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Friday, December 1, 2023

क्वार्ड बाइक का रोमांच

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं, सब तरफ़ सन्नाटा है, केवल पंखे की हल्की सी आवाज़ आ रही है। दिन भर शोर सुनने की आदत हो गई है, उनके घर के दायें-बायें दोनों तरफ़ के घरों में काम चल रहा है। धूल व शोर से बचने के लिए वे दिन भर खिड़कियाँ बंद करके रहते हैं, पर इस समय खुली हैं।अचानक फ़ोन की घंटी बजी, एक विज़िटर को अप्रूव किया, अमेजन डिलीवरी है शायद, नन्हे ने कुछ भेजा होगा। घर बैठे ही ख़रीदारी करने की जो सुविधा मिली है आजकल, सभी उसका पूरा लाभ उठा रहे हैं। पहले ही उसके लिए रंग और कैनवास की तीन कॉपी मंगाकर रख दी हैं नन्हे ने । वे अभी कुछ देर पहले टहल कर आये हैं। हवा ठंडी थी, दिसम्बर का मध्य आ चुका है, पर यहाँ अभी तक चाहे एक नंबर पर ही सही, पंखा चलता है। उससे पहले डिनर में सूप और मुकरु लिए। दोपहर को लेखन का कुछ कार्य किया, छोटे भांजे के लिए एक कविता भी लिखी। पिटुनिया के दो पौधे मुरझा गये थे, उन्हें बदला, पीछे वाले बगीचे में भी काम करवाया, उन्हें दवा-पानी दिया। पौधे भी बच्चों की तरह होते हैं, ध्यान न दें तो पनप नहीं पाते। सुबह धनिया और पालक के बीज बोए, शायद एक हफ़्ते में अंकुर निकल आयेंगे।आज एक पुरानी परिचिता को फ़ोन लगाया, देर तक बातें हुईं, और अचानक शाम को एक अन्य परिचिता का फ़ोन अपने आप आ गया। वे जो देते हैं, वह लौटकर उनके पास ही आता है, यह सही है, उसे ऐसा लगा। 


आख़िर आज कामवाली आयी, घर की सफ़ाई भली प्रकार से हुई।दोपहर को मुख्य घटनाओं का ज़िक्र करते हुए उसने जाते हुए वर्ष का लेखा-जोखा लिखा। योग वसिष्ठ का अध्ययन पुन: आरम्भ किया है। यह दुनिया एक स्वप्न ज़्यादा  कुछ नहीं है, ऐसा ही तो होना भी चाहिए। यह एक खेल है, एक लीला है, आनंद का प्रस्फुरण है, तरंगों का उठना-गिरना है, रस है जो अबाध बह रहा है। इसमें ज़्यादा फँसने की ज़रूरत नहीं है। अघोरा, घोरा और घोरतारा शक्तियों का खेल, शब्दों का एक मायाजाल, जिनसे वे व्यर्थ ही प्रभावित होते रहते हैं। शब्द जहां से निकलते हैं, वहाँ पहुँच जाओ तो चैन ही चैन है।  


आज का इतवार काफ़ी अलग रहा। सुबह टहलने गये तो वॉकिंग मैडिटेशन किया, पता ही नहीं चला, पचास मिनट कैसे बीत गये। वापस आकर कुछ पंक्तियाँ लिखीं, कल टाइप करेगी। बच्चे दस बजे के बाद आये। दोपहर के बाद नन्हा क्वार्ड बाइक चलाने ले गया। काफ़ी रोमांचक अनुभव था। जून ने थोड़ी दूर तक ही चलायी। वह और नन्हा एक गाँव में गये, ऊँची-नीची कच्ची सड़क पर लगभग आधा घंटा चलायी।ढेर सारी तस्वीरें खींची। एक कार्यक्रम में टीवी पर सुना, कल राजकपूर का जन्मदिन है और शैलेंद्र की पुण्यतिथि। दोनों ने कई फ़िल्मों में साथ काम किया था। शाम को छोटी बहन से बात हुई, उसकी दोनों बेटियाँ क्रिसमस की छुट्टियों में घर आयी हैं। छोटी स्टैटिसटिक्स में एमएसी कर रही है, बड़ी जॉब कर रही है, संगीत भी सीख रही है और वह एक सप्ताह के लिए भारत भी आना चाहती है।देश से दूर रहकर देश की ज़्यादा याद आती है। यहाँ भी क्रिसमस की चमक नज़र आने लगी है। सामने वाली लाइन में दो घरों में लाइट और स्टार लग गये हैं। शाम को रोज़ की तरह सूडोकू हल किया, अब अभ्यास होने के कारण अधिक समय नहीं लगता, पहले दस से बीस मिनट उसमें लग जाते थे। एक सखी का फ़ोन आया, उसके बेटे की कोर्ट मैरिज हो गई है, सामाजिक विवाह अगले वर्ष होगा। वक्त बदलता है तो प्रथाएँ भी बदल जाती हैं। किसानों के आंदोलन का आज बीसवाँ दिन है, सरकार का कहना है वह बात करने के लिए तैयार है, यदि वे सुझाव लेकर आयें।    


