Showing posts with label पनीर. Show all posts
Showing posts with label पनीर. Show all posts

Saturday, April 26, 2014

जार्ज बर्नार्ड शा की सीख


‘हर पल अपने विचारों पर नजर रखना अर्थात यह ज्ञात होना कि मन क्या सोच रहा है, ध्यान की पहली सीढ़ी है. ध्यान से जीवन में गहराई आती है. जीवन का ध्येय है सत्य की खोज !  लेकिन सत्य क्या है ? उसकी खोज क्यों करनी है ? यह जगत क्या है ? क्यों है ? इस तरह के प्रश्नों के हल ढूँढने के बजाय क्या उन्हें इस जग में रहकर जीवन को और सुंदर बनाने का ही प्रयत्न नहीं करना चाहिए, जीवन में सुन्दरता तभी आ सकती है जब मन प्रेम से ओत-प्रोत हो, कोई दुर्भावना न हो, कहीं अन्तर्विरोध न हो. जैसी सोच हो वही कर्मों में झलके और वही वाणी में, लोग किसी भी प्राणी या वस्तु के प्रति भी हिंसक न हों और यह सब स्वतः स्फूर्त हो न कि ऊपर से ओढ़ा गया. जब फूल खिलता है तो उसके पास जाकर पंखुड़ियों को खोलना नहीं होता, नदी पर्वतों से उतरती है तो अपना मार्ग स्वयं ढूँढ ही लेती है. ऐसे ही उनके मनों में शुभ संकल्प उठें अपने आप, जीवन के कर्त्तव्यों को नियत करें और उन्हें पूर्ण करें’.

कल नूना की डायरी पर अचानक नजर पड़ गयी तो जून ने यह सब पढ़ा था, कुछ-कुछ उसकी  समझ में आया पर ज्यादा नहीं. आज सुबह पांच बजे का अलार्म सुनते ही वह उठ गया, यह वही जून है जो कुछ वर्षों पहले साढ़े छ बजे भी उठा करता था कभी-कभी, और दौड़ते-भागते बस पकड़ता था. अब समर्पित है अपने काम के प्रति, परिवार और मित्रों के प्रति भी. कल शाम नन्हे की क्लास के कारण वे एक मित्र के यहाँ नहीं गये. दफ्तर से घर लौटा तो नूना उदास थी, पता चला, दोपहर को पहले तो उसकी संगीत अध्यापिका आ गयीं, वह उनके सामने नर्वस हो गयी, दरअसल वह जल्दी आ गयी थीं और वह तैयार नहीं थी, दूसरी बार उनकी पड़ोसिन आई थीं सिन्धी कढ़ाई सीखने, नन्हा और वह एसी चलाकर बैठे थे, सो उन्हें दरवाजे की घंटी की आवाज सुनाई ही नहीं दी, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि उनके घर से कोई इस तरह बिना मिले वापस गया हो. उसने सुझाव दिया कल वह खुद ही उनके यहाँ चली जाये और वह मान गयी.

कल रात फिर वर्षा हुई सो मौसम ठंडा है, जून ने उठते ही कहा, कितना अच्छा मौसम ! नूना ने अपनी असुविधा ( गार्डन में काम के कारण) देखते हुए कहा, अच्छा नहीं है. पर इसकी जरूरत नहीं थी क्यों कि मौसम को जैसा होना है वह वैसा ही रहेगा, उनकी सुविधा-असुविधा का ख्याल रखकर तो वह स्वयं को नहीं बदल लेगा. नूना ने दीवाली की सफाई की शुरुआत कर दी है, आज दोनों गुसलखाने साफ़ करवा रही है. सारी बाल्टियाँ, मग, दीवारें, दरवाजे सभी कुछ. उसने मन ही मन सोचा, सिविल विभाग में बेड रूम में पेंटिंग करवाने के लिए भी कहेगा. आज उसे पड़ोसिन के यहाँ भी जाना है, सिन्धी टाँके का आखिरी स्टेप सिखाने. उसने बताया, आज सुबह से वह अपने विचारों पर नजर रखने का काम कर रही है, देखा कि कभी अतीत और कभी भविष्य में झूलता रहता है मन, टिकता नहीं कहीं भी. एक बात भी उसने आज सीखी ‘जार्ज बर्नार्ड शा’ से, वह हर दिन पांच पेज लिखते ही थे सो आज से वह भी नियमित आसन, संगीत और डायरी के साथ साथ नियमित लिखने का भी अभ्यास करेगी, रोज पांच पेज ?   

