Thursday, March 23, 2017

प्रोटीन बिस्किट


आज सुबह इस बात का अर्थ स्पष्ट हुआ कि यह जगत एक नाटक है, एक लीला है और उन्हें इसमें कुशलता से अपना पात्र निभाना है. जिस समय जो भी भूमिका मिले, उसे पूरी ईमानदारी से निभाते चलें तो कोई दुःख छू भी नहीं सकता, वे जो नहीं हैं, वह बनने का प्रयत्न करते रहते हैं और जो हैं उससे चूक जाते हैं, व्यर्थ के कर्मों का बंधन बांध लेते हैं. आज भी मौसम वर्षा का है, पंखे से ठंडी हवा आ रही है. इस समय उसका रोल एक लेखिका का है, एक कविता लिखेगी, इन्हीं भावों पर आधारित. कल से एक नई किताब पढनी शुरू की है, अच्छी लग रही है रूमी की कहानी. उसकी अपनी कहानी भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है.

आज सुना, शक्ति जब ऊपर के केन्द्रों में जाती है तो साधक के देखने की शक्ति बढ़ जाती है, लेकिन सत्य इन सबके पार है, वह देखने वाला है. ऊर्जा का सदुपयोग हो सदा इसके लिए सजग रहना है. कल नन्हा आ रहा है अपने दो मित्रों के साथ, जिनमें से एक लड़की है. उसने सोचा, देखे, ऊंट किस करवट बैठता है. बंगलूरू में ट्रैफिक ज्यादा है, प्रदूषण है हर तरह का. जिंदगी एक चुनौती है, जिसे उठाना ही होगा. वक्त ही बतायेगा कि भविष्य में क्या लिखा है.

मेहमान चले गये. आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. पिछले दिनों ब्लॉग पर पोस्ट डालने के अलावा कुछ नहीं लिखा. आज मौसम का मिजाज गर्म है. इस समय सुबह के दस बजे हैं. पिताजी अपने कमरे में बैठे हैं, टीवी बंद है, अख़बार पढ़ चुके हैं. नन्हे का संदेश आया है, सवा नौ बजे, ऑफिस जा रहा था. आज अपेक्षाकृत स्वस्थ है नूना, पिछले दो दिन तबियत ढीली-ढाली सी थी, लेकिन भीतर आत्मा का दीपक ज्यों का त्यों जलता रहा, शक्ति भी बनी रही. अभी कुछ देर पूर्व ग्लूकोज का एक गिलास पिया, मुँह का स्वाद अभी भी बिगड़ा हुआ है. एकाध दिन में सामान्य हो ही जायेगा, लेकिन यह अस्वस्थता उसे बहुत बड़ा पाठ पढ़ा कर गयी है. नन्हे के कारण भी कई पाठ पढ़ने को मिले हैं. वे अपने बनाये पूर्वाग्रहों के जाल में इस कदर जकड़े रहते हैं कि जरा सा भी विपरीत होने पर उसमें कसमसाने लगते हैं. समाज में हर तरह के लोग हैं, आदिकाल से होते आये हैं. हरेक अपनी तरह से जीता है. समाज कुछ नियम बनाता है जिन्हें पालन करना होता है, लेकिन अपनी जीवनचर्या के लिए किसी को नीचा देखना व्यर्थ है. यह खुद को नीचा गिराने जैसा है. हरेक स्वतंत्र है और अक्सर वे जिन बातों के लिए अन्यों को दोष देते हैं, जरूरत पड़ने पर खुद भी वही कर रहे होते हैं. अपने लिए एक कसौटी व दूसरों के लिए दूसरी कसौटी यही तो दम्भ है. इस तरह तो इस जगत में कोई भी दोषी नहीं है, यहाँ पूर्ण न्याय है. परमात्मा हरेक के भीतर है यदि व्यक्ति उसकी ओर नजर उठाकर देखे तो सारे प्रश्न गिर जाते हैं, भीतर समाधान मिल जाता है किसी के प्रति कोई राग-द्वेष नहीं रहता. जीवन एक सहज धारा की तरह बहने लगता है !
आज गुरु पूर्णिमा है, नैनी ने एक पुत्र को जन्म दिया है. उसे आश्चर्य हुआ. दो-दो बार तो संयोग नहीं हो सकता. उसकी बिटिया का जन्म गुरूजी के जन्मदिन पर हुआ, माँ ने उसका नाम मीरा रखा था. बेटे का जन्म गुरु पूर्णिमा के दिन, उसकी भक्ति भावना अवश्य सद्गुरु तक पहुंच गयी है.  

