Wednesday, February 8, 2017

पहाड़ी पर घर


कल रात को एक और स्वप्न..मन न जाने कितने गड्ढे, कितने गहरे तल छिपाए है और अवचेतन मन न जाने कितना व्यर्थ भी अपने में समाये है. वासना और कामना, लोभ और अहंकार सभी के बीज भीतर हैं ही..यहाँ हर व्यक्ति अपने भीतर एक गहरा कुआँ समोए है और एक अनंत आकाश भी. वे जो अन्यों की तरफ ऊँगली उठाते हैं पहले अपने भीतर झाँक कर देखना चाहिए. एक मन जिसने जान लिया, सारे मन उसने जान लिए. यहाँ सभी एक ही कीचड़ से उपजे हैं और कमल बनने की सभी को छूट है. लोगों का आपस में मिलना अकारण नहीं है, न जाने कितने जन्मों में वे एक दूसरे के मान-अपमान का सुख-दुःख का कारण बने हैं. कितनी बार उन्होंने फूल भी उगाये हैं और कांटे भी. माँ की हालत बिगड़ती जा रही है, उनका मस्तिष्क अब साथ नहीं दे रहा है, पिताजी बहुत परेशान रहने लगे हैं.

पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. परसों सुबह एक सखी के यहाँ आयोजित धार्मिक उत्सव में भाग लेने वह मोरान गयी थी, शाम को लौटी, उसी दिन माँ बिस्तर से उठकर बाथरूम जाते समय चक्कर आने से गिर गयीं. उनके दाहिने कूल्हे में चोट लगी है. इस समय वह अस्पताल में हैं, जून और पापा भी उनके साथ हैं. बहुत दिनों बाद पूरे घर में वह अकेले ही है.

आज माँ का अस्पताल में दूसरा दिन है, न जाने कितने दिन, कितने हफ्ते या कितने महीने उन्हें अस्पताल में रहना होगा. जीवन की संध्या में यह दारुण दुःख उन्हें झेलना पड़ रहा है, कर्मों की ऐसी ही गति है. कल दिन भर उसका मन भी कुछ अस्त-व्यस्त सा रहा, कोई भी कार्य पूरे मन से नहीं कर पायी. आज सुबह से दिनचर्या नियमित हुई है. जून आज फील्ड गये हैं.

आज तीसरा दिन है. जून अभी कुछ देर में आने वाले हैं. अस्पताल में खाना ले जाना है. एक परिचिता  का फोन आया है, विश्व विकलांग दिवस पर उसे बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेना है. दो दिन बाद बाल दिवस है, शायद वह न जा पाए. सभी को फोन पर माँ के बारे में बताया. जीवन क्या मात्र मृत्यु की प्रतीक्षा है ? प्रतीक्षा जो केवल एक व्यक्ति ही नहीं करता, करते हैं उसके अपने भी (?) जून के एक मित्र की माँ पिछले पांच-छह महीनों से बिस्तर पर हैं. अब माँ ने भी बिस्तर पकड़ लिया है अगले दो-तीन महीनों के लिए, डाक्टर ने कहा है इतना समय तो हड्डी को जुड़ने में लगेगा. नूना खुद भी धीरे-धीरे बढती हुई उम्र का अनुभव देह के तौर पर करने लगी है. मन के तौर पर तो कोई स्वयं को बूढ़ा कभी महसूस नहीं करता. कहना कठिन है उम्र घटती है या बढ़ती है.

‘संडे स्कूल’ व ‘मृणाल ज्योति’ के बच्चों के साथ बालदिवस मनाया, जून कापी और पेंसिलें ले आए थे. मिठाई और केक भी. एक ही स्थिति में लेटे-लेटे माँ की परेशानी थोड़ा बढ़ गयी है. पिताजी का उत्साह पूर्ववत है, वह ज्यादातर समय अस्पताल में ही रहने लगे हैं. उसे अभी ‘विवेक चूड़ामणि’ का काव्यानुवाद आगे लिखना है. नवम्बर आधा बीत गया है, अभी तक सभी क्यारियों में फूल नहीं लगा पायी है. आज शाम को सत्संग है. उस सखी का फोन आया जो यहाँ से चली गयी है. काफी देर तक बात करती रही. वहाँ का जीवन यहाँ से बिलकुल अलग है. उनका घर एक पहाड़ी पर है, चढाई करके घर तक आना पड़ता है. पांचवीं मंजिल पर घर है और अभी तक लिफ्ट चलनी शुरू नहीं हुई है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते साँस फूल जाती है. बालकनी से सुंदर सूर्योदय दीखता है, ऊपर ठंड भी रहती है. नैनी दोपहर को एक ही बार आती है. कुछ काम खुद भी करने होते हैं. माँ को अस्पताल गये आज पूरा एक सप्ताह हो गया. ऐसे ही देखते-देखते समय बीत जायेगा और वह घर आ जाएँगी.

