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Monday, September 7, 2015

गुजरात की बाढ़


सहनशीलता, धैर्य, मनोबल, संकल्प बल तथा दृढ़ इच्छा शक्ति जिसके पास हो वही अध्यात्म के पथ पर चल सकता है. मौत का भी डर जब मन में न रहे, कोई भी कष्ट आए, सम रहकर उसे सहना, यह जब तक जीवन में न हो तब तक कोई जीवन से दूर ही रह जाता है. आजकल उसके मन की दशा कुछ ऐसी ही है. सत्य का सामना करने की हिम्मत वह अपने भीतर नहीं जुटा पायी. यात्रा पर जाने से पहले एक सखी ने उसे एक खत पोस्ट करने को दिया था, वह भूल गयी और यात्रा के अंत में उसे पोस्ट किया, पर जब उसने पूछा तो यह नहीं बताया कि पोस्ट करने में देरी हो गयी थी. उसे बुरा लगेगा यही सोचकर नहीं बताया पर अब लगता है कि वह उसके बारे में अपनी राय को बदल देगी इस डर से. पर यह सच है कि झूठ के पाँव नहीं होते. एक बोझ जो उसने व्यर्थ ही चढ़ाया है. नीरू माँ के अनुसार उसे प्रतिक्रमण करना होगा और इस बोझ को सिर से उतार फेंकना होगा. अपने आस-पास की दुनिया की वास्तविकता को भी उसने नहीं देखा. गुजरात में बाढ़ आई है, बड़ी ननद से उसने बात भी नहीं की. वह आत्मकेंद्रित होती जा रही थी, जिस क्षण यह भास हुआ उसी क्षण से स्थिति बदल गयी है. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, गुजरात में बाढ़ आई है, वहाँ किसी ने एक बार कहा तो उसे इसकी गम्भीरता का अंदाजा ही नहीं था. आज सुबह छोटी ननद, दीदी व बड़े भाई से बात हुई. दो सखियों से बात हुई, एक ने कृष्ण के १०८ नामों के बारे में पूछा तथा दूसरी ने गुरूजी द्वारा कही यह बात बताई कि १५ अगस्त तक का समय भारी है, उन सभी को ध्यान द्वारा इसे टालने का इसकी भयानकता को कम करने का कार्य करना चाहिए. वह ईश्वर को केवल अपने भीतर ही पाना चाहती थी पर वह तो कण-कण में बिखरा है, वह तो हर एक जड़-चेतन में है, वही तो माँ के प्यार में है और वही प्रिय के प्रेम में, वही वात्सल्य में है. ईश्वर कहाँ नहीं है, बाढ़ के पानी में फंसे लोगों में भी वही है और बाढ़ के पानी में भी वही है. उसका कण-कण इस सृष्टि के कल्याण की कामना करता है.

अभी-अभी बिजली थी, अभी-अभी चली गयी. ऐसे ही एक दिन अभी-अभी जीवन होगा, अभी-अभी नहीं होगा. एक पल में मृत्यु उन्हें अपना ग्रास बना लेगी अथवा तो एक पल में वे शरीर के बंधन से मुक्त हो जायेंगे. पीछे की खिड़की से हवा का एक शीतल झोंका पीठ को सहला गया, पंखा चलते रहने पर इसका आभास भी नहीं हो पाता, ऐसे ही जीवन के न रहने पर आत्मा तो अपने आप में रहेगी ही, परमात्मा के प्रकाश से परिपूर्ण ! कल एक पुस्तक पढ़ी, ध्यान के विभिन्न गुर बताये हैं उसमें, विपश्यना ध्यान के, जिसमें केवल बाहर जाती हुई साँस को देखना है. एक नये नजरिये से लिखी गई पुस्तक है. आज मौसम गर्म है, उसकी आँखें मुंद रही हैं, तमस का प्रभाव है.

भाव की संवेदना बहुत दूर तक जाती है, जहाँ मन नहीं पहुंचता, बुद्धि नहीं पहुंचती वहाँ भाव के सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं. ध्यान का दर्शन केवल मन को स्थिर करना ही नहीं बल्कि भाव शुद्धि है. अभी कुछ देर पूर्व उससे जन्माष्टमी का दिन जब एक बार पुनः पूछा सासु माँ ने तो उसका जवाब शांत भाव दिया गया नहीं था. छोटी ननद का फोन आया. पिता जी की तबियत ठीक नहीं है, उसने कहा, वह अपना ध्यान भी नहीं रखते. वह कह रही थी कि दोनों को साथ-साथ रहना चाहिये. देखें  भविष्य में क्या लिखा है. इतना तो सही है कि वृद्धावस्था में भी पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ तो चाहिये ही.  

कल रात तेज वर्षा हुई, आँधी-तूफान भी. मेघ अपने पूरे बल के साथ गरजते रहे. एक-दूसरे से टकराते रहे, रह-रह कर बिजली चमकती रही. वह सब कुछ अनुभव कर रही थी पर इन सबसे परे भी थी. उसके मन में तब आत्मा का गीत गूँज रहा था. मन जैसे यहाँ का न होकर किसी और लोक का था. वह निद्रा थी या तंद्रा थी या शुद्ध ज्ञान का नशा था, पर बिजली जाने से जो कमरे में गर्मी हो गयी थी, उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था. जून का आज जन्मदिन है, कल उसने उनके लिए एक कविता लिखी. आजकल वह बहुत खुश रहते हैं. उन्हें भी उस प्रेम का अनुभव हो रहा है, जिसकी बात वह उनसे करती थी. अभेद प्रेम का जहाँ दो न रहें एक हो जाएँ, वहाँ कोई अहंकार नहीं बचता और तभी शुद्ध साहचर्य का अनुभव होता है, पर प्रेम की यह धारा इतनी संकीर्ण तो नहीं होनी चाहिए, यह तो सभी की ओर अबाध गति से बहनी चाहिये. उसके मन की यह धारा यूँ तो सभी ओर बहती है पर एक तरफ जाकर थोड़ी अवरुद्ध हो जाती है. एक सखी के प्रति उसके मन में एक द्वंद्व बना ही रहता है. उसने प्रार्थना की, सद्गुरु ही उसे इस धर्म संकट से बचा सकते हैं. पर सद्गुरु तो यही कह रहे हैं, जो बाधा उसने स्वयं खड़ी की है उसे कोई दूसरा चाहकर भी नहीं दूर कर सकता, ईश्वर भी नहीं. वह उसकी आजादी में व्यवधान डालना नहीं चाहता. जिस दिन उसे स्वयं अहसास होगा कि इस द्वंद्व के चलते उसकी ऊर्जा का अपव्यय हो रहा है उस दिन स्वयं ही यह छूट जायेगा, उससे पहले नहीं और उसके बाद भी नहीं. आग में हाथ पड़ जाये तो स्वयं ही निकालने की सुध जगती है. 

Monday, March 24, 2014

कम्प्यूटर पर रेसिपीज



कल दोपहर हिंदी में सृजनात्मक लेखन के लिए दूसरी कविता लिखी, कविता यदि गढ़ी जाये तो उल्लास के बजाय मन को तनाव से भर देती है. कुछ देर ‘सत्यजित रे’ की पुस्तक पढ़ी. फिर नन्हा स्कूल से आ गया और दोपहर बाद की दिनचर्या में व्यस्त हो गयी. शाम को लाइब्रेरी से ‘अनिता देसाई’ की किताब लायी है. कल घर से पत्र आया है, पर उसके निर्णय के अनुसार जवाब अगले हफ्ते देगी तब तक दूसरा कोई खत भी आ जायेगा. कल शाम जून ने कहा उसे कम्प्यूटर में एक लैटर पैड बना लेना चाहिए पर ऐसा कौन है जिसे वह नियमित पत्र लिखे वह भी अंग्रेजी भाषा में. आज भी गर्मी बहुत है अभी तक उन्होंने टेबल फैन नहीं निकाला है, निकालने पर नैनी का मांगना लाजमी है, उसने कहा है अगले महीने वह पंखा खरीदना चाहती है पर हिसाब लगाकर देखा तो पैसे कम पड़े, उसी में पूरे महीने का खर्च भी चलाना होगा, यूँ उसकी बेटी भी काम करती है. और जून के अनुसार जिसकी जितनी आय होती है उसी में वे गुजारा करना सीख जाते हैं. पर जो समर्थ हैं उन्हें भी तो उनके लिए कुछ सोचना चाहिए. उन्होंने इतना धन लगाकर कम्प्यूटर खरीदा और कुछ सहायता करके पंखा खरीदने में उसकी मदद नहीं कर सकते, जबकि वह काम करके धीरे-धीरे पैसे चुका ही देगी. दीपक चोपड़ा के अनुसार जब इच्छा मन में उत्पन्न हुई है तो उसे ब्रह्मांड की गोद में डाल दो, खुदबखुद पूर्ण हो जाएगी. जैसे आजतक उसके सारे काम होते आए हैं.

