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Wednesday, August 13, 2025

संयम की साधना

संयम की साधना



आज ‘संयम’ का दूसरा दिन है। कल की तुलना में ध्यान सरलता से लगा और देर तक भी। भीतर जैसे कोई सिखा रहा था, योग की साधना आरंभ करने से पूर्व यम-नियम का ज्ञान आवश्यक  है। यम अर्थात वे मूल्य, जो समाज में जीने का तरीक़ा सिखाते हैं। जब तक मन में हिंसा की प्रवृत्ति किसी भी रूप में है, नकारात्मकता बनी रहेगी। हिंसा के प्रति आकर्षण ही है जो मनुष्य को हृदयहीन बनाता है. योग में स्थित होने के लिए अहिंसा पहला मूल्य है. दूसरों के दुख को देखकर उदासीन बने रहना भी हिंसा है. अन्यों के दुख को देखकर बुद्ध के मन में करुणा का जन्म होता है, वह करुणा तभी उपजती है जब अहंकार शून्य होकर कोई अपने को परिवर्तित कर लेता है. ऊर्जा एक ही है चाहे कोई उसे अहंकार के रूप में उपयोग करे अथवा अस्तित्त्व के प्रति स्वयं के समर्पण के रूप में. जब तक साधक को अपने लक्ष्य का ज्ञान नहीं हो पाता, वह आगे कैसे बढ़ सकता है?


साधक का साध्य परमात्मा है और यदि वह स्वयं को अन्यों से श्रेष्ठ मानता है, तो वह हिंसा कर ही रहा है। अन्यों को हेय दृष्टि से देखने पर उन्हें दुख होगा। साधक मन में ईश्वर को धारण करता है, यह भाव अहंकार बढ़ाता है। मन को परमात्मा के प्रति समर्पित करना है, यह भाव विनम्र बनाता है। पूर्ण समर्पण ही उसके योग्य बनाता है। अन्य की संपत्ति देखकर उसे पाने की इच्छा मन में जगी तो लोभ मिटा नहीं, अस्तेय सधा नहीं।ज़रूरत से अधिक वस्तुओं का संग्रह भी व्यर्थ है और ब्रह्म में विचरण नहीं किया तो मन व्यर्थ की चेष्टाओं में ही लगेगा। इसी प्रकार भीतर संतोष बना रहे तो मन सहज ही प्रसन्न रहेगा। भीतर-बाहर की स्वच्छता रहे, तभी यह संभव है।


विपरीत परिस्थतियों में मन की समता बनी रहे, इसके लिए ईश्वर पर अटूट श्रद्धा और आत्म निरीक्षण की कला भी आनी चाहिए। इसके बाद आता है आसन का अभ्यास, जिसमें बैठकर प्राणायाम करना है। सभी इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर मन में धारण करना, मन को बुद्धि में और बुद्धि को आत्मा में स्थित करके आत्मा को परमात्मा में लीन कर देना ही ध्यान है। जब  दीर्घ काल तक यह सहज ही होने लगे, तो यही समाधि है।समाधि का अभ्यास जब दृढ़ हो जाता है तो जागृत अवस्था में हर समय भीतर एक स्थिरता का अनुभव होता है। मन को टिकने के लिए एक आधार, एक केंद्र मिल जाता है। मन एकाग्र रहता है, ऊर्जा व्यर्थ नहीं जाती और मन सहज ही प्रसन्न रहता है। जब सुने हुए और देखे हुए के प्रति कोई आकर्षण शेष नहीं रहता, तब वैराग्य घटता है।आज गर्मी ज़्यादा है, किंतु दिन भर आभास ही नहीं हुआ। रात्रि भ्रमण के लिए निकले तो हवा बंद थी। आज सुबह देखा, पैशन फ़्रूट की बेल नीचे गिर गयी है। पड़ोस में बनने वाले मज़दूरों ने जो हरे रंग की शीट लगाई थी वह भी गिर गई है। शायद कल वे उसे ठीक करेंगे। 


आज स्वसंचालित कोर्स का तीसरा दिन है। आज सुबह का ध्यान इतना गहरा नहीं था पर दोपहर बाद का बहुत रसपूर्ण।वर्षों बाद बालकृष्ण की छवि का ध्यान किया, सुबह जो वाक्य भीतर सुना  था वह सही सिद्ध हुआ। परमात्मा को सब कुछ पहले से ही ज्ञात होता है। शाम को भी कुछ देर भाव-जगत में विचरण किया। वेदान्त का ध्यान कितना सपाट होता है, शून्य का अनुभव, बस स्वयं के होने का: पर कोई साथ हो, जो राह दिखाने वाला हो अथवा तो जिस पर दिल न्योछावर किया जा सके तो साधना में प्राण आ जाते हैं। मन कैसा ठहरा हुआ है। आज गुरुजी के ज्ञान के अनमोल वचनों का आधार लेकर कुछ लिखा, यह भी तो उनके ज्ञान का प्रचार-प्रसार ही होगा। वही सिखाने वाला है और वही सीखने वाला भी ! वहाँ दो होकर भी दो नहीं हैं !  

   

आज सुबह समय पर साधना आरंभ की। दोपहर तक सब समयानुसार हुआ, पर तीन बजे के बाद गुरुजी को लिखे पत्रों की डायरी पढ़ने के लिए उठा ली, सारा समय उसी को पढ़ने में बीत गया। लगभग बारह वर्षों तक अपनी साधना संबंधी समस्याएँ नूना उन्हें पत्र में लिखती थी, समाधान भी मिल जाता था।२०१७ के बाद कोई पत्र नहीं लिखा। नन्हे के विवाह में पुन: पूर्व संस्कारों का उदय हुआ था, कुछ दिनों तक स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। उसके बाद बैंगलोर आने का स्वप्न था मन में। यहाँ आकर गुरुजी के दर्शन होने लगे, सेवा कार्य भी शुरू हुआ। कोरोना काल में आश्रम जाना ही बंद हो गया।कवि सम्मेलन में भी उनसे मुलाक़ात हुई, पर अब उनसे दूरी नहीं लगती सो पत्र लिखने का ख़्याल भी नहीं अता। अपना आप, गुरु और परमात्मा तीनों एक ही हैं, यह भाव दृढ़ होता जाता है।शाम छह बजे के बाद से मौन खुल गया है, पर सिर में जैसे भारीपन लग रहा ही, शायद शब्दों का असर हो रहा है। बोलने में काफ़ी ऊर्जा ख़र्च होती है।     

  




Friday, May 31, 2024

चंदन का लेप

चंदन का लेप


आज रविवार है, माली आने का दिन, सो योगाभ्यास का अवकाश। उसने माली से सारे गमलों की निराई-गुड़ाई करवायी और ‘रात की रानी’ के पौधे ज़मीन में लगवाये। ‘मॉर्निंग ग्लोरी’ के गमले ऊपर सिट आउट में रखवाए हैं। बच्चे आये तो उन्हें नाश्ते में कटहल दोसा मिक्स से बना दोसा खिलाया। जून ने गेहूं का दलिया भी बनाया था, वह इसमें निपुण हो गये हैं। दोपहर बाद सब मिलकर दो मकान देखने गये, सोनू के माँ-पापा भी बैंगलुरु में आकर बसना चाहते हैं। शाम को चार बजे से ‘जोड़ों के दर्द’ पर डेढ़ घंटे के वेबिनार के एक सत्र में भाग लिया, जिस पर आधारित एक लेख उसे लिखना है।स्वस्थ रहने के लिए कितने ही नुस्ख़े और आदर्श जीवन शैली के बारे में वैद्य ने बताया। सुबह मुँह का स्वाद कुछ कड़वा सा था, ‘धौति’ क्रिया की। इस समय भी देह में ताप का अनुभव हो रहा है। वे आयुर्वैदिक अस्पताल जाने का विचार कर रहे हैं। 


आज फ़रवरी का प्रथम दिवस है।वसंत ऋतु दस्तक दे रही है। आम के बगीचे से भीनी-भीनी सुगंध बहती रहती है। सुबह वे टहलने गये तो आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे। वापस आकर ‘हेल्थ इन योर हैंड’ पुस्तक निकाल कर कुछ पन्ने पढ़े, उसमें लेखक ने सामान्य रोगों को दूर करने के कई सरल उपाय बताये हैं। आज भी स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं है। सुबह से सिर में हल्का दर्द है। इस समय मस्तक पर चंदन का लेप लगाया है, जो भीतर की गर्मी को खींच लेगा। जीरा-सौंफ वाला पानी पिया। कैस्टर आयल लिया। दिन  में  नारियल पानी व मट्ठा भी लिया था।शरीर में अग्नि तत्व बढ़ गया है। शाम को कुछ देर ‘चन्द्र नाड़ी प्राणायाम’ भी किया, ‘शीतली प्राणायाम’ भी। नाड़ी की गति बैठे रहने पर भी ९५ रहती है। चलते समय पैरों में जकड़न सी महसूस होती है। अचानक ही इतने सारे लक्षण आ गये हों, ऐसा नहीं है। पाचन क्रिया मंद रहने की समस्या तो कुछ दिनों से थी ही। ख़ैर, यह सब शरीर को हो रहा है, मन भी शरीर का ही सूक्ष्म हिस्सा है। पिछले दिनों रात को नींद ठीक से नहीं आयी, उसका असर रहा होगा।जो भी हो, आत्मा साक्षी भाव से सब कुछ देख रही है, उस पर कुछ भी असर नहीं हो रहा है।आज सुबह एक सखी से बात की, दोपहर को दीदी-जीजा जी से, शाम को भी एक परिचिता  से वार्तालाप हुआ, सभी से सामान्य बातें हुईं। दोपहर को ‘जोड़ों के दर्द’ पर लेख लिखना आरम्भ किया। ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की। आज वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वार्षिक बजट प्रस्तुत किया, जिसे बहुत सराहा जा रहा है। 


रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं। एक और दिन स्वास्थ्य की देखभाल करते बीत गया। सुबह कितना हल्का महसूस हो रहा था पर दोपहर बाद कुछ भारीपन लग रहा था। रात्रि भ्रमण के समय पैरों को भली प्रकार पता चला कि चलने के लिए  भी एक प्रयास करना पड़ता है। सुबह सवा चार बजे नींद खुल गई थी। सुबह सामान्य रही। याकुल्ट, नारियल पानी, ग्रीन टी तथा खीरा नींबू वाला पानी पिया दिन भर।संभवत: वजन भी बढ़ गया है। सारी समस्या इसी कारण हो रही है। इसे कम करने का उपाय करना होगा।छोटी भांजी के जन्मदिन के लिए लिखी कविता उसे भेज दी, बहन के साथ उसने दुनिया की सबसे लंबी ‘ज़िप लाइन’ में भाग लिया। शाम को नन्हे का फ़ोन आया, सोनू की मौसेरी बहन को एक और सर्जरी करानी पड़ेगी। उसे गॉल ब्लेडर में स्टोन हो गया था। 


आज एक संत को सुना, “आगे से जवाब देना, उल्टा बोलना, ज़ोर से बोलना, दूसरे की बात को न सुनना या नकार देना, ये सभी वाणी के दोष हैं, जिनसे साधक को बचना चाहिए। अहंकार ही आत्मा को प्रकट न होने देने में सबसे बड़ी बाधा है, और उपरोक्त सभी बातें अहंकार से उपजती हैं, न कि विवेक से।विवेक तो सदा आत्मा से युक्त रहता है, जो प्रेमस्वरूप है।” उसकी अस्वस्थता में उसका इतना ध्यान रखने वाले जून को जब वह कभी आगे से जवाब दे देती है तो उन्हें कितना बुरा लगता होगा। उनका धैर्य अपार है, जो उसकी सारी हिमाक़त चुपचाप सह लेते हैं और सुबह से शाम तक हर कार्य में उसकी सहायता करने को तत्पर रहते हैं। आज से बल्कि अभी से वह प्रण करती है कि उनकी हर बात को अपने लिए आज्ञा मानकर शिरोधार्य करेगी ताक़ि उसका अहंकार छूट जाये और आत्मा में स्थिति दृढ़ हो जाये; जो कि उसका वास्तविक स्वरूप है। उसका रोग भी तो शरीर के साथ स्वयं को जोड़कर देखने से ही हुआ है। भोजन के प्रति आसक्ति का ही यह फल है।