आज धूप तेज है, कल सुबह उन्होंने धूप लगाने के लिए गद्दे, तकिये बाहर निकाले ही थे कि आधे घंटे में ही बादल छा गये और जल्दी-जल्दी सभी सामान उन्हें वापस रखना पड़ा. उसका दफ्तर आज बंद है, कुछ सामान पीछे आंगन में रखा है, नूना के साथ शर्त लगाई थी कि आज मौसम खुश्क रहेगा या नम, और लगता है वह हार गयी, पर उसे पता है हार की बात पर यही कहेगी, हारने में भी अपना एक मजा है. उसे उससे क्रॉस वर्ड हल करवाने में भी बहुत आनन्द आता है, शायद वह जानती है, अपने आप वह यह काम कभी नहीं करेगा. उसके दफ्तर में पूजा है, पहले सोचा था वे नहीं जायेंगे, पर दफ्तर का मामला है, उसने नूना से फोन करके कहा, उसे पनीर की डिश बनानी होगी, वह झट मान गयी, शायद कल्पना में यह भी देख लिया हो कि उसकी बनाई सब्जी की सभी तारीफ़ कर रहे हैं. जून ने कई बार ध्यान दिया है, वह हर समय किसी न किसी कल्पना में खोयी रहती है, टीवी देखती है तो उसमें ड़ूब ही जाती है, पात्र उसे बाँध लेते हैं, कहती है, लोगों की मासूमियत, जो उनके चेहरों पर झलक आती है, गहरे जज्बात और एक दूसरे की बात सुनने की तौफीक, उसे पसंद है, उसने पूछा यह तौफीक क्या होती है, तो कहने लगी शायद सलाहियत..उस समय जून यदि कुछ कहे तो वह उसको सुनाई नहीं देता. सुबह जब वह उसे विदा करने आती है तो गेट खोलने व बंद करने का काम करती अवश्य है पर बहुत जल्दी में रहती है, शायद यह काम उसे पसंद नहीं, उसने सोचा, कहीं यह उसका वहम ही न हो.
 





Tuesday, July 16, 2013

पनीर टिक्का और बिरयानी



कई वर्ष पहले उसने पढ़ा था, हर व्यक्ति अंततः अकेला होता है, एक ही घर में बरसों तक साथ रहने वाले लोग भी एक दूसरे को पूरी तरह नहीं जान पाते, इन्सान खुद को तो जानता नहीं तो भी अन्यों को जानने का दम भरता है. लेकिन वह यह मानती थी कि उनके साथ ऐसा नहीं होगा, वे एक दूसरे  को भली-भांति जानते हैं. लेकिन इस क्षण उसे लग रहा है, ऊपर की बात ही सही है. उसे लगा उनका रिश्ता भय पर टिका  है न कि प्रेम पर, या तुलसी दास की बात ठीक है, ‘भय बिन होत न प्रीति गुसाईं’.....या मीरा की भी, ‘जो मैं ऐसा जानती प्रीत करे दुःख होए’...हो सकता है वह ओवर रिएक्ट कर रही हो, शायद उसका मन अभी ठीक नहीं है, पर कल शाम को जो हुआ उसकी उसने कल्पना नहीं की थी, कल शाम एक मित्र परिवार मिलने आया, वह कमरे में लेटी थी, उठने का जरा भी मन नहीं था सो बाहर नहीं गयी, वे कुछ देर रुके फिर चले गये, उसे लगा कि जून कारण पूछेंगे और उसकी बात समझेंगे, पर उसे झेलना पड़ा उनका क्रोध. उसने सोचा, समझदार होने का, शांत रहने का, मन की बात मन में ही रखने का अधिकार तो स्त्रियों को जन्म से ही मिला हुआ है, यह तथाकथित समानता की बातें बस यूँ ही हैं.