कल दिन भर पूसी उसके पीछे-पीछे थी आज सुबह से गायब है, कल जब संगीत कक्षा में गयी तो उसके पीछे वह भी गयी और पूरे समय बाहर बैठी रही. शाम को जून और वह टहलने गये तो पीछे चल दी, जानवरों की भाषा यदि वे समझ पाते तो.. सुबह दो-तीन बार घर में आ गयी और जबरदस्ती उसे बाहर निकाला, मन इतना कठोर हो जाता है जब उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई काम हो रहा हो. दीपक चोपड़ा कहते हैं जब लोग किसी व्यक्ति या परिस्थिति से परेशान होकर कुछ व्यक्त करते हैं या महसूस करते हैं तो यह प्रतिक्रिया उनकी भावनाओं के प्रति होती है और भावनाएं किसी अन्य की गलती से उत्पन्न नहीं हो सकती, उनकी जिम्मेदारी सिर्फ उनकी है, कोई कैसा सोचे यह उसी पर निर्भर करता है. there is always a choice and choice is ours. अपने मूड या अपनी मानसिक स्थिति के लिए किसी अन्य को दोषी या ज्जिम्मेदार ठहरने का किसी को कोई हक नहीं है, क्यों कि यह सत्य नहीं है. आज नन्हे की छुट्टी है, उसे कम्प्यूटर पर ढेर सारे काम करने हैं, सुबह से ही योजनायें बना रहा है.
कल शाम दो सखियाँ आयीं उनका नया टीवी देखने, एक को कम्प्यूटर भी देखना था, उसने अपना रेखाचित्र भी पढ़ने को दिया पर उसके छोटे-छोटे अक्षर वह ठीक से पढ़ नहीं पायी, वैसे भी इतने शोर में कोई गम्भीर बात पढ़ना आसान नहीं था. पर उसकी इच्छा पूर्ण हुई अपने आप ही. आज भी बादलों के कारण गर्मी कम है. आज टीवी पर एक कार्यक्रम देखा, जो दीपक चोपड़ा की उसी किताब पर आधारित था जिसमें आज पढ़ा कि उन्हें अपने आस-पास के लोगों व स्थितियों को वे जैसे हों वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए न कि अपना दृष्टिकोण उनपर थोपना चाहिए. जैसे कि उसने सुबह चाय बनाने के तरीके पर जून को टोका. कल नन्हे ने उसका टाइम टेबल कम्प्यूटर पर बनाया, और उन्होंने एक cd देखा जिसमें ढेरों रेसिपीज थीं. computer is real fun !







Thursday, August 22, 2013

नाटक की रिहर्सल



दस बजे हैं, वर्षा है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही. आज सुबह समाचारों में सुना, आन्ध्र प्रदेश में लू से कुछ लोग मर गये, यहाँ उन्हें स्वेटर निकलने पड़ रहे हैं. दिल्ली में ओले पड़ते रहे पूरे बीस मिनट तक, सडक पर snow fall जैसा  दृश्य बन गया था प्रकृति के विभिन्न रूप एक साथ देखने को मिलते हैं भारत में. आज वह  लिखने में ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रही है, नन्हा भी यहीं है और एक के बाद एक सवाल पूछे जा रहा है, आलू इतने छोटे क्यों हैं ? इससे भी छोटे मिलते हैं ? कल शाम उसी परिचिता से बात हुई, वह दोपहर को तीन-चार बच्चों को लेकर आयेगी skit की प्रैक्टिस के लिए. केंद्र में बीजेपी के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रपति ने सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है, सारे देश के लोगों की जो एक इच्छा थी कि एक बार बीजेपी को मौका मिलना ही चाहिए, पूरी हो गयी. असम विधान सभा में एजीपी की सरकार बनेगी, कहीं फिर से वह आतंक तारी न हो जाये जो ४-५ वर्ष पहले यहाँ छाया हुआ था.

आज सुबह वर्षा बहुत तेज हो रही थी जब बच्चे पढ़ने आये, children meet के कारण सुबह आते हैं आजकल, कल रात देर तक वह एक सवाल हल करती रही थी उनके लिये, पर उन्होंने वह स्वयं ही हल कर लिया था. नन्हा कम्प्यूटर क्लास से आकर खुश था, he is really enjoying this class. इस समय दोनों पिता-पुत्र क्लब गये हैं, वह बगीचे में काम कर रही थी. नैनी और उसके दो बच्चे भी उसके साथ बगीचे की सफाई कर रहे थे. बच्चे अपने घर की, घर में लगे आम, बेर के पेड़ों की, पिता की, नानी की बातें कर रहे थे, उन्हें सुनकर यही लगता है, उनका पहले का जीवन अच्छा बीता है, अब भी खुश रहते हैं ये लोग, कभी-कभी माँ परेशान रहती है जो स्वाभाविक है, पति ने दूसरी शादी कर ली है और वह तीन बच्चों को लेकर घर छोड़ आयी है. रोज सुबह ‘जागरण’ सुनने-देखने के बाद भी कभी-कभी वह भी अपने मन पर नियन्त्रण नहीं कर पाती है और न जाने क्या–क्या सोचने लगती है. गोयनका जी ठीक ही कहते हैं, यह मन अंदर से बड़ा बेचैन है, बड़ा अशांत है, कैसी-कैसी गांठें पड़ी हैं, कभी राग कभी द्वेष, कभी कामना के बंधन में जकड़ा न स्वयं सुखी होता है न दूसरों को सुखी करता है. यदि कोई प्रतिक्षण इस पर नजर न रखे तो मौका मिलते ही यह कहीं से कहीं भाग जाता है, मरकट राज की तरह इस डाल से उस डाल उछलता रहता है, कभी चोट खाता है तो कभी कोई मीठा फल मिल गया तो उछल पड़ता है. यह मन बड़ा ही चंचल है पर इसे बस में तो रखना ही होगा. अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले को तो इसे साधना ही होगा.

मौसम आज भी वही है बादलों भरा. नन्हा कम्प्यूटर क्लास गया है, जून फील्ड गये हैं. उनके नाटक की रिहर्सल ठीक चल रही है पर अभी समूह गान के बारे में कुछ भी निश्चित नहीं है. बच्चों में भी उत्साह की कमी नहीं है. सुबह-सवेरे ‘जागरण’ में इतनी अच्छी बातें सुनीं कि उसका मन अभी तक उनमें डूबा हुआ है. बाहरी कर्मकांड को त्याग कर आन्तरिक प्रवृत्तियों की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है. मन जो सदा किसी न किसी जोड़-तोड़ में लगा रहता है उसको  स्थिर करने की, शांत चित्त होने की प्रक्रिया ही धर्म है. धर्म को आचरण में लाने का सबसे अच्छा उपाय है कि अपने मन पर नजर रखी जाये, सद्विचार हों, धार्मिकता स्वयंमेव आ जाएगी.

