Thursday, July 20, 2017

लिट्टी-चोखा


कल ईद थी. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आया. वे लोग यहाँ से जा रहे हैं, अपने घर से पौधे ले जाने को कहा था, उन्होंने लिट्टी-चोखा खाने का निमन्त्रण भी दिया है. जून ने गाड़ी भेजी है, अभी माली आएगा, उसे साथ लेकर जाना है. उनके लिए एक कटहल भी लिया है. इस समय भी धूप भी काफी तेज है, शाम के पांच बजने को हैं. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखी है. उसने एक कविता की पैरोडी बना दी, खुदा की बात इतनी आसानी से समझ में आती कहाँ है. उसे भी नहीं आती थी, अब भी आई है ऐसा नहीं लगता. खुदा उन्हें खाली कर देता है, बिलकुल ‘हॉलो एंड एम्प्टी’ ! सितम्बर में छोटा भाई परिवार सहित यहाँ आ रहा है, यकीनन वे दिन बहुत अच्छे होंगे ! परसों एक जन्मदिन पार्टी में जाना है, अभी उसे एक कविता ( यदि उसे कविता कहें तो) लिखनी है, मन हल्का है, खाली-खाली सा..सो परमात्मा का सत्य उसमें से वैसे ही बहेगा जैसे खाली बांसुरी से हवा !  

अगस्त का आरम्भ हो चुका है, आज सारे कैलेंडर बदलने हैं. दूधवाले, धोबी, माली, नैनी सभी का हिसाब चुकतू करना है, जन्मदिन के कैलेंडर में इस माह पड़ने वाले विशेष दिनों को भी देखना है, शरीर का भार लेने का एक कार्य और करते हैं वे हर माह के पहले दिन. सुबह वे आज समय पर उठे, पिछले कुछ दिनों से उसका पाचन कुछ ठीक नहीं था. इतने वर्षों उस पर जो जुल्म ढाए हैं, उनकी भरपाई करने का वक्त आ गया है. इन्सान अपने छोटे-से छोटे कृत्य से भी बच नहीं सकता. जितनी नकारात्मकता इस मन के द्वारा उपजी है, उसका भुगतान उन्हें हर हाल में करना होगा. अब समय आ गया है कि पूर्ण सकारात्मकता को अपनाया जाये, उससे कम रत्ती भर नहीं, हर रत्ती का जवाब देना होगा जो सदा बढ़कर ही मिलता है. नन्हे ने बताया, कल कर्नाटक बंद था.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल, कल कमेटी की पहली मीटिंग थी, एक सदस्या के साथ मिलकर उसने सभी के लिए स्नैक्स व रात्रि भोजन का इंतजाम किया. सब कुछ ठीक से हो गया. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को राखियाँ बांधी. जीवन एक धारावाहिक की तरह है, उसकी कहानी भी ऐसी ही है. कभी कुछ घटता है जो परेशान कर जाता है पर अपने स्वभाव में टिकते ही सब कुछ पूर्ववत् हो जाता है, बाहर न भी हो पर भीतर तो अवश्य. जो कुछ भी उन्हें निर्बल बनाता है वह त्याज्य है. सकारात्मकता में टिके रहने से हर क्षण नयेपन का अनुभव भी होता है. अभी-अभी नैनी की बच्चियां आई थीं, ईश्वर के प्रेम से परिपूर्ण, कितनी प्यारी मुस्कान है इन दोनों की ! उनके साथ जाकर फुहार में ही फूल चुने और तुलसी के चौरे पर सजाये. बहुत सी बातें वे बिन कहे ही समझ जाती हैं. प्रेम भी प्रेमी हृदय ही महसूस कर सकते हैं, संत या बच्चे ! सामने का दृश्य हरियाली का एक समुन्दर जैसा ही तो है, मौन है पर सब कुछ कहता और सब कुछ सुनता हुआ ! जीवन कितना सुंदर है और कितना अनोखा ! परमात्मा और जीवन एक ही तो हैं ! 

