Monday, April 24, 2017

सूरज का लाल गोला

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नये वर्ष का चौथा दिन ! कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस वक्त भी बादल बने हैं. जून आज मुम्बई गये हैं, कल कोचीन जायेंगे. वे यात्रा के नाम से बहुत प्रसन्न होते हैं, उन्हें नये-नये स्थान देखना भी भाता है और यात्रा की परेशानियाँ जरा भी परेशान नहीं करतीं. महर्षि अरविन्द पर लिखी एक पुस्तक बंगलूरू की उस दुकान से खरीदी थी, जहाँ किताबें ही किताबें पड़ी थीं, सीढियों पर भी किताबें. महान योगी थे वे. संस्कार में आजकल सद्गुरु का पतंजलि योगसूत्र पर बोला भाष्य प्रसारित हो रहा है. बहुत सी बातें स्पष्ट हो रही हैं. कितना कुछ जानने को है अभी, अनंत है वह परमात्मा..वे तो कुछ भी नहीं जानते..कई बार ऐसा लगता है जैसे पहले वह जो जानती थी अब उतना भी नहीं जानती. जीवन एक रहस्य है जो जाना नहीं जा सकता, जीया जा सकता है. शाम गहराती जा रही है, पांच भी नहीं बजे हैं अभी दस मिनट शेष हैं.

ठंड आज कुछ ज्यादा है, स्वेटर के भीतर त्वचा और त्वचा के भीतर हाड़ों को छूती हुई. सुबह आसमान पर बादल थे या कोहरा, सब श्वेत था मध्य में लालपन लिए नारंगी सूरज का गोला आकाश में ऊपर तो चढ़ आया था पर अभी तक बालसूर्य सा लग रहा था. उसे देखकर मन कैसा उल्लसित हो उठा, जैसे परमात्मा के माथे पर लगा टीका हो या..एक और उपमा उस वक्त ध्यान में आई थी पर अब मन से पुंछ गयी है. कई बार ऐसी सुंदर पंक्तियाँ मन में कौंध जाती हैं पर तब लिखने का साधन नहीं होता. एक सखी का फोन आया था, भावुक है, कलाकार है, पर बोलती कुछ ज्यादा है. कल क्लब के वार्षिक उत्सव की कला प्रदर्शनी में उसकी कृति भी लगायी जाएगी, उसे आमंत्रित किया है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की, बार-बार फोन कट जाता था, पर वह कोशिश करते रहे जब तक बात पूरी नहीं हो गयी, जबकि वह एक बार कट जाने के बाद दुबारा प्रयास नहीं करती, उनसे सीख लेनी चाहिए. कल एक परिचिता आयीं थीं, सेंट जेवियर्स स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी कुछ असमिया कविताओं का हिंदी अनुवाद उसे देखने के लिए देकर गयी हैं. भविष्य में हिन्दी में यह किताब छपेगी, जिसमें भूपेन हजारिका, मामोनी और अब्दुल कलाम के लिए लिखी कविताएँ हैं.


आज धूप चमचमाती हुई निकली है. कल बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी की मंगनी तय हो गयी है, लड़का बंगाली है. उसने सोचा उसकी बंगाली सखी को सुनकर अच्छा लगेगा. आज सुबह टहलने गयी तो आई पौड पर मृत्यु पर प्रवचन सुना, कितनी अद्भुत व्याख्या करते हैं सद्गुरु ! टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. परमात्मा का बखान करते-करते थकते ही नहीं, गाए ही चले जाते हैं. इलाहबाद में कुम्भ का मेला लगने वाला है, करोड़ों लोग आएंगे उस परमात्मा का गुणगान करने ही तो. परमात्मा घट-घट वासी है पर वह नित नूतन है, बासी नहीं है. कल रात छोटे भाई को सुंदर प्रवचन देते सुना, अद्भुत स्वप्न था वह. रात को ध्यान करते-करते सोयी थी. अभी उससे बात हुई, कल रात उसे भी स्वप्न आया कि वह किसी को समझा रहा है बहुत विस्तार से, आश्चर्य है और नहीं भी, परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं ! भाई ने कहा वह इस बारे में ज्यादा बात करेगा तो उसकी आँखों से अश्रुपात होने लगेगा, उसने कहा, उसका यह तबादला भी कृपा से हुआ है, वह अपने सद्गुरु से जुड़ा है और वह उसे दिशा दिखाते हैं. सचमुच उसका समर्पण कहीं ज्यादा है.

