Monday, December 9, 2019

मन की शांति



“दुःख, उदासी, शरीर में अस्थिरता, श्वास में कंपन आदि समाधि में अंतराय होते हैं. आध्यात्मिक दुःख यदि न हों तो अन्य दो प्रभावित नहीं कर सकते”. आज सुबह टीवी पर उपरोक्त वाक्य सुना. वैदिक चैनल पर डॉ सुमन विद्यार्थियों को ‘पतंजलि योग सूत्र’ पढ़ाते समय कह रही थीं. समाधि शब्द सुनते ही उसके भीतर कोई कमल खिल जाता है. सम्भवतः योग के हर साधक का यही लक्ष्य होता है, वह भाव समाधि का अनुभव कर चुकी है, निर्विकल्प समाधि का अनुभव इसी जन्म में होगा, ऐसा स्वप्न भी कितनी बार देखती है. परमात्मा की कृपा से ही यह सम्भव होगा. कल सुबह की तैयारी हो चुकी है, सामान काफी हो गया है इस बार. ग्यारह दिनों के लिए वे बाहर जा रहे हैं. चार रात्रियाँ कोलकाता में, सात भूटान में. तीन थिम्पू, दो-दो पुनाखा और पारो में। आज योग कक्ष का रेगुलेटर बदल गया है. पुराने में अंक स्पष्ट नहीं दिखते थे, पर इतने वर्षों से काम चला रहे थे वे. कई बार समस्या का हल कितना आसान होता है पर उन्हें समस्या के साथ रहने की आदत पड़ जाती है. जैसे मानव देह के रोग, कमजोरी आदि से परेशान रहता है, पर आत्मा की खोज नहीं करता. परेशानी के साथ जीने की आदत डाल लेता है. आज सुबह अकेले ही प्राणायाम किया, जून तैयारी में लगे थे. उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने का अब मन नहीं होता, वह स्वयं के लिए निर्णय लेने में समर्थ हैं. वाणी का दोष स्पष्ट नजर आने लगा है, सो बोलने से पूर्व बोलने का तरीका भी स्पष्ट हो रहा है. परमात्मा कितना धैर्यपूर्वक उन्हें सिखाते हैं, वैसे वे खुद हैं ही कहाँ, वही तो है, वही खुद को संवार रहा है, उसी का एक अंश... जिसने स्वयं को उससे जुदा मान लिया था भ्रम वश ! 

अभी कुछ देर पहले ही यात्रा से वह घर लौटी है, जून घर नहीं आये, सीधा दफ्तर चले गए. उन्हें किसी मीटिंग में जाना था. नैनी ने सफाई का काम करवा  दिया है. सफाई कर्मचारी भी आ गया था और धोबी भी, घर कुछ ही घण्टों में व्यवस्थित हो गया है. सुबह की फ्लाइट से आने का कितना फायदा है. आज पूरे ग्यारह दिनों बाद यह डायरी खोली है. भूटान में हर दिन का यात्रा विवरण लिखा था, छोटी डायरी में. आज दोपहर से टाइप करने आरंभ करेगी. मृणाल ज्योति के लिए भी कुछ लिखना है. पिछले दिनों जे कृष्णामूर्ति की किताब पढ़ती रही. कोलकाता में कल काफी समय मिला. बहुत कुछ स्पष्ट होता जा रहा है. मन किस तरह स्वयं ही स्वयं का विरोध करता है, फिर स्वयं के जाल में फंस जाता है. मन यदि स्थिर हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति जैसे ही मन कोई राय बनाता है उससे दूर हो जाता है. अब वह राय ही उसकी आँख पर पर्दा बन जाती है. जैसे गोयनका जी  कहते हैं, प्रतिक्रिया करने के बाद उनका मन प्रतिक्रिया से उत्पन्न संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, मूल कारण तो पीछे छूट जाता है. मन जो भी विचार करता है वे  अतीत के अनुभवों पर आधारित होते हैं, यानि अतीत की लहरें वर्तमान के तट से टकराती हैं और भविष्य का जन्म होता है. शुद्ध वर्तमान को वे देख ही नहीं पाते. मन अपनी धारणाओं, मान्यताओं और विश्वासों के आधार पर एक मशीन की तरह काम करता है. ‘ऐसा होगा तो ऐसा करना है’, उसका अपना नियत एजेंडा है. 

आज चौथा दिन हैं उन्हें वापस लौटे, अभी भी मन भूटान की स्मृतियों से भरा है. जून ने जिस किताब का ऑर्डर वहाँ से किया था, वह आ गयी है. काफी मोटी पुस्तक है, भूटानी इतिहासकार की. उसे पढ़ना शुरू किया है, अभी यात्रा विवरण लिखना आरम्भ नहीं किया. आज सुबह स्वप्न में भगवान शिव की एक मूर्ति देखी। अंग स्पष्ट नहीं थे, पत्थर की आकृति से जान पड़ता था कि शिव हैं, फिर कुछ क्षण बाद श्वेत पत्थर की नन्दी की मूर्ति की झलक मिली. कल सुबह भी शिव-पार्वती दोनों की मूर्ति दिखी थी और बाद में भीतर शब्द प्रकट हुए थे दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती.... भीतर कोई पुरानी स्मृति जाग उठी थी शायद ! आजकल भिन्न-भिन्न गंधों को महसूस करती है, ज्यादातर समय कोई मधुर गन्ध, कभी-कभी धुंए की गन्ध, पता नहीं यह कोई अनुभव है या रोग.. कुछ भी तो नहीं ज्ञात ! कल गुरूजी को सुना, उन्होंने बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बतायीं. एक लेखक को क्या और कैसे लिखना चाहिए, यह भी बताया. आज शाम को मीटिंग है, क्लब की एक सदस्या की बेटी का स्वागत समारोह, वह आईएएस में उत्तीर्ण हुई है. कुछ देर पूर्व छोटी बहन से बात हुई, वह खुश थी, परसों से उसे अपने भीतर शांति का अनुभव हो रहा है, ईश्वर उसे सदा इसी तरह प्रसन्न रखे ! उसके भीतर भी शांति का साम्राज्य है, जो अब खण्डित नहीं होता, होता भी है तो कुछ क्षणों के लिये. मन अपने पुराने स्वभाव में लौटना चाहता है, पर मन वास्तविक नहीं है, एक मिराज है ! एक इंद्रधनुष जैसा... मन का कहना नहीं मानना चाहिए अर्थात मन का भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मन को कोई तवज्जो नहीं देनी चाहिए जब यह कुछ नासाज हो ! 