Tuesday, January 3, 2023

देवों की भूमि

बाहर वर्षा हो रही है। रात्रि के नौ बजने को हैं। शाम के ध्यान के बाद जब वे नीचे उतरे तभी से वर्षा आरंभ हो गयी, सो भोजन के बाद रात्रि भ्रमण के लिए नहीं जा सके। शाम का ध्यान गहरा था, गुरूजी के शब्द सीधे दिल की गहराई तक जा रहे थे, उसका असर था या दोपहर को देखी फ़िल्म का, मन कैसा पिघला जा रहा था। जून की ज़रा सी बात भी उसे प्रभावित कर गयी। मन होता ही ऐसा है, पल में तोला, पल में माशा ! जहाँ से मन ऊर्जा पाता है, वह पराशक्ति है। मन शब्दों का ही आश्रय लेता है यदि मौन का ले तो बचा रह सकता है। चेतना पहले श्वास में बदलती है फिर शब्दों में, यदि श्वास रुक जाए तो मन भी ठहर जाता है। आज पंत पर लिखा लेख काव्यालय में प्रकाशित कर दिया। शाम को सब्ज़ी वाला ट्रक आया था, ‘फ़्रेश वर्ल्ड’, पुदीना लिया, जून ने चटनी पीस दी। सुबह बड़ी भांजी से बात हुई, उसने बताया, कैसे उसने अपने अंग्रेज़ी लघु उपन्यास ऑन लाइन प्रकाशित किए, पर मार्केटिंग नहीं कर पायी है।  एओएल की एक शोध कर्त्री द्वारा ‘अवसाद’ पर लिखे एक लेख का अनुवाद किया। कल श्राद्ध पर एक ज्योतिषाचार्य का वीडियो देखकर आलेख लिखना है। लेखन के ये कार्य उसके अनुभव क्षेत्र को बढ़ा रहे हैं, उसने मन ही मन गुरु जी का इस सेवा कार्य में सम्मिलित करने के लिए आभार व्यक्त किया।   


सुबह टहलने गए तो बादलों के पीछे से चाँद की ज्योति झलक रही थी। इस समय कितना सन्नाटा है, बाँयी ओर से जैसे झींगुर  बोलता है, एक ध्वनि आ रही है। सजग होते ही दाँयी तरफ़ से भी आने लगी है। सन्नाटा सधने लगा है कुछ-कुछ। गुरूजी दिन में दो बार ध्यान करवाते हैं। अक्सर वे व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा वाणी के रूप में खर्च करते हैं। बाहर के मौन के साथ-साथ भीतर का मौन भी आवश्यक है, बल्कि ज़्यादा ही आवश्यक है। विचार ही कृत्य बनते हैं। वे जो पहले सोचते हैं वही तो बाद में कर्म रूप में फलित करते हैं। सोसाइटी के जिम में वस्त्रों की सेल लगी है, पर उनके पास इतने वस्त्र हैं कि शायद अगले दस वर्षों तक खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।  


संध्या भ्रमण के समय कोने वाले घर में एक छोटा बच्चा रोज़ मिलता है, हाथ हिलाता है। इतना ही बड़ा नन्हा था, उसे प्रैम में लेकर वे जाते थे तो एक पंजाबी महिला उसे देखकर बहुत खुश होती थीं, बाद में उस परिवार से अच्छी जान-पहचान हो गयी थी। जून के पैरों की जलन सौंफ, धनिया और मिश्री का मिश्रण खाने से काफ़ी ठीक है। असम में कोरोना फैल रहा है। सभी जगह यही हाल है। यह महामारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है , कितनों की जानें भी जा चुकी हैं। भारत में संक्रमितों की संख्या चार लाख हो गयी है। 


आज शिक्षक दिवस पर अनेक शिक्षिकाओं को कविता भेजकर शुभकामना दी। शाम को वर्षा के कारण छत पर टहलने गए तो देखा पास वाले गोदाम की छत हटायी जा रही थी। हो सकता है यहाँ कोई दुकान बने। वे इधर उधर की बातें करते हुए टहल रहे थे कि बात बचपन के दिनों तक पहुँच गयी। उसने जून को बताया, वे लोग कौन सी पत्रिकाएँ पढ़ते थे, रेडियो पर नाटक सुनना भी उन दिनों विशेष आकर्षण होता था, आँगन में या छत पर सभी लोग अपने बिस्तर पर लेटे होते थे तब रेडियो पर रात्रि नाटक का समय होता था।कल नन्हा और सोनू आएँगे, वे लोग टेस्ट ड्राइव के लिए जाएँगे। नन्हे को अब कार की आवश्यकता महसूस होने लगी है, अब ओला, ऊबर सब बंद हैं। संयोग की बात है कि आज के ही दिन एक वर्ष पहले वे असम में विक्टर बनर्जी से मिले थे और आज ही उनकी पहली फ़िल्म ‘देवभूमि’ देखी, जो केदारनाथ में फ़िल्मायी गयी है।    


Wednesday, April 28, 2021

ऐनी विद एन इ

 रात्रि के नौ बजकर पांच मिनट हुए हैं. अभी-अभी जून ने दो किताबों का आर्डर दिया है, नए वर्ष के लिए सुंदर उपहार ! कल छोटा भाई यहां आ रहा है, उसने सोचा, शाम को वे उसे आम व अंगूर के बगीचे में ले जायेंगे, हो सका तो गाँव के खेत में भी. आज दोपहर बारह बजे वे असमिया सखी के यहां से लौटे, पूरे चौबीस घण्टे बाद. उन्होंने बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया, कल दिन में तथा रात्रि का भोजन व आज सुबह का नाश्ता प्रेम से खिलाया. तस्वीरें खींची, चाइनीस चेकर खेला , पुराने दिनों की बातें कीं, उन दिनों की तस्वीरें देखीं. आज मृणाल ज्योति से एक अध्यापिका का फोन आया, पूछ रही थी वह वहाँ कब आएगी. जून ने कहा है शायद दो वर्ष बाद वे वहाँ दुबारा जा सकें. मैक्स टीवी पर क्वीन का आठवां भाग देखा, शक्ति अब पुन: फिल्मों में काम करने के लिए तैयार है. मौसम आज सुहावन है, कल सखी की सोसाइटी में क्रिसमस पार्टी थी और आज उनके पड़ोसी के यहां क्रिसमस केक की सेल थी. असम में हर वर्ष वे क्रिसमस ट्री सजाते थे और बच्चों को केक खिलाते थे। 


अभी-अभी भाई का फोन आया, वह दोपहर ढाई बजे पुट्टपर्थी पहुंच गया था. वहां के स्टेट बैंक में पूरे आठ दिन उसे ऑडिटिंग करनी है, उसका भाग्य उसे तीर्थ स्थानों के दर्शन करा रहा है. तमिलनाडु व आंध्र के कितने ही मंदिर भी देख चुका है. कल सुबह विजयवाड़ा से बारह बजे तक घर आ गया था, बड़े भाई भी आधे घण्टे बाद पहुंच गए. कल शाम वे उसे एओल आश्रम ले गए थे, विशालाक्षी मंडप रौशनी में बहुत भव्य लग रहा था. सप्ताहांत में चार दिनों के लिए उन्हें काबिनी जाना है. घूमना और लिखना-पढ़ना यही काम होंगे वहां. उनके गैराज में किनारे की पट्टी पर मार्बल लगवा लिया है, जून कह रहे हैं सामने की दीवार पर टाइल्स लगवा लेते हैं, बरसों वे लोग सरकारी घरों में रहते आये हैं जिसमें कभी कोई काम नहीं करवाया, पर अब अपने घर को संवारने का कोई अंत ही नहीं है. सोनू ने उसे दो बंदनवार व दो मोबाइल बैग्स दिए, नन्हा आजकल ज्यादा बात नहीं करता है, अपने काम में ज्यादा व्यस्त रहने लगा है. 


आज बहुत दिनों बाद रेडियो पर रात्रि समाचार सुने. बचपन में हर रात को सोने से पूर्व घर में रेडियो पर समाचार सुने जाते थे. राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर बनाने की प्रक्रिया को मंजूरी दे दी गयी है. सरकार लोगों तक सीएए की जानकारी पहुंचाने की कोशिश कर रही है. शरणार्थियों ने दिल्ली में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री व गृहमंत्री को धन्यवाद दिया है. पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री व राज्यपाल के मध्य तनाव कम नहीं हो रहा है. सुबह-सुबह कुछ लिखने का प्रयास कर रही है नूना पिछले कुछ दिनों से, दिन भर लिखने का समय नहीं मिल पाता। छत पर काम चल रहा है, दिन भर कोई न कोई आता रहता है. सुबह मन कितना स्पष्ट रहता है खाली और निर्मल .. विचार अपने आप ही आते हैं । आज सुबह जून नए खुले रेस्त्रां से पुट्टू लाये,  साथ में काले चने की सब्जी. नए वर्ष के लिए कुछ संकल्प लेने का समय आ गया है. अगले वर्ष वे  ध्यान, लेखन, सेवा कार्य, पुस्तकें पढ़ना तथा बागवानी नियमित करेंगे. नया वर्ष आने में मात्र सात दिन रह गए हैं. कल क्रिसमस का त्योहार है, देश में शांति बढ़े, विकास हो, आर्थिक प्रगति हो और आपसी मेलजोल बढ़े. यह कामना उन्हें नए वर्ष के लिए करनी चाहिए. जून की पीठ में दर्द हो गया है, योग कक्षा में उन्हें विशेष आसन करने को कहा शिक्षिका ने. अगले महीने वह घर जाने वाली है, ऋषिकेश से यहाँ आयी है, किराये का घर लेकर अकेले ही रहती है। उसने सोचा  है, एक दिन उसे घर बुलाएगी।  


कल रात एक स्वप्न देखा, एक बड़ा हवाई जहाज है, जिसमें नन्हे और जून को कहीं जाना है, एक परिचित व्यक्ति और भी है, वह उन्हें छोड़ने भर आयी है, पता नहीं कैसे जहाज में पहुंच जाती है. तभी वह उड़ने लगता है, उन्हें लगता है, जहाज अभी रुकेगा और वह उतर जाएगी, पर ऐसा नहीं होता. उसके पास टिकट भी नहीं है. अंततः वह अपने लक्ष्य पर उतर जाता है, वे बाहर आते हैं, उनसे आगे तीन जन को निकलने देते हैं चौथे को रोक लेते हैं, वह सुनती है, वह कह रहा है, उसके पास टिकट नहीं है और गलती से वह बैठ गया था, पर उसकी बात वे सुन ही नहीं रहे. तभी नींद खुल जाती है, कितना स्पष्ट अर्थ है इस स्वप्न का, उसे जहाँ जाना नहीं है, जिसकी टिकट यानि क्षमता भी उसके पास नहीं है, वहीं वह जा रही है। सचेत हो जाना चाहिए अब तो ! उसके जीवन का लक्ष्य क्या है यदि वह खुद ही भूल गई तो आस-पास के लोग उसे कैसे याद रख सकते हैं। 

आज फिर दाहिने हाथ की मध्यमा में नख के निकट सूजन दिख रही है। कुछ हफ्ते पहले डॉक्टर को दिखाया था, ठीक भी हो गई थी पर पुन: किसी कारणवश संक्रमण हो गया है। यू ट्यूब पर घरेलू उपाय देखे, पानी में सेब का सिरका मिलाकर  लगाने से यह ठीक हो जाएगा, ऐसा सुना। नेटफलिक्स पर ऐनी विद एन इ धारावाहिक का पहला भाग देखा। उसमें एक तेरह वर्षीय कल्पनाशील बालिका की कहानी है।  आज क्रिसमस है उसके एक ब्लॉग का जिक्र एक वरिष्ठ ब्लॉग  लेखिका ने सम्मान पूर्वक किया है, क्रिसमस का उपहार ! दोपहर को छोटी ननद का फोन आया, पुत्र की बात बता रही थी, सुबह चार बजे सोता है और एक बजे उठता है, मित्रों के साथ ज्यादा समय बिताता है। आज की युवा पीढ़ी अपनी सेहत का भी ध्यान नहीं रखती। 


और अब उस पुरानी डायरी का एक पन्ना - 


मुक्त ! वे एक क्षण तो स्वयं अपने मन पर शासन नहीं कर सकते, यही नहीं, किसी विषय पर उसे स्थिर नहीं कर सकते और अन्य सबसे हटाकर किसी एक बिन्दु पर उसे केंद्रित नहीं कर सकते ! फिर भी वे अपने को मुक्त कहते हैं ! 


