Friday, June 15, 2018

विश्व सांस्कृतिक समारोह



सुबह आँख जल्दी खुल गयी थी, यहाँ छह बजे तक अँधेरा रहता है. कुछ देर ध्यान किया, ‘अपने’ घर तक यात्रा की जो उनका वास्तविक घर है. यह संसार तो कुछ पलों का ही खेल है. उस लोक में जाना अब पलों में घट जाता है. इस संसार से कोई मोह न रहे तभी ऐसा होता है, शास्त्रों में कितना सही लिखा है, वैराग्य में कौन सा सुख नहीं है. आज ही समारोह है, जिसके लिए वह आई है. एनजीटी  ने पांच करोड़ का जुरमाना लगाया है पर गुरूजी कहते हैं वे नहीं देंगे. असम का आर्ट ऑफ़ लिविंग का दल दिल्ली पहुंच गया है. उत्सव स्थल की तस्वीरें व्हाट्सअप ग्रुप पर डाल दी गयी हैं. एक घंटे बाद उन्हें यात्रा के लिए निकलना है.

दो बजे वे दिल्ली स्टेशन पहुंचे. दो मेट्रो बदल कर घर पहुंचे और भोजन किया जो भाभी ने साथ में दिया था पर ट्रेन में नहीं खा सके. तीन बजे घर से निकले, द्वारिका के सेक्टर बारह के मेट्रो स्टेशन पहुंचे, जहाँ लोगों की बहुत भीड़ थी. डेढ़ घंटे बाद ‘मयूर विहार एक्स्टेंशन’ पहुंचे, वहाँ भी भीड़ का वही आलम था, बाहर निकले तो वर्षा आरम्भ हो गयी. कुछ देर रुककर थमने की प्रतीक्षा की फिर चल पड़े. कीचड़ और फिसलन भरे रास्ते पर ढाई-तीन किमी भीड़ में धीरे-धीरे चलते हुए यमुना तट पर आर्मी द्वारा बनाया गया पुल पार किया. आयोजन स्थल पर आये तो कुर्सियां भीगी हुई थीं, उन्हीं पर बैठे पर स्टेज से काफी दूर बैठे थे सो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और सामने बैठे लोग खड़े हो गये थे. मंत्रोच्चार सुना, फिर कथक नृत्य हुआ, पर मन अधिक उत्साहित नहीं था, थके पैर, भीगे वस्त्र, ठंडी हवा चल बह रही थी, सो सोचा वापस ही चलते हैं. इतनी यत्नपूर्वक की गयी यात्रा के बाद फिर वैसी ही भीड़ में वापसी की यात्रा..कीचड़ भरे रास्ते पर नृत्य करके आते हुए कलाकार भी चल रहे थे. सुंदर वस्त्र पहने, घाघरा जरा सा टखनों से ऊपर कर नंगे पावों चलती छोटी-छोटी लडकियों को देखकर उन पर करुणा आ रही थी, पर वे सब उत्साह से परिपूर्ण थीं. गुरूजी ने सबको एक अनोखे जोश से भर दिया है. सारे कष्ट सहते हुए भी सभी हंसते रहते हैं. दुनिया के १५५ देशों के कलाकार और प्रतिनिधि आए हैं या इसे देख रहे हैं. अद्भुत कार्यक्रम है यह अपने आप में अनोखा. घर पहुंचे तो पौने दस बज चुके थे, भीगे वस्त्र बदले और गर्म-गर्म चॉकलेट वाला दूध पिया. चीज का परांठा खाने में बनाया, फिर एक घंटे बाद ही नींद आई. 