जून देहली गये हैं, नन्हा भी वहाँ किसी काम से आया था उससे भी मिले. एक सखी का फोन आया, उसने कहा माँ को ठीक से खाना चाहिए, उसे पता नहीं है किस स्थिति में वह हैं. उस दिन उसने अस्तित्त्व से उन्हें दुःख से मुक्त करने के लिए प्रार्थना की थी, उसे अभी तक पूरा होना बाकी है लेकिन यह दिखाकर ईश्वर उसके मन में वैराग्य दृढ़ कर रहे हैं, ओशो कहते हैं, जीवन के अनुभव ही काफी हैं किसी को वैरागी बनाने के लिए. सुबह से कई संतों के वचन सुने, अच्छा लगता है सुनना पर मनन् भी करना चाहिए मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं है.

    

Monday, February 6, 2017

'बोधगया' में बोध गया


परसों रात एक स्वप्न देखा. कितना जीवंत था, लग रहा था जागकर ही देख रही है. ध्वनि इतनी स्पष्ट थी जैसे जागते में होती है. गाना इतना स्पष्ट था और शब्द भी याद थे. कल फिर एक स्वप्न देखा, ये सारे स्वप्न उसके अवचेतन की खबर रखते हैं, देते हैं. उसने अपने अवचेतन के विचारों का प्रक्षेपण जगत पर किया है और तभी जगत उसे वैसा ही दीखता है. उसने पिछले जन्म में या जन्मों में जो कुछ किया है उसका भय भी अवचेतन में विद्यमान है कि कहीं उसके साथ भी वैसा न हो. उन्हें ध्यान में दबे हुए भावों की निर्जरा करनी है ताकि मुक्त हो सकें. स्वयं को जगत के सामने अच्छा दिखाने की कामना, साधना का फल भी भौतिक जगत में नाम तथा यश के रूप में पाने की कामना अहंकार के ही सूक्ष्म रूप हैं. आत्मा में स्थिति हर क्षण नहीं रहती अन्यथा इतनी भूलें नहीं होतीं. आज पिताजी सुबह से बाहर ही बैठे हैं, सारे संबंधों में सूक्ष्म हिंसा छिपी है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है उनका माँ से संबंध. एक-दूसरे को जितनी तरह से हो सकता है परेशान करने के उपाय खोजना ही जैसे लक्ष्य हो, उसके बावजूद वे कैसे इतने उत्साहित रहते हैं, आश्चर्य होता है.

कल पुनः उसने स्वप्न में बाबा रामदेव को देखा, वे उनके घर आए हैं और किसी कार्यक्रम की तैयारी कर रहे हैं, उसका नाम लेकर एक बैग लाने को कहते हैं. बाद में एक स्वप्न वह पुनः पुनः देख रही थी, हर बार पूर्व की कमी को दूर करके, यानि वे अपने स्वप्न स्वयं ही गढ़ते हैं. ध्यान में आज एक सुंदर मोती की माला दिखी..मन कितना रहस्यमय है..चेतना में कितने रहस्य छिपे हैं, साक्षी जो भीतर बैठा है कुछ विचार नहीं करता मात्र द्रष्टा है किन्तु उसके होने मात्र से ही मन, बुद्धि अपना कार्य करते हैं. आज शनिवार है, बाहर से बच्चों की आवाजें आ रही हैं और उसके भीतर अनहद का स्वर फूट रहा है, कितना स्पष्ट सुनाई दे रहा है, यह सुनने वाला भी वही है. टीवी पर सारनाथ में दिया बापू का प्रवचन आ रहा है. भीतर जब तक बोध भी टिका है, तब भी बाधा है. बोध भी जाना चाहिए, ‘बोधगया’ ..इसी का प्रतीक है. भोगों की लालसा, आलस्य, प्रमाद, तम ये सब साधना में विघ्न हैं. आलस्य कुशल कर्म में उत्साह को तोड़ता है, जो विषय नहीं चाहिए उसमें लगना प्रमाद है. विषाद व कमजोरी भी भी विघ्न हैं. कुशल प्रवृत्ति में निरंतर उत्साह बना रहे, यह बुद्ध की एषणा है. कितना अद्भुत ज्ञान है यह !

