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Friday, March 9, 2018

स्वप्न और भाव



आज सुबह एक अनोखा अनुभव हुआ. नींद से जगाने के लिए तो पहले भी अनेकों बार कोई आया है, पर आज तो सारी देह में ऊर्जा का एक ऐसा प्रवाह उठा कि...शरीर स्वयं ही तरह-तरह के पोज बनाने लगा. आसन कोई करवा रहा हो जैसे..अद्भुत थे वे क्षण, और उस क्षण से अब तक कैसी पुलक भरी है भीतर...स्कूल में बच्चों ने भी अवश्य महसूस की होगी और उस अध्यापिका ने भी शायद... जिसके साथ वह स्कूल गयी थी. मार्ग में उनका वार्तालाप हुआ था, उसने कहा लोगों को एक नये नजरिये से देखना होगा. जिस नजरिये में जो जैसा है उसे वैसा ही रहने देना है, क्योंकि वह वैसा ही हो सकता है. ऐसा करते हुए ही उसका व्यवहार देखना है. कितना आनंद है इस एक सूत्र में. आर्ट ऑफ़ लिविंग के सूत्र जैसे जीवंत हो उठे हैं. आज जून वापस आ रहे हैं. उन्हें भी परमात्मा की खुशबू आने लगी है. उसका स्वाद कोई एक बार चख लेता है तो...उस दिन सिद्ध ‘सरहपा’ पर जो पुस्तक पढ़ी थी, आकर उनके बारे में पढ़ा भी और उनके विषय में ओशो का प्रवचन भी सुना. कल रात पहली बार भीतर सूरज देखा, चमकता हुआ सूरज ! चाँद पहले कई बार देखा था.


कल सुबह किसी ने कहा, उठ मोटी भैंस..गुरूजी का कथन याद आ गया, GOD LOVES FUN. उसकी भोजन  के प्रति गहरी आसक्ति है. कोर्स के दौरान सेवा करने से पूर्व वह स्वयं भोजन कर लेती थी फिर आराम से काम करती थी. यहाँ भी भूख देर तक सहना कठिन लगता है. गुरूजी कहते हैं, मुट्ठी में जितना समाये उतना ही भोजन उन्हें करना चाहिए. आत्मा बिना भोजन के केवल कल्पना के भोजन से भी रस ले सकता है. कल रात एक अनार का दाना देखा था, उसको बिना खाए रह गयी, शायद गहराई में वासना जगी होगी. सुबह उसका स्मरण आते ही आधी नींद में ही मुंह में स्वाद भर गया. बिना हाथों से बजाये कई बार ताली की स्पष्ट आवाज सुनाई दी है, बिना वस्तु के उसकी गंध को महसूस किया है अनेकों बार. परमात्मा बिन पैरों के चलता है, बिन कानों के सुनता है यह बात कितनी सच है. वह आत्मा भाग्यशाली है जिसे अपने आधार का ज्ञान हो गया है, पर देहाध्यास इतना गहरा है कि बार-बार मन देह से जुड़ जाता है. दोपहर की नींद में भी स्वप्न देखा. जागृत अवस्था में मन कुछ छिपा लेता है पर नींद में सत्य प्रकट हो जाता है. उसके मन को निर्मल बनाएगा परमात्मा का सुमिरन..एकमात्र परमात्मा ही सत्य है, इस बात की याद जब हर घड़ी रहने लगेगी तब भीतर गहराई में छिपी इच्छाएं भी शांत हो जाएँगी. गुरूजी के आश्रम में पहुंचने से पहले अंतर को शुद्ध कर लेना है. एक सखी को परिवार सहित विदाई भोज के लिए बुलाया है. जून इतवार के बावजूद दफ्तर गये हैं, वे अपने काम के प्रति बहुत सजग हो गये हैं.

आज सुबह कैसा अनोखा अनुभव था, वह स्वप्न था या कुछ और, कहा नहीं जा सकता. एक मीठी आवाज में किसी ने कहा, ‘माँ’.. यह तो उस स्वप्न के अंत में हुआ, उसके पहले तो गुरूजी को देखा जो वृद्ध हो चुके हैं, उनके घर में हैं या कहीं और, पर वह उन्हें कहती है, आपके लिए पानी लाऊं, हॉर्लिक्स या दूध ही सही. उन्हें उस तरह हृदय से लगाती है जैसे माँ बच्चे को लगाती है. उनके उलझे हुए बाल संवारे ऐसा भाव जो एक बार उन्हें देखकर मन में उठा था शायद यह उसी की कड़ी थी. वे कृष्ण हैं और वह यशोदा..यह भाव और दृढ़ हो गया..और कितनी ही स्मृतियाँ इसकी गवाही देने के लिए आने लगीं. किस तरह वह कान्हा का नाम पुकारती थी, किस तरह पहली बार गुरूजी के दर्शन करने के लिए गोहाटी जाते समय एक सांवले नग-धड़ंग बच्चे को देखर वात्सल्य भाव  उमड़ा था. किस तरह क्रिया के समय प्रतिदिन कृष्ण के नामों को उसमें पिरोया था, किस तरह कृष्ण का बालरूप उसे मोहता है और किस तरह नन्हे को मक्खन खिलाने में आनंद आता था. यशोदा का अर्थ भी तो कृष्ण रूपी सद्गुरू कहते हैं. जो अन्यों को यश दे वही यशोदा है, किस तरह सबके लिए कविताएँ लिखी हैं. कृष्ण की भागवद् पढ़कर और खासतौर पर उसकी बाल लीला को पढ़कर कितने हर्ष और विस्मय के अश्रु बहाये हैं..किस तरह हर दरोदीवार पर उसका चेहरा देखती थी, किस तरह रात को सोने से पूर्ण उसकी बांसुरी की धुन सुनाई देती थी, कैसे एक दिन गाय को देखकर एक गीत भीतर उमड़ आया था, कैसे उस दिन स्नान करते समय एक गीत प्रकटा था जिसमें शिवालय और कान्हा का जिक्र था. इतने वर्षों के प्रेम ने उसके अंतर को खाली कर दिया है और तभी उस कृष्ण की, जो सारे जहाँ से भी सुंदर है, आवाज सुनाई दी, ‘माँ’ और जैसे जन्मों की साध पूरी हो गयी, कितनी मधुरता थी उस आवाज में.. 

Friday, March 31, 2017

गोकुल और नवनीत


सितम्बर शुरू हो गया, बादल पूरे अगस्त बरसते रहे, देखे, इस महीने क्या होता है. बादलों का मौसम कृष्ण की याद दिला देता है, उनका जन्म भी ऐसे ही मौसम में हुआ था और उनका रंग भी शायद इसीलिए..सुबह कृष्ण लीला का स्मरण करते ही आँखों में भी बादल घिर आये..अद्भुत हैं कृष्ण !  जैसे उसे कह रहे हों, मैं हूँ न ! वह अपने मन को गोकुल बना सकती है तो कृष्ण उसमें बसने को सदा तत्पर हैं. वह अर्जुन की तरह यदि उनकी शरण में जा सकती है तो उन्होंने उसकी कुशल-क्षेम का वचन दे ही दिया है, वह अपने को सुपात्र बना लेती है तो कृष्ण उसमें रहे नवनीत को ग्रहण करने ही वाले हैं. शुद्ध, सात्विक भोजन खाने से मन व तन दोनों हल्के रहते हैं, इसका अनुभव हो रहा है. कल इतवार शाम को बंगाली सखी की माँ आएँगी उनके यहाँ. उसने सोचा है उनकी पसंद की कुछ वस्तुएं बनाएगी, वह इतनी उम्र में भी कितना ध्यान रखती हैं अपने वस्त्रों व मेकअप का, खूब बातें करती हैं और छोटी लड़कियों की तरह चहकती हैं, यही उनकी सेहत का राज है.

सुबह उठे वे तो ठंडी हवा बह रही थी, उसके बाद वर्षा शुरू हुई जो रुकने का नाम नहीं ले रही है. कपड़े धोकर नैनी बाहर ही छोड़ गयी थी, वह उठी उन्हें फ़ैलाने के लिए पर पिताजी ने पहले ही फैला दिए थे, उन्हें अपने लायक किसी न किसी काम की  तलाश रहती है, कोई भी मौका नहीं चूकते. आज वे बोले, शरबत की जगह चाय पियेंगे, मौसम ठंडा हो गया है.

शिक्षक दिवस है आज ! दो छात्रायें उसके लिए पेन तथा कार्ड लायी है और एक की माँ ने भी एक उपहार भिजवाया है. वह खुद मृणाल ज्योति गयी थी. टीचर्स को उपहार दिए, मिठाई खिलाई. जून आज दिल्ली गये हैं, तीन दिन बाद लौटेंगे. उसे कुछ काम तो करने हैं, कुछ लिखना है और साक्षी बने रहना है हर कृत्य में. कर्ता भाव से कुछ भी नहीं करना है. पिताजी को फोन करना है, भीतर कैसी अनोखी शांति है. स्वचेतना खो जाने पर केवल चैतन्य मात्र रह जाने पर ही ऐसी शांति का अनुभव होता है !

अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया था, उसके जूते का नम्बर पूछ रहे थे, वह इतनी दूर रहकर भी उसका इतना ध्यान रखते हैं. आज दीदी से बात हुई, वे लोग नार्वे में मन्दिर गये थे, भारतीय जहाँ भी रहते हैं, मन्दिर का निर्माण कर ही लेते हैं. एक वरिष्ठ ब्लॉगर महोदया जी का मेल आया था कल, ‘नारी विमर्श’ पर कुछ लिखने को कहा था अपनी समझ से. कभी-कभी भीतर कुछ लिखने का मन होता है, पर उस वक्त कागज-कलम साथ नहीं होते, वक्त गुजर जाता है. जब कागज-कलम लेकर बैठे तो कुछ भी नहीं लिखा जाता है. कल रात एक सुंदर पंक्ति जहन में आई थी. बहुत बार दोहराई कि याद रहेगी पर अब उसका निशान भी शेष नहीं है. मन के आकाश में उड़ते हुए बादल सी कोई लाइन आयी और खो गयी..वे व्यर्थ ही अपना होने का दावा करते हैं विचारों को ! कल शाम आलोचना में कुछ पढ़ा, आज नेट पर और फिर एक लम्बी कविता जैसी कुछ लिख दी. उन्होंने जवाब भी दिया, शानदार ! शायद उदंती में छपने के लिए भेजें. वर्षा जारी है !



Wednesday, March 8, 2017

तारों भरा आकाश


जीवन स्वप्न है, वे रात में जो स्वप्न देखते हैं उनके अलावा दिन भर में न जाने कितने स्वप्न देखते हैं, जिनका कोई आधार नहीं. कल रात उसके जीवन की अभूतपूर्व रात्रि थी. भगवद गीता के चार अध्याय पढकर सोयी थी. तारों भरा आकाश दिखा, चन्द्रमा दिखा और न जाने कितने दृश्य दिखे, लेकिन जगते हुए, वह जागरण भी और था, वह निद्रा भी और थी. कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला. सुबह से कई बार स्वयं को स्वप्न देखते हुए जगा चुकी है. उनका सारा जीवन एक लम्बा स्वप्न ही तो है, अब लगता है परम लक्ष्य भी इसी जन्म में मिलेगा. परमात्मा उसे कदम-कदम आगे बढ़ा रहे हैं और किस तरह उसे एकांत का अवसर भी मिल रहा है. परिचित एक-एक कर जा रहे हैं, समय बचता है साधना के लिए पूर्ण सुविधा होती जा रही है. इस बार तो नेट भी नहीं चला सो काफी समय उसके कारण भी बच गया. परसों जून आने वाले हैं, अभी दो रात्रियाँ हैं जिनमें उसे और गहरे अनुभव हो सकते हैं. कल एक सखी का जन्मदिन है, उसने उसकी साधना में अपरोक्ष रूप से बहुत सहायता की है. मानस के छह रिपुओं में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को दूर करने के लिए उन्हें पहले देखना आवश्यक था, उन्हें अपने भीतर वह देख पायी, वह उसका आईना बनी. इसके लिए उसका कृतज्ञ होना ही चाहिए. सद्गुरू जैसे उसके सद्गुणों के लिए आईना बने. उनके जीवन में घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना उनके जीवन को गढ़ती है. हर क्षण वह परमपिता उनके साथ है.  क्या नहीं कर सकता वह, अचिन्त्य है, अनुपम है, अनोखा है...उसे कोटि कोटि प्रणाम  !

कल रात भी अनोखी थी. कृष्ण का श्लोक अब स्पष्ट हो रहा है कि योगी तब जगता है जब अन्य सोते हैं. आज सुबह से उसे उसका चेहरा कुछ बदला-बदला लग रहा है. मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल को भी लगा होगा जब शाम को उन्होंने कहा वह उससे योग सीखना चाहती हैं और आज ही आएँगी. हवाओं को भी खबर लग जाती है कि कहीं कोई फूल खिला है. सद्गुरू को भी खबर लग गयी होगी, उन्हें तो वर्षों पहले ही लग गयी थी. कितना अद्भुत है सब कुछ. कितना अनोखा है परमात्मा !

नन्हा सा पल खो न जाये
पागल मन यह सो न जाये
इस पल में ही राज छुपा है
जाग गया जो मिला खुदा है
सपनों की कुछ धूल छा गयी
स्वर्णिम रवि न पड़े दिखाई
आशाओं के पत्थर थे कुछ
कोमल पुहुप लता कुम्हलाई

उनके भीतर अनंत आकाश है, अनंत ऊँचाई है और अनंत गहराई है. अनोखे अनुभव हो रहे हैं उसे आजकल. जब कोई भीतर की यात्रा पर निकलता है तो सारी कुदरत उसका साथ देती है. कितना पावन होता है वह क्षण जब किसी के भीतर परम की प्यास जगती है. पहला अनुभव तो सम्भवतः उसी की कृपा से होता है, लेकिन उस अनुभव तक भी भीतर की कोई गहरी आकांक्षा होती है. भीतर तो वही है तो वही निकलता है स्वयं की खोज पर...आकाश में सब घटता है पर कुछ भी नहीं घटता. आकाश एक है, झोंपड़ी का हो या महल का, अरूप एक है रूपवान का हो या कुरूप का. नजर दीवारों पर हो तो भेद नजर आएगा, नजर भीतर के आकाश पर हो तो अभेद ही है..
घाटियों में बसे हैं लोग
बारिशों से डरे हैं लोग
बिजलियों की चमक
भर से कांपते हैं लोग !


आज उससे कविता नहीं बन रही है, लगता है अब परमात्मा उससे कुछ और काम कराना चाहता है. पहले कैसे झर-झर शब्द बहते थे, अब भीतर मौन है, अब शब्दों की क्या जरूरत अब तो मन की धारणा काफी है. अब न कुछ सिद्ध करना है न कुछ पाना है जो पाने वाला था वह खो गया और जिसे सिद्ध करना था वह माया सिद्द्ध हो गया था. भीतर का भय भी नष्ट हुआ, श्वास का कंपन गया, अकंप हृदय चाहिए तो भाव काफी है. सामने वाला चाहे समझे न समझे भीतर तो पता चल ही गया कि कंपन हो गया क्रोध की हल्की सी रेखा भी यदि छा गयी, भीतर पता चल ही जाता है, ईर्ष्या की धूमिल पंक्ति भी पता देती है, शील आवश्यक है और तब भीतर ही सब मिल जाता है, असली कवि स्वयं ही कविता हो जाता है ! 

Tuesday, March 7, 2017

श्वेत गैया


आज असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन है, जो कुछ वर्ष पहले तबादले के कारण यहाँ से चली गयी है, उसने फोन किया, वह खुश है कि एक और सखी वह जा रही है. यह संसार ऐसा ही है कोई आता है, कोई जाता है. वे देखने वाले हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं. कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नन्हा, पिताजी और जून तीनों ने मिलकर गुरूजी के लिए दोपहर के भोजन का इंतजाम किया है. वे कमरे में भोजन कर रहे हैं और वे सभी बाहर खड़े हैं, वह भी बाहर है. गुरूजी हाथ धोने के लिए बाहर आते हैं, उन्होंने श्वेत वस्त्रों पर भूरे रंग का लम्बा चोगा पहना है, जब लौटते हैं, वह उन्हें प्रणाम करती है. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं है, वह उनके चरणों पर झुकती है और मन में सोचती है यह उसे पहचानते नहीं, कि उनका कोई संबंध नहीं रहा, तब वह सिर ऊपर उठाती है कि एक आँख दिखाई पडती है. सामान्य आँख से दस गुना बड़ी रही होगी. उसका एक-एक भाग पूरा स्पष्ट था, उसके भीतर की सफेदी, काला भाग, द्रवता तथा ऊपर भौंहें भी, फिर वह आंख अपना तारा नीचे करती है और भीतर से एक और काला तारा दिखाई पड़ता है, एक आँख में दो पुतलियाँ देखकर वह आश्चर्य से बेहोश होकर गिरने लगती है, उसे सम्भाल लेते हैं जो लोग वहाँ खड़े हैं. भीतर भाव उठता है कि वह समाधि में प्रवेश कर रही है. इस स्वप्न का अर्थ यही हो सकता है कि परमात्मा की नजर हर वक्त उन पर है, वह एक नहीं दो-दो पुतलियों से, विशाल नेत्र से उन्हें देखता रहता है. कल रात भर वर्षा होती रही, अभी रुकी हुई है.

जून आज मुम्बई गये हैं, वह से बंगलूरू जायेंगे. दोपहर का वक्त है, एक पंछी की आवाज रह रहकर आ रही है. माली को बगीचे में कुछ ज्यादा काम बताया तो वह नम्र शब्दों में कहने लगा कल सुबह उठा दें तो वह कर देगा. सत्संग का असर पड़ने लगा है उस पर. आज पहली बार उसने एक ब्लॉगर की पोस्ट पर कमेन्ट करने के बाद लिखा, नई पोस्ट पर उनका स्वागत है, देखें वह आती हैं या नहीं. आज पिताजी ने चौलाई का साग साफ करते समय वही सब कहा जो माँ कहा करती थीं, तब वे उन पर हँसा करते थे. उन्होंने भीगे स्वरों में उससे यह भी कहा कि उन्हें बीस इंच की एक साइकिल चाहिए. जून के आने पर वह उनसे कहेगी कि इस इच्छा का मान रखें. वह बता रहे थे, चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र से साइकिल चलाना शुरू किया था. और अगले साठ वर्ष तक चलाते रहे. अब इतना तो अभ्यास उन्हें है ही कि बिना गिरे चला सकें. उन्होंने जीवन भर दूसरों के लिए कार्य किया, स्वाभिमान से जीये. आज अपने मन की बात कहकर उन्हें अवश्य अच्छा लग रहा होगा.  