Friday, December 6, 2019

आडवाणी जी की किताब





दोपहर के तीन बजने वाले  हैं. आज मौसम गर्म है, इस मौसम का पहला गर्म दिन ! माया के अधीन होकर ही आज दीदी से फोन करते वक्त पूछ लिया कि  कविता पढ़ी या नहीं, जीजाजी ने अपने स्वभाव के अनुरूप कह दिया, वह अपनी तारीफ सुनने के लिए कविता लिखती है क्या  ? कोई प्रशंसा करे तो भीतर जिसे ख़ुशी होती है अहंकार ही तो है वह, और यही कर्म का बन्धन है. फोन पर या आमने-सामने भी, किसी से बात करते समय बहुत सजग रहना होगा, अलबत्ता तो बात उतनी ही करनी चाहिए जितनी जरूरी हो. सुबह लॉन में घास पर नंगे पैरों चली, अच्छा लगा. माली को बुलाकर कुछ काम बताये पर उसने गेट के बाहर झाड़ू लगाने के सिवाय कुछ भी नहीं किया, शायद उसे काम पर जाना था.  इसी हफ्ते उन्हें यात्रा पर निकलना है. स्कूल से आकर नन्हे व सोनू से बात की. सोनू ने रोजे का महत्व बताया. यह उपवास राजा और रंक को एक धरातल पर ले आता है. अनुशासन सिखाता है, संकल्प शक्ति को बढ़ाता है. पूरे तीस दिन उसे यह करना है, यदि किसी दिन छूट जाये तो अगले वर्ष से पहले पूरा कर लेना है. दोपहर को भोजन में उसने आलू परांठा खाया, जून के न रहने पर पूरा भोजन बनना तो बन्द हो जाता है, अक्सर वह तहरी बनाती है. आज भी पंचदशी पर व्याख्यान सुना, बहुत विस्तार से इसमें तत्वज्ञान समझाया गया है.

ग्यारह बजने वाले हैं, जून आज आने वाले हैं. स्पीकिंग ट्री के एक लेख में स्वयं के विषय में एक जानकारी मिली. कल फोन पर भी ध्यान दिलाया गया था कि सम्मान पाने की आकांक्षा यदि भीतर अभी तक है तो हृदय फूलों के साथ काँटों से भी युक्त है. अपनी चिंता पहले सताये और दूसरा बाद में रहे तो साधना फलित नहीं हुई. वर्षों पहले वाणी के दोष से पीड़ित थी तो स्वयं को समझ कितनी बार सुधारा था, अब ऐसे ही भावों को अंतिम बिंदु तक शुद्ध करना है, कर्म तभी शुद्ध होंगे. जब पूरा का पूरा परमात्मा गुरूजी ने पकड़ा दिया है तो कैसा भय और कैसी सुरक्षा .. अब तो अंतिम पड़ाव नजदीक है. सत्य वही है जो सदा एक सा है, बदलने वाला मन और बदलना वाला तन तो सत्य नहीं हो सकता, पर ये दोनों उसी के विस्तार हैं, एक चेतना ही विभिन्न नाम-रूपों में अभिव्यक्त हो रही है, उस एक पर दृष्टि हो तो सभी एक ही विस्तार प्रतीत होंगे. उस एक का अनुभव विचार से भी किया जा सकता है और समाधि में भी. उस पर टिके रहना ही एक कला है, चेतना निरन्तर गतिमय है, चैतन्य अटल है. चैतन्य में स्थित होकर इस जगत को देखना है. उनका लाभ उसी में है और यदि इसके लिए अन्य हानियाँ भी उठानी पड़ें तो कोई बात नहीं.

परसों भूटान की यात्रा पर निकलना है. आज उसके विषय में कुछ लेख पढ़े. आडवाणी जी की पुस्तक आगे पढ़ी. आजादी के समय लाखों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए. विश्व के इतिहास में ऐसी दर्दनाक घटना शायद ही कभी घटी हो. राम और बुद्ध के देश में गाँधी जी के अहिंसा के सन्देश के बावजूद इतना रक्तपात, सोचकर भी भय भी लगता है. बचपन में उसे एक स्वप्न बार-बार आता था कि एक कोने में घेर कर किसी व्यक्ति को भीड़ मार रही है. सँकरी गलियाँ और और सटे हुए मकानों से गुजर कर भागना भी कितनी ही बार देखा होगा. अब तो गुरूकृपा से जीवन ही एक स्वप्न लगता है, भीतर एक ऐसा ठिकाना मिल गया है, जहाँ कुछ भी नहीं घटता, जो बस है.. जो ज्ञाता है और द्रष्टा ! आज सुबह साक्षी भाव काफी देर तक बना रहा. इन्द्रियों को अपना काम करते हुए देखा, मन भी अपना करता है और बुद्धि भी. आहार के अनुसार तीनों गुण भी घटते-बढ़ते हैं, फिर देह में हल्का व भारीपन लगता है.