Saturday, April 22, 2017

जीवन और मृत्यु

दिसम्बर का तीसरा सप्ताह और वर्षा होने के आसार...ठंड बढ़ाने का पूरा सरंजाम प्रकृति ने कर दिया है. आज सविता देव नहीं दिख रहे हैं, सूर्य विकास की प्रेरणा देता है, अपनी ओर बुलाता है. परमात्मा भी उन्हें अपनी ओर खींचता है, प्रेरणा देता है. वह उन्हें खुद सा बनाना चाहता है पर प्रयास उन्हें करना होगा. हाथ उठाना होगा, वह तो हाथ थामने को तैयार ही है. बादलों के कारण टीवी पर प्रसारण भी अटक रहा है. क्रिसमस और देव दीवाली पर उसे कविता व आलेख लिखने हैं. सभी को आभार के छोटे छोटे संदेश लिखने हैं जिनसे यात्रा वे मिले हैं. नये वर्ष के लिए नई कविता भी..जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए भी, पर जाते-जाते यह वर्ष कैसी दुखद घटना से सारे देश को हिला गया है. सुबह उठकर समाचारों में जब उस वीभत्स घटना के बारे में सुना तो मन कैसा भारी हो गया था. कुछ शब्द अपने आप ही निकल पड़े.

नारी की पूजा करने वाला
यह देश..
आज शर्मसार है !
जैसे चढ़ाया गया हो
किसी को
क्रूस पर
व्यर्थ न जाये
उसका भी बलिदान
मांग रही है इंसाफ
जिसके लहू की एक-एक बूंद

कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नन्हा नृत्य कर रहा है. दोनों पैरों को बहुत तेजी से तरंगित कर रहा है और अंत में नटराज की सुंदर मुद्रा में खड़ा हो जाता है, मंत्रमुग्ध करने वाला अद्भुत रूप था उसका..और भी कई स्वप्न देखे पर यही याद है. दीदी ने एक शुभ समाचार दिया, छोटी भांजी की पुनः मंगनी हो गयी और अब वह आस्ट्रेलिया में रहेगी अपने मंगेतर के साथ, जो स्वयं भी तलाकशुदा है. दोनों के जीवन में पुनः प्रेम का फूल खिलेगा.

दामिनी की अंततः मृत्यु हो गयी. सोलह दिसम्बर की रात से वह मौत से लड़ रही थी, जिन्दगी हार गयी, मौत जीत गयी, शायद उसका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता बना जाये. सरकार को जागना ही होगा आये दिन होने वाली ये घटनाएँ अब अनदेखी नहीं की जा सकतीं. महिलाओं को आतंक के वातावरण में जीने के लिए अब विवश नहीं किया जा सकता, उन्हें वस्तु की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. नारी के व्यक्तित्त्व को पनपने का मौका मिलेगा तो वह भी सबल बनेगी. अख़बार में महिलाओं के उत्पीड़न के समाचार पढ़कर मन कितना बेचैन हो जाता है.

कैसे कहें नये वर्ष की शुभकामनायें
जबकि सामने बिछी है जाते हुए वर्ष की
खून से लथपथ देह
पिछले वर्ष भी तो यही कहा था
पर नहीं रुका आतंक नहीं थमा मौत का तूफान
लील गया निर्दोष स्कूली बच्चों को
कभी राजधानी की सड़कों पर
अस्मत मासूमों की
इतना बेरहम हो गया है इन्सान
लाठियों, जुलूसों और विद्रोह की भाषा
बोलनी पड़ती है अपनों के खिलाफ..

नहीं तो कैसे मांगे इंसाफ और किससे ..?

Friday, April 21, 2017

विशालाक्षी मंडप


आज हफ्तों बाद लिख रही है. कितना कुछ है मन में जो अनकहा रह गया है. जून के मित्र की पुत्री के विवाह में सम्मिलित होने गये थे वे बनारस. विवाह सारनाथ में था, रात देर से लौटे, पर बिना ब्याह देखे, बारात देर से आयी. जून इस बार अपने एक पुराने मित्र से लगभग तीस वर्षों बाद मिले. ‘गंगा महोत्सव’ देखा और ‘देव दीपावली’ में हजारों दीपकों का प्रकाश, गंगा का तट जैसे दिव्य आलोक से भर गया था. कितना पैदल चलना पड़ा था, हजारों की भीड़ घाट की ओर जा रही थी. मुख्य आयोजन स्थल गंगा के पानी में ऊंचे मचान पर बना था, आरती का मंच अलग था. पिताजी बनारस में रह गये और व बैंगलोर चले गये.