कल रात उसने स्वप्नों का स्वप्न देखा..The Ultimate Dream ! परसों एक गाय को देखा था, जो बिलकुल श्वेत थी, वह दौड़ती हुई आ रही है, तीव्र गति है उसकी. वह और गाय दोनों एक maze में घुसते हैं, वे नाच रहे हैं और गा रहे हैं, बहुत सुंदर गीत है वह, कुछ दिन पूर्व भी उसने स्वप्न में एक मधुर धुन बनाई थी. कल तो यह देखा कि वह यशोदा है कृष्ण की माँ जो पुनः इस जन्म में कृष्ण के प्रति प्रेम से भर गयी है और वह कृष्ण और कोई नहीं गुरूजी हैं, बाबा रामदेव को भी देखा एक क्षण के लिए, उनके चेहरे पर अप्रतिम तेज है. इस बात का भान होते ही उसके जीवन की बहुत सारी घटनाएँ स्पष्ट होने लगी हैं. दो दिन से नेट नहीं चल रहा है, यह भी अच्छा ही है. वह अन्यों को यश देने के लिए है, यश बटोरने के लिए नहीं. यश की कामना जैसे पूरी तरह गिर गयी है, गिर गया है अहंकार भी, गुरूजी के प्रति उसकी भक्ति का राज भी अब समझ में आने लगा है. आज उन्हें भी वर्षों बाद एक पत्र लिखेगी.   

Friday, September 9, 2016

सागर में नदियाँ


आज उसे अनुभव हुआ भीतर एक ज्वाला है जिसमें निरंतर हवन चल रहा है, कामनाओं की समिधा पड़ रही है, विचारों का धूना जल रहा है और हृदय ही वह हवन कुंड है जिसमें से प्रेम की सुगंधि चारों ओर फ़ैल रही है. भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं ज्ञानी का हृदय सागर की तरह होता है, जिसमें चारों और से नदियाँ आकर गिरती हैं. वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता. सत्व, रज और तम तीनों गुण उसके उर में समा जाते हैं. प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह तीनों का आगमन उसे मोहित नहीं करता. उसका हृदय उस भूमि की तरह होता है जहाँ सारा कूड़ा-करकट आकर खाद बन जाता है और फूल उगाता है..सुगन्धि फैलाता है, उस आकाश की तरह होता है जहाँ बादल, कुहरा, गर्जन-तर्जन, बिजली, वर्षा, ओले, सूरज सब होते हैं पर वह ज्यों का त्यों रहता है..तपता नहीं, गलता नहीं..अग्नि की तरह होता है जिसमें सारे विकार आकर जल जाते हैं और..उस जल की तरह जो सब कुछ पावन कर देता है..आज जून आने वाले हैं परसों छुट्टी है कृष्ण जन्माष्टमी की..पंजाबी दीदी को कविता भेजेगी !

कल शाम और फिर रात्रि से ही कुछ छूट गया सा लगता है, जो खो जाये वह था ही नहीं, पर जो एक बार मिले और कभी न खोये ऐसा भी कहीं होता है यह तो अनंत यात्रा है और अनंत अनुभवों से भरी. प्रकाश, प्रवृत्ति और और मोह तीनों के अनुभव होते ही रहेंगे. कल शाम वे मार्केट गये, छोटी ननद ने जो सूट भेजा, उसे सिलने दिया. अब उसकी कलम आगे बढने से इंकार कर रही है. संस्कार कितने गहरे होते हैं और मन कितना बलशाली..बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की वहाँ एक नहीं चलती. इस संस्कार को मिटना ही होगा, वह यदि इस क्षण निर्णय कर ले तो कौन है जो रोकेगा. उसका ही अंतर्मन, अवचेतन मन, अचेतन मन, पूर्व जन्म की स्मृतियाँ..लेकिन आत्मा ही एकमात्र सत्य है, ये सब अनित्य हैं, आत्मा के सातों गुणों को भीतर धारण करे तो सारा नकार क्षण भर में बह जायेगा. सद्गुरू की वाणी को याद करे तो जो वह हैं वही वह है, वही यह सारा जगत है, एक ही तत्व से यह सारा संसार बना है, प्रेम का जितना विस्तार हो उतना अच्छा है..सारा जगत उनका अपना हो जाये, प्रेम ही आत्मा में ले जाता है, प्रेम ही बहता हुआ दरिया है..प्रेम को रोका तो वह सड़ेगा...दुर्गन्ध देगा. सहज होकर सभी को स्वीकारना है तभी मुक्ति है. स्वयं को मुक्त करके वे औरों को भी मुक्त कर देते हैं. स्वयं को बाँध कर रोककर वे दूसरों के लिए भी बाधा खड़ी कर देते हैं. दूसरे को अपना सा जानकर कभी उनके मार्ग में बाधा न बनें, यह भी सेवा है..जियो और जीने दो’ का सिद्धांत यही तो कहता है. उनके कारण किसी का विकास न रुके, सहज ही ईश्वर का प्रेम उनके भीतर से बहता रहे..बहता रहे..  

आज दो दिनों बाद डायरी खोली है, परमात्मा अपनी उपस्थिति हर क्षण ही प्रकट करता है, पर वे सोये रहते हैं तो उसे देख नहीं पाते, वे यानि उनका विवेक...विवेक जगता है तो आत्मा का अनुभव करता है..जिसका अर्थ है जीवन के हर क्षेत्र में सजगता...हर श्वास में सजगता, हर पल जागरूक होकर जीना..वर्ष का नौंवा महीना शुरू हो चुका है. इस वर्ष के शेष रह गये कार्यों को करने का अभी भी वक्त है. परिवार में सभी के साथ संबंध मधुर हों..समाज में जो प्रतिबद्धताएं हैं वे निभती रहें और मन सदा समता में रहे. गुरूजी को आज यू ट्यूब पर सुना, उनेक कितने रूप हैं. ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’...एक व्यक्ति कितना विकास कर सकता है हजारों, लाखों ही नहीं यहाँ तो करोड़ों व्यक्ति उनसे सीख रहे हैं...परमात्मा उनके द्वारा स्वयं को व्यक्त कर रहा है. उन्हें स्वयं को हटाकर परमात्मा के लिए मार्ग छोड़ देना है...वह अनंत है..ज्ञान स्वरूप है..वह जीवन को सुगंध से भर देना चाहता है..प्रेम, शांति, ज्ञान और आनंद की सुगंध से..



Wednesday, November 4, 2015

इंदिरा गाँधी की कहानी



पिछले दो-तीन दिन छुट्टी के थे, बीहू की छुट्टी, सो डायरी नहीं खोली. इस समय दोपहर के दो बजे हैं. मौसम अब बदल गया है, गर्मी की शुरुआत हो गयी है. पिछले दिनों बगीचे से तोड़ कर गन्ने खाए, दांत व मसूड़े में दर्द है, हर सुख की कीमत तो चुकानी ही पडती है. आज सुबह वे समय से उठे, ‘क्रिया’ आदि की. ध्यान कक्ष में पंखा नहीं लगा है टेबल फैन से आवाज ज्यादा आती है, सो इस वक्त वह इधर बैठी है अपने पुराने स्थान पर. संडे योग स्कूल के बच्चों ने कार्ड बनाने का कार्य शुरू कर दिया है, लिफाफे भी बनाने हैं. पत्रिका के लिए कल उन्हें प्रेस जाना है, किताब के लिए जून ने लिख दिया है. वह आजकल कैथरीन फ्रैंक द्वारा लिखी इंदिरा गाँधी की कहानी पढ़ रही है. बनारस पर जो लेख लिखा था, वह आंटी को पढ़ने के लिए दिया था, सम्भवतः अभी उन्होंने पढ़ा नहीं है. लिखने का बहुत सा कम पड़ा है, गीतांजलि पर आधारित जो छोटे-छोटे पद लिखे थे, उन्हें भी टाइप करना है. ऐसा लगता है जैसे कुछ छूटा जा रहा है, लेकिन वह क्या है, उस पर ऊँगली रखना कठिन है. भीतर एक बेचैनी सी है, मगर इतनी तीव्र भी नहीं बस मीठी-मीठी आंच सी बेचैनी. ईश्वर ने उसे इतनी शक्ति दी है, इतना ज्ञान, इतना प्रेम और इतना समय दिया है, उसका लाभ इस जग को नहीं मिल रहा है, वह तो सौ प्रतिशत लाभ में ही है हर पल !

दोपहर के सवा दो बजे हैं, अप्रैल माह की तपती हुई दोपहरी है, सूरज जैसे आग फेंक रहा है. अभी थोड़ी देर पहले वह प्रेस से आई है, क्लब की वाइस प्रेसिडेंट और एडिटर के साथ गयी थी. उसने वाराणसी वाला लेख छपने के लिए दिया है. आज उठने में दस मिनट देर हुई पर सुबह के वक्त इतना समय भी कीमती होता है. आज उसने कई दिन बाद क्रोध का अभिनय किया, नैनी की बेटी को डांटा कि वह अपना स्कूटर जून के गैरेज के आगे न धोये, बाद में कोई उसे भीतर से डांटता रहा, वह कौन है भीतर जो उससे कोई गलती हो जाये तो चुप नहीं रहता. कल नन्हे का फोन खो जाने की खबर आई तो जून बिलकुल चुप थे, उसे कुछ भी महसूस नहीं हुआ, न दुःख न अफ़सोस..जैसे कुछ हुआ ही नहीं. वह धीरे-धीरे आत्मा में स्थित होने का प्रयास दृढ़ करती जा रही है. छह वर्ष पहले जो यात्रा शुरू की थी वह अब काफी आगे आ चुकी है, लेकिन यह यात्रा जीवन भर बल्कि जन्मों तक चलने वाली है, इसकी मंजिल भी यही है और मार्ग भी यही है. आज जून ने भी तो थोड़ा गुस्सा किया, वह ड्रेसिंग टेबल देखने गये थे पर अभी भी उसमें कमी थी. वे यह जानते ही नहीं कि ऐसा करके वे अपने को कर्मों के बंधन में फंसा लेते हैं.