Thursday, June 22, 2017

पौधों की आँखें


जून कल गोहाटी गये हैं, आने वाले कल दिल्ली जायेंगे. अभी कुछ देर पहले फोन आया उनका. सवा पांच बजे हैं, कुछ देर में प्राणायाम सीखने माली का पिता और उसकी दो पोतियाँ आयेंगी, अब उन्हें आते हुए एक हफ्ते से ज्यादा समय ही हो गया है. छह बजे से भजन है. नैनी के यहाँ से भी भजनों की मधुर आवाज आ रही है. आज दो सखियों से बात की. कल क्रिसमस है, एक अन्य से कल करेगी. सुबह उठी तो सिर में दर्द था, जो अभी तक बना हुआ है, पर बीच-बीच में गायब हो जाता है. देहभाव जब हट जाता है तभी शायद महसूस नहीं होता होगा. ठंड बढ़ गयी है, पर इस वक्त फायर प्लेस में आग जल रही है, कमरा गर्म है. दीदी से फोन पर बात हुई, देहरादून में भी ठंड है, सुबह वह देर से उठने लगी हैं. छोटे भाई का फोन देवप्रयाग से आया, वह आज गोपेश्वर जा रहा है, ऐसा उसने कहा. वर्षों पूर्व उसने वहाँ की रामलीला में अभिनय किया था. इतने वर्षों बाद भी लोगों को याद था. उसका अभिनय सराहा गया था.

अज क्रिसमस है, बादल हैं, मौसम ठंडा है. सूरज जल्दी अपने घर चला गया है. आज वह नर्सरी गयी थी, कुछ फूलों के पौधे लिए. शायद एक महीने बाद इनमें फूल आयें. रंग-बिरंगे फूल जो पौधों की आँखें हैं ओशो के अनुसार, जिनसे वे जगत को निहारते हैं. वह जब अस्तित्त्व को निहारती है, तो वह एकाएक कितना मुखर हो उठता है. एक कोहरे जैसा श्वेत धुआं सा उठने लगता है. घास कितनी सुंदर हो जाती है, चमकदार और जैसे कोई तिलस्म घट रहा है, परमात्मा कितना सुंदर है और उनके चारों ओर है, भीतर की शांति गहराती जा रही है, एक अनोखा जगत छिपा है, इसी जगत के भीतर जिससे वे अनजान ही बने रहते हैं. समाधि का अनुभव कैसा होता है यह तो नहीं मालूम, लेकिन एक अनोखी शांति इस बार उसने अनुभव की है. जून का बाहर जाना भी शायद परमात्मा की इस लीला का एक हिस्सा है. उनके रहते ध्यान इतना घर नहीं हो पाता, अब लगातार दो घंटे बैठना सम्भव है. सद्गुरु की कृपा का अनुभव भी हर क्षण होता है.

नया वर्ष आरम्भ हो चुका है. आज दूसरा दिन है. परसों वे यात्रा पर गये. उससे पूर्व ही तैयारी करते समय ज्ञात हुआ अभी भी मन प्रतिक्रिया करने से बाज नहीं आता, अपने को ऊपर रखने से भी और स्वयं को सही सिद्ध करने से भी, आश्चर्य करने के सिवा और किया क्या जा सकता है. परमात्मा का इतना-इतना प्रेम पाकर भी ऐसा होता है तो..वैसे जिन लोगों के साथ बर्ताव करना होता है उन्हें परमात्मा की खबर कहाँ है ? शायद सहज रूप से सभी के भीतर से जो भी आता है उसे ही परमात्मा का इशारा समझ कर स्वयं को साधना में आगे बढ़ते देना है. कृष्ण इसलिए ही गीता में कहते हैं, प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के उत्पन्न होने पर भी जो सम रहता है वही मुक्त है. जो ‘है’, उस पर ध्यान देना है, जो ‘नहीं’ है उस पर नहीं, तो है ही सब कुछ घेर लेगा. परमात्मा भरपूर है, हर जगह है.. हर समय है... वही उसके द्वारा काम कर रहा है. आज इस क्षण यह बात स्पष्ट हो रही है. परमात्मा उसकी वाणी, उसकी लेखनी, उसके रग-रग में समा गया है. वह उससे दूर नहीं है, वह उसीमें है. वह उसे अपनी बाँसुरी बना ले..अपनी कठपुतली.. अपनी आवाज..अपना संदेश...अपना बना ले, बस इतना ही काफी है..वही ऋत है..वही धर्म है..वही सत्य है..वही नियम है..वही है..वही है..!