Wednesday, July 19, 2017

नूरपुर की रानी


अभी-अभी नैनी ने कौए और कबूतर के झगड़े की गाथा सुनाई. उसकी सास ने रोज की तरह कबूतरों के लिए कटोरी में पानी रखा और चावल के दाने बिखेरे. दो कौए आकर पानी पीने लगे. एक ने कटोरी ही चोंच से उलट दी, फिर चावल खाने आये कबूतरों को खदेड़ने लगे. बाद में एक बड़े कौए को बुलाकर लाये, शायद वह उनके नेता था. एक कबूतर की पूंछ पकड़कर उसे गोल-गोल घुमाने लगे और इस क्रिया में उसका एक पंख भी निकल गया. कौआ शनि देवता का रूप माना जाता है और कबूतर तो शिव का प्रिय पक्षी है. दोनों का यह झगड़ा फिर क्यों ! इन जीवों में भी कितना ज्ञान होता है. रात को दो अनोखे स्वप्न देखे, एक में वह आचार्य रजनीश से मिल रही है. वे अभी युवा हैं, वह कहती है, सर, आप कहाँ रहते हैं, उन्होंने इलाहाबाद का नाम लिया, इलाहबाद के किसी स्थान का. दूसरे में श्री श्री का सत्संग हो रहा है, आगे क्या करना है, इसके लिए वह उनसे मन्त्रणा कर रही है. गुरूजी से इतनी निकटता से बातचीत स्वप्न में ही सम्भव है, शायद भविष्य में कभी जागृत में भी सम्भव हो. भीतर कैसा तो अहोभाव भर गया है, परमात्मा की महक चारों और भरी है, धनक कण-कण में है, उसका स्पर्श हर शै पर है ! उसका सौन्दर्य अप्रतिम है. कितनी सुंदर सृष्टि रची है उसने, और पल-पल रच रहा है. उन्हें उसे कुरूप करने का कोई अधिकार नहीं है. उनका मन भी सुंदर होना चाहिए, विचार तथा भावनाएं भी. सभी कुछ एक सौन्दर्य का प्रकटीकरण करे, ऐसा होना चाहिए. बाहर माली की कैंची की आवाज सुनाई दे रही है, वह आज जल्दी आया गया है. उसने सोचा बगीचे में क्या-क्या काम और करवाए जिससे बगीचा और सुंदर लगे. जून कल आ रहे हैं, उन्होंने कोलकाता में कुछ सामान खरीदा है, उन्हें खरीदारी करने में बड़ा मजा आता है, जैसे उसे कविताएँ लिखने में ख़ुशी मिलती है.

कल कुछ नहीं लिखा, आज सुबह से मन स्थिर नहीं है. कोई पुराना कर्म अवश्य ही जागृत हुआ है. साक्षी में टिकना कोई ऐसी बात नहीं है कि एक बार यदि हो गया तो सदा के लिए हो गया. पल-पल  सजग रहना होगा. पूर्ण ज्ञान के बाद सम्भवतः वह सदा ही हो जाता हो, अप्रयास ही. कबीर तभी कहते हैं, साधो, सहज समाधि भली ! आज सुबह बाबा रामदेव जी की गंगोत्री यात्रा पर अच्छा सा कार्यक्रम देखा. वे साधु-संतों से भेंट करते हुए, अपने शिष्यों के साथ गंगोत्री से गोमुख की ओर जा रहे थे.  

आज धूप बेहद तेज है, पर पंखे के सामने बैठकर गर्मी का अहसास नहीं हो रहा है, यूँ भी मन यदि शीतल हो तो बाहर का ताप विशेष असर नहीं करता. बड़ी ननद का फोन आया, कल बेटी के ससुराल वालों के साथ बात हुई, पर कोई हल निकलता नजर नहीं आ रहा है. कुछ देर ‘नूरपुर की रानी’ धारावाहिक देखा. नायिका नूरी कितनी अच्छी उर्दू बोलती है और बहुत संवेदनशील है. वह शहजादी बनकर अच्छे-अच्छे लिबास पहनती है तो उसे भी आज बहुत खूबसूरत लिबास मिले हैं. दो कुरते, जिनमें एक कुरता चिकन का है, और दो सूट के कपड़े, जिनपर कश्मीरी कढ़ाई है.

आज क्लब की वार्षिक मीटिंग है, नई कमेटी को जिम्मेदारी सौंपने का दिन, उसका काम अब कोई और संभालेगा. जुलाई भी समाप्त होने को है, नया वर्ष आता है और उसके जाने का वक्त भी आ जाता है. दोपहर को उठी तो सिर में दर्द था, आचार्य बालकृष्ण जी का तरीका अपनाया. दायीं नासिका को बंद करके बायीं नासिका से लम्बे श्वास लेना, दर्द काफी चला गया है, शायद पित्त बढ़ गया है. आजकल वे रोज ही आम खा रहे हैं. 

