Friday, September 21, 2018

दादा-दादी दिवस



आज सुबह टीवी पर सुंदर वचन सुने थे. ज्ञान रत्नों से आत्मा को अपना श्रृंगार करना है, फिर उस  ज्ञान का उपयोग करना है. सुने हुए को यदि व्यवहार में नहीं लाया, अपना संस्कार नहीं बनाया, तो सुनना व्यर्थ ही है. योग की शक्ति से ही ज्ञान को भीतर स्थिर किया जा सकता है, अन्यथा स्वंय को छलना ही कहा जायेगा. परमात्मा से यदि संबंध जुड़े तो आत्मा पवित्र बन जाती है, पवित्रता की शक्ति स्वतन्त्रता की शक्ति है. पवित्र आत्मा को कर्मों के बंधन नहीं बांधते. पञ्च तत्वों से बना यह तन भी तब आत्मा को बंधन नहीं लगता, वह इसका आधार लेकर जगत में लीला करती है. वह देह में रहकर भी अशरीरी ही रहती है. ऐसी स्थिति में दुःख का नाम भी नहीं रहता. इसी खुशी में आत्मा शरीर से मोह निकाल देती है. यदि देह से ममत्व है तो आत्मा बंधन में है, जब तक पवित्र नहीं बने हैं, तथा कर्मातीत अवस्था नहीं हुई है, तब तक विदेह भाव सिद्ध नहीं होता. देह सहित सब वस्तुओं से ममत्व हटा देना है. जब देह इस स्थिति में नहीं है कि आत्मा स्वयं आनंद में हो और अन्यों को आनन्द बांटे तो नई देह लेने का वक्त आ गया है, तब आत्मा नई राह पर निकल पडती है. मक्खन से ज्यों बाल निकल जाता है, वैसे ही देह से आत्मा आराम से निकल जाती है, यदि देह में ममत्व नहीं है.
स्कूल में दादा-दादी दिवस मनाया जा रहा है, उसे एक भाषण देने के लिए कहा है. दोपहर को कुछ लिखने बैठी तो बचपन के कितने ही चित्र सम्मुख आने लगे. दादी से सुनी कहानियाँ और दादा के यूनानी दवाघर से खाए स्वादिष्ट चूर्ण. लगभग दस वर्षों तक वे सब साथ रहे. उसके बाद भी समय-समय पर मिलते रहे. आजकल कम ही बच्चों को दादा-दादी का साथ मिल पाता है.

रात्रि के आठ बजे हैं. चार दिनों के बाद आज कलम उठाई है. ब्लॉग पर आज कुछ भी पोस्ट नहीं किया, फेसबुक पर तस्वीरें अवश्य पोस्ट कीं. कल बड़े भाई चले गये, जाते समय उनका भी मन भर आया था, दिन भर मन थोड़ा उदास रहा, पर वक्त के साथ भावनाएं अपने आप ही सम्भल जाती हैं. उन्हें यकीनन यहाँ रहना अच्छा लगा होगा. जून जब से आये हैं, उन्हें सर्दी-जुकाम की शिकायत है, ठंडे देशों से ही शायद यह सौगात मिली है. उन्हें नीचे बैठने में दिक्कत हो रही है, सो कुछ देर कुर्सी पर बैठकर प्राणायाम किया. दोपहर को एक सखी के घर गयी उसकी सासुमाँ का श्राद्ध था. उसके बाद बच्चों की योग कक्षा में, अगले हफ्ते गाँधी जयंती मनाने के लिए उनसे कहा है. कुछ सार्थक होना ही चाहिए. स्वच्छता अभियान के लिए कुछ करे ऐसा भी मन में आता है. अपने समय और शक्ति का पूरा उपयोग करना होगा उसे, एक-एक क्षण का उपयोग करना होगा. जून कल से दो दिनों के लिए गोहाटी जा रहे हैं. कल से दीवाली की सफाई भी आरम्भ करनी है. पुब्लिक लाइब्रेरी से आयुर्वेद पर एक किताब भी लायी है, उस दिन भाई को लाइब्रेरी दिखने ले गयी थी, वहीं मिली थी. काफी अच्छी किताब है.
मौसम आज भी सुहाना है. पिछले दिनों लेखन व साधना में जो गतिरोध उत्पन्न हुआ, उसे पटरी पर लाने का सुंदर अवसर मिला है. सुबह स्कूल गयी. बच्चों को योग सिखाया. कुछ बच्चे वाकई करना चाहते हैं, पर अन्यों के कारण कर नहीं पाते. शिक्षिकाएं यदि अपनी-अपनी कक्षा के बच्चों पर थोड़ी नजर रखें तो सभी शांत रह सकते हैं. उसने सोचा अगली बार यदि ऐसा हुआ तो वह स्कूल इंचार्ज से कहेगी. प्रधानाध्यापिका कुछ दिनों के लिए बाहर गयी हैं. उनकी माँ वृद्धा हैं, उन्हें भूलने का रोग हो गया है. भाई विदेश में रहते हैं. समाचारों में सुना, प्रधानमन्त्री ने पाकिस्तान के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाने का निर्णय लिया है.