कल बंद था, उल्फा ने बंद कॉल किया था और इसीलिए बंद पूरी तरह सफल था. वे लोग अलबत्ता साइकिलों से घर से निकले, पर जिस कार्य के लिए गये वह  सफल नहीं हो पाया, अभी तक तो ऐसा लग रहा है जिस गाने का अभ्यास बच्चे कर रहे थे, वह शायद नहीं हो पायेगा. सुबह से शायद इसी कारण या मौसम के कारण वह कुछ झुंझला रही है पर उसी क्षण गोयनका जी के शब्द याद आ जाते हैं और मन को समझा लेती है. जून की फरमाइश पर साम्भर व नारियल चटनी बनाई है, इडली अभी बनानी है. दोपहर को एक जगह फिर रिहर्सल के लिए जाना है, कल की तरह सारी शाम भी उसी में जाएगी. उसने सोचा, अगले वर्ष से कम से कम वह तो इस रिहर्सल आदि से दूर ही रहेगी. इस हफ्ते खतों के जवाब भी नहीं दे सकी, और भी कई  काम इन पिछले दिनों नहीं हो पाए, और तो और इस वक्त भी मन में उन्हीं बातों की पुनरावृत्ति हो रही है, जो सुबह  से इस कार्यक्रम के सिलसिले में फोन पर की हैं. मन के आगे चारा है और जुगाली किये जा रहा है. परसों से कार्यक्रम शुरू हैं यह एक अच्छी बात है. इतवार को अंतिम दिन होगा, उस रात वे किसी नये सफर की कहानी सोचकर सोयेंगे. नन्हे का गृहकार्य जो बीच में ही रुक गया है शुरू हो जायेगा और शामों को उनका टीटी खेलना भी, लाइब्रेरी से किताबें बदलना और घर आकर एक साथ बैठकर कोई बोर्ड गेम खेलना भी. कितनी जल्दी इन्सान एक चीज से बोर हो जाता है. 










Monday, May 20, 2013

गोल्फ फ़ील्ड में भ्रमण



कल दोपहर उसने टमाटर प्यूरी बनाई, उनके घर में उगे टमाटर अब साल के उन दिनों में भी उनका साथ देंगे जब वे बाजार में नहीं मिलते. परसों शाम उन्होंने ‘अलादीन’ फिल्म देखी. बहुत अच्छी लगी. कल शाम उसकी बंगाली सखी ने खाने पर बुलाया था, उसे अच्छा लगा, उसकी बातें अच्छी लगती हैं, और वह जानती है कि वह भी उसका साथ पसंद करती है. उसने शाम को क्लब में होने वाले “संगीत कार्यक्रम” में जाने के लिए कहा है, उसने सोचा यदि जून और नन्हा मान जाएँ तो वह जा सकती है.

अज भी ठंड ज्यादा है, उसने सारे काम निपटा लिए और हीटर के सामने आ गयी, जून का कहना है कि उसके घर आने से पूर्व खाना बिलकुल तैयार होना चाहिए. छह खतों के जवाब लिखे. जून एक स्वास्थ्य पत्रिका भी लाये हैं, जो वह तभी लाते हैं जब घर में कोई अस्वस्थ होता है.
आज मन में एक विचार आया है क क्यों न धूप में कुछ देर टहल आया जाये, इस समय सडकें भी खाली होती हैं. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, उनके पिता आए हुए थे, उसने सोचा तेजपुर से लौटकर वे भी उन्हें अपने घर बुलायेंगे, इतना लिखकर वह गोल्फ फील्ड तक टहलकर आयी है, कुछ दूर फील्ड के अंदर भी गयी, सूखी घास पर, सूखे पत्तों पर चलना अच्छा लग रहा था. कल रात वर्षा के साथ तूफान भी आया, उनके बगीचे में कई नाजुक पौधे जमीन पर गिर गये हैं, उसने सहारा देकर उन्हें खड़ा तो कर दिया पर बाद में माली ही उन्हें ठीक से सम्भालेगा. आज धूप में कई दिनों बाद तेजी है, वह चटाई पर बैठी है पिछले बरामदे में.

  कल शाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनकी ‘असमिया क्लास’ हुई. उसके कुछ देर बाद उसकी असमिया सखी आ गयी, उसके साथ वह बहुत अपनापन महसूस करती है. नन्हा कल शाम फिर कह रहा था, बोर्डिंग स्कूल नहीं जायेगा, पर बाद में उनके समझाने पर मान गया, यदि उसका दाखिला हो जाता है तो उसके भविष्य के लिए बहुत अच्छा होगा. वह कहाँ रहकर पढ़ेगा यह तो भविष्य ही बतायेगा.

अभी अभी उसकी हमराशि पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, लिखने का क्रम टूट गया तो अब कुछ मुश्किल हो रही है विचारों को पकड़ पाने में, मन कितना तेज भागता है. इस एक पल में जब वह एक वाक्य लिखती है, मन में एक पूरा विचार अंकित होकर जा चुका होता है. ऐसी कोई मशीन कभी न कभी बनेगी जो मन के एक एक भाव को पकड़ सके. ऋषि-मुनियों ने इसी भागते हुए मन को लगाम लगाने का प्रयास तपस्या के बल पर किया था. उसका सारा प्रयास उस वक्त व्यर्थ चला जाता है जब वह मन ही मन गीता पाठ करती है. उस दिन उसकी सखी ने ठीक ही कहा था, बोल कर पाठ करने से मन जल्दी एकाग्र होता है.  




Friday, May 17, 2013

तेजपुर का स्कूल



फरवरी का प्रथम उजला-उजला सा दिन ! दोपहर को जून जब गये तो अख़बार उठाई पढ़ने के लिए, उसके नचे ही एक पत्रिका दिख गयी, उसने ऐसा बांधा कि...ये सितारे भी किसी जादूगर से कम नहीं होते, अपने आकर्षण में खच ही लेते हैं, खास तौर से उस जैसे कमजोर इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति को...अब दोपहर के दो बजे हैं, नन्हा कह गया था एक बजे तक लौट आएगा पर अभी तक नहीं आया है, सम्भवतः अब जून उसे अपने साथ लायेंगे लौटते वक्त. सुबह उसने वाशिंग मशीन लगाई, मच्छरदानी धोयी जैसा कि उसे मालूम था, जून ने कहा, क्या जरूरत थी, साफ तो थी. कल नन्हे का एडमिशन कार्ड भी आ गया, इसी माह की तेरह को तेजपुर जाना होगा. स्कूल की इमारत आदि सब देखकर आएंगे, शायद देखने के बाद नन्हे का मन परिवर्तित हो. टीवी पर ‘शांति’ शुरू हो गया है, अब वह स्वेटर बुनेगी, तीनों भांजियों के लिए स्वेटर बना रही है, चमकदार पीले रंग की ऊन से.

  आज टीवी पर केरल के इमरान खान की, सोलह राज्यों की ४४९ दिनों की दौड़ कर की गयी यात्रा का, विश्व रिकार्ड बनने की खबर सुनकर मन प्रेरित हुआ और अपनी दिनचर्या को सुचारू रूप से चलाने का भाव उदित हुआ. जीवन क्षण भंगुर है और जिसे पलों में जीना आ जाता है वह अनंत में जीता है. जो हो चुका उस पर उनका वश नहीं और जो होगा वह वे जानते नहीं. तो वर्तमान जो उनका अपना है क्यों न ख़ुशी ख़ुशी जिएँ... उद्देश्य पूर्ण, क्रियाशील और सारे आरोपों, प्रत्यारोपों से परे. कल शाम उसने काले चने बनाये थे, जून के एक मित्र भी आये थे, दोनों को पसंद आये. आज नन्हे की पसंद पर मटर-पनीर बनाया है. उसके स्कूल में सोशल साइंस की विशाल प्रदर्शनी लगी है, जून ने भी कल देखी, और वापस आते समय उन्हें काफी देर हो गयी थी.