Sunday, July 16, 2017

फुटबाल का विश्वकप


कल से उसके बाँए कान में सुनाई देना कम हो गया है और एक आवाज भी आती है. शायद इन्फेक्शन है या पानी चला गया है, अथवा तो वैक्स है और या तो ज्यादा सुनने से कान की श्रवण शक्ति कम हो गयी है. उम्र के साथ-साथ भी शरीर में कई परिवर्तन होते हैं. आज इतवार है और जून ने लंच में विशेष पुलाव तो बनाया ही था, शाम को ब्लू बेरी, रोस्टेड आलमंड, डेट्स तथा बगीचे से तोड़ा ताजा भुना हुआ भुट्टा. कल सिनेमा हॉल में HSKD देखी, फिल्म उसे ज्यादा पसंद नहीं आयी. अमेरिकन कॉर्न खाए और चालीस रूपये कप वाली चाय पी, यानि कल दिन भर मस्ती की. शाम को सत्संग में गये. गुरू पूर्णिमा  उत्सव के कारण गुरू पूजा थी. आज ट्विटर पर गुरूजी का संदेश देखा, यू ट्यूब पर उनका कल का संदेश भी कुछ देर के लिए सुना था. अभी वे कुछ देर बैडमिंटन खेलेंगे फिर शेष भाग सुनेंगे. फुटबाल के विश्व कप के खेल समाप्त हो चुके हैं. जर्मनी जीत गया है, ब्राजील चौथे स्थान पर है. जून भी डायरी लिख रहे हैं. लिखने से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है. जीवन को एक दिशा मिलती है. वे वही हो जाते हैं जैसा सोचते हैं. चेतना जब परम के साथ जुड़ी होती है तब कोई दुःख कोई परेशानी उन्हें छू भी नहीं सकती.

आज भी वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण स्थगित करना पड़ा, शाम को यदि मौसम खुल गया तो जा सकते हैं. उनके बगीचे में अन्नानास लगा है पर जून ने बाजार से लाये अनानास की तस्वीर व्हाट्स ऐप के एक ग्रुप में डाल दी, सब लोग खुश हैं और अगले वर्ष यहाँ आने का प्रोग्राम बना रहे हैं. अभी कुछ देर पहले ही आँख-कान-गला विशेषज्ञ से मिलकर आ रही है. उनके केबिन के बाहर काफी लोग बैठे थे. जून ने फोन कर दिया था सो सबसे पहले उसे ही बुलाया. कान साफ किया और अब खुला-खुला लग रह है, कान में डालने की दवा भी दी है. उसका गला भी थोड़ा सा खराब है पर डाक्टर ने देखकर कुछ कहा नहीं है. दवा के काउंटर पर भी काफी भीड़ थी. जनसंख्या इतनी बढ़ रही है सो हर जगह भीड़ तो बढ़ेगी ही, धैर्य सिखाती है भीड़ भी. वहाँ बातूनी सखी मिली, उसे भी इन्फेक्शन था, एक कोर्स कर चुकी है पर ठीक नहीं हुआ. नैनी ने तुलसी लाकर दी, फिर गर्म पानी भी थर्मस में भर दिया है, वह बहुत ख्याल रखती है हर बात का. सलाद सजाने में उसका जवाब नहीं. आज भी वर्षा हो रही है, जून अभी आने वाले हैं. उन्हें भी उसका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगता होगा जैसे उसे लिखकर लगता है. आज सुबह उन्हें कुछ अच्छी बातें परमात्मा ने कहलवायीं इस मुख से, वे अवश्य ही उन्हें याद रख पाएंगे. उसका जीवन भी सद्मार्ग से विचलित न हो, ऐसी प्रार्थना उसने अपने लिए की.

आज सुबह फिर एक अनोखे स्वप्न ने जगाया. एक नई ब्याहता को उसके पति का नवजात शिशु थमाया जाता है, जिसकी माँ मर चुकी है. वह उसे स्तनपान कराती है और लो..उसके स्तनों में दुग्ध उतर आता है. वात्सल्य की गहरी भावना उसके मन में जगती है और यह चमत्कार घटता है. ऐसे ही परमात्मा की गोद में जब वे अबोध शिशु की तरह वे जाते हैं तो उसका असीम आनंद उन्हें सहज ही मिलने लगता है. वह वहाँ था ही, उसे प्रकट भर होना था. तभी संतजन परमात्मा को माँ के रूप में भजते हैं. माँ कहने का भाव तभी सिद्ध होगा जब वे अबोध शिशु बन जाएँ, जो वास्तविक भी है. क्या जानते हैं वे इस संसार के बारे में, उनकी जानकारी अल्प है और अज्ञान अनंत है. उससे पूर्व भी कुछ स्वप्न देखे. एक में लोभ की प्रवृत्ति स्पष्ट दिख रही थी. स्वप्नों की दुनिया भी कितनी विचित्र है. कल रात बिजली चली गयी थी. वे पहले पूजा रूम में गये, जहाँ पांच खिड़कियाँ हैं, फिर बिजली आने पर अपने कमरे में, पुनः वहाँ जाना पड़ा और फिर लौटे, नींद लेकिन आ ही गयी. परमात्मा की कृपा ही है गहरी निद्रा, लेकिन अभी भी उसे स्वप्न बहुत आते हैं. जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में भी तूरीया यानि चौथी अवस्था बनी रहे, ऐसी ही कामना साधक की होती है, पर वह अवस्था कामना से नहीं मिलती.

