Thursday, May 25, 2017

अंत और आरम्भ


सुबह-सवेरे खबर मिली, बड़ी भांजी के यहाँ बिटिया का जन्म हुआ है. नार्मल नहीं हुआ यही एक बात अच्छी नहीं है. दीदी अभी वहाँ नहीं गयी हैं, दो दिन उनके बाद बेटे-बहू आ रहे हैं, पर उसे लगता है उन्हें जाना चाहिए, खैर..आज एक परिचिता का फोन भी आया, वह अपनी बेटी को आस्ट्रेलिया छोड़कर आई हैं. वहाँ सभी काम खुद करने होते हैं, अभी विवाह को एक ही वर्ष हुआ है. दो महीने के बच्चे को छोड़कर वह आ गयी हैं, इस भरोसे कि बिटिया की सास पहुंच जाएँगी, पर स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानी के चलते वह अभी जा नहीं पाएंगी.

कल मामीजी की आर्मी डाक्टर नतिनी अपने पांच वर्ष के पुत्र के साथ आ रही है, पिछले दो वर्ष से यहीं असम के किसी स्थान में पोस्टेड थी, जब जाने का समय निकट आया तो उसने सोचा एक बार मिलकर ही जाये. बड़ी ननद का फोन आया, अगले हफ्ते वे आ रही हैं. जो भी होगा अच्छा ही होगा, जागे हुए के लिए सब शुभ है, हर घड़ी, हर पल शुभ के सिवाय कुछ है ही नहीं. पिताजी की तबियत पूर्ववत् बनी हुई हैं, आज वे नींद में कुछ बोल रहे थे. पहले कहा, ‘नहीं लगा’, फिर कहा, ‘अच्छा हुआ’. आज भी बगीचे में कुछ काम करवाया, इतने बड़े बगीचे में कुछ न कुछ काम निकलता ही रहता है.

मेहमान सुबह-सवेरे पहुंच गयी, वे अभी उठे ही थे. उसका पुत्र बहत ऊर्जावान है, जैसे कि आजकल पांच वर्ष के बच्चे होते हैं. स्वयं भी बहुत बातें करती है. पति से तलाक का केस चल रहा है, कितने आराम से सारी बातें बता रही थी, जैसे किसी और के बारे में हों. जीवन में कितना कुछ घट जाता है जिस पर किसी का बस नहीं होता. वे अस्पताल भी गये पर पिताजी ने आँखें नहीं खोलीं. कल रात एक बहुत अजीब सा स्वप्न देखा, एक नवजात शिशु कन्या को देखा जो उसकी हमशक्ल थी, वह उसकी बेटी थी, वह ही थी या उसकी आत्मा थी. उसका सुंदर चेहरा और काले केश चेहरे के भाव, आँखों का रंग सब कुछ कितना स्पष्ट था स्वप्न में. उसे उसने जन्माया था पर कितने अलग ढंग से, वह श्वेत आवरण से ढकी थी जैसे कोई प्लास्टर लगा हो. ढकी थी कई वस्त्रों से, फिर उसे अनावृत किया. अद्भुत स्वप्न था वह. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, उसकी कृपा ही भीतर उजाला बनकर छा रही है.    

तीन दिनों का अन्तराल.. जिस दिन वे आए थे, उसके अगले दिन मेहमानों को लेकर रोज गार्डन गयी, शाम को पार्क व काली बाड़ी भी. उसी रात को पिताजी की साँस उखड़ने लगी, जो सुबह से ही तेज चल रही थी. एक जीवन का अंत करीब आ गया था, एक नये जीवन की शुरूआत होने वाली थी. रात को बारह बजे जून अस्पताल से लौटे. अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. दोपहर दो बजे लौटे. शाम तक लोग आते रहे, कल सुबह भी कुछ लोग आये, कल शाम को भी. आज छत पर काम करने वाले मजदूर आ गये हैं. नैनी किचन में काम कर रही है, सफाई कर्मचारी अपना कम कर रहा है, जीवन पहले सा चल रहा है पर एक चेतना अपना रूप बदल चुकी है, एक लहर सागर में समा गयी है एक नई लहर बनकर थिरकने के लिए. जून ने सभी कार्ड्स लिखे, वे लेकर ड्राइवर देने गया है. परसों क्रिया है. मंझला भाई आ रहा है, दोनों ननदें भी कल आ रही हैं. उसके मस्तिष्क में कई उदार कल्पनाएँ आ रही हैं, एक बच्चों का स्कूल खोलने की, एक बड़ों की क्लास लेने की, एक सत्संग करने की, एक मृणाल ज्योति के लिए एक स्कालर शिप देने की, जिसमें कुशाग्र विद्यार्थी को चुना जायेगा. पिताजी के नाम से होगी यह स्कालर शिप. लेडीज क्लब में एक नया प्रोजेक्ट भी खोलना है, योग और ध्यान का, जिसका नाम होगा आह्लाद ! जिसमें वे सप्ताह में एक दिन योग कक्षा चलाएंगे.


