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Thursday, May 21, 2015

लोहड़ी के गीत


दस बजे हैं सुबह के, अभी कुछ देर पूर्व ही ‘क्रिया’ की. सुबह अलार्म सुना तो था, पर ठंड के कारण और रात को सोने में देर हो जाती है, इस वजह से अथवा तो प्रमाद के कारण फौरन बिस्तर नहीं छोड़ा, फिर नन्हे को स्कूल भेजने के कार्य में व्यस्त हो गयी. नैनी, स्वीपर के जाने के बाद ही बैठी, महाभारत व भगवद् गीता का पाठ करने के बाद. सुबह जून से बात की. वह परसों पिताजी से मिलने जा रहे हैं. आज यहाँ ठंड बहुत ज्यादा है, कोहरा और बादल दोनों ही हैं, अभी तक धूप नहीं निकली है. सुबह सत्संग भी नहीं सुना, कुछ देर स्वयं का ही भागवद पाठ सुना. कृष्ण की कथा का अमृत है भागवद्, जिसे पढ़कर उसके हृदय में कृष्ण के लिए अथाह प्रेम उमड़ा था. वह इतनी प्यारी बातें कहते हैं अपने ग्वाल-बाल मित्रों से, गोपियों से, सखा उद्धव से और मित्र अर्जुन से कि बरबस उन पर प्यार आता है. वह सभी को निस्वार्थ प्रेम करते हैं, बिना किसी प्रतिदान की आशा के, एकान्तिक प्रेम और जो उन्हें प्रेम करता है उसे वह अभयदान देते हैं, वह उनके निकट आकर निर्भय हो जाता है. ध्यान में उसे उनके क्षणिक दर्शन होते हैं, क्योंकि उसका ध्यान टिकता नहीं है.. पर ऐसा होगा एक दिन अवश्य कि साक्षात वह उसे मिलेंगे. वह उसकी हर बात जानते हैं. उसकी सारी छोटी-बड़ी इच्छाएं उनपर उजागर हैं. उसकी सारी कमियों के वह साक्षी हैं. उसका प्रमाद व लापरवाही भी उनसे छुपी नहीं है और उसका प्रेम भी..वह तो प्रकट होने को आतुर हैं, वे ही ऐसे अभागे हैं कि मन को इतर विषयों से मुक्त नहीं कर पाते, मन में संसार प्रवेश किया रहे तो उसे बिठाये कहाँ ? मन की ही चलती है ज्यादातर, वे जो वास्तव में हैं पीछे ही कहीं छिपे रह जाते हैं. जैसे कोई अपने ही घर में सबसे कोने में दुबका रहे और घर पर पड़ोसी कब्जा कर लें, वही हालत उनकी है. दुनिया भर की फिक्रें वे करते हैं बिना किसी जरूरत के पर जो वास्तव में उन्हें करना चाहिए उसके लिए समय नहीं निकाल पाते. आत्मा में रहकर ही विशुद्ध प्रेम का अनुभव होता है. आज नन्हे की किताब में तीन कार्ड देखे जो उसके क्लास की लडकियों ने दिए थे, यह भी एक तरह का प्रेम है !

आज लोहड़ी है, स्नान करते समय बचपन में लोहड़ी पर गाए जाने वाले गीत याद आ रहे थे. एक सखी ने फोन करके मुबारकबाद दी. जून को अभी-अभी फोन किया, वह घर पहुंच गये हैं, चाय पी रहे थे. उन्होंने मिठाई भिजवाई है, अभी उस दिन उनका भिजवाया गया सामान ऐसे ही पड़ा है, उनके बिना खाने का नन्हा और उसका दोनों का ही मन नहीं करता. आज नन्हे का स्कूल बंद है, देर से उठे वे. नौ बजे थे, वह ‘क्रिया’ कर रही थी कि एक परिचिता मिलने आयीं, नन्हे ने कह दिया, माँ नहा रही हैं, यह भी एक तरह का मानसिक स्नान ही तो है. जैसे दिन भर में देह व वस्त्रों पर धूल जम जाती है, वैसे ही मन पर भी विकारों की मैल चढ़ जाती है, जिसे हर सुबह वे क्रिया के माध्यम से स्वच्छ करते हैं. स्वाध्याय के माध्यम से भी उसे सुंदर बनाते हैं जैसे वह मन पर लगाने वाले क्रीम, लोशन आदि है.

ठंड आज भी बहुत है, नन्हा ऐसी ठंड में साइकिल से कोचिंग के लिए गया है. वह यहाँ हीटर के पास बैठी है. जून अभी घर पर हैं, सुबह उनसे बात हुई. उन्होंने पिता और भाई की तरफ से उसके लिए कोट खरीदा है, नन्हे के लिए भी स्वेटर खरीदे हैं. पहले ही वह सामान भिजवा चुके हैं. वे कितना भी सोचें कि अब उन्हें और कुछ नहीं चाहिए, पर जब भी नया कुछ मिलता है तो उसे लेते समय झिझकते नहीं और कर्मों के बोझ सिर पर चढाये ही जाते हैं. दुनिया ऐसे ही चलती है और ऐसे ही वे बार-बार जन्म लेते रिश्ते बनाते व निभाते चले आते हैं. ज्ञान होता भी है तो थोड़े से सुख के लिए उसे अपनी सुविधानुसार मोड़ लेते हैं. जीवन ऐसे ही चलता चला जाता है. आज ध्यान करते-करते और गीता पाठ करते समय भी कृष्ण की बातें जैसे मन को भीतर तक छूना चाहती थीं पर मन तो फोन पर की बातों में उलझा था, मन टिकता नहीं एक जगह, जब वे उसे प्रलोभन का शिकार होने देते हैं. आज सद्गुरु ने बताया, जीवन जितना परमार्थ के लिए होगा, सामर्थ्य उतना ही बढ़ेगा, स्वकेंद्रित होकर वे अपनी ही हानि करते हैं, स्व का विस्तार करना होगा. गहराई से देखें तो वे सभी एक ही तत्व से बने हैं, एक ही तत्व की तरफ जा रहे हैं. सभी को एक उसी की तलाश है...