सुबह किस स्वप्न ने जगाया याद नहीं, वर्षा नहीं थी सो टहलने गये, आकाश गुलाबी था और हवा में हल्की सी ठंडक. दोपहर को वह बाजार गयी, राखी बनाने का सामान खरीदा. अगले महीने की दस तारीख को राखी है, उसे बच्चों के लिए ढेर सारी राखियाँ बनानी हैं. उन्हें भेजने की तैयारी भी करनी चाहिए. सुबह कविता लिखी ब्लॉग पर और दोपहर को व्हाट्सएप पर पढ़ी. छोटी बहन ने सुंदर भजन गाया. शाम को पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, उसके पुत्र की मंगनी की खबर देने के लिए, दिसम्बर में विवाह है. नन्हे ने बताया अगले तीन महीनों में उसकी कम्पनी में काम करने वालों की संख्या दुगनी हो जाएगी.  



Saturday, July 15, 2017

भात करेले की सब्जी


कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, एक तालाब में स्वयं को पौधों के रूप में या फूलों के रूप में उगे हुए ! ढेर सारे चेहरे पानी की सतह पर तैर रहे थे. किसी जन्म में शायद वह कमल रही हो. आज तक कितने ही स्वप्नों में पिछले कितने ही जन्मों की कहानी देखी है. कितना अद्भुत है यह जीवन, कितने राज छुपाये हुए. ध्यान में जो शांति महसूस होती है पता नहीं किस लोक से आती है. कभी-कभी जो आकृतियाँ दिखती हैं जाने वे कौन हैं ! कुछ भी नहीं जानते वे..सामने रखे मोगरा के फूलों से जो गंध आया रही है, वह माटी से उपजी है, इतनी कठोर भूमि और इतनी कोमल पंखुरी, फिर उससे भी सूक्ष्म गंध, और उससे भी सूक्ष्म उस गंध को स्पर्श को महसूस करने वाली नासिका पर आश्चर्यों का महा आश्चर्य, इस गंध को पहचानने वाला सूक्ष्म मन तथा इसका आनंद लेने वाली आत्मा..तो कृष्ण भोक्ता हैं, यह तो स्पष्ट हो गया. वही एक तत्व जो भोक्ता है वही तो प्रकृति के माध्यम से गंध बनकर बिखरा है. जीवन ऊर्जा जो अनगिनत रूपों में प्रकट हो रही है, स्वयं ही आनंदित भी हो रही है ! पर कैसे यह खेल चल रहा है, कौन जानता है !

कल फिर एक अनोखा स्वप्न देखा, मस्तिष्क को अपने सम्मुख देखा और उसमें जगह-जगह निशान बने थे गोल, छोटे-छोटे टुकड़े, जिन पर लिखा था अज्ञान और वह उसे वहाँ से काट कर निकाल रही थी ! उनके मस्तिष्क में ज्ञान व अज्ञान दोनों हैं. अज्ञान को दूर करना है यही बात स्वप्न बन कर आई. वास्तव में उन्हें ज्ञान को बढ़ाना है, अज्ञान अपने-आप चला जायेगा.