Thursday, September 20, 2018

सिस्टर शिवानी का कार्यक्रम



शाम के चार बजकर दस मिनट हुए हैं. आज भी क्लब में मीटिंग है. कल बड़े भाई आ रहे हैं, वह उन्हें लेने जाएगी. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी थी, शिक्षक दिवस का कार्यक्रम था, क्लब की तरफ से व अपनी तरफ से भी उसने सभी अध्यापिकाओं को उपहार दिए. उनके द्वारा पेश किया कार्यक्रम भी अच्छा रहा. सुबह नींद जल्दी खुल गयी, कुछ देर ध्यान किया बाद में फिर नींद आ गयी, किसी ने आवाज दी उस नाम से जिसमें उसे जून बुलाते हैं. कैसा रहस्यमय यह संसार, कौन है जो बिना मुख के बोलता है, कौन है जो बिना हाथों के छूता है, उस दिन कंधों पर जो स्पर्श किसी ने किया था, वह अभी तक सिहरन पैदा कर देता है. पिछले कुछ दिनों से एक गंध हर समय साथ रहती है. कैसी है यह गंध, क्या है इसका स्रोत..कुछ पता नहीं. आज कई दिन बाद फोन ठीक हुआ, शायद दो-तीन दिन बाद ब्लॉग पर लिखा. कविता कई दिनों से नहीं लिखी, समय भी तो चाहिए और एक भिन्न भाव दशा, अब मन स्थिर हो गया है.

कल भाई की फ्लाईट समय पर थी. दोपहर बाद वे हवाई अड्डे से घर वापस आ गये थे. सुबह भ्रमण के लिए गये. भाई को यहाँ अच्छा लग रहा है. दिन भर कुछ न कुछ क्रिया-कलाप होता है. शाम को क्लब जाना था, वापस आकर भोजन करते और सोते काफी देर हो गयी. आज भी सुबह स्कूल गयी, शाम को क्लब में एक परिचित परिवार का विदाई समारोह था. अच्छा रहा, लौटने में देर हो गयी. भाई तब तक जगे ही थे. अखबार में सुडोकू हल कर रहे थे.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. समय जैसे तीव्र गति से भाग रहा है. आज वे ड्राइवर के साथ दूर तक घूमने गये, भाई को पाइप ब्रिज दिखाया. उन्होंने ही बाजार से सब्जी भी खरीदी. शाम को योगनिद्रा का अभ्यास किया. लगभग रोज ही एक बार सिस्टर शिवानी को सुनने का क्रम भी बन गया है. वह अस्पताल गयी, एक सखी की सासुमाँ वहाँ भर्ती हैं. उसे देखकर वह प्रसन्न हुई. प्रेम से किया गया छोटा सा कृत्य भी किसी को राहत दे जाता है.

शाम के साढ़े पांच बजे हैं. बाहर से जंगली काली मुर्गी की आवाज लगातार आ रही है, जो अपने पूरे परिवार के साथ बांस की हेज में रहती है. जब बगीचे में कोई नहीं होता तब घूमती फिरती है और शोर मचाती है, बाहर जाकर देखें तो छुप जाती है. अभी कुछ देर पूर्व वे बगीचे में थे. भाई ने एक तस्वीर ली, आंवले के वृक्ष पर बैठी गिलहरी की. आकाश पूर्व में गुलाबी हो रहा था. कल शाम वे भ्रमण पथ पर जाकर आकाश की तस्वीर उतारेंगे. आज जून इटली के शहर ट्यूरिन में हैं, उन्हें वापस आने में चार-पांच दिन और हैं. कल फेसबुक पर एक वरिष्ठ लेखक ने प्रश्न किया, वह फेसबुक पर क्यों है, सहज ही उत्तर लिख दिया, पर उन्होंने उसे टैग करके पोस्ट कर दिया, कितने ही लोगों ने पढ़ा, उसकी एक तस्वीर भी पोस्ट कर दी, कब किस मार्ग से लोगों से जुड़ना होगा, कौन जानता है. विचार किस प्रकार उनका भाग्य बनाते हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज देखा. उन्हें मनसा, वाचा, कर्मणा कितना सजग रहना होगा.