यदि वह अपने मन की सारी पीड़ा समेट कर एक वाक्य में कहे और अपने मन की सारी खुशी समेट कर एक वाक्य में कहे तो दोनों बार एक ही वाक्य उसके अधरों से निकलेगा- उसकी कविताओं में झलकता उसके मन का भ्रम  कितना सुंदर है ! लगता है सुख -दुख की चरम स्थिति में मनुष्य समभाव हो जाता है, यह बिल्कुल सही है। 


कई बार लगा है पानी में प्रतिबिंब देखते हुए, अपने अधूरेपन को देख, अपनी आवाज में टूटन देख, बिखरे हुए विचारों को देखकर कि  दुनिया में कोई ऐसी मिट्टी नहीं जो इतनी पक्की हो कि उसे जोड़ सके, कुछ मिट्टियाँ किन्हीं विशेष स्थानों पर ही मिलती हैं और उसके मन के मेल की मिट्टी कहाँ मिलेगी, यह नहीं मालूम ! 


Wednesday, March 3, 2021

एस्टोनिया के फूल

 इस समय वे पहली मंजिल पर बैठक में बैठे हैं। राजस्थान पत्रिका में पढ़ा, दिल्ली में प्रदूषण के कारण स्कूल पाँच तारीख तक बंद कर दिए गए हैं। एक सप्ताह बाद उन्हें भी यात्रा पर निकलना है, तीसरे सप्ताह में दिल्ली पहुंचेंगे। तब तक संभवत: हालात सुधर जाएं। शाम को जून साइकिल से गैस सिलिन्डर की बुकिंग के लिए गए और उसने यहाँ आने का बाद पहली बार ध्यान किया, मन कितना शांत लग रहा है। सुबह सूर्योदय की तस्वीरें उतारीं, मोबाइल से प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें उतारना कितना सहज है और अब तो यह  उसके जीवन का एक भाग ही बन गया है। आजकल सुबह-शाम दोनों समय टहलते समय फूलों की गंध आती है, एस्टोनिया के फूलों की गंध ! कल शाम नन्हा व सोनू आ गए थे, सुबह उनके साथ पहले डेन्टिस्ट के पास गए फिर कपड़े सिलने देने के लिए दर्जी के पास। मार्च तक उन्हें तीन शादियों में सम्मिलित होना है। 


तुलसी का पौधा लगाने के लिए पत्थर का एक विशेष गमला कल खरीदा था, कल उसमें पौधा लगाना है।  आज सुबह बुरादा, खाद मिलकर मिट्टी तैयार की। तुलसी व अजवाइन के पौधे लगाए, शेष गमलों में खाद डाली। ग्लेडियोली के बल्ब से पौधे निकलने लगे हैं। जून को बालकनी में पिटूनिया लगाने का मन है।  वे निकट स्थित एक नर्सरी में गए, पर वहाँ पौधे नहीं मिले, आश्रम की नर्सरी से दो फूल के पौधे लिए। आज मौसम अपेक्षाकृत गरम है, यहाँ ठंड का मौसम आता ही नहीं शायद। पिताजी को फोन किया तो उन्हें यहाँ आने का निमंत्रण दिया।आज टाटा स्काई लगाने के लिए लोग आए थे, शायद कल से वे कुछ देर टीवी भी देख सकें।


मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है। आत्मा सभी के भीतर बीज रूप में विद्यमान है। उसमें फूल खिलाना जिसने सीख लिया, सुगंध उसे ही मिलती है, उसे वृक्ष बनाना जिसने सीख लिया, छाया उसे ही मिलती है। उसे जाने बिना जो रह गया, उसके लिए आत्मा का होना या न होना क्या अर्थ रखता होगा ? 


दिन खरामा-खरामा बीत रहे हैं, किसी नदी की शांत धारा की तरह। मौसम आज भी गरम है। सुबह ठंडी थी, उन्हें जैकेट पहनकर निकलना पड़ा। फूलों से लदे वृक्षों की तस्वीरें उतारीं। कुछ देर प्राणायाम किया पर आसन नहीं किए, जून के अनुसार ‘समय नहीं था’ उन्हें हर काम को जल्दी करने की आदत है। कल शाम उन्होंने पिताजी की पुरानी तस्वीरें खोजीं, जिन्हें स्कैन करके एक वीडियो बनाना है। उनके जन्मदिन पर यह उपहार होगा उस कविता के साथ जो उनके लिए उसने लिखी है।  बर्तन डिशवाशर में लगाकर वे ऊपर शयन कक्ष में आ गए हैं। आज इतने दिनों बाद टीवी पर तेनालीरामा देखा, कहानी जैसे आगे बढ़ी ही नहीं है। दोपहर को वे फोर्टिस अस्पताल गए, उसके हाथ के नाखूनों में सफेदी आ रही थी और जून को भी त्वचा विशेषज्ञ को दिखाना था। डाक्टर ने खाने व लगाने  की दवा दी है। दोपहर को सीढ़ी चढ़ने में दाहिने घुटने में कुछ दिक्कत महसूस हुई, बर्फ का सेक करने का सुझाव दिया है नेट पर, जून ने तिल के तेल से मालिश करने को कहा। दिन में कई बार सीढ़ियाँ चढ़नी व उतरनी पड़ती हैं, नया-नया अभ्यास है अभी। अभी छोटे भाई से बात हुई, वह नन्हे की ससुराल गया था, वहाँ बहुत खातिरदारी हुई उसकी। नन्हे ने  शाम को बिग बास्केट से कुछ नए प्रकार के फल भेजे, उनमें एक ड्रैगन फ्रूट भी है। 


आज उन्हें असम छोड़े हुए तीन सप्ताह हो गए हैं। यहाँ घर  की दिनचर्या लगभग निश्चित हो गई है।  सुबह वे साढ़े चार बजे उठते हैं, टहलने जाते हैं जब हल्का अंधेरा होता है। वापस आकर योग साधना। हॉर्लिक्स पीने के बाद बगीचे में कुछ देर काम और हरसिंगार के फूल चुनना। उसके बाद स्नान और नाश्ता बनाना। जिसमें सब्जी काटने से आरंभ करना होता है। उसके बाद अखबार पढ़ना, व्हाट्सएप व फ़ेसबुक पर पोस्ट डालना।  जून ने दीवाली की लाइट उतारने के लिए इलेक्ट्रिशियन को बुलाया है। कल की सेवा के बाद दायाँ घुटना ठीक है, अब बाएं में कुछ दर्द हो रहा है, उसकी भी सेवा-सुश्रुषा हो जाएगी। एक सब्जी वाली घर बैठे पालक व पुदीना दे गई है, निकट ही एक गाँव है, वहीं से आयी होगी। शाम को वे टहलने गए तो काफी रौनक दिखी, एक पार्क में महिलाओं की थ्रो बॉल प्रैक्टिस चल रही थी। एक जगह बच्चे स्केटिंग कर रहे थे।  


वर्षों पुरानी उस पुरानी डायरी में पढ़ा - 


सत्य यही है कि संसार में दो नियम हैं जन्म और मृत्यु ! 

नाश का ज्ञान रखने वाला क्या कभी पाप करेगा ? वह तो जितने दिन रहेगा, स्नेह और समता से ही इस संसार में रहेगा। आदमी जब तृष्णा, अहंकार और ईर्ष्या से शीघ्र ही कुछ प्राप्त कर लेने के लिए काम करता है, तब वह अपने भीतर ही असहिष्णु हो जाता है। अहंकार उसकी नींवों को ठोस भूमि पर खड़ा नहीं रहने देता। 


सबकी आत्मा की शक्ति समान है कुछ की शक्ति प्रकट हो गई, कुछ की प्रकट होनी बाकी है, बस इतना ही अंतर है ! 


बापू की एक सूक्ति भी उसने लिखी थी - क्षण भर भी काम के बिना रहना ईश्वर की चोरी समझो। काम के सिवा भीतरी और बाहरी आनंद का और कोई रास्ता मैं नहीं जानता। 


Tuesday, September 8, 2020

बारिश की बौछार

 

आज सुबह घर से निकलने के लिए तैयार थे पर न ओला मिली न उबर, काफी देर इंतजार किया फिर नन्हे के मित्र ने कहा, उसकी कार ले जाएँ. आधे घण्टे में ही पहुँच गए. रास्ता बहुत सुंदर है, सड़क भी अच्छी है, गांव से गुजरते हुए, मन्दिरों के दर्शन करते सोसायटी के पिछले गेट से वे घर पहुँचे तो जाली के दरवाजे लेकर कारीगर खड़े थे. जो उनकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे. थोड़ी देर में एसी लगाने दो मकैनिक भी आ गए. दोपहर तीन बजे तक दोनों काम हो गये. कुछ देर विश्राम करने के बाद वे वापस आ गए. कुछ देर पूर्व नीचे शॉप में गयी तो शीशे का दरवाजा इतना साफ था कि खुला समझकर टकरा गयी, ध्यान कहीं और था. दोपहर को योग वशिष्ठ पढ़ा था जिसमें चेतना के जागरण के सिवा और कोई बात ही नहीं है. स्वयं के प्रति सजग व्यक्ति को जगत के प्रति असजग तो नहीं हो जाना चाहिए. नन्हे ने गृहप्रवेश के निमन्त्रण के लिए  सुंदर इ कार्ड बनाया है. पंडित जी व कैटरर को उसने एडवांस भी दे दिया है. कल रात्रि गुरूजी का एक वीडियो देखा, ‘कला’ के बारे में समझा रहे थे. बहुत सुंदर विधि से उन्होंने कला व कविता की परिभाषा बताई. सुबह सोमनाथ में दिए उनके प्रवचन को सुना, अमृत के समान मधुर हैं उनके बोल ! इस बार की कविता का विषय है ध्यान, उसने सोचा व्हाट्सएप कविता ग्रुप में ‘ध्यान’ पर लिखी कोई पुरानी कविता पोस्ट करेगी. 

शाम को घर वापस आ रहे थे कि अचानक तेज बूंदें पड़ने लगीं, विंड स्क्रीन पर लगातार चल रहे वाइपर के बावजूद सड़क साफ नहीं दिखाई दे रही थी. जून आज भी नन्हे के मित्र की कार लेकर आये.  दोपहर को एसी यूनिट के सिलसिले में दो मकैनिक आये. उन्हें दीवार में हुए छेद को सीमेंट से बन्द करना था, छत से रस्सी के सहारे लटक कर उन्होंने यह काम किया, काफी खतरा था इसमें. इसके अलावा माइक्रोवेव ओवन भी आयी और तकिये भी, अक्टूबर में जब वे यहां आएंगे अपने साथ कुछ सामान लाना ही शेष रहेगा. किताबें, वस्त्र, कलात्मक वस्तुएं, गमले और कुछ फर्नीचर. आज पहली बार यहां के डिपार्टमेंटल स्टोर में गयी, एक महिला चला रही थी, साथ में थी उसकी दुबली, लंबी बिटिया.  कुछ छोटे-मोटे सामान खरीदे, दो रातें उन्हें यहाँ बितानी होंगी. दोनों बिल्लियां सो रही हैं, दफ्तर जाते समय नन्हा उन्हें खाना-पानी देकर बालकनी में बन्द कर देता है, ज्यादातर समय सोती रहती हैं. योग वशिष्ठ पढ़ते समय कैसी अनुभूति होती है. इस संसार में सारा भय, विषाद और दुःख तभी तक है जब तक मन है, यानि आत्मा नहीं है. एक ही आत्म तत्व विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है, जब तक यह ज्ञान दृढ नहीं हो जाता, दुःख से छुटकारा नहीं हो सकता. आज दोपहर को उनके पड़ोसी आये थे, वह बहुत शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाते हैं, टहलने जाते हैं, और घर आकर प्राणायाम करते हैं. 


अतीत के पन्ने .....कॉलेज की अंतिम परीक्षा का प्रथम दिन है. कितनी ख़ुशी होती है जब किसी वस्तु को वे अंतिम बार विदा देते हैं. जैसे आज वह पहले कोर्स को दे देगी. कल पढ़ाई के बीच में थोड़ा सा विश्राम लेने के लिए निर्मल वर्मा की एक सशक्त कहानी पढ़ी, किसी विदेशी कहानी जैसे लगती है. 

पहली परीक्षा के बाद सात दिन का अंतराल था. दिन भर पढ़ाई की, शाम को टीवी पर फिल्म थी ‘गमन’, अच्छी थी, एक समस्या प्रधान फिल्म. 


दिन भर किताबों में बीता पर शाम को यहाँ क्लब का वार्षिकोत्सव था, अच्छा लगा सिर्फ एक नाटक को छोड़कर, उस नाटक की कथावस्तु एक घटिया नारेबाजी जैसी बनकर रह गयी, जो लोगों को हँसा जरूर सकती है पर कुछ सोचने पर विवश नहीं कर सकती. पढ़कर उसे वे वर्ष याद आ गए, दो-तीन नाटकों में उसने भी अभिनय किया था. एक का निर्देशन भी. उस दिन नाटक और लेख प्रतियोगिता का पुरस्कार उसे भी मिला था. उसकी पढ़ाई पूरी होने वाली थी, अब तो आत्मनिर्भर होना था, यही लक्ष्य था उसका अब नौकरी ढूंढना. शमे फिरोजा प्रोग्राम में सुना था कि जिंदगी बेमकसद हो तो जिंदगी नहीं रहती. एक सीधी सच्ची राह चुन कर उस पर चलते जाना है जैसे एक दिन एक जिन्न ने आदमी से कहा उसे खजाना पाना है तो इस रास्ते पर सीधा चलता  जाये, दांये-बांये देखा तो पत्थर बन जायेगा. 