Saturday, February 7, 2015

स्वेटर्स की धुलाई


कल शाम वह पहली बार aol के सत्संग में गयी. ॐ के उच्चारण से आरम्भ हुआ और फिर एक के बाद एक कई भजन गए गये. कृष्ण, राम, शिव और गणेश के नामों का उच्चारण संगीत के साथ श्रद्धापूर्वक किया गया. प्रसाद बंटा फिर एक महिला ने अपने अनुभव सुनाये. तेजपुर से इटानगर तक उनकी कार में गुरूजी ने सफर किया उनसे बातें की, पूरा परिवार बेहद उत्साहित व प्रसन्न था मानों उन्हें गुरू रूप में अमूल्य निधि मिल गयी हो. गुरू की महिमा ऐसी ही होती है. वापस लौटने में उसे देर हो गयी, पौने आठ बज गये जबकि चर्चा अभी जारी थी, जून को लेने भी जाना पड़ा और उन्हें इतनी देर होना भी नहीं भाया. खैर...भविष्य में क्या होगा भविष्य ही बतायेगा. रात को देर तक गुरूजी के बारे में सोचती रही. मन में कई विचार आ जा रहे थे, सब कुछ जैसे अस्पष्ट सा हो गया था. दो नावों पर पैर रखने वाले की स्थिति सम्भवतः ऐसी ही होती है. उसे अपना मार्ग स्वयं ही खोजना होगा. उपासना की भिन्न-भिन्न विधियों के जाल में स्वयं को उलझाना ठीक नहीं है. कृष्ण को अपने जीवन का आधार मानकर उससे ही ज्ञान पाना होगा. इस बार ‘महाभारत’ भी वे लाये हैं. स्टेशन पर ही मिल गया. अभी आरम्भ से पढ़ना शुरू नहीं किया है. कल द्वितीय खंड की भूमिका पढ़ी. सफाई का कार्य अभी चल रहा है, दो-एक दिन और चलेगा.

आज ‘जागरण’ में ध्यान की विधि सिखा रहे थे. सुंदर वचनों से हृदय प्रफ्फुलित हो उठा. कुछ देर संगीत अभ्यास किया फिर एक परिचिता आयीं अपने तीन-चार वर्ष के पुत्र को लेकर. जाते समय वह नन्हे के तीन-चार खिलौने लेता गया जो उसकी आदत है. अगले दिन माँ सबको वापस भिजवाती हैं. पुत्र मोह इन्सान से क्या-क्या करवाता है. आज नन्हा वाशिंग मशीन में स्वेटर धोने का कार्य कर रहा है. सभी स्वेटर धोकर अगली सर्दियों तक सहेज कर रखने होंगे. कल कुछ वस्त्र मृणाल ज्योति में देने के लिए निकाले, सोमवार को एक अन्य महिला के साथ वह वहाँ जाएगी. एक अन्य परिचिता का फोन आया, मुख्य अधिकारी की विदाई के लिए उन्हें दो कविताएँ चाहियें.


आज सुबह पौने पांच बजे उठी. जून ने मच्छरों के कारण नेट के अंदर ही क्रिया करने की तैयारी कर रखी थी जब वह ब्रश आदि करके कमरे में आयी. कल पहली बार एसी भी चलाया, गर्मी एकाएक बढ़ गयी थी. आज फिर बादल छा गये हैं. सुबह घर में सभी से बात हुई, पिताजी काफी ठीक लगे. छोटी बहन मेजर बनने वाली है मई में, उसे बधाई देनी है. गुरू माँ ने कहा, जिसके हृदय में प्रेम नहीं वह धार्मिक नहीं हो सकता, दिल में प्रेम हो, सरलता, सहजता हो, विश्वास हो तो ईश्वर की तरफ चलने के पात्र बन सकते हैं वे. ईश्वर जो उनके भीतर है उन्हें उनसे भी ज्यादा अच्छी तरह जानता है. उसे बाह्य आडम्बरों से कुछ भी लेना-देना नहीं है, वह तो मन, बुद्धि का साक्षी है. वे कितने भले हैं अथवा कितना ढोंग क्र रहे हैं, उसे सब पता है इसलिए उसके सम्मुख कोई दुराव नहीं चल सकता. खुले मन से उसे पुकारना है, खुली आँखों से उसे निहारना है. जिस मन में कोई छल न हो, जिन आँखों में कोई भ्रम न हो..  

Thursday, February 20, 2014

धूप के कतरे


क्लब की प्रेसीडेंट का फोन आया, उन्होंने कार्यक्रम की थीम के लिए कुछ नाम पूछे, वह फोन पर बहुत विनम्रता से, मधुर आवाज में बात कर रही थी. उसने कुछ शब्द बताये, आड़ोलन, आह्वान, आह्लाद, स्फुरण, स्पंदन, समन्वय, तारतम्य, अनुराग, शुचिता, अनुरक्ति, मकरंद, पराग, किसलय आदि, पर कोई भी शब्द उनके दिल को स्पर्श नहीं कर सका. आज नन्हे ने सुबह उठने में फिर नखरे किये, ठंड में बिस्तर से निकलने का उसका मन ही नहीं था. उन्होंने टीवी पर एक साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा, भारत ने पाकिस्तान को हरा कर बांग्लादेश का independence cup  जीत लिया.

रात्रि के पौने दस बजे हैं, सुबह से लिखने का समय अब मिला है, वह भी उसने चुराया है, जून तो सो जाने को ही कह रहे हैं. आज दिन अच्छा था, सुनहरी धूप से भरा हुआ. एक दिन की धूप से ही ठंड कम हो गयी है. संगीत की कक्षा ठीक रही पर उसे लगता है जितना सहज होकर वह  अभ्यास करती है वहाँ वह सहजता खो जाती है. अगले हफ्ते उनका हारमोनियम भी आ जायेगा. सुबह माँ ने कपड़े प्रेस कर दिए थे. उसने नाश्ते में पोहा बनाया था, उन्हें पसंद आया, माँ-पापा को भी यहाँ रहना अच्छा लग रहा है, और उनका जीवन भी पहले से कहीं ज्यादा भरा हुआ हो गया है. उसने ध्यान दिया है कि आजकल मन एक अलग तरह से शांत रहता है. बैकडोर नेबर के यहाँ गयी, जिसने घर में ही ब्यूटी पार्लर खोला है, पर वहाँ वह ‘मिस इंडिया’ की माँ का फेशियल करने में व्यस्त थी, उनके गर्व भरे शब्दों व उनकी बेटी की बातें उनके मुंह से सुनीं, TOI में उसका फोटो भी देखा. पहली बार असम की कोई सुन्दरी प्रतियोगिता में विजयी हुई है. शाम को उनकी मीटिंग सामान्य रही, इतने से काम के लिए सभी area coordinators को बुलाना व दो घंटे बिठाए रखना सार्थक नहीं लगा, खैर ! अभी तक भी थीम के लिए सही शब्द नहीं चुना जा सका है, महिलाओं से सम्बन्धित ऐसा शब्द उन्हें चाहिए जो उनके बारे में सब कुछ कहता हो !