Wednesday, May 24, 2017

बड़ा सा घर


नये घर में उनका तीसरा दिन है. परसों दोपहर बाद वे सभी सामान लेकर यहाँ आ गये थे. पिछले दस दिनों से यानि बुद्ध पूर्णिमा के दिन से उन्होंने शिफ्टिंग का काम शुरू किया. उसी दिन से डायरी के पन्ने कोरे हैं. पहले दिन पूजा का कमरा यानि योग का कमरा ठीक किया. दूसरे दिन किताबें लाये, तीसरे दिन पिताजी के कमरे का सामान. एक दिन छुट्टी की, फिर पांचवें, छठे, सातवें दिन अन्य सामान और अंत में आठवें दिन शेष सारा सामान. अभी तक घर में कुछ न कुछ काम निकल ही आ रहा है, कोई बाथरूम लीक हो रहा था, कोई ट्यूब लाइट काम नहीं कर रही थी. धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. आश्चर्य है कि उन्हें एक बार भी वह घर याद नहीं आया, ऐसा लग रहा है जैसे वे इसी घर की प्रतीक्षा कर रहे थे. यह उनके स्वप्नों का घर था, बाहर का लॉन इतना बड़ा है कि आराम से एक विवाह की पार्टी हो सकती है. उनके गमले जो वहाँ सिमटे सकुचाये से थे, यहाँ खिल के अपना वैभव दिखा पा रहे हैं, उनके साज-सज्जा के सामान यहाँ कितनी मुखरता से अपना सौन्दर्य प्रदर्शित कर रहे हैं. इतना बड़ा और इतना सुंदर घर उसे ईश्वर की कृपा का अनुभव करा रहा है. इस घर में यह बाहर का बरामदा बैठने के लिए अच्छी जगह है, ऊपर पंखा भी है, सामने ‘नाइन ओ क्लॉक’ के फूल खिले हैं. कुछ ही दिनों में सामने की लंबी क्यारी में लगे जीनिया के फूल खिल जायेंगे. पिताजी अभी तक अस्पताल में ही हैं, उनका स्वास्थ्य सुधर नहीं रहा है, अब दोनों ननदों के आने की प्रतीक्षा है. लगभग दो हफ्तों बाद वे दोनों आ रही हैं, सम्भवतः उन्हें देखकर उनकी तबियत में कुछ सुधार आये.
कल शाम एक मित्र परिवार आया पहली बार इस घर में. नयी नैनी ने पहले दो गिलास शरबत बनाया फिर दो कप लाल चाय. रोज सुबह भी वह नींबू वाली ग्रीन चाय का एक कप लाती है उसके लिए. आज मौसम अच्छा है भीगा-भीगा सा, महादेव का अंतिम भाग आने वाला है. आज बहुत दिनों बाद वह विद्यार्थी आया अपनी नई साईकिल पर, आखिर वह समर्थ हुआ अपने आप कहीं जाने में. सुबह कितनी ठंडी थी, रात भर वर्षा होती रही. सुबह हरी घास पर टहलते हुए कई सारे स्नेल जीव बाहर किये, नन्हे पौधों को खा लेते हैं ये, आज बगीचे में मिट्टी डाली जा रही है. हेज के किनारे जमीन काफी नीची हो गयी थी. सद्गुरू कहते है, जीवन के अंत में यही पूछा जायेगा कितना ज्ञान प्राप्त किया और कितना प्रेम बांटा...उसके भीतर प्रेम का जो सहज स्रोत था वह आजकल शांत पड़ा है. प्रेम का स्वरूप बदल गया है, वह मौन में ही प्रवाहित होता है. दो महीने हो गये हैं उसे मृणाल ज्योति गये हुए, पिछले दिनों सेवा की भावना जैसे भीतर सिकुड़ गयी थी. पिताजी को इस हालत में देखकर भी कुछ न कर सकने का भाव अजीब सा है. विचित्र है मानव मन, अहंकार भी कितने-कितने रूपों में सम्मुख आता है. उसे कार की आवाज आयी, लगता है जून आ गये.
कल रात तेज वर्षा हुई, बगीचे में हेज के किनारे पानी भर गया है. इस समय धूप निकली है. जून अस्पताल गये हैं पिताजी के लिए दही और दाल के पानी का भोजन लेकर. आजकल उनका यही आहार है. मानव अपने अंतिम काल में कितना बेबस व निरीह हो जाता है, वे पूरी तरह से सोच और समझ तो रहे हैं पर बोल नहीं पाते. डाक्टरों की सहायता से उनके अंतिम समय को कुछ आरामदेह बनाया जा  सकता है, पर कष्ट से उन्हें मुक्ति नहीं दिला सकते. कल शाम जून ने नन्हे से होने वाली दुल्हन के लिए चेन खरीदने के लिए कहा, उसे थोड़ा नहीं काफी अजीब लगा. उसे अपने मन पर कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है, कब कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा, उसे खुद भी पता नहीं चलता. यह मन नामकी वस्तु दुनिया में सबसे अजूबी है. आज सुबह की साधना में काफी देर मन टिक गया, कितना कुछ दिख रहा था, मन ही रूप धरकर आ रहा था, पर वह साक्षी बनकर देख रही थी. पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है, भविष्य नामकी कोई वस्तु होती भी है या सिर्फ कल्पना ही है, हर क्षण जो उनसे मिलता है, वह तो वर्तमान ही बनकर मिलता है. कल जो बीत गया वह भी और कल जो आएगा वह भी.   


