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Tuesday, June 11, 2019

पिटुनिया के फूल



आज बड़े भाई से बात हुई, बुआ व मामी जी से भी. सबको विवाह के लिए निमन्त्रण दिया. फुफेरे भाई ने कहा, वह कार्यक्रम बनाकर बतायेगा. मंझली भाभी से बात की, वह बेटी को लेकर परेशान हैं. आज से मात्र एक महीना शेष है विवाह के दिन में. आज भी वे कार्ड्स बांटने जायेंगे. परसों मुख्य अधिकारी के यहाँ से शुरुआत की. उसके बाद छह घरों में गये. पटवारी, पॉल, फूकन, बनर्जी, एक तमिल परिवार, और शर्मा परिवार में. कल भी पांच मित्रों के यहाँ गये, मराठी, बंगाली, मारवाड़ी, दो असमिया, व ब्राह्मण परिवार में, एक तरह से यहाँ पूरा भारत बसता है. हर प्रदेश के लोग यहाँ रहते हैं. सभी ने दीवाली की मिठाई खिलाई. एक परिवार में उनकी बेटी से मिले जिसने कानून में पढ़ाई पूरी कर ली है और अब एक लॉ कालेज में पढ़ाने जा रही है. सभी के घर सुसज्जित थे. सबसे सुंदर थे दो बंगाली सखियों के घर. उनके घरों की सज्जा देखने लायक थी. सुंदर फर्नीचर तथा सुंदर बगीचे रहने वालों के कलात्मक मिजाज की खबर दे रहे थे. अगले वर्ष उनमें से एक के पति रिटायर हो रहे हैं, तथा दो अन्य के इसी वर्ष. उनके लिए विवाह से लौटने के बाद कुछ लिखेगी.

दस बजने को हैं, आज भोजन पहले ही बना लिया है ताकि आराम से एक घंटा बैठकर लेखन कार्य किया जा सके. कल शाम भी वे कालोनी के दस परिवारों के यहाँ कार्ड्स देने गये. एक का घर बंद था. आज शाम को भी जाना है.

आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, इस बार बंगलूरू में उसके साथ रहने का अवसर मिला. मिलनसार है, काम में हाथ बंटता है. सीधा-सरल स्वभाव है उसका. भगवान उसे शक्ति और ज्ञान का वरदान दे ! जून का स्वास्थ्य ठीक नहीं है पर अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण वह किसी समस्या को खुद पर हावी नहीं होने देते हैं. आज शाम को अपने दफ्तर में काम करने वाली एक कर्मचारी को बुलाया है. जो कुछ परेशान है, घर से दूर अकेले रहती है, अपने शहर में तबादला करवाना चाहती है. उसे समझना और समझाना है. कल शाम भी वे कुछ मित्रों के घरों में कार्ड्स देने गये, अच्छा लग रहा है. एकाध दिन और जाना होगा. शाम को बहुत दिनों बाद बेक्ड सब्जी बनाने वाली है. आज से एलोवेरा जूस बनाना भी आरंभ करना है. इस वर्ष आंवले काफी हुए हैं बगीचे में. कुछ महीने चलेंगे.

कल कुछ नहीं लिखा और आज इस समय शाम के पांच बजे हैं, जून गोहाटी गये हैं, परसों लौटेंगे. आजकल उसे न ही फोटोग्राफी का शौक रहा है, न ही व्हाट्स एप पर संदेश भेजने का, न ही लोगों से बात करने का. वैराग्य बढ़ रहा है, सब कुछ व्यर्थ प्रतीत होता है. आज सुबह जून की बात का जवाब भी ठीक से नहीं दिया. माली को भी उसकी गलती के लिए सुनाया. हर बार वह वही गलती करता है. कल रात भी नींद ठीक नहीं आई, परसों भी. शायद देर तक जगने के कारण ही, समय से सो जाना ही उचित है. नींद पूरी न होने पर ऐसे लक्षण होने स्वाभाविक हैं. आज दोपहर को बारह-तेरह बच्चे ही आये. कल स्कूल जाना है और नर्सरी भी, जहाँ से फूलों की पौध लानी है. 

तीन बजने को हैं, यानि योग कक्षा का समय. अभी-अभी वर्षा शुरू हो गयी है. महिलाओं की संख्या कम हो सकती है. आज नर्सरी गयी थी. छह गमले खरीदे और कैलेंडुला, पिटुनिया, डहेलिया, सिल्विया और इंका की पौध. सर्दियों में फूलों से भर जायेगा बगीचा..अभी तक तो बरसात का मौसम ही चल रहा है. मृणाल ज्योति से फोन आया, बौद्धिक अक्षमता पर योग, संगीत या व्यायाम का कितना और क्या असर पड़ता है, इस पर कुछ लिखने को कहा है. उसने इसके बारे में नेट पर पढ़ा. दुनिया में बहुत जगह लोग ऐसे व्यक्तियों और बच्चों को योग सिखा रहे हैं. कल शाम को 'सीता' पुस्तक से प्रेरित होकर नन्हे और सोनू के लिए कविता लिखनी आरंभ की है. आज उसे आगे बढ़ाना है.  