बैंगलोर में नन्हे का घर, वह बहुत परिपक्व लग रहा था इस बार, खुश व शांत भी. उनका बहुत ध्यान रखा. नया बेड लाया, और भी कई सामान, अलमारी का एक खाना भी उसने खाली करके रखा था, जैसे वह करती है और बचपन से वह देखता आ रहा है. अपने मित्रों का भी बहुत ध्यान रखता है. उसे इतनी अच्छी तरह से भोजन परोसते देखना भी अच्छा लगा, चाय बनाना भी सीख गया है पर चाय पत्ती कुछ ज्यादा डालता है. उसने बताया एक बार घर में चोर आ गया था तो दौड़ कर उसने उसका पीछा किया, वहीं एक फिल्म भी देखी, ‘लाइफ ऑफ़ पाई’ बहुत पहले किताब पढ़ी थी. प्रकृति के मोहक व भयानक रूप के बहुत सुंदर दृश्य थे. नन्हे को याद था कि उसने उसे यह कहानी सुनाई थी.

उसके बाद आश्रम में बिताये दिन. बुहारी लगाने की सेवा और वह चमत्कार. गुरूजी के न होने पर भी उनकी उपस्थति का अहसास. आश्रम के कुत्तों का स्नेह प्रदर्शन, कोर्स के दौरान आश्रुओं की बाढ़ व नृत्य की छटा..सब कुछ कितना अद्भुत था तब. उस दिन सुबह उठे तो मन में उत्साह था, आज आश्रम जाना है. दोपहर को टैक्सी बुलाई थी. रास्ते में अपना निर्माणाधीन घर देखा. आम के एक पेड़ पर अम्बियाँ लगी थीं, सर्दियों में आम देखकर मन अचरज से भर गया. आश्रम पहुंचे और रजिस्ट्रेशन कराया. उन्हें बुद्धा में रहना था. कमरे में दो अन्य जन थे. एक महिला भूटान से आई थीं केवल आश्रम देखने, वैसे वे लोग लायंस क्लब के वार्षिकोत्सव में भाग लेने आये थे. भूटान में आर्ट ऑफ़ लिविंग के प्रति जानकारी ज्यादा नहीं हैं इसके लिए भी चिंतित लगीं. दूसरी गुजरात की एक नौकरीपेशा युवती थी, जो अकेलेपन के अपने भय से मुक्त होने के लिए यह कोर्स कर रही थी. जून भी उसी बिल्डिंग में दूसरे कमरे में थे. अगले दिन सुबह तैयार होकर वे महावीर हॉल पहुँच गये. छह बजे से व्यायाम की कक्षा शुरू हुई.  योग शिक्षक संजयजी थे, हंसमुख व प्राणवान व्यक्ति..पता ही नहीं चला, कैसे समय बीत गया. सेवा काल में विशालाक्षी मंडप में उसने झाडू लगाया, जैसे अपने घर की सफाई कर रही है ऐसा ही भाव मन में उठ रहा था. कुछ वर्षों बाद वे जब बैंगलोर में रहेंगे, तब भी वह इसी तरह आश्रम में आकर सेवा का कार्य करेगी, ऐसे विचार भी मन को आनंदित कर रहे थे. दिन में कोर्स चलता रहा. ध्यान, संगीत, वीडियो और मध्य में विश्राम. प्रकृति के सान्निध्य में कुछ पल, वे दूर तक घूमने गये, आश्रम के बाहर राधा कुञ्ज है उसे देखा फिर सुमेरु मंडप भी. पंचकर्म के स्थल के पास एक झील है, उसके भी दर्शन किये. शाम को अँधेरा होते ही विशालाक्षी मंडप रौशनी में जगमगा उठा था. वे सामने लॉन में बैठकर उसकी शोभा निहारते रहे, हर दिन ऐसा ही हुआ, दो दिन दो कुत्ते पास आकर बैठ गये, स्नेह जताते हुए, बिलकुल निकट, उनकी आँखों में जैसे कोई कुछ कह रहा था, आत्मा की भाषा क्या होती है तभी जाना. फिर वापसी में गोहाटी में एक सखी के साथ बिताये वे पल. पिताजी ट्रेन से वहीं आ गये थे, फिर वे सभी मिलकर घर लौट आये, यह सभी कुछ स्मृति पटल पर अंकित हो गया है.