आज भीतर एक गहरा सन्नाटा है, साक्षी भाव उदित हुआ है, कोई कर्ता नहीं दिखाई पड़ता. नाश्ता ले कर बाहर बगीचे में गई, ठंड शुरू हो गयी है. धूप भली लगती है तन को. वहाँ बैठकर लग रहा था जैसे वह भी अन्य पेड़-पौधों की तरह एक जीव है, देह व आत्मा के बीच का जो सेतु था, जो अहंकार था, वह क्षीण हुआ है शायद गिर ही गया है, इतनी गहन शांति है भीतर, कुछ भी करने का भाव नहीं रह गया है, सब कुछ हो रहा है. सद्गुरू के सम्मुख होती तो वह पहचान लेते..वह कहते यह भी एक अनुभव है, आज से पूर्व न जाने कितने अनुभव आए, एक से बढ़कर एक, सारे खो गये..यह कब तक टिकेगा. वे इतने बड़े महारथी हैं कि सारे अनुभवों को पचा गये..डकार तक नहीं लेते वे. जो करने योग्य है वह प्रकृति करवाए ही जा रही है, पहले डर था कि यदि वे ही नहीं रहे तो उनका काम कैसे चलेगा ! परसों एक सखी का जन्मदिन है उसके लिए अंतिम कविता लिखनी है ! वे लोग यहाँ से जाने वाले हैं.

‘उसने देखते ही मुझको दुआओं से भर दिया
मैंने तो अभी सजदे में सर झुकाया भी नहीं था’


साक्षी भाव कितना मधुर है. कितने अनुभव हुए उसे आजतक लेकिन सब आकर जाने के लिए. यह टिकेगा ऐसा लगता है. भीतर एक शीतलता का अनुभव होता है, जैसे बाहर का मौसम है ठंडा सा, भीतर एक सन्नाटा है जो मिटने वाला नहीं है ऐसा लगता है. उन्हें आज विशेष बच्चों के स्कूल जाना है. जब तक गाड़ी आती है उसे पाठ कर लेना चाहिए.

आकाश में हाथी


आज करवाचौथ है, बड़ी भाभी का फोन आया था, उनका जन्मदिन भी आ रहा है, उन्हें एक कविता लिख भेजनी है, तथा दीवाली कार्ड व भाईदूज का टीका भी. ‘दादीजी’ पर उसने एक स्मृति लेख लिखा है, जून ने उनका फोटो भी स्कैन कर के डाल दिया है. दोपहर को एक पंजाबी सखी के यहाँ जाएगी, नहीं भी जा सकती, मन में एक संदेह ने जन्म लिया है, तो मन अभी तक बचा है, चलो मन तो बचा पर उसमें संदेह भी बचा है, कैसा आश्चर्य है ! सुबह से मन उच्चावस्था में था, संसार की आंच लगते ही निम्न केन्द्रों में चला गया. मन की यही तो विशेषता है, उसे जैसा रंग लगाओ वह उसी में रंग जाता है. परमात्मा की आंच में वह परमात्मा ही हो जाता है. आज सुबह से कितने दोहों का अर्थ स्पष्ट हो रहा है भीतर..लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल..परमात्मा हर कहीं है जैसे सागर में लहर उठती है वैसे ही प्राणी इस परमात्मा के सागर में उठने वाली लहरे हैं..सभी कोई..इसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है. परमात्मा की नजर में सभी समान हैं एक कीट से ब्रह्मा पर्यन्त ! अब कौन इस परम को अपने भीतर प्रकटने का अवसर देता है इस बात पर उसकी प्रसन्नता टिकी है. कोई जग जाये तो परम उसमें प्रविष्ट हो सकता है. सद्गुरू ऐसे ही होते हैं..वे स्वयं हट जाते हैं और परमात्मा उनमें प्रवेश कर लेता है. भीतर अमृत बह ही रहा है, उसके प्रति सजग भर होना है. जो स्वयं ही भीतर समाया है फिर वहाँ परमात्मा को स्थान कहाँ मिलेगा. यही अज्ञान है, यही मोह है. वे जो स्वयं है वहाँ सिवाय दुःख के कुछ नहीं लाता और जो वह है सिवाय सुख के कुछ नहीं देता..अब उनके हाथ में है कि वे चाहते क्या हैं ?