Friday, September 14, 2018

देवदूत



दस बजने वाले हैं सुबह के. कल रात्रि साढ़े सात बजे हवाई जहाज उतरा, मंझला भाई लेने आया था हवाई अड्डे पर. नौ बजे तक वे घर पहुंच गये. बड़े भाई व भतीजी भी मिलने आये थे. भाई अब ठीक हैं. एक घंटे बाद सोने गयी, पहले नींद नहीं आ रही थी, फिर आ गयी और सुबह पांच बजे ही खुली. स्नान करके प्राणायाम किया, अनोखा अनुभव हुआ. ‘दिव्य समाज के निर्माण’ के सूत्र जैसे कोई भीतर सिखा रहा था. वह यही कोर्स करने ही तो आश्रम गयी थी. कल आश्रम में भी सुदर्शन क्रिया के बाद कितना अनोखा अनुभव हुआ था. एक नन्हे बच्चे का छोटा सा कोमल हाथ मस्तक को छूता हुआ सा लगा, फिर एक सुंदर महिला की आकृति बांयी तरफ सामने आकर बैठ गयी तथा एक पुरुष की आकृति दांयी ओर सामने आकर बैठ गयी. अद्भुत शांति का अनुभव हो रहा था. आज सुबह भी ध्यान घटा. अब भीतर जैसी स्थिरता का अनुभव होता है, वह पहले नहीं था. भक्ति नित नूतन होती है, पढ़ा था, पर अब इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है. परमात्मा उनका सुहृद है, मित्र है, सखा है, ये न जाने कितनी बार लिखा होगा, वह उनका अपना आप है, वह उनसे अभिन्न है, वह उनसे दूर नहीं है, वह उतना ही करीब है, जितना वे स्वयं अपने आप से हैं, वह उनसे उसी तरह बातें करता है जैसे दो मित्र आपस में बातें करते हैं. वह अनुपम है, उसने खुद पढ़ाया उसे, दिव्य समाज के निर्माण का कोर्स. स्वीकार भाव को दृढ़ करवाया. उसका प्रेम अनोखा है !

वह आज गुड़गाँव में है, कल शाम ही यहाँ आ गयी थी, यहाँ के मैनेजमेंट संस्थान में, जहाँ जून की ट्रेनिंग चल रही है. कैम्पस बहुत विशाल है और हर-भरा व शांत है. प्रातःभ्रमण के समय उन्हें कुछ अन्य ट्रेनी भी मिले. दोपहर बाद वे बाजार जायेंगे और शाम को भाई के घर. कल सुबह उसे वापस घर जाना है. सुबह एक अलौकिक अनुभव हुआ. पांच बजकर ग्यारह मिनट हुए थे जब किन्हीं कोमल हाथों का स्पर्श दोनों कंधों पर पाकर उठी. कितना प्रेम था और कितनी शीतलता थी उस स्पर्श में, अनोखी थी उसकी कोमलता, कोई देवदूत था या परमात्मा के स्नेह भरे हाथ. उठकर स्नान आदि किया और प्राणायाम. उसे याद आया एक सुबह किसी मधुर आवाज ने उठाया, घंटी की सी आवाज थी. उस परम के पास हजारों साधन हैं, जब चाहे किसी का भी प्रयोग कर सकता है.