Tuesday, June 3, 2014

पतझड़ का मौसम


She began her spiritual journey long ago but still she is very far from destination, when in college read books and in those days she used to feel a presence but with passing of years began to doubt even in its existence. Now again after fruitless effort  of obtaining true happiness and peace that never lasts, she has come to Him. He says that she should change herself because all her sorrows and despairs are her own creations, created by ego. When she will do her duties with selfless love she will be happier, and when she will be at ease with herself, Meditation will find its way, nowadays mind wanders because it has no base to stay in. Buddha also says your mind is your friend and is your enemy. It is  mind with false ego which dances  on its tune. Never doubting  real self one should be above from its whims and fancies.

शाम का वक्त है, मौसम अच्छा-खासा है, न सर्दी न गर्मी, न पूरी तरह दिन अस्त हुआ है न दिन शेष ही है. शाम का ऐसा सुहाना वक्त जब दिन और रात मिलते हैं. पडोस की छोटी लड़की घर की सीढ़ियों पर बैठकर कविताएँ याद कर रही है. माली दिन की जाती रोशनी में गुलाब के पौधों की निराई करने में व्यस्त है. वह इतने सारे घरों में काम करता है, सुबह से ड्यूटी बजाते-बजाते हर दिन किसी न किसी घर में शाम हो जाती है. पूसी, घर की बिल्ली घास पर लेटी अपनी थकान मिटा रही है. बीच-बीच में चौकन्नी होकर इधर-उधर ताकने लगती है फिर बदन सिकोड़ती हुई गड्डमड्ड सी हो बैठ जाती है. मई महीने की शाम वर्षा के कारण थोड़ी सी नमी लिए हुए है, पौधे हरे-भरे होकर शांत-संतोषी भाव लिए दीखते हैं. पौधों में जान होती है, शायद उनमें भावनाएं भी होती हों, वर्षों तक एक ही जगह खड़े-खड़े पीपल, आम और कटहल के पेड़ क्या ऊब नहीं जाते होंगे, सामने खड़ा कनकचम्पा का पेड़ आधा हरा है, नये कोमल पत्ते धारण कर चुका है और आधा अभी पुराने सूखे पत्ते लिए काला दीखता है. गुलदाउदी के पौधों में कुछ पर फूल आ चके हैं, कुछ अभी तक पुष्प हीन हैं. प्रकृति में सभी संयमी हैं, जिनपर फूल आ गये हैं उन्हें कोई घमंड नहीं और जिनपर नहीं आये हैं उन्हें कोई दुःख नहीं, वही पेड़ जो वसंत आने पर फूलों से लद जाता है, पतझड़ में ठूँठ सा लगता है पर अपने ऊपर सारे मौसमों की मार सहता हुआ तटस्थ भाव से खड़ा रहता है. दूर से कु कू.. की आवाजें आ रही हैं, दो पंछी जैसे जुगलबंदी कर रहे हों.

आज चार दिनों के बाद डायरी खोली है, पिछले चार दिन सुखमय थे, उसके मन पर किसी भी तरह का बोझ नहीं था, जिन्दगी पहले की तरह खुशनुमा लगने लगी थी और यह कायाकल्प हुआ काम करने से, उसने हर क्षण अपने को व्यस्त रखा. पिछले दिनों की उदासी अकर्मण्यता का परिणाम थी. हाथ सदा काम में लगे रहें तो मन भी शांत रहता है, कहीं कोई उहापोह नहीं. आज भी सुबह से कार्यों का क्रम जारी है. मानव अपने लिए परेशानियों की किले खुद ही बनाता चलता है. उम्र के साथ-साथ स्वभाव में जो परिपक्वता आनी चाहिए कभी-कभी उसका अभाव खटक जाता है. स्वयं को नहीं जाना, ऐसा लगता है. कभी कभी रात को जब नींद से आँखें बोझिल होती हैं. मन में विचार एक रील की तरह चलते हैं, एक-दूसरे से बिलकुल अलग विचार, जिन पर उसका कोई नियन्त्रण नहीं है. उसकी सारी समस्याओं का हल उसके अंतर में ही मिल सकता है क्योंकि वहीं चैतन्य का निवास है, जो मानव को अच्छे कर्मों पर आनंद और विकर्मों पर दुःख की अनुभूति कराता है. कल उसने तीन पत्र भी लिखे..