Tuesday, December 3, 2019

पंचदशी का ज्ञान



सुबह मौसम अच्छा था. स्कूल में एक छात्रा को योग कक्षा लेने को कहा, जब वह यहाँ नहीं रहेगी तो वह आराम से सिखा सकेगी. अभी-अभी छोटी बहन से बात की, पिछले एक महीने से वह बहुत व्यस्त थी. पहले उसकी बड़ी बिटिया आयी, जो विदेश में रहती है, वह व्यायाम करती है, फिट रहती है. एओल का एडवांस कोर्स भी उसने किया और डीएसएन भी करने वाली है. उसकी जीवन चर्या देखकर माँ खुश है, फिर उसकी ननद परिवार सहित आयी, उसके बाद छोटी बिटिया, जो कल लगभग तीन महीनों  के लिए इंटर्न बनकर दक्षिण अफ्रीका गयी है. कनाडा से केन्या के स्कूलों को पढ़ाया जाने वाला गणित उनके लिए कितना उपयोगी है, इस पर रिसर्च करेगी. आज सुबह पिताजी से बात की और छोटे भाई से भी, वह उन्हें एक बार फिर कम्प्यूटर पर वीडियो देखना सिखा रहा था. यू-ट्यूब पर अनुभवानन्द जी को डिब्रूगढ़ मेडिकल कालेज में बोलते सुना, रिकार्डिंग अच्छी नहीं हुई है, पर उनका वही अंदाज है. उन्होंने नब्बे किताबें लिखी हैं. बड़ी-बड़ी किताबें भी. उनकी बातें सुनकर मन झट प्रेरित हो जाता है, जैसे गुरूजी के वचन सुनकर मन शांत हो जाता है. सदगुरू जीवन को पंख देते हैं, वे सीमित दायरों से निकाल क्र एक बड़े फलक का दर्शन कराते हैं. उनका संकीर्ण मन पहले-पहल विरोध करता है, पर आकाश में उड़ना कौन नहीं चाहता. जून ने मुल्तानी मिट्टी मंगाई है, देह पर उसका लेप करने से पित्ती ठीक होती है.

कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह रविवार के विशेष कार्य, दोपहर को बच्चों के साथ गुरूजी का जन्मदिन मनाया. शाम को एओल सेंटर गए वे. कार्यक्रम अच्छा रहा. साढ़े आठ तक वापस लौटे. नैनी ने सुंदर बड़ी सी माला बनाकर दी थी. पहले भी वह बड़ी और छोटी माला बनाकर दे चुकी है. गुरूजी का जन्मदिन सारे विश्व में मनाया गया. बंगलूरू आश्रम में भी कई धर्मों के पुरोहित आए थे. सभी ने उन्हें बधाई दी. युगों-युगों में कोई ऐसी महान आत्मा धरती पर जन्म लेती है. इस समय रात्रि के आठ बजने को हैं. बाहर वर्षा हो रही है. आज सुबह इस मौसम में पहली बार वे टहलकर आते समय भीग गए. पहले हल्की सी बूंदा-बूंदी थी, फिर तेज वर्षा होने लगी. जून ने दौड़ना शुरू किया, वह भी भागने लगी, फिर बच्चों के स्कूल के शेड में आकर रुके वे. कुछ देर बाद वर्षा की गति कम हुई तो घर लौटे. नाश्ते में मकई का दलिया बनाया जी बैंगलोर से लाये थे, सोनू ने दिया था. दोपहर को सहजन की सब्जी बनायी, मोटे वालर सहजन, जो उस दिन बगीचे से तोड़े थे. इससे पहले वह बिलकुल कोमल लगभग गुलाबी सहजन ही खाते थे, मोटे बाँट देते थे, पर इनका अलग स्वाद है. इंसान को अपनी सीमाएं बढ़ाते रहना चाहिए, वे ऐसा कुछ हर दिन करें जो पहले कभी न किया हो. वे देह को ठीक करने के लिए हजार उपाय करते हैं पर आत्मा या मन को अपने सहारे या भगवान के सहारे छोड़ देते हैं. कल से शाम की योग कक्षा में  श्री श्री की पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़ना आरम्भ किया है. उन्हें हर दिन एक नोटबुक में कुछ न कुछ लिखने को भी कहा है. एक साधिका ने अपना लिखा भजन गया, धुन भी  मनहर थी.

आज सुबह निकले तो आकाश नीला था, वर्षा काफी पहले होकर रुक चुकी थी. आज सफाई कर्मचारी फिर नहीं आया. नैनी ने घर की सफाई की, उसे कुछ मेहनताना देना ठीक रहेगा. दुबली-पतली है और तीन बच्चों को संभालने व घर का काम करने में दिन भर लगी रहती है. बारह बजने वाले हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं. आज उसने गोभी वाले चावल बनाये हैं, जो कल शाम वे लाये थे. शिलांग की गोभी, मई के महीने में. दस दिनों बाद उन्हें भूटान की यात्रा पर निकलना है. आज प्रतियोगिता के लिए कहानी लिखना आरंभ किया है. यू ट्यूब पर ‘पंचदशी’ सुना, अच्छा लगा. इस ग्रन्थ का नाम पहली बार सुन रही है. भारत का प्राचीन साहित्य इतना विशाल है कि कोई सामान्य जन एक जन्म में इसे पढ़ ही नहीं सकता. दोपहर को मृणाल ज्योति जाना है. चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग है. विशेष बच्चों को होस्टल में रखकर स्कूल चलाना कोई आसान काम नहीं है. उन्हें साफ-सुथरा रहना सिखाना पड़ता है. उन्हें अपना काम खुद करना भी सिखाना पड़ता है. जो सहायक व अध्यापक वहाँ काम करते हैं, उनका वेतन भी अधिक नहीं है. कई समस्याओं पर चर्चा हो सकती है.