Friday, March 8, 2019

चुनार का किला



सुबह-सुबह ही वे चार जन इनोवा से चुनार के लिए रवाना हुए. बनारस से चुनार के लिए कई रास्ते हैं पर उन्होंने वह चुना जो पाइप के पुल को पार करके किले तक ले जाता है. शहर से बाहर निकलते ही खेतों के मध्य से गुजरती हुई कार उन्हें मनमोहक दृश्य दिखाने लगी. आगे चलकर दुर्गा देवी का मन्दिर आया फिर शीतला माता का. पहले वे गाँव के भूतपूर्व सरपंच के घर पर रुके, आगे की यात्रा में वे साथ जाने वाले थे. उनके वृद्ध पिताजी बाहर ही बैठे थे. घर पक्का था तथा बैठक में सोफा आदि पड़ा था. उनके द्वारा परोसे मालपुए ग्रहण किये तथा नगरो बाँध की तरफ रवाना हुए. अब रास्ता रेतीला हो गया था. दोनों तरफ सूखी धरती और पत्तों से विहीन वृक्ष नजर आ रहे थे. वे सिद्धनाथ की दरी पर पहुंचे जहाँ पत्थरों की विशाल चट्टानों पर चढ़ते-उतरते मुख्य स्थान पर पहुँचे जहाँ गुफा में शिव का मन्दिर है. बरसात में यहाँ झरना बहता है पर इस वक्त सब सूखा हुआ था. गर्मी बहुत थी पर हवा चल रही थी. उन्होंने आधा घंटा वहाँ बिताया फिर स्वामी अड़गड़ानंद जी के आश्रम की ओर रवाना हुए. छोटे-बड़े वृक्षों से घिरा यह आश्रम अपनी गौशाला और बड़े हॉल के कारण प्रसिद्ध है. यहाँ हजारों की संख्या में एक साथ बैठने की व्यवस्था है. स्वामी जी इस वक्त आश्रम में नहीं थे, उनकी पुस्तक ‘यथार्थ गीता' पढ़ने की मन में आकांक्षा जगी, जिसे सरपंच जी ने पूरा करवाया. आश्रम में खिचड़ी व चूरा का प्रसाद मिला. वहाँ से चुनार के किले की तरफ रवाना हुए. रास्ते में गाँव की एक चाय की दुकान पर रुककर चाय पी तथा सरपंच जी को उनके घर उतारकर वे किले की और बढ़े. गंगा नदी पर पीपों का एक पुल बनाया गया है, जिस पर से पर जाना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव था. प्रवेश द्वार से अंदर आते ही एक वृक्ष के नीचे एक महिला रजिस्टर लेकर बैठी थीं, जिसमें उन्होंने अपने नाम लिखे. ननदोई जी पहले आ चुके थे, सो गाइड को नहीं लिया, उन्होंने सारा किला घुमाया और इसके इतिहास से भी परिचित कराया. इस किले का जिक्र ‘चन्द्रकान्ता’ में मिलता है. इसमें गहरी सुरंगें हैं, कुएं हैं, कैदियों को रखने के लिए भुतहा कैदखाने हैं. काफी डरावना इतिहास है यहाँ का. चमगादड़ों का बसेरा है. किले की हालत जर्जर हो रही है. कुछ समय पहले ही इसे पुरातत्व विभाग को सौंपा गया है. धूप तेज होती जा रही थी सो वे शीघ्र ही वापस लौट पड़े और मडुआडीह होते हुए चौकाघाट स्थित निवास पर पहुंच गये.   

कल शाम तैयार होते-होते उन्हें देर हो गयी थी और रात्रि साढ़े आठ बजे के लगभग विवाह के स्वागत स्थल पर पहुँचे. जून के एक पुराने मित्र के दो पुत्रों के विवाह का रिसेप्शन था. मित्र अब इस दुनिया में नहीं हैं पर उनकी पत्नी ने बड़े स्नेह से बुलाया है. द्वार पर सुंदर श्वेत पुष्पों की झालरें लगी हुई थीं. भीतर जाकर मंडप दो भागों में बंट जाता था. दांयी तरफ पुरुषों के लिए और बायी तरफ महिलाओं के लिए. हॉल के अंत में स्टेज बना था, सामने कुर्सियां रखी थीं. एक तरफ भोजन के स्टाल लगे थे. कुछ देर में दोनों दुल्हनें गुलाबी लहंगों में सजी हुई लायी गयीं. मित्र की पत्नी बेहद खुश थीं कि इतनी दूर से वे उनकी ख़ुशी में सम्मिलित होने आये थे. दावते वलीमा में शाकाहारी भोजन एक अलग स्थान पर परोसा गया था, जो उन्होंने ग्रहण किया. आज संध्या जून के एक अन्य पुराने प्रिय मित्र मिलने आ रहे हैं. वाराणसी की हवा में कुछ अलग बात है, यहाँ होटलों के नाम भी काफी आध्यात्मिक हैं, समर्पण होटल, अपना होटल, हनुमान चाय, कानूबाबू होटल आदि, मोदी सरकार के आने के बाद से सुबहे-बनारस कार्यक्रम आरम्भ हुआ है, जिसमें हर दिन कोई नया कलाकार अपनी कला की प्रस्तुति रखता है.

Monday, January 28, 2019

ग्रेनाईट की स्लैब



पौने ग्यारह बजे हैं सुबह के, घर में सफेदी आदि का काम शुरू हो गया है. मौसम अच्छा है, खिली हुई धूप बगीचे को और भी सुंदर बना रही है. लेकिन कमरे में भीतर तक महसूस होने वाली ठंड भी है. आज डहेलिया में पहला लाल पुष्प खिला है. किचन में ग्रेनाईट की स्लैब लगाने का काम हो रहा है. कितना शोर करती है यह मशीन और काटते हुए जो धूल उड़ती है उससे दीवारों व फर्श के साथ-साथ मजदूरों के वस्त्र तथा चेहरों पर धूल की कितनी मोटी परत चिपक गयी है. आज वे किचन का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. कल सुबह धनबाद की यात्रा पर निकलना है. कल रात एक पुराना मित्र परिवार अपने मेहमानों के साथ भोजन पर आया था, उन्हें दो कविताएँ भी सुनायीं. जून ने बहुत ठहाके भी लगाये, वह कल बेहद खुश थे. कालेज के जमाने की बातें हुईं. सखी की मेहमान के लिए उसने एक कविता लिखी, अभी टाइप करनी है, छोटी बहन की फरमाइश वाली कविता भी लिखनी है. कल उसके विवाह की पच्चीसवीं वर्षगांठ है, वह चाहती है उसके जीवन के मुख्य पड़ावों का जिक्र करती हुई एक कविता हो. शाम को क्लब जाना है, मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है.