Wednesday, January 22, 2014

किताबों की दुनिया


आज मौसम अच्छा है, ठंडी हवा, बादल और हरियाली ! गुलदाउदी के पौधों के लिए सहारे की जरूरत है, ज्यादा पानी पड़ने से पौधे तिरछे हो गये हैं. नैनी का लड़का बांस के खप्पचे तैयार कर  रहा है, फिर उन्हें बांधेगे और अब नीम की खली भिगोने का भी समय हो गया है. अभी-अभी उसी सखी से बात की, मन भर आया, अभी तो जाने की बात भर है, जब वास्तव में जा रहे होंगे तब... वे भी तो उन्हें उतना ही याद करेंगे. कुछ देर पूर्व पड़ोसिन से बात हुई उस दिन सैंडविच काटने के कारण एक सखी को बांह में दर्द हो गया था, उसे अस्पताल तक जाना पड़ा पर उसके साथ बात करने पर उस सखी ने यह बात नहीं बताई, शायद उसकी प्रतिक्रिया (कि वह बहुत नाजुक है) याद करके या उसकी तरह वह अपनी कमजोरी जाहिर न करना चाहती हो. शाम को वह घर पर ही रही स्वेटर बनाते हुए. अचानक उसे ध्यान आया यूँ अपने आप से बातें करते चले जाना कितना आसान है पर चिन्तन करना, सोचना-समझना कितना मुश्किल, हर पल मन पर नजर रखना यानि कि सब कुछ निरपेक्ष भाव से देखना शुरू करना, बिना किसी तुलना या भेद भाव के, और वह देखना ही सही सम्बन्धों का आरम्भ होगा. सुबह जून ने कहा, आलस्य के कारण शाम को उनके लिए उसने oats नहीं बनाये थे, बात कुछ हद तक सच भी थी पर चुभ गयी और अहम् का गुब्बारा पिचक गया, लोगों से कैसे पेश आयें कि न ही उन्हें दुःख हो, न ही स्वयं को, बातचीत करना दुनिया की सबसे बड़ी कला है जो स्वयं ही सीखनी पडती है, किसी भी स्कूल में नहीं सिखाई जाती.

क्लब में आज डिबेट है, कपड़े धोते समय मन में विचार आया क्या उसे सुनना सफल होगा, या फिर क्यों जाएँ वे सुनने ? उसकी दोनों सखियाँ नहीं जाना चाहतीं. उसके पास जाने का सबसे बड़ा कारण है लोगों को बोलते हुए सुनना, ऐसे तो टीवी पर हर दिन कितने ही लोगों को सुनते हैं पर अपने आस-पास के लोगों में से कुछ को अपने विचार रखते देखना सचमुच एक सुखद अनुभव होगा. मात्र सुनना और उन पलों की सुन्दरता को महसूस करना.

आज सुबह प्रमाद के कारण उठने में फिर देर हुई, जून तो जल्दी –जल्दी तैयार होकर दफ्तर चले गये पर वह सोचती रही कि दुनिया भर की किताबें पढने के बाद भी अगर उसमें इतना सा भी बदलाव नहीं आया तो व्यर्थ है पुस्तकों का पढना. स्वयं सोचना सीखना चाहिए. दूसरों के ज्ञान के सहारे अपनी नैया नहीं खे सकते. आधी से ज्यादा जिन्दगी बीत चुकी है पर सही मायनों में जीना अभी तक नहीं आया. ले दे कर कुल तीन प्राणी हैं घर में, उनमें भी आपस में कभी न कभी कोई टकराव हो ही जाता है चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, पर क्या यह अनुचित है? बात यह नहीं कि टकराव अनुचित है या नहीं, पर उसकी वजह उसकी नासमझी भी तो हो सकती है या सही संवाद का न होना भी, और ये बातें किताबों से पढकर नहीं सीखी जा सकतीं, सीख भी लें पर उसे अमल में लायें तो सही.

उसकी रोटी, जिसकी मेहनत, जिसका श्रम है ! आज घर कितना साफ लग रहा है, दर्शन पर किताबें पढने से अच्छा तो उन पर जमी धूल साफ करना है, मन हल्का है, तन शायद थका है पर यह थकान संतोष देती है, कुछ करने का संतोष. आज फोन पर किसी से कोई बात नहीं की, समय ही कहाँ था, कल शाम वे क्लब जाने के लिए तैयार हो रहे थे, एक परिवार मिलने आ गया, हंस कर अपने पतिदेव की शिकायत करना आगन्तुका की आदत है, उसकी नन्ही बेटी बातूनी हो गयी है, और पुत्र पहले की तरह है शर्मीला. कल जून ने बताया उन्हें एक पेपर प्रस्तुत करने दिल्ली जाना होगा. नन्हे की आजकल स्वीमिंग कोचिंग चल रही है, वह खुशदिल, शांत और मिलनसार बच्चा है, सुबह-सुबह उठने में उसे परेशानी होती है पर रात देर तक पढ़ सकता है.