Monday, May 22, 2017

कविता और नृत्य


नन्हा आज चला गया, अभी तो रास्ते में ही होगा, रात तक घर पहुंचेगा. पिताजी को उसके आने से काफी अच्छा लगा, उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. उन्हें भी उसके रहने से अस्पताल की ड्यूटी में कुछ राहत मिली. सहायक की अनुपस्थिति में भी जून को रात को वहाँ नहीं सोना पड़ा. इस बार वह काफी शांत लगा. आज से सहायक सोयेगा जब तक उसका कोई अन्य काम नहीं निकल आता.
आज मौसम अच्छा है, मन भी सुवासित है, ऊर्जा का प्रस्फुरण हो रहा है. ऊर्जा का ही खेल है यह जगत. हर पल उनके भीतर से ऊर्जा का संचरण हो रहा है, सकारात्मक भी और नकारात्मक भी...जैसी ऊर्जा वे भीतर निर्मित करते हैं, वैसी ही बाहर भेजते हैं और वही उन्हें पुनः मिलती है. एक चक्र का निर्माण होता है. वे सद्भावनाएँ भेजते हैं तो वही उन्हें मिलती हैं. भीतर कठोर हो जाते हैं तो वही कठोरता कई गुनी होकर उन्हें मिलती है..ऊर्जा का अनंत भंडार उनके चारों और फैला हुआ है, वे चाहे जितनी ऊर्जा उसमें से ले लें. वह कभी समाप्त होने वाली नहीं है..प्रेम अनंत है..आनन्द अनंत है..शांति अनंत है..सुख अनंत है...और ज्ञान अनंत है...लुटा रहा है वह खुले दिल से..जितना भर ले कोई अपनी झोली में..जीवन एक अनमोल उपहार है जो परमात्मा ने स्वयं को व्यक्त करने के लिए उन्हें दिया है. वह प्रकट हो रहा है नृत्य की किसी मुद्रा में..चित्र में..कविता में और प्रकृति के हजार-हजार रूपों में..वह..
आज फिर ‘वर्षा’ रानी अपना जौहर दिखाने आयी है. कल दिन भर पिताजी लगभग सोये ही रहे, आज सुबह-सुबह जगे थे, नाश्ता भी किया, उनका नया घर तैयार हो रहा है. अगले महीने उन्हें वहाँ जाना है, जून का कनाडा का कार्यक्रम स्थगित होने जा रहा है, सम्भवतः उन्हीं दिनों वे शिफ्ट करेंगे. कल रात कोई स्वप्न देखा हो, याद नहीं आता पर वे तो दिन भर ही न जाने कितने स्वप्न देखते हैं, याद नहीं आता पर वे तो दिन भर में ही न जाने कितने स्वप्न देखते रहते हैं. ‘समाधि’ के अतिरिक्त शेष स्वप्न ही तो है. एक ही सत्ता है जो प्रतिबिम्बित हो रही है भिन्न-भिन्न रूपों में. ‘महादेव’ में पार्वती को समाधि का अनुभव होने वाला है. सद्गुरू की कृपा से उसे भी इसी जन्म में समाधि का अनुभव अवश्य होगा. नैनी की बिटिया यहीं पास में खेल रही है, पूछ रही है कि आप क्या कर रही है !
पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, आज अभी अस्पताल जाना है, पिताजी पहले से काफी ठीक हैं, उठकर बैठे भी, कहा, पोते की शादी देखनी है, इन्सान की जिजीविषा कितनी प्रबल है, वह हर कठिनाई को पार कर जीना चाहती है, कल नन्हे को कहा तो है कि वह तैयार हो तो जल्दी ही मंगनी की रस्म हो सके. कौन जानता है, भविष्य में क्या लिखा है ? परमात्मा हर वक्त उनके साथ है, बल्कि वही तो है..
पौने तीन बजे हैं, मौसम अच्छा है, ठंडी हवा बह रही है, अभी कुछ देर पहले उसका एक विद्यार्थी पढ़कर गया है. कह रहा था, बहुत दिनों से पापा से मार नहीं खायी, मार खाकर ऊर्जा आती है, अजीब बच्चा है, उसकी लिखाई खराब है, थोडा आलसी है, उसकी माँ ने ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ऐसा बना दिया है, और इधर उसका मन भी ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ही दिक् कर रहा है. पुराने संस्कार ढीठ बच्चे की तरह होते हैं, कहना ही नहीं मानते, उसे व्यस्त रहकर उनकी उपेक्षा रखनी है और कुछ नहीं हटाने से वे और भी जिद्दी हो सकते हैं. साक्षी भाव से उन्हें देखना भर है, अच्छा ! ऐसा भी होता है, कहकर आश्चर्य व्यक्त करना है..आज पुस्तकालय भी जाना है, बंगाली सखी को अपनी बेटी की किताबें पुस्तकालय में देनी हैं. आज फिर बिजली नहीं है. कल से वे अपने नये घर में कुछ सामान शिफ्ट कर रहे हैं.   