सितम्बर का आरंभ हुए दो दिन हो गये हैं. जून पेरिस पहुँच गये हैं. तस्वीरें भेजी हैं. शाम को भाई से बात की, उन्होंने पैकिंग आरंभ कर दी है. दो दिन बाद उन्हें आना है. घर की सफाई काफी हो चुकी है, कुछ कल हो जाएगी. सेक्रेटरी का फोन आया, कल दस बजे क्लब जाना है, बाजार भी जाना है, फूलों का एक गुलदस्ता भी लेना है. इस बार मीटिंग में एक सदस्या की विदाई पार्टी है, उन्हें देना है. इस बार वार्षिक सभा है, वर्ष भर में जिन लोगों को विदाई दी गयी, उन्हें याद करते हुए नाम कहना ठीक होगा, चाहे जितना भी समय लगे. मंझली भाभी से बात हुई, दीदी ने उन्हें अपने बगीचे की भिन्डी व तोरई भिजवाई है. आज टेलीफोन खराब हो गया, इंटरनेट नहीं चल रहा, वैसे भी पिछले कई दिनों से लेखन का काम बहुत कम हो पा रहा है. अब इस महीने भी ऐसा ही चलेगा. भीतर विश्रांति है, एक नई सी गंध हर समय बनी रहती है. पहले कभी-कभी आती थी, शायद इसका कारण शारीरिक से अधिक आध्यात्मिक है. उसे शुचिता का अधिक ध्यान देना होगा. होना ही पर्याप्त है जिसके लिए, ऐसी स्थिति अब बनती नजर आ रही है. आज सुबह ध्यान में कैसा विचित्र अनुभव हुआ. जैसे भूचाल आया हो, कितने ही दृश्य दिखे, छोटी भांजी को देखा, अपने किसी पूर्व जन्म में वह अंग्रेज थी.   

Tuesday, September 11, 2018

ब्रह्मपुत्र का पाट



पूरे पांच दिनों के बाद कलम उठायी है. परसों शाम इस समय वह गोहाटी के आर्ट ऑफ़ लिविंग आश्रम जा रही होगी, या हो सकता है पहुँच ही चुकी हो. तैयारी लगभग हो गयी है. आज ओडोमॉस भी मंगायी, जून ने कल याद दिलाया था. उनकी ट्रेनिंग अच्छी चल रही है. आश्रम का जीवन शांतिदायक होगा, चाहे आरामदायक न हो. अल्प साधनों में रहना सीखना हो तो आश्रम में ही सीखा जा सकता है. बंगलूरु में उनका घर सम्भवतः अगले तीन वर्षों में भी बनकर तैयार न हो सके तो वे आश्रम में ही रहेंगे, अवश्य वहाँ ऐसा कोई स्थान होता होगा, आखिर इतने बड़े आश्रम को चलाने के लिए कितने सारे लोग वहाँ रहते ही होंगे. अभी कुछ देर में सेक्रेटरी आएगी, क्लब का कुछ कार्य है. उसने एक सदस्या के बारे में बताया कि वह दुखी है, एक सीनियर सदस्या ने उसे कड़े शब्द कहे. इंसान का दिल बहुत कोमल होता है, फूल से भी नाजुक, जरा सी बात पर कुम्हला जाता है. आत्मा का अनुभव किये बिना मन को संभालना बहुत मुश्किल है, आत्मा के पास अपार शक्ति है. उस दुखी महिला को समझाना पर आसान नहीं है, वह भावुक है और ज्यादा सकारात्मक भी नहीं, काम बहुत मन से करती है. उसको फोन किया पर उसने उठाया नहीं. वह उसके लिए प्रार्थना ही कर सकती है.

आज दोपहर मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. वापस आकर क्लब की कुछ सदस्याओं को फोन किये नयी कमेटी के कार्यकर्ताओं के चुनाव के लिए, कुछ मान गयीं, कुछ ने मना कर दिया. सेक्रेटरी भी कल कुछ अन्यों को फोन करेगी. सुबह जगने से पहले विस्मित कर देने वाला अनुभव हुआ, वह जिस वस्तु या जीव की कल्पना करती थी, वह प्रकट हो जाता था जैसे बिलकुल सजीव हो. उनके मन में कितनी शक्ति छुपी है. यह अनुभव रोमांचकारी था, पिछले दिनों और भी कई विचित्र अनुभव हुए, पर लिखे नहीं और अब याद नहीं हैं. बड़े भाई का स्वास्थ्य अब ठीक है, पर उन्हें कमजोरी है. जून अपने प्रशिक्षण से प्रसन्न हैं, नन्हे ने भी एक ट्रेनिंग ली कि लोगों को कैसे नियुक्त किया जाये. बिना ट्रेनिंग के वह कितने ही कालेजों में कम्पनी के लिए छात्रों का इंटरव्यू लेने गया है. कह रहा था, इस ट्रेनिंग से काफी सुझाव मिले हैं. वह भी एक किताब पढ़ रही है जो एक ट्रेनर ने लिखी है, इस तरह वे तीनों ही कुछ नया सीख रहे हैं. अभी वह रसोईघर में गयी और नैनी को फ्रिज में बर्फ की ट्रे रखते देखा, इसका अर्थ हुआ उसने बिना कहे फ्रिज से बर्फ निकाली, अवश्य ही वह अपनापन महसूस करती होगी. उसने सोचा, अच्छा है.