कल वह उदास थी, आज नहीं है. जून और वह एक दूसरे के उतने ही करीब आ गये हैं, जितने तब थे जब उन्होंने एक-दूसरे को पहले-पहल जाना था.
आज हफ्तों बाद डायरी लिखने बैठी है, छोटी बहन आने वाली थी उसके पहले  ही सफाई आदि में फिर अपनी उसी स्वास्थ्य समस्या के कारण और उनके आने के बाद तो समय मिला ही नहीं. मिला भी तो एक दिन उसके शेफ पति से कुछ रेसिपीज नोट कीं. पनीर टिक्का, अरहर दाल, भरवां शिमला मिर्च और बिरयानी की रेसिपीज. उनका आना उन्हें उत्साह से भर गया. अभी सोचती है तो लगता है कितने खुश थे वे, सुबह से शाम तक बिना थके कभी यह काम कभी वह. और उसकी बिटिया की भोली शरारतें.... समय कितनी जल्दी बीत गया. आज शाम को जून भी जाने वाले हैं, परसों शाम को अपने माँ-पिता को लेकर आ जायेंगे. फिर कुछ दिन हँसी-ख़ुशी बीत जायेंगे.  आज सुबह कितने दिनों बाद उसने व्यायाम भी किया और पाठ भी. उसने मन ही मन नोट किया, उसकी पुरानी पड़ोसिन की दोनों ‘सेल्फ हेल्प’ की किताबें नियमित पढ़कर उसे वापस भी करनी हैं. कल शाम उसने कहा वह उदास लग रही है, शायद वह वाकई उदास थी पर उसे खुद इस बात का पता तक नहीं था. वह अंदर की बातें कैसे जान लेती है. कल दोपहर को प्राज्ञ की कक्षा लेने गयी थी, कोई नहीं आया, लगता है सभी के सभी भूल गये या उन्हें सूचना ही नहीं दी गयी थी.
जून इस समय गोहाटी में अपने मित्र के यहाँ होंगे, नॉर्थ-ईस्ट ट्रेन अभी आई नहीं होगी. वह उसके फोन का इंतजार करेगी, यह और बात है कि उसे तो केवल संदेश ही मिलेगा, सीधी बात नहीं हो सकेगी. आज धूप बहुत तेज है, सुबह से सोच रही है, शाम को बगीचे में काम करना है, देखें क्या होता है. शाम को उसकी पुरानी पड़ोसिन ने भी आने को कहा है. अभी नन्हे का प्रोजेक्ट वर्क भी बाकी है. उसका घाव अभी तक सूखा नहीं है, जून को बताना ही होगा कहीं ऐसा न हो कि फिर से... और क्या लिखे, मन है की इतनी सारी बातें एक साथ सोचने लगता है उन्हें सिलसिलेवार बैठाने का वक्त भी नहीं देता. मसलन कल जून ‘बनाना’ लाये थे कहा था, भूल नहीं जाना और वाकई वह अब तक भूली हुई थी, फिर यह कि प्याज और टमाटर खत्म हो गये हैं, मंगवाए या ऐसे ही काम चला ले. और अब नन्हे ने स्नान कर लिया है, उसका काम शुरू करवाना है. कल शाम वह उसकी बहुत फ़िक्र कर रहा था. उसे पापड़ सेंक कर ला दिया और.... अब वक्त नहीं है आगे कुछ लिखने का.  


Friday, March 22, 2013

स्क्रैम्ब्लर-हिज्जों का खेल




अचानक उसका ध्यान पर्दों पर गया तो सोचा बेडरूम के पर्दे धुलवाने चाहिए, कारपेट धुलवाने की बात भी की है धोबी से. फ्रिज में से सब्जियां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, पर लगता है बाजार जाने की जरूरत जल्दी नहीं पड़ेगी, बगीचे से गाजर व गोभी मिल सकती हैं. आज उसने शाम को नाश्ते में पनीर का परांठा बनाया, सो रात को देर तक भूख ही नहीं  लगी, पौने दस बजे है, उसने रोज की तरह लिखना शुरू किया है, सोचा, जून भी इसी वक्त सोने की तैयारी कर रहे होंगे. शायद उन्होंने भी ‘विविधा’ की कहानी देखी हो टीवी पर. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आना चाहता था, पर जून के न होने कि बात सुनकर नहीं आया. पड़ोस से नन्हे का मित्र आ गया था, सो वह दूर तक टहलने भी नहीं जा सकी. माली भी नहीं आया, प्लायर्स से नल खोल कर पानी दिया पौधों को फिर वैसे ही बंद किया. सुबह रजाई का गिलाफ धोकर चढाया. दिन में स्वेटर बनाया. नन्हे को स्कूल की पत्रिका के लिए कोई कविता या कहानी लिखनी है, इस समय लेटे हुए वही सोच रहा है. “ओशीन” धारावाहिक आज नहीं दिखाया जा रहा, अगले सोमवार को वह जून के साथ देखेगी. नन्हे को स्कूल में हेल्पेज के लिये बीस रूपये जमा करने थे, उसके पास दस रूपये थे, पचास वह ले जाना नहीं चाहता था, ऐसे वक्त में पड़ोसी ही तो काम आते हैं., लिखाई बिगड़ने लगी तो उसे लगा ठंड से उसकी उंगलियाँ अकड़ गयी हैं शायद, या ज्यादा देर स्वेटर बनाने से, वहाँ जून के शहर में तो इससे भी ज्यादा ठंड होगी.

