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Tuesday, January 13, 2015

भागवद पुराण की कथाएं



आजकल धूप आँख-मिचौली खेलती रहती है, मौसम ठंडा-ठंडा सा ही रहता है. उन्होंने मोज़े, स्वेटर पहनना शुरू कर दिया है. आज दोपहर को जब जून ऑफिस चले गये वह प्रमाद वश नहीं उठी तो अजीब सा स्वप्न आया. सड़क पर चलते हुए कुछ खिलौने उससे मिलने आ रहे हैं. स्वप्न चेताने आते हैं और स्वप्न भी तो वही भेजता है. आज सुबह कृष्ण कथा सुनी, उसकी कथाएं अनुपम हैं, अगली बार घर जाने पर वह अवश्य ही ‘भागवद् पुराण’ खरीदेगी. कल रात दीदी का फोन आया. सुबह उसने छोटे भाई को किया था. उसने गर्मी की छुट्टियों में वहाँ आने के लिए कहा है. जून भी घर जाने को कह रहे हैं. हिमाचल जाने का भी उनका मन है. परीक्षाओं के बाद यात्रा का योग काफी प्रबल है. ईश्वर उनके साथ है, वही सही मार्ग सुझाएगा. आज पिता का पत्र भी आया है. कल ‘श्री शंकर देव’ के लिए लिखा लेख हिंदी पत्रिका के लिए भिजवाया. नन्हे की पूर्व परीक्षाएं  चल रही हैं. मात्र दो महीने उसके फाइनल्स में रह गये हैं. आजकल वह स्वयं ही पढ़ता है.

ध्यान में यदि उतरना हो तो एक भी व्यर्थ का ख्याल नहीं आना चाहिए नहीं तो वही एक ख्याल रस्सी बन जाता है जो ऊपर ले आती है. मन पूरा का पूरा खाली हो जाये तो ध्यान गहरा होता जाता है. आज जून ने छुट्टी ली है, साल का आखिरी महिना है छुट्टियाँ व्यर्थ हो जाएँगी, इसलिए आज वह घर पर हैं. उन्हें दोपहर को कोपरेटिव स्टोर जाना है और शाम को नन्हे के साथ कनज्यूमर फोरम भी जाना है. यानि आज का दिन खरीदारी को समर्पित होगा. नये वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स भी उन्हें खरीदने हैं. मौसम आज खिला हुआ है. कल रात स्वप्न में एक घायल महिला को जो खून से लथपथ थी वह अस्पताल ले जाती है. शायद रात को देखी ‘Matilda’ फिल्म के कारण यह स्वप्न आया था. यह किताब उसने काफी पहले पढ़ी थी.

क्रोध कब आकर उन्हें परास्त कर देता है पता ही नहीं चलता. लेकिन यह आध्यात्मिक प्रगति के लिए बहुत बड़ी बाधा है. कल शाम जून ने उसकी बात नहीं सुनी तो चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही उसे क्रोध आया तो था. मन, वाणी और क्रोध के वेगों को रोकना ही होगा, अन्यथा वे जहाँ है वहीं रह जायेंगे बल्कि पीछे जाने का डर अधिक है. इन सारे वेगों को नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है कृष्ण का नाम. उसकी स्मृति बनी रहे तो कोई ताप नहीं सताता भौतिक जगत में कोई न कोई दुःख तो रहेगा ही, जब तक ईश्वर की स्मृति बनी रहेगी तभी तक वे इन दुखों से अलिप्त रह सकते हैं ! उसे दिल से चाहो तो वह विश्रांति के रूप में तत्क्षण अपना अनुभव करा देता है. आत्मा जो उसी का अंश है उसी की भाषा बोलती है परदेश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाये तो कैसी ख़ुशी होती है. मन जब शांत होकर आत्मा का आश्रय लेता है तो वह भी उसी की भाषा बोलता है.


Wednesday, December 25, 2013

हरी घास पर पक्षी


गर्मी की लम्बी छुट्टियों के बाद आज नन्हे का स्कूल खुला है. सुबह उसे जल्दी उठा दिया था, हमेशा की तरह थोड़ा सा परेशान था, स्कूल का पहला दिन...क्या होगा ? तरह-तरह के डर उसे सता रहे थे, बेबुनियाद हैं वे डर यह भी उसे पता था, कल से स्वाभाविक हो जायेगा. पड़ोस के बच्चे के साथ भी यही समस्या थी, पहली बस छोड़ दी उसने...ये बच्चे भी उन बड़ों की तरह तनाव का शिकार होते हैं. एक सखी से बात हुई, वह बच्चा भी चिड़चिड़ा हो गया है, पिता की कमी उसे जरुर खलती होगी. कल सुबह उसकी माँ सब कुछ समेट कर दिल्ली जा रही है, वहाँ उसे काम मिल गया है, नया जीवन शुरू करेगी. आज सुबह साढ़े चार बजे अलार्म सुनकर उठ गयी, पांच बजे वह छात्रा पढ़ने आई, हफ्ते में तीन दिन उसी वक्त आया करेगी. छह बजे उसके जाने के बाद जोर से भूख का अहसास हुआ, पर ज्यादा खा नहीं पाई, फिर जून को दफ्तर व नन्हे को स्कूल भेजना और उसके बाद ही फोन पर बात करते करते ही इतना वक्त हो गया है. मौसम बेहद गर्म है, धूप में तेजी है और हवा बंद है. इसी तरह गर्मी के ये उमस भरे दिन बीत जायेंगे और मौसम सुधरेगा..फूलों का मौसम यानि शरद ऋतु आयेगी.