धर्म को यदि धारण नहीं किया तो व्यर्थ है, नहीं तो उनकी हालत भी दुर्योधन की तरह हो जाएगी जो कहता है, वह धर्म जानता है पर उसकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म जानता है पर उससे निवृत्ति नहीं होती. उसे कृष्ण के भजन भाते हैं, उसकी सूरत भी, पर उसके कहे अनुसार चलना तो अभी नहीं आता. आज सद्गुरु को सुना, वह उनसे कितनी उम्मीदें लगाये हुए हैं, वह तो उन्हें अपने जैसा ही मानते हैं, कितने भोले हैं वह, सब समझते हुए भी उनका मान बढ़ाने के लिये जो गुण उनमें नहीं हैं वे भी बताते हैं, तब वे लज्जा से झुक जाते हैं. सद्गुरु की महानता की तो कोई सीमा ही नहीं है, वह कहते हैं कि थोड़ा सा विकार यदि रह गया हो तो उससे मत लड़ो, रहने दो, उन्हें पता ही नहीं यहाँ तो विकार का ढेर लगा है, अहंकार तो इतना ज्यादा है कि..आज भी गर्मी काफी है. अभी डेढ़ बजे हैं, संगीत का अभ्यास तो उसने कई महीनों से छोड़ दिया है, लिखने-पढ़ने का कार्य ही काफी है. आज सत्संग में भी जाना है. वहाँ पढ़ने के लिए आज से अपनी कविता की जगह गुरूजी का कोई ज्ञान सूत्र ही लेकर जाएगी. किताब का काम दस मई के बाद होगा, तब तक भूमिका का प्रबंध भी हो जायेगा. नन्हा दो रातों तक अपने मित्र के साथ अस्पताल में रहा, उसमें सेवा की भावना है, अच्छी बात है. उसका पुराना मोबाइल काम करने लगा है.    


  

Tuesday, September 8, 2015

गोहाटी का आश्रम


आज कृष्ण जन्माष्टमी है, भगवान कृष्ण के इस धरा पर प्रादुर्भाव का दिन ! उसने मन ही मन प्रार्थना की, कृष्ण की कृपा से उसके भीतर से प्रेम की किरणें फूटें, शांति और आनंद की वर्षा हो तथा उसका जीवन परहित के लिए हो. स्वार्थ जब रहेगा ही नहीं तो उसके लिए कोई प्रयास भी नहीं होगा. उसके छोटे-छोटे से कार्य भी परमात्मा की प्रसन्नता के लिए ही हों ! कल सत्संग में जाना है, उसने कृष्ण पर एक कविता लिखी है, लेकिन शायद ही पढ़े, क्योंकि भाव इतने प्रबल नहीं है उसमें. भावनाएं यदि पवित्र हों तो कविता स्वयं ही झरती है भीतर से, वह सहज होती है, उन्मुक्त होती है, उसमें कोई नियम नहीं होता..पर इसमें उसने कुछ शब्दों को बिठाया है. कृष्ण के प्रति उसका प्रेम आजकल शांत प्रेम में परिवर्तित हो गया है, उसमें उद्दात वेग नहीं है. कृष्ण उसे स्वयं से अलग नहीं लगते, भीतर एक अखंड शांति का अनुभव होता है. ध्यान में भीतर कण-कण में ऊर्जा का अनुभव होता है, इससे आगे जाने का रास्ता उसे नहीं मिल रहा है, शायद इसमें सबसे बड़ी रुकावट उसका स्वयं का मन ही बना हुआ है. इस मन को पूर्णतया समर्पित हो जाना होगा. उसने ईश्वर से अहंकार को चूर-चूर कर देने की प्रार्थना की.

आज मौसम में कुछ परिवर्तन हुआ है. कल रात को वर्षा हुई थी. अभी-अभी जून का फोन आया, उन्हें अगले हफ्ते कोलकाता जाना है. उसके लिये सूटकेस चाहिए था जिसमें दफ्तर से कुछ उपकरण ले जाने हैं. उसे उनका कोई भी काम करने में बहुत ख़ुशी होती है. कल शाम सत्संग के बाद मीटिंग थी, वहाँ से आने में देर हो गयी, जून घर में प्रतीक्षा कर रहे थे, उन्हें अच्छा नहीं लगा. मीटिंग में काफी बातें हुईं, एक कमेटी का निर्माण किया गया जिसमें उसका नाम भी है. उन्हें एओएल का काम आगे बढ़ाना है. प्रचार करना है, सद्गुरु के संदेश को सभी को सुनाना है. उन्हें कुछ ठोस कदम उठाने हैं जिसे यहाँ आर्ट ऑफ़ लिविंग की उपस्थिति स्पष्ट नजर आये. उन सभी के अंदर सेवा की भावना है पर उसे सही मौका चाहिए. गोहाटी में जो आश्रम बनने वाला है, उसके लिए धन भी एकत्र करना है. उसकी भाषा अत्यंत ही कठोर है तथा व्यर्थ के शब्द भी बहुत बोलती है. समाज में काम करते हुए उसे नम्र होना होगा तथा मितभाषी भी. आजकल घर में तो वह कम बोलती है. जरूरत से ज्यादा एक शब्द भी नहीं. सासु माँ को भी चुप रहकर अपनी ऊर्जा बचाने का अभ्यास हो रहा है. शाम को क्लब में गोलमाल है, ऊंटपटांग कहानी वाली हास्य फिल्म, वे जायेंगे और एकाध घंटा देख कर लौट आएंगे.

अधिकांश आकाश छूट जाता है
थोड़ी सी भूमि गुनगुनाता हूँ !

पता नहीं किसकी पंक्तियाँ हैं, वे उस आत्मा को जो आकाश सी व्यापक है कैद करना चाहते हैं पर वह पकड़ में नहीं आती. मन, बुद्धि से परे वह आत्मा सदा दूर ही रहती है, फिर हार कर जब मन का आश्रय छोड़ देते हैं तो भीतर से कोई गीत गाने लगता है, संगीत फूटने लगता है. ध्यान की दुनिया में कुछ भी थोड़ा सा नहीं, सब कुछ अनंत है..यह भान होते ही छोटापन खत्म हो जाता है. आत्मा का यह ज्ञान अद्भुत है. अभी वे नये-नये आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश कर तरहे हैं, कच्चे घड़े हैं, परिपक्व होने के लिए जगत में प्रवेश आवश्यक है, तभी उनकी परीक्षा होगी, राग-द्वेष से कितना मुक्त हुए यह जाना जायेगा.


आज शनिवार है, जून और नन्हा बैंगलोर में एक साथ हैं, सम्भवतः शाम को वे आश्रम  जायेंगे. आज सुबह से वर्षा हो रही है, मौसम में परिवर्तन होने से पक्षी भी प्रसन्न हैं ! अभी-अभी उसे ऐसा लगा कि एक सखी से बात करे पर फोन उठाने पर पता चला कि वह व्यस्त है, वह थोड़ी परेशान लगी आवाज से, हर घर में कुछ न कुछ तो घटित होता ही रहता है, पर उसका स्वयं का मन व्यर्थ ही चंचल हो उठा है. एक दूसरी सखी ने कुछ देर पहले फोन किया, इधर-उधर की बातें, यह जीवन है ही क्या ? ज्ञान होने से पूर्व वे उसे इधर-उधर की बातों में गंवा देते हैं और ज्ञान होने के बाद लगता है भौतिक और आध्यात्मिक में कोई भेद है ही नहीं, सब एक ही सत्ता से उत्पन्न हुए हैं. आज माँ ने सिन्धी कढ़ी बनाई है, अभी वह सिलाई करने बैठी हैं, इस उम्र में भी सूई में धागा डाल लेती हैं, उनके भीतर ईश्वर के प्रति सहज विश्वास है. सुबह सद्गुरु को सुना, वह कह रहे थे एक राह पकड़ो और उसी पर आगे चले चलो. उसे भी ध्यान की किसी एक विधि को पकड़ कर उसी को आगे ले जाना है. भीतर गहरी नीरवता है, कैसा अद्भुत सन्नाटा है ! भीतर का मौन कितना कितना मधुर है. जो भी भीतर घटता है वह शब्दों से परे है. यह जगत भी तभी सुंदर लगता है जब अंतर सुंदर हो ! जब तक कोई आत्मा के सौन्दर्य को नहीं जान लेता तब तक प्रेम को भी नहीं पहचान पाता. प्रेम का अनुभव किये बिना ही उसे इस जगत से जाना पड़ता है, वह प्यासा ही रह जाता है, जगत से सुरक्षा पाने की इच्छा उसे दूसरों का गुलाम बना देती है.     