पौने तीन बजे हैं. वे विश्व सांस्कृतिक समारोह के लिए बनाये गये विशाल आयोजन स्थल पर आ चुके हैं. सामने विशाल स्टेज है, जिस पर रिहर्सल चल रही है. नेपाल का नृत्य हुआ, फिर घूमर नृत्य, इस समय जर्मनी की रिहर्सल चल रही है जो एक समूहगान गा रहे हैं. हजारों लोग अभी से आ चुके हैं. शाम होते-होते सभी कुर्सियां भर जाएँगी. साढ़े ग्यारह बजे वे घर से निकले थे, कल शाम भर वे सब मिलकर टीवी पर कार्यक्रम का लाइव प्रसारण देखते रहे. अभी-अभी जून का फोन आया, कह रहे थे छह बजे ही वापसी के लिए रवाना हो जाना चाहिए, पर वे आठ बजे वापस जायेंगे. आज वर्षा के आसार नहीं हैं. अभी कार्यक्रम शुरू होने में दो घंटे हैं, मोहक संगीत बज रहा है. पाकिस्तान से भी एक सूफी गायकी का समूह आया है. सीरिया के एक मुफ़्ती भी आये हैं. नरेंद्र मोदी, शिक्षा मंत्री, गृह मंत्री तथा कई अन्य राजनेता भी उपस्थित हैं. श्री श्री ने कहा है यह उनका प्राइवेट कार्यक्रम है, सही है क्योंकि सारा विश्व ही उनका परिवार है. अध्यात्म अणु से विभु बना देता है. लोगों का ताँता लगातार लगा हुआ है. भारत के कोने-कोने से इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए लोग आए हैं. नृत्य और संगीत का आनन्द लेने तथा गुरूजी का दर्शन पाने. पुलिस के सिपाही भी जगह-जगह तैनात हैं, महिला पुलिस भी उतनी ही तत्परता से काम कर रही है. इस समय स्टेज पर सुंदर पीत वस्त्र पहने कलाकार बालाएं तैयार हैं. भाई सर पर छाता लगाये शांति से बैठे हैं, उन्हें भी उसके साथ धूप में बैठना पड़ रहा है. बड़े से घूमते हुए रॉड से कैमरा घूम-घूम कर तस्वीरें ले रहा है. कुछ स्वयंसेवक जगह-जगह से कूड़ा उठा रहे हैं, इस जगह को साफ करके ही वापस सौंपना है. आज के कार्यक्रम में श्रीखोल(एक प्रकार का ढोल) का वादन है तथा बीहू नृत्य भी. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की ग्रैंड सिम्फनी का तो कहना ही क्या जिसमें साढ़े आठ हजार कलाकार हैं जो पचास तरह के वाद्य यंत्र बजा रहे हैं. सात बजे तक लोगों की भीड़ इतनी अधिक हो गयी कि कुछ लोग सामने आकर खड़े हो गये, उन्होंने वापस जाने का मन बनाया. लौटते समय विशाल जनसमूह को देखकर, जो शांति से बैठकर कार्यक्रम का आनन्द ले रहे थे, मन में गर्व का अनुभव हुआ. लोगों की एक बड़ी भीड़ अभी भी आया रही थी, उतने ही लोग वापस भी जा रहे थे, पौने तीन घंटे की यात्रा के बाद घर पहुंचे.

आज सुबह साढ़े पांच बजे स्वतः ही नींद खुल गयी, नहा धोकर साढ़े छह बजे ही तैयार थी. मंझली भाभी के यहाँ चाय पी, उसने लंच पैक भी दिया. भाई एअरपोर्ट ले आए. उन्होंने इस सात-आठ दिनों में उसका बहुत ध्यान रखा. उनका स्वभाव बहुत कोमल है, हृदय सदा सभी की सहायता के लिए तत्पर रहता है. उनके हृदय में भाभी के प्रति एकनिष्ठ प्रेम की ज्योति जल रही है. एकमात्र पुत्री को भी वे बहुत स्नेह करते हैं. ध्यान की उनकी समझ भी गहरी है. ईश्वर उन्हें प्रसन्न रखे. जीवन के इस मोड़ पर पर उन्हें ईश्वरीय शांति ही आगे बढ़ते रहने का बल प्रदान कर सकती है.   