कल कुछ नहीं लिखा. स्वस्थ नहीं थी. आज सुबह अस्पताल गयी थी, शाम तक रिपोर्ट मिल जाएगी, सब कुछ सामान्य ही होगा. भोजन के प्रति जो दृढ आसक्ति थी, उसे छुड़ाने के लिए ही यह सब प्रकृति द्वारा रचा गया है. ‘शिव’ वह नई आत्मा जो नैनी के गर्भ से जन्मी है, अच्छा भाग्य लायी है. इतने शुभ दिन उसका जन्मना और इतनी सरलता से माँ को कष्ट दिए बिना धरती पर आना भी यही बताता है. उसके प्रति सहज ही स्नेह उमड़ता है, नवजात शिशु कितना निष्पाप होता है.

कल शाम बेहद तेज वर्षा हुई, मूसलाधार वर्षा. जून को आने में देर हुई, उसे लगा वह डाक्टर से उसकी मेडिकल रिपोर्ट डिस्कस कर रहे होंगे. लिवर में कुछ वृद्धि मिली है उसकी पाचन संबंधी सारी परेशानियां उसी के कारण हो रही हैं. अगले एक महीने तक दवा खानी है. देह में अतिरिक्त गर्मी के कारण ऐसा होता है. पर इन सब बातों के बावजूद उसकी भीतरी ऊर्जा वैसी ही है. परमात्मा की कृपा रूप जो कष्ट मिला है, उसने जीवन को एक नई दिशा दी है. व्यर्थ को छूट ही जाना चाहिए. जून उसके लिए प्रोटिनेक्स और प्रोटीन बिस्किट ले आए हैं. प्रोटीन से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ेगी, गुरूजी कहते हैं देह का सम्मान करो. उसने अपने लिवर को न जाने कितनी बार जलाया है. क्रोध, ईर्ष्या और भय के कारण, आज उससे क्षमा मांगी, उसे स्नेह भेजा, आगे ऐसा न करने का वचन भी देना चाहिए. परमात्मा उसके जीवन से सभी अवांछित बातों को हटाता जा रहा है. उससे परमात्मा को कोई काम होगा भविष्य में तभी तो वह उसे तैयार कर रहा है. इस वक्त भी जो कुछ उससे हो रहा है, वह उसी का है.   



Wednesday, March 8, 2017

चने की दाल की कढ़ी


याद आता है बहुत दिन पहले ओशो को सुना था जिसकी तीसरी आँख खुलने वाली होती है उसे पहले एक आंख स्वप्न में या ध्यान में दिखाई देती है, उस दिन स्वप्न में गुरूजी ने जो उसे इतनी बड़ी सी आँख दिखाई थी वह संभवतः इसी की पूर्व सूचना थी जो दो-तीन दिन बाद उसने अनुभव किया, अपने भीतर का आकाश और चाँद-तारे..उनके भीतर कितने रहस्य भरे पड़े हैं. उस दिन की वर्षा जिसमें मन तो भीग गया पर तन सूखा ही रहा ! आज एकादशी है, उसका अंतर इतना हलका महसूस कर रहा है जैसे अभी हवा में उड़ जायेगा. कल शाम को टहलते समय भी भारहीनता का अनुभव हो रहा था. आज भी मौसम सुहावना है. वर्षा अभी थमी है. दीदी आज यात्रा पर निकल रही हैं उनसे बात हुई, छोटी बहन व मंझली भाभी से बात की. उस दिन की कविता शायद शायद कुछ ही समझ सकें, जिसका अनुभव न किया हो उसे समझना मुश्किल तो है ही. परमात्मा की अमृत वर्षा बरस ही रही है, जब शिष्य तैयार होता है तो गुरू अपने-आप प्रकट हो जाता है. यह बात बिलकुल सच्ची है, वह इसकी गवाही दे सकती है. कल की पुरानी कहानी में बात ‘धन’ तक आ पहुंची है, अब भरपूर धन है उसके पास, परमात्मा ने हर तरह से उसे मालामाल कर दिया है, वह बरस ही रहा है अनवरत...