तीन बजे हैं दोपहर के, अभी कुछ देर पहले ही सलीम ने कहा, जो मुस्लिम है और मजदूरों का मुखिया है, पंडाल भी वही लगाएगा और खाना भी वही बनाएगा. उस का अर्थ था कि घर में जो विवाह होने जा रहा है उसके लिए. सुबह कम्पनी से आये चेनमैन ने पूछा था, शादी कब है, उसने कहा, अभी देर है. उन्हें कैसे बताये कि अभी तो विवाह केवल कोर्ट में होगा बाद में ही रीतिरिवाज वाली शादी होगी और वह भी बंगलूरू में. यहाँ पर एक पार्टी ही होगी. छोटे भाई के यहाँ भी लड़के वाले आ रहे हैं, बड़ी भतीजी के रिश्ते की बात तय हो चुकी है, विवाह की तारीख आदि तय होगी. जून आज दिगबोई गये थे, दोपहर भोजन पर नहीं आये. उसने इस मौसम में पहली बार गाँठ गोभी वाले चावल बनाये थे, उनके लिए रखे थे पर मजदूरों ने जब कहा, वे ठेकेदार से पैसे न मिलने के कारण भोजन करने ही नहीं गये तो उन्हें दे दिए. उसे आश्चर्य हुआ ठेकेदार आखिर ऐसे किस काम में उलझ गया कि उसे मजदूरों के भोजन का भी ध्यान नहीं रहा. आज जून के एक सहकर्मी के पिताजी द्वारा भेजी पत्रिका ज्ञानोदय पढ़ती रही, अब उस तरह का साहित्य उसे ज्यादा आकर्षित नहीं करता. अध्यात्म से जुड़े विषय ही मन को भाते हैं. आज मृणाल ज्योति जाना था पर कुछ अव्यवस्था के चलते गाड़ी नहीं मिली. पिछले दिनों कम्पनी में कुछ अकुशल मजदूरों की भर्ती की गयी, जिन्हें काम नहीं मिला वे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, तथा तोड़-फोड़ पर उतर आये हैं. कल क्लब के वार्षिक सम्मेलन भी हो गया. जून उसे अपने साथ धनबाद ले जा रहे हैं, जहाँ उन्हें एक सेमिनार में भाग लेना है, और यही नहीं, वह चाहते हैं कि वह कार्यक्रम में भी उनके साथ सम्मिलित हो. वह अलग ही मिट्टी के बने हैं, दृढ़ और कर्मशील ! वे दोनों एकदूसरे के मित्र बन गये हैं अब. कल रात को कई बार भीतर के शोर और सन्नाटे को अनुभव किया, बिजली के बटन को जैसे कोई ऑन-ऑफ करे, वैसे ही भीतर संसार व भगवान दिखते हैं.      

Friday, May 19, 2017

वर्षा और धूप


कल भांजी की शादी भी हो गयी. आज से उसका नया जीवन आरम्भ हो रहा है. कल रात एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह ‘सत्यनारायण’ की कथा करने वाली है, पिताजी, माँ भी हैं, उन्हीं का घर है, कोई नया स्थान है, नया घर है. अभी ड्राइंग रूम में मेज पर प्रसाद का सामान ढककर रखा है, नीचे फर्श पर झाड़ू लगाकर वे चादर आदि बिछाते हैं, तभी लोग आने शुरू हो जाते हैं, वे सोफे पर ही बैठ जाते हैं और पहले ही प्रसाद खाना शुरू कर देते हैं. फिर स्वप्न आगे बढ़ता है तो लोग बैठ गये हैं, वह पढ़ना शुरू करती है. कथा की पुस्तक की जगह एक कॉपी है जिसमें कुछ श्लोक है, उनका अर्थ भी लिखा है, शरुआत एक कहानी से करना चाहती है पर लोग कहते हैं, नहीं , यह तो कथा नहीं है. वह आगे पढ़ती है, जो लिखा है वह अस्पष्ट सा है, कुछ बोलती है पर लोग संतुष्ट नहीं होते, तभी हाथ में एक सांप आ जाता है, लम्बा, चमकदार सांप, जिसका तन वह सहलाती है और उसके सिर पर हाथ फेरती है. वह डंक निकालता है, कोई पूछता है, यह काटता नहीं तो वह कहती है इसमें जहर नहीं है. तभी लोग उठने लगते हैं, हॉल लगभग खाली हो गया है, पर उसके भीतर न कोई लज्जा है, न ग्लानि, न पीड़ा, सहज आनन्द है भीतर, तभी अलार्म बजता है और नींद खुल जाती है. शिवशंकर ने गले में सर्प धारण किया है, वही सर्प उसके हाथों में कैसा पालतू बना हुआ था. यह स्वप्न इशारा करता है उसी विकार की ओर जिससे वह मुक्त होना चाहती है. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है. कल छोटे भाई ने जिस आनंद की बात कही उसी में आज मन डूबता-उतराता है, किसी अदृश्य की झलक पायी है शायद..वह कितना महान है, उस जैसे जीव पर भी उसकी कृपा बरसती है. जिसे कुछ भी नहीं पता. आज सुबह से वर्षा हो रही है. उसकी कृपा ही इन बून्दों  के रूप में बरस रही है. जीवन एक अनमोल उपहार प्रतीत होता है परमात्मा का, जिसका होना ही उसके होने का प्रमाण है ! वही तो है !

आज गुरूजी का जन्मदिन है, सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी जिस कारण टीवी पर कोई प्रसारण नहीं आ पा रहा था. सीडी लगाकर अमृत वचन सुने. आज नैनी की बिटिया का भी जन्मदिन है और छोटी भांजी का भी. दोनों को शुभकामनायें दीं. वर्षा अब थम गयी है, हल्की धूप भी नजर आ रही है. अभी कुछ देर बाद अस्पताल जाना है, कल नर्सिंग डे था, टाफीस् रखी हैं पर्स में, सम्भव हुआ तो सिस्टर्स को देगी. घर से पिताजी का फोन आया, नन्हे से बात करना चाहते थे, बिजली का बिल जमा करने जा रहे थे. अपने को स्वस्थ रखने में वह सफल हुए हैं. छोटी ननद का फोन आया, बड़ी का स्वास्थ्य परसों बिगड़ गया था, वह बेटी के विवाह में बहुत थक गयी है. जहाँ वे ठहरे हैं, विवाहस्थल वहाँ से काफी दूर है. उसकी कल की रात भी स्वप्न लेकर आई, अस्तित्त्व उसे सचेत करने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता और वह हमेशा चूक जाती है. कल रात जून जल्दी सो गये, आजकल वह पिताजी की देखभाल बहुत प्रेम से कर रहे हैं, उनके दिमाग में एक ही बात है. पिताजी का स्वास्थ्य पहले से बेहतर है, ऐसा उन्होंने बताया. जिजीविषा ही है जो मानव को बड़े रोगों से लड़ने में सहायता देती है, हो सकता है उनके भीतर की इच्छा शक्ति इस रोग से उन्हें मुक्त कर दे और वे एक बार नये घर भी जा सकें और यात्रा पर भी. ईश्वर की कृपा अनंत है..कल रात उसे दो बार अनुभव हुआ जैसे मुँह से श्वास छोड़ रही है, जैसे पिताजी अक्सर करते हैं. सभी ऐसा करते होंगे नींद में. वे खुद को सोते हुए कहाँ देख पाते हैं, वे दूसरों के निर्णायक बहुत जल्दी बन जाते हैं. उनके वश में कुछ भी तो नहीं है, परमात्मा की बनाई इस सृष्टि में सब कुछ अपने आप घटित हो रहा है. उन्हें उसकी स्मृति से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. मन को शून्य में समाहित करना होगा, सत्य ही उनका एकमात्र आश्रय हो..उससे कभी च्युत न हों वे..