जून अभी-अभी गये हैं छाता लेकर, सुबह से जो बादल झींसी के रूप में बरस रहे थे अब तेज हो गये हैं. आज भी पार्लर का अनुभव कुछ अलग ही रहा, एक तो समय बहुत लगाया, दूसरे घरों में काम करने वाली चार-पांच लडकियाँ भी आ गयीं, उस छोटे से कमरे में इतने लोग, क्यों न हों, आखिर वे उसकी क्लाइंट थीं. माँ सुबह से जून के स्वेटर में डिजाइन डालने का प्रयास कर रही थीं, काम चाहे कठिन हो अगर उन्हें विश्वास हो कि कर सकेंगी तो वह उसे छोडती ही नहीं हैं और अगर थोड़ा सा गलत हो जाये तो पूरा खोलने में जरा भी हिचकिचाती नहीं हैं. दोपहर को टीवी पर दूर दर्शन के धारावाहिक देखती हैं, औरत, अपराजिता और वक्त की रफ्तार....आदि. पिता दिन भर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं, लाइब्रेरी से वे किताबें लाये थे, एक लता मंगेशकर पर लिखी किताब दूसरी सरदार पटेल के जीवन पर. शाम को जून उन्हें सांध्य भ्रमण पर ले जाते हैं. उसने सोचा, जून हैरान होते होंगे यह देखकर कि आजकल नूना दोपहर के भोजन से पहले फल और बाद में कोई स्वीट डिश वह कितने आराम से खा लेती है, इन्सान का बचपन साये की तरह सदा उसके साथ लगा रहता है.

नेता जी का जन्मदिन, आज धूप सुबह से ही भरपूर निकली है, जमीन का कतरा-कतरा धूप से भर गया है. दोपहर उन्होंने लॉन में गुजारी, घास पर फूलों के बीच, मगर सूरज की तरफ पीठ करके. नन्हा आज सर्दी खांसी के कारण स्कूल नहीं गया था. जून का फोन आया है, वह उसे डॉ के पास ले जाने आ रहे हैं. एक परिचिता अस्पताल में है, उसने सोचा वह भी उसे देखने चली जाएगी.

पिछले दो-तीन दिन डायरी नहीं खोली, इतवार को वे तिनसुकिया गये थे, माँ-पापा ने केन का कुछ सामान खरीदा और कुछ तांत की साड़ियाँ भी. उसका चिर-प्रतीक्षित हारमोनियम खरीदने का स्वप्न भी पूरा हो गया, पर अभी उँगलियाँ अभ्यस्त नहीं हो पा रही हैं, संकोच वश पूरी आवाज से गा भी नहीं सकी, सभी लोग घर में थे. कल छब्बीस जनवरी का अवकाश था, टीवी पर ‘सरदार बेगम’ देखी, श्याम बेनेगल की एक फिल्म. आज सुबह उसने बहुत दिनों बाद statistics पढ़ाई. हिंदी का कोर्स समाप्त हो गया है. उस दिन बहुत दिनों बाद असमिया सखी आई, पहले की तरह कुछ नुक्ताचीं और कुछ प्रशंसा के भाव से भरी...कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, वे यहाँ के जीवन से अन्तुष्ट हैं, कहीं भी और जाना चाहते हैं, पर उसे यह स्थान पसंद है, यहाँ की हवा, मिटटी, सुगंध सभी कुछ ! उसकी खुशियाँ उसके विचारों और कार्यों पर आधारित हैं न कि किसी बाहरी वस्तु पर.








Thursday, January 30, 2014

पूजा का अवकाश


आज मंगलवार है और कल बुधवार, यानि वह दिन जब उन्हें अपने घर में सांस्कृतिक संध्या और रात्रि भोज का आयोजन करना है, लेकिन कोई भी कार्य बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो जाये ऐसा कहीं हो सकता है ? जिन्हें निमन्त्रण दिया है वे यदि व्यस्त हों, उपस्थित न हो सकते हों तो सारा आयोजन ही व्यर्थ हो जाता है. पहले केवल एक परिवार के देर से आने की बात थी पर अभी जब दूसरी सखी ने भी कहा तो मन...बेचारा नाजुक सा मन मुरझा ही गया. एक दुःख, पीड़ा का अहसास हो रहा है, यह पीड़ा रिजेक्शन के कारण उत्पन्न हुई है. जिन्दगी में ऐसा कई बार हुआ है और होगा पर हर बार कचोट उतनी ही नई लगती है. शायद उसका मन कुछ ज्यादा ही sensitive है पर जिस बात पर वश नहीं उसे लेकर क्यों परेशान हुआ जाये जैसे कोई हाथ पर रखा कीड़ा झटक दे या जुल्फों से पानी झटक दे उसी तरह दिमाग से इस बात को झटक कर उत्सव की तयारी में जुट जाना चाहिए. वे यह उत्सव अपनी ख़ुशी को सबके साथ मिल कर  बाँटने के लिए मना रहे हैं, यदि कोई नहीं शामिल हो सकता तो कोई बात नहीं, वे तब भी प्रसन्न  रहेंगे. अभी मात्र साढ़े नौ हुए हैं, सारा दिन उसके सामने हैं अगर सुबह-सवेरे ही मन कुम्हला गया तो दिन ढलते-ढलते तो...

आज वे दिगबोई गये थे, कुल चार परिवार मिलकर पूजा देखने, दशहरे की दो छुट्टियाँ अभी शेष हैं. पिछले तीन दिन पूजा के उल्लास में कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. बुधवार को उन्होंने रात्रि भोज का आयोजन किया था, जो खासा ठीक रहा बस ‘कोफ्ते’ कुछ ज्यादा मुलायम नहीं बने थे. उसके अगले दिन यानि कल वे तिनसुकिया गये उसने छोटी बहन की दूसरी बेटी के लिए ऊन खरीदी लाल रंग की बेबी वूल...एक सखी के बेटे के लिए एक ड्रेस और जून और स्वयं के लिए जूते. नन्हे ने पहली बार Gents beauty parlor में hair cut करवाए. जून का स्वास्थ्य थोड़ा सा नासाज है, वैसे भी छुट्टियों में आलस्य घेर लेता है, वह भी पिछले दिनों गरिष्ठ भोजन के कारण भारीपन का अनुभव कर रही थी.

एक खुशनुमा इतवार की सुबह ! हल्के बादल सुबह से ही थे, अभी-अभी रिमझिम वर्षा होने लगी, पर चंद घड़ियों की मेहमान थी, अब धूप निकल आई है. कल दोपहर उन्होंने ‘साहेब’ देखी, अनिल कपूर का अभिनय अच्छा है. कल रात्रि नन्हे ने ‘स्पीड’ देखी. जून और उसे नींद आ गयी पर वह  अकेले ही जग कर देखता रहा. उसका गृहकार्य अभी भी शेष है.