आज सुबह ध्यान में बैठी तो चालीस मिनट में ही उठ जाना पड़ा. देह में भारीपन लग रहा था, शरीर को स्वस्थ रखने में ही कितनी ऊर्जा चली जाती है उनकी. कल शाम वह स्कूल गयी थी, एक बच्चे के पैर पर काफी फुंसियों के निशान थे, गर्मी के कारण कमरे में गंध भी थी. पंखा शायद नहीं था या था ध्यान नहीं दिया, पर चल नहीं रहा था. निर्धनता का अभिशाप सबसे बुरा है, लेकिन जहाँ तक अभी शिक्षा नहीं पहुँची, सडकें नहीं पहुँचीं, बिजली नहीं पहुँची, वहाँ अमीरी कैसे पहुंच सकती है. कल ब्लॉगर रश्मिप्रभा जी ने कहा कि एक दिन के लिए शासनडोर की बागडोर आपके हाथ में आ जाये तो आप क्या करेंगे. करने को कितना कुछ है, यहाँ  कभी कुछ पूर्ण होता ही नहीं. जून आज पिताजी की आँखें दिखाने तिनसुकिया जायेंगे.

आज आखिर वह चने की दाल की कढ़ी बना रही है जिसकी रेसिपी अख़बार में पढ़कर पिताजी ने कई बार बताई है. आज भी मौसम अच्छा है. सुबह वर्षा के कारण वे टहलने नहीं जा सके, शाम को जायेंगे. उसका ध्यान आजकल गहरा नहीं हो पा रहा है, वैसे तो मन हर पल ही ध्यानस्थ रहता है, सब कुछ स्वप्न जो लगता है, न जाने कब जीवन की शाम आ जाये और यह स्वप्न टूट जाये, इससे पूर्व ही असंग हो जाना बेहतर है. अनंत काल उनके पीछे है और अनंत काल उनके आगे है, अनंत को पाना हो तो इस वर्तमान के नन्हे से पल में जागना होगा जिसके एक क्षण पूर्व भी अनंत है और एक क्षण बाद भी अनंत है, तो वहाँ भी वही हुआ. आज सुबह एक पंक्ति मन को छू गयी थी, ‘घर खो गया है’
आज शरणार्थी दिवस भी है इसी पर कुछ लिखेगी. एक और वाक्य मन में गूँजा कि ‘जो उन्हें मिला ही हुआ है, उसे वे न देखने का नाटक करते हैं और बाहर भी उसी को खोजते हैं, जो छूट ही जाने वाला है उसे पकड़ने का निरर्थक प्रयास करते हैं’. मानव की पीड़ा का यही कारण है, सार को असार में खोजते हैं, असार में कुछ असार भी नहीं तो सार कैसे मिलेगा. जो अभी बीज है उसमें फूल खोजते हैं, पहले उसे बोना होगा धरा में, शीत, ताप सहना होगा.


तारों भरा आकाश


जीवन स्वप्न है, वे रात में जो स्वप्न देखते हैं उनके अलावा दिन भर में न जाने कितने स्वप्न देखते हैं, जिनका कोई आधार नहीं. कल रात उसके जीवन की अभूतपूर्व रात्रि थी. भगवद गीता के चार अध्याय पढकर सोयी थी. तारों भरा आकाश दिखा, चन्द्रमा दिखा और न जाने कितने दृश्य दिखे, लेकिन जगते हुए, वह जागरण भी और था, वह निद्रा भी और थी. कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला. सुबह से कई बार स्वयं को स्वप्न देखते हुए जगा चुकी है. उनका सारा जीवन एक लम्बा स्वप्न ही तो है, अब लगता है परम लक्ष्य भी इसी जन्म में मिलेगा. परमात्मा उसे कदम-कदम आगे बढ़ा रहे हैं और किस तरह उसे एकांत का अवसर भी मिल रहा है. परिचित एक-एक कर जा रहे हैं, समय बचता है साधना के लिए पूर्ण सुविधा होती जा रही है. इस बार तो नेट भी नहीं चला सो काफी समय उसके कारण भी बच गया. परसों जून आने वाले हैं, अभी दो रात्रियाँ हैं जिनमें उसे और गहरे अनुभव हो सकते हैं. कल एक सखी का जन्मदिन है, उसने उसकी साधना में अपरोक्ष रूप से बहुत सहायता की है. मानस के छह रिपुओं में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को दूर करने के लिए उन्हें पहले देखना आवश्यक था, उन्हें अपने भीतर वह देख पायी, वह उसका आईना बनी. इसके लिए उसका कृतज्ञ होना ही चाहिए. सद्गुरू जैसे उसके सद्गुणों के लिए आईना बने. उनके जीवन में घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना उनके जीवन को गढ़ती है. हर क्षण वह परमपिता उनके साथ है.  क्या नहीं कर सकता वह, अचिन्त्य है, अनुपम है, अनोखा है...उसे कोटि कोटि प्रणाम  !