Monday, August 31, 2020

एओल आश्रम

 आज सुबह ही वे नए घर आ गए थे. जून को दफ्तर का कुछ काम था, वह देर तक फोन पर ही रहे. नन्हा अपना दफ्तर का काम करता रहा, मजदूर अपना काम और वह योग वशिष्ठ पढ़ती रही और मोदी जी के पुराने भाषण सुने. उनका अति मोहक व्यक्तित्व था और अब भी है. उनका जैसा प्रतिभावान व्यक्ति कोई लाखों में एक होता है. शाम को वे पड़ोसी के यहाँ गए, बहुत मिलनसार हैं. जून को चाय पिलाई, उनके पुत्र ने आश्रम तक लिफ्ट दी. इस समय रात्रि के दस बजे हैं, वे एओल आश्रम में हैं. उसका कमरा नम्बर तीन सौ दो है और जून का एक सौ चौदह, पहले उन्हें कोई और कमरा  मिला था, फिर बदला और अंत में अब यह खाली कमरा  मिला है, शायद अब तक कोई आ गया हो. उसके कमरे में अभी तक और कोई नहीं है. उन्होंने सामूहिक भोजनालय में रात्रि भोजन किया, टमाटर सूप, दाल-चावल, रोटी तथा सब्जी, प्रसाद रूप में हजारों लोगों के लिए बना यह भोजन स्वादिष्ट होता है. सैकड़ों लोग इसे बनाने में अपनी सेवा देते होंगे. आश्रम में गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष में कई कोर्स चल रहे हैं. बच्चों के लिए भी कोर्स है और सबके साथ वृद्धजनों के लिये भगवद गीता के प्रवचन का भी. प्लेट्स धोने का तरीका अच्छा नहीं लगा, लेकिन हजारों प्लेट्स को धोने का काम कितना कठिन होता होगा, अवश्य ही कोई साफ-सुथरा तरीका अपनाना होगा. पानी में हाथ डालकर प्लेट्स निकालते समय कैसा लगता होगा, सेवा भाव अपनी जगह है पर... जब वे अन्नपूर्णा जा रहे थे गुरूजी अपनी कार से रवाना हुए, लोगों ने उन्हें हाथ हिलाया, उन्होंने भी हाथ हिलाया. सत्संग के समय बड़े से स्क्रीन पर उनका निर्देशित ध्यान किया. कल सुबह दस बजे से कार्यक्रम है. अभी-अभी एक अन्य महिला इस कमरे में आ गयी हैं. हिंदी भाषी हैं. उनका नाम व हालचाल पूछा, उन्हें एसी उनतीस डिग्री  पर रखना है पर पंखा फुल पर, पसन्द अपनी-अपनी... नन्हे से बात की वह घर पहुँच गया है.  


रात्रि के सवा नौ बजे हैं, आश्रम के बसवा अतिथिगृह में उनका दूसरा दिन है. सुबह गुरूजी का प्रवचन सुना, गर्मी बहुत थी. टिन की छत वाला मण्टप काफी गर्म हो गया था. भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय का आधा भाग आज समाप्त हुआ, शेष भाग कल लिया जायेगा. कल प्रश्न भी पूछे जायेंगे. सुनकर कोई प्रश्न यदि सहज, स्वाभाविक रूप से उठता है मन में, तो उसका समाधान उसे भी पूछना चाहिए.  शाम के सत्संग में भी उन्होंने भाग लिया. गुरूजी ने कई प्रश्नों के उत्तर सरल शब्दों में  दिए. वे कुछ देर से पहुँचे सो बैठने के लिए कुर्सियां तब तक भर चुकी थीं. नीचे बैठना पड़ा, जून की पीठ में दर्द हो गया. उसे लगता है वह थोड़ी सी भी कठिनाई सहन करना नहीं चाहते, अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना नहीं चाहते. खैर.. सबकी अपनी-अपनी क्षमता होती है. सत्संग आरम्भ होने से पूर्व आश्रम की कैंटीन में हॉट चॉकलेट पी सीढ़ियों पर बैठकर, जैसे प्रातः भ्रमण व प्राणायाम के बाद कॉफी पी थी. अभी तीसरी महिला कमरे में नहीं आयी हैं, वह पंजाब से आयी हैं पूरे पन्द्रह दिनों के लिए. दोपहर तीन बजे वे नए घर गए, जो कार से यहाँ से दस मिनट की दूरी पर है. आज काफी काम हो गया. पूजा कक्ष में एक लकड़ी का एक सुंदर वृक्ष लगवाया, उसके पीछे प्रकाश भी है. डाइनिंग रूम में छोटी बहन की दी कुकू घड़ी लगायी, जिसमें हर घण्टे पर चिड़िया बाहर आकर बोलती है. धीरे-धीरे घर सामानों से भरता जा रहा है. 


उसने अतीत के पृष्ठ खंगाले, “ मिल गयी शांति  ! वह सोचती है उसने अच्छा किया पर उसने बुरा किया, बहुत बुरा ! जो जिसमें खुश रहे उसे वैसे ही रहने देना है. किसी के जाने से वह खुश रहेगी या उदास यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि उनके साथ वह कैसे रहती है. कोई कैसा भी हो उसके प्रति द्वेष भाव रखता हो या प्रेम का भाव, अपना ही तो है. फिर क्यों नहीं चुप रहती ! चुप रहना सबसे अच्छा है यदि उसके पास मधुर बोल नहीं हैं तो कड़वे बोल क्यों बिखेरती-फिरती है. ऐसे कड़वे बोल जो उसके होंठों से निकलते हैं जब उसका बदन काँप जाता है, उसके सिर में दर्द हो जाता है. 

वह सिर्फ अपने लिए जीते हैं ! दूसरों की जिंदगी में दखल देना उन्हें पसन्द नहीं, पर वे दूसरे कौन हैं ? उनका अपना परिवार ही तो. कितनी आसानी से उन्होंने कहा कि वे तो घर में मेहमान की तरह रहते हैं. ओह ! ईश्वर ! क्या फिर रिश्ते-नाते स्नेह आदि सब असत्य हैं ? 


नहीं ! नहीं ! नहीं ! यह यदि  असत्य है तो जीवन क्या है ? जीवन एक खोखली अनुभूति नहीं है फिर ! 

उस वक्त उम्र कच्ची थी, सो मेहमान की तरह रहने का अर्थ समझ में नहीं आया था. जीवन की समझ नहीं थी, आज पढ़कर हँसी आ रही है, अज्ञान के हाथों किस तरह छला जाता है मानव. 


Tuesday, August 25, 2020

ओला और उबर

 

साढ़े ग्यारह बजे हैं दोपहर के या कहें सुबह के. आज धूप काफी तेज है. प्रातः भ्रमण के बाद लौट रहे थे तो उस सोसाइटी के वही सज्जन मिले जिन्होंने एक बार उन्हें पार्क में योग अभ्यास करते देखकर कहा था, यहां की सड़कें सभी के लिए खोल दी गयी हैं पर पार्क नहीं. आज मुस्कुरा कर अभिवादन किया. वापस आकर नाश्ता बनाया, इतवार को कुक नहीं आता है. सोनू को अपने सहेली की बेटी के नामकरण पर जाना है, वह लौटेगी तब वे सब नए घर जायेंगे. ‘तीन’ का शेष भाग आज देखा. आज स्वास्थ्य काफी ठीक लग रहा है. कैल्शियम, विटामिन्स आदि सभी डॉक्टर ने लिख दिए थे. आयु बढ़ रही है. नए घर में काफी काम रहेगा, साथ ही आश्रम भी जाना होगा, स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा. चिंता और तनाव से मन को मुक्त रखना होगा.

रात्रि के आठ बजे हैं. आज योग वसिष्ठ में प्रह्लाद की कहानी पढ़ी. दीर्घतपा की कहानी भी, जो वर्षों पहले सुनी थी. आत्मा में टिकना जिसने सीख लिया वह अपने ही मन की उहापोह से बच जाता है. एक ही तत्व से यह सारा जगत बना है, यह गुरू-वाक्य जब अपना अनुभव बन जाता है तब मन में न राग बचता है न द्वेष, कुछ पाने और और कुछ छोड़ने की आकांक्षा भी तब नहीं रहती, एक गहन विश्रांति में मन टिक जाता है. कल दोपहर बाद वे नए घर गए थे, सफाई का काम चल रहा था. कई मजदूर लगे थे, महिलाएं भी थीं. शाम को नन्हा व भांजा डिपार्टमेंटल स्टोर से चाय का सामान ले आये, वहां पहली बार चाय बनाई. सबने बैठकर पी, कुछ तस्वीरें उतारीं, भेजीं, सभी की बधाई मिली. पिताजी को फोन करके कहा, यहां आने का मन बनाएं पर उन्होंने असमर्थता दिखाई. जून को इसी माह देहरादून जाना है वहां से उनसे मिलने भी जायेंगे. सुबह बड़े भाई का फोन आया, दोपहर को बड़ी ननद का, दोनों को गृह प्रवेश में आने का निमन्त्रण दिया. आज सुबह वहां जाने के लिए न ओला मिल रही थी न ऊबर, काफी प्रतीक्षा के बाद कार आयी. नया घर सेट करने में कितना श्रम होता है. दोपहर जून को काफी काम करवाने पड़े. अभी वापस आकर विश्राम करने लगे, सो शाम का योग आदि कुछ भी नहीं हुआ आज. सोनू ने दोपहर का लन्च पैक कर दिया था जो उन्होंने बारी-बारी से खाया. कुक अब रात का भोजन बना रहा है. वहाँ काम कुछ आगे बढ़ा है, इलेक्ट्रिशियन आया था, एक बार उसे और आना होगा. कार जो कल बन्द हो गयी थी और वे उसे वहीं छोड़कर आ गए थे, अभी भी वहीं है. आज मकैनिक नहीं गया, सम्भवतः कल जायेगा, कल ही होम एप्लाइंसेस भी इंसटाल होंगे.


ग्यारह बजे हैं. आधा घन्टा पूर्व वे यहां पहुंचे हैं. पड़ोसी से बात हुई. एक नैनी जाती हुई दिखी और अपने आप ही रुक गयी. शाम को चार बजे आएगी. असमिया पड़ोसी की बहू स्थानीय है, उसने हिंदी में समझाया, यहां भाषा की समस्या उन्हें होने वाली है. भाषा सीखनी पड़ेगी, अच्छा है, आज से ही शुरू कर दे. बढ़ बजे पर्दे आने वाले हैं, उसके बाद फ्रिज व डिश वाशर लगाने वाला आएगा. शाम को वे वापस जायेंगे, इस घर से उस घर. अभी-अभी कन्नड़ सिखने का एक ऐप डाउनलोड किया. पहले दिन का पाठ सीखा जिसमें मैं, हम, तुम, मेरा, हमारा, तुम्हारा  आदि के लिए नानू, नाबू, नीनू, नन्ना, नम्मा, निन्ना हैं. मेरे लिए, हमारे लिए, तुम्हारे लिए आदि के लिए नानाडू, नामाडू, निनागे हैं. 


और अब उस अतीत के आईने में देखा, लिखा था...वह पागल होती जा रही थी, ऐसा उसे लगा. उसने सोचा कि जो जो बातें उसके साथ घटित हों उन्हें डायरी में लिखती जाये ताकि उसे पढ़कर उसकी केस हिस्ट्री से किसी डॉक्टर को कुछ ज्ञान मिल सके फिर उसने आइना देखा और लगा उसकी आँखें हँस रही हैं और यूँ लगा कि वह जिन्दा है, जिन्दी जीती जागती ! और वह खिलखिला कर हँस पड़ी, पागल कहाँ है वह ! 