आज आडवाणी जी की लिखी किताब पढ़ी. बहुत रोचक है. उनके जीवन के साथ-साथ देश के इतिहास का भी ज्ञान हो रहा है. गुरूजी की पुस्तकें निकालकर योग साधिकाओं के सामने रखीं, पर किसी ने कोई पुस्तक नहीं ली, शायद उन्हें पढ़ने का शौक नहीं है. आजकल रमजान का महीना चल रहा है. पिताजी का फोन आया दोपहर को. जून ने व्हाट्सऐप का फैमिली ग्रुप कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया है. वह यह बात समझ गए कि बड़े-बड़े वीडियो और पोस्ट देखने का समय नहीं है किसी के पास, साथ ही मोबाइल में स्पेस भी नहीं बचता। समाचारों में सुना कर्नाटक में बीजेपी सरकार बना रही है, उन्हें ग्यारह विधायक मिल गए हैं अर्थात उन्होंने खरीदे हैं ! 

हरसिंगार के फूल


दोपहर के तीन बजे हैं. आज का दिन भी वर्षा से आरम्भ हुआ, प्रातः भ्रमण के बाद जैसे ही घर पहुँची, बूँदें पड़ने लगीं, पर दिन चढ़ते-चढ़ते धूप निकल आयी. आज धारावाहिक का अंतिम भाग भी देख लिया. बुद्ध के अनोखे जीवन की गाथा पढ़ -सुनकर कौन प्रभावित नहीं होगा. वे अपार आशावादी थे जबकि कुछ लोग उन्हें दुखवादी कहते हैं. वह मानव को उसके मूल स्वरूप का अनुभव करना चाहते थे. वह उन्हें मानसिक रोगों के चक्र से बाहर निकलना चाहते थे. बुद्ध कहते हैं हर दिन को कृतज्ञ होकर जिन चाहिए. कोई न कोई सत्कर्म करना चाहिए. परमात्मा ने जो ज्ञान, प्रेम और शक्ति मानव को दी है, उसका वितरण करना चाहिए. भीतर के आनंद को जो स्वयं में पा लेता है, वह अन्यों को भी उसे पाने का मार्ग बता सकता है. बुद्ध होने की क्षमता हरेक के भीतर है. सदमार्ग पर चलना ही धर्म का पालन करना है, जिसके द्वारा वह बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है. मन की बिखरी हुई शक्तियों को एक्टर करना ही संघ की शरण में जाना है. वे जब अपने केंद्र में स्थित होते हैं तो सारी शक्ति एक पुंज के रूप में प्राप्त होती है, जो किसी कार्य को सजगता पूर्वक करने के लिए अनिवार्य है. आज भी सदगुरू को सुना, कर्म व पुनर्जन्म पर उनकी व्याख्या अत्यंत मनोरम व सरल है. जग की प्रत्येक वस्तु में चार बातें होती हैं, धर्म, प्रेम, कर्म तथा ज्ञान. उनमें भी ये चार बातें हैं, प्रेम से वे घिरे हैं, वह उन्हें चारों ओर से स्पर्श कर रहा है, इसी प्रकार ज्ञान वह अविनाशी सत्ता है जो जानने की क्षमता है. जानना है. हर वस्तु अपने नियत धर्म के अनुसार कर्म करती है, जैसे अग्नि का धर्म है जलाना  और प्रकाश देना. उनके पूर्व कर्मों का फल उन्हें अब मिल रहा है और वर्तमान के कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा. जून कल शाम को अपने गन्तव्य पर पहुँच गए. सोनू का फोन आया, बैंगलोर में एक स्टार्टअप कम्पनी छोटे-छोटे प्लॉट लोगों को सब्जी उगने के लिए दे रहे हैं, जिसमें हर महीने दो हजार रूपये देकर ऑर्गैनिक सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती हैं. उनके माली ही काम करेंगे, बस अपनी पसंद बतानी है और यदि मन हो तो बीच-बीच में जाकर देख सकते हैं कुछ काम भी कर सकते हैं.  महिला क्लब की साहित्यिक प्रतियोगिता होने वाली है, पर सलाहकार होने के नाते क्या उसे उसमें भाग लेना चाहिए, शायद नहीं, शेष लोगों को भी मौका मिलना चाहिए. हिंदी में बेहद कम प्रतियोगी होते हैं, इसलिए हर बार उसे कहा ही जाता है.