Tuesday, April 18, 2017

सुबह की सैर


आज सुबह टहलने गयी तो पैरों में अचानक ताकत भर गयी थी. कुछ देर दौड़ कर बाकी वक्त तेज चाल से भ्रमण पूर्ण किया. घर आकर विश्राम किया, मन खाली था. जहाँ कुछ भी नहीं रहता, सारे अनुभव चुक जाते हैं, वहीं कैवल्य है, वहीं निर्वाण है. सारे अनुभव मन को ही होते हैं. मन एक मदारी है, वह ढेर से खेल दिखाए चले जाता है, लुभाए चले जाता है. लेकिन जहाँ कुछ भी नहीं रहता, दूसरा कोई रहता ही नहीं, मुक्ति है. गुरूजी कहते हैं, अच्छे से अच्छा अनुभव भी बाहर ही है. वहाँ द्वैत है, अब कुछ देखना नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना नहीं, बस होना है..सहज अपने आप में पूर्ण..मौन ! इस मौन के बाद जो शब्द उठेंगे वह जीवन को उत्सव बना देगें..अर्थात जीवन को उत्सव बना देखने की कामना तो भीतर है ही..कैसा चतुर है मन..एक ही कामना में सब कुछ मांग लेता है और फिर अलग हो जाता है..

आज का भ्रमणकाल कल से अलग था. हरियाली, फूलों की लाली, मनहर मनभावन सुख वाली. नवम्बर की सुबह कितनी सुहानी होती है. आकाश पर रंगों की अनोखी चित्रकारी, वातावरण में हल्की सी ठंडक..पंछियों का कलरव और हवा इतनी हल्की सी..भीतर कोई प्रेरणादायक वचन बोलने लगा. बहुत सारे संशय दूर हो गये. उन्हें साक्षी भाव रहना है, पूर्व संस्कार वश यदि कोई विकार जगता है तो साक्षी भाव में रहने के कारण उसका कोई असर नहीं होता. कैसी अनोखी शांति है इस ज्ञान में. शाम को मीटिंग है, कल एक सखी का जन्मदिन है. सभी कुछ कितना सरल है. वे अपनी पूर्व धारणाओं और पूर्वाग्रहों के कारण जटिल बना लेते हैं. जीवन एक गुलाब की तरह जीना चाहिए या एक संत की तरह..निर्लिप्त..सदा मुक्त !

आज बदली है, ठंडी हवा भी बह रही है. कल आखिर कसाब को फांसी हो गयी. उसकी कहानी इस जन्म की तो खत्म हो गयी, लेकिन अगले जन्म में उसे जाना ही होगा. सुबह साढ़े तीन बजे ही नींद खुल गयी, उठी नहीं, एक स्वप्न चलने लगा. नन्हे को देखा, कल रात माँ, पुत्र के मिलन के जो डायलाग सुने थे, वे भी कहे, सुने, तभी भीतर विचार आया God loves fun वह परमात्मा उन्हें नाटक करते देखकर कितना हँसता न होगा ! सुबह वे साथ ही घूमने गये, बातचीत हुई ज्यादा, घूमना हुआ कम, वापस आये तो माली आ गया था.