कल रात भी अनोखी थी. कृष्ण का श्लोक अब स्पष्ट हो रहा है कि योगी तब जगता है जब अन्य सोते हैं. आज सुबह से उसे उसका चेहरा कुछ बदला-बदला लग रहा है. मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल को भी लगा होगा जब शाम को उन्होंने कहा वह उससे योग सीखना चाहती हैं और आज ही आएँगी. हवाओं को भी खबर लग जाती है कि कहीं कोई फूल खिला है. सद्गुरू को भी खबर लग गयी होगी, उन्हें तो वर्षों पहले ही लग गयी थी. कितना अद्भुत है सब कुछ. कितना अनोखा है परमात्मा !

नन्हा सा पल खो न जाये
पागल मन यह सो न जाये
इस पल में ही राज छुपा है
जाग गया जो मिला खुदा है
सपनों की कुछ धूल छा गयी
स्वर्णिम रवि न पड़े दिखाई
आशाओं के पत्थर थे कुछ
कोमल पुहुप लता कुम्हलाई

उनके भीतर अनंत आकाश है, अनंत ऊँचाई है और अनंत गहराई है. अनोखे अनुभव हो रहे हैं उसे आजकल. जब कोई भीतर की यात्रा पर निकलता है तो सारी कुदरत उसका साथ देती है. कितना पावन होता है वह क्षण जब किसी के भीतर परम की प्यास जगती है. पहला अनुभव तो सम्भवतः उसी की कृपा से होता है, लेकिन उस अनुभव तक भी भीतर की कोई गहरी आकांक्षा होती है. भीतर तो वही है तो वही निकलता है स्वयं की खोज पर...आकाश में सब घटता है पर कुछ भी नहीं घटता. आकाश एक है, झोंपड़ी का हो या महल का, अरूप एक है रूपवान का हो या कुरूप का. नजर दीवारों पर हो तो भेद नजर आएगा, नजर भीतर के आकाश पर हो तो अभेद ही है..
घाटियों में बसे हैं लोग
बारिशों से डरे हैं लोग
बिजलियों की चमक
भर से कांपते हैं लोग !


आज उससे कविता नहीं बन रही है, लगता है अब परमात्मा उससे कुछ और काम कराना चाहता है. पहले कैसे झर-झर शब्द बहते थे, अब भीतर मौन है, अब शब्दों की क्या जरूरत अब तो मन की धारणा काफी है. अब न कुछ सिद्ध करना है न कुछ पाना है जो पाने वाला था वह खो गया और जिसे सिद्ध करना था वह माया सिद्द्ध हो गया था. भीतर का भय भी नष्ट हुआ, श्वास का कंपन गया, अकंप हृदय चाहिए तो भाव काफी है. सामने वाला चाहे समझे न समझे भीतर तो पता चल ही गया कि कंपन हो गया क्रोध की हल्की सी रेखा भी यदि छा गयी, भीतर पता चल ही जाता है, ईर्ष्या की धूमिल पंक्ति भी पता देती है, शील आवश्यक है और तब भीतर ही सब मिल जाता है, असली कवि स्वयं ही कविता हो जाता है ! 

Tuesday, March 7, 2017

श्वेत गैया


आज असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन है, जो कुछ वर्ष पहले तबादले के कारण यहाँ से चली गयी है, उसने फोन किया, वह खुश है कि एक और सखी वह जा रही है. यह संसार ऐसा ही है कोई आता है, कोई जाता है. वे देखने वाले हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं. कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नन्हा, पिताजी और जून तीनों ने मिलकर गुरूजी के लिए दोपहर के भोजन का इंतजाम किया है. वे कमरे में भोजन कर रहे हैं और वे सभी बाहर खड़े हैं, वह भी बाहर है. गुरूजी हाथ धोने के लिए बाहर आते हैं, उन्होंने श्वेत वस्त्रों पर भूरे रंग का लम्बा चोगा पहना है, जब लौटते हैं, वह उन्हें प्रणाम करती है. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं है, वह उनके चरणों पर झुकती है और मन में सोचती है यह उसे पहचानते नहीं, कि उनका कोई संबंध नहीं रहा, तब वह सिर ऊपर उठाती है कि एक आँख दिखाई पडती है. सामान्य आँख से दस गुना बड़ी रही होगी. उसका एक-एक भाग पूरा स्पष्ट था, उसके भीतर की सफेदी, काला भाग, द्रवता तथा ऊपर भौंहें भी, फिर वह आंख अपना तारा नीचे करती है और भीतर से एक और काला तारा दिखाई पड़ता है, एक आँख में दो पुतलियाँ देखकर वह आश्चर्य से बेहोश होकर गिरने लगती है, उसे सम्भाल लेते हैं जो लोग वहाँ खड़े हैं. भीतर भाव उठता है कि वह समाधि में प्रवेश कर रही है. इस स्वप्न का अर्थ यही हो सकता है कि परमात्मा की नजर हर वक्त उन पर है, वह एक नहीं दो-दो पुतलियों से, विशाल नेत्र से उन्हें देखता रहता है. कल रात भर वर्षा होती रही, अभी रुकी हुई है.