Friday, May 19, 2017

वर्षा और धूप


कल भांजी की शादी भी हो गयी. आज से उसका नया जीवन आरम्भ हो रहा है. कल रात एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह ‘सत्यनारायण’ की कथा करने वाली है, पिताजी, माँ भी हैं, उन्हीं का घर है, कोई नया स्थान है, नया घर है. अभी ड्राइंग रूम में मेज पर प्रसाद का सामान ढककर रखा है, नीचे फर्श पर झाड़ू लगाकर वे चादर आदि बिछाते हैं, तभी लोग आने शुरू हो जाते हैं, वे सोफे पर ही बैठ जाते हैं और पहले ही प्रसाद खाना शुरू कर देते हैं. फिर स्वप्न आगे बढ़ता है तो लोग बैठ गये हैं, वह पढ़ना शुरू करती है. कथा की पुस्तक की जगह एक कॉपी है जिसमें कुछ श्लोक है, उनका अर्थ भी लिखा है, शरुआत एक कहानी से करना चाहती है पर लोग कहते हैं, नहीं , यह तो कथा नहीं है. वह आगे पढ़ती है, जो लिखा है वह अस्पष्ट सा है, कुछ बोलती है पर लोग संतुष्ट नहीं होते, तभी हाथ में एक सांप आ जाता है, लम्बा, चमकदार सांप, जिसका तन वह सहलाती है और उसके सिर पर हाथ फेरती है. वह डंक निकालता है, कोई पूछता है, यह काटता नहीं तो वह कहती है इसमें जहर नहीं है. तभी लोग उठने लगते हैं, हॉल लगभग खाली हो गया है, पर उसके भीतर न कोई लज्जा है, न ग्लानि, न पीड़ा, सहज आनन्द है भीतर, तभी अलार्म बजता है और नींद खुल जाती है. शिवशंकर ने गले में सर्प धारण किया है, वही सर्प उसके हाथों में कैसा पालतू बना हुआ था. यह स्वप्न इशारा करता है उसी विकार की ओर जिससे वह मुक्त होना चाहती है. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है. कल छोटे भाई ने जिस आनंद की बात कही उसी में आज मन डूबता-उतराता है, किसी अदृश्य की झलक पायी है शायद..वह कितना महान है, उस जैसे जीव पर भी उसकी कृपा बरसती है. जिसे कुछ भी नहीं पता. आज सुबह से वर्षा हो रही है. उसकी कृपा ही इन बून्दों  के रूप में बरस रही है. जीवन एक अनमोल उपहार प्रतीत होता है परमात्मा का, जिसका होना ही उसके होने का प्रमाण है ! वही तो है !