Thursday, June 14, 2018

रिश्तों का इन्द्रधनुष



साढ़े दस बजे हैं सुबह के, कुछ देर पहले ही वह बड़े भाई के साथ एक पार्क में टहल कर आई है. दिल्ली की हर कालोनी में पार्कों की सुंदर व्यवस्था है, बढ़ते हुए प्रदूषण से राहत पाने का एकमात्र सरल उपाय. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के पैंतीस वर्ष पूरे होने पर दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम में सम्मिलित होने वह कल ही असम से एक सप्ताह के लिए यहाँ आई है. वे घर में प्रवेश कर ही रहे थे कि जून का फोन भी आया, वह ठीक हैं, आए दिन के टूर के कारण अब उन्हें भी अकेले रहने की आदत हो गयी है, स्वयं पर निर्भर हो गये हैं. यहाँ घर में काफी अस्त-व्यस्तता है, लगभग एक वर्ष पूर्व भाभी के चले जाने के बाद यह स्वाभाविक भी है, उनकी छाप घर के हर कोने में है, सामने ही उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीर रखी है लगता है अभी बोल पड़ेंगी. सोच रही है सफाई का काम कहाँ से शुरू करे, या महरी के आने के बाद ही उचित रहेगा. भाई नित्य की साधना कर रहे हैं. कल रात छोटी भाभी ने डिनर के लिए बुला लिया था, वहाँ से लौटे तो कुछ देर ठंडी हवा में टहलते रहे. भाई सोने चले गये, पर उसे देर रात तक नींद नहीं आ रही थी, ‘शिवरात्रि’ को जागरण करना चाहिए यह लिखा ही है शास्त्रों में. सो देर तक ध्यान करती रही. अभी उत्सव में तीन दिन शेष हैं, परिवार के अन्य जनों से मिलने आज दोपहर को ‘घर’ के लिए निकलना है.

सुबह पांच बजे ही नींद खुल गयी. चालीस मिनट तक खुली हवा में भ्रमण किया, प्राणायाम भी, तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. सदा की तरह पिताजी ने सुबह ही रेडियो पर ‘विविध भारती’ लगा दिया है. कल शाम सात बजे वे यहाँ पहुँच गये थे. पिताजी, छोटी भाभी व उनके माता-पिता सभी ने स्वागत किया. ‘एओएल’ के कार्यक्रम के बारे में बातचीत हुई. आज कोर्ट में सुनवाई है. पर्यावरण को इस कार्यक्रम से खतरा है, इस बात के आधार पर जन याचिका दायर की गयी है. शाम को छोटा भाई भी आ गया, उसने पिताजी को ‘किन्डल’ दिया, भाई ने उसमें कई किताबें डाउनलोडन कर दी हैं. कल देहरादून जाना है, जहाँ दीदी व बड़ी बुआ जी रहती हैं. आज कुछ उपहार लेने बाजार जाना है.

आज सुबह भी जल्दी उठे वे. पौने आठ बजे वे घर से चल दिए. चौक तक जाने के लिए सीधी सड़क मिलेट्री की भर्ती की कारण बंद थी सो काफी घूम कर जाना पड़ा. गन्तव्य तक पहुंचने में ढाई घंटे लग गये. बुआजी के पैर का कुछ महीने पहले आपरेशन हुआ था, वॉकर के सहारे चल रही थीं. उन्होंने सुंदर वस्त्र पहने थे तथा एक शांत व सुंदर वृद्धा लग रही थीं. उनका पोता व पोती, दोनों बच्चे भी बहुत सुंदर व स्मार्ट लग रहे थे. गली भी साफ-सुथरी थी. देश में चली विकास की लहर का असर हो सकता है. वहाँ से फिर वे दीदी के यहाँ गये. छोटी व बड़ी भांजियाँ उनके दोनों पुत्र व पुत्री, बड़ी की सास तथा पति, दीदी व जीजाजी सभी ने स्वागत किया. उनके बगीचे से तोड़ा गन्ना व खट्टे-मीठे लुकाठ खाए तथा ढेर सारा पुदीना व कच्चे पपीते लेकर वे लौट आये. रास्ते में ममेरे, चचेरे व फुफेरे भाई-बहनों से फोन पर बात की. इस समय रात्रि के पौने दस बजे हैं. भाई पापाजी को ध्यान के सूत्र समझा रहे हैं. आज से कुछ वर्ष पहले वह इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि उन दोनों में आत्मीयता इतनी बढ़ सकती है. उसे अच्छा लग रहा है यह देखकर कि भाई बहुत शांत हो गये हैं तथा ध्यान करने लगे हैं. दीदी भी हर घटना के पीछे सकारात्मकता ही देखती हैं. कुल मिलाकर आज की यात्रा अच्छी रही, उसे स्वयं थोड़ा कम बोलना चाहिए, अभी भी वाणी पर संयम नहीं है. कल सुबह वापस दिल्ली जाना है.