जून आज मुम्बई गये हैं, वह से बंगलूरू जायेंगे. दोपहर का वक्त है, एक पंछी की आवाज रह रहकर आ रही है. माली को बगीचे में कुछ ज्यादा काम बताया तो वह नम्र शब्दों में कहने लगा कल सुबह उठा दें तो वह कर देगा. सत्संग का असर पड़ने लगा है उस पर. आज पहली बार उसने एक ब्लॉगर की पोस्ट पर कमेन्ट करने के बाद लिखा, नई पोस्ट पर उनका स्वागत है, देखें वह आती हैं या नहीं. आज पिताजी ने चौलाई का साग साफ करते समय वही सब कहा जो माँ कहा करती थीं, तब वे उन पर हँसा करते थे. उन्होंने भीगे स्वरों में उससे यह भी कहा कि उन्हें बीस इंच की एक साइकिल चाहिए. जून के आने पर वह उनसे कहेगी कि इस इच्छा का मान रखें. वह बता रहे थे, चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र से साइकिल चलाना शुरू किया था. और अगले साठ वर्ष तक चलाते रहे. अब इतना तो अभ्यास उन्हें है ही कि बिना गिरे चला सकें. उन्होंने जीवन भर दूसरों के लिए कार्य किया, स्वाभिमान से जीये. आज अपने मन की बात कहकर उन्हें अवश्य अच्छा लग रहा होगा.  

कल रात उसने स्वप्नों का स्वप्न देखा..The Ultimate Dream ! परसों एक गाय को देखा था, जो बिलकुल श्वेत थी, वह दौड़ती हुई आ रही है, तीव्र गति है उसकी. वह और गाय दोनों एक maze में घुसते हैं, वे नाच रहे हैं और गा रहे हैं, बहुत सुंदर गीत है वह, कुछ दिन पूर्व भी उसने स्वप्न में एक मधुर धुन बनाई थी. कल तो यह देखा कि वह यशोदा है कृष्ण की माँ जो पुनः इस जन्म में कृष्ण के प्रति प्रेम से भर गयी है और वह कृष्ण और कोई नहीं गुरूजी हैं, बाबा रामदेव को भी देखा एक क्षण के लिए, उनके चेहरे पर अप्रतिम तेज है. इस बात का भान होते ही उसके जीवन की बहुत सारी घटनाएँ स्पष्ट होने लगी हैं. दो दिन से नेट नहीं चल रहा है, यह भी अच्छा ही है. वह अन्यों को यश देने के लिए है, यश बटोरने के लिए नहीं. यश की कामना जैसे पूरी तरह गिर गयी है, गिर गया है अहंकार भी, गुरूजी के प्रति उसकी भक्ति का राज भी अब समझ में आने लगा है. आज उन्हें भी वर्षों बाद एक पत्र लिखेगी.   