Monday, September 7, 2015

गुजरात की बाढ़


सहनशीलता, धैर्य, मनोबल, संकल्प बल तथा दृढ़ इच्छा शक्ति जिसके पास हो वही अध्यात्म के पथ पर चल सकता है. मौत का भी डर जब मन में न रहे, कोई भी कष्ट आए, सम रहकर उसे सहना, यह जब तक जीवन में न हो तब तक कोई जीवन से दूर ही रह जाता है. आजकल उसके मन की दशा कुछ ऐसी ही है. सत्य का सामना करने की हिम्मत वह अपने भीतर नहीं जुटा पायी. यात्रा पर जाने से पहले एक सखी ने उसे एक खत पोस्ट करने को दिया था, वह भूल गयी और यात्रा के अंत में उसे पोस्ट किया, पर जब उसने पूछा तो यह नहीं बताया कि पोस्ट करने में देरी हो गयी थी. उसे बुरा लगेगा यही सोचकर नहीं बताया पर अब लगता है कि वह उसके बारे में अपनी राय को बदल देगी इस डर से. पर यह सच है कि झूठ के पाँव नहीं होते. एक बोझ जो उसने व्यर्थ ही चढ़ाया है. नीरू माँ के अनुसार उसे प्रतिक्रमण करना होगा और इस बोझ को सिर से उतार फेंकना होगा. अपने आस-पास की दुनिया की वास्तविकता को भी उसने नहीं देखा. गुजरात में बाढ़ आई है, बड़ी ननद से उसने बात भी नहीं की. वह आत्मकेंद्रित होती जा रही थी, जिस क्षण यह भास हुआ उसी क्षण से स्थिति बदल गयी है. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, गुजरात में बाढ़ आई है, वहाँ किसी ने एक बार कहा तो उसे इसकी गम्भीरता का अंदाजा ही नहीं था. आज सुबह छोटी ननद, दीदी व बड़े भाई से बात हुई. दो सखियों से बात हुई, एक ने कृष्ण के १०८ नामों के बारे में पूछा तथा दूसरी ने गुरूजी द्वारा कही यह बात बताई कि १५ अगस्त तक का समय भारी है, उन सभी को ध्यान द्वारा इसे टालने का इसकी भयानकता को कम करने का कार्य करना चाहिए. वह ईश्वर को केवल अपने भीतर ही पाना चाहती थी पर वह तो कण-कण में बिखरा है, वह तो हर एक जड़-चेतन में है, वही तो माँ के प्यार में है और वही प्रिय के प्रेम में, वही वात्सल्य में है. ईश्वर कहाँ नहीं है, बाढ़ के पानी में फंसे लोगों में भी वही है और बाढ़ के पानी में भी वही है. उसका कण-कण इस सृष्टि के कल्याण की कामना करता है.

अभी-अभी बिजली थी, अभी-अभी चली गयी. ऐसे ही एक दिन अभी-अभी जीवन होगा, अभी-अभी नहीं होगा. एक पल में मृत्यु उन्हें अपना ग्रास बना लेगी अथवा तो एक पल में वे शरीर के बंधन से मुक्त हो जायेंगे. पीछे की खिड़की से हवा का एक शीतल झोंका पीठ को सहला गया, पंखा चलते रहने पर इसका आभास भी नहीं हो पाता, ऐसे ही जीवन के न रहने पर आत्मा तो अपने आप में रहेगी ही, परमात्मा के प्रकाश से परिपूर्ण ! कल एक पुस्तक पढ़ी, ध्यान के विभिन्न गुर बताये हैं उसमें, विपश्यना ध्यान के, जिसमें केवल बाहर जाती हुई साँस को देखना है. एक नये नजरिये से लिखी गई पुस्तक है. आज मौसम गर्म है, उसकी आँखें मुंद रही हैं, तमस का प्रभाव है.

भाव की संवेदना बहुत दूर तक जाती है, जहाँ मन नहीं पहुंचता, बुद्धि नहीं पहुंचती वहाँ भाव के सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं. ध्यान का दर्शन केवल मन को स्थिर करना ही नहीं बल्कि भाव शुद्धि है. अभी कुछ देर पूर्व उससे जन्माष्टमी का दिन जब एक बार पुनः पूछा सासु माँ ने तो उसका जवाब शांत भाव दिया गया नहीं था. छोटी ननद का फोन आया. पिता जी की तबियत ठीक नहीं है, उसने कहा, वह अपना ध्यान भी नहीं रखते. वह कह रही थी कि दोनों को साथ-साथ रहना चाहिये. देखें  भविष्य में क्या लिखा है. इतना तो सही है कि वृद्धावस्था में भी पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ तो चाहिये ही.  

कल रात तेज वर्षा हुई, आँधी-तूफान भी. मेघ अपने पूरे बल के साथ गरजते रहे. एक-दूसरे से टकराते रहे, रह-रह कर बिजली चमकती रही. वह सब कुछ अनुभव कर रही थी पर इन सबसे परे भी थी. उसके मन में तब आत्मा का गीत गूँज रहा था. मन जैसे यहाँ का न होकर किसी और लोक का था. वह निद्रा थी या तंद्रा थी या शुद्ध ज्ञान का नशा था, पर बिजली जाने से जो कमरे में गर्मी हो गयी थी, उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था. जून का आज जन्मदिन है, कल उसने उनके लिए एक कविता लिखी. आजकल वह बहुत खुश रहते हैं. उन्हें भी उस प्रेम का अनुभव हो रहा है, जिसकी बात वह उनसे करती थी. अभेद प्रेम का जहाँ दो न रहें एक हो जाएँ, वहाँ कोई अहंकार नहीं बचता और तभी शुद्ध साहचर्य का अनुभव होता है, पर प्रेम की यह धारा इतनी संकीर्ण तो नहीं होनी चाहिए, यह तो सभी की ओर अबाध गति से बहनी चाहिये. उसके मन की यह धारा यूँ तो सभी ओर बहती है पर एक तरफ जाकर थोड़ी अवरुद्ध हो जाती है. एक सखी के प्रति उसके मन में एक द्वंद्व बना ही रहता है. उसने प्रार्थना की, सद्गुरु ही उसे इस धर्म संकट से बचा सकते हैं. पर सद्गुरु तो यही कह रहे हैं, जो बाधा उसने स्वयं खड़ी की है उसे कोई दूसरा चाहकर भी नहीं दूर कर सकता, ईश्वर भी नहीं. वह उसकी आजादी में व्यवधान डालना नहीं चाहता. जिस दिन उसे स्वयं अहसास होगा कि इस द्वंद्व के चलते उसकी ऊर्जा का अपव्यय हो रहा है उस दिन स्वयं ही यह छूट जायेगा, उससे पहले नहीं और उसके बाद भी नहीं. आग में हाथ पड़ जाये तो स्वयं ही निकालने की सुध जगती है. 

Tuesday, August 4, 2015

कान्हा संग होली


पिछले दिनों घर में काम चलता रहा और होली की तैयारी भी, कल ‘होली’ भी होली ! होली के लिए जो हास्य कविता लिखी उसके अतिरिक्त कुछ नहीं लिखा पिछले दिनों, पढ़ा भी नहीं. बस कानों में प्रभु का नाम अवश्य पड़ने दिया. कृष्ण के प्रेमावतार, रसावतार की चर्चा कल होली उत्सव में सुनी तो हृदय द्रवित होकर बहने लगा. यह कमरा अब बहुत साफ-सुथरा लग रहा है, धुले हुए पर्दे, दीवारों पर नया-नया डिस्टेम्पर तथा फर्श पर पॉलिश. परसों उन्हें यात्रा पर निकलना है. उसे विश्वास है बैंगलोर प्रवास के दौरान गुरूजी से भेंट होगी. उसके जीवन की यह पहली यात्रा है जब वह किसी आश्रम में कुछ समय व्यतीत करने के उद्देश्य से जा रही है. उसका मन गहन शांति का अनुभव कर रहा है, हृदय प्रेम और श्रद्धा से भरा है. आज शाम को साप्ताहिक सत्संग में जाना है. आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की एक महिला टीचर से बात की, जो उम्र में उससे छोटी है. बात करते ही लगा वह कितनी स्थिरमना है. वह सद्गुरु के निकट रह चुकी है, कितनी साधना उसने की है, वह परिपक्व है. उसने सोचा क्लब की मीटिंग में उसे बुलाएगी, वह अन्य महिलाओं को कोर्स करने के लिए प्रेरित कर सकती है. सेवा के इस कार्य में वह उसकी सहायता करेगी.

आज उन्हें यात्रा पर जाना है. उसके अंतर की इच्छा ने ही फल का रूप लिया है अब इससे जुड़े सारे सुख-दुःख की निर्मात्री वह स्वयं है. सारे दुखों का कारण व्यक्ति स्वयं होता है यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाये उतना ही अच्छा है, अध्यात्म का साधक स्वयं की जिम्मेदारी स्वयं उठाना जानता है. मन को असंग रखकर यदि द्रष्टा भाव से जीये तो बिना किसी बाधा के यात्रा फलीभूत होगी. यात्रा से कोई फल मिले ऐसी भी आशा नहीं है, बस कृतज्ञता स्वरूप की जा रही है यह यात्रा, सद्गुरु के प्रति कृतज्ञता और उस परमात्मा के प्रति कृतज्ञता जो कण-कण में व्याप्त है !