Monday, April 17, 2017

पितरों का लोक


कल शाम उलझन भरी थी, परमात्मा ही उस रूप में आया था. “जब जैसा तब वैसा रे”. अंदर की ताकत पैदा करनी है, बाहर कर्म करना है. उन्हें अपने पात्र को बड़ा बनाना है. कृपा की वर्षा प्रतिपल हो रही है, वे धन्यभागी हैं, कृपा हासिल करने का कोई अंत नहीं है. आज सुबह पौने चार बजे नींद खुल गयी, ‘यजुर्वेद’ का स्वाध्याय चल रहा है आजकल ‘ज्ञान प्रवाह’ में. परमात्मा की स्तुति सुनते-सुनते प्रातःकालीन कर्म करते हुए टहलने गयी तो मन में वही चिन्तन चल रहा था. लौटकर सूर्य देवता के सम्मुख ध्यान किया. अद्भुत दृश्य था, देखते-देखते बादलों के पीछे से नारंगी सूरज ऊपर उठने लगा और अचानक हवा चलने लगी. पेड़ झूमने लगे, सारा दृश्य स्वर्गिक प्रतीत हो रहा था. प्रकृति इतनी  सुंदर है, आज से पूर्व कहाँ ज्ञात था. परमात्मा चुपचाप अपना काम किये जाता है. मिट्टी से खुशबुएँ उगाता है, रंग बिखेरता है आकाश से. परमात्मा की महिमा सोचने लगो तो बुद्धि चकराने लगती है, उसमें तो बस डूबा जा सकता है, उसे तो बस महसूस किया जा सकता है. वह तो अपने भीतर जगाया जा सकता है, बल्कि यह भी वही करवाता है. आज सुबह टीवी पर ‘महादेव’ धारावाहिक देखा, फिर टिकट सेल करने निकली, दो बिके, शाम को फिर जाना है, इस तरह एक बुक खत्म करनी है, बल्कि हो ही गयी है. सभी महिलाओं ने कितने प्यार से बात की, सभी के दिल एक ही तो हैं, एक के यहाँ सुंदर पक्षी देखे, एक के यहाँ दरवाजे पर लगाने के लिए करटेन रोप का तरीका देखा. लोगों से उसे मिलना-जुलना है इसलिए ही परमात्मा ने उसे मुक्त किया है, अब समय है उसके पास !

उसने आज सुना सद्गुरु कह रहे थे, ‘श्रद्धा से किया जाने वाला कृत्य ही श्राद्ध है. शरीर जो सगुण है जब अनंत चेतना में समा जाता है तो सूक्ष्म शरीर या कारण शरीर में वासना रह जाती है. ब्रह्मांड में रहते हैं तो पिंड की आशा रहती है पिंड में रहते हैं तो ब्रहमांड की. शरीर की वासना को पूर्ण करने के लिए ही पिंडदान किया जाता है. इसका अर्थ है उन्हें पुनः देह मिल जाये. मृतक को यदि लगे कि वह जल रहा है तो उसे दस दिन तक जल व तिल अर्पित करते हैं. उनकी पसंद की वस्तुएं भी देते हैं, बिना नमक के देते हैं, आत्मा को सुगंध मिलती है तो वह तृप्त हो जाती है. तृप्त करना ही तर्पण है. भाव यदि शुद्ध हो तभी लाभ होता है. पितरों से प्रार्थना करके सूक्ष्म जगत से उनसे संपदा व स्वास्थ्य भी मांगते हैं. उस लोक में पितरों का मार्ग सुगम हो इसकी प्रार्थना भी करते हैं और उनके द्वारा तृप्ति मिले इसकी कामना भी. जिन्हें देह नहीं मिली ऐसे पितृ भी होंगे, जिन्हें देह नहीं चाहिए ऐसे भी, दोनों के लिए प्रार्थना करनी है. कुछ ऐसे होंगे जिन्हें देह मिल गयी होगी उनके नये जीवन के लिए प्रार्थना करनी है.’ कितनी अनोखी है भारतीय संस्कृति ! उसने मन ही मन सद्गुरू को इस सुंदर ज्ञान के लिए प्रणाम किया और पितरों से प्रार्थना भी की.


आज दीपावली है, सुबह जल्दी उठे वे, रोज के सभी कार्य निपटा कर नर्सरी से फूलों के पौधे लाये, अब हरसिंगार के नीचे बैठे हैं, हवा बह रही है. कौन है जो इस शीतल पवन को डुला रहा है, कौन सी शक्ति है ? वृक्ष के नीचे कितना सुकून मिलता है इसका आभास आजकल होने लगा है. कल बाल दिवस है, वे मृणाल ज्योति स्कूल जायेंगे. बच्चों के लिए ढेर सारे उपहार लेकर.