Sunday, March 5, 2017

बरसे बदरिया सावन की


प्राणायाम कराने से उसके एक छात्र में काफी बदलाव आ रहा है, जो पढ़ते-पढ़ते ही सोने लगता था. अभी कुछ देर पहले ही वह पढ़कर वापस गया है, आज काफी सचेत था, उसका ध्यान टिकने लगा है. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि इस बालक पर अपनी कृपा बनाये रखे. सुबह एक सखी से बात की, वे लोग मकान बदलने वाले हैं, इसी घर की जब वे नये-नये आये थे, कितनी तारीफ़ की थी पर अब इसकी कमियां नजर आ रही हैं. नये घर में सब अच्छा ही होगा यह भी तो नहीं कह सकते, फिर भी बेहतर के लिए प्रयास तो निरंतर चलता ही रहता है, और चलना भी चाहिए. कल उसने एक स्थानीय लेखक की कविताओं की एक किताब के लिए प्रस्तावना लिखी. आज धूप तेज है. कल सुबह सड़क किनारे के पेड़ से आंधी में गिरे आम लाने पर उसने पिताजी को टोका तो वे आज न फूल ही लाये न आम, घर में खिले चाँदनी के फूलों को सजाया है. अपने ही घर में जब सब कुछ हो तो बाहर से लाने की क्या आवश्यकता है, पर मानव के भीतर का नन्हा बच्चा कभी बूढ़ा नहीं होता. अनंतपुर स्टेशन पर एक भयंकर रेल दुर्घटना हो गयी आज सुबह, काफी लोग मृत हुए, काफी घायल हुए, अभी भी कुछ लोग फंसे हुए हैं. जीवन में वैसे ही कितने दुःख होते हैं, ऊपर से यह भयंकर दुःख..

आज फिर वर्षा हो गयी है, मौसम सुहावना है. नन्हे ने कल बताया अगले महीने वह आ सकता है. रात को एक अद्भुत स्वप्न देखा, उसे लग रहा था वह जाग रही है, ध्यान में है, दो काली चीटियाँ दिखती हैं, बिलकुल जीवंत, चलती हुईं, उन्हें देखती है तो कंधे के पीछे से किसी के हँसने की आवाज आती है और यह वाक्य भी, ‘अब मृत्यु ही शेष है जीवन नहीं’ और तभी एक प्रवचन सुनाई देता है स्पष्ट था एक-एक शब्द उसका, वह मुस्का रही है, यह आभास भी हुआ यानि स्वयं को मुस्काते देखा..कैसा अनोखा स्वप्न था यह ! टीवी पर बापू द्वारा इजराइल में गायी रामकथा का प्रसारण हो रहा है, शायद दुनिया का कोई कोना नहीं बचा होगा, जहाँ वह न गये हों. राम का नाम विश्व भर में गूँज रहा है. अभी कुछ देर पहले उपनिषद के उपदेश पढ़े, Indian Philosophy में से, जो पिछली बार पब्लिक लाइब्रेरी से लायी थी. आज कान्हा से बातें भी हुईं, पहली बार कॉफ़ी भी ऑफर की, जागते रहने का मन्त्र उसने दिया. वे जागते हुए भी स्वप्न देखते हैं अर्थात सोये रहते हैं. पिताजी टीवी नहीं देख रहे हैं, बरामदे में बैठे हैं. यूँही बिना कुछ किये बैठे रहना उन्हें अच्छा लगता है. बड़े भाई की बिटिया का दसवीं का परीक्षा परिणाम आ गया, बहुत अच्छा रहा, उसे ९.५ की उम्मीद थी, ९.८ रहा, भैया-भाभी बहुत खुश हैं और सारा परिवार ही खुश है. सरदारनी आंटी की पोती के बारहवींमें ९७.२% अंक प्राप्त किये हैं, उसे याद आया उनके समय में ६०% अंक प्राप्त करने पर ही घर में लड्डू बांटे जाते थे.

आज शाम वे पूजा कक्ष की जगह आंगन में सत्संग करने वाले हैं, नैनी के परिवार को भी शामिल होने को कहा है शायद एकाध और भी परिवार आयें, धीरे-धीरे इसमें और भी लोग जुड़ते जायेंगे, आरम्भ के लिए आज का दिन उत्तम है. कल उसका जन्मदिन है और गंगा दशहरा भी. पिताजी ने बनारस से पंचाग मंगवाया है उसमें देखकर बताया. उसने कल एक कविता ‘मस्ती’ पर लिखी थी, पर लोग इतने दुखी हैं कि मस्ती की बात उन्हें जंचती ही नहीं. अभी-अभी कृष्ण भक्त प्रवीर की कथा पढ़ी, भक्त को मरना ही पड़ता है, बिना मरे कोई भक्ति नहीं कर सकता, तभी तो संतों ने गाया है, भक्ति करे कोई सूरमा..