इस आश्रम में यह पहली रात है. पिछले माह जब यहाँ के स्वामीजी उनके स्थान पर गये थे, तब इस कोर्स के बारे में पता चला था, पर अभी तक ज्ञात नहीं है कि कल सुबह कोर्स आरंभ भी हो पायेगा या नहीं. कम से कम बीस प्रतिभागियों के होने पर ही होगा और आज की तिथि में केवल ग्यारह ही हैं. टीचर भी कोलकाता से आई हैं. उसकी पीठ में शायद दिन भर में एक भी बार न लेटने के कारण दर्द हो रहा है. कुछ पंक्तियाँ लिखकर सोना ही अगला कार्य है. सुबह सवा नौ बजे वह घर से निकली थी, दोपहर सवा दो बजे गोहाटी में रहने वाली एक सखी के यहाँ पहुंच गयी, दोपहर का भोजन और कुछ देर विश्राम के बाद पौने चार बजे वहाँ से विदा लेकर इस आश्रम में पहुंची. यहाँ पर सब सुविधाएँ हैं पर गर्मी के कारण तथा उस समय बिजली न होने के कारण कुछ देर परेशानी हुई. आसपास का दृश्य बहुत सुंदर है. कल प्रातःकाल और तस्वीरें लेगी. ब्रह्मपुत्र का चौड़ा पाट सागर सा विस्तीर्ण लगता है. शाम को सभी ने मिलकर गुरूजी का जन्माष्टमी के अवसर पर सीधा प्रसारण देखा, फिर भोजन किया. बाद में मंदिर में कृष्ण पूजा हुई, प्रसाद भी मिला.

सुबह के सात बजे हैं. एक सुहावनी सुबह है. वह आश्रम के कमरे में है. बहर वर्षा हो रही है. सुबह पांच बजे ही नींद खुल गयी. स्नान किया, फिर कुछ देर टहलने गयी. तब वर्षा नहीं थी. कुछ देर नदी की तरफ मुख करके एक कुर्सी पर बैठकर ध्यान किया. बहुत अच्छा अनुभव था. जून से बात की, अब कुछ देर में रूद्र पूजा में भाग लेने मन्दिर जाना है.

Monday, September 10, 2018

तीन परतों वाला केक



आज टीवी पर सुंदर वचन सुने, इन्द्रियां प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती जा रही है और मृत्यु सामने खड़ी है, फिर भी उन्हें दुखदायी सांसारिक भोगों में सुख भास रहा है. जन्म, मृत्यु और जरा संबंधी दुखों से सदा आक्रांत होकर संसार में मनुष्य पकाया जा रहा है तो भी वह पाप से उद्व्गिन नहीं हो रहा है. जैसे कछुआ अपनी इन्द्रियों को समेट लेता है, वैसे ही साधक कामनाओं को संकुचित करके रजोगुण रहित हो जाता है.’’
भोग में रोग का भय है, ऊँचे कुल में पतन का भय है. मान में दीनता का, रूप में वृद्धावस्था का तथा देह में काल का भय है. संसार में सभी वस्तुएं भयपूर्ण हैं, भय से रहित तो केवल वैराग्य ही है.
उनके शुभ और अशुभ कर्मों के एकमात्र साक्षी वे स्वयं ही हैं, क्योंकि कर्मों के पीछे की भावना ही उन्हें शुभ अथवा अशुभ बनाती है. मनसा, वाचा, कर्मणा किये गये हर कर्म का फल उन्हें ही मिलने वाला है. अज्ञान दशा में जो कर्म उन्होंने आज तक किये हैं, उनका फल सुख या दुःख के रूप में सम्मुख आने ही वाला है. उनको सम अवस्था में रहकर ही काटा जा सकता है, अन्यथा नये कर्मों का जाल खड़ा हो जायेगा. जैसे यदि कोई अपनी आदत या संस्कार के कारण दुःख पा चुका है, पुनः वही स्थिति आने पर उसे समता बनाये रखनी है न कि पूर्व की भांति उसे दोहराना है, तब तो वह उस संस्कार को दृढ ही करता जायेगा. जहाँ कहीं भी आसक्ति दिखाई दे तो उसमें दोष दृष्टि करके स्वयं को उससे मुक्त करना चाहिए, क्योंकि जहाँ वह परमसुख का स्रोत है, वहाँ कुछ भी नहीं है, कोई विचार कोई भाव भी वहाँ प्रवेश नहीं पा सकता. उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं होती रहती है, अनावश्यक का ही त्याग करना है.