कल नन्हे का जन्मदिन है, जून कल आ रहे हैं. इस समय साढ़े पांच बजने को हैं. बाहर अभी धूप है. कुछ देर पहले बगीचे में काम करवाया. अभी एक कविता लिखनी है, नये-नये शब्दों से सजी सुंदर कविता. आजकल वह कुछ सुंदर शब्दों को देखती है और फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द अन्य शब्द जैसे अपने आप चले आते हैं, सामान्यतया भीतर अब मौन ही रहता है, एक सन्नाटा ! मधुरिम नीरवता ! हवा बह रही है, बाहर झूमते हुए वृक्ष अच्छे लग रहे हैं. कुछ देर में क्लब की एक सदस्या आने वाली है, इसी महीने क्लब की वार्षिक बैठक है, कुछ देर उसका काम करना है. एक अन्य सखी का फोन आया, अगले महीने किशोरियों के लिए होने वाला कार्यक्रम एक स्कूल में होगा. उसने अपनी सब्जी बाड़ी में उगे करेले और लोभिया की फलियाँ भी भिजवायीं. नूना ने भी भात करेले भिजवाये, जो जरा भी कड़वे नहीं होते, जो उसने असम में आकर ही देखे हैं. जामुन आज नहीं मिले, पिछले महीने भर से सुबह-सुबह वह रोज मीठे जामुन उठाकर लाती रही है, शाम को जिसका शरबत जून को बहुत भाता है. जून ने कल दोपहर की टिकट बुक करवायी हैं, कोई नई फिल्म आई है. वह उसके लिए वस्त्र भी लाये हैं. वे जीवन के रस को भरपूर निचोड़ लेना चाहते हैं. ढेर-सारी खाने-पीने की वस्तुएं भी लाये हैं, उसे बिना मांगे ही सब कुछ मिल जाता है, परमात्मा की कैसे कृपा है ! उस परमात्मा के लिए वह क्या कर सकती है सिवाय चंद शब्दों में उसकी महिमा बखान करने के !

Thursday, July 13, 2017

मनसा देवी का मंदिर


कुछ संस्कार इतने गहरे होते हैं कि मिटने का नाम ही नहीं लेते, आज सुबह प्राणायाम करने बैठी तो सहज ही ध्यान लग गया पर उठी तो किसी बात पर हल्की सी धूमिल रेखा मन पर छा गयी. द्रष्टा बन कर उसे देखा पर मन में एक संशय तो छा ही गया. कल रात छोटे भाई से बात हुई, उसे ध्यान व समाधि का अनुभव सदा होता रहता है. परमात्मा अकारण दयालु है, प्रेमिल है, आनंद स्वरूप है और सहज ही प्राप्य है ! वह वसंत है, हर पीड़ा का अंत है ! सद्गुरू, परमात्मा और आत्मा में कोई भेद नहीं ! भीतर से जो ज्ञान का पथ दिखलाता है, वही तो गुरू है !

आज स्कूल गयी, योग की कक्षा आखिरी कक्षा में होनी थी, चटाई की दीवार है उस कमरे की, शेष को बरामदे में खड़े होकर करना पड़ा, खैर, न से तो हाँ भली. अगले हफ्ते से स्कूल में छमाही परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं, इसके बाद स्कूल बंद हो जायेगा, फिर अगस्त में खुलेगा, यानि अब हर सोमवार को जल्दी-जल्दी काम निपटा कर स्कूल नहीं जाना है. शाम को भांजियों को लेकर क्लब जाना है, बच्चों का वार्षिक सम्मेलन चल रहा है इन दिनों. मौसम गर्म है आज भी, दिल्ली का तापमान कल अड़तालीस डिग्री था, अब तक का सबसे अधिक ! कल मेहमान वापस जा रहे हैं. जैसे वह उन्हें लिवाने गयी थी, कल उन्हें छोड़ने भी जा रही है. वे ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर पहुंच जाएँ और बड़ी भांजी के जीवन में सब कुछ पहले का सा ठीक हो जाये तभी माना जायेगा कि उनका यहाँ आना सफल रहा. परमात्मा उनके साथ है और वह उन्हें सही मार्ग दिखायेगा. ज्ञान हो जाने के बाद पुराने कर्मों का क्षय होता है, नये कर्म नहीं बंधते. आज मृणाल ज्योति में एक कार्यक्रम है. विकलांग व्यक्तियों को सरकार की ओर से व्हील चेयर व साइकिल वितरित किये जायेंगे. उसे जाना है.