कल शाम का सत्संग बहुत अच्छा रहा, चार बच्चे, चार बड़े, सद्गुरू की उपस्थिति स्पष्ट महसूस हो रही थी. उसके बाद उसे जिव्हा पर नियन्त्रण रखने का उपदेश भी दिया एक लीला रच के. बाद में लॉन में एक अभूतपूर्व अनुभव हुआ, उसका स्मरण होते ही अब भी रोमांच होता है. वह घास पर बैठी थी कि अचानक घास प्रकाश से भर गयी, फिर उसमें पारदर्शी धुंध सी निकलने लगी, जो ऊपर उठकर नीचे गिरने लगी, फिर तो बाकायदा प्रकाश की वर्षा होने लगी झर झर झर..बूँदें टपक रही हों जैसे, मीरा का भजन याद आया, बरसे बदरिया सावन की..यह इसी वर्षा को देखकर उन्होंने लिखी होगी. अमृत की वर्षा का जिक्र कबीर ने भी किया है. परमात्मा उनके साथ है, इसकी खबर वह कई रूपों में देता है. आज एक सखी अपनी बिटिया को छोड़ने मुम्बई जा रही है, जहाँ वह एमबीए की पढ़ाई करेगी. एक अन्य सखी नाराज है उससे, जिसका एक अनुरोध वह मान नहीं पायी थी, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे और तत्क्षण अपने लिए भी उसने यही प्रार्थना की.             
   


Friday, March 3, 2017

अँधेरे के प्राणी


दोपहर के तीन बजने को हैं, आज धूप तेज है, ग्रीष्म ऋत है सो गर्मी होना स्वाभाविक है. जून चार-पांच दिनों के लिए अहमदाबाद गये हैं. उसने सोचा गर्मियों के वस्त्र सहेज कर रखने और सर्दियों के वस्त्र बाहर निकलने का यही उचित समय है. कल रात तेज वर्षा, आंधी, तूफान के कारण बिजली चली गयी. घोर अंधकार छा गया, बाहर भी भीतर भी. पल भर के लिए एक अजीब सा भय उत्पन्न हो गया. भीतर न जाने कितने संस्कार दबे हैं. भय का संचार होते ही वे जग जाते हैं. जैसे अँधेरे में सारे रात्रि के जीव निकल आते हैं वैसे ही मन यदि तनिक भी भय का शिकार हुआ तो भूत बनकर कुसंस्कार चिपक जाते हैं. प्रकाश होते ही सब जीव चले जाते हैं वैसे ही ज्ञान का प्रकाश होते ही वे भी जल जाते हैं. साधना के द्वारा उन्हें पूरा नष्ट करना होगा, ताकि घोर अंधकार में भी मन अभय का पात्र ही बना रहे.

उस दिन से शुरू हुई वर्षा आज थमी है, पर हवा ठंडी है, स्वेटर पहनना पड़े इतनी ठंडी. आज सुबह सुंदर व्याख्यान सुना, शब्दों को वे सुनते हैं, कानों को भले लगते हैं पर थोड़ी ही देर में अपना असर खो देते हैं. उसके अर्थ पर जब ध्यान हो, अर्थ में मन टिक जाये, वे अर्थरूप ही हो जाएँ तभी शब्दों का काम पूरा होता है.

कल दोपहर एक सखी के यहाँ हालैंड वासी एक आर्ट ऑफ़ लिविंग के स्वामी से भेंट हुई, वह बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं तथा संस्कृत में धाराप्रवाह श्लोक भी. शाम को जून के दो मित्र आए, समय बदलता रहता है, एक सा नहीं रहता. कभी वे सब परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, अब सब दूर-दूर हो गये हैं. मृणाल ज्योति का एक बच्चा जिसे कई रोग एक साथ थे, कल रात नींद में ही चल बसा. उस दिन वह स्कूल गयी थी तो हॉस्टल के कुछ बच्चे मिले थे, पता नहीं उनमें से कौन सा था.