Friday, April 7, 2017

केसरिया बदलियाँ


परमात्मा हर पल उनके मन का द्वार खटखटाता है, वे कभी खोलते ही नहीं, वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है. वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है. चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है. जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी न करें, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है, चेतना एक ही है.  उन्हें अपने ‘होने’ की सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है. वे अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले. जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें. वे किस निमित्त हैं, वे किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में उनका भी योगदान हो, उनके पास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, वे उसके सहचर बन जाएँ. सन्नाटे में भी जो उनके साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो उनके निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है. आज सुबह चार बजे उठी, अकेले ही टहलने गयी, बाहर बगीचे में ध्यान किया, सूर्य की रौशनी में आकश और पेड़ किस अद्भुत तरीके से चमचमा रहे थे !

परमात्मा स्वयं को कितने रूपों में प्रकट कर रहा है, मानव देख नहीं पाता, आश्चर्य है, सुंदर वृक्ष, हरी घास, चहकते पंछी, उगता हुआ सूर्य, प्रातःकालीन शीतल सुगन्धित पवन सभी कुछ उसी की याद दिलाते हैं. उनके भीतर का आकाश अनंत शांति व निस्तब्धता भी उसी की याद दिलाते हैं. सारा जगत एक अलौकिक शांति से भर गया लगता है. इस जगत की हर शै उसी की लीला में सहभागी है. वे मानव ही स्वयं को पृथक मानकर उससे अलग हो जाते हैं !

आज से नया माली काम पर आ रहा है, अमर सिंह, जो सारे पंजाबी लोगों को एक ही मानता है, जैसे उन्हें सारे जापानी एक जैसे लगते हैं. सुबह सूर्य का लाल गोला दिखा पर बीस मिनट बाद ही दृश्य बदल गया, कोहरा आ गया, सूरज श्वेत हो गया था. अभी तक धूप नहीं निकली है, परमात्मा उसे रात को जगाने आता है, पर नींद और स्वप्न की दुनिया में मन कैसे खो जाता है. आज शाम को क्लब की मीटिंग है. बाएं तरफ की पड़ोसिन को-ओर्डीनेटर है, उसे फोन करके न आ पाने के लिए कहेगी.

जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा. ऐसी समाधि जिसे चाहिए जो सहज हो. समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं. समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है. जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया. कितने सुंदर शब्द उसने सुने आज सुबह..आज तीसरा दिन था, सूर्य देवता को अपना रूप बदलते हुए देखा. परसों चमचमाता हुआ बाल सूर्य देखा, कल कोहरे के पीछे श्वेत सूर्य और आज बादलों के पीछे छुपा सूर्य. अभी तक धूप में तेजी नहीं आई है !

एक नन्हे से बीज में जीवित रहने की प्रबल इच्छा होती है, कितनी बाधाएं पार करके वह अंकुरित होता है, पनपता है, वह मिटने को तैयार है तभी वह ‘होता’ है. आज सुबह चार बजे से पहले उठी. सूर्य देवता ने आज नया रूप धरा था. सलेटी बादलों में सुनहरी व केसरिया किरणों का जाल झांक रहा था. प्रकृति का रूप कितना मोहक है, उसके पीछे छिपे उस अव्यक्त चेतन के ही तो कारण, इस सुन्दरता को निहारने वाला भी तो वही चेतन है, वही इस अपार सौन्दर्य को जन्म देने वाला है और वही इसका चितेरा भी ! कल शाम मृणाल ज्योति से फोन आया, आज एक मीटिंग में जाना है. ॐ की ध्वनि आ रही है, पता नहीं कहाँ से अक्सर यह ध्वनि उसे सुनाई देती है, गम्भीर स्वरों में कोई ॐ कहता है !   



Thursday, April 6, 2017

नवम्बर की धूप


पिछली तीन रात्रियों को ठीक एक बजकर सैंतालीस मिनट पर कोई उसे उठा देता है. उसके बाद भीतर से कोई कहता है जीवन अब बदल जायेगा. पूर्ववत् नहीं रहेगा. एक ख़ुशबू की परत, चारों ओर लिपटी रहती है. उनके भीतर कितने खजाने हैं, रंगों, खुशबुओं और संगीत के खज़ाने ! उसका मन एक अनोखी शांति से भर गया है, मन उसका नहीं रहा इसलिए कोई अदृश्य सत्ता ही अब सूत्रधार है. परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, वह मृणाल ज्योति की डोनेशन बुक लेकर जाएगी.