Wednesday, June 13, 2018

अच्छाई की कठिनाई



Just now she saw some documentary on solar system. It is amazing to see the Sun,  Moon , movement of earth and other planets. The universe is so vast and no one knows how vast it is! Only God knows but no one knows God! He only knows himself. Today she went to school, did some yoga exercices. Children love to laugh, elders also. Peace and happiness, they feel after each session is contagious. Yesterday Jun said she may go to Delhi for three-four days during world cultural festival of art of living. In the morning she saw once again the dream of nice food, she has food vasnaas, will get rid of them also with the grace of God! He is so powerful and so loving. While coming back from school, she went to see the company guest house garden. It is an amazingly beautiful garden with so many flowers at one place. Today she also saw the video of Anita Moorjani, who had cancer and went in coma, then she came back and got healed up. She experienced her true self.
अभी-अभी दीदी व बड़े भाई से बात की. ढेर सारे समाचार मिले. भाई बिटिया के घर पर रह रहे हैं, परसों नन्हे से मिलने जायेंगे. दीदी के घर छोटे बेटे की वधू तथा उसकी माँ आने वाले हैं. होली से पहले लंच पार्टी होगी. आजकल वह गुरूचरणदास की किताब पढ़ रही है ‘अच्छाई की कठिनाई’. जिसमें महाभारत के पात्रों को लेकर जीवन के मूलभूत प्रश्नों का विश्लेष्ण किया गया है. समाधि के बार में सुना, समाधि में वही जा सकता है जिसे मृत्यु का भय न हो. कल उन्हें मृणाल ज्योति जाना है. विशेष बच्चों को योग कराके ख़ुशी मिलती है. ख़ुशी बांटने से ही बढ़ती है, इसका तो पता चल चल गया है, और उनके पास है ही क्या बांटने को..वही तो एकमात्र अपनी संपदा है, ख़ुशी, प्रेम, शांति और आनन्द ...
पिछले दिनों एक स्वपन देखा, अथवा तो दृश्य देखा, पूरा होश था देखते समय कि किसी जन्म में उसका विवाह एक ऐसे परिवार में होता है जो चोरी के कर्म में लिप्त है. इसलिए भीतर चोरी के भय का संस्कार समा गया है, यदि कोई वस्तु निर्धारित स्थान पर नहीं मिलती है तो झट पहला ख्याल आता है चोरी न हो गयी हो. एक क्षण का शतांश भी नहीं लगता इस विचार को आने में पर अगले ही क्षण अपनी मूर्खता पर हँसी आती है. उनके संस्कार कितने दृढ़ होते हैं. इन्सान उनके हाथों का एक खिलौना ही तो है यदि सजग न रहे, यदि ज्ञान में स्थित न हो ! इसी तरह देह के प्रति आकर्षण का संस्कार जिसका जितना गहरा होता है, वह अन्यों को वस्तु रूप में ही देखता है, जड़ वस्तु के रूप में. चेतन का उसे बोध ही नहीं होता, मन ही मनुष्य के बंधन का कारण है ! योग वसिष्ठ में इसी बात को समझाया गया है.
पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. जून के आने पर दिनचर्या बदल जाती है, समय की सीमा का ध्यान रखना होता है. आज वह दिल्ली जा रही है. भाई लेने आयेंगे. कल वहीं से पिताजी से मिलने तीन दिनों के लिए घर जाएगी. बाद में दिल्ली में ‘विश्व सांस्कृतिक सम्मेलन’ का तीन दिन का कार्यक्रम है. आज महा शिवरात्रि है, हो सका तो रात को जागरण करेगी, कल दोपहर को फ्लाइट में सोया जा सकता है. उसकी अनुपस्थिति में भी घर में योग कक्षा चलती रहे इसका प्रबंध करके जाना है. आज एक परिचिता के यहाँ किसी काम से गयी तो उनका बगीचा देखा, बहुत सुंदर है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, कुछ देर पहले उसने मंझली भाभी से बात की थी. जून ने भाई से बात की, शाम को एयरपोर्ट से वह मेट्रो से घर ले जायेंगे. उनके घर की सफाई भी करवानी है, कल करेंगे, भाभी की स्मृति में होने वाले हवन की तैयारी भी. जब जिस वक्त जहाँ जो जरूरत होती है. अस्तित्त्व उसकी तैयारी कर ही देता है, वे निमित्त मात्र ही बनते हैं.