आज पूरे छह दिनों के बाद डायरी खोली है. उस दिन मेहमानों को छोड़ने गयी, कल उनके लिए कविता लिखी. हर कविता के अवतरण का एक समय होता है, उससे पहले वह आती ही नहीं, जबकि विद्यमान तो रहती ही है. माली से कह कटहल व नारियल तुड़वाकर एक सखी के यहाँ भिजवाने हैं. दो मालियों में से एक काम छोड़कर जा रहा है, उसने लाइन में किसे के साथ झगड़ा कर लिया है, उसे अपने क्रोध पर नियन्त्रण नहीं है. उसे गमले रंगने के लिए कहा था, अभी तक उसने शुरू नहीं किये हैं. कुछ लोग दीर्घसूत्री होते हैं, काम को टालने वाले, जैसे उसने भी अभी तक आत्मा को जानने का काम पूरा नहीं किया है. यह एक अंतहीन यात्रा है. गुरू के बिना मार्ग नहीं मिलता. कदम-कदम पर सहायता चाहिए. सब कुछ ज्ञात होते हुए भी मन पुरानी लकीरों पर पल भर के लिए ही सही चलता तो है. पर अब उसे देखने वाला मौजूद है. आत्मा वे स्वयं हैं, खुद को जानने के लिए तो खुद को ही होश बनाये रखना होगा !

आज महादेव देखा. वे स्वयं को पृथक समझते हैं, यही द्वंद्व है. ‘मनसा’ शिव की मानस पुत्री है और स्वयं को देवी बना हुआ देखना चाहती है, स्वयं की पूजा करवाना चाहती है. पार्वती स्वयं ही दूसरा रूप धारण कर शिव से विवाह करना चाहती है. उनका मन भी आत्मा से पृथक अपनी सत्ता जमाना चाहता है और व्यर्थ ही बंधता है. मनसा और पार्वती शिव को नहीं जानती, मन कितना ही प्रयास करे आत्मा को नहीं जान सकता. आत्मा ही आत्मा को जान सकती है. आज मंगलवार है, शाम को बच्चे आयेंगे. अभी प्रसाद बनाना है.  



Wednesday, July 12, 2017

किताबों वाला घर


जून का महीना भी कल आरम्भ हो गया. मौसम काफी गर्म है. आज स्कूल गयी थी, करेंट नहीं था, बच्चों को पसीना बहाते हुए व्यायाम/आसन कराए. छोटे बच्चे बहुत आनंद लेते हैं. एओल की टीचर का फोन आया, वह कल से आने वाली थीं, पर अब लडकियों को वहीं बुलाया है. कल से वे जाएँगी. शाम के सवा चार बजे हैं, बाहर धूप इतनी तेज है जैसे भरी दोपहर हो. ब्लॉग पर उसकी कहानी अब अध्यात्म की ओर बढ़ रही है. एक वर्ष पहले से ही भूमिका बननी शुरू हो गयी थी, तभी क्रिया के दौरान वह अनुभव हुआ. सद्गुरू तक उसकी प्रार्थना पहुंच ही गयी थी. कितना विचित्र है परमात्मा का यह चक्र, यह व्यवस्था कितनी अबूझ है. वह परम कितना दूर है पर कितना निकट...जीवन कितना अद्भुत है, यदि वे जाग जाएँ तो हर पल उसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं. स्वप्न की धारा जो भीतर चलती रहती है, जिसने उनकी नींद को भी निर्दोष नहीं रहने दिया और उनके जागरण को भी, उसे रोकना ही साधना का लक्ष्य है. वह धारा उनके नियन्त्रण से बाहर हो गयी है क्योंकि वे इतने कमजोर हो गये हैं. पहले उन्हें जानना होगा किस तरह वे मन से पृथक हैं, जैसे आकाश बादलों के पार है, वैसे ही वे भी मन के पार हैं. स्वयं के मुक्त स्थान में स्थित होते ही वे मन के पार चले जाते हैं. जब वे उस स्रोत से जुड़ जाते हैं, उत्साह से भर जाते हैं, ऊर्जा से भर जाते हैं. उन्हें परमात्मा से जुड़कर पहले शक्तिशाली बनना है फिर इस धारा पर उनका नियन्त्रण होगा !

वही दोपहर की बेला है, पंछियों की आवाज के अतिरिक्त मौन की गूंज ही है जो सुनाई दे रही है. दोनों बहनें सो रही हैं, वे आज सुबह योग की कक्षा में गयी थीं, पहला दिन था, उन्हें आनंद नहीं आया. बच्चे तो बच्चे ही हैं, अब कल वे जाएँगी या नहीं, यह उन पर निर्भर करता है. आज सुबह भीतर जो भय जगा लेडीज क्लब के दफ्तर में चल रहे खिडकियों पर जाली लगाने वाले काम को लेकर, क्रोध के रूप में प्रकट हुआ नैनी की एक भूल के कारण उसके ऊपर, जो आज अचानक ही जल्दी आ गयी थी. एक ही ऊर्जा तो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है. सुबह ध्यान किया, केवल शुद्ध चेतना में रहने का अभ्यास, स्वप्न की जो श्रृंखला जो भीतर चलती रहती थी अब खंडित होने लगी है, विचार वे स्वयं ही बनाते हैं और स्वयं ही उनसे पीड़ित होते हैं, सुबह इसका कितना स्पष्ट अनुभव हुआ. परमात्मा कितनी कृपा करता है जो पहले उन्हें प्रेम से भर देता है, वे तो उसे बाद में प्रेम कर पाते हैं. सद्गुरू को आज टीवी पर देखा, fb पर रोज ही देखती है. आज शाम उन्हें क्लब ले जाना है, आज क्लब का स्थापना दिवस है.