सामने हरा-भरा बगीचा है. बोगेनविलिया के फूल शाखाओं पर शीतल हवा में झूम रहे हैं. कुछ देर पहले हवा चलने लगी थी जैसे आंधी आने वाली हो. उत्तर भारत में पिछले दिनों अंधी-तूफान में कारण कितनी हानि हुई. बुद्ध ऐसी आंधी-तूफान में छह वर्षों तक तप करते रहे. अद्भुत थी उनकी आत्मशक्ति ! राजा के पुत्र होकर सन्यासी की भांति बेघर होकर रहना और भिक्षा मांगकर गुजारा करना कितना कठिन रहा होगा. उनके आकर्षण से खिंचे कितने ही युवा उस कल में सन्यासी बन गए. हिंसा का जीवन त्याग दिया. भारत में सैनिकों के प्रति श्रद्धा घट गयी और कालांतर में इसका परिणाम हुआ विदेशी राजाओं का आक्रमण, लेकिन बुद्ध के काल में जो हिंसा व्यर्थ ही होती थी, वह रुक गयी. आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट प्रकाशित की. बुद्ध पूर्णिमा के दिन अंतिम पोस्ट की थी. उनके प्रति श्रद्धा तो थी पर वे इतने महान हैं, इसका अनुभव नहीं किया था. अद्भुत थी उनकी करुणा, उसका हजारवां अंश भी यदि उसमें आ जाये तो जीवन सफल हो जायेगा. ऐसा लगता है जैसे वह कुछ भी नहीं जानती. जीवन और यह सृष्टि अनंत रहस्यों से भरी है, इसे जाना नहीं जा सकता, कोई बुद्ध होकर ही, इसके साथ एक होकर ही इसको थोड़ा-बहुत जान सकता है. सामने गमले में लाल सुर्ख एक गुलाब खिला है, जिस पर उसका ध्यान बरबस चला जाता है. बुद्ध के निर्वाण के समय उन पर फूलों की वर्षा आरम्भ हो गयी थी, जिस वृक्ष के नीचे वे लेटे थे, उसके फूलों का मौसम भी नहीं था तब. वनस्पति में भी जीवन है, चेतना है, ज्ञान है. जिस वर्ष वे इस घर में रहने आये थे, उस पुराने घर में हरसिंगार ने असमय फूल उगाये थे. प्रातःकाल भ्रमण के लिए जाते समय निकलते ही एक काली तितली सम्मुख आ गयी थी. कल सुबह उसे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर जाना है, वहां से किसी स्कूल में, गुरूजी के जन्मदिन पर सेवा कार्य के लिए. आज उनके लिए एक कविता लिखी. एक कविता आस्ट्रेलिया निवासी छोटी भांजी के लिए भी जिसका जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है. उसने बताया वहाँ ठंड पड़नी शुरू हो गयी है, जब भारत में ठिठुरती सर्दियां होती हैं, वहां तेज गर्मी होती है. जून ने उस स्थान की तस्वीरें भेजी हैं, जहाँ वह ठहरे हैं, बहुत सुंदर स्थान है. उन्होंने सुंदर फूलों के चित्र और एक मोर का चित्र भी भेजा है. अगली बार वह अवश्य जाना चाहेगी, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है ! पिताजी से बात करे ऐसा मन हो रहा है, इस वर्ष उनसे मिलना होगा या नहीं, पता नहीं !

आज सुबह हल्की फुहार पड़ रही थी, वातावरण शांत था. सदगुरू को सुना,  चेतना में अपार शक्ति है. देह को स्वस्थ करने का सामर्थ्य भी है. यदि मन टिक हो तो चेतना अपना काम कर सकती है, वरना विचारों का विक्षेप उसे अभिव्यक्त होने से रोकता है. ध्यान मन को स्थिर रखने का, निर्मल रखने का उपाय ही तो है. सुबह वह आर्ट ऑफ़ लिविंग के अन्य सदस्यों के साथ एक स्कूल में गयी, बच्चों से बातें किन, उन्हें योग कराया, कुछ सामान वितरित किया, दो घण्टे वहां बिताकर वे वापस लौटे. जैन धर्म के बारे में कुछ जानकारी हासिल करने के लिए महावीर स्वामी पर एक फिल्म देखी. इस समय रात्रि के सवा नौ बजे हैं मन आज किसी अनोखे लोक में भ्रमण कर रहा है. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अहसास इतना सघन है कि लगता है उसे हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है. भीतर एक मधुर सी झंकार जैसी आवाज सुनाई दे रही है, किसी पंछी की आवाज या चिड़िया की, जाने कहाँ से. शाम को एक घंटा ध्यान किया शायद उसी का परिणाम है, वैसे परम् कार्य-कारण से परे है, अकारण दयालु है ! शाम को नन्हे और जून से बात हुई, वे लोग इस स्थान पर गए थे, जहाँ नन्हे ने बारह क्यारियां किराए पर ली हैं, जहाँ से उन्हें ताज़ी सब्जियां मिला करेंगी. 

