Showing posts with label कहानी. Show all posts
Showing posts with label कहानी. Show all posts

Wednesday, May 6, 2020

बगिया में घोंघे



आज गाँधी जयंती है. कल रात सोने से पहले उनके बारे में कुछ बातें पढ़ीं, सुनीं.  उनके प्रशंसक भी बहुत हैं और विरोधी भी. उनका व्यक्तित्त्व अनोखा था. चट्टान से भी मजबूत हृदय था उनका ! नैनी ने ध्यान कक्ष में जून द्वारा भेजी उनकी मूर्ति को फूलों से सजा दिया है. दोपहर की योग कक्षा में  महिलाओं और बच्चों को भी सुंदर कहानियाँ व गीत सुनाये, सबने गाँधी जी के प्रिय भजन गाये. महिला क्लब की प्रेसीडेंट का फोन आया, कल दस बजे उसे उनके साथ  बालिका विद्यालय जाना है जहाँ किशोरावस्था की समस्याओं पर एक वर्कशॉप है, जिसमें एक महिला डॉक्टर उनका मार्गदर्शन करेंगी. जिसके बाद उसे कक्षा नौ की छात्राओं को योग सिखाना है.

कल स्कूल में कार्यक्रम अच्छा रहा, दो छात्राएं बाद में उससे मिलने आयीं, कहने लगीं कुछ साल पहले वे सन्डे योग क्लास में आया करती थीं. आज मृणाल ज्योति गयी, हिंदी कक्षा में एक बच्चे  की पेन्सिल बार-बार टूट जाती थी, वह लिख नहीं पा रहा था, उसने शिकायत की तो रुआंसा हो गया. इन बच्चों से सामान्य बच्चों की तरह व्यवहार नहीं किया जा सकता, उसे ज्यादा उदार रहना होगा, उनकी अपनी सीमाएं हैं, उसके बावजूद वे पढ़ने आ रहे हैं, सच्चे सिपाहियों की तरह वे डटे हैं. बाद में निदेशक ने कहा तीन दिसम्बर आने वाला है, उस सिलसिले में एक मीटिंग करनी होगी. स्कूल में ही थी, पिताजी का फोन आया, दीदी वहाँ आयी हुईं थीं. उन्हें असम आने का निमन्त्रण एक बार फिर दिया. आज स्टोर की सफाई हो रही है, कल पैंट्री की होगी, दीवाली में एक महीना तीन दिन शेष हैं, देखते-देखते ही बीत जायेंगे. एक सप्ताह यात्रा में ही निकल जायेगा. बगीचे में घोंघे बढ़ गए हैं, जगह-जगह मिट्टी के ढेर लगा दिए हैं. वनस्पति खाकर वे शरीर से मिट्टी निकालते हैं, उनकी प्रकृति भी कितनी विचित्र है. 

आज बैठक की सफाई का कार्य आरम्भ किया है. जून दफ्तर जाने से पूर्व सारे पर्दे उतार गए हैं । मौसम का हाल बताता है कि शनि और रविवार को वर्षा होगी, सो तब तक का इंतजार नहीं किया जा सकता. आज बहुत दिनों बाद असमिया सखी से बात हुई, वे लोग दिसंबर में पोती के अन्नप्राशन के लिए पश्चिम बंगाल आएंगे, वहीं से असम. उनसे मिलना हो सकता था पर दिसम्बर में जून बैंगलोर जाने का कार्यक्रम बना चुके हैं. आज सुबह बगीचे से चौलाई का ढेर सारा साग मिला, जो अपने आप ही उग आया है, गोबर की जो खाद क्यारी में डाली थी शायद उसमें बीज रहे होंगे. डायन्थस के फूलों की पौध लगा दी माली ने आज. दीवाली तक पौधे जड़ पकड़ लेंगे. घर में सिविल का काम होना है, झूले को रंग कराना है. आज दो ठेले गोबर और लिया, अभी कई गमलों और क्यारियों में डालना शेष है. यह अंतिम वर्ष है जब उन्हें बगीचा तैयार करना है, अगले वर्ष इस समय सम्भवतः वे कर्नाटक में होंगे. आज छोटी ननद के विवाह की वर्षगाँठ है कल दीदी के विवाह की, उनके लिए कविता लिखेगी आज दोपहर. विश्व विकलांग दिवस के लिए एक पोस्टर बनाना है इस वर्ष की थीम के अनुसार. हिंदी कहानी प्रतियोगिता  के विजेताओं का चयन भी कर लिया है. निर्णय पब्लिक लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन को सौंपना है. कल प्रेसीडेंट ने अपनी अनुपस्थिति में क्लब की जिम्मेदारी उसे सौंपी। वह इलाज के लिए बाहर जा रही हैं. अभी-अभी एक सखी ने कल शाम अपने घर में होने वाली पूजा में बुलाया है. 

Thursday, November 13, 2014

नाटक की रिहर्सल


आज उनके नाटक की ड्रेस रिहर्सल है, बाबाजी आ चुके हैं पर नैनी अपने जीवन की व्यथा सुना रही है. उसके पास कहानियों एक नहीं अनेक हैं, अपने लम्बे-चौड़े भूतपूर्व परिवार की कहानियाँ, उसके पति ने दूसरी शादी कर ली तो वह अपने तीन बच्चों को लेकर घर छोड़कर आ गयी, बर्तन मांजकर गुजारा करने लगी. यह कई साल पहले की बात है फिर उसके पति की दुखद मौत हुई. देवर-जेठ सभी समर्थ थे पर किसी ने सहारा नहीं दिया यहाँ तक कि जायज हक भी नहीं दिया. ननदें भी अचछे घरों में ब्याही हैं, उनके बच्चे भी पढ़लिख रहे हैं पर इसके बच्चे बिन पढ़े ही रह गये अब तो बेटियों की शादियाँ हो गयी हैं. बेटा भी काम तलाश रहा है, कभी मिल जाता है कभी नहीं मिलता. आज भी सर्दी ने उसे परेशान किया हुआ है, विश्वास पूर्ण हृदय ले ईश्वर से शक्ति के लिए प्रार्थना की ताकि आज और कल अपने कर्त्तव्य का पालन कर सके. इतना विश्वास तब तो नहीं होता जब वह स्वस्थ होती है. कबीरदास ने सच ही कहा है- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई.. जून आज सुबह समझा कर गये हैं कि वह अपना ख्याल रखे. वह उसका बेहद ख्याल रखते हैं, कल उसके साथ उन्होंने ‘संघर्ष’ फिल्म देखी. फिर वह क्लब गयी. मौसम आजकल ठीकठाक है, न बेहद वर्षा न बेहद गर्मी.

आज शनिवार है, शाम को नाटक है, स्वास्थ्य पूरी तरह तो नहीं सुधरा है पर शेष पात्रों को आभास तक नहीं हुआ सो स्पष्ट है कि आवाज और अभिनय पर पकड़ पूर्ववत् ही है. कल क्लब में तीन घंटे से भी ज्यादा वक्त लग गया, आज भी तीन-चार घंटे तो देने ही होंगे. जून और नन्हे को उसकी अनुपस्थिति का धीरे-धीरे अभ्यास हो रहा है. आज मौसम अच्छा है रात भर वर्षा होती रही. पहले-पहल नींद कुछ अस्त-व्यस्त सी रही पर बाद में आ गयी. काफी देर तक नाटक के संवाद बिन बुलाये मेहमान की तरह चक्कर लगते रहे. स्वप्न में वह घंटों नेपाल के राजा से बातें करती रही, उनके राज्य में विद्रोह करने वाले नेताओं, क्रांतिकारियों से भी मिली. जून ने कल पिता से बात की, उनके घर में नये मालिक आ गये हैं, अब वह उनका कहाँ रहा ?

