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Wednesday, March 10, 2021

मूंगफली मेला

 मूंगफली  मेला 

रात्रि के पौने दस बजे हैं। आज सुबह भी वे प्रतिदिन की तरह अंधेरे में ही टहलने गए। सुबह सोसाइटी की तरफ से बगीचे व गमलों में खाद डाली गई। ग्लैडियोली के बल्ब फूटने लगे हैं। जून को पिटुनिया लगाने का मन है। जिनके लिए  यहीं स्थित सुपर मार्केट में रेलिंग में लगाये जाने वाले दस गमलों का ऑर्डर दिया है, बालकनी में लगाएंगे।  नैनी सुबह सफाई करके नहीं गई, दोपहर को बेटी को साथ लाएगी, ऐसा कहकर। दोपहर को दोनों ने मिलकर सभी खिड़कियों के शीशे साफ किए।अब भाषा के कारण कोई समस्या नहीं होती, वह इशारों से सब समझ व समझा लेती है। 


शाम को वे एओल आश्रम जाने से पहले मैसूर रोड पर स्थित बालाजी नर्सरी गए, पर वहाँ फूलों की पौध नहीं मिली। आश्रम की नर्सरी से  फूल के दो पौधे लिए। वहाँ भीड़ बहुत थी। गुरूजी लगभग साढ़े छह बजे आए, उसके पहले भजन गाए जा रहे थे। आज गुरूजी ने डाक्टर्स तथा वैज्ञानिकों के प्रश्नों के सदा की तरह आनंदित करने वाले जवाब दिए। कुछ पुलिस अधिकारी भी उनसे मिलने आए थे।  जापान से आए एक व्यक्ति ने जल को शुद्ध करने का एक सस्ता व सरल तरीका बताया। उन्हें कुछ सर्दी भी लगी हुई थी, एक-दो बार छींक आयी। वहाँ से आकर मन कितना हल्का लग रहा है।आश्रम के कैफे में ही दोसा खाया।


रात्रि के नौ बजे हैं। नवंबर का महीना है,  कमरे में गर्मी का अहसास हो रहा है। यहाँ सर्दी का मौसम मात्र दिसंबर-जनवरी में ही होता है। दोपहर को टेलर से कपड़े ले आए, ठीक सिले हैं. लक्ष्मी नर्सरी से गुलदाउदी के पौधे लिए तथा एक स्नेक प्लांट, जो कमरे में रखा जा सकता है। आज लेखन का कोई कार्य नहीं हुआ, एक कविता पर एक प्रतिक्रिया लिखी। बड़े भाई ने पिताजी के लिए एक वीडियो बनाया है जिसमें उनकी अकेले तथा सबके साथ तस्वीरें हैं। आज मार्केट में पहली बार ‘रिलाइन्स ट्रेंड्स’ गए वे, घर ले जाने के लिए कुछ उपहार खरीदे, उनके साथ एक चादर मुफ़्त मिली, तथा कुछ कूपन भी, उन्हें आश्चर्य हुआ जितने का समान था उतना ही गिफ्ट, यह कैसा व्यापार है ! 


आज राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गये ऐतिहासिक फैसले का दिन था। सरकार ने बहुत सावधानी बरती और सबको बार-बार कहा कि फैसला किसी के भी पक्ष में हो, हिंसा नहीं होनी चाहिए; और ऐसा ही हुआ है। कई मुस्लिम संस्थाओं ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। पिताजी से बात हुई, उन्हें भी इस फैसले से खुशी हुई है। छोटा भाई आज छोटी ननद के घर गया है, वह बैंक के काम से पूरे भारत में घूमता है। शाम को एक सखी का फोन आया, अब वह उनके असम वाले कंपनी के घर में रहने वाली है। अच्छा है कि वह पुरानी नैनी को सर्वेन्ट रूम में रहने देगी। आज एओल के एक ऐप से योग साधना में सहायता ली। शाम को गुरूजी का एक सुंदर प्रवचन सुना, “फीलिंग द प्रजेन्स”, कितने सरल शब्दों में कितनी गहरी बात उन्होंने बता दी। 