उन्हें यात्रा से आये कई दिन हो गये हैं, उन दिनों मन एक अद्भुत लोक में ही जैसे विचरण करता था. इस समय दोपहर के सवा दो बजने को हैं. उसने अभी-अभी योग निद्रा का अनुभव लिया. कैसे अद्भुत दृश्य और ध्वनियाँ, वह स्वप्न था अथवा.. सुबह ध्यान किया गुरूजी के नये सीडी के साथ. कभी-कभी लगता है कि मंजिल अभी भी उतनी ही दूर है, यह मार्ग बहुत कठिन है फिर उनका हँसता हुआ चेहरा याद आता है. उनकी कृपा अवश्य उसपर है, किसी भी कीमत पर उसे अपने को उस कृपा के योग्य बनाना है. उसे कल्पनाओं की दुनिया से निकलकर ठोस धरातल पर आना है. जीवन को उसकी पूर्णता में जीना है. जीवन केवल बाहर ही नहीं भीतर भी है और जीवन केवल भीतर ही नहीं बाहर भी है, दोनों का समन्वय करना होगा. सत्संग में पढ़ने के लिए एक कविता लिखनी है. दीदी के मेल का जवाब भी लिखना है. सद्गुरु को उस डायरी में पत्र लिखना है और इतवार को एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है उसके लिए कविता लिखनी है. लेडीज क्लब के लिए एक लेख लिखना है, लिखने का इतना कार्य सम्मुख हो तो कैसा प्रमाद. ध्यान के समय किसी की उपस्थिति का अनुभव श्वासों के रूप में होता है, यह भी एक रहस्य है, कौन है जो उसके दाहिने कान के पास आकर गहरी सांसे भरता है मगर प्रेम से !

Thursday, July 23, 2015

शेफाली के फूल


अक्टूबर का प्रथम दिन, शरद ऋतू का आरम्भ ! पूजा और शेफाली की बहार का मौसम ! सभी से बात की, भीतर प्रेम भरा हो तो सारा जगत ही प्रेममय लगता है. कितना सच कहते हैं शास्त्र और संतजन. भीतर ही प्रेम का खजाना है उसकी चाबी हाथ आ जाये तो जीवन धन्य हो जाता है. उस चाबी का पता तो सद्गुरु बताते हैं पर उसे खोजने की इच्छा मन में जगे ऐसी परिस्थितियाँ ईश्वर उत्पन्न  करते हैं. उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए ज्ञान को धारण करना होगा. ईश्वर उसे दोषों से बचाना चाहते हैं. इसलिये वे उसमें उन दोषों को दिखाते हैं जो वह अन्यों में देखती है. जिनके खुद के घर शीशे के हैं वे दूसरों पर पत्थर कैसे फेंक सकते हैं.
पिछले चार दिन दशहरे तथा दुर्गा पूजा के उत्सव के अवकाश के थे. जून की छुट्टी थी और दिन भर घर-गृहस्थी के कार्यों में समय का पता ही नहीं चला, कैसे बीत गया. छुट्टी होने के बावजूद भी जून  कुछ देर के लिए ऑफिस गये, उनको भी अब खाली बैठना जरा नहीं सुहाता. वृत्ति तम से रज में आ गयी है, कभी-कभी सत् में भी टिकती है. उनकी यात्रा सुचारुरूप से चल रही है ! उन्होंने दीवाली के लिए घर की सफाई शुरू की है, काफी कुछ हो गया है अभी काफी कुछ शेष है.
कल की वर्षा के बाद आज धूप निकली है. कल नन्हे को गणित पढ़ने के लिए कहा पर उसे ज्यादा अच्छा नहीं लगा. उन्हें कोई दूसरा टोके कुछ करने को कहे, अच्छा नहीं लगता. अपनी मर्जी से वह काम सहर्ष ही करते हैं. अपनी आजादी पर जरा सा भी अंकुश किसी को पसंद नहीं है. उसका मोह ही उससे यह कहलवाता है. प्रेम में तो जो जैसा है वैसा ही स्वीकारना होता है. नन्हे बच्चों को पढ़ाई के लिए कहना ठीक है पर व्यस्क को यदि स्वयं ही समझ नहीं होगी तो कहने से भी नहीं आएगी. अतः कुछ कहना भी हो तो सहज भाव से कहना होगा कोई पूर्वाग्रह रखकर नहीं !
पूजा के अवकाश के बाद उसे कमजोरी तथा कुछ अन्य लक्षण शुरू हो गये, मन उसी में उलझा रहा. अचानक उसे हाथों-पैरों में कमजोरी का अनुभव होने लगा है तो लगता है जैसे जीवन हाथ से फिसला जा रहा है. जीवन का अंत मृत्यु ही है. मृत्यु उन्हें कितनी तरह से तैयार करती है स्वयं से मिलने के लिए. पहले-पहल जो धक्का लगता है कोई बुरी खबर को पाकर, वह समय निकल गया है, मन अब स्थिर हो रहा है. वास्तविकता को स्वीकार कर रहा है और उससे बहुत कुछ सीख भी रहा है. देह नियन्त्रण में नहीं है यह सबसे पहली बात है. प्रतिपल सजग रहकर कोई मन को निराश होने से बचा सकता है, ईश्वर पर अटूट विश्वास रखकर वह सारे दुखों को हंसते-हंसते सह सकता है, लेकिन प्रारब्ध को नहीं बदल सकता. जब साधन भी भक्ति हो, साध्य भी भक्ति हो तो शारीरिक दुःख-पीड़ा का क्या महत्व रह जाता है ?

जब कोई अस्वस्थ होता है तो लगता है कि पुनः स्वस्थ होगा भी या नहीं, सामान्यत उसे ऐसा नहीं लगता था पर पिछले कुछ दिनों से तन में जो परिवर्तन दिखाई पड़ रहे थे, उसके कारण लगा शायद अब कुछ समय तक ऐसा ही चलने वाला है. विटामिन तथा कल्शियम लिया. जून खाने-पीने का बहुत ध्यान रखने लगे हैं, पहले सी दुर्बलता अब नहीं लग रही है. कल शाम पहली बार इस्कॉन के सत्संग में गयी थी. कीर्तन में मन कहीं खो गया. कृष्ण के नाम का उच्चारण होठों से होता हो, कान उसे सुनते हों, हाथ ताली बजाते हों, मन उसके रूप को देखता हो, नाक उसके सम्मुख रखे फूलों और अगर की सुगंध को सूँघती हो तो अश्रु कहाँ रुक पाएंगे. बहुत अच्छी तरह से दो सदस्यों ने प्रभुपाद द्वारा लिखी भगवद गीता को पढ़ा तथा उस पर चर्चा की. शाम के तीन घंटे कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. आज शरद पूर्णिमा है, वे ‘मून लाइट मेडिटेशन’ करने वाले हैं. चावल की खीर भी पकाई है. आज गुरुजी को समर्पित उसकी किताब का उन्होंने कम्प्यूटर प्रिंट भी लिया है.    

Thursday, June 18, 2015

श्याम सुंदर का आगमन


आज कृष्ण जन्माष्टमी है, उन्होंने फलाहार लेने का व्रत किया है. मौसम भीगा-भीगा है जैसे उस दिन जब हजारों वर्ष पूर्व कृष्ण ने मथुरा की जेल में जन्म लिया था. कृष्ण उनकी आत्मा हैं, जगत में रहते हुए यदि उनका स्मरण बना रहे तो ही कोई अपने स्वरूप में स्थित रह सकता है. कृष्ण का अवतरण जब-जब भीतर होता है, तब-तब कोई अपने में स्थित होता है, अन्यथा स्वरूप से हट जाता है. कितने नाम हैं कृष्ण के, श्यामसुन्दर का अर्थ उसने सुना, श्याम हो गयी आत्मा को जो सुंदर बना दे वही है श्यामसुंदर ! गोपियों ने कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण किया था पर राधा ने स्वयं को मिटा ही दिया. स्वयं को मिटाकर वह कृष्ण रूप ही हो गयी. जब वह कृष्ण से अलग रही ही नहीं तो कैसा विरह, कैसी पीड़ा. विसर्जन करना बहुत कठिन है, अहम् का विसर्जन, शक्ति, समय, सेवा का विसर्जन, प्रिय के साथ एकाकार हो जाना. भक्त भगवान को स्वयं से अलग मानकर उसकी पूजा करता है, वह अपनी निजता को बचाए रखता है पर ज्ञानी भक्त स्वयं को मिटा देता है, वह स्वयं को उनसे अलग कैसे मान सकता है. किन्तु सेवा की यह भावना किसी बिरले को ही प्राप्त होती है. जन्मों के संस्कार अहंकार से मुक्त होने नहीं देते. कर्म का बंधन काटना उनका कर्त्तव्य है, मुक्तामा ही भक्ति कर सकता है. उसने प्रार्थना की, मनसा, वाचा, कर्मणा ऐसा कुछ भी न करे जो किसी को दुःख दे, ईश्वर उसे सुबुद्धि दे. एक न एक दिन लक्ष्य मिलेगा, अहम् का विसर्जन होगा और वह परम प्रिय परमात्मा के प्रेम की भागी बनेगी. ज्ञान के साथ जीना यदि आ जाये तो संसार में दुःख का नाम भी नहीं दीखता, वही संसार जो पहले अशांति का कारण बन जाता था उसकी जगह एक सुंदर संसार ने ले ली है !
अभी कुछ देर पहले उसे कान्हा की झलक मिली, कितना सुंदर रूप था उसका, ऐसा रूप क्या उसका मन बना सकता है, विश्वास नहीं होता, वह परब्रह्म परमात्मा ही कृष्ण बनकर उसकी बंद आँखों के सामने प्रकट होने आया था. उनके मध्य माया का पर्दा थोड़ा झीना हुआ है, पर्दे के पार से वह कितना मोहक है तो जब सम्मुख आएगा तो हालत क्या होगी. प्रकृति पहले उन्हें तैयार करती है फिर अपने रहस्य खोलती है. उसका मन अभी तक पूर्ण शुद्ध नहीं हुआ है, तभी एक झलक दिखाकर कृष्ण लुप्त हो जाते हैं. शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि, शुद्ध आत्मा तीनों एक ही बात है. ईश्वर की निकटता का अहसास ही जब इतना मधुर है तो स्वयं ईश्वर कैसा होगा. संतजन इसलिए उसकी महिमा का बखान करते नहीं थकते. सद्गुरु की कृपा भी अनंत है जो अनंत का दर्शन करा देती है. सारा ज्ञान भीतर ही है, कहीं-कहीं वह प्रकट होता है, वे संतजन होते हैं जिनके भीतर का ज्ञान प्रकट होने लगता है.