आज गोयनकाजी ने महावीर स्वामी और गुरुनानक का उदहारण देते हुए विपासना का महत्व समझाया. महावीर ने कहा है, जो भीतर है वही बाहर है और जो बाहर है वही भीतर है. बाहर की सच्चाई को बुद्धि के स्तर पर समझा जा सकता है पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर ही समझना होगा. नानक ने कहा है, “थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई” भीतर की सच्चाई को देखने के लिए कुछ आरोपित नहीं करना है न ही कुछ करना है, जो अपने आप है वही हरि है !  कबीर ने भी इस प्रश्न के उत्तर में, कि हरि कैसा है ? कहा, जब जैसा तब वैसा रे...जिस क्षण हमारे अंतर की स्थिति जैसी होगी हरि उस क्षण वैसा ही होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखते  रहना ही विपासना है. यदि मन में विकार भी जगा है तो उसे देखना है कि उसके प्रति कैसी संवेदना जगी है. उस संवेदना के मूल का ज्ञान होने से वह स्वतः ही नष्ट हो जाती है और ऐसे धीरे-धीरे विकार जड़ से दूर होते हैं, दमन करने से जड़ भीतर ही रह जाती है और वह विकार पुनः-पुनः सर उठाते हैं. उसे यह सब सुनना अच्छा लगता है, लगता है  अपनी विचार शक्ति को जितना ऊंचा बनाएगी उतना ही जीवन उन्नत होगा. वह कहाँ है और क्या करती है यह उतना महत्व नहीं रखता जितना कि उसका मन कहाँ है और वह कैसी भावना से कर्म करती है, इसका महत्व है.



Friday, September 27, 2013

कश्मीरी शालें


कल सुबह एक छोटा सा झूठ बेवजह ही बोल दिया, चाहे कितना ही निर्दोष क्यों न हो, झूठ तो झूठ ही है. आत्मा पर एक दाग लगा ही जाता है. जाने कितने दाग लग चुके हैं चादर पर. दास कबीरा ने जतन से ओढ़ी थी चदरिया, पर उसने तो हर दिन उसे मैला ही किया है और साफ करने की आदत भी भूलती जा रही है. कल एक पुस्तक लायी है लेकिन पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ..... मन का बैर तो ढाई आखर पढ़ने से ही मिलेगा न, और वे ढाई आखर भी कभी धुंधला जाते हैं. आज नन्हे को असेम्बली में एक कहानी पढ़नी है और उम्मीद है कि वह अपनी स्पष्ट आवाज में पढ़ पायेगा. इस समय सुबह के दस बजे हैं, काम लगभग हो गया है, पर मन है कि टिक ही नहीं रहा है, इतनी सी देर में सिन्धवा जाकर ब्रज, सुमन, शिव और रुकमणी से भी मिल आया है.

आज भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी का जन्मदिन है, सुबह के समाचारों में इसका जिक्र होना चाहिए था. नन्हे को आज फिर असेम्बली में समाचार बोलने हैं स्कूल में. कल उसकी कहानी ठीक रही. सभी ने उसकी तारीफ़ की, उसे पुरस्कार भी मिल सकता है . बच्चों के भोलेपन पर रश्क आता है, उनकी निर्दोष बातें बड़ों के दुराव-छिपाव के आगे कितनी बड़ी लगती हैं. नन्हा अपनी कई बातों से कई बार कितना कुछ सिखा जाता है. आज नूना को हिंदी कक्षा में जाना है वापसी में प्रदर्शनी देखते हुए आएगी, कश्मीरी सामानों की प्रदर्शनी आई है. आजकल फोन से सबसे बात हो जाती है, उसके पत्र लिखने कम हो गये हैं. कल वह नई परिचिता आई थी, उसकी बातों से लगा कि वह अपने पति से पूरी तरह जुड़ नहीं पा रही है. वह अपना व्यक्तित्व बनाये रखना चाहती है, एक अलग पहचान, सिर्फ किसी की पत्नी बन कर जीना उसे मंजूर नहीं. पर सही मायनों में एक होने के लिए दोनों को अपना-अपना अहम् छोडकर एक-दूसरे के सुख-दुःख को स्वयं महसूस करना होगा.

दोपहर का वक्त है, दूर से एक पक्षी की आवाज निस्तब्धता को भंग कर रही है, अभी-अभी वह पिता की फरमाइश पर शाम के नाश्ते के लिए कस्टर्ड बनाकर आई है. जून दफ्तर से आते समय लाये थे, माँ-बाप जब वृद्ध हो जाते हैं तो बच्चे उनका बच्चों की तरह ख्याल रखते हैं. सही कहा है कवि ने child is the father of man. वे दोनों(माँ-पिता) सो रहे हैं, बस तीन दिन और रह गये  हैं उनके प्रवास के. वह पिता के लिए एक टोपी बना रही है. आज माली ने डायन्थस व फ्लौक्स के पौधे लगा दिए.



Saturday, April 20, 2013

मिस यूनिवर्स - सुष्मिता सेन


   

 आज न ही कोई खत आया न फोन, पता नहीं आजकल पत्र इतनी देर से क्यों मिलते हैं, जून का पिछला पत्र पूरे सत्रह दिनों के बाद उसे मिला था. सुबह साढ़े पांच बजे ही नींद खुल गयी, अमूमन उस वक्त शीतल हवा बहती है पर आज हवा ने छुट्टी ली थी. छत पर व्यायाम करने गयी, कमर का घेरा बढ़ता ही जा रहा है, घी लगे फुल्के और ताजा मक्खन लगाकर माँ परांठे खिलाती हैं. उसने सोचा जून भी अपने भोजन का ख्याल रखते होंगे. आज पूरे घर की बाहरी दीवारों की सफेदी हो गयी है, कल से अंदर की होगी. शाम को आंधी-तूफान के कारण बिजली गुल हो गयी थी, काले बादलों में बिजली इतनी तेज चमक रही थी कि शाम के वक्त ऐसा लगने लगा जैसे सूरज चमकने लगा हो. फिर जैसे-जैसे शाम गहराती गयी, अँधेरा बढ़ता गया, अंधेरे में तकिये में मुंह छिपाए नन्हा जैसे कुछ देख रहा था, पापा को याद कर रहा था. उसे रोज नई कहानी सुनानी होती है, नानाजी के साथ जाकर ढेर सारी कॉमिक्स भी लाया है पास में ही किसी दुकान से जो पच्चीस पैसे में एक दिन पढ़ने के लिए देते हैं. कभी-कभी अकेले उसे संभालना मुश्किल हो जाता है, सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बन गयी है, कोई भारतीय जब किसी क्षेत्र में जब नाम पाता है तो कितनी खुशी होती है न.

  आज का इतवार भी तरबूज के नाम था, भाई परिवार सहित यहीं आ गया था. आज घिसाई वाला आया था, पिता को उसकी बातों पर, उसके टालमटोल पर आज क्रोध आया गया, पर बाद में वे बेहद परेशान थे. आज धूप तेज है, उसने मन ही मन जून से कहा, तुम्हारे पास बादल हैं और मेरे पास धूप है.