आज सरस्वती पूजा है, वसंत पंचमी अर्थात फूलों का मौसम. अगले शनि-रवि को क्लब में फ्लावर शो और गार्डन कम्पीटीशन है. कल तीन खत मिले, छोटी बहन, मंझले भाई व माँ-पिता के. छोटे भाई का पत्र पहले ही आ चका है, दीदी का पिछले महीने आया था, एकाएक सारे भाई-बहन उसके करीब आना चाहते हैं. छोटे भाई ने लिखा था जब भी वह खुश या उदास होता है, उन्हें अपने करीब पाता है. छोटी बहन ने लिखा है कि वह जानती है वे उसकी बात सुनेंगे अनसुनी नहीं कर देंगे. उसका खत पढ़कर थोड़ी सी हँसी भी आई और उदासी भी, वह अभी तक ससुराल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पायी है. उसको जवाब लिखा तो है, पता नहीं उसे पकर साहस मिलेगा अथवा वह यह सोचेगी कि उपदेशों की उसे जरूरत नहीं है. जून ने भी कल रात उसे व उसके पति को पत्र लिखा. कल शाम एक मित्र के यहाँ एक नया बोर्ड गेम खेला. घर में आज काम चल रहा है, सुबह आठ बजे से ही खट-खट  की आवाजें आ रही हैं, जो खल तो रही हैं पर काम एक न एक दिन तो होना ही था, कुछ दीवारों में क्रैक आ गये हैं. नन्हा आज घर में है, उसने सोचा आज वह उनके साथ ही ग्यारह बजे लंच करेगा, रोज स्कूल में साढ़े बारह बजे तक उसे इंतजार करना पड़ता होगा टिफिन टाइम का. आज वह पीले चावल बनाएगी तथा प्याज, टमाटर, धनिये का रायता और मिक्स्ड वेजिटेबल.


Monday, May 6, 2013

पालतू बिल्ली



आज फिर कुछ दिनों बाद डायरी खोली है, नन्हा पूजा की छुट्टियों के बाद आज स्कूल गया है, यूँ कारण यह नहीं है. कल दीदी को खत में लिखा कि लिखने का शौक बस डायरी लिखने तक ही सीमित रह गया है, लिखना चाहिए था कि कभी-कभार लिखने तक, पर स्वयं के प्रति ईमानदार रह सके इतनी हिम्मत अभी तक नहीं आयी है. हर बार छला है स्वयं को शब्दों से, सही-सही मन की बात बाहर आने से कतराती रही है. खैर अब उसकी फितरत यही है तो यही सही, ज्यादा भावुक होने की जरूरत नहीं, हाँ, अपनी बात को सच साबित करने के लिए कल से नियमित लिखना चाहिए. जून आज नन्हे को छोड़ने गए हैं, उसे प्रोजेक्ट वर्क लेकर जाना था. जिसमें पूरी छुट्टियों भर वे व्यस्त रहे. एक दिन दो अन्य परिवारों के साथ दिगबोई गए पिकनिक मनाने. पूजा देखने गए एक दिन, कुल मिलाकर पूजा का यह अवकाश अच्छा रहा. शाम को उनका एक मित्र परिवार घर जा रहा है, उनकी बिल्ली कुछ दिन यहाँ रहेगी, कुछ दिनों तक पेट् पालने का अनुभव भी हो जायेगा, पहले वह घबरा रही थी पर अब लगता है वे उसे आराम से रख पाएंगे. कल उसने पांच खतों के जवाब लिखे जो बहुत दिनों से पेंडिंग थे.  

  आज सुबह उठी तो सबसे पहले बिल्ली का ध्यान आया, दरवाजा खोल कर देखा तो बड़ी-बड़ी ऑंखें खोले वह रात वाली जगह पर ही बैठी थी, शायद रात को उसके लिए रखे बोरी के बिस्तर पर गयी ही नहीं. मालकिन को बहुत मिस कर रही है शायद, दिन भर बहुत थोड़ा सा ही खाया उसने. समय पर नैनी तो आ गयी पर सारा रूटीन अस्त-व्यस्त हो जाने के कारण दोपहर तक उसे काफी थकान लग रही थी, जून के जाने के बाद पढ़ना शुरू किया कि नींद आ गयी तेज और गहरी नींद. जो पौने तीन बजे खुली, फिर मशीन चलाई, कपड़े यूँ ही पानी में भीगे हुए थे, सुबह लाइट गायब हो गयी थी. नन्हे की सोशल की टीचर नहीं आयीं, उसे मॉडल और चार्ट सब वापस लाने पड़े. शाम को कुछ देर बगीचे में काम किया, कुछ देर बैडमिंटन खेला, फिर कुछ देर फिल्म देखी, और इस समय एक फिल्म के गाने बज रहे हैं, जो उसकी सखी ने बड़ी तारीफ करके दिया है, बेतुके से गाने हैं, वह पहला गाना जो उसे ज्यादा पसंद है अभी नहीं बजा, शायद वही अच्छा हो. जून भी कई दिन की छुट्टियों के बाद ऑफिस गए हैं उनका काम भी बढ़ गया है, विभाग में एक अधिकारी ने त्यागपत्र दे दिया है, उनकी पत्नी की अनुपस्थिति से लेडीज क्लब का आकर्षण भी कम हो जायेगा.

  आज सुबह बिल्ली जून की कार के नीचे छुप कर बैठ गयी और बहुत बुलाने पर भी नहीं निकली. वे दोनों जब सारे प्रयत्न करके हार गए तो नन्हे ने बिस्किट देकर उसे बाहर निकाला, उससे पहले जून ने बताया कि वह गेट से बाहर चली गयी थी, उसे हमेशा बाँध कर ही रखना होगा. उसकी मालकिन ठीक ही कहती थी, चीजलिंग शौक से खाती है, कोर्नफ्लेक्स कभी खाती है कभी सूंघ कर छोड़ देती है. लेकिन उसके कुछ दिन यहाँ रहने से बिल्लियों के प्रति उनके नजरिये में काफी बदलाव आ जायेगा.

 अभी साढ़े दस ही हुए हैं, यानि आधा घंटा तो है ही अपने आस-पास रहने का, सुबह साढ़े पांच बजे से लगातार कुछ न कुछ करते रहने से इस वक्त बैठना सुकून से भर गया है. मौसम आज भी पिछले कई दिनों की तरह अच्छा है, गर्म और खुला खुला सा दिन. सुबह उसकी पड़ोसिन ने सोमवार को उससे बड़ा पतीला देने को कहा, और फौरन ही उसने ग्रीटिंग्स कार्ड्स लाने का काम उसे थमा दिया, उसे शायद अच्छा न लगा हो. परसों कार्तिक का पहला सोमवार है, उनके यहाँ बहुत सारी महिलाएं आएँगी. उड़िया लोग त्योहारों को मिलजुल कर  मनाना पसंद करते हैं. कल नन्हे का न ही स्टोरी कम्पीटिशन हुआ न ही असेम्बली कार्यक्रम. बच्चों को निराशा का अनुभव कैसा लगता होगा, स्कूल से आया तो एक क्षण उदास था फिर सब भूल गया, यही तो बचपन कई सबसे बड़ी विशेषता है. इस हफ्ते उसे दो पत्र लिखने हैं, दीवाली तक चादर भी पूरी करनी है, दीवाली आने में सिर्फ बारह दिन शेष हैं, हो ही जायेगी, अर्थात होनी ही है.

Saturday, April 20, 2013

मिस यूनिवर्स - सुष्मिता सेन


   

 आज न ही कोई खत आया न फोन, पता नहीं आजकल पत्र इतनी देर से क्यों मिलते हैं, जून का पिछला पत्र पूरे सत्रह दिनों के बाद उसे मिला था. सुबह साढ़े पांच बजे ही नींद खुल गयी, अमूमन उस वक्त शीतल हवा बहती है पर आज हवा ने छुट्टी ली थी. छत पर व्यायाम करने गयी, कमर का घेरा बढ़ता ही जा रहा है, घी लगे फुल्के और ताजा मक्खन लगाकर माँ परांठे खिलाती हैं. उसने सोचा जून भी अपने भोजन का ख्याल रखते होंगे. आज पूरे घर की बाहरी दीवारों की सफेदी हो गयी है, कल से अंदर की होगी. शाम को आंधी-तूफान के कारण बिजली गुल हो गयी थी, काले बादलों में बिजली इतनी तेज चमक रही थी कि शाम के वक्त ऐसा लगने लगा जैसे सूरज चमकने लगा हो. फिर जैसे-जैसे शाम गहराती गयी, अँधेरा बढ़ता गया, अंधेरे में तकिये में मुंह छिपाए नन्हा जैसे कुछ देख रहा था, पापा को याद कर रहा था. उसे रोज नई कहानी सुनानी होती है, नानाजी के साथ जाकर ढेर सारी कॉमिक्स भी लाया है पास में ही किसी दुकान से जो पच्चीस पैसे में एक दिन पढ़ने के लिए देते हैं. कभी-कभी अकेले उसे संभालना मुश्किल हो जाता है, सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बन गयी है, कोई भारतीय जब किसी क्षेत्र में जब नाम पाता है तो कितनी खुशी होती है न.