टीवी पर आज गुरूजी अपने कार्य के आरम्भिक दिनों के बारे में बता रहे हैं. हर इन्सान को अपना मार्ग स्वयं चुनना होता है और यदि वह सच्चे हृदय से प्रार्थना करे तो ईश्वर स्वयं उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं. उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर ही कुछ करना होता है. आज उसे क्लब की कुछ सदस्याओं के साथ मोरान ब्लाइंड स्कूल जाना है. सेक्रेटरी का फोन आया, उनके साथ इस वर्ष उसकी कई यात्रायें हो रही हैं, कितना कुछ सीखने को भी मिला है.

आज नन्हे के बचपन के मित्र, असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन था, उसने फोन किया. एक अन्य सखी से बात हुई, उन्होंने पोहा बनाने का अच्छा तरीका बताया, भांजियों ने वैसा ही बनाया. दोनों निकट ही बंगाली की दुकान पर भी गयीं, फल खरीदे और अपने लिए मैगी भी. दोनों बहुत शांत व समझदार हैं, अपने काम से काम रखने वालीं. क्लब की एक सदस्या सदा के लिए जा रही हैं, उनके पति रिटायर हो गये हैं, किताबों से भरा था उनका घर, ड्राइंग रूम में बड़ी सी आलमारी तो भरी ही थी, छोटी-छोटी शेल्फ पर भी ढेरों किताबें सजी थीं. उनके पति लेखक हैं, वे स्वयं भी लिखती हैं. वर्षों से बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विद्यालय चला रही हैं. उसने सोचा उनके लिए भी एक कविता लिखेगी. आज फेसबुक पर अस्सी वर्षीय एक महिला को सालसा नृत्य करते देखा, कमाल का नृत्य था, बच्चों की तरह वे घूम रही थीं.  देह, मन के अधीन रहे तो वे उसे अपनी इच्छा से प्रयोग कर सकते हैं. तमस और जड़ता से भरी देह मन पर हावी हो जाती है. जून आजकल बहुत व्यस्त रहते हैं, कल उन्हें दिल्ली जाना है. नन्हे के दफ्तर में एक प्रतियोगिता होनी थी, अच्छी ही होगी. वह अपनी टीम का हेड हो गया है अब. जे कृष्णमूर्ति की जो किताब वह वर्षों पहले बोस्टन से लायी थी, मिल नहीं रही थी, उस दिन मिल गयी, पढ़ना शुरू किया है.  


Tuesday, July 11, 2017

हरियाली का गीत


वर्षा आज भी लगतार हो रही है. पिछले तीन दिनों से वर्षा के कारण प्रातः या सांय भ्रमण नहीं हुआ, आज वर्षा थमने पर जाना ही होगा.  पेड़-पौधे और घास गहरी तृप्ति का अनुभव कर रहे हैं. हरियाली एकाएक बढ़ गयी है. आकाश बादलों से घिरा है. वायुदेव मंदगति से पेड़ों को झुला रहे हैं. बूंदों की टिपटिप और पंछियों के स्वर दोपहर को संगीतमय कर रहे हैं. अभी कुछ देर पूर्व ही उसने चाय पी और आकाश को निहारते हुए कुछ प्रकाश बिन्दुओं को हवा में तैरते देखा. सम्भवतः ये जीवात्माएं हैं जो उनके चारों ओर एक और आयाम में रहती हैं. कभी-कभी प्रकृति अपने रहस्य खोल देती है. एक धुआं सा कभी-कभी धरा से उठता दिखाई देता है, कभी गगन से बरसता हुआ..परमात्मा अपनी उपस्थिति से उन्हें भर देना चाहता है. उसका अंतर उसके लिए खाली है, वहाँ और कोई नहीं है, वही है, वैसे भी वहाँ क्या था, सिवाय अहंकार से उपजी पीड़ा के. वे व्यर्थ ही स्वयं को ढोए चले जाते हैं. शायद नहीं निश्चय हो गया है अब, मन जिसे वे कहते हैं केवल उनकी मूर्खता का दूसरा नाम है, अज्ञानवश वे देख ही नहीं पाते. सतोगुण को तमस व रजस ढक लेता है और उनकी दृष्टि ही दूषित हो जाती है. अपना भला-बुरा भी सोचने की क्षमता नहीं रहती. प्रारब्धवश जो भी सुख-दुःख मिलते हैं, उनमें उनका क्या योगदान है, अहंकार करने जैसा तो यहाँ कुछ भी नहीं है. 