  कल दोपहर को जून का खत मिला, मन फूल की मानिंद हल्का था, सुबह ही माँ किसी सम्बन्धी के यहाँ दसवें पर चली गयीं थीं. शाम को लौटीं तो बुआ जी उनके साथ थीं, वे छोटे-छोटे रसगुल्ले लायीं थीं. ज्यादा मुखर होना हमेशा पछतावे का कारण बनता है, उसे स्वयं पर संयम रखना चाहिए, जून भी यही चाहते होंगे उसने सोचा. आज सुबह एक बार फोन की घंटी बजी, कहीं दूर से कोई आवाज आ रही थी, बेहद धीमी, बात नहीं हो सकी, लाइन नहीं मिल रही थी शायद. उसने सोचा क्या जून ही थे उस पार. सुबह उसने पिता के कहे अनुसार हिसाब की कापी से मुख्य मद्दों पर खर्च का जोड़ किया. आज एक खुशी की बात और हुई, फर्श की घिसाई पूरी हो गयी, कल से वायरिंग का काम भी शुरू हो जायेगा. शाम को माँ की एक परिचिता आई थीं, नूना को साड़ी पहने देखकर कहने लगीं, साड़ी उस पर अच्छी लगती है. वह धीरे-धीरे बोलती हैं, चलती भी धीरे-धीरे हैं. शाम को नन्हे और भतीजी ने कवितायें सुनायीं, सबको बहुत आनंद आया.




Friday, March 22, 2013

स्क्रैम्ब्लर-हिज्जों का खेल




अचानक उसका ध्यान पर्दों पर गया तो सोचा बेडरूम के पर्दे धुलवाने चाहिए, कारपेट धुलवाने की बात भी की है धोबी से. फ्रिज में से सब्जियां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, पर लगता है बाजार जाने की जरूरत जल्दी नहीं पड़ेगी, बगीचे से गाजर व गोभी मिल सकती हैं. आज उसने शाम को नाश्ते में पनीर का परांठा बनाया, सो रात को देर तक भूख ही नहीं  लगी, पौने दस बजे है, उसने रोज की तरह लिखना शुरू किया है, सोचा, जून भी इसी वक्त सोने की तैयारी कर रहे होंगे. शायद उन्होंने भी ‘विविधा’ की कहानी देखी हो टीवी पर. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आना चाहता था, पर जून के न होने कि बात सुनकर नहीं आया. पड़ोस से नन्हे का मित्र आ गया था, सो वह दूर तक टहलने भी नहीं जा सकी. माली भी नहीं आया, प्लायर्स से नल खोल कर पानी दिया पौधों को फिर वैसे ही बंद किया. सुबह रजाई का गिलाफ धोकर चढाया. दिन में स्वेटर बनाया. नन्हे को स्कूल की पत्रिका के लिए कोई कविता या कहानी लिखनी है, इस समय लेटे हुए वही सोच रहा है. “ओशीन” धारावाहिक आज नहीं दिखाया जा रहा, अगले सोमवार को वह जून के साथ देखेगी. नन्हे को स्कूल में हेल्पेज के लिये बीस रूपये जमा करने थे, उसके पास दस रूपये थे, पचास वह ले जाना नहीं चाहता था, ऐसे वक्त में पड़ोसी ही तो काम आते हैं., लिखाई बिगड़ने लगी तो उसे लगा ठंड से उसकी उंगलियाँ अकड़ गयी हैं शायद, या ज्यादा देर स्वेटर बनाने से, वहाँ जून के शहर में तो इससे भी ज्यादा ठंड होगी.

रात्रि के साढे नौ बजे हैं, नन्हे ने इस वक्त उसे गुस्सा दिलाया है, काम के समय दुनिया भर के सवाल पूछता है और बातें करता है उस वक्त, जब कोई काम कहा गया हो, वैसे वह शायद रोज ही ऐसा करता हो पर आज उसे सिर में दर्द है, दोपहर को फिल्म देखी शायद इसी कारण. उसका रिपोर्ट कार्ड मिल गया है, आज वह स्कूल में पहली बार किसी टीचर के घर गया था.

बुधवार, आज बारह तारीख है, उसका मन हो रहा है जल्दी से सोने के लिए लेट जाये, शाम को बगीचे में काम किया, टहलने गयी अकेले, दोपहर को स्वेटर बनाती रही, थकान हो गयी है, जून होते तो.... अब बहुत हो गया अकेले रहना...अब बिलकुल अच्छा नहीं लगता मन करता है उससे ढेर सारी बातें करूं. उसके बिना कितने सारे काम भी तो बढ़ गए हैं न, नन्हा सो गया है, उसकी छुट्टी आज जल्दी हो गयी थी, कल भी ऐसा ही होगा, उसने कहानी लिख ली है पत्रिका के लिए.

“जिंदगी तू भी पड़ोसन की तरह लगती है
आज तोहफे में कुछ दे है तो कल मांगे है”
‘मुन्नवर राना’ का यह शेर उसे अच्छा लगा तो लिख लिया डायरी में.   

  परसों जून आ जायेंगे, सुबह से यह ख्याल आकर मन को सुकून दे गया है, उन्हें महसूस करने लगे हैं वे अब, उनकी हंसी उनका स्पर्श सब स्पष्ट हो गया है, नन्हा कह रहा है पापा के आने पर हलवा-पूरी बनाइएगा, आज दोपहर को इतने दिनों में वह पहली बार एक घंटा बेड में थी, कारण वही, नन्हा भी लेट कर टीवी देख रहा था, उसके स्कूल में आज जाते ही छुट्टी हो गयी पर वह साढ़े बारह बजे ही आ पाया, अब एक हफ्ते बाद स्कूल में पढ़ाई होगी. क्योंकि छह दिन बाद वार्षिक दिवस है. सुबह सामान्य रही सिवाय इसके कि गाजरें निकलीं गार्डन से, जून के लिए गाजर का हलवा बनाना है न, टमाटर भी मिले. उसके एक सहकर्मी सर्वोत्तम तथा आधा किलो मटर दे गए, उसने मंगाए थे. शाम को पड़ोसियों के साथ क्लब गए बीहू का कार्यक्रम था, सवा सात पर लौटे. घर आकर स्क्रेमब्लर खेलते रहे, समय का ध्यान ही नहीं रहा, खाना देर से खाया. कल टीवी पर ‘हुन हुन्शी हुन्शाराम’ गुजराती फिल्म Sदिखाई जायेगी और परसों “सूरज का सातवाँ घोड़ा”, जो वे साथ-साथ  देखेंगे. उसने मन ही मन जून से स्वप्न में आने कि बात कही, मच्छर दानी भी नहीं लगा रहे वे आज, नन्हा इस समय गुड नाईट में नई मैट लगा रहा है.

Wednesday, February 27, 2013

तकिये पर खरगोश



आज से वह कोशिश कर रही है कि ज्यादा कार्य बाएं हाथ से करे, दोपहर को अस्पताल जाना है, रिपोर्ट भी मिलेगी, दायें कंधें में भी हल्का खिंचाव है, दर्द भी है मीठा-मीठा सा, अब इस हफ्ते खत लिखने काम जून को ही करना पडेगा. वैसे भी कहते हैं कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है. अस्वस्थ मन से लिखे खत अच्छे नहीं होंगे. नन्हा इस वक्त पड़ोस के मित्र के साथ खेल रहा है. कल शाम वे तीनों पुस्तकालय गए, नन्हा चुपचाप कोई किताब लेकर बैठ जाता है, उसे ऐसा देखना अच्छा लगता है, जबकि और बच्चे शोर मचाने से नहीं चूकते. गिरिबाला और रेवती की दो कहानियाँ पढ़ीं उसने और दो किताबें भी लायी है, दोनों कहानियों की किताबें हैं.