आज दस दिनों के बाद नन्हा स्कूल गया है, कल शाम से तैयारी कर रहा था, थोड़ा सा परेशान हुआ पर सुबह ठीक था. प्रोजेक्ट वर्क सभी पूरे कर लिए थे. कई दिनों बाद एकांत मिला है, सिर्फ चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है. आज सुबह उसकी छात्रा आई थी, वह अभी और पढ़ना चाहती है, नूना को भी पढ़ना होगा, हिंदी कविता इतनी आसान नहीं कि बिना पढ़े ही पढाई जा सके, फिर उसके जाने के बाद जून ने, जो उसका बेहद ख्याल रखते हैं, तुलसी की चाय बनाकर दी, सुबह पहनने के लिए स्वेटर भी निकाल कर दिया था रात को. पड़ोसिन से उसके बेटे के प्रोजेक्ट के बारे में बात हुई, उनके विचार टकराए, पर इससे घबराना क्या ?  पीटीवी पर किन्हीं अदीब से गुफ्तगू सुनकर जहन में कई सवाल आ खड़े हुए, मसलन लोग किस बात पर यकीन करें, ईश्वर की सत्ता को किस सीमा तक स्वीकारें या नकारें या इस बात को बिलकुल ही नजर अंदाज कर दें. जीवन को सही रूप से जीने के लिए आधारभूत मूल्य क्या हैं ? कौन से आदर्श अपनाएं और किन नैतिक गुणों को अपनाएं. इस संसार में स्वयं को किस तरह योग्य बनाएं और अपनी योग्यता सिद्ध करें, जीवन किन बातों से सार युक्त बनता है और किन से सार हीन ! विश्वास और श्रद्धा का केंद्र क्या हो, बिना पतवार की नाव की तरह जीवन भर इधर-उधर न भटकते रहें. जीवन का उद्देश्य क्या हो? क्या जीवन के मार्ग में जो भी आए जो सहज प्राप्त हो उसे साधते चलना और स्वयं को उसके अनुकूल ढालना ही जीने की सच्ची कला नहीं ?  अपने आस-पास के लोगों, वातावरण और प्रकृति को खुशनुमा बनाना, उनके विकास में सहायक होना ही कर्त्तव्य नहीं, अपने समय का सदुपयोग कर विभिन्न कलाओं का सृजन कर मन को व्यर्थ के विचारों से मुक्त रखना ही क्या जीवन का साधन नहीं, नैतिक गुण और आध्यत्मिकता क्या स्वयंमेव ही नहीं समा जायेंगे ऐसे जीवन में जो स्वार्थ के दायरे से मुक्त हो. जहां द्वेष व परायेपन का अहसास न हो, जहां आलस्य व प्रमाद का स्थान न हो, जहाँ मन में सुख व शांति हो, जहां प्रियजनों के प्रति वास्तविक प्रेम हो, जहाँ मानसिक स्वतन्त्रता हो, सहज प्राप्य सम्पत्ति से पूर्णतया संतोष हो, लोभ, क्रोध और राग-द्वेष आदि दुर्गुणों से परे हो. वह लिख ही रही थी कि फोन की घंटी बजी, मुम्बई से जून के लिए कोई फोन था, उसने उन्हें दफ्तर का नम्बर दिया पर सम्भवतः जून वहाँ भी नहीं मिले.



Wednesday, January 22, 2014

किताबों की दुनिया


आज मौसम अच्छा है, ठंडी हवा, बादल और हरियाली ! गुलदाउदी के पौधों के लिए सहारे की जरूरत है, ज्यादा पानी पड़ने से पौधे तिरछे हो गये हैं. नैनी का लड़का बांस के खप्पचे तैयार कर  रहा है, फिर उन्हें बांधेगे और अब नीम की खली भिगोने का भी समय हो गया है. अभी-अभी उसी सखी से बात की, मन भर आया, अभी तो जाने की बात भर है, जब वास्तव में जा रहे होंगे तब... वे भी तो उन्हें उतना ही याद करेंगे. कुछ देर पूर्व पड़ोसिन से बात हुई उस दिन सैंडविच काटने के कारण एक सखी को बांह में दर्द हो गया था, उसे अस्पताल तक जाना पड़ा पर उसके साथ बात करने पर उस सखी ने यह बात नहीं बताई, शायद उसकी प्रतिक्रिया (कि वह बहुत नाजुक है) याद करके या उसकी तरह वह अपनी कमजोरी जाहिर न करना चाहती हो. शाम को वह घर पर ही रही स्वेटर बनाते हुए. अचानक उसे ध्यान आया यूँ अपने आप से बातें करते चले जाना कितना आसान है पर चिन्तन करना, सोचना-समझना कितना मुश्किल, हर पल मन पर नजर रखना यानि कि सब कुछ निरपेक्ष भाव से देखना शुरू करना, बिना किसी तुलना या भेद भाव के, और वह देखना ही सही सम्बन्धों का आरम्भ होगा. सुबह जून ने कहा, आलस्य के कारण शाम को उनके लिए उसने oats नहीं बनाये थे, बात कुछ हद तक सच भी थी पर चुभ गयी और अहम् का गुब्बारा पिचक गया, लोगों से कैसे पेश आयें कि न ही उन्हें दुःख हो, न ही स्वयं को, बातचीत करना दुनिया की सबसे बड़ी कला है जो स्वयं ही सीखनी पडती है, किसी भी स्कूल में नहीं सिखाई जाती.

क्लब में आज डिबेट है, कपड़े धोते समय मन में विचार आया क्या उसे सुनना सफल होगा, या फिर क्यों जाएँ वे सुनने ? उसकी दोनों सखियाँ नहीं जाना चाहतीं. उसके पास जाने का सबसे बड़ा कारण है लोगों को बोलते हुए सुनना, ऐसे तो टीवी पर हर दिन कितने ही लोगों को सुनते हैं पर अपने आस-पास के लोगों में से कुछ को अपने विचार रखते देखना सचमुच एक सुखद अनुभव होगा. मात्र सुनना और उन पलों की सुन्दरता को महसूस करना.

आज सुबह प्रमाद के कारण उठने में फिर देर हुई, जून तो जल्दी –जल्दी तैयार होकर दफ्तर चले गये पर वह सोचती रही कि दुनिया भर की किताबें पढने के बाद भी अगर उसमें इतना सा भी बदलाव नहीं आया तो व्यर्थ है पुस्तकों का पढना. स्वयं सोचना सीखना चाहिए. दूसरों के ज्ञान के सहारे अपनी नैया नहीं खे सकते. आधी से ज्यादा जिन्दगी बीत चुकी है पर सही मायनों में जीना अभी तक नहीं आया. ले दे कर कुल तीन प्राणी हैं घर में, उनमें भी आपस में कभी न कभी कोई टकराव हो ही जाता है चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, पर क्या यह अनुचित है? बात यह नहीं कि टकराव अनुचित है या नहीं, पर उसकी वजह उसकी नासमझी भी तो हो सकती है या सही संवाद का न होना भी, और ये बातें किताबों से पढकर नहीं सीखी जा सकतीं, सीख भी लें पर उसे अमल में लायें तो सही.