उस दिन वह बेहद खुश थी, एक पत्र आया था साहस और उम्मीद भरा पत्र, समझदारी और अच्छी सलाहों से भर पत्र, अपनेपन और हास्य से भरा पत्र. वह हमनाम सखी भी मिली उसे रस्ते में, वे बातें करते घूमते रहे मधुबन में ठंडी घास पर नंगे पाँव. उन्होंने निष्कर्ष निकाला, जो स्नेह का प्रति उत्तर स्नेह से देना नहीं जानती वह कैसे कविता की अधिकारिणी बन सकती है. उस दिन सुबह दादी के यहां भी गयी थी और मासी के यहां भी. उसके पेन की निब जो खराब हो गयी थी बदलवाई, और सोचा अब किसी को नहीं देगी, इसके साथ भी एक स्मृति जुड़ी है, उसकी हर वस्तु की तरह या हर पेन की तरह. एक जानकारी भी मिली थी उस दिन, अभी कुछ दिनों पहले तक क्वार्क्स सबसे छोटे कण माने जाते थे किसी तत्व के लेकिन एक महीने पहले किये गए रिसर्च के अनुसार अब प्रियोन्स सबसे छोटे कण हैं. 


Wednesday, July 22, 2020

वसिष्ठ और राम



आज सुबह अप्पम बनाये नाश्ते में, जून के एक सहकर्मी आये थे दस बजे कुछ जानकारी लेने, उन्हें भी खिलाये. पसन्द आये उन्हें. उन्होंने अपने बाल्यकाल की बातें बतायीं, किस तरह उनके माता-पिता ने कृषि का काम करना सिखाया तथा भोजन बनाना भी. कक्षा पांच में थे तब दोसा बना लेते थे. अब भी वे घर पर खेती करते हैं, उनके लिए खुद की उगाई सब्जियां लाये थे. टीवी में रामदेव जी को देखकर नियमित योग अभ्यास भी करते हैं. जून ने भी उन्हें सहजन व नारियल तुड़वा कर दिए. कल माली ने बहुत सारे सहजन तोड़े थे, दो तीन अन्य परिवारों को भी बांटे। सुबह शिवानी को सुना, कितना ज्ञान उनके भीतर भर है सीधा परमात्मा से उतरता है ज्यों ! दोपहर को सब्जी-फल लेने वे तिनसुकिया गए. बीहू के कारण बहुत चहल-पहल थी. नन्हे-सोनू  से बात की कल वे लोग किसी मित्र के विवाह में राजस्थान जा रहे हैं. नए घर में रंगरोगन का काम शायद कल से शुरू होगा. दोनों के लिए उसने वस्त्र खरीदे, पहली बार एक साथ दोनों के लिए ! बड़े भांजे के विवाह की सालगिरह है आज, दीदी के यहां फोन किया, सभी आये हुए हैं, विदेश में रहने वाली भांजी भी आयी है. शनिवार को वे पुस्तकालय गए थे उसे याद करते हुए शाम को एक घन्टा पढ़ने में बिताया. पिताजी ने बताया वह आजकल योगवशिष्ठ व भागवद पढ़ रहे हैं, पर इन ग्रन्थों को नॉवल की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, नियमित एक या दो पृष्ठ का अध्ययन करना चाहिए. योग वसिष्ठ में राम ने हर अवस्था में मानव के दुखों का कैसा मार्मिक वर्णन किया है. कलात्मक भाषा में अहंकार, मोह व तृष्णा के दुष्परिणामों का वर्णन किया गया है. चित्त की अशुद्धि को दूर रखने के लिए मन को स्थिर रखना होगा. समता को भावना में टिके बिना आत्मपद में स्थित होना असंभव है. तेनाली रामा में मुल्ला नसरुद्दीन भी आ गए हैं आजकल, उन्हें त्रिदेव के दर्शन करने हैं !

मौसम आज सुहाना है. सुबह साढ़े तीन बजे ही उठ गयी, उससे पूर्व ही एक स्वप्न देखकर नींद खुल गयी थी. छोटे भाई को देखा और उसके पूर्व स्वर्गवासी सास-ससुर को भी, वे अस्पताल में हैं. मन पुरानी स्मृतियों को दोहराता है पर कुछ इशारे भी करते हैं ये स्वप्न. मन आकर्षक दृश्यों को दिखाता है ताकि अपनी उपस्थिति जताता रहे. अव्यक्त की अनुभूति अब कितनी स्पष्ट होती है, एक प्रकाश, एक शांति और एक चैन के रूप में ! सुबह प्रातः भ्रमण से लौटते समय पलाश के फूलों से लदे  लाल वृक्ष देखे, कल वे  मोबाईल लेकर जायेंगे  और उनकी तस्वीरें उतारेगें. पहली बार पूरे के पूरे वृक्ष फूलों के लद गए हैं.  दोपहर को अचानक तेज हवा चलने लगी और एक घण्टे  तक मूसलाधार वर्षा होती रही. योग सत्र में ध्यान किया व करवाया, गुरूजी का ज्ञान पत्र पढ़ा; यह देह भी एक युद्ध क्षेत्र है, ऐसा उन्होंने कहा. उन्हें अपने भोजन पर ध्यान देना है, एक वृद्ध व्यक्ति से सुना था, ‘कम खाओ और अधिक खाओ’ भोजन  ऐसा हो कि देह में सुस्ती न आने पाए स्फूर्ति बनी रहे. टीवी पर प्रधानमंत्री की उड़ीसा में की गयी विशाल रैली दिखाई जा रही है. विपक्षी उनकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा  रहे हैं और बीजेपी कांग्रेस के घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र कह रहे हैं. गंधराज खिल गए हैं अभी उनकी तस्वीर उतारी ! 

शायद कोई संदेश मिला था उस दिन जो उसने बरसों पहले लिखा होगा - 

आ सकती नहीं वह 
आ सकता वह 
आएगा 
या बन जायेगा पत्थर पर खुदा
उसने उठाया उसे बाँहों में 
हवा उठाती ज्यों चिन्दी को 
ज्यों उठाते हैं जल चढ़ाने सूर्य को 
नसीब एक भारी पत्थर 
वे बच्चे 
करते हैं कोशिश हटाने की 
पत्तों के बीच थिरकती किरणों से खेल 
बनना नहीं चाहती वह नाव 
उसे ला दो समुन्दर 
वह घुल जाये बह जाये उसी में 
हवा आती है गुजर जाती है 
जैसे दूसरे देश का वासी 
जैसे परछाईयाँ तेज बादल की 
घाटी पर रुकती नहीं चली जाती हैं !

Saturday, June 20, 2020

पासीघाट के सन्तरे


आज इतवार था, सुबह के सभी कार्य, प्रातः भ्रमण, योग आदि बड़े इत्मीनान से किये, बिना किसी जल्दबाजी के. नाश्ते में अप्पम बनाये ढेर सारी हरी सब्जियां डालकर. बगिया में हरे प्याज, गाजर, गोभी आदि हो रही हैं. यह अंतिम वर्ष है जब वे सब्जियां उगा रहे हैं, अगले वर्ष से महानगर में सम्भवतः फूल ही उगा पाएंगे या सजाने के लिए गमलों में कुछ हरे पौधे. दोपहर को बच्चों को योग सिखाया साथ ही गणित भी, उन्हें बहुत आनंद आया. एक लड़का बहुत उदास था, अगली कक्षा में उसका दाखिला अभी तक नहीं हुआ है, बच्चों के लिए स्कूल जाना कितना जरूरी है , उससे बात करके लगा. एक बच्चे का पैर सूजा हुआ था, उसे अभी तक इलाज नहीं मिला, माता-पिता को सन्तान के प्रति ज्यादा सजग होना चाहिए पर... शाम को एक बाल फिल्म का एक अंश देखा. एक किशोरी अपनी सखियों के साथ सागर तट पर जाती है पर घर पर बताकर नहीं आयी है, सबके माँ-पिता कुशंकाएँ करने लगते हैं. मन कितनी जल्दी भयभीत हो जाता है, आत्मा अभय है सदा एक सी ! 

अभी वे रात्रि भ्रमण से लौटे, पिटूनिया के फूलों  का लाल रंग हल्के प्रकाश में सुंदर लग रहा था. आज दोपहर छोटी बहन से वीडियो कॉल पर बात हुई. वह मेथी काट रही थी, वीडियो कॉल पर बात करो तो लगता ही नहीं कि हजारों मील की दूरी है, उसका घर जैसे पड़ोस में आ गया हो. बताया, उसकी छोटी बिटिया विदेश पहुँच गयी है. बहनोई विदेश जाने वाले हैं, उनके लिए लिखी कविता का अंतिम भाग समझ में नन्हीं आया, ऐसा बताया. परमात्मा को भीतर या बाहर अनुभव किये बिना समर्पण का गीत गाया नहीं जाता. शाम को भगवद्गीता के एक श्लोक का भावार्थ सुना, आचार्य प्रद्युम्न कितनी अच्छी तरह भक्ति भाव में डूबकर गीता की व्याख्या करते हैं. कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग को बहुत सरलता से परिभाषित कर देते हैं. उसके पहले प्रेसीडेंट से मिलने गयी, उनका गला खराब है, पर क्लब का काम करने का उनका उत्साह देखते ही बनता है. उनके लिए विदाई कविता लिखनी है. दोपहर को पावर ऑफ़ नाउ का एक और अध्याय पढ़ा.उनके भीतर एक छाया शरीर भी होता है जो पीड़ा से ही पोषित होता है. पुराने नकारात्मक संस्कार तथा घटनाएं जब कभी जागृत हो जाती हैं तब वह शरीर मुखर हो जाता है और वे स्वयं को भूल जाते हैं, अपने स्वरूप से डिग जाते हैं. उसके भीतर भी हीन भावना, ईर्ष्या, अहंकार तथा दम्भ के रूप में पुराने संस्कार हैं, जो अचेत होने पर उभर आते हैं. दुबई से वापसी की यात्रा में कुछ पलों के लिए कैसी विवेकहीनता छा गयी थी, जैसे वह वह नहीं थी, कोई अन्य ही था. चाय के प्रति आसक्ति भी इसी छाया शरीर की मांग पर टिकी है, आत्मा को कोई अभाव नहीं है . उसे किसी सुख के लिए किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर निर्भर होने की जरा भी आवश्यकता नहीं है. आज मकर संक्रांति है, कल वे पासीघाट जा रहे हैं, अरुणाचल प्रदेश में स्थित यह स्थान सेंटरों के लिए प्रसिद्ध है. कल से कुम्भ भी आरम्भ हो रहा है. 

उसने फिर उस वर्षों पूर्व की डायरी का अगला पन्ना खोला, कुछ कविताएं कालेज की पत्रिका में छपने के लिए दीं थीं उसी दिन. एक कविता तो अवश्य छपेगी उनमें से ऐसा भी लिखा था.  अगले पन्नों पर वे कविताएं थी जो रेडियो पर सुने कवि सम्मेलन से लिखी थीं, 

जिंदगी जैसे शिकन रुमाल की 
एक नन्हीं सी लहर है ताल की 
जिंदगी है एक चिड़िया डाल की  
देखते ही देखते उड़ जाएगी 

बादलों में छिप गयी वह धूप है 
घूँघटों में कैद गोरा रूप है 
एक गिरते फूल का मकरन्द है 
एक झूठे प्यार की सौगन्ध है 
आंसुओं के नीर में बस जाएगी 
कुंवर बेचैन 

जीना  हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा
हर आँधी का उत्तर हो तुम, तुमने नहीं विचारा 
.............

सोचो तुमने इतने दिन में कितनी बार हुंकारा 

बाल कवि बैरागी  

है महानगर में शोर शोर में महानगर 
नागरिक नहीं रहती है भीड़ यहाँ, 

ये पंक्तियाँ किसकी हैं, नहीं लिखा है. 


Tuesday, June 9, 2020

अतीत और वर्तमान


वर्तमान के इस छोटे से क्षण में अनंत छिपा है, जिसने इस राज को जान लिया, वह मुक्त है. मन सदा अतीत में ले जाता है, या भविष्य की कल्पना में, वर्तमान में आते ही वह मिट जाता है. उसे टिकने के लिए कोई आधार चाहिए, वर्तमान का क्षण इतना छोटा है कि उसमें कोई शब्द नहीं ठहर सकता, मन शब्द के सहारे ही जीवित रहता है. उस पुरानी डायरी में पढ़ा, वह फिर कड़वा बोली, कितनी बार कहा है खुद को, अपने तुर्श मिजाज को बदले, उसे पछताना पड़ेगा. जितना कम बोलेगी उतना सही बोलेगी, जितना ज्यादा बोलेगी उतना गलत बोलेगी. जहाँ जानकारी न हो या कोई मतलब न हो वहाँ रहकर चल रहे वार्तालाप में भाग लेने की क्या जरूरत है, अन्य की बातों में दखल देने में क्या तुक है ? कालेज में जब एक खाली पीरियड था, वह कुछ लिख रही थी, उसके हाथों और आँखों की गतिविधियों को देखकर एक छात्रा ने अनुमान लगा लिया कि वह उनके बारे में कुछ लिख रही है. उसने कालेज के कार्यक्रम में कविता पाठ किया है सो इतना तो वे जानती हैं कि उसे लिखने का शौक है. वह उसके निकट आकर वही सब कहने लगी जो पहले भी दो छात्राएं कह चुकी हैं, फिर यह कि मैथमैटिशियन हैं, दिमाग चढ़ा हुआ है. वह चुपचाप सुनती रही. मन में एक नाम कौंध गया, उसका नाम लेते ही उसकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाती हैं, क्या जादू है उसके नाम में या उसके नाम के प्रति उसकी आस्था में. आस्था सिर्फ नाम में है उसमें नहीं पर यह कौन मानेगा ? वह कविता उसने एक छात्रा को दे दी, पता नहीं उसे कैसी लगेगी. अपनी एक प्रिय सखी को देती तो प्रतिक्रिया उसके अनुकूल होती, वह तो मिली नहीं जिसके लिए लिखी थी. कोई एक ऐसा वाक्य लिखने का मन होता है जिसमें उसकी सारी भावनाएं समा जाएँ और वह वाक्य सुकून भी दे - तुम्हारी आँखें हर वक्त मुस्कुराती क्यों हैं ? 