  आज का इतवार भी तरबूज के नाम था, भाई परिवार सहित यहीं आ गया था. आज घिसाई वाला आया था, पिता को उसकी बातों पर, उसके टालमटोल पर आज क्रोध आया गया, पर बाद में वे बेहद परेशान थे. आज धूप तेज है, उसने मन ही मन जून से कहा, तुम्हारे पास बादल हैं और मेरे पास धूप है.

  कल दोपहर को जून का खत मिला, मन फूल की मानिंद हल्का था, सुबह ही माँ किसी सम्बन्धी के यहाँ दसवें पर चली गयीं थीं. शाम को लौटीं तो बुआ जी उनके साथ थीं, वे छोटे-छोटे रसगुल्ले लायीं थीं. ज्यादा मुखर होना हमेशा पछतावे का कारण बनता है, उसे स्वयं पर संयम रखना चाहिए, जून भी यही चाहते होंगे उसने सोचा. आज सुबह एक बार फोन की घंटी बजी, कहीं दूर से कोई आवाज आ रही थी, बेहद धीमी, बात नहीं हो सकी, लाइन नहीं मिल रही थी शायद. उसने सोचा क्या जून ही थे उस पार. सुबह उसने पिता के कहे अनुसार हिसाब की कापी से मुख्य मद्दों पर खर्च का जोड़ किया. आज एक खुशी की बात और हुई, फर्श की घिसाई पूरी हो गयी, कल से वायरिंग का काम भी शुरू हो जायेगा. शाम को माँ की एक परिचिता आई थीं, नूना को साड़ी पहने देखकर कहने लगीं, साड़ी उस पर अच्छी लगती है. वह धीरे-धीरे बोलती हैं, चलती भी धीरे-धीरे हैं. शाम को नन्हे और भतीजी ने कवितायें सुनायीं, सबको बहुत आनंद आया.




Friday, April 5, 2013

होली आने वाली है




पिछले तीन-चार दिन डायरी नहीं खोली, लिखने-पढ़ने का क्रम भी छूट सा गया. इसका कोई कारण समझ में नहीं आ रहा, ऐसा कुछ विशेष कार्य भी नहीं था, हाँ, शनि-इतवार बस यूँ ही गुजर जाते हैं हमेशा ही. शनिवार को वे तिनसुकिया गए थे, जून ने नया दांत लगवा लिया है पर उसके कारण उन्हें दिक्कत होती है, खासकर खाते समय. रविवार को दो मित्र परिवार आये शाम को, उससे पहले वे पड़ोसी के यहाँ गए थे, उनकी सोने की चेन जो खोयी थी, मिली नहीं है और न ही मिलने की उम्मीद है. इस बात के कारण पिछले दिनों उसके मन में व्यर्थ का भ्रम था, इतने दिनों के संशय और उहापोह का अंत सिर्फ फोन में था और वह फोन आखिर उसे ही करना था क्योकि परेशान वह ही थी अपनी भावुकता के कारण. दीदी ने भी पत्र में लिखा है वे तीनों ही सेंटीमेंटल हैं. कल एक अंतराल के बाद दीदी का खत आया है, बहुत बड़ा सा और बेहद अच्छा, उन्हें जल्दी ही जवाब देना है कल नन्हे का अंग्रेजी का टेस्ट था, एक गलती कर दी, जो वह अक्सर करता है. सुबह उठते ही उसने एक अच्छा सा स्वप्न सुनाया हवाई-जहाजों का, बेहद खुश था. कल उसने केक बनाया, सोचा था बहुत अच्छा बनेगा पर अच्छा ही बन पड़ा है, बहुत अच्छा नहीं.. जून ने कहा है आज उबला हुआ भोजन खायेंगे, उसने दाल और सब्जी बस उबाल कर रख दी हैं.

  पिछले हफ्ते उसने डायरी खोली तो है कुछ पंक्तियाँ कादम्बिनी की चित्र देखकर कविता लिखने की प्रतियोगिता के लिए और कुछ होली के लिए लिखने हेतु, पर बात बनी नहीं-
“दे रहे निमंत्रण अधर मधुर
मनुहार छिपी है आँखों में
बिंदिया चमकी कंगन खनके
यूँ अंगड़ाई ली उमंगों में
यूँ बही फागुनी पुरवाई
प्यार बसाये रंगों में....”

यूँ तो सारा आलम उनका वैसे ही दीवाना था
ऊपर से थापें कदमों की न जाने कितने तीर चले

दिल का मामला निकला यह कोई छोटी बात नहीं
हाल सभी के दिल का जानें वह तो छुपे रुस्तम निकले

झूठमूठ के शिकवे शिकायत झूठी अपनी सारी लड़ाई
एक दूजे के लिए बने हैं वे हर्फ यही बस सच निकले

अब के बरस तो रुत होली पर संग संग हैं वे दोनों
दूना रंग लगाने उनको दिल के सब अरमां निकले

  जून कल से मोरान गए हैं, आज आ जायेंगे, तीन-चार बार फोन कर चुके हैं, उनका मन जैसे नन्हे और नूना में ही लगा हुआ है, जैसे उन दोनों का उनमें. आज मौसम ठीक है, कल शाम की भयंकर आंधी और तूफान ने तो डरा ही दिया था, पर आज धूप निकली है. उन्हें घर जाने को आज पूरा एक महीना रह गया है. कुछ देर पहले मन में एक विचार आया कि होली पर जो कुछ लोगों को बुलाने का विचार है उसे रहने दें, नन्हे की परीक्षाएं भी नजदीक आ रही हैं, और वैसे भी तो शायद यह एक औपचारिकता मात्र ही नहीं है क्या, मिलने आना तो दूर फोन तक करने में जो कंजूसी करें उन्हें.... ?




Tuesday, February 26, 2013

भुट्टे के पेड़



कल खतों के जवाब का दिन था. शाम को उसकी तीन सखियाँ एक साथ आ गयीं, परसों जो केक बनाया था, उन्हें पसंद आया, आज एक एनिवर्सरी पार्टी में जाना है, कल रात नूना सोच रही थी कि इस अवसर पर एक कविता लिखेगी लेकिन अब सम्भव नहीं लगता, समय नहीं है या कहें कि वैसा मूड नहीं है, शायद लिख भी पाए, कोशिश तो करेगी ही. जून की स्वास्थ्य समस्या अभी ठीक नहीं हुई है, वह आजकल थोड़ा उदासीन से रहते हैं, या फिर उम्र के साथ यह स्वाभाविक है. कल लाइब्रेरी से लौटते समय हल्की बूंदाबांदी होने लगी, वे लोग एक परिचित के यहाँ रुक गए. गृहणी का भाषण शुरू हो गया, वह पता नहीं कैसे इतना बोल लेती हैं.

कल कविता जैसा कुछ लिख नहीं सकी, पार्टी अच्छी रही, लौटने में काफी देर हो गयी. उनका उपहार शायद उन्हें पसंद आया हो शायद नहीं, पर फूल तो अवश्य भाए होंगे, फूल जो वह  हमेशा ले जाती है ऐसे अवसरों पर, उन्हें प्रतीक्षा भी रहती है.. कल रात उसे भी अपनी शादी की स्मृतियाँ ताजा हो गयी थीं. जून भी उसके भावों में सम्मिलित हो गए, वह दिल की बात समझ जाते हैं. नन्हे का लिखने का आजकल बिलकुल मन नहीं करता है, पर पढ़ने में वह ठीक है. आज वह बहुत देर से सोकर उठा है, उसकी मर्जी पर छोड़ दिया जाये तो शायद वह  दस बजे तक भी न उठे.