आज वे मूंगफली मेला देखने गए, जिसे यहाँ पर ‘कंदले काई फरशे’ कहते हैं। बसवन गुड़ी में कार्तिक माह के अंतिम सोमवार को आयोजित होने वाला यह मेला चार सौ वर्ष पुराना है। लगभग दो किमी सड़क पर मूंगफली बेचने वाले किसान व व्यापारी अपने दुकानें लगाते हैं। मेले में अन्य दुकानें व झूले आदि भी होते  हैं। सात दिनों तक चलने वाले इस मेले में लगभग बारह से पंद्रह टन मूंगफली बेची जाएगी। ज्यादा भीड़ होने के कारण वे बीच से ही लौट आए, नन्हे का एक मित्र भी साथ था, पहले वे उसी के घर गए थे, जो उसी इलाके में रहता है। उसने बताया कि बचपन के बाद इतने वर्षों में वह आज पहली बार ही मेले देखने आया है। कभी बाद में देखेंगे यह सोचकर अपने ही शहर के दर्शनीय स्थल देखने लोग नहीं जा पाते हैं।  


उसने कालेज के दिनों की डायरी में पढ़ा, विनोबा के विचार उसने लिखे थे। ‘अध्यात्म-ज्ञान से बगावत की हिम्मत आएगी’ 


“हम देह से अलग अविनाशी, आत्मरूप हैं, परमेश्वर अंदर विराजमान है, इसी जन्म में उसका दर्शन सुलभ है, सारे जीव हमारे रूप हैं” इस अध्यात्म विचार में प्रवीण होना चाहिए। 

शिक्षण में सत्यनिष्ठा और जीवन में तपस्या की सख्त आवश्यकता है जिससे मौजूद समाज के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत आए। जिसके अंदर अध्यात्म विद्या है उसे सारी दुनिया भी दबाना चाहे तो दबा नहीं सकती। मेरा विश्वास है कि अध्यात्म विद्या से हम जबरदस्त क्रांति कर सकते हैं। पुस्तकों से मदद अवश्य मिलती है, परंतु अगर मूल विचार मिलता है तब ही आगे की बात हो सकती है । आत्मजज्ञान ही सही ज्ञान है जिसकी सबको जरूरत है। मुख्य रूप से तीन प्रकार का ज्ञान हरेक को होना चाहिए - आरोग्य ज्ञान, नीति ज्ञान, आत्मज्ञान ! 


Saturday, July 15, 2017

भात करेले की सब्जी


कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, एक तालाब में स्वयं को पौधों के रूप में या फूलों के रूप में उगे हुए ! ढेर सारे चेहरे पानी की सतह पर तैर रहे थे. किसी जन्म में शायद वह कमल रही हो. आज तक कितने ही स्वप्नों में पिछले कितने ही जन्मों की कहानी देखी है. कितना अद्भुत है यह जीवन, कितने राज छुपाये हुए. ध्यान में जो शांति महसूस होती है पता नहीं किस लोक से आती है. कभी-कभी जो आकृतियाँ दिखती हैं जाने वे कौन हैं ! कुछ भी नहीं जानते वे..सामने रखे मोगरा के फूलों से जो गंध आया रही है, वह माटी से उपजी है, इतनी कठोर भूमि और इतनी कोमल पंखुरी, फिर उससे भी सूक्ष्म गंध, और उससे भी सूक्ष्म उस गंध को स्पर्श को महसूस करने वाली नासिका पर आश्चर्यों का महा आश्चर्य, इस गंध को पहचानने वाला सूक्ष्म मन तथा इसका आनंद लेने वाली आत्मा..तो कृष्ण भोक्ता हैं, यह तो स्पष्ट हो गया. वही एक तत्व जो भोक्ता है वही तो प्रकृति के माध्यम से गंध बनकर बिखरा है. जीवन ऊर्जा जो अनगिनत रूपों में प्रकट हो रही है, स्वयं ही आनंदित भी हो रही है ! पर कैसे यह खेल चल रहा है, कौन जानता है !

कल फिर एक अनोखा स्वप्न देखा, मस्तिष्क को अपने सम्मुख देखा और उसमें जगह-जगह निशान बने थे गोल, छोटे-छोटे टुकड़े, जिन पर लिखा था अज्ञान और वह उसे वहाँ से काट कर निकाल रही थी ! उनके मस्तिष्क में ज्ञान व अज्ञान दोनों हैं. अज्ञान को दूर करना है यही बात स्वप्न बन कर आई. वास्तव में उन्हें ज्ञान को बढ़ाना है, अज्ञान अपने-आप चला जायेगा.