आज माली ने पौधों के बीज डाल दिए. फूलों के बीज, धनिया, पालक, लाही साग व मूली के बीज भी. कल वह नर्सरी से पिटुनिया, टमाटर, गोभी आदि की पौध लाएगी. और परसों वह भी लगा दी जाएगी. दस बजने को हैं माँ रोज की तरह पिताजी को ढूँढ़ रही हैं. उनकी बातें सुनकर कभी तो वे हँस देते हैं, कभी क्रोध करते हैं जैसा मन हो, मन बदलता रहता है कभी इधर तो कभी उधर..मृणाल ज्योति ने दीवाली के लिए सुंदर दीपक रंगे हैं, परसों शाम कोओपरेटिव में बिक्री करने के लिये आएँगे वे लोग.

कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नीला आकाश अपनी विशालता व भव्यता के साथ मजूद है और रह रह कर उसका रंग गाढ़ा नीला हो जाता है. चमत्कार जैसा ही लग रहा था. पिताजी भी थे और भी कई लोग थे. स्वप्न में इतने शोख रंग पहले देखे हों याद नहीं आते. बचपन का एक स्वप्न आज तक याद है जिसमें आकाश में चारों दिशाओं में बड़े-बड़े हाथी अपनी सूंड से जल वर्षा कर रहे थे और सारा आकाश फूलों से सजा था..स्वप्न में उनकी चेतना ही कितने रूप धर लेती है. ऐसे ही यह जगत उस परमात्मा का स्वप्न है..कितना अनोखा है यह सब कुछ ...   
  
 ‘गॉड लव्स फन’ ! कल रात को एक अनोखा स्वप्न देखा. बाबा रामदेवजी का फोन आया है उसके लिए. उसने कहा, विश्वास ही नहीं हो रहा कि उनसे बात कह रही है. तब बाबा ने कुछ कहा ..कि ऐसी क्या बात है और हर्षातिरेक में स्वप्न टूट गया. फिर आज सुबह क्रिया के बाद यह अनुभव हुआ की वह ही आत्मा है, अनोखा अनुभव है यह जानना कि वह ही इन्द्रियों के माध्यम से देख, सुन, बोल रही है. बचपन में वे कितने विश्वास से कहते थे कि उनके भीतर जो बोल रहा है वह परमात्मा है, तब ये सामान्य बातें हुआ करती थीं, हर कोई इन्हें जानता था, पर आज के युग में कोई परमात्मा को अपना अनुभव बनाना नहीं चाहता, माया प्रबल है.    

Friday, February 3, 2017

शाम और खामोश पेड़


कल शाम एक सखी की बिटिया से उसके अनुभव सुनकर आनंद आया, उसने सोचा एक कविता लिखकर उसे देगी. रात को मोबाईल पास रखकर नहीं सोयी थी, जून ने फोन किया, वह अधीर हो गये फिर दूसरे फोन पर किया. पिताजी और माँ के बीच नोक-झोंक बढ़ती जा रही है, उसे लगता है यह मोह की पराकाष्ठा है. ऐसे ही लड़ते-झगड़ते सारा जीवन चला जाता है. नवरात्रि का तीसरा दिन है आज, ध्यान में मन लगता है, सद्गुरू कहते हैं, इन दिनों में की गयी साधना का विशेष प्रभाव होता है. एक अन्य सखी के दिए हुए कपड़े व स्वेटर आस-पडोस के बच्चों को बाँट दिए. कुछ कपड़े वे मृणाल ज्योति भी ले जायेंगे. ईश्वर उसके हाथों यह शुभ काम करवा रहे हैं. वह भजन याद आ रहा था, करते हो तुम कन्हैया..मेरा नाम हो रहा है..सचमुच सभी कुछ वही कराता है. आज सुबह स्वप्न था या तंद्रा थी या ध्यान था, उसे अपने भीतर लिखे हुए कुछ वाक्य दिखे. शास्त्रों में कहा गया है कि ऋषियों ने मन्त्र देखे, तभी वे द्रष्टा कहलाये. वे जो भी बुद्धि से लिखते हैं वह उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना जो सहज प्रकटता है वह होता है.