Tuesday, December 24, 2013

ए सूटेबल ब्वॉय


आज फिर मन बादलों के साथ अम्बर में उड़ रहा है, जीवन के प्रति नया विश्वास कायम हो गया है और यह मिला है पौधों के सामीप्य से, नन्हे और बड़े पौधे या पेड़, अगर उन्हें थोड़ा सा प्यार से संवार दें तो कितना कुछ दे जाते हैं. उनका स्पर्श कितना सुकून देता है. पेड़-पौधे मानव के सच्चे साथी हैं जो सिर्फ देना जानते हैं और सिर्फ थोड़े से रखरखाव की मांग करते हैं. आज सुबह नींद एक स्वप्न के कारण खुली, उसके गले की चेन जब फंस जाती है तब कोई चौंकाने वाला स्वप्न आकर जगा देता है. नन्हा आज बहुत दिनों के बाद जल्दी उठ गया, अपने से दुगने वजन के मित्र को साइकिल पर पीछे बैठा कर जब कम्प्यूटर क्लास के लिए जा रहा था, उसे देखकर अच्छा लगा, He has a helping nature. कल उसके बचपन के साथी का जन्मदिन है, उसके लिए जन्मदिन कार्ड बनाएगा, पिछले दिनों उसने एक इंजन बनाया लकड़ी का, जिसे बनाते-बनाते पिछले इतवार को वह बहुत परेशान हो गया था कि रो ही पड़ा था.

इस बार लाइब्रेरी से अच्छी किताबें मिली हैं, एक है विक्रम सेठ की Suitable Boy, बहुत रोचक किताब है, पेज हैं १३४९, काफी दिन लगेंगे इसे पूरा खत्म होने में. इतवार को तो उसने उठते ही पढ़ना शुरू कर दिया था, जब तक जून और नन्हा सो रहे थे. इस किताब ने किसी हद तक उसे बांध लिया है, लता मन के पास रहने लगी है और कबीर पर कभी कभी...खैर. एक किताब किसी मित्र के यहाँ से लाये थे, Cosmic coincidence, कल शाम उन्होंने ‘सपने’ देखी, मन को गहराई तक छू जाने वाली फिल्म..

गालों को सहलाती पलकों को छू जाती
सतरंगी सपने आँखों को दे जाती
नगमे सुनाती, गाती रेशमी हवा

पेड़ों की डालें कभी तो लहराएँ
पीपल के पत्ते धीरे से सरसराएँ
जादू सा जगाये रेशमी हवा..
कुछ ऐसे ही गीत थे फिल्म में.

कल दोपहर को एक छात्रा हिंदी पढ़ने आई, उसे शुरू में थोड़ी सी परेशानी हुई पर धीरे-धीरे शब्द दिमाग में आते गये, अलंकर, छंद आदि का अधिक ज्ञान तो नहीं है, न ही विशेष पढ़ा था, फिर कितने वर्ष हो गये हैं हिंदी साहित्य स्कूल में पढ़े हुए, आज भी वह आएगी, शांत है और लिखाई भी अच्छी है. कल उसने पिछले एक साल से रखे हुए तकिये के गिलाफों पर पेंटिग की, एक फिल्म देखी ‘आस्था’, किसी आस्था टूटी किसकी कायम रही कुछ समझ में नहीं आया, अजीब सी कहानी और अजीब सी फिल्म थी.

आज फिर वर्षा हो रही है, बादल कभी झमझम और कभी रिमझिम बरस रहे हैं, सुमित्रा नन्दन  पन्त ने वह कविता ऐसे ही किसी भीगे दिन में लिखी होगी. चारों ओर हरियाली ही हरियाली और सभी कुछ धुला-धुला सा भीगा-भीगा...गर्मी का नाम भी नहीं, ऐसा मौसम उसे बहुत भाता है. आज भी हल्का दर्द है, यूँ जून ने कल पूछा था कि कल तो वह बिलकुल ठीक हो जाएगी, उन्हें उसका बिखरा-बिखरा सा रहना पसंद नहीं है, कल रात वह ठीक से सो नहीं पाए सुबह उठे तो ठंड की शिकायत की. भाव उनके थे शब्द उसके थे, अनजाने में वे एकदूसरे की भाषा बोलने लगे हैं. नन्हे को आज सुबह जब प्यार से उठा रहे थे तो.. बहुत अच्छा लगा. He has a golden heart !  