Wednesday, February 22, 2017

ओले और वर्षा


नया वर्ष आरम्भ हुए दस दिन हो गये और आज पहली बार लिखने का समय मिला है. आजकल दिन अस्पताल और घर दोनों जगह की खोजखबर लेते ही बीत जाता है. सुबह सवा चार पर नींद खुली, मन में विचारों का ताँता लगा था, अब तो विचार चित्रों के रूप में दीखते हैं और सजग होते ही न जाने कहाँ खो जाते हैं. साक्षी भाव का अनुभव साधना है, अन्यथा मन में उठने वाली छोटी सी लहर भी तरंगित कर देती है. किसी विचार को रोकने जाओ तो वह टिक जाता है क्योंकि उसे ऊर्जा दे दी, सम्मान दे दिया. विचार रास्ते पर गुजर जाने वाले वाहनों जैसे ही हैं, जो आते हैं और चले जाते हैं. नदी की धारा में बहने वाले सामानों जैसे भी, आकाश पर उड़ने वाले बादलों जैसे भी, जो अभी हैं और अभी नहीं. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है सो कुछ भी सत्य नहीं है, जो इनका साक्षी है बस एकमात्र वही सत्य है. उसमें टिकना आ जाये तो मन स्वतः शांत हो जाता है.

कई दिनों से हो रही वर्षा के कारण ठंड बहुत बढ़ गयी है. पूरे देश में ही वर्षा, बर्फ, ओले व कोहरे का प्रकोप जारी है. सर्दियों का मौसम अपनी पूरी सेना लेकर आया है. सद्गुरू को सुना, सहज भाव से प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे. सहज रहना तभी सम्भव है जब किसी को कर्म के फल के प्रति आसक्ति न हो. सहजता. सरलता यदि स्वभाव बन जाये तो परमात्मा दूर नहीं है. वह हर क्षण उनके साथ है, वे ही अपनी नासमझी में उसे भुलाकर ढूँढने का नाटक करते हैं. जैसे कोई चश्मा नाक पर लगाकर खोजने का प्रयास करे. उसके सिवाय उन्हें कुछ चाहिए भी नहीं, फिर भी इधर-उधर हाथ-पांव मारते हैं, वही उनका सुहृद है, हितैषी है, यह मानते हुए भी दुनिया का मुँह तकते हैं. उसने उन्हें दाता बनाया है, वे दाता हैं, फिर क्यों मंगते बनें. उसने ‘एक जीवन एक कहानी’  पुनः लिखना शुरू किया है. अन्य पुरुष में लिखना ही ठीक रहेगा.

जून आज बड़ी ननद की बड़ी बेटी की शादी में सम्मिलित होने चले गये, भांजी की शादी में उसका जाना तो सम्भव नहीं है. नन्हा वहाँ पहले से ही पहुंच गया है. कल विवाह है. दोपहर बाद वह अस्पताल गयी, सिक्योरिटी गार्ड्स को बीहू के लिए तिल के लड्डू दिए. पिताजी ने कहा, उसकी एक सखी ने फोन करके कहा है, वह सुबह उन्हें अस्पताल से घर ले जाने आएगी, उन्हें अच्छा लगा है. माँ आज भी बेचैन लग रही थीं. उन्हें तकलीफ हो रही है, पर शब्दों में कह नहीं पाती हैं.  

दो दिनों का अन्तराल. जून आज आ रहे हैं. सुबह गहरा ध्यान लगा. अब जबकि ध्यान सधने लगा है, लगता है उसे ध्यान करना आता भी है या नहीं. उसे कुछ भी नहीं पता, ऐसा भाव भी होता है. परमात्मा ही जाने क्या हो रहा है, वह तो अब है ही नहीं, यदि वास्तव में ऐसा है तो यह लिख कौन रहा है, लिखने वाला हाथ है, कलम है, देह है, मन है, बुद्धि है, पर ये सब तो वह नहीं है. जो वह है वह निराकार है, शुद्ध चैतन्य है. आज एक लेखिका व ब्लॉगर महिला का संदेश फेसबुक पर आया है. वह उसकी कविताएँ अपने अगले कविता संग्रह में छापना चाहती हैं ! उसने दीदी की बड़ी बिटिया के लिए कार्ड बनाया उसके विवाह की सालगिरह है आज, एक कविता भी लिखी. शाम को एक विवाह में भी जाना है, हो सका तो उसके लिए भी एक कविता लिखनी है. जून माँ के इलाज के सिलसिले में आज डिब्रूगढ़ गये हैं.

एक परिचिता का फोन आया, उनके बेटे की मंगनी हो गयी, उन्हें कल ही फेसबुक से पता चल गया था. रात को लौटे जून और अभी माँ के लिए दोपहर का भोजन ले गये हैं, अब दो दिन उसे अकेले रहना है परमात्मा के साथ, ‘वह’ ही रहे नूना न रहे अब ऐसा ही भाव होता है. दीदी ने उसका चौथा ब्लॉग भी पढ़ना शुरू किया है. धीरे-धीरे और भी पाठक मिलेंगे. आज धूप कितनी तेज है, बैठा नहीं जा रहा है. कल सिहरन हो रही थी, ऐसा ही जीवन है कभी धूप कभी छांव. एक और भी जीवन है, महाजीवन..जो सदा एकरस है. मधुमय और ज्योतिर्मय..कल एक पुरानी परिचिता से वर्षों बाद मिली, उन्हें अब तक उसकी कविता की स्मृति थी. कविता दिल से निकलती है और दिल परमात्मा से..परमात्मा प्रेम से..प्रेम अमर है सो कविता भी अमर है !