उसकी रोटी, जिसकी मेहनत, जिसका श्रम है ! आज घर कितना साफ लग रहा है, दर्शन पर किताबें पढने से अच्छा तो उन पर जमी धूल साफ करना है, मन हल्का है, तन शायद थका है पर यह थकान संतोष देती है, कुछ करने का संतोष. आज फोन पर किसी से कोई बात नहीं की, समय ही कहाँ था, कल शाम वे क्लब जाने के लिए तैयार हो रहे थे, एक परिवार मिलने आ गया, हंस कर अपने पतिदेव की शिकायत करना आगन्तुका की आदत है, उसकी नन्ही बेटी बातूनी हो गयी है, और पुत्र पहले की तरह है शर्मीला. कल जून ने बताया उन्हें एक पेपर प्रस्तुत करने दिल्ली जाना होगा. नन्हे की आजकल स्वीमिंग कोचिंग चल रही है, वह खुशदिल, शांत और मिलनसार बच्चा है, सुबह-सुबह उठने में उसे परेशानी होती है पर रात देर तक पढ़ सकता है.




Wednesday, October 9, 2013

गर्मागर्म पकौड़े


आज दिन बदली भरा है, सो हल्की ठंडक महसूस हो रही है आज काम जल्दी समाप्त करके उसे टोपी बनानी है. शाम को एक सखी के घर जाना है, उसका जन्मदिन है, उसके हाथ में हरी मिर्च छूने से जलन हो रही है, किसी पत्रिका में इसके मिटाने का उपाय पढ़ा था पर याद नहीं है, वक्त पर याद न आये ऐसे पढने से क्या लाभ, वह पत्रिकाएँ पढकर बहुत जल्दी ही भूल जाती है. लेडीज क्लब की मीटिंग में एक सरप्राइज गेम था, पर न तो वह विज्ञापन ही पहचान सकी न कलाकारों के चित्र, किसी ने कहा आप इतनी पत्रिकाएँ पढ़ती हैं, ठीक ही कहा, उसे ज्यादा पहचान होनी चाहिए, पर वह विज्ञापन न तो देखती है न पढ़ती है. टीवी पर ‘झूठी’ फिल्म आ रही है, माँ-पिता बहुत शौक से देख रहे हैं. कल शाम असमिया सखी बहुत दिनों बाद आयी, उसने पकौड़े बनाये, और लगा कि उसमें तेल बहुत लगता है, इतना तेल स्वास्थ्य के लिए शायद ठीक नहीं है, अच्छा है कि वह साल में एक या दो बार ही बनाती है. कल दोपहर ‘बुनियाद’ देखा, अच्छी लगती है लाजो जी की बातें और हवेलीराम का उसे ‘लाजो जी’ कहना. नन्हे का आज हाफ डे है, २६ से उसकी परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं शायद इसीलिए. नैनी बगीचे से मूला का साग तोड़ कर लायी है, इस वक्त काट रही है.

  
ठंड एकाएक पिछले दो दिनों से बढ़ गयी है, कल सारे स्वेटर, स्कार्फ आदि निकाल दिए, आज धूप दिखाने के लिए रखे हैं. जून आज सुबह माँ-पिता को गोहाटी तक छोड़कर वापस आ गये, उस दिन जब वे जा रहे थे उसकी आँखें भर आई थीं. उनका रहना उसे अच्छा भी लगा और कुछ बंधन सा भी था. फिर इतवार और कल का दिन नन्हे को पढ़ाते व पढ़ते बीते. इस बार उसे पढ़ाने में मेहनत कम लग रही है, जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है उसे याद करने की अथवा रटने की जरूरत कम होती जा रही है.

पिछले दो दिन फिर मौन, कल सुबह आशा पारेख और धर्मेन्द्र के अभिनय में उलझी रही और परसों एक पुराने मित्र के लिए लंच बनाने में, पता नहीं क्यों उनसे मिलकर वह जिसे कहते हैं न दिल से ख़ुशी होना, वह नहीं हुई, जून भी उतना खुलकर नहीं मिले जैसे अन्य मित्रों से मिलते हैं. वह अपने दिल्ली वासी होने के या विदेश भ्रमण करने के गरूर में खोये से लगे खैर.. नन्हे से कहकर उनके बेटे के लिए कार्ड अवश्य बनाना है. कल रात जून से और भी कार्ड बनाने की बात कही थी, नया साल आने वाला है और उन्हें कई जगह कार्ड भेजने हैं. आज धूप नहीं निकली है सूरज बादलों के पीछे छिपा है, सर्दियों में धूप की कीमत कितनी बढ़ जाती है. जून आजकल खुश रहते हैं, कुछ दिनों की नियमित दिनचर्या से मिली आजादी को अच्छी तरह enjoy करते हुए ! कल पूरे एक महीने बाद उसने पत्रों के जवाब दिए, फोन और पत्र दूरियों को कम कर देते हैं.

अपने–अपने घरों में कैद
खुद से बतियाते
अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग
क्या जानें कि नदी क्यों बहती है
दूर बीहड़ रास्तों से आ
ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे
तटों को भिगोती, धरा को ठंडक
पहुंचाती चली जाती है
क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता
नदी की गोद से उछल कर शाम हुए उसी में सो जाता है
आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब
संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स
सदियों से सर्द हुआ मन
धूप की गर्माहट पाकर पिघल कर
बहने लगता है नदी की धरा के साथ
बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना
जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें
नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में
मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप
की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आयें
हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा
जब निकल जाये
तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर
नदी के साथ समुन्दर तक चले जाँए..
धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब
सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में
अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न 

Thursday, March 28, 2013

एक घर आस-पास


  

 आज उन के जाने के बाद कामों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि अब जाकर वह थोड़ा वक्त निकाल पाई है, सुबह देर हुई उन्हें उठने में सो सब काम ही लेट होते चले गए, कल की सुबह अच्छी रही, दोपहर भी और शाम भी..वे बाहर गए थे एक मित्र के यहाँ बीहू की चाय पीने. माँ ने नन्हे के लिए एक स्वेटर बनाकर भेजा है, बहुत सुंदर है, कभी वह भी ऐसे ही स्वेटर बना सकेगी अपने.. के लिए. लेकिन अभी जो स्वेटर वह जून के लिए बना रही है, आगे बढ़ ही नहीं पा रहा है, आज से ज्यादा समय देगी, नहीं तो सर्दियाँ खत्म हो जाएँगी और..नन्हा चम्पक पढ़ रहा है इस समय, कल उसके स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम है, वे जायेंगे. आज धूप खिली है पूरी तरह, पहले दो दिनों की वर्षा ने धरती को कितना हर-भरा कर दिया है, पौधों में जैसे जान आ गयी है, और ऐसे ही उजाला भर गया है उसके दिल में जून के आने से. अभी कुछ देर में वह आ जायेंगे, अभी भोजन पूरा नहीं बना है, पर ये चंद लाइनें ...जिसमें नूना वह सब लिखना चाहती है जो महसूस कर रही है. थोड़े दिनों की दूरी स्नेही जनों के लिए टॉनिक का काम करती है. दूर होने पर वे एक-दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह देख सकते हैं, नजदीकियां कभी-कभी दृश्य को धुंधला कर देती हैं न, उसकी सारी खूबियाँ वह महसूस कर रही थी जब वह उसके पास नहीं थे..विवाह के नौ वर्षों बाद जैसे वे एक-दूसरे को नए सिरे से पहचान रहे हैं...कितनी बातें करनी हैं उससे, पर वक्त ही नहीं मिलता क्योंकि अब जितना भी वक्त मिले उसे कम लगता है...