कल नन्हे का जन्मदिन है, जून कल आ रहे हैं. इस समय साढ़े पांच बजने को हैं. बाहर अभी धूप है. कुछ देर पहले बगीचे में काम करवाया. अभी एक कविता लिखनी है, नये-नये शब्दों से सजी सुंदर कविता. आजकल वह कुछ सुंदर शब्दों को देखती है और फिर उन्हीं के इर्द-गिर्द अन्य शब्द जैसे अपने आप चले आते हैं, सामान्यतया भीतर अब मौन ही रहता है, एक सन्नाटा ! मधुरिम नीरवता ! हवा बह रही है, बाहर झूमते हुए वृक्ष अच्छे लग रहे हैं. कुछ देर में क्लब की एक सदस्या आने वाली है, इसी महीने क्लब की वार्षिक बैठक है, कुछ देर उसका काम करना है. एक अन्य सखी का फोन आया, अगले महीने किशोरियों के लिए होने वाला कार्यक्रम एक स्कूल में होगा. उसने अपनी सब्जी बाड़ी में उगे करेले और लोभिया की फलियाँ भी भिजवायीं. नूना ने भी भात करेले भिजवाये, जो जरा भी कड़वे नहीं होते, जो उसने असम में आकर ही देखे हैं. जामुन आज नहीं मिले, पिछले महीने भर से सुबह-सुबह वह रोज मीठे जामुन उठाकर लाती रही है, शाम को जिसका शरबत जून को बहुत भाता है. जून ने कल दोपहर की टिकट बुक करवायी हैं, कोई नई फिल्म आई है. वह उसके लिए वस्त्र भी लाये हैं. वे जीवन के रस को भरपूर निचोड़ लेना चाहते हैं. ढेर-सारी खाने-पीने की वस्तुएं भी लाये हैं, उसे बिना मांगे ही सब कुछ मिल जाता है, परमात्मा की कैसे कृपा है ! उस परमात्मा के लिए वह क्या कर सकती है सिवाय चंद शब्दों में उसकी महिमा बखान करने के !

Friday, August 14, 2015

टिंडे की सब्जी


आज सुबह चार बजे ही नींद खुल गयी, रात को जल्दी सो गयी थी. मन अपेक्षाकृत शान्त है, किन्तु अभी भी पहले की सी स्थिरता नहीं आई है. यात्रा में ध्यान में जो व्यवधान पड़ा उसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है. मन में बेवजह ही विचार चलते रहते हैं, कभी भूत के, कभी भविष्य के, कभी आत्मग्लानि के, कभी अहंकार के, वह साक्षी भाव से सभी को देखा करती है. उनके भीतर कितना कुछ भरा पड़ा है. एक ब्रहमांड बाहर है तो एक उनके भीतर भी है. कभी-कभी ध्यान में कुछ चेहरे दीखते हैं, कौन हैं वे, शायद उसके किसी पिछले जन्म के परिचित या उसके स्वयं के चेहरे ! उस दिन कैसा अजीब स्वप्न देखा था, एक पौधे के तनों के सिरों पर जानवरों के चेहरे, पौधा और जन्तु एक साथ. पौधा जैसे कीट बन गया था या कीट जैसे पौधा बन गया था. उसे यह बताने के लिए स्वप्न आया होगा कि द्वैत नहीं है. सब एक ही है. उस दिन आश्रम में भी तो यही विचार बार-बार मूर्त होता हुआ लग रहा था कि सभी कुछ एक ही तत्व से बना है, एक ही तत्व भिन्न-भिन्न रूपों में प्रगट हो रहा है. सब उसी एक आत्मा का विस्तार है. दृष्टिकोण यदि विशाल हो तो सारे छोटे-छोटे भेद, दुःख, दर्द खत्म हो जाते हैं. सद्गुरु उन्हें इसी विशाल दृष्टि को अपनाने को कहते हैं. मेरे-तेरा का झगड़ा अब बहुत हो चुका, अब तो उत्सव की बेला है, अमृत बरस रहा है, ज्योति जल रही है, प्रकाश में नहाना है तथा अमृत छकना है. भीतर तृप्ति तभी मिलेगी, नहीं तो जगत के सामान भरते-भरते उम्र निकल जाएगी और हाथ कुछ भी नहीं आएगा. उनके सम्मुख हर क्षण दो रास्ते होते हैं, एक प्रेय दूसरा श्रेय, चुनाव उन्हें करना है तभी कल्याण होगा !