आज गुरूजी का जन्मदिन है, सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी जिस कारण टीवी पर कोई प्रसारण नहीं आ पा रहा था. सीडी लगाकर अमृत वचन सुने. आज नैनी की बिटिया का भी जन्मदिन है और छोटी भांजी का भी. दोनों को शुभकामनायें दीं. वर्षा अब थम गयी है, हल्की धूप भी नजर आ रही है. अभी कुछ देर बाद अस्पताल जाना है, कल नर्सिंग डे था, टाफीस् रखी हैं पर्स में, सम्भव हुआ तो सिस्टर्स को देगी. घर से पिताजी का फोन आया, नन्हे से बात करना चाहते थे, बिजली का बिल जमा करने जा रहे थे. अपने को स्वस्थ रखने में वह सफल हुए हैं. छोटी ननद का फोन आया, बड़ी का स्वास्थ्य परसों बिगड़ गया था, वह बेटी के विवाह में बहुत थक गयी है. जहाँ वे ठहरे हैं, विवाहस्थल वहाँ से काफी दूर है. उसकी कल की रात भी स्वप्न लेकर आई, अस्तित्त्व उसे सचेत करने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता और वह हमेशा चूक जाती है. कल रात जून जल्दी सो गये, आजकल वह पिताजी की देखभाल बहुत प्रेम से कर रहे हैं, उनके दिमाग में एक ही बात है. पिताजी का स्वास्थ्य पहले से बेहतर है, ऐसा उन्होंने बताया. जिजीविषा ही है जो मानव को बड़े रोगों से लड़ने में सहायता देती है, हो सकता है उनके भीतर की इच्छा शक्ति इस रोग से उन्हें मुक्त कर दे और वे एक बार नये घर भी जा सकें और यात्रा पर भी. ईश्वर की कृपा अनंत है..कल रात उसे दो बार अनुभव हुआ जैसे मुँह से श्वास छोड़ रही है, जैसे पिताजी अक्सर करते हैं. सभी ऐसा करते होंगे नींद में. वे खुद को सोते हुए कहाँ देख पाते हैं, वे दूसरों के निर्णायक बहुत जल्दी बन जाते हैं. उनके वश में कुछ भी तो नहीं है, परमात्मा की बनाई इस सृष्टि में सब कुछ अपने आप घटित हो रहा है. उन्हें उसकी स्मृति से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. मन को शून्य में समाहित करना होगा, सत्य ही उनका एकमात्र आश्रय हो..उससे कभी च्युत न हों वे..

Thursday, May 18, 2017

स्कैवश की सब्जी


आज नन्हा आ रहा है, वर्षा सुबह से ही हो रही है. पौने दस बजने को हैं. उसे अस्पताल जाना है. पिताजी की पीठ में दर्द बढ़ गया है. चार-पांच चम्मच से ज्यादा दूध एक साथ नहीं पी पाते, बात करने में उन्हें दिक्कत हो रही है. आँखें कुछ कहना चाहती हैं पर उनमें देर तक देखने से एक शून्यता ही नजर आती है. ज्यादा देर आंख भी नहीं खोल पाते. दोनों बहनों को यहाँ आने के लिए जून ने कहा है, पता नहीं भविष्य में क्या छिपा है. सुबह आँख खुली उसके पूर्व ही नींद खुल गयी थी. अपना आप जिसे बड़े गर्व से पाला पोसा था था यानि अहंकार अपने त्याज्य रूप में सम्मुख आया, उसे भीतर की अग्नि में भस्म कर दिया. अब भीतर जो भी बचा है वही रखने योग्य है, वही पाने योग्य है, वही रखने योग्य है, वही है ही, उसके सिवा जो भी है वह अशोभनीय ही है, वास्तव में वह है ही नहीं. अच्छा हो या बुरा उस एक की सत्ता के सिवा जो भी है वह माया ही है. वह हर तरफ है, हरेक में है और स्वयं में भी है, उस एक की ही सत्ता है. जीवन रहते जिसे इस राज का पता चल जाये वही प्रेम का रस अनुभव कर सकता है. प्रेम जिसे सभी तलाश रहे हैं पर अहंकार जिसमें बाधा बन जाता है. अहंकार की आँख से उसका विकृत रूप ही दिखाई देता है, वह उन्हें जाने कितने-कितने उपायों से अपनी ओर बुलाता है. वे ज्ञान का अभिमान भरे उससे दूर ही रहते हैं.  