माँ को आज अस्पताल जाना पड़ा. उनके पैर में घाव हो गया है. एक सखी ने कहा उनके कपड़े अलग से धोये जाएँ तथा डेटोल में रिंज किये जाएँ. स्नानघर में सीट तथा दरवाजे का हैंडल व नल भी डेटल से पोंछें. उसने पिताजी को भी सजग रहने को कहा कि कहीं उन्हें भी छूत न लग जाये पर वे कुछ और ही अर्थ लगाकर परेशान हो गये. इन्सान अपने सुख-दुःख का निर्माता स्वयं ही है. माँ की मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं है. इस समय लेटी हुई हैं. उनके प्रति उसके मन में कोई भाव नहीं जगता, वह कुछ भी समझने की स्थिति में नहीं हैं ऐसा लगता है. उनके भीतर भी उसी परमात्मा की ज्योति है वही जो उसके भीतर है. अपने प्रति भी तो कोई कठोर हो ही सकता है. अस्तित्त्व में जो भी घटता है, वे उससे जुड़े ही हुए हैं. उनके भीतर परम चैतन्य सोया रहता है और वे सारा जीवन दुःख में ही गुजार देते हैं. उसे जगा दें तो भीतर उत्सव छा जाये, जगाना भी क्या कि मन के सारे आग्रह, सारी वासनाएं शांत करके खाली हो जाना है. वह शेष काम स्वयं ही कर लेगा. कल लक्ष्मी पूजा का अवकाश था, शरद पूर्णिमा भी थी. उसके पूर्व पूजा का अवकाश था, समय भाग रहा है.

फिर वही झूला, वही ढलती हुई शाम है.
कई दिनों बाद मिली इस दिल को फुर्सत, आया आराम है
आसमां चुप है सलेटी चादर ओढ़े
पेड़ खामोश है, हवा बंद, नहीं कोई धुन छेड़े
एक खलिश सी है भीतर कोई अपना बीमार है
दुआ के सिवा दे न सकें कुछ ये हाथ लाचार हैं
लो देखो एक कार की रफ्तार से पत्तों में हरकत आयी
हिल-हिल के जैसे भेज रहे उसे दवाई
जीवन है तभी तक तो दिल धड़कते हैं
रोते हैं, हँसते हैं साथ-साथ बड़े होते हैं
दो हैं कहाँ जो कोई असर हो दिल पे किसी बात का
दो हैं कहाँ जो दूजा लगे, अपना सा दर्द है जज्बात का
दुःख कहने से जो भीतर कसक उठती है वह अहम् है..



Thursday, January 26, 2017

सिक्किम का भूकम्प


कल पंखा भी था, टीवी भी था फिर भी गर्मी का जिक्र किया आज न बिजली है, न पंखा है, न टीवी पर बापू की कथा आ रही है, पर भीतर संतोष है. जून आधे घंटे में आ जायेंगे. आज सुबह काफी वर्षा हुई. सिक्किम में भूकम्प के कारण काफी नुकसान हुआ है, जापान में पुनः बाढ़ व तूफान आया है. पाकिस्तान में भी बाढ़ है. मानव ने अपनी मूर्खताओं से ऐसी स्थिति उत्पन्न कर ली है. प्रकृति का तो यह रोज का काम है. रोज ही कहीं न कहीं भूकम्प आते ही रहते हैं. पृथ्वी के होने का यही तरीका है. सागर है तो तूफान आयेंगे ही !

‘वह कौन है’ यह प्रश्न भीतर गूँज रहा था कि किसी ने पूछा, प्रश्न पूछने वाला कौन है..और गहन शांति हो गयी. कोई जवाब नहीं आया. लेकिन मौन में भी मन मुखर था. कुछ दृश्य, कुछ शब्द सुनायी दे रहे थे. आज से उसने यही ध्यान करने का निश्चय किया है. मन का शुद्धिकरण तो साधना से होता है पर विस्तार भी बहुत हो जाता है. जब सारा ब्रह्मांड ही खुद के भीतर भासने लगे तो अहंकार भी उतना ही विशाल होगा. अभी भी यही कामना भीतर बनी रहती है, देह स्वस्थ रहे, मन शांत हो, बुद्धि तीक्ष्ण हो, जगत में यश हो, सारी सुख-सुविधाएँ हों तो इन कामनाओं में और एक संसारी व्यक्ति की कामनाओं में जरा सा भी भेद नहीं है. हाँ, इतना जरूर हुआ है अब भीतर द्वेष नहीं रहा है, कोई विशेष पदार्थ ही मिले ऐसा आग्रह नहीं रहा, पर जब तक भीतर कोई भी कामना है, तब तक परमात्मा से दूरी बनी ही हुई है. भक्त को यह विश्वास होता है कि परमात्मा हर तरह से उसकी मदद करते हैं, जो भी उसकी उन्नति के लिए श्रेष्ठ है वही वह होने देते हैं !