Monday, June 11, 2018

नीरजा - एक वीरांगना



कुछ लिखने के लिए कलम उठायी है, पर क्या लिखे ? सुबह की शुरुआत प्रातः भ्रमण से हुई. हवा में हल्की ठंडक थी और फूलों की गंध भी. अभी ग्रीष्म आने में देर है, सो इस मॉडरेट मौसम का भरपूर लुत्फ़ उठाया जा सकता है. उसके बाद स्कूल गयी, बच्चों को योग करने में आनंद आता है, लेकिन स्कूल के प्रबंधक सिर्फ आधे घंटे का समय देते हैं वह भी सप्ताह में एक बार. शुभता का प्रतीक योग कब शिक्षा का मुख्य अंग बनेगा, यह सोचने की बात है. एक नई कविता लिखी आज. निराला की एक कहानी पढ़ी. बच्चन की कविता पढ़नी अभी शेष है. शाम को जून के एक सहकर्मी भोजन के लिए आ रहे हैं. नैनी सब्जी काट रही है, उसके बाद वह पाकघर में जाएगी. कल इतवार था, उसने सुबह योग कक्षा ली और जून ने दोसे के नाश्ते की तैयारी कर ली, छुट्टी के दिन उन्हें भोजन बनाने में बहुत आनंद आता है. बचपन में उनके घर से स्कूल जाते समय हलवाई की दूकान पड़ती थी, वह रोज ही देखा करते थे, शायद वही संस्कार मन पर हैं. कल शाम क्लब में सत्य घटना पर आधारित फिल्म ‘नीरजा’ देखी, बहुत अच्छी फिल्म है. जिसमें तेईस वर्ष की एक एयर होस्टेस लड़की अपनी जान की परवाह नहीं करती और कराची से अपहरित विमान के यात्रियों की जान बचाती है. उसे मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था. कुछ आत्माएं इस धरती पर अल्पकाल के लिए आती हैं, पर कोई ऐसा कारनामा कर जाती हैं कि उनका नाम अमर हो जाता है.

मार्च का प्रथम दिन ! सुबह समय से उठे वे, ठंड अब घट गयी है, पांच बजे ही दिन निकल आता है. प्राणायाम किया, निशब्द में टिकता है मन अब शीघ्र ही. नाश्ते में बंगलूरू से लाया दलिया बनाया, जिसमें दिल्ली से लाया गुड़ मिलाया. व्हाट्सएप, फेसबुक और ब्लॉग पर सबसे दुआ-सलाम हुई. दोपहर को सिर्फ चावल पकाए, शेष कल रात के राजमा और धनिये वाले आलू. बच्चन की कुछ कविताएँ पढ़ीं, बापू की मृत्यु पर उन्होंने कई कालजयी कविताएँ लिखी हैं. बाल्मीकि रामायण का एक और सर्ग ब्लॉग पर लिखा. रॉबिन शर्मा का एक वीडियो देखा, अच्छी बातें सुझाई हैं उन्होंने. टैगोर, निराला, देवदत्त पटनायक को भी पढ़ा, भगवद गीता का एक श्लोक भी, सारे साधु एक मत, सत्य एक है, उसके खोजी अलग-अलग हो सकते हैं पर अनुभूति एक सी होती है. योग वशिष्ठ के भी दो पेज पढ़े, अद्भुत पुस्तक है. मानव इसी देह में अनंत सुख पा सकता है, बिना कुछ भी किये. मन के द्वारा ही वह दुःख पाता है, जो मन से मुक्त हुआ वह आनन्द का अनुभव करता है.

Friday, June 8, 2018

इमर्सन के अनमोल वचन


कल कुछ नहीं लिखा, दोपहर को जून चेन्नई के लिए रवाना हो गये, उसके बाद सिर में दर्द के कारण सो गयी, उठी तो तीन बजे थे, भूख तब भी नहीं लगी थी. रात्रि को योग कक्षा के बाद ही भोजन किया. पित्त बढ़ने के कारण ही ऐसा हुआ होगा. नींद से उठाने के लिए एक स्वप्न आया, महिला क्लब की मीटिंग उनके यहाँ है, पर उसने उनके लिए भोजन आदि की कोई व्यवस्था नहीं की है. उसी स्वप्न में माँ-पिताजी को भी देखा. बाद में पिताजी से फोन पर बात की, वह अपने भोजन के लिए कहने दुकान पर गये थे, होटल वाला सुबह शाम घर पर ही टिफिन दे जायेगा. भाभी कुछ दिनों के लिए मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. वह बड़ी बेटी हैं और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं

आज सुबह स्कूल गयी, खड़े होकर करने वाला ध्यान कराया, अच्छा रहा. उसका मौन ही उन्हें कुछ दे सकता है, उसके भीतर का मौन ! ध्यान साक्षी में टिकना ही है. भीतर जो सन्नाटा है, स्थिरता है, एकरसता है, वही साक्षी है. जो सबकुछ देखता रहता है, पर अचल रहता है. आज सिर में दर्द नहीं है, यह भी वह देख रहा है, दर्द के कारण भीतर गहराई में जाने का अवसर मिला. पुराने संस्कार से मुक्ति का अवसर भी मिला. सद्गुरू से वार्तालाप करने का भी ! शाम को एक घंटा कैसे बीता, पता ही नहीं चला. ज्ञान के पथ पर चलना सचमुच तलवार की धार पर चलने जैसा है, पर एक बार जिसे साक्षी में टिकना आ जाये, उसके लिए यह श्वास लेने जितना सहज है.

शाम के पौने छह बजने को हैं, कुछ देर पहले लाइब्रेरी से पुस्तकें लेने गयी, आज शुक्रवार है, सो लाइब्रेरी बंद थी. जून वापस आकर क्लब में चल रही एक सरकारी मीटिंग में चले गये हैं. ढेर सारे फल लाये हैं और मेवे भी, कई तरह की चाय भी. आज सुबह ध्यान में एक दृश्य देखा, प्लेट में चाय डालकर कोई दे रहा है. बचपन में सुबह का नाश्ता होता था चाय के साथ तिकोना परांठा. तब से कितने गहरे संस्कार मन पर पड़ गये हैं, पर इनसे मुक्त होना ही है. इस समय कितनी शांति प्रतीत हो रही है. जब कोई इच्छा नहीं रह जाती, तब ऊर्जा स्वयं पर लौट आती है. स्वयं से मिलन होता है और तब परमात्मा के सम्मुख जाने लायक वे होते हैं. आज भी पिताजी से बात की, उन्होंने कहा, ओशो की एक किताब में पढ़ा, अंग्रेजी के लेखक इमर्सन ने कहा है, शिक्षा का अर्थ शाब्दिक ज्ञान नहीं है, वह ज्ञान जो व्यक्त्तित्व से झलकता है, वही शिक्षा है. जो किसी के होने मात्र से झलकती है, व्यवहार से झलकती है, वही शिक्षा है. आत्मा के बारे में कोई कितना भी ज्ञान सुन-पढ़ ले, जब तक निरंतर आत्मा में स्थिति नहीं हो जाती, तब तक लक्ष्य से दूरी बनी ही हुई है.

साढ़े नौ बजे हैं रात्रि के, जून अभी तक क्लब से नहीं आये हैं, दस बजे तक आयेंगे सम्भवतः. मन आज कितना हल्का है, जैसे हो ही न. शाम को लाइब्रेरी से हिंदी की दो किताबें लायी, निराला की कहानियाँ और बच्चन की कविताएँ. सेक्रेटरी का फोन आया, कल मीटिंग है और कल ही शाम को क्लब में ‘’नीरजा’ फिल्म है. नन्हे से बात की, वह घर का काम करवा रहा है, काफी कुछ खराब था, विशेष तौर से नल आदि, जो बदलवाने पड़े हैं, इसी माह में वह शिफ्ट हो जायेगा. सुबह घर का साप्ताहिक सफाई का दिन था, हीटर व ब्लोअर अब पैक करके रख दिए हैं, रजाई भी वापस अपने स्थान पर चली गयी है. कल फरवरी का अंतिम दिन है. आज इस मौसम में पहली बार सुबह से स्वेटर नहीं पहना है. आम के पेड़ पर बौर आ गया है और कंचन भी खिल गया है, हालाँकि बहुत अधिक फूल अभी नहीं आये हैं. मालिन ने बताया, माली सुबह से पीकर पड़ा है, दोपहर को उसने भोजन भी नहीं किया. आदमी कितना बेसमझ है, कितना दुखी भी, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है. आज कई दिनों के अख़बार खंगाले. उनके अनुसार देश के हालात कुछ ठीक नजर नहीं आते. देशभक्ति के नाम पर कुछ लोग बवाल कर रहे हैं और कुछ लोग देशद्रोह को अपना रहे हैं. समाज में एकरसता की जो धारा थी वह सूखती जा रही है. भारत को जोड़ने वाला जो एक सूत्र था वह कहीं खो गया सा लगता है !  