शाम के सात बजे हैं. आज स्वतन्त्रता दिवस है. सुबह वे समय से उठे, नेहरू मैदान जाने से पूर्व प्रधानमन्त्री का भाषण सुना. अस्पताल में मरीजों को मिठाई दी. कम्पनी में बहुत उत्साह से आज का दिन मनाया गया. घर में भी झंडा फहराया और लड्डू बांटे. प्रधानमन्त्री का भाषण उत्साहवर्धक था. उन्होंने पाकिस्तान में बढ़ते असंतोष का भी जिक्र किया. नैनी ने आज सुबह पुत्र के जन्मदिन के केक का फोटो दिखाया. तीन परतों में सजा था, जिसपर एक बच्चे का पुतला था तथा एक गेंद. केक बनाकर सजाने के एक से एक नायाब तरीके निकल रहे हैं. आजकल नेट से देखकर लोग काफी सृजनशील हो गये हैं. शाम को वे यात्रा की तैयारी के लिए खरीदारी करने गये. सुबह ध्यान में गुरूमाँ के मुद्रा ध्यान का सीडी लगाया, अंत में एक सखी के साथ नृत्य किया, उसे भी आनन्द आया होगा.
साढ़े आठ बजे हैं. अज उसने स्वयं से वादा किया है कि वह सहजता से शुद्ध अंग्रेजी भाषा में बोलने का अभ्यास करेगी, और किसी के भी सम्मुख इस भाषा में बोलने से झिझकेगी नहीं. परमात्मा उसके साथ है उसने कल्पना में एक विशाल समूह के सामने स्वयं को अंग्रेजी में भाषण करते हुए देखा, उसे लगा वह कर सकती है. अगले हफ्ते उसे एक कोर्स के लिए गोहाटी जाना है. वहाँ उसे समूह मे काम करने का अवसर भी मिलने वाला है.

आज जो पीड़ा है, कल वही हँसी बनेगी. विनाश की महाक्रीड़ा से ही नई सृष्टि जगेगी ! ब्रह्मा ने सृष्टि की, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार ! हर अश्रु छिपाए है भीतर, एक मुक्त हँसी का कलरव स्वर ! आज एक परिचिता के घर गयी पहली बार, उसने अपनी सीडी दिखाई, सुनाई. असमिया, हिंदी, तथा बंगाली गाना सुनाया जो अपनी माँ के लिए लिखा है तथा फिल्माया है. उसकी माँ ने भी पूरा साथ दिया है. कितनी ऊर्जा है उसमें. चित्रकला का भी पांच वर्षीय डिप्लोमा कोर्स कर रही है, अंतिम वर्ष में है. लिखती भी है, संगीत भी देती है और गाती भी है. केक भी बनाती है. परमात्मा ने उसे सब कुछ दिया है, सुंदर भी है, पर फिर भी संतुष्ट नहीं. इन्सान को कितना भी मिल जाये, वह तृप्त होना नहीं जनता. तृप्ति केवल और केवल आत्मा में जाकर ही मिलती है. जो भी वे होना चाहते है,  वे हैं ही, यह जानकर ही मन शांत होकर बैठ जाता है.   