कल उसने चंद पंक्तियाँ लिखकर भिजवा दीं, अभी तक उनका फोन नहीं आया है, शायद वह झिझक रही हों. आज भी मौसम गर्म है. सुबह देखा गुलाब की पत्तियों में छेद है, जीनिया के पौधों में भी शुरू हो रहे हैं, शाम को दवा का छिडकाव करेंगे. अगले महीने गुलदाउदी की कटिंग्स भी लगनी हैं, उसके पत्तों पर भी दवा का छिड़काव जरूरी है. कोलकाता रेलवे स्टेशन से जो पुस्तक खरीदी थी “किचन गार्डन” उसे भूल ही गयी, आज पढ़ेगी.

नन्हे का परीक्षा परिणाम अच्छा रहा चार सौ में से तीन सौ तिरानवे अंक मिले हैं और दूसरी पोजीशन है क्लास में, वह बहुत खुश था कल. शाम को क्लब में ‘दोस्त’ फिल्म देखी, जो जानवरों पर थी, उसे बहुत पसंद आई, पिछले कुछ दिनों से नूना के दायें हाथ में कुछ अनोखी सी अनुभूति होती है, डाक्टर को बताना भी मुश्किल है, जून को भी नहीं बताया है अभी तक, कभी-कभी लगता है कहीं यह उसका वहम न हो, पर टहलते समय कभी-कभी हाथ देर तक जब लटका रहता है, ऊपर उठाना एक बड़ा काम सा लगता है.

पिछले सप्ताह वे लोग दो दिनों के लिए तेजपुर गए थे. दो दिनों की भीषण गर्मी के बाद आज मौसम अच्छा हुआ है. कल रात को वर्षा हुई, आंधी भी आयी होगी क्योंकि सुबह भुट्टे के सभी पेड़ गिरे हुए थे. पीछे आंगन में व बाहर सभी ओर पत्ते बिखरे हुए हैं. शनिवार को अस्पताल गयी थी, कल पहला इंजेक्शन लगा, कल से हाथ में वैसा अनुभव नहीं हुआ है, एक बार फिर चिकित्सा शास्त्र के प्रति मन श्रद्धा से भर गया है. कल “कल्याण” पढ़ा कुछ देर, मन हल्का होगया, सरे संशयों से दूर..ॐ पूर्ण मदः पूर्ण मिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते. आज इस समय भी काफी तेज वर्षा हो रही है झमाझम..उसने सोचा, अच्छे-भले मूड को बिगाड़ना हो तो सोनू को कोई काम दे देना चाहिए, कई बार कहने पर भी नहीं होता है जब काम, तो खीझ उठती है और कल्याण में पढ़े वे सारे वाक्य आँखों के सामने आ जाते हैं कि क्रोध आने पर इंसान विवेक शून्य हो जाता है.

Monday, February 4, 2013

चित्रकूट की शोभा



आज कृष्ण जन्माष्टमी है, टीवी पर सुबह भी और दोपहर को भी इसी उपलक्ष में अच्छे कार्यक्रम दिखाए गए. अभी-अभी सोनू देखकर सोया है, जो खुद भी एक नन्हा कन्हैया है, उनका प्यारा सा पुत्र, कितने आराम से सो रहा है, शायद कोई स्वप्न देख रहा है. आज उसका स्कूल बंद है, तभी सुबह से उसका मन लगा है उसके छोटे-छोटे कामों में हाथ बंटाते..कैसे रहेगी वह जब वह हॉस्टल में रहेगा..वह रह तो पायेगा न. यहाँ की तरह कभी घुटनों पर तो कभी हाथों पर चोट लगाकर तो नहीं आयेगा स्कूल से.

पिछले तीन-चार दिनों से..हाँ पिछले गुरुवार से ही घर में कार्य चल रहा है. दिन भर यानि सुबह सात बजे जून के दफ्तर जाने के बाद ही काम करने वाले आ जाते हैं, साढ़े तीन तक रहते हैं, अभी काफी दिन लगेंगे. उसे समझ नहीं आता कहाँ बैठे, वैसे इसमें कोई परेशानी की बात नहीं है, क्योंकि यह काम उन्होंने अपनी इच्छा से ही शुरू करवाया है. जब पूरा घर साफ हो जायेगा, नए पेंट की खुशबू से महकेगा तो यह सारी गड़बड़ी भूल जायेगी, गड़बड़ी यानि अव्यवस्था, इस कमरे का सामान उधर और उधर का इधर..अभी तो ऐसे ही चल रहा है. कल चार पत्र लिखे उसने, पिछले हफ्ते घर से पत्र नहीं आया है इस बार तो आना ही चाहिए, बहुत दिन हो गए हैं.

कल आखिर वह खत आ ही गया, जिसका उसे इंतजार था. पिता ने लिखा है, शब्दों का प्रवाह निर्झर की तरह था, और माँ को भी भाव सुंदर लगे. छोटे भाई ने अभी तक जवाब नहीं दिया है शायद वह ज्यादा ही उदास है. आज ही पिलानी से चिट्ठी भी आ गयी है, रजिस्ट्रेशन हो गया है, जून आज परीक्षा शुल्क भेज रहे हैं. नन्हा आज सुबह बिस्तर छोड़ना ही नहीं चाह रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया..एक बार तो बोला ‘रोज-रोज स्कूल जाते जाते मेरा मन स्कूल से उठ गया है’, वह जानती थी की वह जायेगा अवश्य...सिर्फ कह रहा है, उसका टेस्ट भी हो सकता है आज. घर के अंदर डिस्टेम्पर का कार्य हो चुका है आज बाहर हो रहा है, परसों से अंदर खिड़कियों की पेंटिंग का काम शुरु हो जायेगा. पिता ने लिखा है, चिंतन, अध्ययन और लेखन यूँ ही चलता रहे तो..उसे जरूर गम्भीरतापूर्वक कुछ करना चाहिए इस दिशा में. जून ने खत पढ़ा मगर कुछ नहीं कहा..कविता उनके लिए..इतनी महत्वपूर्ण नहीं है..अपना-अपना स्वभाव है, लेकिन उनका मन जब प्यार करता है तो एक कवि का सा ही लगता है..एक साथ ही वह इतने  भावुक और इतने कठोर हैं. कठोर इस माने में कि वह लोगों पर शीघ्रता से विश्वास नहीं करते..खैर.. उसने यहीं लिखना बंद किया और पत्र लिखना शुरू किया.

आज मौसम ने फिर दरियादिली दिखाई है, सुबह से टप-टप सुनाई दे रही है, नन्हा स्कूल गया है, जरूर उसके स्कूल के मैदान में पानी भर गया होगा, कल रात से जो जल अनवरत बरस रहा है. ग्यारह बजने में कुछ ही मिनट हैं, मन बार-बार रामायण में पढ़ी उन सुंदर पंक्तियों की और जा रहा है जो राम चित्रकूट की शोभा का बखान करते हुए सीता से कहते हैं. सुंदर नीलधर मेघ उच्च शिखरों पर वृष्टि करते हैं फिर मन्दाकिनी की शोभा का वर्णन भी अद्भुत  है, एक सुंदर प्राकृतिक दृश्य आँखों के सामने आ जाता है.






Wednesday, January 9, 2013

हर कोई चाहता है...क्या?