Saturday, October 15, 2016

गुलाब वाटिका


पौने तीन बजने को हैं थोड़ी देर में कार आ जाएगी और वह मार्केट जाएगी फिर वहीँ से उन वृद्धा आंटी से मिलने जाएगी, जिनके भाई का देहांत परसों ब्लड कैंसर से हो गया, अन्य कई रोग भी उन्हें सता रहे थे. बुढ़ापा अपने-आप में एक रोग है. उसके खुद के दांत में भी पिछले कुछ दिनों से थोड़ा दर्द है, यथा सम्भव मुंह व दांत साफ रखने की चेष्टा करती है, शेष जो हो सो हो. कल ब्लॉग पर एक हास्य कविता पोस्ट की, नन्हे को पसंद आई. कल नन्हे ने एसी से आने वाली गंध का कारगर इलाज बताया, बच्चों का दिमाग यकीनन तेज चलता है. उसका दिमाग तो अब एक ही ट्रैक पर चलता है. ध्यान का अनुभव जिसे एक बार हो जाये उसे ऐसा ही होता होगा. अब इस जगत की किसी भी वस्तु में कोई रूचि नहीं रह गयी है, सब खेल लगता है. उनके भीतर एक और जगत है, फूल उतने ही सुंदर हैं भीतर और आकाश उतना ही विशाल..लेकिन सद्गुरू की बात मानकर साधना, सत्संग, सेवा व स्वाध्याय फिर भी जारी रखने होंगे. साधना करने में अब केवल ध्यान में ही रूचि रह गयी है, ज्ञान सुनने की जगह भीतर का सन्नाटा सुनना भाता है. कल से पिताजी आ रहे हैं तो वैसे भी उनकी दिनचर्या बदल जाएगी. आज सुबह नृत्य उतर आया था और कुछ शब्द भी..कुछ पंक्तियाँ बाद में लिखीं पर जो शब्द स्वत: फूट रहे थे वे बाद में याद नहीं रहते. सुबह गुलाब वाटिका में टहलने गयी, माली, सफाई कर्मचारी सभी अपने-अपने काम में लगे थे. एक बूढ़ी महिला घास काट रही थी, उससे बात की तो कितनी खुश हो गयी. उस बगीचे के माली फूलों के बीज सुखा रहे थे, उसने भी गेंदे के फूल सुखाने को रखे हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है, कण-कण में वही तो है, वह परमात्मा उसका अपना है !

आज बड़े भाई-भाभी के विवाह की सालगिरह है, तीन दशक हो गये उनके विवाह को, भाई दो वर्ष बाद रिटायर हो जायेंगे. उनसे बात की, आज छुट्टी है, भाई की तबियत ठीक नहीं है, सोये थे. उसने उन्हें कार्ड में कविता भेजी थी, लेकिन मन भी तो प्रफ्फुलित होना चाहिए तभी कविता भाती है. जीवन का आनन्द क्या है इसका पता ही नहीं चल पाता कि जिन्दगी हाथ से फिसल जाती है. कल छोटी बहन को भी एक कविता भेजी. मौसम बदल रहा है, अब वे आंवले-लौकी-एलोवेरा का जूस पीना शुरू कर सकते हैं. कल सुबह उसने मन को खुली छूट दे दी थी, सुबह टहलने गयी दोपहर बाद बाजार..भगवान कृष्ण  कहते हैं जो सब जगह उन्हें ही देखता है वही देखता है, यदि ब्रह्म उनका मूल है तो एक अर्थ में वे भी वही हैं. मूल से ही फूल होता है, दोनों को एक साथ ही देखना होगा, समग्रता में. डाल से टूटा फूल कब तक रहेगा. आज पिताजी आ रहे हैं, अगले कुछ दिनों तक वे व्यस्त रहेंगे, जीवन का एक नया रंग प्रसुत होगा. आज बगीचे में कुछ काम करवाया. उसकी ऊर्जा इन्हीं छोटे-मोटे कामों में ही लग रही है, कुछ बड़ा काम उसके हाथों से होने वाला नहीं है, लेकिन सद्गुरु कहते हैं जो भी काम हो यदि उसे निष्काम भाव से किया जाये तो वह भी मुक्त करता है. सुबह से रात्रि तक मन समता में रह पाता है या नहीं इस बात पर निर्भर करता है उनका विकास, लेकिन मन यदि इस कामना से पीड़ित हो कि उसे कुछ महान कार्य करना है तो वह कामना ही बंधन का कारण बनेगी. कर्म कर्ता भाव से मुक्त होने के लिए ही है न कि कर्म करके कुछ बन जाने के लिए. उनके भीतर एक तृप्ति का अहसास हो, संतुष्टि हो और आनंद हो, वही प्राप्य है !

पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा, उस दिन दोपहर ढाई बजे पिताजी आ गये थे, आज उन्हें आये पांचवा दिन है. उन्हें यहाँ रहना अच्छा लग रहा है पर और पांच दिन रह कर वापस जायेंगे ही. आज एक सखी के विवाह की वर्षगांठ है, वे सभी पार्टी में जाएँगे.  



Tuesday, September 27, 2016

कांगड़ी की आग


यहाँ इस कमरे में झींगुर की आवाज आ रही है. उसके भीतर कुछ पंक्तियाँ गूँज रही हैं.
तुमने ही सींचा है दुःख को
निज प्राणों से सींचा है
साहस करके छोड़ उसे दो
जिसको खुद ही भींचा है
तुमने ही जो राह बनायी
तुम्हीं उसे मिटा सकते हो
काँटों से जो भरी हुई है
तुम्हीं उसे तज सकते हो
खोज रहे हो जिसे जगत में
वह न कभी पा सकते हो
कठिन सही भीतर जाना पर
तुम ही तो जा सकते हो
उलझे हुए हैं सारे रस्ते
जो भी बाहर जाते हैं
एक ही रस्ता भीतर को है
जिस पर संत सभी आते हैं
विधियाँ सारी बाहर-बाहर
छिपा खजाना भीतर है
जब तक स्वयं को खो न डालो
खुद को न पा सकते तुम
स्वयं को खोकर स्वयं को पाते
यह सब प्रश्नों का उत्तर है !