आज सुबह जून को उसने शून्य के बारे में बताया, void के बारे में, कुछ नहीं है....केवल ब्रह्म सत्य है. जगत मिथ्या है, आज ध्यान में यह सूत्र समझ में आया. आज भी समाचारों में सिक्किम में आए भूकम्प की भयानक खबरें सुनीं, अब भी कई लोग लापता हैं, कुछ मलबे के नीचे दबे हैं. प्रकृति कितनी कठोर हो सकती है, यह वे सोचते हैं, लेकिन प्रकृति इतनी विशाल है, अनंत है, उसमें थोड़ा सा विक्षेप एक ग्रह पर आए तो उसके लिए कुछ भी नहीं है. जैसे कोई लखपति हो और उसके गाँव के अनेकों घरों में से एक ढह जाये तो उसे क्या अंतर पड़ेगा. मानव भी प्रकृति का ही अंश है, मानव इस सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर अनुभव कर सकता है, लेकिन प्रकृति के सम्मुख वह भी विवश है.

आज जून मुम्बई जा रहे हैं. दस बजने को हैं, थोड़ी देर में वह भोजन बनाने जाएगी. शाम को एक सखी की बिटिया से मिलने जाना है, उससे पहले घर में सत्संग है. कल सुबह केन्द्रीय विद्यालय जाना है एक प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाने. दोपहर को एक मीटिंग में दुलियाजान क्लब जाना है. शाम को भी मीटिंग है, पर उसमें वह नहीं जाएगी. आजकल माँ को किचन में जलती गैस से भय लगने लगा है, वह कब उठकर गैस बंद कर आती हैं पता ही नहीं चलता. वह कड़ाही में सब्जी रखकर आयी, और कुछ देर बाद जाकर देखा तो गैस बंद है. उसे पल भर के लिए क्रोध आया, पर फिर समझाया मन को, वह हर हाल में बड़ी हैं, उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिये. पिताजी उन्हें प्रेम से धमका सकते हैं, उनकी बात और है. नैनी की बेटी को खसरा हुआ था, पर अब उसका चेहरा लाल दानों से भर गया है, अस्पताल जाकर इलाज कराने के नाम से ये लोग घबराते हैं. नन्हा गोवा से लौट आया है, उसने वहाँ water sports तथा paragliding की. जीवन कितना अमूल्य है, एक-एक श्वास यहाँ अनमोल है, यह विचार उसके मन में कौंध गया जैसे ही नन्हे ने वह बताया.

आज उसने दीवाली के लिए सफाई का श्रीगणेश किया है. आज महालय है, आश्विन कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन. कल से नवरात्रि का आरम्भ हो रहा है. सिक्किम में लोग आपदा से जूझ रहे हैं, वहीँ गुजरात में लोग नृत्य में झूम रहे हैं. अजब है यह गोरखधन्धा, स्वप्न में जी रहे हैं जैसे सभी लोग. ऊपर से तुर्रा यह कि यह स्वप्न केवल रात को ही नहीं चलता, दिन को भी चलता है. यह स्वप्न चौबीसों घंटे चलता है. वे एक बड़ी साजिश के शिकार तो नहीं बनाये गये हैं ...?


Wednesday, January 25, 2017

'द्रौपदी'-प्रतिभा राय


सिर में एक ध्वनि उसे स्पष्ट सुनाई दे रही है. आज ध्यान में ज्वाला की प्रतीति हुई, अग्नि में जलकर उसके सारे कल्मष नष्ट हो जाएँ, परमात्मा से यही प्रार्थना है. कल रात को अजीब सा स्वप्न आया और आज सुबह नैनी पर पल भर के लिए क्रोध भी किया. इन विकारों को स्वयं में नहीं मानती, स्वयं को शुद्ध, बुद्ध आत्मा ही मानती है वह और ध्यान में इसका अनुभव भी होता है, लेकिन अभी मंजिल मिली नहीं है. वह परमात्मा अनंत है. थोड़ी सी साधना से ही कृपा बरसने लगती है, लगता है अरे, वे तो इसके योग्य ही नहीं थे..आज गुलदाउदी के पौधे पुनः लगा दिए. कल जून लौट आए और शायद अपने होश में पिछले कई वर्षों में पहली बार उन्हें ऐसा लगा हो कि कहीं कोई विरोध का एक अंश भी नहीं है, पूर्ण स्वीकृति और शायद इससे ही मुक्ति का मार्ग मिलेगा. ‘व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति को वे जैसे हैं वैसा ही स्वीकारें’, इस सूत्र को जीवन में अभी तक पूरी तरह कहाँ उतार पायी थी.