कल दोपहर नन्हा जल्दी आ गया था, आज कल की तरह परेशान नहीं था, पर बहुत खुश भी नहीं था, एक मित्र के आने पर ही उसके चेहरे पर मुस्कान दिखी. कल शाम जून ने भी उसके साथ बगीचे में काम किया. अब पिछला हिस्सा काफी साफ हो गया है. वह जो किताब पढ़ रही है, उसकी तरह उनके बगीचे में भी कई पक्षी आये थे जो शायद कीट खा रहे थे या घास के कोमल पत्ते. विक्रम सेठ की इस पुस्तक में बगीचे का वर्णन इतना रोचक है कि.. काश ! उनके जैसा माली उनके पास भी होता, उनका माली भी अपने आप में एक अनोखा चरित्र है, पूर्वी ऊत्तर प्रदेश की भाषा बोलता, है बूढ़ा, जबकि अपने काम में दक्ष है पर ज्यादा वक्त नहीं है उसके पास, और स्वीपर तो..बुद्धू सा है, इतना बड़ा हो गया है पर बच्चों की तरह बहती नाक लिए घूमता है.

कल क्लब में किसी संगीता ने अपनी मधुर आवाज से सभी को मुग्ध कर दिया, उसके गले से आवाज बिना किसी प्रयास के सहज रूप से निकल रही थी, वह एक ऊंची कलाकार है, वह उससे कहना चाहती थी पर कह नहीं सकी. वह उसी बातूनी सखी के साथ गयी थी, जिसके भीतर कुछ करने का जज्बा है, वह भी गाती है, उसने भी शायद प्रतिद्वंद्वी समझ कर कुछ कहना ठीक न समझा. कल पिता का पत्र आया है, लिखा है वे लोग दिसम्बर में आने का कार्यक्रम बना रहे हैं, पर उसे नहीं लगता यह सम्भव हो पायेगा, पहले भी कई बार उन्होंने कहा है, वह जानती है पिछली बातों को याद करना बुद्धिमानी नहीं है और जिन्दगी का दरिया अगर बहता न रहा तो दूषित हो जायेगा. जो जब जैसा हो उसे स्वीकारना होगा. कल दोपहर उसकी तेलगु पड़ोसिन आई थी, कोलकाता एयर पोर्ट पर मिले किन्हीं तेलगु बैंक मैनेजर से हुई मित्रता की बातें बता रही थी, उन्होंने इसकी थोड़ी तारीफ़ कर दी और यह उन्हें घर आने का निमन्त्रण दे बैठी.

एक आग गमे इश्क की...
वह इश्क जो हमसे रूठ गया अब उसका हाल सुनाएँ क्या
कोई महर नहीं कोई लहर नहीं अब सच्चा शेर सुनाएँ क्या

पीटीवी पर आज बहुत दिनों बाद गजल सुनी. उसके दायें गाल में छाले हो गये हैं, कारण शायद विटामिन बी की कमी या पेट की खराबी ! एक दो दिन में अपने आप ही ठीक हो जायेंगे, जून आज ग्लिसरीन भी लायेंगे जिसे लगाने से आराम मिलता है. नन्हे को कल बाएं हाथ पर चोट लग गयी, sprain हो गया, एक लड़के का घुटना उस पर आ गया, पता नहीं कौन सा खेल खेल रहे होंगे. उसकी सोशल और विज्ञान की टीचर ने अभी तक क्लास में जाना शुरू नहीं किया है. उसका संस्कृत टेस्ट है आज, मगर वह कापी रखना जरूर भूल गया होगा...अगर नहीं भूला हो तो वाकई कुछ बात है ! जून अपना पर्स आज घर पर ही भूल गये हैं. कल शाम वे क्लब में डॉ गांगुली की टॉक सुनने गये थे, अच्छा लगा, जाने की तयारी, वहाँ बैठना और कुछ हद तक सुनना भी. सुबह एक सखी का फोन आया आखिर में कहा आज की present लग गयी न, उसे पसंद नहीं आता उसका यह कहना पर दूसरों को अपनी पसंद, नापसंद बताने का ढंग उसने सीखा ही कहाँ है.