Thursday, May 24, 2018

देव दत्त पटनायक की माय गीता



ग्यारह बजे हैं सुबह के. जून नये घर में हैं. काम शुरू हो गया है. मिस्त्री, प्लम्बर, बढ़ई सभी आ गये हैं. अभी कुछ देर पहले बड़ी भतीजी के लिए एक कविता लिखी. बंगाली सखी के लिए भी लिखनी है, उसके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, नये घर की बधाई दी है. एक सखी ने अपनी भतीजी के विवाह का कार्ड भेजा है.

परसों उन्हें वापस जाना है. दो दिन में घर काफी साफ हो जायेगा. जून आज भी वहीं गये हैं. नन्हा व उसके मित्र दफ्तर चले गये हैं. नन्हा कल रात देर से आया, फिर भी देर से सोया और अब उठकर चला गया है. उसकी दिनचर्या में कोई तारतम्य नहीं है, पर उसका काम ही ऐसा है. मानव मन व तन की सहनशक्ति अपार है. उसे परमात्मा ही शक्ति से भरता है. हर कोई अपने कर्मों के अनुसार ही पाता है तथा जीवन निर्वाह करता है. वहाँ असम में योग कक्षा सुचारुरूप से चल रही है. अब भविष्य में कभी भी उसे कहीं जाना हुआ तो मन में यह खेद नहीं रहेग कि साधिकाओं को कोई परेशानी होगी. यहाँ जो शिवकुमारी नाम की मेड आती है उसे अपने निर्धारित काम के अलावा कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती. इसी तरह लोग अपने को सीमित कर लेते हैं. असीम परमात्मा ही सीमित जीव बनकर देह में कैद हो गया है. मुक्तता का अनुभव इसी मानव देह में हो सकता है, पर मानव इतनी गहरी नींद सोया है कि उसे इस सत्य की कोई खबर ही नहीं लग पाती.

कल वे घर लौट आये हैं. इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं. मौसम बादलों भरा है. कल रात भर वर्षा हुई. बगीचा फूलों से भर गया है. डहेलिया, सिल्विया, एन्थ्रेनियम, कैलेंडुला, और भी जाने कितने फूल..एक हफ्ते में काफी परिवर्तन आ गया है मौसम में, अब बसंत पूरे निखार पर है, कंचन के विशाल वृक्षों में भी गुलाबी और श्वेत फूल दिख रहे हैं. सुबह स्कूल गयी थी, बच्चों को योग की कुछ क्रियाएं करवायीं. छोटी बहन से स्काइप पर बात हुई. बड़े भाई को घर में पूजा करवानी है, समय कितनी तेजी से बीत जाता है. भाभी को गये दस महीने हो गये हैं. पिताजी से भी बात हुई, वे अकेले हैं, भाभी मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. भाई कल शाम को घर आ रहा है. उसने इस बार देवदत्त पटनायक की पुस्तक, ‘माइ गीता’ खरीदी एअरपोर्ट से. जून ने कहा, फ्लिपकार्ट से यह पुस्तक आधे दाम में मिल रही है. पर फ्लाइट में पढ़ने का जो आनंद है, वह नहीं मिलता, फिर भी आगे से ध्यान रखना है. किताबें उसकी सबसे बड़ी मित्र हैं, ज्ञान की देवी सरस्वती इनमें ही तो बसती है !