आज हफ्ते का चौथा दिन है, जून को आजकल ज्यादा काम रहता है दफ्तर में, फिर शाम को अक्सर वे सब कहीं न कहीं घूमने चले जाते हैं, नन्हे की छुट्टियाँ जो हैं, सो खत उसे ही लिखने होंगे, इस समय वह कला प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए ड्राइंग सीखने गया है, कल दीदी का भी पत्र आया. उन्हें जन्मदिन का कार्ड भी भेजेगी. अभी कुछ देर पहले उसकी बंगाली सखी ने ‘पिजा’ की रेसिपी पूछी थी, वह गलती से टी स्पून की जगह टेबल स्पून कह गयी, ऐसी गलतियाँ अक्सर होती है उससे, इसलिये न कि पूरा ध्यान नहीं रख पाती. शाम को कुछ मित्र आएंगे, वे सब कैरम भी खेलेंगे, उसने दोसा बनाने की तैयारी की है. कल शाम को उसने मेडिकल गाइड में हाथ की अनुभूति के बारे में पढ़ा, इन इंजेक्शन से ठीक हो जाये वर्ना तो ईश्वर ही जानता है..ईश्वर की याद उसे अक्सर ऐसे ही वक्तों पर आती है, वह भी अच्छी तरह समझ गया होगा, लेकिन हर बार ऐसे वक्तों से उसने ही निकाला है.

परसों कैरम खेलने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई उसे, दोसे भी अच्छे बने थे. कल शाम क्लब में फिल्म देखते समय उसे गर्दन में हल्की अकड़न महसूस हुई, घर आकर जून ने मूव जैसी कोई क्रीम लगा दी, वह उनका ख्याल नहीं रख पाती है आजकल, पर वह हैं कि..  जबकि वे खुद भी अपने स्वास्थ्य के प्रति चिंतित हैं, उनका वजन भी कम हुआ है, कल उन्होंने बनारस फोन किया, उन्हें घर की चिंता भी रहती होगी. नूना को तो बस आराम ही आराम करना है घर बैठकर, फिर भी न जाने कहाँ-कहाँ से परेशानियाँ आकर उसके पीछे पड़ जाती हैं. कल दीदी को जन्मदिन की बधाई भेज दी, छोटी बहन के लिए भी कार्ड लाकर रख दिया है, इसी माह उसका खुद का भी तो जन्मदिन है, आधे से ज्यादा जिंदगी गुजर चुकी है.

कल वे दो परिचित परिवारों से मिलने गए. उसकी गर्दन का दर्द सर झुकाने पर महसूस होता है, इस कारण ही सुबह ठीक से नाश्ता नहीं बना सकी, जून भी उसके आए दिन के इन मर्जों से परेशान हो गए होंगे पर वे जाहिर नहीं करते. हर रात वह सोचती है कि इस अस्वस्थता को स्वयं पर हावी होने नहीं देगी, पर हर सुबह भूल जाती है. आज फिर मौसम बादलों भरा है, परसों वे तिनसुकिया गए थे, उसने हेयरकट करवाए, और फैब्रिक पेंट भी लिया, वह कल तकिये पर पेंटिंग करेगी. आज दोपहर को उसे एक फिल्म देखनी है.

इस समय वह काफी ठीक महसूस कर रही है, कल शाम दायीं तरफ वाले पास के घर में गयी, पड़ोसिन ने बताया कि कठोर बिस्तर पर सोने से निश्चित ही लाभ होगा, उन्हीं की तरह कारपेट बिछाकर उन्होंने भी बेड को कठोर बना लिया है, सुबह उठी तो गर्दन में अकड़न जा चुकी थी. नन्हा देर से उठा और इस समय बहुत धीरे-धीरे मजे से नाश्ता खा रहा है. उसे जल्दी खाने को कहती है पर कोई फायदा नहीं होता, वह तय करती है कि अब उसे टोकना बंद कर देगी, क्योंकि इससे दोनों में से किसी का भी लाभ नहीं है. कल दोनों छोटे भाइयों के पत्र मिले. बहुत दिनों से उसने सिवाय डायरी की चंद पंक्तियों के उसने कुछ नहीं लिखा है. ईश्वर से सहारा, आश्रय, आश्वासन चाहती है पर अपने आप को छोटा नहीं कर सकती उसके सामने, बराबरी के दर्जे पर ऐसे मांगना कि मुँह से शब्द भी न निकलें और वह समझ जाये और उसे यह भी न लगे कि उसने कुछ दिया है उसे.

कल शाम उसने ढोकला बनाया था, दो लोग आने वाले थे. आज उसने बेसन की भुजिया बनाई, फीकी भुजिया बिना मिर्च की. सुबह मूँग की दाल का हलवा बनाया था, पर जून को लगा कि घी कम डाला था, जैसे कि वह यह नहीं जानते कि उससे लाभ तो नहीं हानि ही होगी. कल दोपहर तकिये के गिलाफ पर फूलों के डिजाइन की छपाई की, नन्हे ने भी कुशलता से एक खरगोश छापा.














Wednesday, February 20, 2013

चाय-बागान में छिड़काव



कल दिल्ली से भी पत्र आ गया, छोटी बहन की सास ने लिखा है और उसके पति ने भी, उसने जून से उनके लिए एक बधाई कार्ड लाने को कहा है. असम में मौसम एक दिन में इतने रूप बदलता है जितनी पोशाकें फिल्मों में नायिका बदलती है, उतनी ही शीघ्रता से, कभी बदली, फिर धूप, फिर ओले, कभी तेज वर्षा, फिर धूप और न जाने क्या-क्या..नन्हा आज स्कूल गया है, कल मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ था, जून अपनी कार का पंक्चर ठीक करवाके घर आए थे, बोले, इसे मत भेजो, सर्दी विशेष तो नहीं पर खांसी अभी ठीक नहीं हुई है उसकी, बहुत खुश रहता है स्कूल जाकर, मगर वे दोनों सोचते हैं, घर में उससे ज्यादा पढ़ सकता है, आराम कर सकता है, गर्म भोजन भी खा सकता है, लेकिन स्कूल जाने से उसको खेलने को मिलता है, दोस्त मिलते हैं, घर से बाहर कुछ वक्त गुजार सकता है, सो जहाँ तक सम्भव हो उसे नियमित स्कूल भेजना ही ठीक है. दोपहर के दो बजे हैं, उसने कुछ देर फोन पर बात की. उसके बाद युद्ध कांड के दो-तीन अध्याय पढ़े, अद्भुत है ‘बाल्मीकि रामायण’. कल रात वे देर तक योजना बनाते रहे, बगीचे में क्या-क्या परिवर्तन लाना है, जो जगह खाली पड़ी है, वहाँ कौन से फूल लगाने हैं. बहुत दिनों से उसने काव्य जैसा कुछ नहीं लिखा-

कविता को लिखा नहीं जाता
उसे जीया जाता है
और उसे जीने के लिए पल दो पल का नहीं
एक लम्बा वक्त गुजारना होता है
ऐसा वक्त जब मन को अपनी गिरफ्त से परे छोड़ा जा सके
उन्मुक्त विचर सके वह भावों की अनोखी दुनिया में
कविता वस्तु नहीं है
यह एक प्रेरणा है, एक स्पंदन..
मगर इसे जगाने के लिए प्रयास चाहिए आतुर
उस हृदय का जो पत्थर में से पानी निचोड़ने की ताब रखता हो
पिघल पिघल कर स्वयं को गला सके, विचारों का ऐसा ताप ला सके
तब जो फूटेगा वह निर्झर सा स्वच्छ होगा
मुक्त होगा...असीम होगा और अपरिमित होगा...
वह बनेगा मधुर गीत..जिसे पोर पोर गायेगा ...
अंतर्मन से उपजा होगा न ...