ध्यान में जब होने का भाव यानि अहंता का लोप हो जाता है, चैतन्य नहीं बल्कि चैतन्य घन शेष रहता है, तब देह का भी भान नहीं रहता, जगत लोप हो जाता है. अभी उसे स्वयं का बोध रहता है, कभी क्षण भर के लिए शुद्ध चेतना शेष रहती भी है तो बीच-बीच में व्यवधान पड़ जाता है. एक तैल धारवत् स्थिति देर तक नहीं टिक पाती. यही अहंता है. इसी जन्म में उसे पूर्ण समाधि का अनुभव होगा ऐसा उसका पूर्ण विश्वास है. सद्गुरू और परमात्मा की कृपा हर क्षण उसके साथ है. उसका अनुभव करने लगो तो अंत ही नहीं आता, वह बरस ही रही है, उनका पात्र जितना बड़ा हो उसी के अनुसार उन्हें मिलती है. सभी के भीतर यह क्षमता है कि उस कृपा को पाले लेकिन लीला के अनुसार हरेक को अपना पात्र निभाना है. अहंकार का विसर्जन ही नहीं हो पाता यही सबसे बड़ी बाधा है. कल भी सुना, पहले भी सुना था सातवें चक्र तक साधक पहुँच जाता है पर आठवें  पर कोई-कोई ही पहुँच पता है. कृपा का भी गर्व हो जाता है. सब कुछ उसी का है, उसी का खेल है, स्वयं भी उसी का है.

आज ध्यान में स्वयं को सारी भावनाओं का स्रोत माना. यदि उनके भीतर किसी के प्रति प्रेम अथवा घृणा का भाव उठता है तो वह उनके ही भीतर से उपजा है. वे उस व्यक्ति पर प्रक्षेपित मात्र कर रहे हैं. उस भाव से उस व्यक्ति या परिस्थिति का कुछ भी लेना-देना नहीं है. इस ध्यान से वे कितने ही दुखों से बच जाते हैं. यदि वे अपने हर कम में पूर्ण चेतना का समावेश कर सकें तो हर कर्म ही ध्यान हो जायेगा और ऊर्जा भी व्यर्थ खर्च नहीं होगी. जब मन अनंत हो जाये तो नष्ट हो जाता है और शेष रहता है अनंत आकाश सा परमात्मा !

कल रात नींद में उसका हाथ हृदय पर आ गया था. स्वप्न में देखा, माँ छोटे भाई को बहुत डांट रही हैं, मार भी रही हैं, वह रो रहा है. नींद खुल गयी. एक कविता लिखी थी उन बच्चों के लिए जो माता-पिता के क्रोध का शिकार बेवजह ही हो जाते हैं, उसी का परिणाम था यह स्वप्न. अपने प्रियजनों को वे ही दुःख देते हैं. अपने स्वप्न भी खुद ही बनाते हैं. कल पूजा के लिए कपड़े लाये वे, उनके यहाँ काम करने वालों के लिए, दशहरा अब निकट ही है और दीवाली को भी कम समय रह गया है. पिताजी अष्टमी की पूजा में कन्याओं को स्टील के ग्लास देना चाहते हैं.


दो दिन कुछ नहीं लिखा. कल विश्वकर्मा पूजा थी और परसों ‘द्रौपदी’ पढ़ती रही. प्रतिभा राय की पुस्तक बहुत अच्छी है, पूरे मनोयोग से लिखी गयी है. टीवी पर बापू की ऑस्ट्रेलिया में हो रही कथा ‘मानस मृत्यु’ का प्रसारण हो रहा है. आज का ध्यान भी अच्छा था. उसे अपने भीतर ही सडकें तथा ट्रैफिक दिखा..उनके भीतर ही सारा विश्व समाया है, वे अनंत हैं, व्यर्थ ही स्वयं को सीमित मानकर दुखी होते हैं. आज धूप तेज है, सूर्य अपनी पूरी शक्ति के साथ दमक रहा है. वह पंखे के ठीक नीचे फर्श पर बैठकर लिख रही है.   

Tuesday, January 24, 2017

मुम्बई की बाढ़


उसने विमल मित्र को पढ़ा और उसके बाद एक कविता लिखी, शब्द अपने थे पर प्रभाव तो यकीनन पढ़े हुए का था. यह भी तो चोरी हुई, विचारों की चोरी भी उतना ही बड़ा पाप है जितना वस्तुओं की चोरी का, यह बात अब समझ में आने लगी है. भीतर ज्ञान का अनंत स्रोत है, जहाँ से शब्दों की नदियाँ बह सकती हैं, फिर क्यों संस्कार वश दूसरों की ईंटों से अपना भवन तैयार करना. आज भी गर्मी बहुत है. उसने सिन्धी कढ़ी बनाई है. आज वे अपनी वसीयत लिखने वाले हैं.