कल जून मोरान गये थे, शाम को लगभग सव छह बजे लौटे तो बहुत खुश थे, डिब्रूगढ़ से ढेर सारे आम लाये हैं, मीठे और रस भरे आम. दिन में उसने किताब पढ़ी और सखियों से फोन पर बात की, दोस्ती की खुशबू मन को हल्का कर देती है. कल उनकी लेन की एक परिचिता ने अपने बगीचे के आड़ू भिजवाये, उन्हें फोन पर thanks कहा तो वह अपने बेटे द्वारा की गयी तारीफ करने लगीं, बातों से खुश करना कितना आसान है और वह उसी में कंजूसी कर देती है.    








Wednesday, June 5, 2013

टेनिस की कोचिंग


कल शाम वे घर पर ही रहे, जून एक साथ पांच धर्मयुग ले आये हैं, जिनमें से एक से वह प्रश्न पूछ रही थी, नन्हे को इस तरह के ‘प्रश्नोत्तरी’ कार्यक्रम में बड़ा मजा आता है. कल ‘बकरीद’ का अवकाश है, वह बंगाली परिवार को विदाई भोज पर बुला रही है.

आज धूप बेहद तेज है, नन्हा साढ़े सात बजे आया तो चेहरा धूप से तमतमा रहा था, पर दोपहर को ढाई बजे पुन टेनिस कोचिंग में जाने को तैयार था. इस समय नाश्ता कर रहा है और अपने दोस्तों की बातें बता रहा है, वह अपने जन्मदिन का इंतजार अभी से करने लगा है. आज खाना बनाने का अवकाश है, कल रात को हुए भोज से काफी सारा खाना बच गया है. कल का दिन उन्हें सदा याद रहेगा. सुबह अच्छी थी, दोपहर भी, पर शाम होते ही जब गर्मी में किचन में खड़े होकर पसीना टपका तो थोड़ी उलझन हुई, जून को भी दो-तीन बार बाहर जाना पड़ा, सामान लाने फिर एक मित्र के यहाँ पौधों को पानी देने, जो बाहर गये हुए हैं. इसी सब में एक मित्र परिवार मिलने आ गया, खैर, यह सब हुआ सो हुआ, उनकी दो सॉस की बोतलें टूट गयीं, जो उसने घर पर बनाया था. जून को भी और उसे भी देर रात तक अफ़सोस रहा, पर बीच में रात पड़ गयी और ‘रात गयी बात गयी’ यह कहावत शत-प्रतिशत सही है, अब उन्हें थोड़ा सा भी दुःख नहीं है. यूँ भी उम्र ने इतना तो सिखा दिया है कि दुखी होकर किसी का भला नहीं होता.

आज सुबह मुसलाधार वर्षा हुई, मौसम सुहावना हो गया है, नन्हे के क्लब जाने के बाद वह हल्की फुहार में बाहर टहलती रही कुछ देर, बहुत भली लग रही थीं बूंदें चेहरे पर, हवा भी ठंडी थी. इतनी गर्मी के बाद वर्षा कितनी राहत दे रही है. कल उसकी पुरानी पड़ोसिन वापस आ रही है, वे उन्हें लेने जायेंगे और खाने पर भी बुलाएँगे. आज नन्हे की नई कक्षा की सारी किताबों व कापियों पर कवर चढ़ाने का काम जून पूरा कर देंगे. आज जून के दफ्तर में एक विदाई पार्टी है, वह पूछ कर गये हैं, क्या उनके लिए मिठाई ले आयें, लेकिन उसे मिठाई जरा भी पसंद नहीं है आजकल. सोचकर भी अच्छा नहीं लगता. वैसे भी यहाँ की दुकानों पर क्या शानदार मिठाइयाँ बनती हैं ! नन्हे के आने की आवाज आई, सो उसने लिखना बंद किया.

आज फिर वर्षा की झड़ी लगी हुई है, आज सुबह उठने में थोड़ी देर हुई, यूँ भी घर कुछ बिखरा-बिखरा सा था, ठीक-ठाक करते, खाने की तैयारी करते काफी समय हो गया. कल शाम वह बंगाली सखी से मिलने गयी जो अपनी चचेरी बहन के यहाँ रह रही है, कल वे लोग चले जायेंगे. अब जैसे-जैसे उनके जाने का वक्त आ रहा है, उसे उदासी का अनुभव हो रहा है.