नन्हे से सुबह कहा था कि वह नाश्ता खाने में इतनी देर लगाता है और अरुचि से खाता है, इस पर एक कहानी लिखेगी. उसने एक पात्र की कल्पना की, जाहिर है वह भी एक बच्चा ही होगा, जो सुबह उठाना पसंद नहीं करता हो, जो भोजन करते समय कुछ और करना चाहता हो, किताब पढ़ना, टीवी देखना या खेलना, अक्सर उसकी स्कूल बस छूटते छूटते रह जाती हो ....

मार्च का महीना शुरू भी हो गया और दूसरा हफ्ता खत्म होने को है. आज हफ्तों बाद डायरी खोली है. बाईस फरवरी को नन्हा अस्वस्थ हुआ, फिर जून भी गले के कारण परेशान थे, पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि कभी ऐसा वक्त आयेगा भी या नहीं जब वे तीनों एकदम ठीक हों, पहले की तरह. उसे ही ज्यादा ख्याल रखना पड़ेगा, खानेपीने का, सफाई का और नियमित व्यायाम का. होली का त्यौहार भी बीत गया, पंजाबी दीदी का बेटा आया था, जो जोरहाट में पढ़ाई कर रहा है. कल माँ-पिता के पत्र के साथ छोटी बहन का पत्र भी आया, लगता ही नहीं कि वह बड़ी हो गयी है, वही पुराना लहजा.. बच्चों की सी बातें. पड़ोसिन की तबियत भी ठीक नहीं है, लगातार दो दिन उसका पुत्र स्कूल नहीं गया. अस्वस्थ होना आजकल रोजमर्रा की बात हो गयी है, हवा इतनी दूषित हो चुकी है कि..इतने पेड़-पौधे होने के बावजूद हवा में एक गंध सी भरी रहती है, शायद सामने के चाय-बागान में कीट नाशक दवा का छिड़काव होता है या कोई रासायनिक खाद डाली जाती है.

उसने कहानी आगे बढ़ाई, स्कूल में सब बच्चे उसे मोटू कहकर बुलाते थे, क्योंकि जब वह छोटा था तो बिल्कुल गोल-मटोल था, उसके जन्मदिन की पार्टी में मित्रों ने उसके बचपन की कुछ तस्वीरें देखीं और तभी से उन्होंने उसका नाम मोटू रख दिया. शुरू में तो उसे बहुत बुरा लगा लेकिन माँ के समझाने पर उसने बाद में इस बात पर ध्यान देना छोड़ दिया. उसकी माँ ने कहा, लगता है तुम्हारे मित्रों को इसमें बहुत खुशी मिलती है, तुम्हें भी उनके साथ खुश होना चाहिए, क्योंकि तुम सचमुच के मोटे नहीं हो. उसकी एक बात अच्छी नहीं थी, वह थी बिना सोचे-समझे सबकी हाँ में हाँ मिलाना, वह कभी किसी को न नहीं कह पाता था. चाहे उसे बाद में कितनी हानि उठानी पड़े. एक बार उसके एक मित्र ने कहा कि वह अपना कलर बॉक्स लाना भूल गया है. टीचर जब उसकी मेज तक आयेंगी तब वह धीरे से कलर बॉक्स उसकी तरफ बढा दे जिससे उसे डांट न पड़े, वह मान गया, और नतीजा यह कि टीचर ने उसे ऐसा करते देख लिया और डांट उसे खानी पड़ी.


Friday, February 15, 2013

साइकिल की सवारी



कल सुबह से लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, दोपहर को उपवास किया, फिर शाम को टिफिन में उबले आलू खा लिए कि कुछ तो खा लेना चाहिए और खेलने चली गयी, खाली पेट में आलू वात बढ़ाते हैं, यह पता ही नहीं था, गैस सिर पर चढ़ गयी और दर्द से फटने लगा अच्छा भला सिर. घर आकर वमन किया फिर एक घंटा आराम और तब जाकर सब ठीक हुआ. पूरे वक्त जून के साथ नन्हा उसका बहुत ख्याल रख रहा था. उसको हिंदी में पूरे नम्बर मिले हैं, अगले हफ्ते उसे हिंदी में समाचार बोलने हैं स्कूल की असेम्बली में. उन्हें साथ वाले घर में हो रही शादी में जाना था, जल्दी ही लौट आए वे. वहाँ का प्रबंध बहुत अच्छा था, न ज्यादा शोर न भीड़भाड़, दुल्हन बहुत छोटी लग रही थी बहुत सुंदर. कल उसका फैब्रिक पेंटिंग का काम पूर्ण हो गया, आज दोपहर को पहले पत्रिका पढ़ेगी, फिर न्यूजट्रैक का कैसेट देखेगी फिर थर्मोकोल पर काम शुरू करेगी वह. कल शाम जून ने बहुत दिनों के बाद कहा कि वह हरी साड़ी में अच्छी लग रही थी, उन्हें शिकायत थी कि वह सिर्फ कहीं जाने के लिए ही क्यों तैयार होती है, इसका अर्थ हुआ कि वह उसकी पोशाक आदि पर नजर रखते हैं.

“आदमी अगर जिन्दा रहे तो उसे सौ साल बाद भी खुशी मिल सकती है”, अभी-अभी बाल्मीकि रामायण में हनुमान के मिलने पर सीता के मुख से यह वाक्य पढा. यह बिलकुल ठीक है, हम थोड़ी सी परेशानी होने पर जीवन को व्यर्थ मानने लगते हैं लेकिन कहीं न कहीं खुशी होती है, जो हमें मिलने वाली है. जैसे आज वे खुश हैं, कल उसने गाजर का हलवा बनाया, लाल गाजरें यहाँ नहीं मिलती, नारंगी रंग का हलवा कुछ अलग सा लगता है. उन्होंने किचन में पेंट करवाया था, नई नैनी ने सूखने की प्रतीक्षा लिए बिना पानी डाल दिया, सारा पेंट उतर गया पर..अब इसे कुछ कहने से क्या लाभ. नन्हे के स्कूल जाना है, जून ने फोन पर कहा था, उसको क्लास कैप्टन ने कल मारा था, शाम को वह थोड़ा उदास था, पर सुबह बिलकुल ठीक था. फरवरी का आरम्भ हो गया है, आदर्श महीना है, न सर्दी न गर्मी..यानि वसंत का महीना. कल उसकी पड़ोसिन ने गुलाब की एक कटिंग दी, पीला, लाल व नारंगी रंग का मिलाजुला रंग है उसका, माली ने शाम को लगा दी थी, इस मौसम में तो शायद ही खिले लेकिन अगले मौसम में जरूर फूल आयेगा. कल की तरह आज भी उसने साड़ी पहनी है, अच्छा लगता है हल्का-हल्का, खुला-खुला सा. जून को पसंद भी है, और उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं इसका तो ख्याल उसे रखना है न...और इससे उसे खुशी मिलती है, और खुशी इंसान की पहली जरूरत है.

आज नैनी जल्दी आ गयी है, खाना भी बन गया है, इसका अर्थ गाड़ी पटरी पर आ रही है, पिछले दिनों ग्यारह बज जाते थे और काम बिखरा रह जाता था. कल वे स्कूल गए थे, नन्हे की क्लास टीचर और साइंस टीचर से मिले. आज सुबह नन्हा बहुत अच्छे मूड में था, खिला- खिला और ताजा सा. टेप रिकार्डर पर ‘मिली’ फिल्म का गाना आ रहा है, छोटे भाई का उपहार उनकी शादी की सालगिरह पर. कल भी परसों की तरह उसने साइकिल चलाई, बहुत अच्छा लगता है हवा को काटते हुए गति से आगे बढ़ना. लगभग दस सालों के बाद वह साइकिल चला रही है. कितना अजीब लगता है सोचकर कि बचपन कितना पीछे छूट गया है. याद करो तो लगता है कल की ही तो बात है. नन्हा कल पिछले या उससे पिछले साल की गर्मियों को याद कर रहा था कि कैसे एक आम के लिए वह गुस्सा कर रही थी, फिर जून और भी नाराज हो गए थे, उसकी याददाश्त बहुत तेज है. उसे कहानी सुनाने की प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार मिला, उदास था कि प्रथम क्यों नहीं मिला.