कल दोपहर समय से नन्हा पहुँच गया, वह भूल से किसी दीमापुर के यात्री का बैग ले आया था. कल एअरपोर्ट जाकर उसे अपना बैग लाना है. बंगाली सखी ने बताया उसकी  बिटिया ने अपना जीवनसाथी चुन लिया है. नन्हा रात को अस्पताल में रहा, सो रहा है इस समय. सुबह जून ने पिताजी को हरिओम कहा तो उसका जवाब दिया, इसका अर्थ हुआ वह सुन पा रहे हैं और समझ भी रहे हैं. लेडीज क्लब का स्वर्ण जयंती समारोह मनाया जा रहा है, आज शाम को केक कटेगा और परसों शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होगा. उसका जाना संभव नहीं हो पायेगा. कल शाम उसे प्रेस जाना था, वापस आई तो नन्हे ने भोजन बना दिया था, आलू+करेले तथा आलू+स्कैवश की सब्जियां, उसने आटा भी सान दिया था. सब्जी काटना भी उसे आता है.


पिताजी आज पहले से बेहतर हैं, आम खाया तथा दाल का पानी पिया. नन्हा आज रात वहीं सो रहा है. वह बहुत समझदार हो गया है और मेहनती भी, खाना भी बहुत अच्छा बनाता है, उसका भविष्य उज्ज्वल है. आज बड़ी ननद की मंझली बेटी का विवाह है, सभी वहाँ पहुँच गये हैं. कल रात एक स्वप्न देखा, ( अभी तक स्वप्नों से मुक्ति नहीं हुई है) जिसने अहसास दिलाया कि भीतर अनंत ऊर्जा है, उन्हें उसका सदुपयोग करना है, वह दुधारी तलवार की तरह है, वही करुणा बन सकती है, वही कठोरता का बाना पहन सकती है. वही प्रेम का पुष्प बन सकती है और वही वासना का कीचड़ बन सकती है. वही शुद्धता, शुभता बन सकती है और वही कुटिलता, छल, पाखंड बन सकती है. परमात्मा कितना दयालु है, वह सभी को तारने के लिए उत्सुक है. उनके संस्कार व प्रमाद उन्हें बार-बार नीचे ले जाता है पर वह असीम धैर्यशाली है, प्रेमस्वरूप है, वह बार-बार मौका देता है. कांटे वे स्वयं चुनते हैं, वह तो पुष्प ही बाँट रहा है. आनन्द लुटा रहा है, वे अपनी झोली में कंकर पत्थर भरे बैठे हैं तो वह क्या करे, फिर भी वह थकता नहीं, लुटाये ही चले जाता है, असीम ऊर्जा का स्रोत है उसके पास !   

Tuesday, May 16, 2017

आम का मौसम


पिताजी पिछले कई हफ्तों से अस्वस्थ तो थे ही, अब उन्हें डिमेंशिया की समस्या भी हो गयी लगती है. समय का पता नहीं चलता उन्हें और अपने रोजमर्रा के काम करने में भी कठिनाई होती है. इस समय सो रहे हैं, दोपहर को उन्हें उठाया, पानी चाय, नाश्ता आदि दिया, दवा दी, फिर सो गये. प्रकृति  का यह नियम है जैसे एक चक्र पूरा हो रहा है. बूढ़ा फिर से बच्चा बन गया है, दीन-दुखिया से बेखबर..अपनी ही दुनिया में खोया हुआ. आज ‘मृणाल ज्योति’ की बीहू मंडली आने वाली है. पाँच बजे का समय दिया था पर अब तो साढ़े पांच हो गये हैं, किसी भी क्षण आते होंगे. जून आज दिल्ली गये हैं, दोपहर उनके जाने के बाद फिल्म देखी, ‘धूल का फूल’, नाम सुना था. पहले कभी देखी नहीं थी. महिलाओं पर अत्याचार न जाने कितने युगों से होते आये है. उन्हें इसके खिलाफ आवाज उठानी ही होगी, उसने भी उठायी थी अपने स्तर पर, आज आजादी का अनुभव भी होता है. कोयल के कूकने की आवाज आ रही है, आमों का मौसम है, कच्ची केरियों से पेड़ भरे हैं. उसने बाहर देखा, अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था, पर भारत में समय की कीमत कहाँ पहचानते हैं वे लोग !
सुबह शीतल थी, भ्रमण को गयी, लौटकर पिताजी को उठाया, सहायक को बुलाकर स्नान आदि कराया. नाश्ता दिया पर वे पचा नहीं सके, दोपहर तक वे अस्वस्थ ही रहे, उन्हें बेल का शरबत दिया जिसके बाद से वे ठीक रहे. जून के फोन आते रहे, दोनों ननदों के फोन भी आये. बच्चों की तरह हो गये हैं वे, फुसला कर खिलाना पड़ता है उन्हें.