  पिछले पांच दिन व्यस्त थी, नन्हे का स्कूल बंद था, फिर ‘क्लब मीट का सप्ताह’, रोज ही शाम को क्लब जाते थे वे, समय निकाल ही नहीं पायी, समय शायद मिलता भी पर एकांत नहीं, सो मन स्थिर नहीं, एकाग्र भी नहीं. आज नन्हा स्कूल गया है और जून डिपार्टमेंट, और वह अपने विचारों के साथ है. काफी कुछ घटा पिछले दिनों, कई लोगों से मिलना भी हुआ. कोलकाता से उनके एक पुराने परिचित आये. कल खत लिखने का दिन है, उसने सोचा, इस बार पंजाबी दीदी को भी लिखेगी. मौसम आजकल मेहरबान है, सो क्लब के कार्यक्रम भी सुसम्पन्न हो गए, पर जिसका उसे इंतजार था, यानि पत्रिका, वह तो मिली नहीं, शायद कुछ दिनों बाद मिले, छपी तो है ही, पहले कभी इतनी उत्सुकता से प्रतीक्षा नहीं की, इस बार जाने क्या बात है, जिसका उसे भी पता नहीं, इसका अर्थ हुआ कि अचेतन मन में ऐसे कितने विचार हैं, जिनका चेतन मन तक को भान नहीं है. शनिवार को फिल्म देखी, “वह छोकरी” मन आक्रोश से भर उठा और कल की फिल्म में भी सड़क पर, फ़ुटपाथ पर पलने वाले बच्चों की दयनीय स्थिति देखकर बहुत दुःख हुआ, इतनी सुख-सुविधाओं में रहकर कभी-कभी वे ईश्वर से, जीवन से शिकायत करते हैं लेकिन अनाथ जिनका इतनी बड़ी दुनिया में कोई नहीं, कैसे जीते होंगे, बड़े होकर अपराधी बन सकते हैं ऐसे ही कुछ लोग शायद...इस दुनिया में सभी को अपने-अपने सुखों व दुखों के साथ जीना ही है. कोई क्या कर सकता है, वह क्या कर सकती है ? हाँ, इतना तो कर सकती है कि उन अनाथों का दुःख शब्दों में व्यक्त कर सके, लेकिन इससे उनका दुःख कम तो नहीं होगा, न सही, उनके दुःख को महसूस करने वाला कोई है यह संतोष तो होगा, तो पिछ्ले पन्नों पर यही लिखेगी, उसने घड़ी की ओर देखा, साढ़े दस बजने को हैं और अभी ढेर सा कम बाकी है.

  आज एक नया स्वीपर आया है, बुद्धू सा लग रहा है, ऐसे व्यक्तियों को देखकर और पिछले दिनों टीवी पर एक घर आस-पास में अज्जू को देखकर भी बचपन में मिली पिता के एक सहकर्मी की बेटी की स्मृति हो आती है कितनी मासूम थी वह, जिसे उसके माता-पिता छिपा कर रखते थे, और अपनी संतानों में भी नहीं गिनते थे. साढ़े दस हो गए है न, अभी उन्हें  आने में आधा घंटा है, आते ही उन्हें भोजन मेज पर लगा हुआ चाहिए, ताकि आराम से झपकी ले सकें, जितना लम्बा लंच ब्रेक यहाँ होता है शायद ही कहीं और होता हो, पूरा डेढ़ घंटा, कोई चाहे तो एक घंटा आराम से सो सकता है, पर उसे लगता है इतना भी क्या आराम पसंद होना, अति हर चीज की बुरी होती है, कितने सारे काम पड़े हैं घर के, समय ही नहीं मिल पाता जिन्हें करने का, शाम को तो बिलकुल नहीं...कल शाम वे पुस्तक मेला गए थे, पर वहाँ केवल असमिया किताबें थीं. कल नन्हा एक जन्मदिन की पार्टी में गया था, उसे रिटर्न गिफ्ट इतना अच्छा मिला है, वह जो उपहार ले गया था उसकी तुलना में, जून भी कभी-कभी कंजूसी कर जाते हैं. कल उसने छह खत लिखे, अच्छा लगा इतने दिनों बाद सबसे बातें करके. अबसे हर सोमवार को कम से कम दो पत्र तो लिखेगी ही, अभ्यास बना रहता है. दोपहर को पडोसिन के यहाँ जाना है, स्वेटर का नया डिजाइन सीखने, वह बहुत स्वेटर बनाती है हर साल ही. आज उसने दाल-पालक यानि साई-भाजी (सिंधी में) बनाया है, अभी फुल्के बनाने हैं. सचमुच यह स्वीपर अज्जू से कम नहीं है.  


Friday, March 22, 2013

स्क्रैम्ब्लर-हिज्जों का खेल




अचानक उसका ध्यान पर्दों पर गया तो सोचा बेडरूम के पर्दे धुलवाने चाहिए, कारपेट धुलवाने की बात भी की है धोबी से. फ्रिज में से सब्जियां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, पर लगता है बाजार जाने की जरूरत जल्दी नहीं पड़ेगी, बगीचे से गाजर व गोभी मिल सकती हैं. आज उसने शाम को नाश्ते में पनीर का परांठा बनाया, सो रात को देर तक भूख ही नहीं  लगी, पौने दस बजे है, उसने रोज की तरह लिखना शुरू किया है, सोचा, जून भी इसी वक्त सोने की तैयारी कर रहे होंगे. शायद उन्होंने भी ‘विविधा’ की कहानी देखी हो टीवी पर. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आना चाहता था, पर जून के न होने कि बात सुनकर नहीं आया. पड़ोस से नन्हे का मित्र आ गया था, सो वह दूर तक टहलने भी नहीं जा सकी. माली भी नहीं आया, प्लायर्स से नल खोल कर पानी दिया पौधों को फिर वैसे ही बंद किया. सुबह रजाई का गिलाफ धोकर चढाया. दिन में स्वेटर बनाया. नन्हे को स्कूल की पत्रिका के लिए कोई कविता या कहानी लिखनी है, इस समय लेटे हुए वही सोच रहा है. “ओशीन” धारावाहिक आज नहीं दिखाया जा रहा, अगले सोमवार को वह जून के साथ देखेगी. नन्हे को स्कूल में हेल्पेज के लिये बीस रूपये जमा करने थे, उसके पास दस रूपये थे, पचास वह ले जाना नहीं चाहता था, ऐसे वक्त में पड़ोसी ही तो काम आते हैं., लिखाई बिगड़ने लगी तो उसे लगा ठंड से उसकी उंगलियाँ अकड़ गयी हैं शायद, या ज्यादा देर स्वेटर बनाने से, वहाँ जून के शहर में तो इससे भी ज्यादा ठंड होगी.