कुछ दिनों से नन्हे का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उससे बात करके उसने कुछ सोचा और जून को एक पत्र लिखा, ताकि वापस आकर वह इसे पढ़े. उन्होंने इकलौते पुत्र को बचपन में बहुत स्नेह से पाला, लेकिन उसकी युवावस्था में उसे अकेला छोड़ दिया, अठारह वर्ष की उम्र बहुत नाजुक होती है. कोटा में उसे हॉस्टल में छोड़ आए थे तो वह बहुत तनाव में रहा होगा. घर की सुरक्षा से दूर एक अनजान शहर में...फिर कालेज में कितनी हिंसा और तनाव झेलना पड़ा, अच्छे पल भी यकीनन थे पर वह कहते हैं न कि नकारात्मक की ओर झुकने की प्रवृत्ति मानव में सहज ही होती है. उसे लगता है बंगलुरू में भी उसे कार्यभार और जीवन की कठिनाइयों से अकेले ही जूझना पड़ रहा है. उसे लगता है पुत्र के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने में उनसे कुछ चूक अवश्य हुई है. वे एक-दूसरे के प्रति जिस तरह पूर्ण समर्पित हैं वैसे ही उसके प्रति नहीं हो पाए. उसने लिखा, जून को अब मजबूत बनना होगा, उसके बिना रहने की आदत डालनी होगी. कुछ दिनों के लिए वह नन्हे के साथ रहना चाहती है. उसे नया जीवन शुरू करना है, जिसके लिए उसे मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए. उसे उनका साथ सदा ही चाहिए था पर वे अपने जीवन में इतना खोये थे कि उसके साथ रहकर उसे सहारा नहीं दे सके. वह कितनी-कितनी परेशानियों को अकेला ही सहता रहा, उसने कभी उन्हें अपना राजदार नहीं बनाया. अब समय आ गया है पुत्र के लिए अपने सुख के त्याग का समय, उसे अपना कर्त्तव्य स्पष्ट दिखाई दे रहा है. उनका शेष जीवन उसके लिए हो, उसे जीवन में अभी प्रवेश करना है. यही उम्र है जब उन्होंने विवाह बंधन में बंधकर नया जीवन शुरू किया था और उन्हें परिवार का पूर्ण सहयोग था. उसने उम्मीद की, जून जब यह पत्र पढ़ेंगे, उसकी बात समझ रहे होंगे.  

    

Wednesday, March 1, 2017

नीला आकाश


घर आने के बाद व्यस्ततता कुछ ऐसी रही कि एक हफ्ता कैसे निकल गया पता ही नहीं चला. आज कई दिन बाद धूप खिली है, वह झूले पर बैठी है, विटामिन डी का सेवन करते हुए. भोजन बन गया है, जून का इंतजार करते हुए पिताजी टीवी देख रहे हैं. शब्द फिर जैसे उतरने लगे अपने आप ही..

हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है
पेड़ों के झुरमुटों से
सुनहली धूप में चमक रहा होता है
जब घास का एक एक तिनका
किसी तितली के इंतजार में फूल
आँखें बिछाए तो नहीं
बैठा होता डाली के सिरे पर..
सूनी सड़क पर एकाएक
गुजर जाती है कोई साईकिल
और ठीक तभी दूर से
आवाज देती है गाड़ी
स्टेशन छोड़ दिया होगा किसी ट्रेन ने
हाथ हिल रहे होंगे, प्लेटफार्म और
ट्रेन के कूपों से बाहर हवा में
जाने किस किस के....  
आकाश नीला है
और श्वेत बगुलों से बादल
इधर-उधर डोल रहे हैं
एक पेड़ न जाने किस धुन में बढ़ता चला गया है
बादल की सफेद पृष्ठभूमि में
खिल रहा है उसका हरा रंग
जैस सफेद चादर पर हरे बूटे...
रह रह के हवा झूला जाती है झूला
जिस पर बैठ कर लिखी जा रही है कविता
परमात्मा इतना करीब है इस पल कि
नासिका में भर रही है उसकी खुशबू
और कानों में गूंज रही है बादलों की गड़गड़ाहट


अप्रैल के तीसरे साँझ की सलेटी साँझ..कोकिल रह रह कर कू..कूकू..कू..कह उठती है अमराई में. गुलमोहर की शाखें हवा में भर रही हैं अपने भीतर ओज और सुवास, ऋतू आने पर खिलने के लिए, नाच रहे हैं पीपल के गुलाबी नव पल्लव, गुड़हल का एक लाल फूल तोड़ कर डाल गया है कोई बच्चा हरी घास पर..झूम रही हैं गुलब की कलियाँ हवा के झोंकों संग. आकाश बादलों से घिरा है और कालिमा गहराती जा रही है. ठंडे लोहे के झूले का स्पर्श पैर की तली को शीतलता से भर रहा है. पेड़ अब काले होते जा रहे हैं. हवा जब माथे से बालों को पीछे सरका देती हैं तो मानो उसी का हाथ हो और तन पर चढ़ जाता है कोई नन्हा कीट तो लगता है वही मिलने आया है..कितना सुंदर है यह सब..