Monday, May 21, 2018

मोटो जी का अलार्म



परसों रात साढ़े दस बजे वे यहाँ पहुँचे थे. कल शाम को टहलने गये. धूप तेज निकलती है यहाँ आजकल. एक कबूतर बाहर सूख रहे गमले से एक सूखी पत्ती का टुकड़ा अपनी चोंच में दबाकर ले गया है, शायद घर बनाएगा. जून नेत्रालय गये हैं. नैनी काम कर रही है. नन्हा व उसके मित्र, जो उसके साथ ही रहते हैं, पहले ही काम पर चले गये हैं, अब सभी देर शाम को वापस आयेंगे. नन्हा अभी तक अपने भविष्य के बारे में तय नहीं कर पाया है. वह अकेला ही रहना चाहता है, दो होकर भी अकेला, पता नहीं ऐसा कब तक चलेगा. समय कितना बदल गया है, अस्तित्त्व तो दूर स्वयं की भी खबर नहीं है. एक नींद में जैसे जी रहे हैं लोग, उसकी खुमारी को आनंद समझते हैं. जीवन की भव्यता और दिव्यता से सर्वथा अपरिचित ! उसे सभी के प्रति सहानुभूति होती है और यह भाव भी होता है, इसी तरह की या इससे भी गयी अवस्था में वह भी थी. ये भी एक दिन नींद से जगेंगे और तब धर्म के मार्ग पर कदम रखेंगे, खुद को जानने का प्रयत्न करेंगे. कल मकान की रजिस्ट्री हो जाएगी, परसों से सफाई का काम शुरू हो जायेगा. शनिवार को गृह प्रवेश के पूजन का कार्यक्रम होगा, इतवार को उन्हें वापस जाना है. नन्हा अगले महीने शिफ्ट करेगा, हो सकता है पहले ही कर ले.
आज से इस सोसाइटी में एक घर उनका अपना भी है. दस बजे से पहले ही वे रजिस्ट्रार के दफ्तर पहुँच गये थे. रजिस्ट्री हो गयी है. नन्हे और उसके नाम पर. अगली बार जब वे बंगलूरू आयेंगे तो नये घर में ही रहेंगे. शाम को जायेंगे वे उस घर में, कल से रंग-रोगन का काम आरम्भ हो जायेगा. छोटी बहन ने गाकर बधाई दी है नये मकान की, वह ऊर्जा से भरी है, सकारात्मक ऊर्जा ! ईश्वर उसे हर ख़ुशी दे !  उन्होंने ‘१९४७’ में दोपहर का भोजन खाया. रेस्तरां के नाम भी लोग बहुत चुन कर रखते हैं यहाँ. सुबह प्राणायाम के बाद आज अनोखे अनुभव हुए, कोई जैसे भीतर गा रहा था, पढ़ रहा था, सिखा रहा था. जैसे कोई सृष्टि के आरम्भ की बात समझा रहा था. सतयुग की बात और जीव के इस जगत में आने की बात. आरम्भ में सब कुछ नया होता है तो विकार रहित होता है फिर धीरे-धीरे परिवर्तन आता है. सद्गुरू की बताई साधना के बाद भीतर एक गहन शांति का अनुभव होता है. तभी वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग इस ज्ञान से जुड़ें. वह पांचवीं मंजिल पर है, नीचे से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही हैं. जून दूसरे कमरे में फोन पर बात कर रहे हैं, छुट्टी पर भी उनका दफ्तर चलता रहता है.

आज सुबह उसके पुराने मोटो जी के अलार्म से नींद खुली. वह जो एक बार गाड़ी में छूट गया था और जिसे वापस लाने के लिए ड्राइवर को एक हजार देने पड़े थे. बाद में एक दिन गिरकर जिसकी स्क्रीन टूट गयी थी, जिसे जून ने नोएडा में बदलवा दिया था, पर दो-तीन दिन ही चली नई स्क्रीन. इतने दिनों से बैग में बंद पड़ा था, आज अचानक उसकी घंटी पूर्व निर्धारित समय पर बजने लगी. शायद रोज बजती हो और उसने सुनी ही न हो...नींद खुलने के बाद कुछ देर ध्यान किया. किसी भी विधि से ध्यान करे, सभी अंत में एक हो जाते हैं, जिसके बाद मन खाली हो जाता है और तन हल्का. फेसबुक पर एक प्रसिद्ध तथा वरिष्ठ लेखक ने कहा है, मई में होगा हिंदी सम्मेलन. जोरहाट का माजुली भी उसका एक केंद्र है. वे अवश्य जायेंगे. माजुली देखने की उनकी इच्छा भी ऐसे पूर्ण हो जाएगी.