आज फिर कई दिनों के बाद उसने डायरी खोली है, सोचती रोज थी, पर कुछ लिखे ऐसा मन नहीं होता था. आज खत लिखने बैठी तो इसे भी ले आई और अब यह उसके सामने है. सबसे पहले ध्यान आया कि कुछ देर पूर्व पंजाबी दीदी को फोन किया था मिली नहीं, शायद अस्पताल गयी हों, कल अगर फ्लाईट आई हो तो उसकी एक मित्र भी आ गयी होगी. पर वह  यह सब क्यों लिख रही है, वह तो अपने आप से बातें करने आई थी. क्या खुद का सामना करना इतना मुश्किल है, शायद आजकल हो गया है उसके लिए. कितना कुछ हुआ इन दिनों में, छोटी बहन का विवाह हो गया, वे घर गए, दिल्ली गए, कोलकाता गए वापस आये. उसका गला भी खराब हुआ, कल पिकनिक में गए और भी न जाने कितनी बातें. पर यह सब तो वह  लिखना नहीं चाहती थी, फिर वह क्या है जो लिखना चाहती है, जो उसके मन के अंदर कहीं दबा, छुपा सा रहता है, पर फूट कर नहीं आता...वह कोशिश ही नहीं करती, पर कुछ है जरूर..जो उसे औरों से पृथक करता है, जो सिर्फ उसका है, ऐसा कुछ जो आजतक बाहर आने के लिए ही वहाँ बसा है. धीरे-धीरे वह अपने आप ही बाहर आएगा, जब वह कागज-कलम लिए उसका स्वागत करने को तत्पर रहेगी, जो बाहर आकर भी उसके मन को खाली नहीं करेगा बल्कि भर डालेगा उसे, सम्पूर्णता देगा उसे, कविता में कितनी बड़ी ताकत है यह...कवि को रीता  नहीं करती, जब एक भाव कवि उड़ेंलता है तो कहीं अंतर में एक घट भर जाता है, और ऐसे ही कई भाव सुगबुगा रहे हैं उसके अंतर्मन में, कहीं तो कोई है जो इन्हें समझेगा...पर जब तक ये बाहर नहीं आते खुद ही कहाँ समझती है..और वह कोई कौन होगा शायद कोई भावी पाठक...कितने दिनों वंचित रखा है उसने उन्हें..कितने दिनों प्रतीक्षारत रखा है स्वयं को..पर कभी तो टूटेगा यह मौन?

आज मौसम फिर ठिठुर रहा है, धूप एक पल के लिए आती है फिर चली जाती है. कल नूना ने लिखना शुरू किया तो समय का आभास ही नहीं रहा, जून के आने पर ही पता चला, दिन कैसा अच्छा बीता..शाम को टीटी खेलने गए, हॉल खाली था, वे आराम से खेल सके. कल यात्रा से यहाँ आने के बाद का पहल पत्र बड़े भाई-भाभी का मिला. नन्हा आज सुबह उठना ही नहीं चाह रहा था, कल दोपहर सोया नहीं था शायद इसीलिए, उसे दस-ग्यारह घंटे तो सोना ही चाहिए. पंजाबी दीदी फिर नहीं मिलीं फोन पर, उसने सोचा कुछ देर में फिर करेगी, उन्हें यहाँ से चले ही जाना है इसीलिए शायद वह पहले सा जुडना नहीं चाहतीं, नहीं तो इतने दिन फोन न करें, ऐसा नहीं हुआ. होता है ऐसा, इंसान जब जहां से जाना चाहता है नाते तोड़ना चाहता है पर जब इस दुनिया से जाना होगा...कितनी भयावह लगती है मृत्यु, शायद उतनी है नहीं पर कभी-कभी जब वह सोचती है एक दिन यह सब कुछ छोडकर शून्य हो जाना होगा तो डर लगता है, जीवन से इतना मोह है तभी समझ में आता है. अचानक उसे अपनी असमिया मित्र का ध्यान हो आया, आज उसका मन इधर-उधर ही जा रहा है, वह एकाग्रता जो लेखन में चाहिए, आ ही नहीं रही है, कोई एक विषय हो या एक बिंदु हो जिस पर मन साधना है तो आसान होगा. पर वह आधार, वह बिंदु कहाँ से लाये ? लाना भी अपने अंदर से होगा..ढूँढना होगा मन में गहरे उतर कर, यह खोज भी तो एक विषय हो सकता है. हर इंसान को हर पल किसी न किसी कई तलाश रहती ही है, किसी को सुख की किसी को शांति की तो किसी को दोस्त की और किसी को दुश्मन की... तलाश करते-करते ही जीवन चूक जाता है, किसी को भगवान की तलाश है...भगवान जो कभी नहीं मिलते, कभी उसका मन भगवान को मानने से इंकार क्यों करता है...तब जब दिमाग मन पर हावी हो जाता है. यह मानना न मानना भी तो एक तरह की तलाश है.

Thursday, December 27, 2012

भारत रत्न



आज एक जन्मदिन और...उम्र यूँ ही बीतती जाती है और जिन्हें जीना चाहिए सुला दिए जाते हैं, राजीव गाँधी के लिए जितने आँसूं बहें कम हैं.. भारत का यह हीरा..एक खरा इंसानएक समझदार राजनीतिज्ञ...आखिर कौन जिम्मेदार है उसकी मृत्यु के लिए.?

पिछली बार कब डायरी खोली थी, याद नहीं, और याद करने की जरूरत भी नहीं, न ही यह वादा करने की कि अब से नियमित लिखेगी...क्योंकि वादा हमेशा टूटने के लिए ही होता है. आज मन हल्का हल्का है, घर भी साफ-सुथरा और मौसम भी सही..यानि सुहावना, न ज्यादा गर्म न ज्यादा ठंडा, बहुत दिनों बाद पुराने घर की पड़ोसिन का फोन आया, अच्छा लगा. वह  घर आयेगी, कैरम खेलने और ‘सदमा’ फिल्म देखने, जिसका अंत बहुत कारुणिक है. कल वह नन्हे को लेकर क्लब गयी थी, एरोमॉडलिंग देखी, बहुत आनंद आया, नन्हे को उससे भी ज्यादा, वही दीदी मिलीं उन्होंने वापसी में लिफ्ट दी. आज सोमवार है यानि खत लिखने का दिन, इस हफ्ते तीन खत लिखने हैं.

कल शाम को जून ने दो लोगों को चाय पर बुलाया था, बाद में कहने लगे कि...बेकार ही बुलाया...जितने उत्साहित वह थे उतने आने वाले नहीं लगे, शायद इसीलिए..ऐसा कई बार होता है ...शायद सबके साथ होता हो. आज सुबह वह एक स्वप्न देख रही थी अद्भुत था किसी फिल्म की कहानी कल तरह..कल शाम को अल्फ़ा द्वारा अपहृत किये गए लोगों के बारे में सुनकर, (जो ओएनजीसी के थे, ऑयल के भी हो सकते थे) मन ही तो है डर गया..लेकिन मन अगर इसी तरह डरता रहा तो यहाँ वे कैसे रह सकेंगे..भगाना ही होगा इस डर को तो. जून कल एक फिल्म का कैसेट लाए थे, उसने सोचा कि वह अभी देखे या नन्हे के आने पर, उसे अभी सारी फ़िल्में नहीं दिखानी चाहिए. ज्यादातर फ़िल्मों में वही सब दिखाते हैं खून खराबा हत्या, यानि शुद्ध हिंसा, इसे ही मसाला फिल्म कहते हैं. कल वह स्कूल में गिर गया, सारे कपड़े गंदे हो गए, टीचर ने दूसरे कपड़े पहना कर भेजा.

अखबार खोलते ही कैसी भयानक खबर पढ़ने को मिली. लन्दन में दो बच्चे भूख और प्यास से मर जाते हैं क्योंकि उनकी माँ मर चुकी है और दस दिनों तक किसी को खबर नहीं होती, कैसा शहर है जहां पड़ोसियों को पड़ोसियों की खबर ही नहीं रहती.
कल रात उन्होंने ‘हिना’ फिल्म देखी, अच्छी फिल्म है, नायिका जेबा भी बहुत अच्छी है. आज अखबार नहीं आया, शायद कल फ्लाईट नहीं आई होगी. कल शाम को जून के साथ एक और सप्लायर आये थे, चाय पिलानी थी उन्हें, उसने बेमन से नाश्ता बनाया, गर्मी इतनी ज्यादा थी और उसके रेशमी कपड़े चिपक गए थे पसीने से, कुछ कोफ़्त पिछली रात की भी थी कि वह ठीक से किसी के सवालों के जवाब नहीं दे पायी, वही अंग्रेजी बोलने में झिझक..पता नहीं क्यों..आज फिर वर्षा हो रही है, बिजली भी चली गयी है, नन्हे के जन्मदिन के लिए पहला कार्ड आया है, उसकी छोटी बुआ ने एक पार्सल भी भेजा है, शायद ड्रेस भेजी होगी. चार वर्ष का हो जायेगा वह, समय कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता.