जीवन को यदि एक सुमधुर संगीत में बदलना हो, एक सुंदर चित्र में बदलना हो या एक कविता में ढालना हो तो जीवन में एक लय की बहुत आवश्यकता है. एक नियम, एक मर्यादा का यदि पालन नहीं किया तो जीवन एक अभिशाप बन जाता है. सभी कुछ समय पर हो तथा सभी कृत्यों को सम्मान मिले. यहाँ कुछ भी हेय नहीं है. प्रातः काल उठना भी जरूरी है और रात्रि को समय पर सोना भी. दिन में आधा घंटा विश्राम भी जरूरी है और नियमित व्यायाम भी. जीवन का एक ही पक्ष यदि दृढ़ हो शेष नहीं तो जीवन बेडौल हो जायेगा. कल दोपहर से देर रात्रि तक वह अस्वस्थ थी, कारण थी मर्यादाहीनता. पिछले दिनों दिनचर्या सुचारुरूप से नहीं चल पाई, कभी देर तक पुस्तक लेकर बैठी ही रह गयी, कभी बिना भूख लगे ही क्योंकि समय हो गया था, भोजन कर लिया, कभी अधिक खा लिया, कभी कोई मिलने वाला आ गया तो चाय ज्यादा हो गयी. आज सब कुछ नियमित चल रहा है. पिछले दिनों नियमित साधना भी नहीं की, मन कुछ ज्यादा ही वाचाल हो गया है, उसे साधना होगा, नियमित ध्यान बहुत जरूरी है. जून कल मुंबई से लौट आयेंगे. मौसम अच्छा हो गया है. दिसम्बर की धूप भाने लगी है, पिछले बरामदे में बैठे हुए उसके पैरों पर धूप पड़ रही है, जो सुहा रही है, तेज नहीं लग रही. अस्वस्थता उन्हें स्वास्थ्य की कद्र कराती है, स्वस्थ होने पर वे लापरवाह हो जाते हैं. आज सुबह बड़ी भाभी व भतीजी से बात की, उसका जन्मदिन था. सर्दियों में पिछवाड़े नैनी क्वार्टर्स से कितनी आवाजें सुनाई पड़ती हैं, सब घर के ठंडे कमरे छोडकर बाहर धूप में आ जाते हैं. यूरोप में ठंड बढती जा रही है, काश्मीर में लोग कांगड़ी खरीद रहे हैं, गर्म अंगारों को फिरन के भीतर रखते हैं, मौसम की मार से बचने के लिए आग को अपनी देह के साथ सटा कर रखते हैं. जीवन कितना विचित्र है, महाश्चर्य है.

इसी महीने मंझले भाई व भाभी के विवाह की पचीसवीं सालगिरह है. उनके लिए एक कविता लिखनी है. दोनों का विवाह भी अनोखी परिस्थितियों में हुआ. बड़ी भाभी की छोटी बहन से विवाह का शुरू में विरोध हुआ था, घर में किसी को भी पसंद नहीं आया था यह कार्य. लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया और अब तो सभी को लगता है दोनों एक-दूजे के लिए बने थे. दोनों की एक बेटी है जो होशियार है, धीर-गंभीर है. अपना घर है, धन-दौलत है, कोई कमी नहीं है. भाई ने इंजीनियरिंग की, भाभी ने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से पढ़ाई की, कुछ वर्ष नौकरी भी की विवाह से पूर्व. देखते-देखते समय बीत गया और आज पच्चीस वर्ष हो गये हैं.


Saturday, July 30, 2016

चाट का स्टाल


आज उनके घर में इस ध्यान कक्ष में ‘सहज समाधि’ कोर्स का पहला भाग सम्पन्न हुआ ! सद्गुरु की कृपा उनके शहर पर हुई है उनके घर पर भी हुई है, उन सब पर हुई है. सदा से ही थी पर वे उसे  अनुभव कर सकें ऐसी पात्रता भी तो चाहिए ! आज सुबह उसने गुरू पूजा की तैयारी की, ठीक समय पर टीचर आ गयीं, कुल उन्नीस साधक हो गये, तीन ने पहले ही कोर्स कर लिया था, उसे और पिताजी को मिलाकर सोलह ने दीक्षा ली. पहले सहज समाधि का अर्थ बताया फिर मस्तिष्क की कार्य प्रणाली, फिर तनाव का कारण..और फिर एक-एक करके मन्त्र दिए. सात बार मौन होकर जाप करने को कहा, बीच-बीच में सात सामान्य श्वास लेनी हैं. उसे छोटा सा मन्त्र मिला है, सुंदर है, हो सकता है सभी को यही देते हों, क्योंकि किसी को बताना तो है नहीं, है न गुरूजी का ट्रेड सीक्रेट ! बहुत अच्छी तरह सारा कार्य हो गया, अब कल सुबह नौ बजे से एक घंटा ध्यान होगा तथा परसों भी. उसने कल कितनी जगह फोन किये लेकिन दो महिलाओं को छोड़कर कोई नहीं आया, जो लोग एडवांस कोर्स कर रहे हैं, उनमें से ही अन्य सभी लोग आये. जून अभी तक फील्ड से नहीं आये हैं, सम्भवतः अब आ रहे हों. आज कितना हल्का-हल्का लग रहा है, वैसे तो रोज ही लगता है पर आज सद्गुरु का एक काम उनके घर पर हुआ, वे निमित्त हुए, आर्ट ऑफ़ लिविंग परिवार का हिस्सा तो वे थे ही आज उस पर मोहर लग गयी. आज का दिन खास है. आज पिताजी ने अपने जीवन में पहली बार मन्त्र दीक्षा ली. उन्होंने बाद में अभ्यास भी किया, उनका जीवन सफल माना जा सकता है, उम्र के अस्सीवें वर्ष में हैं पर जोश जवानों से बढ़कर है, जीवन दर्शन बहुत ऊंचा है, प्रेम भी है पर थोड़ा  क्रोध है और अभी तक परमात्मा का पूर्ण अनुभव नहीं किया है, झलकें अवश्य पायी होंगी. उसे इस क्षण लग रहा है जैसे कुछ करने को नहीं है, कृत-कृत्य हो गया है मन..प्राप्त-प्राप्तव्य हो गयी है आत्मा..   
पिछले साल इन्हीं दिनों दीदी अपने बड़े पुत्र के विवाह की तैयारी कर रही थीं और वे भी यहाँ योजना बना रहे थे कि जाना है भांजे की शादी में...
महीनों से करती तैयारी..     
भरे उमंग, उत्साह अति मन में  
सारे घर को चमका डाला
कितना कुछ नया मंगवा डाला
दुकानों में जातीं लम्बी फेहरिस्तें
मेहमानों के आने के देखे रस्ते
साड़ियाँ, सूट और रेशमी परिधान
सपनों में आने लगे अब तो थान
कार्ड छपवाने से हाल बुक करने तक
चाट, मिठाई के स्टाल लगाने तक
सजाने हैं फूलों से आंगन और हाल     
बेटे की शादी है नहीं कोई खेल !

थोड़ी देर पहले टीचर से मिलकर आयी, उनके घर पर बचपन से ही आध्यात्मिक माहौल था. पिताजी रामकृष्ण मिशन से जुड़े थे, कई संत उनके घर आकर रुकते थे, भविष्यवाणी की थी कि वह भी अध्यात्म के पथ पर चलेंगी, पर वह ऐसा मानती थीं कि दोनों मार्ग साथ-साथ चलेंगे. सामान्य जीवन भी अपने कर्म से चलेगा और अध्यात्म का भी एक उचित स्थान रहेगा, पढ़ाई आदि उसी तरह की, लेकिन सन सतानवे में बेसिक कोर्स करने आश्रम गयीं तो वहाँ योग की टेकनीक सीखने गयी थीं पर गुरूजी से मिलने के बाद जो अनुभव हुआ, वह अविस्मरणीय था. उसने जीवन की दिशा ही बदल दी.