Saturday, November 30, 2019

मुक्ति बोध



आज सुबह तेज वर्षा हुई, उसी वर्षा में वे मृणाल ज्योति गए. बच्चों को योग कराया और क्लब की सदस्याओं द्वारा दिया सामान सौंपा. एक अध्यापिका ने कुछ पैसे मांगे थे, वे भी उसे दिए, वर्ष के अंत तक धीरे-धीरे करके लौटा देगी, ऐसा उसने कहा है. पिछले चार दिनों से मन बुद्ध के साथ है. वह बुद्ध के जीवन पर आधारित धारावाहिक देख रही है, जो बुद्ध पूर्णिमा के दिन देखना आरम्भ किया था. उस दिन उनके निर्वाण का दृश्य देखा था. उनके उपदेश हृदय को छू गए थे, फिर जन्म से लेकर उनके बुद्ध बनने तक का संघर्ष देखा. कितने महान थे वे, कितने करुणावान और कितने बड़े तपस्वी किन्तु देवदत्त उन्हें कभी समझ नहीं पाया. उन्हें मरवाने के कितने षड्यन्त्र किये उसने. यशोधरा का त्याग भी अनुपम है, उसने बुद्ध के हृदय को समझ था. स्वयं में स्थित होकर ही कोई सुखों-दुखों के पार जा सकता है. मानव के शुभ कर्म एक दिन मुक्ति पथ पर ले जाते हैं और दुष्कर्म बन्धन की ओर. जिसे बुद्ध निर्वाण कहते हैं उसे ही ऋषि मोक्ष कहते हैं, जहां पूर्ण शांति है, जहां जाकर मन खो जाता है. जो सारे द्वंद्वों से अतीत है. जून आज पाँच दिनों के लिए बाहर गए हैं. अभी कुछ देर बाद नैनी व उसके साथ की महिलाएं आएँगी योग कक्षा के लिए, शाम के योग सत्र को एक घन्टा पहले खिसका दिया है क्योंकि शाम को मीटिंग है, फ्रिज को कल रात से बन्द किया है, भीतर की सारी बर्फ पिघल जाएगी तब वह अपना काम करना शुरू कर देगा. मानव का मन भी कभी कभी नकारात्मकता के कारण जम जाता है, फिर उसे साधना के द्वारा पिघलाया जाता है, पहले सा खुशनुमा हो जाता है, प्रेम की ऊष्मा जो भीतर दबी हुई थी, फिर झलकने लगती है. उसके सर के दाहिने भाग में ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने के कारण तनाव महसूस हो रहा है, विश्राम देने से वह ठीक हो जायेगा. पिछले कई दिनों से नियमित लेखन नहीं हुआ. अब समझ-बुझ कर, जागकर लिखना होगा. इस समय मौसम सुहाना है, भीतर एक सहजता का अनुभव हो रहा है, ध्यान के बाद की सहजता ! भीतर के उस अछूते केंद्र का पता उसे भी मिल गया है, वर्षों पूर्व उसकी झलक मिली थी, पर उसमें हर पल स्थित रहने के लिए सजगता बहुत जरूरी है. 

शाम के साढ़े चार बजे हैं. मन बुद्धमय हो गया है. उनकी मंजुल मूर्ति तथा सुंदर देशना भीतर तक छू जाती है. उनके उपदेश सरल हैं और अनुभव से उपजे हैं. वे सिद्धांत की बात नहीं कहते, व्यावहारिक ज्ञान देते हैं वे कहते हैं, सन्देह अति विकट शत्रु है, वह मानव को पतन की ले जाता है. ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, अग्नि के समान जलाते हैं और अहिंसा व करुणा आनंद को उपजाते हैं. बुद्ध शीलाचरण की बात करते हैं, फिर ध्यान का मन्त्र सिखाते हैं, जिससे विवेक का जन्म होता है, तथा शील का पालन सहज ही होने लगता है. ध्यान की गहराई में जो ज्ञान मिलता है, वही सच्चा ज्ञान है जिसके प्राप्त होने के बाद शील का पालन प्रयास पूर्वक नहीं करना पड़ता, लेकिन आरम्भ में तो पुरुषार्थ करना होगा, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा. शम, दम, तप, सन्तोष व ईश्वर प्राणिधान का पालन भी करना होगा. आज सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, दुःस्वप्न ही कह सकते हैं अथवा तो पूर्व के किये अशुद्ध कर्मों का फल देने वाला स्वप्न ! बुआ जी को देखा, उनका मुख बिलकुल अलग था. उनकी पुत्री का विवाह हो रहा है. वह रसोईघर में है पर शौच का पालन नहीं किया. अतीत के कितने ही विकर्मों का स्मरण हो आया. वह जगी तो भीतर प्रार्थना चल रही थी. उनका अवचेतन मन नींद में भी सक्रिय रहता है. उठकर टहलने गयी, वर्षा के बाद सब कुछ साफ-सुथरा था, मौसम शीतल था. सद्गुरु को सुना जो कह रहे थे, यदि अपने घर वापस लौटना है तो पहले पूरी तरह थक जाओ, जैसे बुद्ध कहते हैं, अपने भीतर सुख के केंद्र को खोजना है तो जीवन में दुःख है इसे अनुभव करना होगा. भीतर जाकर पता चलता है, परम् आनंद व प्रेम का स्रोत भीतर ही है . आज भी बुद्ध के जीवन की गाथा देखी-सुनी. अब कुछ ही अंक रह गए हैं. मगध, कपिलवस्तु, कौशल आदि राज्यों में ही बुद्ध विहार करते थे, पर उनका धर्म पूरे विश्व में फ़ैल गया जैसे सदगुरू का सन्देश पूरे विश्व में अपनाया जा रहा है. इसी महीने उनका जन्मदिन है, उस दिन वे दोपहर को श्रमदान करेंगे  और शाम को गुरुपूजा में सम्मिलित होंगे. जून आज तमिलनाडु जा रहे हैं, वह जो पौधे ले गए थे, नन्हे ने गमलों में लगा दिए हैं. 