जून आज आ गये हैं, उनका गला खराब है, इस समय आराम कर रहे हैं. आज सुबह वह देर से उठी, रात को देर तक पढ़ती रही फिर कुछ देर ध्यान किया और सुबह स्वप्न देखती रही. सद्गुरु कहते हैं जैसे ही नींद खुले उठ जाना चाहिए, सोये रहना ठीक नहीं है, तमस बढ़ता है, प्रमाद ही मृत्यु है. आज पढ़ा कि आयु मिली है ईश्वर की प्राप्ति के लिए, वे व्यर्थ ही सोकर गंवा देते हैं, उतनी देर ध्यान –भजन करें तो यह कमाई होगी. उसे ईश्वर ने कितनी सुविधाएँ दी हैं ध्यान-भजन के लिए, आजकल तो विशेष रूप से, थोड़ा सा घर का काम और हाथ में ढेर सारा समय परमात्मा को याद करने के लिए. आज दो घंटे ध्यान करने का प्रयत्न किया, पता नहीं कितनी देर वास्तव में ध्यान घटित हुआ. मन आजकल वश में नहीं रहता, यहाँ तक कि क्रिया के वक्त भी इधर-उधर भाग जाता है, वह शेष समय उस पर ध्यान नहीं देती शायद इसीलिए ! गुरुमाँ ने कहा था कि जो विचारों से मुक्त है वही  मुक्त है. अब से मन पर ज्यादा ध्यान रखेगी. आज यहाँ कई दिनों बाद धूप निकली हाई. पहली बार एसी चलाया इस वर्ष. पहली बार टिंडे बने हैं. जून दिल्ली से लाये हैं, भिस, टिंडे तथा बेबी कॉर्न. कल दीदी का फोन आया था, परसों जीजाजी से बात की उन्हें लगा कि उसके भीतर वैराग्य ज्यादा ही जाग रहा है. उसकी एक सखी का भी यही विचार है उसकी सासूजी ने बताया और इधर उसे लगता है कि राग छूटता ही नहीं, राग-द्वेष से मुक्त मन ही तो ध्यानस्थ हो सकता है. सद्गुरु कहते हैं कुछ जान के चलो, कुछ मान के चलो, वे साधना के पथ पर प्रगति कर रहे हैं यह मानना ही चाहिए तभी प्रेरणा मिलेगी.     


Sunday, November 30, 2014

कबीर का दोहा


इस समय एक तरफ तो धूप निकली है दूसरी तरफ बादलों के गरजने की आवाज भी सुनाई दे रही है. सुबह-सवेरे मौसम ठंडा था, जून को सर्दी लग गयी है, सो पहले वह उठी, बाहर गयी तो हवा शीतल थी पर कल सुबह चार बजे की शीतल स्वच्छ हवा का एक झोंका भी कितना प्रफ्फुलित कर गया था. ब्रह्म मुहूर्त में उठने की महिमा यूं ही तो नहीं गयी गयी है धर्म ग्रन्थों में ! अब दोपहर के पौने एक बजे हैं, अभी कुछ देर पहले जून को बाहर तक छोड़कर आने लगी तो उन्होंने पौधों पर पड़ रही धूप की ओर ध्यान दिलाया, पौधों को टोपी से ढका अन्यथा शाम तक कुम्हला जायेंगे. जून ने वह पुस्तक भेज दी है, अगस्त का आरम्भ है यदि वर्ष के अंत तक भी छप जाये तो बड़ी बात होगी. ढेर साडी पत्रिकाएँ पड़ी हैं पढने के लिए, लिखना भी है, पत्र व इमेल भी. एक ड्रेस पर बटन टांकने हैं, अभ्यास करना है, और यह सब करना है इन सवा दो घंटों में. जागरण में आज कर्मवाद पर सुना, मानव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है पर फल भोगने के लिए नहीं, वह उसके चाहने अथवा न चाहने पर भोगना ही पड़ेगा, सो कर्म करते समय प्रतिक्षण सजग रहना होगा. उस वक्त वह जीनिया के सूखे फूलों से बीज निकाल कर अलग कर रही थी, इस कर्म का फल तो रंगीन ही होने वाला है. ‘आत्मा’ में गीता के ‘प्रथम अध्याय’ पर चर्चा हुई, मन ज्ञानियों की सी बातें तो बहुत करता है पर ज्ञान उसके भीतर टिकता नहीं है !