Friday, September 7, 2018

कमल कुंड



शाम के चार बजकर बीस मिनट हुए हैं. जून अभी कुछ देर में आने वाले होंगे. मौसम गर्म है. टीवी पर प्रधानमंत्री तमिलनाडु के एक परमाणु ऊर्जा केंद्र को राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं. कुडनकुलम के इस केंद्र को बनाते समय उसका विरोध हुआ था, पर विकास की धारा को कौन रोक सकता है. ओलम्पिक खेलों में भारत के लिए आज अच्छा दिन रहा है. हाकी टीम ने अर्जेंटीना को हराया है. सुबह साढ़े चार बजे उठे वे, बाहर लॉन में कुछ देर टहले, आजकल दूर तक टहलने नहीं जा रहे हैं. जून को डाक्टर ने मना किया है. नौ बजे एक योग साधिका ध्यान के लिए आती है. उसे ध्यान के बारे में समझा सकी, उस वक्त जैसे कोई भीतर से अपने आप बोलने लगता है, परमात्मा हर क्षण उनके साथ है ! समय कितना बदल गया है. जो मित्र होते हैं, वही एक समय शत्रु बन जाते हैं फिर वही मित्र बन जाते हैं. कर्मों की गति अति गहन है. विचित्र है अस्तित्त्व की लीला, कर्मों का हिसाब-किताब पूर्ण होता है तो शुद्ध प्रेम का प्रवाह होने लगता है. सुबह बगीचे से ढेर सारी भिंडी मिली. चार नारियल भी तोड़े हैं, नारियल पानी के लिए. स्कूल में बच्चों को ध्या कराया, अब वे ठीक से करना सीख गये हैं, कुछ क्षणों में शांत हो जाते हैं. पिछले दिनों एक दुखद घटना भी हुई, पूसी शाम को सड़क पर निकल गयी, और किसी वाहन से टकरा कर आहत हो कर किसी और दुनिया में चली गयी. चंद महीनों का ही उसका साथ था पर उसे बहुत दुःख हुआ. नन्हे को जब पता चलेगा उसे भी बहुत दुःख होगा. जीवन सुख-दुख दोनों के तानों-बानों से बुना है. नैनी आज और राखियाँ बनाने के लिए सामान ले गयी है. अभी तक लगभग साठ राखियाँ बन गयी हैं.

शाम के पांच बजे हैं, जून अभी-अभी आये हैं. बड़ी ननद की राखी आज मिल गयी, उसने लिफाफा खोल कर देखा, शायद कोई पत्र हो, पर कुछ भी नहीं है, एक पंक्ति भी नहीं. पत्र लिखने का संस्कार छूटता ही जा रहा है. आज बाहर धूप तेज है. कमल कुंड में पानी का स्तर फिर घट गया है, शायद नीचे तले या दीवारों के सीमेंट में छेद हो गया है, जल रिसकर भूमि में जा रहा है. ताल खाली करवा कर ठीक करवाना होगा. यह कार्य तो सर्दियों में ही ही सम्भव होगा, जब पत्ते कम हो जाते हैं और फूल नहीं खिलते. आज बाल्मीकि रामायण में अयोध्या की स्त्रियों के विलाप के बारे में लिखा. कवि की दृष्टि कितनी सूक्ष्म है, उनके दुःख का कितना सजीव वर्णन उन्होंने किया है. आज फिर ताओ पर प्रवचन सुना. जब ताओ था तब मन्दिर नहीं थे, पूजा भी नहीं थी, नीति का निर्धारण भी नहीं था. सहज ही सब धर्म को धारण करते थे. परमात्मा अनुपम है. भीतर उसकी रश्मिया प्रवाहित होती महसूस होती हैं. पूसी की स्मृति अब दुःख देती प्रतीत नहीं हो रही, नियति को यही मंजूर था. इन्सान का मन समय के साथ-साथ बदलता रहता है. यदि उसके पास भूलने की क्षमता न हो तो मन कितना भारी हो जाये. ध्यान के द्वारा मन को प्रतिपल नया रखना आना चाहिए. ज्ञान के द्वारा जीवन के रहस्यों को आत्मसात करन भी ! आज बंगाली सखी से बात की, वह अगले माह घर जा रही है, पूजा में केरल. क्लब की सेक्रेटरी से बात की, वह गोहाटी जा रही है, पड़ोसिन से बात हुई, वह परसों कोलकाता से आई हैं. यात्रा जीवन का एक अभिन्न अंग है. उड़िया सखी से बात हुई, वह राखी पर उसके साथ मृणाल ज्योति जाएँगी. दो दिन बाद जून का जन्मदिन है, शाम को छोटी सी पार्टी होगी. दोपहर को बच्चों के साथ पन्द्रह अगस्त का पूर्व दिन व रक्षा बंधन का उत्सव मनाना है. उसके पूर्व नैनी के पुत्र के पहले जन्मदिन की पार्टी में कालीबाड़ी जाना है, यानि पूरा दिन व्यस्तता बनी रहेगी. कल दोपहर को पूसी के सारे चित्र व वीडियोज का एक फोल्डर बनाना है, उसकी स्मृति में लिखा आलेख भी जून को दिखाना है. आज पार्लियामेंट का वर्षा सत्र समाप्त हो गया. इस बार काम शांतिपूर्ण ढंग से हुआ है.