Friday, November 29, 2019

बुद्धं शरणं गच्छामि




कल का पन्ना कोरा ही रह गया है, स्वास्थ्य ठीक न हो तो उत्पादक क्षमता कितनी घट जाती है. डायरी में आज भी कल की तरह नासिका में विचित्र सी गंध आ रही है . कल दिन भर मन में अनुत्तरित प्रश्न चलते रहे, आज सुबह तक सन्देह का सा वातावरण था. कोई स्वास्थ्य संबन्धी समस्या है या कोई रहस्य है सृष्टि का. आज दोपहर कोर्स का अंतिम दिन था, सेंटर गयी, वहाँ का सकारात्मक वातावरण तथा टीचर के प्रेरणादायक वचन सुनकर मन पुनः आह्लाद से भर गया है. जो भी  है परमात्मा का प्रसाद है, आज से पूर्व किसी भी स्वास्थ्य संबंधित समस्या ने उसे परेशान नहीं किया, पर गंध आने पर भविष्य में कोई समस्या हो सकती है, इसी भय का असर था कि मन घबरा गया था. कल किसने देखा है, जो ‘है’ उसी पर ध्यान देना है. जो नहीं है उसे महत्व नहीं देना है. गुरु का ज्ञान भी उसी वक्त काम आता है जब वे शरणागत हो जाते हैं उनके हाथ में कुछ नहीं है, जो भी जब भी होगा उसका सामना वे करेंगे, यह भरोसा गुरु उन्हें देता है. गुरूजी कहते हैं, परमात्मा, आत्मा और गुरु में कोई भेद नहीं है. उसका जीवन किसी के काम आये तभी सार्थक होगा. जो काम वह भली प्रकार कर सकती है, उसी के द्वारा संसार के किसी काम आ सकती है. उसने सोचा कल स्कूल जाना है, एक नए सन्देश के साथ, फिर कैलेंडर पर नजर गयी, कल बुद्ध पूर्णिमा है. वह लिख रही थी कि ड्राइवर का फोन आया, उसे दस किलो अख़बार की रद्दी चाहिए, शाम को ले जायेगा. छोटे भाई ने आज छोटी बुआ से वीडियो कॉल पर बात करायी, उनका सुंदर घर भी देखा. कुछ वर्ष अस्वस्थ रहने के बाद अब वह पुनः ठीक हो रही हैं. 

नौ बजने वाले हैं आज बुद्ध पूर्णिमा है. भगवान बुद्ध  के जीवन पर आधारित एक धारावाहिक  भी है यू-ट्यूब पर, दो एपिसोड देखे. सभी भाग देखेगी एक एक कर ! ब्लॉग पर उनके बारे में दो पोस्ट्स लिखीं, उनका जीवन आज भी एक मिसाल है, अनोखी थी उनकी तपस्या और अद्धभुत था उनका ज्ञान.  आनन्द ने उनके उनकर वचनों को संग्रहित किया. काश्यप उनके प्रिय शिष्य थे. रात वे समय पर सोये सो सुबह भी सहजता से उठे. माली से कुछ काम करवाना था, बुलवाया पर उसके सर में पीड़ा थी, शायद ज्यादा नशा करने के कारण. योग कक्षा में आज बच्चों को आनंद पूर्वक बड़ा करने के कुछ उपाय बताये, जो उस किताब में पढ़े थे. नैनी को भी बताना है, वह अपने बेटे को बहुत डांटती है. विचित्र गन्ध विदा हो गयी, इस समय नासिका से भीनी-भीनी मधुर गन्ध आ रही है. परमात्मा की सृष्टि में सब कुछ कितना रहस्यमय है. आज दोपहर डॉक्टर के पास भी गयी थी, उसने एक फ्री एयर स्प्रे दिया है, दिन में एक ही बार डालना है. एक्स रे  भी किया. आज क्लब में ‘अक्टूबर’ फिल्म थी. जून गए थे. 

परसों वे शिवसागर गए थे, कल तीन कविताएं लिखीं, एक परसों के पन्ने पर है, आशा और विश्वास से भरे शब्द.. यदि पीड़ा न हो जीवन में तो सुख का सम्मान भला कौन करेगा. इन कविताओं को एक-एक कर ब्लॉग पर प्रकाशित करेगी, हो सकता है उसके शब्द किसी आकुल उर को शांति की एक छांव दे जाएँ. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं अभी-अभी छोटे भाई का फोन आया. आज सुबह छह बजे उसे कोई उठाने आया था, किन्हीं हाथों ने उसे स्पर्श किया और थपकी देकर कहा भोई, उठो, उठो ! उसने आवाज भी स्पष्ट सुनी और वह सुबह से ही आश्चर्य विमुग्ध है. परमात्मा उनके आस-पास है, वह कभी उनसे दूर नहीं होता, वे ही अपनी व्यर्थ की उलझनों में उसे भुला बैठते हैं. टीवी पर तेनालीराम की चतुराई की कहानी आ रही है. 