आज मौसम खुशनुमा है और नन्हा ठीक है, उसकी आँखें भी जो कल शाम को लाल हो गयी थीं, अब ठीक हैं, सो उसका मन भी खुश है. कल दोपहर चार पत्र लिखे, जून ने पार्सल भी बना दिया. सुबह एक सखी का फोन आया उसे कुछ दिनों के लिए उनका धोबी चाहिए.  





Thursday, March 14, 2013

बापू ! सुन ले यह पैगाम



सितम्बर का महीना खत्म होने को है, आज कई हफ्तों के बाद कलम उठाई है. पहले जून अस्वस्थ रहे फिर वह कोलकाता चले गये, नूना घर की सफाई में लगी रही. फिर नन्हा अस्वस्थ हुआ और फिर वह व्यस्त रही दुनियादारी में. ईश्वर से जो निकटता उन दिनों वह पुस्तक पढते समय अनुभव की थी उसी का असर है कि इतने झंझटों या कहें सांसारिक कार्यों के बीच भी उसकी याद बनी रही, जिसने उसे शांत रखा है. कुछ देर पूर्व जून से कुछ पूछ रही थी, पर निष्कर्ष यही निकला कि जिन बातों पर वश नहीं उसके बारे में सोच कर अपना समय व्यर्थ करने से कोई लाभ नहीं. आज उन पंजाबी दीदी का पत्र आया है, संभवतः कोलकाता में वे उनसे मिलेंगे. गुलदाउदी के पौधों को धूप में रखा है, लेकिन धूप फिर आँखें चुरा रही है, ईश्वर से थोड़ी धूप मांगी है और वह देगा भी जरूर.

  अभी-अभी वह गमलों की कुड़ाई करके आई है, जब इन पौधों में फूल आएंगे तो यह सारी मेहनत(अगर यह मेहनत है तो) या कार्य सफल होगा, और अगर फूल न भी खिले तो भी उसे कोई अफ़सोस नहीं होगा, पौधों की देखभाल की इतना ही पर्याप्त नहीं क्या ? शनिवार को बाहर ट्रक जो मिट्टी ड़ाल गया था, मजदूर आज उसे अंदर ला रहे हैं, नई मिट्टी में यकीनन फूलों का रंग शोख होगा. आज भी धूप नहीं है, धूप की इतनी कमी शायद ही कभी इतनी महसूस की हो, जब धूप बिखरी रहती थी तब कद्र नहीं की उसकी. जून का एक बटन आज दफ्तर में टूट गया..पहली बार ऐसा हुआ इतने बरसों में. कल उसकी पुरानी पड़ोसिन ने हरा ब्लाउज सिल कर दे दिया, सुंदर सिला है, जून ने भी लो बैक पर कोई एतराज नहीं किया.

 कल मीटिंग सामान्य रही, पहली बार तम्बोला खेला. वह अपनी बंगाली सखी के साथ गयी थी, मगर सदा की तरह उसने वहाँ खुद को अकेला पाया..यह अकेलापन उसकी नियति बन चुका है.. भीड़ में रहते हुए भी अकेलापन. धूप निकली है सुबह से पहली बार, उसने सोचा सारे गमले धूप में रख देगी, यह लिखने के बाद.  
 
   महीने का अंतिम दिन, आज नन्हे का हाफ डे है, बचपन में ऐसा होने पर बच्चे ‘आधी छुट्टी सारी’ गाते हुए आते थे. नन्हा आज सुबह फिर उठना नहीं चाह रहा था, वह पहले से कुछ दुर्बल भी हो गया है, अगले महीने उसके यूनिट टेस्ट हैं, पढ़ाई उतनी नहीं हो पायी है जितन होनी चाहिए. उसके प्रिंसिपल ने यूनिट टेस्ट का टाइम टेबिल देकर अच्छा किया है. निर्माण कार्य भी चल रहा है स्कूल में. कुछ पल पहले राधाकृष्णन व विवेकानंद की पुस्तकों के कुछ अंश पढ़ने का प्रयत्न किया पर सफल नहीं हो पायी, लगता है अब काफी पढ़ लिया है, अमल में लाना चाहिये जितना पढ़ा है. सुबह से झुंझला रही थी, कारण कुछ खास नहीं पर जून के आते ही कहना होगा. कल शाम वे एक परिचित परिवार के यहाँ गए, गृह स्वामिनी ने नूडल्स खिला दिए, रात को वे खाना भी नहीं खा सके, हर बार उनके यहाँ जाने पर ऐसा ही होता है.