Friday, January 4, 2013

द साइप्रस ट्री



फिर वही प्रमाद और ढेर सारे बहाने...उसके पास अपने निकट आने के लिए दस मिनट भी नहीं हैं और वह कुछ करने का ख्वाब देखती है. शनिवार की ही बात है उसे कुछ भी रुच नहीं रहा था, मन का पंछी उड़ान भरने को आतुर था, और तब से अब तक फिर उसी पुरानी दिनचर्या में खप गया है मन अपने आप ही, दरअसल करने को घर में भी कुछ कम नहीं है..पर नया कुछ नहीं..खैर जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ ? जून और नन्हे को ढेर सारा प्यार करना..फिर उनके लिए नाश्ता, खाना बनाना..यह भी कोई कम काम है क्या, पर पहले प्यार की जो तीव्रता महसूस करती थी जो आकुलता ...वैसा अब क्यों नहीं लगता..शायद इसलिए कि अब वह प्रेम को उतना महत्व नहीं देती, जबकि यह हमेशा महत्वपूर्ण होता है.
आज भी मौसम अच्छा है, बदली है, अभी सुबह के साढ़े दस ही बजे है पर अभी से शाम सी लगने लगी है. नन्हे ने कल टीवी पर बच्चों के लिए कहानी सुनी, उसे इतना मजा आया, शाम को उसे चटखारे लेकर सुना रहा था कि कैसे बीरबल ने नाई को उसके ही जाल में फंसा दिया. वह बहुत प्यारा है, मासूम और सच्चा..बच्चों को तभी भगवान का रूप कहते हैं. छोटी-छोटी बातों पर इतना खुश हो जाता है...उसने मन को झटका दिया, कहीं उसे उसकी नजर न लग जाये..उसने मन ही मन कहा वह उसे और उसके पिता को बहुत प्रेम करती है.

आज अचानक उसकी बंगाली सखी का फोन आया, बहुत अच्छा लगा. सबसे अच्छी बात यह कि उसने सुबह ड्राइविंग की, इतना मुश्किल नहीं है कार चलाना जितना वह सोचती थी. कल माँ का पत्र आया वह विस्तार से सभी के समाचार लिखती हैं, छोटी भाभी स्कूल में पढ़ाने लगी है. नन्हा कल रात बहुत परेशान हो गया था..उसकी टीचर ने कल पांच स्पेलिंग याद करने दी थीं और आज डिक्टेशन देने को कहा था..उसको शायद याद करने में इतनी मुश्किल नहीं होती पर डर गया था और यही कह रहा था कि एक दिन में कैसे बच्चे याद कर सकते हैं. बेहद संवेदनशील है और आंसू भी बहुत जल्दी आते हैं उसको. पापा ने कहा है, जीरो नम्बर मिलेंगे, बस यही कहकर रोने लगा. उसका पड़ोस का मित्र आज अस्वस्थ है, वह अकेला ही गया है स्कूल.
कल सुबह वह Cyprus tree पढ़ रही थी. John spain उसे भी अच्छी लगी और उसकी माँ उतनी नहीं पर Laura की Mummy से ज्यादा. नन्हे का टेस्ट आज दुबारा होगा, शायद कल सभी बच्चे अच्छा नहीं कर पाए. कल दोपहर वह सो नहीं पाया, गर्मी बहुत थी, शाम को उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही थी, शायद थकान से. उसने सोचा है आज से दिन में भी एसी चलाएगी वह. शाम को उत्तपम बनाया था, रात को खाना खाने का किसी का मन नहीं हुआ. जून बेड पर जाते ही सो गए जो उसे नागवार गुजरता है, रात को उसे कुछ बातें करके ही सोने का ख्याल आता है, बातें जो दिन भर की भाग-दौड़ में वे नहीं कर पाते, कभी सुकून से बैठकर दिल की बातें. सुबह, दोपहर, शाम हर वक्त तो कोई न कोई काम लगा रहता है, फिर मन, मस्तिष्क और चाहत का क्या करे? अधूरापन...शब्द नहीं मिल रहे हैं पर कोई तो वक्त ऐसा हो जब वे दोनों.. जीवनसाथी.. भूतपूर्व प्रेमी और न जाने क्या-क्या एक दूसरे को यह अहसास दिला सकें कि हाँ, उन्हें एक-दूसरे की जरूरत है, कि वे अर्थहीन नहीं है, कि उनका प्यार सम्बल है कि वे साथ-साथ जी रहे हैं सही अर्थों में, कि वे एक-दूसरे के लिए हैं कि वे सिर्फ इसलिए साथ-साथ नहीं रहते कि ऐसा करना ही है क्योकि इसके सिवा कोई रास्ता नहीं, बल्कि इसलिए कि वे एक दूसरे के दोस्त हैं..साथ रहने का सुख मिलता है उन्हें, कि वे अकेले नहीं जी पाएंगे..लेकिन जून को शायद इन सबकी जरूरत नहीं, वह अपनी नींद को ही ज्यादा महत्व देते हैं..दोपहर हो शाम हो या कि रात..खाली वक्त यानि उनकी आँखें बंद...उसकी बात कभी वे समझेंगे..शायद हाँ..शायद नहीं..पर फिर भी उसे उनसे प्रेम है और वह जानती है कि उन्हें भी उससे बहुत ज्यादा.







Tuesday, January 1, 2013

पोलियो ड्राप्स - एक बूंद जिंदगी की



Demletza खत्म कर ली है अभी कुछ देर पहले, Ross Poldark  की यह किताब उसे अच्छी लगी. आज दोपहर को सोयी नहीं, किताब का नशा था, किताब के चक्कर में नन्हे को दो कहानियाँ भी नहीं सुनायीं. वह इतना छोटा है और इतना मासूम...कैसे डांट दिया उसने, पर जब वह सोकर उठेगा सब भूल चुका होगा, उसकी सर्दी ठीक हो गयी सी लगती है पर जून अभी ठीक नहीं हुए हैं, साइनस की समस्या है उनको, आज डॉ के पास गए होंगे. परसों दो पत्र मिले उन्हें, एक घर से ननद का, एक सुरभि का, वाराणसी में उनकी गली में गोली चली, कितने तनाव में होंगे वहाँ सभी लोग. सुरभि रक्षाबन्धन तक वहाँ रहेगी, उसने सोचा अगले हफ्ते उसे भी जवाब देगी. इस घर में जब से वे आए हैं वह ज्यादा आराम पसंद हो गयी है, कोई अनुशासन नहीं मानती, जब जैसे मूड हुआ कर लिया. उसे याद आया कल छोटी बहन का जन्मदिन है, उसे कार्ड व पत्र मिल गया होगा, बड़ी बहन का पत्र भी बहुत दिनों से नहीं आया है, वे लोग भारत आए हुए हैं, जरूर माँ-पिता से मिलने गए होंगे. चचेरे भाई, बहन का भी स्मरण हो आया, जिनकी माँ नहीं रही और पिता भी उनका विशेष ख्याल नहीं रखते. उसने सोचा काश ! वह उस बहन के लिए कुछ कर सकती..