रात्रि के साढे नौ बजे हैं, नन्हे ने इस वक्त उसे गुस्सा दिलाया है, काम के समय दुनिया भर के सवाल पूछता है और बातें करता है उस वक्त, जब कोई काम कहा गया हो, वैसे वह शायद रोज ही ऐसा करता हो पर आज उसे सिर में दर्द है, दोपहर को फिल्म देखी शायद इसी कारण. उसका रिपोर्ट कार्ड मिल गया है, आज वह स्कूल में पहली बार किसी टीचर के घर गया था.

बुधवार, आज बारह तारीख है, उसका मन हो रहा है जल्दी से सोने के लिए लेट जाये, शाम को बगीचे में काम किया, टहलने गयी अकेले, दोपहर को स्वेटर बनाती रही, थकान हो गयी है, जून होते तो.... अब बहुत हो गया अकेले रहना...अब बिलकुल अच्छा नहीं लगता मन करता है उससे ढेर सारी बातें करूं. उसके बिना कितने सारे काम भी तो बढ़ गए हैं न, नन्हा सो गया है, उसकी छुट्टी आज जल्दी हो गयी थी, कल भी ऐसा ही होगा, उसने कहानी लिख ली है पत्रिका के लिए.

“जिंदगी तू भी पड़ोसन की तरह लगती है
आज तोहफे में कुछ दे है तो कल मांगे है”
‘मुन्नवर राना’ का यह शेर उसे अच्छा लगा तो लिख लिया डायरी में.   

  परसों जून आ जायेंगे, सुबह से यह ख्याल आकर मन को सुकून दे गया है, उन्हें महसूस करने लगे हैं वे अब, उनकी हंसी उनका स्पर्श सब स्पष्ट हो गया है, नन्हा कह रहा है पापा के आने पर हलवा-पूरी बनाइएगा, आज दोपहर को इतने दिनों में वह पहली बार एक घंटा बेड में थी, कारण वही, नन्हा भी लेट कर टीवी देख रहा था, उसके स्कूल में आज जाते ही छुट्टी हो गयी पर वह साढ़े बारह बजे ही आ पाया, अब एक हफ्ते बाद स्कूल में पढ़ाई होगी. क्योंकि छह दिन बाद वार्षिक दिवस है. सुबह सामान्य रही सिवाय इसके कि गाजरें निकलीं गार्डन से, जून के लिए गाजर का हलवा बनाना है न, टमाटर भी मिले. उसके एक सहकर्मी सर्वोत्तम तथा आधा किलो मटर दे गए, उसने मंगाए थे. शाम को पड़ोसियों के साथ क्लब गए बीहू का कार्यक्रम था, सवा सात पर लौटे. घर आकर स्क्रेमब्लर खेलते रहे, समय का ध्यान ही नहीं रहा, खाना देर से खाया. कल टीवी पर ‘हुन हुन्शी हुन्शाराम’ गुजराती फिल्म Sदिखाई जायेगी और परसों “सूरज का सातवाँ घोड़ा”, जो वे साथ-साथ  देखेंगे. उसने मन ही मन जून से स्वप्न में आने कि बात कही, मच्छर दानी भी नहीं लगा रहे वे आज, नन्हा इस समय गुड नाईट में नई मैट लगा रहा है.

Tuesday, July 24, 2012

पौधे पर जोंक




आज एकाएक इतने दिनों बाद डायरी उठा लेने के पीछे कारण है, कल जून उसके लिये एक स्लैक्स लाए हैं जिसे पहन कर वह व्यायाम करेगी और एक अलार्म घड़ी, सुबह-सुबह उठाने के लिये. सुबह इतनी सुंदर होती है वह तो जैसे भूल ही गयी थी. प्रातः कालीन शांत वातावरण, शीतल हवा और रात की वर्षा के कारण धुला-धुला सा सब कुछ जैसे एक कविता लिखने का आमन्त्रण हो. सामने वाली उड़िया निवासिनी शायद अभी सो ही रही है उस दिन उसने कहा था कि सुबह पांच बजे वे दोनों साथ-साथ घूमने जायेंगे. जून अभी सोये हैं वह उठाकर तो आयी है पर नींद शायद टूटी नहीं. उनकी लेन में लगाये गए वृक्षों पर पहली बार फूल लगे हैं, बयार में धीरे धीरे झूल रहे हैं. आज शुक्रवार है क्लब में फ़िल्म का दिन, वे जायेंगे पर नन्हा आधा घंटा भी बैठने नहीं देता, उसे भला फिल्म में क्या रूचि हो सकती है. आजकल हर बात अपनी मनवाना चाहता है. जून परेशान हो जाते हैं. उसे भी कभी-कभी झुंझलाहट होती है पर अगले ही पल लगता है प्यार से ही समझाना होगा.

आज की सुबह कल की तरह शीतल नहीं है, वह उठकर बाहर आयी तो खिड़कियाँ खोल दीं व पंखा बंद कर दिया था कि सुबह की ताजी हवा कमरे में भर जायेगी, लेकिन बाहर हवा नहीं है सो उसने पुन पंखा चला दिया यह सोचकर कि नन्हे और जून को गर्मी लगेगी. तभी उसने देखा कि उड़िया लड़की साइकिल चलाकर लौट रही है, तो वह वजन घटाने के लिये यह करती है, इसका अर्थ हुआ कल भी वह सोयी नहीं थी. कल बड़ी भांजी को जन्मदिन कार्ड भेजा और आज चचेरी बहन को स्वेटर का पार्सल भेजना है. वातावरण की उमस उसे परेशान करने लगी, सुबह-सुबह तो मन शांत होना चाहिए, मधुरतम भावनाओं से भरा हुआ. उसे लगा वह भीतर से कठोर हो गयी है, लिखना छोड़ वह शेष कार्य करने भीतर चली गयी.