  दोपहर के पौने दो बजे हैं, पंखे की घर-घर के आलावा और कोई आवाज कहीं से भी नहीं आ रही है, जैसी ख़ामोशी बाहर है, वैसी ही मन में भी, खुशवंत सिंह कहते हैं कि शांत मन क्रियेटिव नहीं हो सकता, लेकिन अशांत मन क्रिएटिव ही होगा, ऐसा भी तो नहीं है न. कल बापू का जन्मदिन है, संडे मैगज़ीन में एक लेख आया है उनके बारे में, अभी पढ़ा नहीं है, लाल बहादुर शास्त्री नेहरु के प्रिय थे एक जगह पढ़ा, उनका भी जन्मदिन है कल. बचपन में यह गीत कितना सुना करते थे- आज है दो अक्टूबर का दिन...  सुबह समाचारों में भूकम्प से हुई तबाही के चित्र देखे, सुन-देखकर यह ख्याल आता है कि कौन जाने एक दिन उनका भी यही हश्र हो, दुःख तो होता ही है उन ग्रामवासियों के लिए, जो सोये-सोये ही गहन निद्रा में लीन हो गए, पूरा परिवार एक साथ..मानव कितना बेबस है प्राकृतिक आपदाओं के सम्मुख. उन्हें इसी माह घर जाना है, पता नहीं कैसा होगा इस बार का सफर, एक लिस्ट भी बनानी है जो सामान कोलकाता से खरीदना है, चचेरे भाई-बहन, भतीजियों के लिए उपहारों की भी, उपहार देने में जो सुख है वह लेने में कहाँ ?



Saturday, August 25, 2012

बात फूलों की रात फूलों की



आज बड़ी भाभी के परिवार में एक शादी है, उसने सोचा सभी वहाँ गए होंगे. कुछ महीने पूर्व जहाँ एक मृत्यु के कारण गमी का माहौल था अब रौनक होगी, फिर भी उस दुःख की छाया कहीं न कहीं अवश्य पड़ रही होगी. उन्हें भी कार्ड मिला है, उसने सोचा जवाब लिखेगी. बड़ी ननद का खत आया है तथा सदा की तरह उसे नहीं भाई को लिखा है, अब उसका जवाब तो उन्हीं को देने दो.

मन में कैसी अनजानी अनदेखी हिलोरें सी उठ रही हैं. पोर-पोर प्यार में डूबा हुआ, मौसम भी मन को भाने वाला है, ठंडा ठंडा...मन-प्राण को शांत करने वाला. वर्षा की बूंदें एक संगीत उत्पन्न कर रही हैं, कल द्विजेंद्रनाथ निर्गुण की एक अनूठी सी कहानी पढ़ी, ‘सरस्वती’ पढ़ते-पढ़ते विजयलक्ष्मी याद आती रही, ऐसी ही तो थी वह वाचाल, लगातार कुछ न कुछ बोलते रहने वाली. शायद उसने भी पढ़ी हो यह कहानी. उसकी भी शादी अब तक हो गयी होगी, उसका पता शायद किसी पुरानी डायरी में हो. कल क्लब में एक फिल्म थी, हिंसा की पराकाष्ठा थी जिसमें, वे जल्दी ही लौट आये.

कल शाम से ही मन उद्वगिन था, रात को नींद नहीं आ रही यही. साढ़े ग्यारह तक पढ़ती रही उसके बाद सोयी, जून भी उसे देखकर परेशान हो गए थे, पर वह खुद ही अपनी उदासी का कारण नहीं समझ पाती. उसी का परिणाम है आज सुबह एक घंटा बगीची में काम किया, डहेलिया की कटिंग्स लगायी हैं, देखें कितनी बचती हैं. गुलदाउदी के पौधों को भी ठीक किया, माली ने क्यारी ठीक कर दी है, शाम को फ्लॉक्स के बीजों का छिड़काव भी कर देगी. पौधों की प्यार से देखभाल करने से मन प्रसन्न है. उसने सोचा आज से नियमित कुछ देर बगीचे में काम करेगी. आज दोपहर उसे दोनों साड़ियों पर फाल भी लगानी है.

पूजा की छुट्टियाँ भी गुजर गयीं, आज तीन दिन बाद जून ऑफिस गए हैं और धूप भी निकली है आज बहुत दिनों के बाद. सोनू पूरे एक घंटे से दूध का गिलास लेकर बैठा है, बीच बीच में खेलने लगता है, चम्मच से पिलाऊं तो फटाफट पी लेगा पर उसे खुद पीना कभी तो सीखना पड़ेगा. आज सुबह माली आया, पैंजी के बीज भी लगा दिए हैं अब सिर्फ स्वीटपी के बाकी हैं. पूजा के दौरान एक दिन वे दिगबोई गए था, वहाँ गोल्फ फील्ड का खुला मैदान बहुत अच्छा लगा. कल दशहरा देखने गए, बारिश के कारण रावण ठीक से जल नहीं पाया.