आओ कहीं हम चलें
फूल हँसी के खिलें..
रेडियो पर यह गाना आ रहा है
भूल के हर मुश्किलें
आज सजा लो महफिलें..
मौसम आज अच्छा है, बादल और फुहार..अन्यथा इस समय कड़ी धूप निकली होती है. आज बहुत दिनों बाद उसने समुचित व्यायाम किया, पाठ किया, अच्छा लग रहा है, सोचा है अब कुछ पढ़ेगी या लिखेगी. लिखना क्या है यह तो मालूम नहीं, मन एक जगह स्थिर हो तब न कुछ सोचे, मन तो तेज चल रही रेलगाड़ी की तरह दौड़ता चला जाता है...एक पल को भी विश्राम नहीं..फिर विचार रुके कैसें, और उन्हें मथे कैसे. मथे बिना तो सार नहीं निकलेगा. न ही कुछ पायेगी ऐसा, जो सार्थक हो...चलो निरर्थक ही सही...वह भी तभी न जब..पिछले वर्ष की डायरी खोली जब जून से दूर थी, कितना याद करती थी, लम्बे लम्बे खत लिखती थी..और वह भी...अब जब वे पास हैं तो..उनके पास इतने दूसरे काम हैं कि...पर उनके पीछे भी प्यार है न..
कल “असम बंद” था, सो जून और नन्हा घर पर ही थे, दिन भर तीनों ने मस्ती की, खूब कैरम खेला, टीवी देखा, और शाम को एक घंटे के लिए टहलने गए. आकाश पर बदली थी, उनका एसी (एयर कंडीशनर) आज लग जायेगा, जब से उन्होंने खरीदा है, धूप नहीं निकली है.
नन्हा पड़ोस में खेलने गया है, यहाँ उसकी उम्र का एक बच्चा साथ वाले घर में रहता है, दोनों की खूब पटती है. उसकी नैनी अभी तक अस्वस्थ है, जो उनके यहाँ सर्वेंट क्वाटर में रहती है, परसों दोपहर को बताने आई थी कि बुखार हो गया है. उसने पड़ोसिन से कहा है, यदि सम्भव हो तो वह अपनी कामवाली को भेज दे. कल दूधवाला भी नहीं आया, अभी आया तो कहने लगा भूल गया, इतने वर्षों से दे रहा है कल भूल  गया, अजीब लगता है न, लेकिन होता है ऐसा कभी-कभी. नन्हे ने कल पहली बार तिनसुकिया में खिलौने के लिए जिद नहीं की. वे दालें लाए और राखियाँ भी, अगले हफ्ते भेजेगी.

आज सात तारीख है, सुबह-सुबह जून ने उसे शुभकामना दी, लगभग हर सात को वह ऐसा ही करते हैं बशर्ते तिथि याद रहे. उसने घर के बाहर गेट तक के पक्के रास्ते पर ब्लीचिंग पाउडर डलवाया है. नैनी कल से काम पर आ गयी है, जो अव्यवस्था हुई थी सब ठीक हो गयी है, आजकल वे क्लब में टेबल-टेनिस खेलने जाते हैं, बहुत अच्छा लगता है. मौसम फिर बदली भरा है, कल शाम गर्मी कुछ बढ़ गयी थी. रात खूब वर्षा हुई. छोटे भाई का पत्र बहुत दिनों बाद आया है उसके सास-ससुर का एक्सीडेंट हो गया था, लिखा है, अब वे ठीक हैं. नन्हे को पोलियो ड्राप्स देने व डीपीटी का टीका लगवाने अस्पताल ले जाना है, उसे पहले कभी टीके से बुखार हुआ हो याद नहीं, उसने दुआ की इस बार भी नहीं होगा. पर उसके माथे पर गर्मी से तीन दाने निकल आये हैं, उसे दर्द भी होता होगा, पर कुछ कहता नहीं. कल जून ने कम्पनी के हिंदी अनुभाग के पुस्तकालय से हिंदी की पांच-छ पुस्तकें लाकर दीं, लेकिन उसके दफ्तर से आने के बाद वह उन्हें नहीं पढ़ती, वह अगर नन्हे को पढ़ाने में भी व्यस्त रहे तो जून को अच्छा नहीं लगता, सो दोपहर को ही उसका गृहकार्य करा देना चाहती है. “तट की तलाश” उसने कल पढ़ी, एक लड़की की दुःख भरी कहानी. Doctor Sahib  भी लगभग पढ़ चुकी है, Stephen Kerry का अन्तिम तबादला बिहार में हुआ था, उसके बाद तो देश आजाद हो गया था और वह अपने देश चले गए थे. कल दोपहर उसने रवीन्द्रनाथ टैगोर की किताब तीन साथी पढ़ी. शाम को क्लब में एक घंटा खेल कर पसीना बहाया. रात को आतंकवादियों के स्वप्न देखे.


Monday, December 24, 2012

नए घर में



कल जून आएंगे, आज उन्हें गए पूरा एक हफ्ता हो गया है, पहली बार घर से आने के बाद इतने दिनों तक वे अकेले रह रहे हैं. एक-एक कर के दिन बीत रहे हैं और कल इंतजार का अंतिम दिन है. नन्हे को होमवर्क कहने को कहा है पर वह टेलीफोन और टाइपराइटर में व्यस्त है, जब से जून गए हैं उसने गेस्ट रूम को ऑफिस बना लिया है और छोटे पापा बनकर यहाँ आता है, फोन अटेंड करता है और न जाने क्या-क्या कहता है, कल वह थोड़ा उदास थी और परसों भी कुछ....वह न होता तो... वह हर वक्त बातों में लगाये रखता है. नन्हा रोज उसे कहानी सुनाने को कहता है, उसने चिंटू खरगोश और मीकू बिल्ली की कहानी बना कर सुनाई, जिसमें वे दोनों घर को चोरों से बचा लेते हैं. फिर उसने मंझले भाई व माँ-पिता को खत लिखे.

मूसलाधार वर्षा हो रही है, नए घर में बड़ा सा आँगन है, उसने सोचा वहाँ वे बारिश में नहा सकते हैं, पुराने घर में भी छोटा सा आंगन था, जहां वे एक बार जलधारा में बहुत भीगे थे. कल रात तेज वर्षा हुई गर्जन-तर्जन के साथ, आवाज से उसकी तो नींद ही गायब हो गयी. ज्यादातर वर्षा यहाँ रात को ही होती है, बिजली की गड़ागड़ाहट से कैसा डर लगा, कितना मोह होता है इंसान को अपने जीवन से...  अप्रैल का आरम्भ हुए चार दिन हो गए हैं और आज उसने डायरी खोली है. जून फिर कलकत्ता गए हैं, परसों शाम को आएंगे, नए घर के लिए कुछ सामान भी लायेंगे. नन्हे की परीक्षाएं शरू होने में केवल पांच दिन हैं.