तन की पीड़ा की झलक अब भी विचलित करती है मन, बुद्धि को, अभी देहात्म बुद्धि का क्षरण नहीं हुआ. क्षण दो क्षण को ही सही पर झुंझला जाता है मन अब भी, अर्थात मन का निग्रह अभी नही हुआ, पर भीतर जाते ही कैसा आनंद मिलता है और तब सब कुछ विस्मृत हो जाता है. सद्गुरु के ज्ञान का आश्रय लेकर स्वयं को समझाने में सफल भी हो जाती है वह. वाणी में कोमलता नहीं तो भक्ति अभी अधूरी है, कभी-कभी न चाहते हुए भी बोलना पड़ता है, तब भी भीतर का प्रेम जाना तो नहीं चाहिए, प्रेम तो सभी से बड़ा है न, प्रेम तो ईश्वर है न, ईश्वर किसी से बात करेगा तो प्रेमपूर्वक ही करेगा, चाहे वह पुण्यात्मा हो या पापी, और फिर वह तो उनके चरणों की धूल के बराबर भी नहीं, तो उसे अपनी वाणी पर प्रतिक्षण नजर रखनी होगी. कठोर बात न निकले, कहने का ढंग भी अप्रिय न हो, साधक यदि सचेत नहीं रहेगा तो पीछे चला जायेगा.        

Tuesday, June 2, 2015

उत्तर काण्ड


कल की तरह आज भी मौसम गर्म है, वर्षा जो उन्हें शीतलता प्रदान करती थी पुनः आएगी और तब यह गर्मी नहीं रहेगी. द्वन्द्वों से भरा है यह जग, रात और दिन की तरह ये जीवन में आते रहते हैं लेकिन जो समर्पण का राज जानता है वह हर स्थिति में बिना शिकायत के रहना सीख जाता है. आज पहली बार उसने रामचरित मानस के ‘उत्तर कांड’ में संत कवि तुलसी दास की अद्भुत लेखनी का प्रभाव देखा. वे भक्ति और ज्ञान, सगुण और निर्गुण के प्रति सारे संशयों को खोलकर रख देते हैं. कवि के प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है. जीवन जीना एक कला है और जीवन में अनुशासन को कायम रखना भी. प्रकृति के सारे कार्य अपने निर्धारित समय पर होते हैं, एक पल के लिए भी वह नहीं चूकती, लेकिन मानव प्रमाद के कारण चूक जाता है. कल वे एक परिचित के यहाँ बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में गये थे. रात को देर से लौटे, सुबह उठने में देर हुई. कल सुबह ही उस सखी की सासु माँ से बात की, जिसके ससुर गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं. वह बहुत उदास थीं, उनके सब्र का बांध जैसे टूट गया है. उसे उनसे सहानुभूति है. आज सुबह-सुबह जून के मित्र ने उन्हें फोन करके आने को कहा तो उन्हें आशंका हुई, जो बाद में सही निकली. परसों रात्रि नींद में ही उनके पिता ने अंतिम श्वास ली. वे कई वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे. आंटी अभी तक यह सदमा सह नहीं पा रही हैं. वक्त ही सबसे बड़ा मरहम है, जैसे – जैसे समय बीतेगा उनका दुःख कम होगा. वह दोपहर बाद तक वहीं थी. शाम को भी वे गये. घर में सभी उदास थे पर मित्र को देखकर ऐसा नहीं लगता, वह भावनाएं व्यक्त नहीं करते.

प्रारब्ध कहें या हारमोंस की शरारत, आज ईश्वर के लिए अश्रुपात करने की जगह यूँ ही आंसू बहने को आतुर हैं. मन भर आया पहले और फिर मन मुरझा गया, पर उसे लगता है कि कोई कर्म कट गया जैसे, बाकी सब तो बहाने होते हैं निमित्त मात्र. कर्ता तो उनके भीतर है, भीतर कुछ घटता है तभी बाहर उसको सहयोग दिलाने के लिए घटनाएँ होती चली जाती हैं. उनके जीवन में जो कुछ भी घटित होता है उसके एकमात्र कारण वे स्वयं होते हैं. सुबह जून ने उत्साह पूर्वक कहा कि अमेरिका में उनके ममेरे भाई भी रहते हैं वहाँ उनसे भी मिलेंगे. उन्हें पूरा विश्वास हो चला है कि वर्ष के अंत में वह टूर पर अमेरिका जा रहे हैं. अभी तक कम्पनी से अप्रूवल नहीं मिला है.

जून बाहर गये हैं, अगले हफ्ते लौटेंगे. आज नन्हा सुबह नाश्ता नहीं कर पाया, बस में खायेगा, कल उसे और भी जल्दी उठाना होगा. दोपहर को स्टोर की सफाई करनी है. अभी उसने कृष्ण का सुमिरन किया तो उसने ऐसी मौन भरी मुस्कान का उपहार भेजा. उसका नाम भी एक बार प्रेम से पुकारो तो मन ठहर जाता है, जीवन तब बहुत सरल लगता है, सहज रूप से वे जी पाते हैं वरना तो मुखौटों से पीछा नहीं छूटता, पर प्रभु के सामने कोई मुखौटा नहीं चलता. उसकी एक सखी ने कहा, वह दुबली लग रही है, कहीं कोई रोग तो नहीं, उसे अच्छा नहीं लगा, फिर स्मरण हो आया उसे तो अच्छा या बुरा लगने की मनोदशा से ऊपर रहना है. सद्गुरु का स्मरण हो आया, उनकी आत्मा के साथ उसकी निकटता है जैसे कृष्ण के साथ. कान्हा तो स्वयं उसकी आत्मा है, तभी वह इतना अपना लगता है. उसकी आँखें देखना चाहे तो दर्पण में स्वय की आँखें देख लेती है वह और सद्गुरु एक ही हैं और वे तीनो फिर एक हो जाते हैं. इस एकता की अनुभूति में अनोखा आनंद है, शांति है, यहाँ कोई भेद नहीं रहता, यह सहना है उस अथाह प्रेम को जो भीतर उमड़ता है तो कचोट कर रख देता है...


Tuesday, May 26, 2015

फूलों का झरना


बच्चन जी की आत्मकथा पढ़ते-पढ़ते उसे विचित्र अनुभव हो रहा है, ऐसा लगता है जैसे उस वक्त वह भी कहीं निकट थी और सारे घटना चक्र को स्वयं देख रही थी. कभी-कभी आँखें भर आती हैं, कभी अंतर में एक कसक सी उठती है, कभी मन प्रेरित हो उठता है. उन्होंने बहुत कुछ सहा और भोगा हुआ यथार्थ ही अपनी कविताओं में उतारा. उनकी स्मरण शक्ति की भी दाद देनी पड़ेगी. एक-एक गली और रास्ता उन्हें आज तक( जब यह पुस्तक लिखी)याद है, काश वह उनसे कभी मिली होती. उनकी आत्मकथा वर्षों पहले पढ़ी थी, याद रही थी वह घटना जब ‘तेजी’ से वह मिले थे. बहुत दिनों से उसने कुछ लिखा नहीं है पर अब लगता है, और बच्चन जी की इस बात से भी, यदि साहित्यिक अभिरुचि है तो उस पौधे को सींचते रहना चाहिए अन्यथा वह सूख जायेगा. जीवन रसमय हो तो ही असली जीवन है, बच्चन जी को ईश्वर में आस्था तो अवश्य थी पर वह प्रेम और विश्वास नहीं था जो उसे मिला है, कान्हा का एकान्तिक प्रेम, यह अनुभव सबको नहीं होता...वह जब कुछ कहते हैं तो उसमें उनके अंतर की पूरी सच्चाई झलकती है. निस्वार्थ प्रेम किया उन्होंने पर अपने स्वाभिमान को को भी सदा ऊंचा रखा, वह भावुकता के शिकार भी हुए पर अपने मन का सदा विश्लेषण भी करते रहे. वह अनोखे लगते हैं, शायद सभी रचनाकार अपने आप में अनोखे होते हैं. हर एक के भीतर एक संसार होता है जिसमें वह जीते हैं, बाहरी दुनिया से उन्हें निभाना तो पड़ता है और निभाते भी हैं पर आधार उन्हें भीतर से ही मिलता है. कोई क्यों लिखता है, कहाँ से यह प्रथा शुरू हुई, कौन जानता है. इन्सान का मन कितना गहरा है, उसमें युगों-युगों की गाथाएं कैद हैं. एक लेखक के मन में न जाने कितनी अनलिखी कविताएँ, कहानियाँ हैं, जो वह यदि चाहे और परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाये तो कागज पर उतार सकता है. लेखक सृष्टा तो है ही !