पिताजी को पुनः अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल रात को उन्हें शुभरात्रि कहने के बाद से कई बार उनके कमरे में गयी, उनके पास जाकर आवाज दी पर उन्हें कुछ पता नहीं था. सुबह चार बजे के लगभग वह उठ गयी थी, टहलने गयी पर वापसी में एक विचार आया कहीं पिताजी उठ न गये हों, जल्दी-जल्दी लौटी तो वह वैसे ही आराम से सोये थे. धीरे-धीरे उनकी चेतना भीतर सिकुड़ती जा रही है, स्वाद का भी पता नहीं चलता और न ही प्राकृतिक वेगों का. कल से नैनी कितनी चादरें व वस्त्र धो चुकी है. वृद्धावस्था का यह काल शायद सभी को देखना पड़ता है. जून जब दिल्ली से वापस आये तो उनकी हालत देखकर तुरंत ही डाक्टर को फोन किया और उन्हें अस्पताल ले गये.

पिछले दो दिन उसके सिर में दर्द बना रहा, मन भी ठीक नहीं रहा, तन के स्वास्थ्य पर मन का स्वास्थ्य निर्भर करता है. आज सुबह प्राणायाम के बाद ध्यान में चाय का कप दो बार दिखा. पिछले दिनों दिन में दो बार चाय पी, अम्लता बढ़ गयी थी, सो कल से नहीं पी रही है, मन भी अपेक्षाकृत ठीक है. परसों नन्हा यहाँ आ रहा है. जून आज चौथे दिन भी अस्पताल में सोने गये हैं, कल से सहायक आ जायेगा जो कुछ दिनों से बाहर गया हुआ था. पिताजी का स्वास्थ्य सुधर रहा है, पर जब तक खुद चलने-फिरने लायक नहीं हो जाते घर नहीं आ पाएंगे. उसे अपना स्वास्थ्य भी पहले सा नहीं लग रहा है. उसके भीतर के भय और अन्य विकार भी स्पष्ट दिखने लगे हैं, जैसे कोई आपरेशन  चल रहा हो, सब कुछ निकाल कर स्वच्छ करना हो मन को ताकि परमात्मा अपनी पूरी गरिमा के साथ प्रकट हो सके.     


Monday, May 15, 2017

महर्षि दधीचि की कथा


आज पिताजी उठकर बैठे व व्हीलचेयर पर बैठकर बाहर घूमने गये, वह घर आने को भी कह रहे हैं. जब जून ने उनसे यात्रा पर जाने के बारे में पूछा तो कहने लगे, जायेंगे. उनके मन में आशा जगी है, ठीक होकर पुनः जीवन को गले लगाने की. मानव में जिजीविषा कितनी प्रबल होती है, यही भावना मृत्यु को सामने देखकर भी उससे पार जाने की चाह जगाती है. प्रकृति द्वारा प्रदत्त है यह जीने की आकांक्षा ! हृदय जोड़ने वाला तत्व है भावना, मानव भावना से ही जीता है लेकिन उसकी भावना एक सीमित दायरे में ही घूमती है.