‘जब कोई उसे ढूँढ़ता है तो वह उसे नहीं मिलता पर जब वह ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाता है तो वह उसे ढूँढ़ता है !’ आज सुबह के समाचारों में जम्मू स्टेशन पर आतंकवादियों द्वारा अँधा-धुंध गोलियां चलाये जाने से दस व्यक्तियों के मरने की खबर सुनी. पिछले एक हफ्ते के अंदर यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है जिसमें निर्दोष लोगों की जान जा रही है. सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में असफल है. कुछ दिन पहले लगा था कि इस समस्या का हल शीघ्र निकल आएगा पर अब ऐसा नहीं लगता. कल शाम को बड़ी ननद को पत्र लिखा. तीन इमेल लिखे. पर सर्वर में कुछ खराबी होने के कारण भेज नहीं सकी. जून का स्वास्थ्य अभी भी पूरा ठीक नहीं है पर वह art of living का कोर्स करने के बाद काफी सचेत हो गये हैं. कल शाम से प्राणायाम का अभ्यास भी शुरू कर दिया है. वे दोनों टहलने भी गये. लाइब्रेरी से ‘झुम्पा लाहिरी’ की एक किताब लायी और हैरी पॉटर का एक और भाग. कल रात नन्हे को दस बजे ही सोने को कहा ताकि सुबह वक्त से उठ सके, सुबह उठा, तब तक गुस्सा दिखा रहा था पर स्कूल से आने तक सब भूल जायेगा. उसे इक्यानवे प्रतिशत नम्बर मिले हैं इस परीक्षा में, और पढ़ाई की जरूरत है विशेषतया गणित में.


जैसे धूँए से अग्नि छिप जाये या धूल से दर्पण ढक जाये उसी तरह मन पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहता है. यह अज्ञान तामसिक व राजसिक गुणों का परिणाम है. पिछले दिनों वह रजोगुण के अधीन रही. सात्विकता का भाव टिक नहीं रहा क्योंकि उसको टिकने का स्थान नहीं दिया. मन निर्विचार हो, निर्विकार तभी पवित्र विचारों को प्रश्रय मिल सकता है. जीवन जीते हुए ही जनक की तरह विदेह होना बहुत कठिन है. जीवन की धारा इतनी वेगवती होती है की मन को अपने साथ ले जाती है. बाबाजी ने कहा, “सुख देवे, दुःख को हरे, करे पाप का अंत, कहे कबीर वह कब मिलें, परम सनेही संत” गुरुमाँ ने कहा स्वप्न में भी साधक को सचेत रहना चाहिए, स्वप्न मन की वास्तविक स्थिति का परिचय देते हैं. जून कल तिनसुकिया गये थे, bookcase का आर्डर दे दिया, एक महीने बाद मिलेगा. 