मन ही वह राक्षस है जिसका दमन करके पुरुष  अवतारी कहलाये, मन ही वह मार है जिसका सामना बुद्ध ने किया. मन के अनुसार नहीं चलना है, उसको उसका सही स्थान दिखाना है. एक साधक यदि मनमुख होकर जीता है और अपने विवेक का अनादर करता है तो उसे साधक कहलाने का अधिकार नहीं है. मन को मारना आत्मा को जगाना है. कल रात्रि पुनः वही स्वप्न देखा, ‘वह कौन है’ इसका उत्तर जिसमें मिला. स्वप्न शुरू होता है तो वह एक पार्टी में है, जून की कोई ऑफिशियल पार्टी है. साथ में बड़ा भांजा भी है. उसके पास एक बैज है जिसे वह लगाना चाहती है, पर वह जून का है और वह लगाना नहीं चाहते. फिर अचानक वर्षा होने लगती है. वह उठ जाती है. और बाहर निकल आती है. कुछ दूरी पर ही कुछ महिलाएं बैठी हैं, जहाँ जाना है पर रास्ता कच्चा है और ढलान है. वह उतरती है तो कुछ पत्थर भी गिरने लगते हैं, पर सुरक्षित पहुँच जाती है. वर्ष संभवतः रुक गयी है, आगे चल पड़ती है, आगे रास्ता चौड़ा है और सुनसान है. काफी दूर निकल जाने के बाद लौटने का मन होता है तो सड़क पर आते वाहन दिखते हैं, बड़े-बड़े वाहन गुजर जाते हैं फिर एक बड़े से रथ पर कृष्ण और अर्जुन की मूर्ति दिखाई देती है. एक दूसरे विशाल रथ में केवल कृष्ण की. फिर आवाज आती है, माँ, माँ, माँ, माँ  और नींद खुल जाती है. माँ की ध्वनि इतनी तीव्र और स्पष्ट थी, मधुर थी. वह किस  की आवाज थी, वर्षों पहले भी किसी ने माँ कहकर उसे जगाया था. यशोदा का अर्थ है दूसरों को यश देना, जो उसे अच्छा लगता है. 

कालेज से लौटने पर पहला काम जो उसने किया वह था पुनः जून के उस पत्र को पढ़ना, जो बहुत प्रतीक्षा के बाद मिला था. हर बार पढ़ने पर नया लगता, उसने कहा है, फालतू बातें मत सोचा करे ! मन लगाकर पढ़े, यही तो उससे होता नहीं. प्रयत्न करेगी.  स्टीवेन्सन की उस कहानी के पात्र की तरह वह किन्हीं अदृश्य हाथों द्वारा संचालित होती है. डायरी में पेज के ऊपर लिखा आज का वाक्य है ‘निष्क्रियता मनुष्य के लिए अभिशाप है’ अभी नजर गयी उस पर, वह भी उसे समझा रहा है. आज सुबह कालेज जाते समय दो छोटे बच्चों की बातें कानों में पड़ गयीं, आपकी नाक कितनी लम्बी है, आपके बाल कितने घुंघराले हैं ! और वह बच्चियां .. आओ दीदी, झूल लो, फिर वह छोटी लड़की... यह लड़की हँसती जा रही है. बस में भिखारी बच्चा उसके घुटने को छूकर पैसे मांगने लगा ... यह सब बच्चे उसे कभी -कभी बहुत उदास कभी बहुत खुश नजर आते हैं. उसे बच्चों को देखकर लगता है, अभी स्पंदन है, धरती जीवित है... जीवन है ... सारिका का स्मृति विशेषांक मिला, पूरा तो नहीं पढ़ा है पर जितना पढ़ा बहुत अच्छा लगा. काफी दिनों बाद सारिका का साहित्यिक, आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक रूप देखने को मिला. 



Monday, April 20, 2020

विश्वकर्मा पूजा


रात्रि के आठ बजने वाले हैं, आज विश्वकर्मा पूजा का उत्सव उन्होंने जून के दफ्तर में मनाया. सुबह साढ़े नौ बजे वह उनके एक सहकर्मी की पत्नी के साथ वहाँ पहुँच गयी थी. पूजा दस मिनट पहले ही समाप्त हो चुकी थी, प्रसाद वितरण की तैयारी थी. जाते ही नाश्ते का एक पैकेट मिला. एक मिठाई, एक नमकीन व एक केला. प्रसाद में नारियल व अदरक के टुकड़े मिश्रित अंकुरित मूंग व चने तथा चिनिया केला. पहले तंबोला और लॉटरी निकलने का मजेदार खेल हुआ फिर भोजन, जो बाहर से मंगवाया गया था. घर आकर कुछ देर आराम किया, पर नींद नहीं आ रही थी, मन में उत्सव के विचार आ रहे थे, फिर सुबह सुनी गुरु माँ की बात याद आयी. जप को गहरा करके पैर के अगूँठे तक स्पंदन को महसूस करना है, मन एकाग्र हो जाता है, ऐसा ही हुआ. दोपहर बाद उसी सखी के साथ एक अन्य सखी को देखने अस्पताल गयी. उसकी किडनी में स्टोन है छोटा सा. उसके पति दफ्तर के काम से विदेश  गए हैं, पुत्र भी यूरोप में जॉब के सिलसिले में हैं, तथा ससुर जी दूसरे अस्पताल में एडमिट हैं, उनका आपरेशन हुआ है शायद एक-दो दिनों में घर आ जायेंगे. भगवान सबकी सहायता के लिए किसी न किसी को भेज ही देता है, उनका माली ससुर की सेवा में है और उसकी पत्नी घर की देखभाल कर रही है, पुत्र ससुर जी के लिए भोजन लेकर गया है. शाम को योग कक्षा में एक साधिका ने पूछा, उसके बाएं पैर में दर्द है, क्या करे, तिल के तेल की मालिश से अवश्य ही लाभ होगा, ऐसा उसे बताया. 

रात्रि के आठ बजे हैं, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में गणेश पूजा का एपिसोड आ रहा है. जिसमें मूसलाधार वर्षा हो रही है. कुछ देर पहले क्लब की अध्यक्षा का फोन आया, कैंटीन में उनके द्वारा मंगाए गए उपहार आ गये हैं. पहली बार ऐसा हो रहा है कि सभी सदस्याओं को वार्षिकोत्सव के बाद उपहार दिए जायेंगे. शाम को बेसिक कोर्स का फॉलोअप था, सुदर्शन क्रिया करायी गयी. दोपहर को अगले महीने होने वाले क्लब के एक कार्यक्रम की तैयारी के लिए मीटिंग थी, परसों कुक को बुलाकर मेनू तय करना है. आज सुबह पीछे वाले घर से लड़कियों के रोने की आवाजें आयीं तो नैनी को भेजकर बुलवाया. दो किशोरी कन्याओं को उनके चाचा ने पिता के कहने पर डंडे से पीटा. उसे भी बुलाया, डांटा। लड़कियों को समझाया, वे दोनों रात भर गांव में कोई कार्यक्रम देखकर सुबह घर लौटी थीं. किशोरावस्था में दोनों ने कदम रखा ही है और मित्र बना लिए हैं. आज माली ने बांस का एक गोल ढाँचा बनाया, जिस पर पॉलीथिन लगाना है. क्यारी में बीज डालकर उसे ढकना होगा वर्षा जल से बचाने के लिए. आज फिर दो ठेले गोबर की खाद के खरीदे बगीचे के लिए. यह वर्ष उनकी खेती-बाड़ी के लिए अंतिम वर्ष है, इसलिए अभी से तैयारी शुरू कर दी है. 

आज का दिन कुछ अलग था, सुबह-सुबह ही प्रेसीडेंट का फोन आया. साढ़े दस बजे वे उपहार में दिए जाने वाला सामान देखने कैंटीन गए, वहां के लोगों का व्यवहार बहुत शालीन था. एक घंटे के अंदर उन्होंने सामान भिजवा दिया.  दोपहर को मृणाल ज्योति गयी, जहां चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष तथा दो सदस्यों से मिलने का अवसर मिला. जिला बाल वेलफेयर अधिकारी भी आयीं थीं. मीटिंग काफी देर तक चली. वे साढ़े तीन बजे घर लौटे. जून सुबह नौ बजे ही दफ्तर चले गए थे और दोपहर को डिब्रूगढ़. विशेष बच्चों की सुरक्षा के लिए सरकार कितनी सजग है, कई बातों की जानकारी हुई. 

मौसम काफी गर्म है आज, सितम्बर का तीसरा हफ्ता चल रहा है पर अभी तक जून का सा आभास हो रहा है धूप में. आज सुबह कुक आया था अक्टूबर में क्लब के कार्यक्रम में नाश्ते व भोजन का जिम्मा उसे दिया गया है. कुछ देर पूर्व टीवी पर राजस्थान सीकर से गुरूजी का ज्ञान सुना जो वे किसी कालेज के छात्र-छात्राओं को दे रहे थे. सीधी-सरल भाषा में उन्होंने ज्ञान के गहरे सूत्र समझा दिए. उनकी बातें इतनी सरल होते हुए भी कितना गहरा अर्थ लिए होती हैं. दोपहर को हिंदी की कक्षा के लिए मृणाल ज्योति गयी. एक से ग्यारह तक गिनती के साथ कुछ शब्द लिखवाये. मोबाइल पर साइन लेंग्वेज में हिंदी सिखाने का तरीका देखा, उसकी सहायता से पढना आसान हो गया है. 

Friday, April 17, 2020

कैटरी-बिल्लियों का घर


सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. आज वर्षा नहीं हो रही है, न ही अभी तक धूप तेज हुई है. बाहर का मौसम अच्छा है वैसे ही मन का मौसम भी ! सुबह उठी तो भीतर ध्यान का प्रयास चल रहा था, अर्थात नींद में भी कोई धारा लगातार चलती रही थी. रात को ध्यान करते-करते ही सोयी थी, शिव सूत्र पर प्रवचन चल रहा था, शायद रात भर मोबाइल ऑन ही रह गया, बैटरी खत्म हो गयी. मन में वृत्ति का प्रवाह अब भी चलता है लेकिन उसे देखते ही विलीन हो जाता है और रह जाती है एक अखण्ड शांति ! उन्हें सदा उसी अपने निराकार स्वरूप में रहना सीखना है, व्यर्थ के संकल्प उनकी ऊर्जा को व्यर्थ करते हैं. एकाग्र मन ही शुद्ध मन है. स्थिर बुद्धि ही विवेक है. परमात्मा की शक्ति है चिति शक्ति और उसका विस्तार है आनंद !  जो प्रकृति के रूप में प्रकट हो रहा है. शिव सूत्र में सोलह कला का एक नया सरल अर्थ सुना, तीनों अवस्थाओं के पन्द्रह भेद और सोलहवां मन. उनके भीतर ही सारे प्रश्नों का अर्थ छिपा है, यदि वे अंतर्मुख होकर स्वयं के सारे आयामों से परिचित होना आरंभ कर देते हैं तो परमात्मा की शक्ति सारे रहस्यों को खोलने लगती है. उनका जीवन एक सहज बहती नदी की धारा की तरह है जिसमें समय के अनुसार परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन इस जीवन का आधार सदा एक रस है, जैसे वह आकाश जिसमें सब कुछ स्थित है. 