परसों जो गतिरोध उत्पन्न हुआ था, वह कल टूट गया. अन्ना हजारे का अनशन कल समाप्त हो गया, अब वह अस्पताल में हैं. देश की हवा बदल रही है. अमेरिका में तूफान आया है. दिल्ली में लोग जश्न मना रहे हैं. लन्दन में भी सड़कों पर कार्निवाल है. समाचारों में सुना कई राज्यों में बाढ़ आयी है. मुम्बई में वर्षा का पानी सडकों व रेल पटरियों पर भर गया है. असम के धेमाजी में भी बाढ़ ने भीषण रूप ले लिया है. इटली में ज्वालामुखी फट गया है. एक बेटे ने अपनी बानवे वर्षीय माँ को घर से निकाल दिया, उसे वह मकान किराये पर चढ़ाना था. जीवन कितने विरोधाभासों से युक्त है. द्वंद्व ही जीवन का दूसरा नाम है, जो इसके पार हो गया, वही यहाँ मुक्त है और वही सुखी है. शेष तो एक भ्रम में जी रहे हैं. कल इतवार की योग कक्षा में बच्चों को पूरे दो घंटे व्यस्त रख सकी. वे ख़ुशी-ख़ुशी सब बात मानते हैं, अभी मासूम हैं. उस दिन उसने स्वप्न देखा, कार में एक परिचिता के साथ जा रही है पर जाना कहाँ हैं पता नहीं, स्वप्न का क्या अर्थ था कौन जानता है, लेकिन उसने यही लगाया कि कोई भेद नहीं रहा अब अर्थ युक्त और अर्थ हीन में, भीतर-बाहर में. सारे आवरण गिर गये हैं. जून ने भी आज अपना स्वप्न बताया. वह एक द्वीप पर पहुँच गये हैं. एक आदिवासी व्यक्ति उन्हें समुद्रतट पर ले जाता है. सुंदर तट है पर अचानक लहरें चढ़ आती हैं और वह किसी तरह रेलिंग को पकड़ कर बच जाते हैं.


आज एक नये तरह का ध्यान किया. देह ऊर्जा का एक केंद्र है. ऊर्जा का चक्र यदि पूर्णता को प्राप्त न हो तो जीवन में एक अधूरापन रहता है. प्रार्थना में भक्त भगवान से जुड़ जाता है और चक्र पूर्ण होता है, तभी पूर्णता का अहसास होता है. हर व्यक्ति अपने आप में अधूरा है जब तक वह किसी के प्रति समर्पित नहीं हुआ. यही पूर्णता की चाह अनगिनत कामनाओं को जन्म देती है. व्यर्थ ही इधर-उधर भटक के अंत में एक न एक दिन व्यक्ति ईश्वर के द्वार पर दस्तक देता है. इस मिलन में कभी आत्मा परमात्मा हो जाता है और कभी परमात्मा आत्मा. उसने भी आज प्रार्थना में तीनों गुणों से मुक्त होने की प्रार्थना की. तीनों एषनाओं से मुक्त होने की प्रार्थना. माँ होने का सुख, शिशु को बड़ा होता हुआ देखने का सुख तो वर्षों पहले मिल गया, अब कितना सुख चाहिए. व्यस्क होने के बाद व्यक्ति स्वयं अपने भले-बुरे का जिम्मेदार होता है. उसका मन जहाँ जहाँ अटका है, उसे वहाँ-वहाँ से खोलकर लाना है. इस जगत में या तो किसी के प्रति कोई जवाबदेही न रहे अथवा तो सबके प्रति रहे. एक साधक का इसके सिवा क्या कर्त्तव्य है कि भीतर एकरसता  बनी रहे, आत्मभाव में मन टिका रहे. जीवन जगत के लिए उपयोगी बने, किसी के काम आए. अहम का विसर्जन हो. वह परमात्मा ही उनका आदर्श है जो सब कुछ करता हुआ कुछ भी न करने का भ्रम बनाये रखता है..चुपचाप प्रकृति इतना कुछ करती है पर कभी उसका श्रेय नहीं लेती..फूल खिलने से पहले कितनी परिस्थितियों से दोचार नहीं होता है, बादल बरसने से पहले क्या-क्या नहीं झेलता.. और वे हैं कि हर कम करने के बाद औरों के अनुमोदन की प्रतीक्षा करते हैं. वे भी छोटे-मोटे परमात्मा तो हैं ही, मस्ती, ख़ुशी तो उनके घर की शै है, इन्हें कहीं मांगने थोड़े ही जाना है. ज्ञान का दीपक सद्गुरू के रूप में जल ही रहा है.