Sunday, July 17, 2016

बनारसी नाश्ता


मन में कितने विचार आजकल आते हैं कि भैया-भाभी के आने पर वे क्या-क्या करेंगे. उन्हें सिलसिलेवार लिख लेना ठीक होगा. मंगल की शाम उन्हें चिड़वा-मटर व मिठाई के बनारसी नाश्ते से स्वागत कर रोज गार्डन में सांध्य भ्रमण के लिए ले जायेंगे. बुधवार सुबह दलिए, परांठे व खीर के उत्तर भारतीय नाश्ते के बाद तैयार होकर सब दिगबोई जायेंगे. शाम को लौटकर कुछ आराम के बाद कोई बोर्ड गेम खेलेंगे. गुरुवार को सुबह किसी दक्षिण भारतीय नाश्ते के बाद वे फोटो सेशन करेंगे, फोटो देखना व खींचना. दोपहर का भोजन व आराम के बाद तेल का कुआं, चाय बागान, काली बाड़ी  तथा ट्रेनिंग सेंटर दिखाने ले जायेंगे. उसी शाम को एक घंटा भजन गायन व नृत्य. शुक्रवार सुबह चायनीज नाश्ते के बाद बाजार, दोपहर बाद एक पुरानी हिंदी फिल्म देखेंगे फिर जल्दी, कुछ विशेष पर हल्का भोजन करके उन्हें छोड़ने स्टेशन जायेंगे. यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो ऐसा ही होगा. पीछे वाले घर में रहने वाली नैनी की लड़की की शादी है. शोर आ रहा है, काफी इंतजाम चल रहे हैं. कभी लगता है कि यह फिजूलखर्ची है, उधार लेकर खर्चा करना कहाँ की अक्लमंदी है फिर लगता है कि इसी बहाने परिवार एकत्र होता है. विवाह की अहमियत पता चलती है, खुशियाँ बढती हैं. पिछले दो-तीन सालों से उसकी बात पक्की थी पर लगन मुहूर्त ठीक नहीं मिलता रहा होगा. उसे उसके लिए उपहार निकाल कर रखना है. ध्यान में स्मरण आया कि उन्हें डाइनिंग टेबल के लिए रनर की जरूरत है. ध्यान में खाली होना होता है, उस शून्य में न जाने कहाँ से कोई ख्याल आ जाता है, धीरे-धीरे ध्यान की समझ बढ़ने लगी है. सबसे जरूरी है श्रद्धा तथा विश्वास उस सुहृद के प्रति, शेष सब अपने आप होने लगता है. उसकी कृपा तो प्रतिक्षण बरस रही है वह मन चाहिए जो सुमन हो ! जिसमें स्वयं के उद्धार की कामना जग गयी हो. जून आज जल्दी आने वाले हैं. कल रात उन्होंने कितनी सुंदर बात कही कि कहीं वही तो उसकी आत्मा नहीं है ? वह भी बदल रहे हैं, भक्ति का रंग उन पर भी चढ़ रहा है. सद्गुरु से दृष्टि मिली या नहीं पर उनकी कृपा अवश्य हो रही है. उसकी प्रार्थनाओं का असर भी..
दो बजे हैं दोपहर के, भैया-भाभी की फ्लाइट डिब्रूगढ़ में उतर चुकी होगी, और एक-डेढ़ घंटे में वे यहाँ पहुंच जायेंगे ! वे कितने दिनों से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. रिश्तों की मिठास अनोखी होती है. उसने उनके स्वागत के लिए तिलक व आरती का प्रबंध किया है. आज मौसम भी खुशनुमा है, चैत का पहला नवरात्र भी है. आज सुबह-सुबह एक नवरात्र अच्छी कविता पढ़ने को मिली. शायद तभी शब्द सहज ही उतर रहे हैं डायरी में-
भैया-भाभी आ रहे, बिटियों के संग आज
दिल में उठी उमंग का, एक यही तो राज !
छोटी भाभी साथ है, दुगना है उल्लास
पलक पांवड़े बिछ रहे, वन में खिला पलास !
दिल्ली व आसाम का, हुआ मिलन है आज,
शुभ दिन आया शुभ घड़ी, हुआ चैत आगाज !
सुमन खिले चहुँ दिशा में, ऋतु नरेश का राज
हर्षित है आराधिका, रेखा क्षितिज की लाल !

Friday, January 29, 2016

हुम्मस की रेसिपी


आज ध्यान में पूरा एक घंटा नहीं बैठ सकी, नाश्ता करने के बाद कुछ भारीपन लग रहा था और ठंड भी. लेकिन ध्यान का अनुभव अच्छा था. श्वेत रंग का प्रकाश दिखा तथा सोहम् की धुन सुनाई दी. भीतर कितनी ध्वनियाँ तथा कितने प्रकाश छिपे हैं, वे बाहर ही देखते हैं बाहर का सुनते हैं, जो एक ही जैसा है पर भीतर की दुनिया अचरज से भरी है. भीतर का सब कुछ नया है अभी उसके लिए, हर पल कुछ नया ही होता है. कल शाम ऑयल पर हिंदी में लिखे एक लेख को वे थोड़ा ठीक-ठाक करते रहे, जून उसकी कविता भी दे रहे हैं क्योंकि स्वर्ण जयंती के अवसर पर प्रकाशित होने वाली पत्रिका में हिंदी में लिखे लेख बहुत कम मिल पाए हैं. उसे भी ऑयल से जुड़े किसी विषय पर एक लेख लिखना है, जून से सहायता लेनी होगी. नैनी की बेटी के रोने की आवाज आ रही है, उसके पैर पर लगी चोट पर उसके पिता पट्टी बाँध रहे हैं. नैनी अपने बेटे को प्यार से पुकार रही है, प्रेम कहीं भी हो सब सुंदर कर देता है. आज धूप खिली है. उसने ‘हुम्मस’ बनाया है, काबुली चने की अरब देश में खायी जाने वाली चटनी, पर वैसा नहीं बना है, उसे और पीसने की आवश्यकता है सम्भवतः. आज गुरूजी ने ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर बोलना शुरू किया है. दम्भ, अहंकार, आसक्ति बाँधते हैं, वे निर्दोष भाव में रहकर स्वयं को मुक्त रख सकते हैं. जहाँ कोई अहंकार न हो, प्रेम ही झलकता हो, सहज प्रेम जिसमें कोई प्रदर्शन नहीं है. मुम्बई में बाबा रामदेवजी का योग विज्ञान शिविर चल रहा है, जहाँ एक जैन मुनि भी आये थे. कितना सुंदर भाषण उन्होंने दिया. देश में सौ करोड़ की लागत से पुराने ऐसे स्थान नये बनाये जा रहे हैं जहाँ पशुओं की हत्या की जाती है. जो लोग ऐसा जघन्य काम करते हैं, वे स्वयं भी पशु योनि में जन्म लेते हैं तथा मारे जाते हैं.