कल इतवार था वह उस पड़ोसन के साथ घूमने गयी थी, उन्होंने काफ़ी लम्बा चक्कर लगाया एक घंटा लग गया. आकर लेट गयी और पांच मिनट बाद ही जून भी उठ गए, सो लिख नहीं सकी, बाद में याद आया तो सोचा कि इतवार के लिये डायरी में जगह ही कहाँ होती है. आज वह हरसिंगार के फूल लायी है. जहाँ वह बैठी है उसकी चप्पल के पास एक जोंक का बच्चा है दो सेंटीमीटर लम्बा होगा  होगा. उस रात को जून के पैर पर एक जोंक चिपक ही जाती उसे पता चल गया. आज थोड़ी ठंड है अब हर दिन ज्यादा ही होती जायेगी, वे शिलांग से जो फूलों के पौधे लाए थे उन्होंने जमीन पकड़ ली है, अभी गुलाब की कलम में अंकुर नहीं फूटे हैं जीवन के. कल रात उनके बायीं ओर वाले पड़ोसी वापस आ गए पूरे पन्द्रह दिनों के बाद, अभी अभी गृहणी बाहर आयी थीं, लाइब्रेरी से वह दो पुस्तकें लायी थी, अभी पढ़ी नहीं हैं. 

Tuesday, July 3, 2012

पटाखों की गूंज


जब भी पिछले दिनों उसने सोचा कि कुछ लिखे या पढ़े, नन्हें मियां ने आवाज दे दी, अब उसके जगते हुए ही वह लिख रही है, अभी तो चुपचाप खेल रहा है, पर पता नहीं कब ऊँ ऊँ आ आ शुरू कर दे, और चाहे कि उसके साथ बातें करो. मौसम ठंडा हो गया है. सर्दियाँ आ ही गयी हैं. उसने सोचा कि उसके लिये एक और स्वेटर तो बना ही लेना था अब तक. हो सकता है आज कल में माँ का भेजा पार्सल मिल ही जाये.
जून लाइब्रेरी गए हैं और नन्हा सो रहा है यानि नूना फुरसत में है, ऐसे पल कहाँ मिलते हैं आजकल तभी तो आज उसने आठ खत लिखे. वैसे छह बज चुके हैं किसी भी क्षण वह आ जायेंगे. नन्हें के लिये कितने सुंदर स्वेटर भेजे हैं माँ ने, उसकी आँख की समस्या ज्यों की त्यों है अब घर जाने पर ही उसका इलाज होगा.
परसों दीवाली है ज्योति उत्सव, और कल है भारत की प्रिय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की पुण्य तिथि. उन्हें इस दुनिया से विदा हुए कितना समय बीत गया है पर उनकी स्मृति अभी भी ताजा है. जून का परीक्षाफल अच्छा रहा वह एक ग्रेड ऊपर चढ़ गये हैं. आज बहुत दिनों बाद इसी खुशी में नूना ने पूरा खाना बनाया है. उसके आने से पहले मेज सजा कर रखी है. नन्हे को भी शायद आभास हो गया कि माँ व्यस्त है वह आराम से सोया. कल उसे लेकर वे अपने दो मित्र परिवारों के यहाँ गए, उसने गुलाबी स्वेटर पहनाया था, बहुत खिल रहा था उस पर. जून ने उसके कितने फोटो खींचे हैं, जब बन कर आएँगे कितना अच्छा लगेगा. दीवाली के दिन वह नूना के भी खींचने वाला है. यदा-कदा  पटाखे कई दिनों से बजने लगे हैं, उनकी आवाज से सोया हुआ छोटू चौंक जाता है.   

Tuesday, April 24, 2012

हर खुशी हो वहाँ...


आज सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविन्द सिंह जी का जन्म दिवस है. जिनका जन्म पटना में माता गूजरी देवी के घर हुआ था. टीवी पर समाचारों में देखा व सुना. दिन में बाजार गयी माँ के साथ, एक किताब खरीदी, बेबी हेल्थ गाइड, किताब हिंदी में है पर नाम अंग्रजी में है, यह दोनों भाषाएँ घुलमिल गयी हैं एक दूसरे में. बाजार से एक रील बॉक्स भी लिया, महरी के लिये धोती व साडी तथा खुद के लिये एक पर्स भी. शाम को गाजर का हलुआ बनाया जैसे बनारस में वे सासु माँ बनाती हैं. बच्चों की एक फिल्म जब वह टीवी पर देख रही थी तो मन कह रहा था शायद जून भी यही फिल्म देख रहा हो.
आज उसका खत आ गया, कोलकाता से लिखा हुआ. उसका स्वेटर बनने वाला है. छोटा भाई कल चला गया, दीदी व बच्चों के लिये उपहार भेजे हैं, अगले महीने मिलने भी जाना है. सुबह पहली बार नींद जल्दी खुल गयी, कितना अँधेरा था, सभी तो इस वक्त रोज ही उठ जाते हैं. कल रात भी नींद नहीं आ रही थी. जून ने खत में लिखा है, “हर हाल में खुश रहना सीखो”, जब उसे यहाँ रहना ही है तो क्यों न खुशी-खुशी रहे, दोपहर को दादी जी ने भी एक उदाहरण देकर समझाया कि खुश रहना सीखो. फिर कितने तो काम हैं करने को. उदास होने का समय ही न बचे ऐसी दिनचर्या बनानी चाहिए. कल अवश्य ही वह गमले ठीक करेगी. किताबें पढ़ना शुरू करेगी. इतने दिन तो बीत ही गए उसने सोचा मात्र तीन-चार हफ्ते ही तो और उसे जून से अलग रहना है. हो सकता है जून फरवरी में ही आ जाये तो कितना अच्छा होगा.  
 

Thursday, April 12, 2012

अदरक की चटनी


आज सुबह कुछ देर के लिये और फिर शाम को उसे घबराहट हो रही थी, पर कुल मिलाकर दिन ठीकठाक ही रहा. सुबह वह इसी कारण देर से उठी, जून पहले ही उठकर चला गया था. दोपहर को फिर सो गयी एक स्वप्न भी देखा, उठकर शाम के नाश्ते के लिये बेसन का हलवा बनाया जो स्वप्न के कारण ही बनाया था. शाम को वे बाजार गए, उसे आजकल बाइक पर बैठना भी रास नहीं आता या हो सकता है यह उसका वहम हो, उसने सोचा. वे कई दुकानों पर गए, उसने ऊन खरीदी और अ पने लिये एक आधी बाँह का स्वेटर बनाना भी शुरू कर दिया है. कल उसी बंगाली मित्र की शादी की पहली सालगिरह थी, उन्होंने उसे एक छोटा सा उपहार भी दिया, वह जरूर खुश होगी. जून ने उसे समझा ही दिया है कि उसका यहाँ अकेला रहना ठीक नहीं है, बल्कि उसे ससुराल या मायके में रहना चाहिए जब वह मोरान में रहेगा, जैसे ही उसका काम खत्म होगा वह उसे लेने आ जायेगा. वह उसका बहुत ख्याल रखता है. नूना ने अदरक, टमाटर और प्याज की चटनी नुमा सब्जी बनायी उसे अच्छी नहीं लगी फिर भी उसने पूरा खाना उसी से खाया.