आज भी मेघ महाराज पूरे ताम-झाम के साथ आये हैं. सद्गुरू स्वप्नों के बारे में बता रहे हैं. कल रात स्वप्न में बहुत सुंदर पीले व लाल रंग के फूल देखे, इतने चमकदार रंग थे उन फूलों के ! गुरूजी कह रहे हैं साधक को जब यह आभास हो जाये, उसे कुछ भी ज्ञान नहीं है, तब जानना चाहिए कि कुछ ज्ञान है. ज्ञान का अभिमान बताता है कि ज्ञान हुआ ही नहीं. मानव जीवन की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपने अनुभव से कुछ सीखता नहीं, एक ही भूल को बार-बार दोहराए चला जाता है. अभी कुछ देर में महादेव आने वाले हैं, शिव पार्वती को अष्टांग योग सिखा रहे हैं. जागरण, स्वप्न व सुषुप्ति के अतिरिक्त एक चौथी अवस्था भी है. जो स्वयं को उस अवस्था में रखना जान लेता है, वह ऊर्जा से भर जाता है. आभा युक्त, प्रकाश युक्त, दिव्य ऊर्जा से जो भर जाता है उसे कैसा अहंकार. स्वयं को तुच्छ के साथ जोड़कर देखे कोई तो तुच्छ ही रहेगा, स्वयं को नीचे गिराना क्या ठीक है ? आज अस्पताल में पिताजी थोड़ी देर चले, उन्हें घर जाने के लिए ठीक होना है. वह एक बार उनसे मिलने सुबह गयी थी फिर शाम को वे दोनों गये.

आज रामनवमी है. सुबह वर्षा हो रही थी. आज नैनी ने अपने पति से झगड़ा कर लिया अभी तक काम पर नहीं आई है. यह उसे जिव्हा से सताती है तो वह इसे शारीरिक कष्ट देता है. दोनों एक से बढ़कर एक हैं. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, इसी हफ्ते वे घर आ जायेंगे. आज सुबह अकर्ता भाव का कितना अनूठा अनुभव हुआ, सब कुछ अपने आप हो रहा है, ‘वे’ कुछ भी नहीं करते, ‘वे’ जो वास्तव में हैं. सुबह चार बजे नींद खुली, उससे पूर्व एक स्वप्न देख रही थी. एक अंग्रेज परिवार है. उसकी किशोरी कन्या चुप रहती है, पिता को इस बात का दुःख है, फिर अचानक एक दिन वह बात करती है तो प्रेरणादायक विचार उसके मुख से निकलते हैं !

पिताजी आज घर लौट आये हैं, नहा-धोकर अपने कमरे में लेटे हैं, बारह दिन वे अस्पताल में रहे, ईश्वर उन्हें स्वास्थ्य प्रदान करे ! आज सुबह ‘महादेव’ में महर्षि दधीचि की कथा देखी, बचपन में ‘हमारे पूर्वज’ में उनके बारे में पढ़ा था. आजकल बच्चों को वे कथाएं नहीं पढ़ाई जातीं. कितने युगों के साक्षी थे वह महर्षि. वे भी न जाने कितनी बार आये हैं इस दुनिया में. कल रात स्वप्न में फिर गुरूमाँ को देखा, कई बार पहले भी देख चुकी है. वे तीन नन्हे बच्चों की देखभाल कर रही थीं, बच्चे उनके नहीं थे. छोटी ननद का फोन आया, छोटा भतीजा गिरकर अपन घुटनों पर चोट लगा बैठा है.
परमात्मा अभी है, यहीं है, कितनी बार संतों के मुख से यह बात सुनी है. आज इसका अनुभव हुआ, होता ही आ रहा है कई बार, अब पक्का होता जा रहा है, जीवन एक खेल ही तो लगता है, इस अनुभव के बाद. अभी न जाने इस खेल में कितने मोड़ आने शेष हैं. कल जून ने कन्या के पिता को अपने आने की सूचना दी. जीवन की यात्रा में कोई साथ हो तो यात्रा कितनी सुखद हो जाती है, दो होकर भी एक और एक होकर भी दो..अद्वैत का अनुभव पहले इसी तरह होता है, फिर धीरे-धीरे वह प्रेम सारे अस्तित्त्व को घेर लेता है. पिताजी बाहर बैठे हैं. वह चुप ही रहते हैं ज्यादातर, शायद बोलने में ऊर्जा को व्यर्थ करना नहीं चाहते. कल स्टोर की सफाई की, गर्मियों के वस्त्र निकले, अब छह महीनों के बाद पुनः सर्दियों के वस्त्र बाहर निकलेंगे, मौसम का यह चक्र इसी तरह चलता रहता है.