सुबह उठी तो सवा पांच हो गए थे. प्रातः कालीन  भ्रमण  पर जाते समय और लौटते समय भी भगवद्गीता का पाठ सुना. अद्भुत वचन हैं कृष्ण के, गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जितनी बार भी पढ़ें या सुनें, नया ही लगता है. मन कृष्णमय हो गया है. जून का वीडियो कॉल आया, वह भुवनेश्वर के उस होटल में ठहरे हैं जहाँ लैगून है, जहाँ वे दोनों कुछ समय पहले ही गए थे. कल वह आ रहे हैं. आज एक पुराने मित्र परिवार से मिलने आएंगे. शनिवार की साप्ताहिक सफाई का कार्य चल रहा है. नैनी को बुखार है, उसकी देवरानी आयी है. कल रात आयी थी तो उसकी आवाज बदली हुई थी, कल दोपहर वह बच्चों को लेकर पैदल ही गणेश पूजा देखने गयी थी वह, खिचड़ी खाने का मन था, पर भीड़ बहुत ज्यादा थी, शरारती भतीजे के कारण भी बहुत परेशानी हुई. अभी उसे देखने गयी तो उसके पति ने कहा, नाश्ता बना रही है, यानि बुखार में भी आराम नहीं है. कल मृणाल ज्योति गयी, मूक-बधिर बच्चों को हिंदी भाषा का ज्ञान देना है, उन्हें चित्रों और इशारों के माध्यम से ही पढ़ाया जा सकता है. वहाँ एक अध्यापिका ने बताया, ट्यूबवेल लगाने के लिए स्थान देखने कम्पनी से कुछ लोग आये थे. स्कूल से लौटकर एक कप कॉफी पीने एक सखी के यहाँ गयी, उसका पुत्र लंदन लेस्टर युनिवर्सिटी पढ़ने जा रहा है, तीन साल का कोर्स है. उससे भी मुलाकात हुई, वह खुस था और समझदार भी बहुत है. इंजीनियरिंग कर चुका है, किन्तु पुनः डिग्री कोर्स करने ही जा रहा है. ज्ञान का कोई अंत नहीं है. अभी-अभी नन्हे और सोनू से बात हुई, उन्होंने अपनी बिल्लियों को दो दिन के लिए कैटरी में रखा है, वहां अन्य दस-बारह बिल्लियां रहती हैं और चिड़िया व तोता भी. सोनू एक पजल बना रही थी जो उसके भाई ने जापान से भेजा था. कल वे दोनों नापा वैली जायेंगे, जहाँ उनके भावी नये घर में आंतरिक सज्जा का काम चल रहा है. 

दोपहर के साढ़े बारह बजने को हैं. इतवार के सारे कार्य हो चुके हैं. पिताजी व बड़ी ननद से फोन पर बात भी हो गयी, छोटी का फोन नहीं लगा. वापसी की यात्रा के लिए जून अब हवाई जहाज में बैठ चुके होंगे. 

Sunday, January 19, 2020

विश्व योग दिवस



आज का दिन काफी व्यस्त रहा और काफी अलग भी. प्रातः भ्रमण के समय फूलों से लदे वृक्षों की तस्वीरें उतारीं, बाकी दिन घर आने की जल्दी होती है सो वे कैमरा लेकर नहीं जाते. बड़े भाई से बात हुई वे एक प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र में नौ दिन रहकर आये हैं, उन्हें काफी हल्कापन महसूस हो रहा है. देह में जहाँ कहीं भी दर्द आदि थे, चले गए हैं. दोपहर को सन्डे योगा क्लास के बच्चों के साथ स्वच्छता अभियान चलाया, घर के सामने तथा बायीं ओर की सड़कों से कई थैले भरकर कूड़ा उठाया, कुछ दिन ये सड़कें साफ रहेंगी फिर आते जाते लोग इन्हें बेहोशी में गन्दा कर देंगे. बच्चे बेहद खुश थे, जब वे वापस आये तो उन्हें पंक्ति में खड़ा कर हाथ धुलवाए, नैनी ने नाश्ता तैयार कर दिया था. श्रमदान के बाद भोजन का अलग ही स्वाद आता है. जून काफी दिन पहले अमूल लस्सी का क्रेट लाये थे, उन्होंने भी बांटने में सहयोग किया. सुबह वह दो सखियों के साथ को ऑपरेटिव से विश्व योग दिवस के लिए आवश्यक सामान लेने गयी, महिला क्लब में भी वे इस दिवस पर कार्यक्रम कर रहे हैं. कल से वे योग प्रोटोकाल के अनुसार अभ्यास भी आरंभ करने वाली हैं. उस दिन सुबह भी बीहू ताली में सामूहिक योग किया जायेगा. क्लब की एक सदस्या से फोन पर बात करके परिचय लिया, उनकी विदाई कविता लिखने के लिए. 

सुबह नींद खुलने से पूर्व स्वप्न में पशुओं की खाल की बात हो रही थी, कल शाम की मीटिंग में कुछ महिलाओं को भोजन का मीनू बनाते समय जो शब्द सुने थे, शायद उन्हीं का परिणाम था यह स्वप्न, या किसी पूर्व जन्म की स्मृति से उपजा था, कौन जाने !  सुबह की दिनचर्या अभी समाप्त हुई ही थी कि ड्राइवर आ गया, ड्राइविंग का अभ्यास किया, अब कुछ-कुछ समझ में आने लगा है. कल विश्व योग दिवस है. उसे चार कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिल रहा है. परमात्मा की कृपा है. 

आज इतवार है. जून थोड़ी देर के लिए दफ्तर गए हैं. लन्च में विशेष कुछ बनाना नहीं है, सलाद व फल. शाम को उनके पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को बुलाया है. वे लोग इसी महीने के अंत में सदा के लिए गोहाटी जा रहे हैं. आज सुबह एक्वा गार्ड का मकैनिक आया, कुछ दिन खराब रहने के बाद आज से मशीन ठीक हो गयी है. यहां पानी में आयरन ज्यादा है. परसों सुबह उन्हें उड़ीसा की यात्रा पर निकलना है. बगीचे में माली काम कर रहा है, उसका पूरा परिवार ही कुछ न कुछ सहयोग कर रहा है. दो दिन पहले नशा करके उसने बहुत उत्पात मचाया, जून ने तो उसे जाने को कह दिया था, पर वे लोग यहां रहना चाहते हैं. सुधरने का वादा पहले भी कई बार कर चूका है पर मन को जब किसी वस्तु की आदत पड़ जाती है, तो वह बिना सोचे-समझे उस कार्य को करना आरम्भ कर देता है, चाहे वह कार्य उसके या देह के लिए हानिकारक हो. मन जब स्वयं को बदलना आरम्भ करता  है तो पुराने संस्कार उसे रोकते हैं. वह छूटना चाहते हुए भी आदत का गुलाम होकर उसी कार्य को दोहराने लगता है. सजगता यदि एक क्षण के लिए भी न रहे तो मन दुर्बल हो जाता है. तमस की अधिकता के कारण भी मन सजग नहीं रह पाता। सजग मन ही सात्विक कर्मों में लगाता है. उसने सोचा, ये सब बातें उसे इस जन्म में कौन बताएगा, जिन्हें ज्ञात हैं वे भी मन को कहाँ साध पाते हैं ?

Monday, December 9, 2019

मन की शांति



“दुःख, उदासी, शरीर में अस्थिरता, श्वास में कंपन आदि समाधि में अंतराय होते हैं. आध्यात्मिक दुःख यदि न हों तो अन्य दो प्रभावित नहीं कर सकते”. आज सुबह टीवी पर उपरोक्त वाक्य सुना. वैदिक चैनल पर डॉ सुमन विद्यार्थियों को ‘पतंजलि योग सूत्र’ पढ़ाते समय कह रही थीं. समाधि शब्द सुनते ही उसके भीतर कोई कमल खिल जाता है. सम्भवतः योग के हर साधक का यही लक्ष्य होता है, वह भाव समाधि का अनुभव कर चुकी है, निर्विकल्प समाधि का अनुभव इसी जन्म में होगा, ऐसा स्वप्न भी कितनी बार देखती है. परमात्मा की कृपा से ही यह सम्भव होगा. कल सुबह की तैयारी हो चुकी है, सामान काफी हो गया है इस बार. ग्यारह दिनों के लिए वे बाहर जा रहे हैं. चार रात्रियाँ कोलकाता में, सात भूटान में. तीन थिम्पू, दो-दो पुनाखा और पारो में। आज योग कक्ष का रेगुलेटर बदल गया है. पुराने में अंक स्पष्ट नहीं दिखते थे, पर इतने वर्षों से काम चला रहे थे वे. कई बार समस्या का हल कितना आसान होता है पर उन्हें समस्या के साथ रहने की आदत पड़ जाती है. जैसे मानव देह के रोग, कमजोरी आदि से परेशान रहता है, पर आत्मा की खोज नहीं करता. परेशानी के साथ जीने की आदत डाल लेता है. आज सुबह अकेले ही प्राणायाम किया, जून तैयारी में लगे थे. उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने का अब मन नहीं होता, वह स्वयं के लिए निर्णय लेने में समर्थ हैं. वाणी का दोष स्पष्ट नजर आने लगा है, सो बोलने से पूर्व बोलने का तरीका भी स्पष्ट हो रहा है. परमात्मा कितना धैर्यपूर्वक उन्हें सिखाते हैं, वैसे वे खुद हैं ही कहाँ, वही तो है, वही खुद को संवार रहा है, उसी का एक अंश... जिसने स्वयं को उससे जुदा मान लिया था भ्रम वश ! 

अभी कुछ देर पहले ही यात्रा से वह घर लौटी है, जून घर नहीं आये, सीधा दफ्तर चले गए. उन्हें किसी मीटिंग में जाना था. नैनी ने सफाई का काम करवा  दिया है. सफाई कर्मचारी भी आ गया था और धोबी भी, घर कुछ ही घण्टों में व्यवस्थित हो गया है. सुबह की फ्लाइट से आने का कितना फायदा है. आज पूरे ग्यारह दिनों बाद यह डायरी खोली है. भूटान में हर दिन का यात्रा विवरण लिखा था, छोटी डायरी में. आज दोपहर से टाइप करने आरंभ करेगी. मृणाल ज्योति के लिए भी कुछ लिखना है. पिछले दिनों जे कृष्णामूर्ति की किताब पढ़ती रही. कोलकाता में कल काफी समय मिला. बहुत कुछ स्पष्ट होता जा रहा है. मन किस तरह स्वयं ही स्वयं का विरोध करता है, फिर स्वयं के जाल में फंस जाता है. मन यदि स्थिर हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति जैसे ही मन कोई राय बनाता है उससे दूर हो जाता है. अब वह राय ही उसकी आँख पर पर्दा बन जाती है. जैसे गोयनका जी  कहते हैं, प्रतिक्रिया करने के बाद उनका मन प्रतिक्रिया से उत्पन्न संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, मूल कारण तो पीछे छूट जाता है. मन जो भी विचार करता है वे  अतीत के अनुभवों पर आधारित होते हैं, यानि अतीत की लहरें वर्तमान के तट से टकराती हैं और भविष्य का जन्म होता है. शुद्ध वर्तमान को वे देख ही नहीं पाते. मन अपनी धारणाओं, मान्यताओं और विश्वासों के आधार पर एक मशीन की तरह काम करता है. ‘ऐसा होगा तो ऐसा करना है’, उसका अपना नियत एजेंडा है. 

आज चौथा दिन हैं उन्हें वापस लौटे, अभी भी मन भूटान की स्मृतियों से भरा है. जून ने जिस किताब का ऑर्डर वहाँ से किया था, वह आ गयी है. काफी मोटी पुस्तक है, भूटानी इतिहासकार की. उसे पढ़ना शुरू किया है, अभी यात्रा विवरण लिखना आरम्भ नहीं किया. आज सुबह स्वप्न में भगवान शिव की एक मूर्ति देखी। अंग स्पष्ट नहीं थे, पत्थर की आकृति से जान पड़ता था कि शिव हैं, फिर कुछ क्षण बाद श्वेत पत्थर की नन्दी की मूर्ति की झलक मिली. कल सुबह भी शिव-पार्वती दोनों की मूर्ति दिखी थी और बाद में भीतर शब्द प्रकट हुए थे दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती.... भीतर कोई पुरानी स्मृति जाग उठी थी शायद ! आजकल भिन्न-भिन्न गंधों को महसूस करती है, ज्यादातर समय कोई मधुर गन्ध, कभी-कभी धुंए की गन्ध, पता नहीं यह कोई अनुभव है या रोग.. कुछ भी तो नहीं ज्ञात ! कल गुरूजी को सुना, उन्होंने बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बतायीं. एक लेखक को क्या और कैसे लिखना चाहिए, यह भी बताया. आज शाम को मीटिंग है, क्लब की एक सदस्या की बेटी का स्वागत समारोह, वह आईएएस में उत्तीर्ण हुई है. कुछ देर पूर्व छोटी बहन से बात हुई, वह खुश थी, परसों से उसे अपने भीतर शांति का अनुभव हो रहा है, ईश्वर उसे सदा इसी तरह प्रसन्न रखे ! उसके भीतर भी शांति का साम्राज्य है, जो अब खण्डित नहीं होता, होता भी है तो कुछ क्षणों के लिये. मन अपने पुराने स्वभाव में लौटना चाहता है, पर मन वास्तविक नहीं है, एक मिराज है ! एक इंद्रधनुष जैसा... मन का कहना नहीं मानना चाहिए अर्थात मन का भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मन को कोई तवज्जो नहीं देनी चाहिए जब यह कुछ नासाज हो ! 