कल रात एक स्वप्न देखा, एक कार में वह बैठी है और उसे कुछ ही दूर जाना है पर उस कार में न स्टीरियंग है न ब्रेक. वह निर्धारित स्थान से आगे चली जाती है, सड़क आ गयी है जिस पर सामने से तेज गति से आते वाहन हैं. उसे डर लगता है पर गाड़ी बिना टकराए मुड़ कर किनारे से निकल जाती है.

कल रात कोई स्वप्न नहीं देखा, देखा भी हो तो स्मरण नहीं है. सुबह ठीक चार बजे किसी ने उठा दिया. वह कोई जो उसके भीतर रहता है, वह उसे एक पल को भी नहीं भूलता, वही वह है अब, तो स्वयं को कोई कैसे भूल सकता है. हरसिंगार के वृक्ष के नीचे की छाया में उसकी ही अनुभूति है, उसकी ही ख़ुशबू है जो चारों ओर से घेरे हुए है. सूखे पत्तों की आवाज में भी वही है, हवा की सरसराहट में भी वही, सामने हरी घास पर बिखरी धूप में उसकी ही चमक है, फूलों के रंगों में, शीतल हवा के स्पर्श में वही तो है, अब शरद काल आ गया है, आकाश नीला है और वृक्ष कितने हरे, एक सन्नाटा बिखरा है चारों ओर जो उसकी ही खबर दे रहा है. आज स्वास्थ्य पहले से बेहतर है. वह आने वाला है इसलिए ही देह को तपाकर स्वच्छ किया प्रकृति ने, फिर भीतर के सारे विकारों को निकाल बाहर किया. तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. अब कुछ करना शेष नहीं है, घर का मालिक आ गया है, अब जो भी वह कराएगा, वही होगा !

हरसिंगार के पत्तों से छनकर धूप के नन्हे-नन्हे गोले उसकी डायरी पर बन रहे हैं. यानि परमात्मा के हाथों से बनी कला ! उसके फूल अभी तक गिर रहे हैं, जो एकाध डाली पर अटके रह गये थे. हवा आज भी शीतल है और सड़क पर स्थित खम्भे का बल्ब आज भी कर्मचारी लगा रहे हैं, एक बल्ब के लिए पूरी की पूरी टीम आई है. पिताजी का मनोरंजन हो रहा है. उसने बोगेनविलिया के गमले धूप में रखवा दिए हैं. इस वर्ष उनमें अवश्य अच्छे फूल आएंगे. कल सिर्फ एक टिकट शेष रही, वह भी बिक जायेगी. आज की दो पोस्ट उसने सुबह ही लिख दी हैं, जून ने कहा, नौ बजे से दो बजे तक बिजली नहीं रहेगी.


नवम्बर की गुनगुनी धूप तन को सहलाती है. बाल सूर्य की किरणों की आभा में जब तृण की नोकें चमचमाती हैं, वृक्षों की डालियाँ एक अनोखी आभा से भर जाती हैं. फूलों की सुगंध रह-रह कर नासापुटों में भर जाती है. बोगेनविलिया की डालों से टपकती टप-टप ओस की बूंदें अंतर भिगाती हैं, झरते हुए फूलों की कतार सी जमीन पर बिछ जाती हैं. जीवन को उसकी सुन्दरता का अहसास जो कराती है, अम्बर की वह नीलिमा स्वप्नलोक लिए जाती है. खगों की कूजन ज्यों लोरी सुनाती है ! पत्तों की सरसराहट.. ज्यों पवन पायल छनकाती है. गुलाबी रंगत कलिका की.. भीतर मिलन का अहसास जगाती है. हर शै कुदरत की उसकी याद दिलाती है. इतनी सुंदर थी यह दुनिया क्या पहले भी..उससे इश्क के बाद नजर जो आती है. दूब घास की हरी नोक भी यहाँ सुख सरिता बहाती है, सड़क पर जाते हुए हरकारे की आवाज भी भीतर कैसी हूक जगाती है. बगीचे में करते माली की खुरपी की ध्वनि जैसे सृष्टि का संदेश सुनाती है. रचा जा रहा है हर पल इस जहाँ में चुपचाप ओ मालिक, यह बात आज समझ में आती है.