Thursday, September 6, 2018

मुरली की धुन



अगस्त आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये और डायरी खोले पांच दिन. पिछले दिनों ऐसी व्यस्तता रही कि कलम कहाँ पड़ी है, इसका भी ख्याल नहीं आया. उस दिन कमेटी मीटिंग में जो भोजन परोसा गया उसे किसी भी तरह स्वास्थ्यवर्धक नहीं कह सकते. घर आकर रस्क, दूध व आम खाए जो जून ने शीघ्रता से लाकर  दिये. अगले दिन विशेष बच्चों के स्कूल गयी, बारह बजे लौटी, तीन बजे से कुछ पहले वे तिनसुकिया गये, लौटे तो शाम को जून के एक मित्र सहकर्मी के जन्मदिन की पार्टी में चले गये. अगला दिन रविवार का था. उसी रात को आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर का फोन आया. रूद्र पूजा के लिए एक स्वामी जी तिनसुकिया आ गये हैं तथा सोमवार की रात्रि उनके यहाँ आयेंगे. सोम की सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को मेहमान कक्ष साफ करवाया. एक घंटा राखियाँ बनाने में लगाया. मंगल व बुध स्वामी जी रहे. पूजा में शामिल होने सेंटर भी गयी. आज सुबह वह चले गये सो इस तरह आज समय मिला है डायरी खोलने का. शाम को योग सत्र में आठ-दस महिलाएं आ रही हैं, अच्छा लगता है समूह में साधना करना. कल दोपहर महिला क्लब में सिलाई कला से जुड़े एक प्रोजेक्ट का कार्यक्रम भी है. ‘एक जीवन एक कहानी’ में आजकल जून की पिछली अस्वस्थता का जिक्र आ रहा है, आजकल उनके घुटने का दर्द कम हुआ है.

आज टीवी पर मुरली सुनी, कृष्ण की मुरली नहीं, वह तो तब सुनी थी जब एओएल के कोर्स में वह अनुभव हुआ था और नियमित ध्यान करना आरम्भ किया था. यह मुरली तो एक ब्रह्मकुमारी द्वारा पढ़ी गयी थी. उसके अनुसार वह आत्मा है, जो परमधाम से अवतरित हुई है और विश्व के लिए कल्याणकारी है. यह स्मृति उन्हें सदा सजग बनाये रखेगी और सर्व शक्तियों का स्फुरण स्वतः ही होता रहेगा. उन्हें चलते-फिरते प्रकाश स्रोत बनकर सेवा करनी है, कितना उच्च भाव है यह. गुरूजी भी कहते हैं, वे सब ऊर्जा का केंद्र हैं, अग्नि स्वरूप हैं. परमात्मा के ज्ञान और प्रेम के वे अधिकारी हैं. वे उस राजा के बच्चे हैं, उसके दिल के तख्त पर आसीन रहते हैं. उस तख्त से नीचे नहीं उतरना है उन्हें. स्वयं को चुम्बक जैसा बनाना है ताकि शांति और प्रेम की तरंगे फैलने लगें. जैसे जल से तृषा बुझती है, वैसे आत्मा के लिए शांति और प्रेम ही जल है जिससे उसकी तृषा बुझ सकती है. वे यदि शांति और प्रेम में टिक जाएँ तो किरणें अपने आप ही प्रसरित होने लगेंगी. स्वयं यदि कोई तृप्त है तो सम्पर्क में आने वाले भी तृप्ति का अनुभव करेंगे. याद की यात्रा में निरंतर रहना है उन्हें. निरन्तरता ही चाहिए. शक्तिशाली संकल्प द्वारा भी उन्हें सेवा का कार्य करना है. परमात्मा चाहते हैं आत्मा उनके जैसी हो जाये. दोनों का लक्ष्य एकत्व ही है.

यह समय सुनने का समय है. प्रकृति पुकार रही है, आये दिन की प्राकृतिक आपदाएं यही तो बता रही हैं. व्यक्ति पुकार रहे हैं. यह पुकार सुनने में नहीं आती क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों में लगे हैं. आत्म स्मृति में रहकर ही उनकी उन्नति हो सकती है, इससे उनकी ऊर्जा का सदुपयोग होने लगता है. परमात्मा से कैसे मिलें इस प्रतीक्षा काल को भूलकर अब तो उसे अपने सम्मुख पाना है. जैसे गुलाब के साथ कांटा होता है वैसे ही ये तकलीफें परमात्मा के और निकट जाने का साधन ही बनती हैं.