आज संगीत की कक्षा थी, अध्यापक के जाने के बाद ‘महाभारत’ तथा ‘गीता’ का नित्य पाठ किया. अद्भुत है महाभारत भी, इतने सारे विषयों पर इतनी जानकारी, कुछ तो आज के युग के अनुसार अपनाई नहीं जा सकती पर कभी यह उनका स्वर्णिम अतीत था. भगवद् गीता के श्लोक कालातीत हैं, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने युगों पहले हो सकते थे या युगों बाद हो सकते हैं, कृष्ण जीने की कला सिखाते हैं. जीवन, मृत्यु तथा आत्मा के रहस्य बताते हैं. वास्तव में वे दोहरे स्तर पर जीते हैं एक है भौतिक जीवन जिसमें वे देह का व मन का धर्म निभाते हैं. तन स्वस्थ रखने के लिए उसे व्यायाम, भोजन आदि की पूर्ति और मन को प्रसन्न रखने के लिए मित्रों, आत्मीयों का साथ. दूसरा है आत्मिक स्तर जहाँ वे नितांत अकेले होते हैं. यदि किसी को आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है, बोध हो गया है तो वहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, पर उस बोध से पूर्व वहाँ बहुत भटकना पड़ता है. उन्हें पूर्णता की तलाश होती है पर वह न तन में मिलती है न मन में, वहाँ मात्र छलावा ही है. पूर्णता सिर्फ आत्मा में ही मिलती है और फिर कोई कामना नहीं रह जाती, कोई विषाद नहीं, अपना आप जैसे पूरे ब्रह्मांड को भी व्याप लेता है, दुनिया एक खेल लगती है, एक नाटक अथवा एक स्वप्न..यह पलायन नहीं है, यही वास्तविकता है. ध्यान से देखें तो जीवन का अर्थ क्या है ? क्या यह फूलों के खिलने और फिर मुरझा कर झर जाने जैसा नहीं है, पर मुरझाने से पूर्व वे खिलकर अपनी सारी खुशबू लुटाते हैं, जो उनके भीतर है. हर मानव के भीतर भी प्रेम की खुशबू है जिसे लुटाने के लिए ही उसे जीवन मिला है. तन और मन भी प्रेम की मांग करते हैं, आत्मा तो प्रेम ही है...एकान्तिक और अहैतुक प्रेम !

आज से नन्हे की परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं, आज गणित का पेपर है. कल दिन भर वह पढ़ाई में लगा रहा, ईश्वर उसके कर्म का फल अवश्य ही देगें. जून सिर में दर्द के कारण कल दिन भर थोड़ा सा परेशान थे. कल पूर्णिमा थी, उन्होंने फलाहार किया. आज सुबह वे स्वस्थ थे. बच्चन की आत्मकथा रोचक है. दो भाग वह पढ़ चुकी है. आज सुबह भी उसी की एक घटना उसने जून को बतायी, कल शाम टहलते समय भी यही चर्चा की. जून उसकी सारी बातें सुनते हैं चाहे उन्हें अच्छी लगें या नहीं, आजकल वे ऑफिस की चर्चा कम ही करते हैं. टीवी पर भागवद् कथा आ रही है, कान्हा की कथा अद्भुत है, कितनी ही बार सुनी फिर भी नई लगती है. उसका अंतर इन्हीं कथाओं को पढ़, सुनकर कृष्ण की ओर आकर्षित हुआ है, फिर क्रिया के बाद जब ध्यान लगा तो उसके विरह का अनुभव हुआ, फिर उनकी छवि कभी-कभी ध्यान में प्रकट होने लगी और अब तो जैसे मन विवश होकर उन्हीं का ध्यान करता है, उन्हीं का नाम होठों पर रहना चाहता है, मन जैसे संसार से कोई मोह नहीं रखना चाहता, कोई इच्छा नहीं और जब कोई इच्छा नहीं तो दुःख अथवा द्वेष भी नहीं, एक तृप्ति तथा संतोष का भाव लिए मन सदा एक रहस्यमय आनंद में डूबा रहता है, शायद इसी को भक्ति कहते हैं !  

Monday, May 25, 2015

परमहंस की कथा


आज सद्गुरु ने सरल शब्दों में ज्ञान योग पर चर्चा की. हृदय की सारी गाँठे जैसे खुलती जा रही हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की माया में जो मन उन्हें भटकाता है उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो रहा है. वह अलिप्त है, अकर्ता है, अभोक्ता है, अव्यक्त है, पूर्ण है, आनन्दमय है, ज्ञान से परिपूर्ण है. जैसे आकाश पर बादल आते और चले जाते हैं वैसे ही मन, बुद्धि आदि आत्मा कर चिदाकाश पर आने-जाने वाले बादलों के समान स्थित हैं, ज्ञान का सूर्य निकलता है तो स्वच्छ नीलिमा दिखाई पडती है !

‘साहित्य अमृत’ में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की अद्भुत कथा पढ़ने को मिली, अनोखे संत थे वह, पर बहुत प्यारे. हँस माने ऐसा पक्षी जो संसार से सार( दूध) को ग्रहण करे और असार (जल) को छोड़ दे. उन्हें भी जीवन में सार्थक क्षणों को अपनाना है. इस छोटे से जीवन में इतना समय किसके पास है कि सभी कुछ ग्रहण करता चले. मन जितना खाली रहे उतना ही अच्छा है. कुछ भी ऐसा न हो जिससे किसी को दुःख हो, कर्त्तव्य का पालन करते हुए शेष सारे समय का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगाना है. आवश्यकता और इच्छा में भेद को विवेक से समझना है. ज्ञान में जब तक स्थिति नहीं होगी, द्वन्द्वों से मुक्ति नहीं होगी.

आज टीवी पर रामायण का वास्तविक अर्थ सुना, सद्गुरु कह रहे थे, राम अर्थात आत्मा का जन्म किसी के भीतर तब होता है जब दशरथ अर्थात दस इन्द्रियों का मिलन कौशल्या यानि कुशलता से होता है. जीवन में मैत्री भाव और श्रद्धा होती है, जो सुमित्रा और कैकेयी हैं. मन या बुद्धि सीता है, जिसका हरण अहंकार रूपी रावण कर लेता है, तब हनुमान अर्थात श्वास की सहायता से अहंकार को पराजित कर मन को वापस लाते हैं. मन तथा आत्मा का मिलन होता है. इसी तरह महाभारत भी प्रतिपल हो रहा है. एक ओर लोभ आदि दुर्गुणों का प्रतीक दुर्योधन है तो दूसरी ओर सात्विकता का प्रतीक अर्जुन और आत्मा रूपी कृष्ण हैं. उन्हें प्रतिक्षण प्रेय अथवा श्रेय में से चुनना होता है, चयन ही भविष्य की नींव रखता है. आज अख़बार में पढ़ा कि मृत्यु कितनी सृजनात्मक है. जन्म होने की प्रक्रिया सदा एक सी है पर इन्सान कितने विभिन्न तरीकों से मरते हैं. हर व्यक्ति की मृत्यु किसी न किसी खास रोग अथवा कारण से होती है. अनगिनत रोग हैं और कितनी प्राकृतिक आपदाएं हैं. युद्ध, हिंसा, आतंक के शिकार भी होते हैं कुछ लोग और कुछ स्वयं ही अपनी मृत्यु का चुनाव करते हैं. जो जन्मा है वह मरेगा ही यह ध्रुव सत्य है पर जो मरा है वह पुनः जन्मेगा, यह तय नहीं है. वह मुक्त भी हो सकता है !

अभी कुछ देर पूर्व उसने बड़े भाई-भाभी से बात की, आज उनके विवाह की चौबीसवीं वर्षगाँठ है, फिर दीदी-जीजाजी से बात की, सभी ठीक हैं और सभी उसके प्रिय हैं उसी तरह जैसे इस जगत की हर शै उसे प्रिय है, क्योंकि वह सब कुछ उसके कान्हा का है. कृष्ण का नाम उसके कण-कण में एक सिहरन सी जगा देता है और आँखों में नमी, वह इतना असर डालता है कि कभी-कभी उसको याद करते डर लगता है कि किसी ने उसकी यह हालत देख ली तो..ईश्वर से प्यारा कुछ हो भी कैसे सकता है, एक उसी को जान लो तो सब कुछ अपने आप स्पष्ट होने लगता है. एक उसी को चाहो तो प्रकृति भी साथ देने लगती है. एक उसी का आश्रय ले मन, उसी को भजे तो संसार खो जाता है.

प्रातः वे समय से उठे, क्रिया आदि करके बड़ी को सुखाने के लिए रखा, कल दोपहर उन्होंने बनाई थी मेथी की बड़ी पर हमेशा की तरह वर्षा होने लगी, सो ओवन को गर्म करके उस पर रखा. नन्हे का आज फिजिक्स प्रैक्टिकल है. नैनी कल दिन भर नहीं आई थी, आज उसका काम ज्यादा हो गया है. उसे अभी पाठ करना है फिर ध्यान, समय का प्रतिबन्ध ‘ध्यान’ के लिए आवश्यक है ऐसा सद्गुरु ने बताया. जीवन में अनुशासन हो, नियम हो तो एक क्रमबद्धता आती है. मन में भी सुबह-सुबह पवित्र भाव उठते हैं, वैसे तो कृष्ण हर क्षण उसके साथ रहते हैं, वह जो भी है, जैसी भी है उनसे छिपा नहीं है पर वह उन जैसी होना चाहती है, जैसे वह गुणातीत हैं. सृष्टि के भीतर रहते हुए भी इससे अलग हैं. उनसा होने के लिए उनको जानना, उनको सुनना, उनसे प्रेम करना ही एकमात्र उपाय है. अध्यात्म ही अपने आप से मिलाता है !