आज उसका इंग्लिश का पहला इम्तहान है, इस बार तैयारी काफी अच्छी है, जरूर कोई पोजीशन लाएगा. आज फिर बादल छाये हैं, कल कितने दिनों बाद धूप निकली थी. वे तिनसुकिया से कुशन भी ले आये हैं और पर्दे भी, जो रंगने को दिए थे. एक डायरी और कैलेंडर भी लाए हैं, चाहे वह नियमित लिखती न हो पर नई डायरी देखकर कितना आनंद होता है, लोभ शायद इसी को कहते हैं...एकत्र करने की प्रवृत्ति है उसमें...चाहे वस्तुओं का उपयोग हो या नहीं पर वे होनी जरूर चाहियें. उसने ध्यान दिया कि उसकी भाषा खिचड़ी होती जा रही है. असम में रहकर शुद्ध हिंदी जैसे भूल ही जायेगी. कल उसने कालेज की सखी सुरभि के पत्र का जवाब दिया और दोनों घरों पर भी पत्र लिखे. उसने सोचा है, धीरे-धीरे पैकिंग का काम आरम्भ कर देना चाहिए. शनिवार को उन्हें शिफ्ट करना है, दो कार्टन भी आकर बड़े हैं छोटा-मोटा सामान रखने के लिए. कितना अजीब लगेगा शुरू-शुरू में, पर वे घर व्यवस्थित करने में इतने व्यस्त रहेंगे कि शेष सब भूल जायेंगे. अच्छा लगेगा बड़े घर में रहना. कभी देखा सपना पूर्ण होगा.. कि बाहर लॉन हो, जिसमें फूल खिले हों, हरी घास हो. गैराज में गाड़ी खड़ी हो.

आज मौसम अच्छा है न वर्षा न धूप. ट्रांजिस्टर पर आशिकी फिल्म का गाना आ रहा है, इस फिल्म के सभी गाने अच्छे हैं. वह गाना खत्म होने का इंतजार कर रही है, अधूरा गाना सुनना उसे नहीं भाता और गाते हुए गायक को बीच में रोकना भी अच्छा नहीं लगता, इसके बाद वह पड़ोसिन को शाम की चाय के लिए निमंत्रित करने जायेगी, अब पता नहीं कब वे उनके नए घर में आयें. कल रात उसने फुफेरी बहन को स्वप्न में देखा, सोचा इस बार उसे पत्र अवश्य लिखेगी, कितने महीने, शायद साल भर हो गया हो उसे खत लिखे. घर से भी कोई पत्र नहीं आया है, जून फोन करना चाह रहे हैं पर मिल नहीं रहा है, शायद हड़ताल है दूर संचार विभाग में. उसके दिमाग ने आजकल सोचना बंद कर दिया है, सोचने से घबराने लगी है, सिर्फ कुछ न कुछ करना चाहती है जिससे दिमाग न खली रहे न सोचे..क्या यह पलायन है?
लगभग आधा सामान तो उस घर में पहुंच ही गया है, कितना खाली-खाली लग रहा है यह घर, कितने साल वे इस घर में रहे अपना समझ कर और अब कोई और रहेगा अपने अपनों के साथ...घर बदलना इतना आसान तो नहीं होता, कितनी यादें जुडी होती हैं, कितनी बातें याद आती हैं, कोई मीठी तो कोई खट्टी बात..आज शाम को वह उन दीदी से अवश्य मिलेगी कितने दिन हो गए हैं पूरा एक सप्ताह ही तो..और अपनी असमिया सखी के यहाँ भी जाना है एक-दो दिन में. नन्हा सुबह उठा तो कहने लगा उसने एक अच्छा सा सपना देखा है, स्नेहा (उसकी फुफेरी बहन) का परिवार, वे तीनों और दादा-दादीजी लोग एक पार्टी में गए हैं...यानि उसने एक ही स्वप्न में सबको देख लिया.


Wednesday, December 19, 2012

युद्ध का दानव



जनवरी का अंतिम दिन, वह कब से डायरी लिखने की प्रतीक्षा कर रही थी, जून अभी-अभी नन्हे को लेकर क्लब गए हैं और यही वक्त है जब वह अपने आप से कुछ बातें कर सकती है. यूँ सच कहे तो अपनेआप से बातें किये उसे वर्षों बीत गए हैं, क्योंकि उसके लिए हिम्मत चाहिए, अपने को कटघरे में खड़े करना आसान है क्या? तो वह अक्सर इस डायरी से ही बातें करती है. शायद आज भी ऐसा ही होगा. उसका गला आज काफी ठीक है, जून के प्यार और देखभाल के कारण ही यह ठीक हुआ है. उसके लिए जितना उसे करना चाहिए वह नहीं कर  पाती है. उसके प्रेम के सामने...यह प्रेम है या कर्त्तव्य? कुछ भी हो, उसके भीतर पहले का सा भाव न रहा हो फिर भी वे एक-दूसरे के लिए हैं. परसों उन्हें फिर फील्ड जाना है और इस बार चार-पांच दिनों के बाद ही आयेंगे. इस हफ्ते का चौथा दिन है वह कहीं नहीं गयी और न ही कोई उनके घर आया यह उसका सौभाग्य ही था क्योंकि वह बोल ही नहीं सकती थी. हाँ, आज पड़ोसियों ने जरूर पूछा उसके स्वास्थ्य के बारे में.

नए साल का दूसरा माह शुरू भी हो गया है और वे हैं कि वहीं खड़े हैं, कभी-कभी अपने आप से चिढ़ होने लगती है कि वह कुछ करती क्यों नहीं? कुछ ऐसा विशेष जो सार्थक हो-रचना किसी भी वस्तु की, सृजन किसी का भी, शिल्प, कला, कविता कुछ भी..कुछ भी ऐसा जिसमें वह खुद को व्यक्त कर सके. कुछ ऐसा जरूर ही करना चाहिए, चित्र ही सही या फिर शब्दों का खेल...अच्छा यहीं से आरम्भ करेगी, उसने सोचा. इराक, अमेरिका में जो युद्ध हो रहा है उसकी विभीषका पर कुछ कहना नहीं है क्या उसे?

ओ दानव !
क्या अब भी बुझी नहीं तुम्हारी प्यास
रक्त के नद में तैरते हुए भी
हजारों के श्रम से बने शहर खाकर भी
तुम भूखे हो
जो बेजबान पंछियों, निरीह जीवों को
निगलना चाहते हो
युद्द के दानव
तुम्हें चाहिए शिशुओं के आँसू, क्रन्दन और रुदन
पीड़ा, दर्द, घुटन, अंधकार और निराशा
यही तुम्हारे साम्राज्य के सिपाही हैं
मिसाइलें, बंदूकें, बम और अनगिनत हथियार
जिनके नाम भी वे नहीं जानते
तुम चलाते हो उन पर
इन बहादुर सैनिकों के हाथों
जिन्होंने प्यार से छुआ होगा अपनी
प्रिया के बालों को, बच्चों के गालों को
ओ दानव ! कितने क्रूर हो तुम
नहीं देखा तुमने
घर कैसे बनता है
अपने सीने से लगाकर कैसे बड़ा किया जाता है
बच्चों को
क्या इसलिए कि तुम उड़ा दो
उनके स्कूलों को
तुम्हें बूढ़ों पर भी दया नहीं आती
वृद्धाश्रम से आती दिल दहलाने वाली पुकारें
नहीं सुनते क्या तुम
उन रातों के तुम नहीं हो गवाह
जब दिल के पास छिपाकर बाँहों में
जीवन भर साथ चलने का वादा लेती है कोई स्त्री
और अगली ही रात तुम आकर चीर डालते हो
दोनों को लकड़ी की तरह अलग अलग
आकाश..धरा..सागर..हवा..क्या कोई भी नहीं
बचेगा तुम्हारे पंजो से
जहरीली हवा, काला धुँधुआता आकाश..लोहित जल..यही तुम्हारा अभीष्ट है
ओ मानव ! युद्ध के दानव को क्यों नहीं रोका
क्यों उसे बुलाया
मानव ही जब बन जाता है दानव
तभी भयानक युद्ध होते हैं
सभ्यताएँ सिर धुनती हैं
और वे मूक दर्शक से
सब कुछ देखते हैं, सब सुनते हैं..लेकिन कुछ कर नही पाते...