दोपहर को उस छात्र को फोन किया जो बैठे-बैठे सो जाता था, वे लोग तीन दिन बाद जा रहे हैं, उसके पिताजी रिटायर हो गये हैं. कल सामान चला जायेगा. उसके लिए कविता लिखी, जून प्रिंट करके लाये, वह कोओपरेटिव गयी, एक मग और एक चाकलेट ली, उसकी माँ बहुत खुश हुईं, वर्षों पहले उन्होंने उसे संगीत सिखाया था. आज भी लगातार वर्षा हो रही है. शाम को किशोरियों के लिए महिला क्लब का एक कार्यक्रम था, उनकी शारीरिक व अन्य समस्याओं के बारे में कुछ जानकारी दी गयी. लेडीज क्लब ने अच्छी पहल की है. यहाँ की लडकियों को एक मंच दिया है जहाँ वे अपनी समस्यायें कह सकती हैं. कल ही खबर सुनी थी कि एक लड़की ने आत्महत्या कर ली. महिलाओं के प्रति अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं. डिब्रूगढ़ में एक लेडी डाक्टर की हत्या वार्डबॉय ने कर दी. टीवी पर मोदी जी का इंटरव्यू आ रहा है. नन्हा कल अपने एक मित्र की शादी में जा रहा है. एक दिन उसकी शादी में भी सभी मित्र आयेंगे.

पांच दिनों का अन्तराल. आज चुनाव के परिमाण आ गये हैं. बीजेपी ने ऐतिहासिक विजय हासिल की है. टीवी पर सुबह से एक ही चर्चा है. मौसम अब अपेक्षाकृत गर्म है. पिछले दिनों छोटी ननद, बहन के पास गयी, फोन किया तो पता चला मंझली भांजी घर आ गयी है ससुराल छोड़कर. वे सभी बहुत परेशान हैं. उन्होंने छोटी व मंझली दोनों भांजियों को यहाँ आने को कहा है. एक महीना वे उनके साथ रहेंगी. परसों नन्हा भी आ रहा है. अगला एक महीना व्यस्त रहने वाला है. जीवन में कुछ परिवर्तन हो तो अच्छा लगता है.

आज दोनों बहनें आ गयी हैं, वह उन्हें लेने एयरपोर्ट गयी थी, दोनों खुश लग रही हैं. नन्हा भी आ गया है, उसने ‘श्रद्धा सुमन’ ब्लॉग में लेबल ठीक करने में उसकी सहायता की.  उसके एक मित्र के विवाह में उन्हें जोरहाट जाना था, वापस आकर भी दो-तीन दिन हो गये हैं.

इस समय वर्षा हो रही है, वह बाहर के बरामदे में बैठी है. दोनों लड़कियाँ अपने कमरे में हैं. बड़ी किताब पढ़ रही है, छोटी फोन पर व्यस्त है, मौसम की कारगुजारी देखने का उनके पास वक्त नहीं है. बड़ी की समस्या सुलझती नजर नहीं आ रही है. वह अपने आप को जरा भी बदलना नहीं चाहती पर वह नहीं जानती ऐसा करके वह अपना ही नुकसान कर रही है. वे सभी किस तरह माया के पाश में जकड़े हुए हैं. उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर से बात की शायद वह कुछ सुझाव दें, अगले हफ्ते वह आएँगी. गुरूजी के ज्ञान से बड़ी के जीवन में कुछ परिवर्तन तो आएगा ही. नन्हा वापस चला गया है.

आज उसका जन्मदिन है, सुबह से ही बधाई संदेश आ रहे हैं. सुबह वे मृणाल ज्योति गये, भाजिंयों ने बच्चों को नृत्य के कुछ स्टेप्स सिखाये, उन्हें अच्छा लगा. सभी को मिठाई व नमकीन वितरित किया. अभी कुछ देर में शाम के मेहमान आयेंगे, उसने जून का लाया फूलों वाला टॉप और लंबा स्कर्ट पहना है. मौसम आज अच्छा है.