अभी-अभी राजीव गाँधी को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ दिए जाने का अलंकरण समारोह टीवी पर देखा. उनके बच्चों व पत्नी के लिए कैसा दृश्य रहा होगा, भारी पल रहे होंगे, बेहद भारी. अगर वे जीवित होते तो क्या यह सम्मान उन्हें मिलता. कितना कुछ कहा जाता, कितनी चर्चाएँ होतीं, विरोध होता. जून ने फोन किया कि दोपहर के खाने पर वह घर नहीं आ रहे हैं, कोई इंटरव्यू है, वह तो सुनकर समझी थी कि इंटरव्यू उन्हें देना है पर बाद में बताया कि लेना है, अब देने की उम्र नहीं रही उनकी. सोनू गृहकार्य करके टेस्ट के लिए पढ़ रहा है, उसकी बड़ी बुआ ने भी जन्मदिन पर पैसे भेजे हैं. सर्वोत्तम(रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण) का नवीनीकरण कराया था उन्होंने, उसे उपहार में मिलने वाली पुस्तक की प्रतीक्षा है. 

फिर एक अंतराल.. आज सब काम कुछ जल्दी ही निपट गए हैं, मन ने कहा डायरी उठा लो तो हाथों ने उठा ली. चारों और मन की ही सत्ता है, हर काम मन के इशारे पर होता है, उसका मन खुश तो वह भी खुश मन उदास तो...पर यह ‘मैं’ कौन ? क्या मन से अलग कुछ, हाँ, कुछ अलग तो है.. नन्हे की चंपक आई है आज, अब वह कहानियाँ सुनाने को कहेगा. गर्मी बहुत है आजकल, ऊपर से बिजली चली गयी कल रात, पर वर्षा हो गयी सो नींद आ ही गयी बाद में. ऐसे में जून को जुकाम हो गया है, कल शाम वे क्लब गए, आइसक्रीम खायी पर वह ने नहीं खा सके, परसों जो डिटेक्टिव किताब वह लाइब्रेरी से लायी थी शायद पहले भी ला चुकी है एक बार, हल्का सा याद आता है, पढकर रात भर स्वप्न आते रहे, शायद.. नहीं पक्का.. उसी किताब का असर था.


Wednesday, November 21, 2012

Cry the Pecock -Anita desai



नए वर्ष का प्रथम प्रभात भी और दिनों की तरह ही आया उसके लिए, यानि कि कोशिश करने पर भी सुबह जल्दी नहीं उठ सकी, वही सात बजे जबकि पिछली रात सोयी दस बजे ही थी, नव वर्ष की पूर्व संध्या पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम भी नहीं देखे, जून होते तो वे साथ-साथ देखते, दोपहर होते-होते ही वह आज भर के लिए आ गए. कल सुबह ही उन्हें जाना होगा. अब पाँच दिन बाद आएंगे. छोटे भाई का खत व फूलों भरा कार्ड मिला. नए वर्ष में उसे यह नीले रंग की सुंदर डायरी मिली है, जून के पास भी ऐसी ही डायरी है. उसके दिन अच्छे बीत रहे हैं, वे आते हैं फिर एक-दो दिन रहकर चले जाते हैं, सब कुछ भला-भला सा लगता है. कभी-कभी मन परेशान हो जाता है, छोटी-छोटी सी बात पर ही. वह सलीके से रहना नहीं जानती इसी बात पर या वह बात नहीं कर सकती या फिर इसी बात पर कि उसके बाल ठीक नहीं लग रहे हैं या फिर यही कि कमर का घेरा बढ़ता जा रहा है. शाम को नन्हे के साथ झूला पार्क में दौड़ने पर उसे कितना अच्छा लगा था हल्का-हल्का, हवा से भी हल्का. उसे अपना वक्त सही बातों में और सही ढंग से लगाना चाहिए, सब कुछ व्यवस्थित...तभी मन भी व्यवस्थित रह सकेगा. दादीजी को अब घर जाने पर वह नहीं देख पायेगी, कभी-कभी सोचकर कैसा लगता है. पिता ने उसकी स्कूल की एक सखी का पता भेजा है. उसे पत्र लिखेगी.

नन्हे का रिजल्ट आया है, उसकी लिखाई के कारण कुछ नम्बर कटे और कुछ उसके राइम्स न सुनाने के कारण, वह थोड़ा शरमाता है. उसने सोचा वह उसकी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देगी, ताकि वार्षिक परीक्षा में अच्छा करे. सुबह का काम खत्म करके वह पड़ोस में गयी उनका नया टीवी देखने, पड़ोसिन ने बड़े स्नेह से स्वागत किया. दोपहर को नन्हा स्कूल से आया तो खेलने में उत्सुक था, वह उसकी बेबी अलबम में फोटो लगाने लगी, उन्होंने खाना देर से खाया, पर ठंडा हो जाने के कारण ठीक से खा भी नहीं सके, कल से वह ऐसा नहीं करेगी सोचा उसने. तीसरे जन्मदिन का फोटो नहीं मिला था, उसे याद आया तब वे बनारस में थे, जन्मदिन मना ही नहीं था, उसी साल तो उसने बीएड किया था, अब लगता है कितनी पुरानी बात हो गयी. मैडम को कार्ड भेजा है पर वे शायद ही जवाब दें, सुरभि ने भी पत्र नहीं लिखा. जीवन में कितने-कितने लोग मिलते हैं, लगता है हम उन्हें अच्छी तरह जानते हैं पर समय के साथ सब भुला देना पड़ता है.

शाम को वह देर तक ‘प्लेन और स्ट्रेट लाइन्स’ पढ़ती रही, कल उसकी छात्रा पढ़ने आयेगी. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी अनिता देसाई की एक पुस्तक cry the pecock भी पढ़ रही है. उसकी नायिका बहुत कुछ खुद जैसी लगती है और लग रहा है कि गौतम यानि उसका पति एक दिन उसे खूब प्रेम करेगा..जैसे जून.. उसे याद आया जून के लिए उसे एक उपहार खरीदना है, उनके विवाह की वर्षगाँठ से पहले. कल ही जायेगी बाजार..पर किसके साथ?

शाम के साढ़े पांच हुए हैं, बाहर सुबह से ही बूंदाबांदी हो रही है जो दोपहर बाद से तेज हो गयी है, नन्हा और वह घर में बैठे हैं, चार बजे से ही अँधेरा छाया है कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता, अगर जून होते तब भी नहीं. नन्हे के साथ कारपेट पर टेनिस टेनिस खेल रही थी, वह एक घंटा पहले ही उठा है. दोपहर सोने से पूर्व उसे दो कवितायें सिखायीं, अगर वह साल भर नर्सरी में पढ़ा होता तो उसे कई याद होतीं. नन्हा उसके पास ही बैठा है कह रहा है उसकी पोयम भी डायरी में लिख दे,  humpty dumpty sat on a wall…और pat a cake …सोमनी उसकी छात्रा ऐसे मौसम में शायद न आ पाए, उसने सोचा था पर घंटी बजी, वह पढ़कर गयी पिछले माह की फ़ीस देकर, पर उसे अब उतनी खुशी नहीं होती, जून की पे बढ़ गयी है अब उन्हें किसी जरूरत के लिए सोचना नहीं पड़ता, यानि की वह अपने मन की हर इच्छा पूरी कर सकती है खरीदने के मामले में, पर अब खरीदने में भी उतना आनंद नहीं आता..संतुष्ट होना शायद इसी को कहते हैं. पर जून के लिए उसे कुछ लेना है.

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