रात्रि के साढे नौ बजे हैं, नन्हे ने इस वक्त उसे गुस्सा दिलाया है, काम के समय दुनिया भर के सवाल पूछता है और बातें करता है उस वक्त, जब कोई काम कहा गया हो, वैसे वह शायद रोज ही ऐसा करता हो पर आज उसे सिर में दर्द है, दोपहर को फिल्म देखी शायद इसी कारण. उसका रिपोर्ट कार्ड मिल गया है, आज वह स्कूल में पहली बार किसी टीचर के घर गया था.

बुधवार, आज बारह तारीख है, उसका मन हो रहा है जल्दी से सोने के लिए लेट जाये, शाम को बगीचे में काम किया, टहलने गयी अकेले, दोपहर को स्वेटर बनाती रही, थकान हो गयी है, जून होते तो.... अब बहुत हो गया अकेले रहना...अब बिलकुल अच्छा नहीं लगता मन करता है उससे ढेर सारी बातें करूं. उसके बिना कितने सारे काम भी तो बढ़ गए हैं न, नन्हा सो गया है, उसकी छुट्टी आज जल्दी हो गयी थी, कल भी ऐसा ही होगा, उसने कहानी लिख ली है पत्रिका के लिए.

“जिंदगी तू भी पड़ोसन की तरह लगती है
आज तोहफे में कुछ दे है तो कल मांगे है”
‘मुन्नवर राना’ का यह शेर उसे अच्छा लगा तो लिख लिया डायरी में.   

  परसों जून आ जायेंगे, सुबह से यह ख्याल आकर मन को सुकून दे गया है, उन्हें महसूस करने लगे हैं वे अब, उनकी हंसी उनका स्पर्श सब स्पष्ट हो गया है, नन्हा कह रहा है पापा के आने पर हलवा-पूरी बनाइएगा, आज दोपहर को इतने दिनों में वह पहली बार एक घंटा बेड में थी, कारण वही, नन्हा भी लेट कर टीवी देख रहा था, उसके स्कूल में आज जाते ही छुट्टी हो गयी पर वह साढ़े बारह बजे ही आ पाया, अब एक हफ्ते बाद स्कूल में पढ़ाई होगी. क्योंकि छह दिन बाद वार्षिक दिवस है. सुबह सामान्य रही सिवाय इसके कि गाजरें निकलीं गार्डन से, जून के लिए गाजर का हलवा बनाना है न, टमाटर भी मिले. उसके एक सहकर्मी सर्वोत्तम तथा आधा किलो मटर दे गए, उसने मंगाए थे. शाम को पड़ोसियों के साथ क्लब गए बीहू का कार्यक्रम था, सवा सात पर लौटे. घर आकर स्क्रेमब्लर खेलते रहे, समय का ध्यान ही नहीं रहा, खाना देर से खाया. कल टीवी पर ‘हुन हुन्शी हुन्शाराम’ गुजराती फिल्म Sदिखाई जायेगी और परसों “सूरज का सातवाँ घोड़ा”, जो वे साथ-साथ  देखेंगे. उसने मन ही मन जून से स्वप्न में आने कि बात कही, मच्छर दानी भी नहीं लगा रहे वे आज, नन्हा इस समय गुड नाईट में नई मैट लगा रहा है.