Thursday, November 28, 2019

सिंधी कोकी




रात्रि  के आठ बजने वाले हैं, आज सुबह उठने में देर हुई. उठते ही पहले की तरह मन उत्साह व शक्ति से भरा नहीं था. नींद जैसे पूरी न हुई हो, या फिर नींद पूरी नहीं है यह भाव अथवा विचार.. उसने स्वयं ही नींद को मृत्यु की निशानी मानकर सम्मान देना बन्द कर दिया था. सोने से पूर्व ध्यान करके मन को इतना होश से भर लेती थी की नींद के लिए जरूरी तमस कहीं दूर चला जाता था, निद्रा भी आवश्यक है पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए, ध्यान के समय ध्यान करना है और नींद के समय नींद लेनी है. पिछले दिनों ध्यान के बाद कुछ सुनकर सोने का क्रम बना लिया था तो मन उस पर भी चिंतन करता ही रहता होगा. खैर .. अब भी कुछ देर नहीं हुई है, जब जागो तभी सवेरा ! दिन सामान्य रहा. मौसम आजकल बहुत सुहावना है. पंछियों का कलरव दिनभर गूँजता रहता है. गंधराज की सुगन्ध भी आती होगी पर उसकी सूंघने की क्षमता कुछ घट गयी है. कोई अन्य गन्ध ही उसे घेरे रहती है, कभी लगता है यह कोई रोग है  फिर लगता है नहीं इसका अध्यात्म से ही कोई संबंध है. परमात्मा उसके साथ है, उसे सब ज्ञात है. आजकल उसे अपनी अल्पज्ञता का बहुत भान होता है, लगता है उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है, बिलकुल अज्ञानी जान पड़ती है स्वयं को. वैसे भी जब इतना विराट आयोजन चल रहा है, पंछी बिना पढ़ाये  ही अपने गीत बना लेते हैं, ऋतुएँ बदल जाती हैं तो उसमें उसका होना भी तो शामिल है. अस्तित्त्व को जो बनाना हुआ बनाएगा, करना हुआ कराएगा. शरीर प्रकृति का अंश है और आत्मा परमात्मा का, मन समाज का दिया हुआ है. ‘मैं’ एक  भ्रम ही है. इसी देह को तुष्ट करने के सारे प्रयास होते हैं . पर देह तो जड़ है, सूक्ष्म इन्द्रियां चेतन होती हुई प्रतीत होती हैं जो मन को नचाती हैं, जैसे मन बुद्धि को नचाता है और जैसे बुद्धि स्वयं को नचाती है . स्वयं जो आत्मा के सान्निध्य में समीपता का अनुभव कर सकता था, इतर सुखों के लिए लोभ से भरा नजर आता है, गिरने की भी कोई गरिमा होनी चाहिए न, आसक्ति उसी को तो कहते हैं जो आ तो सकती है पर जा नहीं सकती. सत्य में स्थित होना है तो हर आसक्ति को जाना होगा.



आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ कोर्स का तीसरा दिन था, सोचा था कि जायेगी पर शाम को प्रेजिडेंट का संदेश फोन पर पढ़ा, गवर्निंग बॉडी की मीटिंग बुलायी है. स्कूल में एक बच्चे को चोट लग गयी है. जब वहां गयी तो  पता चला आँख के ऊपर माथे पर दरवाजे से चोट लगी है, हाथ में हल्का फ्रैक्चर भी है, डिब्रूगढ़ ले जाना पड़ा है बच्चे को. प्रिंसिपल भी आयी थीं, दो शिकायतें भी आयी थीं दो बच्चों के माता-पिता की और से, दो अध्यापिकाओं के खिलाफ. शायद उन्होंने बच्चों पर ज्यादा कठोरता दिखाई थी. मीटिंग में और किसी विषय पर कोई बात नहीं हुई. क्लब के स्थापना दिवस पर सफाई का सेवा कार्य करने के लिए जो सुझाव व तस्वीर उसने भेजी थी, उस पर भी कोई टिप्पणी नहीं की किसी ने. जून आज गेस्टहाउस गए हैं, आजकल वह सेफ्टी विभाग भी देख रहे हैं कोई ऑडिटिंग टीम आयी है, जिसको पार्टी दी गयी है. जाने से पूर्व उन्होंने पिताजी से बात की, उन्हें जून का भेजा वेट वाइप्स का पैकेट मिल गया है.



ग्यारह बजने वाले हैं. अभी-अभी बिजली चली गयी. मौसम आज गर्म है. बाहर से एक कोयल के कूकने की आवाज आ रही है. नैनी ने बगीचे से ढेर सारी गाजरें लाकर दीं। आजकल फूलों से भी बगीचा भर हुआ है. पिटूनिया, गंधराज, श्वेत लिली, जरबेरा अपने पूरे शबाब पर हैं. माली भी इस हफ्ते रोज ही आ रहा है. उस समय जून आ गए, फिर दोपहर का भोजन, कुछ देर विश्राम, ब्लॉग लेखन, सांध्य योग कक्षा, रात्रि भोजन तथा बाद का भ्रमण, सब कुछ करने के बाद अब पुनः डायरी उठायी है, भोजन करते समय जून ने ‘कोकी’ बनाने  का वीडियो  दिखाया. किन्हीं पूनम जी ने इस सिंधी नाश्ते की अच्छी सी विधि सिखाई है. उनका कहना है पहली तारीख को मई दिवस पर दफ्तर बन्द है उसी दिन यह नाश्ता बनाएंगे. उसके बाद उन्हें शिवसागर जाना है. आज दो वर्ष पूर्व की डायरी में चेट्टीनाड की साड़ियों का जिक्र पढ़ा, जून अगले महीने फिर वहीं जाने वाले हैं. कल पुस्तकालय से दो नई किताबें लायी, एक ‘न्यू एज पेरेंटिंग’ पर है और दूसरी ‘जे पी वासवानी’ की लिखी है, जो परमात्मा के प्रति प्रेम से भरी हुई है. भक्ति और श्रद्धा जीवन में न हों तो जीवन कितने सूना-सूना रहता है. परमात्मा जो सदा ही मानव के साथ है, वह उससे दूर ही रह जाता है. वे पूरी तरह उसके प्रति समर्पित नहीं होते तो वह भी उन्हें पूरा नहीं मिलता. आज दोपहर को कितनी गहरी नींद आयी, पिछले दिनों रात की नींद गहरी नहीं थी, नींद में वे अहंकार से मुक्त हो जाते हैं और उस परम् के साथ एक हो जाते हैं. आज योग कक्षा में गुरूजी का ज्ञान सुनकर एक साधिका ने कहा, यह ज्ञान पहले मिला होता तो इतना दुःख नहीं सहना पड़ा होता. 

Thursday, September 19, 2019

फूलों की तस्वीर






आज कामवाली नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आयी है, उन्हें भी बाद में एक सहायिका को नियुक्त करना होगा, इतने बड़े घर की देखभाल व सफाई के लिए कोई तो चाहिए होगा. जून नेट फ्लिक्स पर 'तीन' देख रहे हैं, अमिताभ बच्चन की फिल्म है यह. उसे फ़िल्में देखने का जरा भी मन नहीं होता अब, जगत ही नाटक लगने लगे तो किसी और नाटक की जरूरत ही नहीं रहती. यहाँ आने के बाद एक बार भी तैरने नहीं गयी, मौसम सदा ही ठंडा रहता है, भीगा-भीगा सा. लेखन कार्य भी बंद है. अपना घर अपना ही होता है, यह बात उनके मन को कितना संकुचित कर देती है, अपना तो यह सारा जहान है !

दोपहर के बारह बजकर दस मिनट हुए हैं. मौसम हल्का गर्म है, धूप तेज है. शाम को मॉल जाना है. वाशिंग मशीन की एएमसी करके अभी-अभी कर्मचारी गया है. कल रात देर से सोये, नन्हा नये घर के लिए खरीदने वाली वस्तुओं की सूची बना रहा था. सोनू देर से लौटी, उसके बाद साढ़े ग्यारह बजे वे सोने गये. सुबह मन्दिर के बाहर बैठने वाली मालिन से फूल लेने गये, छोटी-छोटी दो मालाएं और गुलाब के ढेर सारे फूल ! वह मर्फी की किताब के साथ कार्नेगी की एक पुस्तक भी पढ़ रही है. जीवन को जब तक कोई दिशा नहीं मिलती, वे नया सीखने में उत्सुक नहीं रहते. आत्मा का स्वभाव है जानना, वह हर पल नयी है और नया सीखना चाहती है. अभी क्रोम बुक नही खोली है, आज की पोस्ट लिखनी है.

आज पूरा एक सप्ताह हो गया उन्हें यहाँ आए हुए. नन्हे व सोनू का घर बहुत सुंदर है, सारी सुख-सुविधाओं से पूर्ण, उनका आपसी व्यवहार भी बहुत अच्छा है, भरोसे और सहयोग से भरा ! शाम को नेत्रालय जाना है, परसों डेंटिस्ट के पास. इंटीरियर डेकोरेटर के पास सप्ताहांत में. आज बड़ी भाभी की तीसरी बरसी है. समय जैसे पंख लगाकर उड़ता है. आज सुबह पांच बजे नींद खुली. सुंदर स्वप्न चल रहा था, मुस्कान थी चेहरे पर जब आँख खुली. फूलों की तस्वीरें उतारीं. कल शाम को एक जगह सुंदर फूल देखे थे, पर आज सुबह नहीं थे, माली ने कटिंग कर दी, पता नहीं कहाँ फेंके होंगे श्वेत व रक्तिम वे पुष्प ! जून ने कल रात ढेर सारा पुलाव बना दिया, नन्हा सुबह टिफिन में वही ले गया है. जाने से पूर्व घर भी ठीक-ठाक कर के जाता है, उसे जरा भी काम नहीं करने देता. उसे अँधेरे से डर लगता है, बचपन में ही यह डर उसके मन में बैठा होगा. उसके खुद के मन में भी कितने भय के संस्कार थे, जिनका सामना करने से वे समाप्त प्रायः हो गये हैं. जून आज सुबह भविष्य के लिए चिंतित थे जब वे वृद्ध हो जायेंगे. यह घड़ी पर्याप्त है जीने के लिए, न कोई भूत सताये न भविष्य  सताये..वर्तमान का यह पल ही पर्याप्त है ! नेट पर एक लेख पढ़ा मछली खाने को लेकर, लेखिका को एक रोग है जो व्यक्ति को कमजोर कर देता है. गेहूँ, चावल, दूध के बने पदार्थ उन्हें नहीं पचते. उसे इतने बड़े विश्व में इस पल अथवा तो ज्यादातर समय किसी से कुछ लेना-देना नहीं होता, वह अपने आप में ही प्रसन्न है ! कोई जवाबदेही न हो किसी के भी प्रति, यही तो सच्ची आजादी है ! यह आजादी जिसने एक बार अनुभव कर ली वह भला क्यों बंधना चाहेगा ! सेवा का बंधन भी नहीं, कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं..सदा-सर्वदा मुक्त और अपनी आजादी में जो हो उसे होने देना..जो अस्तित्त्व कराए हो जाने देना !

दस बजे हैं सुबह के, आज असमिया सखी आने वाली है, कई बार पहले भी उसने कहा, अंततः वे लोग यहाँ आ रहे हैं. हो सकता है एक और मित्र परिवार भी आये. आज बहुत दिनों बाद दीदी का ब्लॉग पढ़ा. शाम को बड़े भाई से बात की, कल दोपहर वह परेशान हो गये थे, अकेलेपन का दंश और भाभी की उपस्थिति का अभाव उन्हें चुभ रहा था, पर स्वयं को स्वयं ही समझाकर वह उस स्थिति से बाहर आ पाए. मन का काँटा मन से निकलता है फिर उस कांटे को भी फेंक देना है. मौसम आज अच्छा है, बाहर का भी और मन का भी !