Friday, March 22, 2013

स्क्रैम्ब्लर-हिज्जों का खेल




अचानक उसका ध्यान पर्दों पर गया तो सोचा बेडरूम के पर्दे धुलवाने चाहिए, कारपेट धुलवाने की बात भी की है धोबी से. फ्रिज में से सब्जियां धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं, पर लगता है बाजार जाने की जरूरत जल्दी नहीं पड़ेगी, बगीचे से गाजर व गोभी मिल सकती हैं. आज उसने शाम को नाश्ते में पनीर का परांठा बनाया, सो रात को देर तक भूख ही नहीं  लगी, पौने दस बजे है, उसने रोज की तरह लिखना शुरू किया है, सोचा, जून भी इसी वक्त सोने की तैयारी कर रहे होंगे. शायद उन्होंने भी ‘विविधा’ की कहानी देखी हो टीवी पर. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आना चाहता था, पर जून के न होने कि बात सुनकर नहीं आया. पड़ोस से नन्हे का मित्र आ गया था, सो वह दूर तक टहलने भी नहीं जा सकी. माली भी नहीं आया, प्लायर्स से नल खोल कर पानी दिया पौधों को फिर वैसे ही बंद किया. सुबह रजाई का गिलाफ धोकर चढाया. दिन में स्वेटर बनाया. नन्हे को स्कूल की पत्रिका के लिए कोई कविता या कहानी लिखनी है, इस समय लेटे हुए वही सोच रहा है. “ओशीन” धारावाहिक आज नहीं दिखाया जा रहा, अगले सोमवार को वह जून के साथ देखेगी. नन्हे को स्कूल में हेल्पेज के लिये बीस रूपये जमा करने थे, उसके पास दस रूपये थे, पचास वह ले जाना नहीं चाहता था, ऐसे वक्त में पड़ोसी ही तो काम आते हैं., लिखाई बिगड़ने लगी तो उसे लगा ठंड से उसकी उंगलियाँ अकड़ गयी हैं शायद, या ज्यादा देर स्वेटर बनाने से, वहाँ जून के शहर में तो इससे भी ज्यादा ठंड होगी.

रात्रि के साढे नौ बजे हैं, नन्हे ने इस वक्त उसे गुस्सा दिलाया है, काम के समय दुनिया भर के सवाल पूछता है और बातें करता है उस वक्त, जब कोई काम कहा गया हो, वैसे वह शायद रोज ही ऐसा करता हो पर आज उसे सिर में दर्द है, दोपहर को फिल्म देखी शायद इसी कारण. उसका रिपोर्ट कार्ड मिल गया है, आज वह स्कूल में पहली बार किसी टीचर के घर गया था.

बुधवार, आज बारह तारीख है, उसका मन हो रहा है जल्दी से सोने के लिए लेट जाये, शाम को बगीचे में काम किया, टहलने गयी अकेले, दोपहर को स्वेटर बनाती रही, थकान हो गयी है, जून होते तो.... अब बहुत हो गया अकेले रहना...अब बिलकुल अच्छा नहीं लगता मन करता है उससे ढेर सारी बातें करूं. उसके बिना कितने सारे काम भी तो बढ़ गए हैं न, नन्हा सो गया है, उसकी छुट्टी आज जल्दी हो गयी थी, कल भी ऐसा ही होगा, उसने कहानी लिख ली है पत्रिका के लिए.

“जिंदगी तू भी पड़ोसन की तरह लगती है
आज तोहफे में कुछ दे है तो कल मांगे है”
‘मुन्नवर राना’ का यह शेर उसे अच्छा लगा तो लिख लिया डायरी में.   

  परसों जून आ जायेंगे, सुबह से यह ख्याल आकर मन को सुकून दे गया है, उन्हें महसूस करने लगे हैं वे अब, उनकी हंसी उनका स्पर्श सब स्पष्ट हो गया है, नन्हा कह रहा है पापा के आने पर हलवा-पूरी बनाइएगा, आज दोपहर को इतने दिनों में वह पहली बार एक घंटा बेड में थी, कारण वही, नन्हा भी लेट कर टीवी देख रहा था, उसके स्कूल में आज जाते ही छुट्टी हो गयी पर वह साढ़े बारह बजे ही आ पाया, अब एक हफ्ते बाद स्कूल में पढ़ाई होगी. क्योंकि छह दिन बाद वार्षिक दिवस है. सुबह सामान्य रही सिवाय इसके कि गाजरें निकलीं गार्डन से, जून के लिए गाजर का हलवा बनाना है न, टमाटर भी मिले. उसके एक सहकर्मी सर्वोत्तम तथा आधा किलो मटर दे गए, उसने मंगाए थे. शाम को पड़ोसियों के साथ क्लब गए बीहू का कार्यक्रम था, सवा सात पर लौटे. घर आकर स्क्रेमब्लर खेलते रहे, समय का ध्यान ही नहीं रहा, खाना देर से खाया. कल टीवी पर ‘हुन हुन्शी हुन्शाराम’ गुजराती फिल्म Sदिखाई जायेगी और परसों “सूरज का सातवाँ घोड़ा”, जो वे साथ-साथ  देखेंगे. उसने मन ही मन जून से स्वप्न में आने कि बात कही, मच्छर दानी भी नहीं लगा रहे वे आज, नन्हा इस समय गुड नाईट में नई मैट लगा रहा है.