Thursday, November 28, 2019

सिंधी कोकी




रात्रि  के आठ बजने वाले हैं, आज सुबह उठने में देर हुई. उठते ही पहले की तरह मन उत्साह व शक्ति से भरा नहीं था. नींद जैसे पूरी न हुई हो, या फिर नींद पूरी नहीं है यह भाव अथवा विचार.. उसने स्वयं ही नींद को मृत्यु की निशानी मानकर सम्मान देना बन्द कर दिया था. सोने से पूर्व ध्यान करके मन को इतना होश से भर लेती थी की नींद के लिए जरूरी तमस कहीं दूर चला जाता था, निद्रा भी आवश्यक है पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए, ध्यान के समय ध्यान करना है और नींद के समय नींद लेनी है. पिछले दिनों ध्यान के बाद कुछ सुनकर सोने का क्रम बना लिया था तो मन उस पर भी चिंतन करता ही रहता होगा. खैर .. अब भी कुछ देर नहीं हुई है, जब जागो तभी सवेरा ! दिन सामान्य रहा. मौसम आजकल बहुत सुहावना है. पंछियों का कलरव दिनभर गूँजता रहता है. गंधराज की सुगन्ध भी आती होगी पर उसकी सूंघने की क्षमता कुछ घट गयी है. कोई अन्य गन्ध ही उसे घेरे रहती है, कभी लगता है यह कोई रोग है  फिर लगता है नहीं इसका अध्यात्म से ही कोई संबंध है. परमात्मा उसके साथ है, उसे सब ज्ञात है. आजकल उसे अपनी अल्पज्ञता का बहुत भान होता है, लगता है उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है, बिलकुल अज्ञानी जान पड़ती है स्वयं को. वैसे भी जब इतना विराट आयोजन चल रहा है, पंछी बिना पढ़ाये  ही अपने गीत बना लेते हैं, ऋतुएँ बदल जाती हैं तो उसमें उसका होना भी तो शामिल है. अस्तित्त्व को जो बनाना हुआ बनाएगा, करना हुआ कराएगा. शरीर प्रकृति का अंश है और आत्मा परमात्मा का, मन समाज का दिया हुआ है. ‘मैं’ एक  भ्रम ही है. इसी देह को तुष्ट करने के सारे प्रयास होते हैं . पर देह तो जड़ है, सूक्ष्म इन्द्रियां चेतन होती हुई प्रतीत होती हैं जो मन को नचाती हैं, जैसे मन बुद्धि को नचाता है और जैसे बुद्धि स्वयं को नचाती है . स्वयं जो आत्मा के सान्निध्य में समीपता का अनुभव कर सकता था, इतर सुखों के लिए लोभ से भरा नजर आता है, गिरने की भी कोई गरिमा होनी चाहिए न, आसक्ति उसी को तो कहते हैं जो आ तो सकती है पर जा नहीं सकती. सत्य में स्थित होना है तो हर आसक्ति को जाना होगा.



आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ कोर्स का तीसरा दिन था, सोचा था कि जायेगी पर शाम को प्रेजिडेंट का संदेश फोन पर पढ़ा, गवर्निंग बॉडी की मीटिंग बुलायी है. स्कूल में एक बच्चे को चोट लग गयी है. जब वहां गयी तो  पता चला आँख के ऊपर माथे पर दरवाजे से चोट लगी है, हाथ में हल्का फ्रैक्चर भी है, डिब्रूगढ़ ले जाना पड़ा है बच्चे को. प्रिंसिपल भी आयी थीं, दो शिकायतें भी आयी थीं दो बच्चों के माता-पिता की और से, दो अध्यापिकाओं के खिलाफ. शायद उन्होंने बच्चों पर ज्यादा कठोरता दिखाई थी. मीटिंग में और किसी विषय पर कोई बात नहीं हुई. क्लब के स्थापना दिवस पर सफाई का सेवा कार्य करने के लिए जो सुझाव व तस्वीर उसने भेजी थी, उस पर भी कोई टिप्पणी नहीं की किसी ने. जून आज गेस्टहाउस गए हैं, आजकल वह सेफ्टी विभाग भी देख रहे हैं कोई ऑडिटिंग टीम आयी है, जिसको पार्टी दी गयी है. जाने से पूर्व उन्होंने पिताजी से बात की, उन्हें जून का भेजा वेट वाइप्स का पैकेट मिल गया है.



ग्यारह बजने वाले हैं. अभी-अभी बिजली चली गयी. मौसम आज गर्म है. बाहर से एक कोयल के कूकने की आवाज आ रही है. नैनी ने बगीचे से ढेर सारी गाजरें लाकर दीं। आजकल फूलों से भी बगीचा भर हुआ है. पिटूनिया, गंधराज, श्वेत लिली, जरबेरा अपने पूरे शबाब पर हैं. माली भी इस हफ्ते रोज ही आ रहा है. उस समय जून आ गए, फिर दोपहर का भोजन, कुछ देर विश्राम, ब्लॉग लेखन, सांध्य योग कक्षा, रात्रि भोजन तथा बाद का भ्रमण, सब कुछ करने के बाद अब पुनः डायरी उठायी है, भोजन करते समय जून ने ‘कोकी’ बनाने  का वीडियो  दिखाया. किन्हीं पूनम जी ने इस सिंधी नाश्ते की अच्छी सी विधि सिखाई है. उनका कहना है पहली तारीख को मई दिवस पर दफ्तर बन्द है उसी दिन यह नाश्ता बनाएंगे. उसके बाद उन्हें शिवसागर जाना है. आज दो वर्ष पूर्व की डायरी में चेट्टीनाड की साड़ियों का जिक्र पढ़ा, जून अगले महीने फिर वहीं जाने वाले हैं. कल पुस्तकालय से दो नई किताबें लायी, एक ‘न्यू एज पेरेंटिंग’ पर है और दूसरी ‘जे पी वासवानी’ की लिखी है, जो परमात्मा के प्रति प्रेम से भरी हुई है. भक्ति और श्रद्धा जीवन में न हों तो जीवन कितने सूना-सूना रहता है. परमात्मा जो सदा ही मानव के साथ है, वह उससे दूर ही रह जाता है. वे पूरी तरह उसके प्रति समर्पित नहीं होते तो वह भी उन्हें पूरा नहीं मिलता. आज दोपहर को कितनी गहरी नींद आयी, पिछले दिनों रात की नींद गहरी नहीं थी, नींद में वे अहंकार से मुक्त हो जाते हैं और उस परम् के साथ एक हो जाते हैं. आज योग कक्षा में गुरूजी का ज्ञान सुनकर एक साधिका ने कहा, यह ज्ञान पहले मिला होता तो इतना दुःख नहीं सहना पड़ा होता.