आज फिर धूप गायब है, लेकिन भीतर का सूरज खिला है ध्यान का, प्रेम का, मस्ती का और रचनात्मकता का सूरज ! दस बजने को हैं, जब तक बच्चे आते हैं, उसे कुछ खास कार्य करने हैं. बुआजी तथा फुफेरी बहन को फोन करना है. दीदी को भी उनकी सुखद यात्रा के लिए शुभकामनायें देनी हैं वह कल दुबई जा रही हैं, कोहरे के कारण फ्लाइट लेट भी हो सकती है, तथा नया लेख लिखने की तैयारी करनी है. अभी-अभी फोन पर बात की, फुफेरी बहन बीमार होने पर भी उत्साह से भरी है. उसके दोनों गुर्दे खराब हो गये हैं, पर जीने का उत्साह जरा भी घटा नहीं है. जिजीविषा ही है जो भयानक से भयानक रोग से लड़ने की शक्ति भीतर भर देती है. नैनी की बेटी पढ़ने आ गयी है, गाना गाते-गाते गृह कार्य कर रही है. आज लंच में मकई की रोटी बनानी है, सरसों की जगह मूली का साग.


आज भी कल के सूत्रों को आगे बढ़ाया गुरूजी ने, जो भक्त होता है वह स्थूल जगत को आनन्दित करता ही है, सूक्ष्म जगत को भी प्रभावित करता है. आज जून ने सिन्धी साईं दादा जेपी वासवानी के बताये तीन वाक्य बोले- God is with me, God is watching me, God is witnessing me. वह भी धीरे-धीरे रंग ही जायेंगे, आखिर कब तक कोई परमात्मा से दूर रह सकता है. वे अपना जीवन तभी तो प्रेममय तथा शांतिमय बना सकते हैं जब विकारों से दूर हों ! ..और विकारों से दूर होने की शक्ति उन्हें परमात्मा से मिलती है, जब उसके प्रेम का अहसास होता है. इस क्षण मन शांत है, अभी-अभी ध्यान करके उठी है, कुछ दृश्य बिलकुल स्पष्ट दीखते हैं ध्यान में सामान्य अवस्था से भी स्पष्ट, भीतर ही यह सारा ब्रह्मांड छिपा है. कल ‘विवाह संस्कार’ पर कुछ लाइनें लिखीं. कल्याण के संस्कार विशेषांक से पढ़कर. पति-पत्नी को एक मन होना ही चाहिए नहीं तो सिवाय तनाव के कुछ हाथ नहीं आता, लेकिन सत्य का आश्रय लेकर ही, अन्याय में गलत कार्य में साथ दिया तो दुःख ही मिलेगा.. इस हफ्ते कई विवाह कार्ड मिले, सभी को बधाई संदेश भी भेजने हैं. इस ठंड में भी बच्चे पढ़ने आये हैं, ज्ञान पाने की इच्छा मानव में नैसर्गिक रूप से होती है. 

Tuesday, June 23, 2015

विवाह की धूमधाम


मकर संक्रांति के दिन वे यात्रा पर निकले थे और दो हफ्ते बाद वापस आये, सो आज कई दिनों के बाद डायरी खोली है. सभी से मिलकर अच्छा लगा, बड़ी भांजी की शादी भी भली प्रकार से हो गयी. उन्होंने नये-नये स्थान देखे, पुराने मित्रों से मिले. कुल मिलाकर दो हफ्ते उनके लिए उम्मीदों व आशाओं से भरे थे. कभी-कभार ऐसे पल भी आए जब मन चिन्तन में लीन था. संगति का असर पड़ना स्वाभाविक था, लोभ भी जगा, कामना भी उठी. नये वस्त्रों की चाह उठी, संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी. चमचमाते बाजार देखकर खरीदने की इच्छा उठी, पर अब अपने पुनः अपने घर लौट आये हैं. यात्रा  बहुत कुछ सिखाती है, बीच-बीच में समय मिला तो सद्गुरु के वचन भी सुने. क्रिया नियमित रूप से की. मन टिका रहा इसी कारण. प्रमाद ने घेरा अवश्य पर भीतर की आग बुझी नहीं. कल रात को एक स्वप्न देखा, जिसमें ईश्वर चर्चा चल रही थी. भीतर जिसने आत्मा को एक बार जाना है वह उससे कभी भी विलग नहीं हो सकता चाहे गला डूब संसार में उसे क्यों न रहना पड़े.

मन जिस भाव में टिकता है, समझना चाहिए उस समय वही प्रबल है. उसका मन स्मरण में न टिककर संसार में जा रहा है. कल फिल्म देखी, जस्सी का भी आकर्षण है. सद्गुरु कहते हैं अपनी परीक्षा स्वयं नहीं लेनी है. अंततः मन लौट कर वहीं तो जाता है जो उसका आश्रय है. आज सुबह सड़क दुर्घटना में डा.विद्यानिवास मिश्र के निधन का समाचार सुना, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे. ईश्वर उनके साथ सदा था, उनके भी और उनकी धर्मपत्नी के भी जिनका देहांत अभी डेढ़ महीने पूर्व ही हुआ था. आनंद के महासमुद्र में निरंतर वास करने वाली आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, नित्य है, चेतन है, अविनाशी है तथा प्रेममयी है. इसे जानते हुए यह जगत का व्यवहार उन्हें  करना है. जगत तब उन्हें छू भी नहीं सकता.


आज सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, एक संत जो भक्ति में नृत्य कर रहे थे और गा रहे थे, उसके सम्मुख आए. उनसे दृष्टि मिली, उसके देखते-देखते उनकी दृष्टि प्रखर होती गयी, आँखों की पुतलियाँ जैसे स्थिर हो गयीं और उनमें से कोई तेज निकलने लगा. उसकी आँखों तक पहुंचा और उसके सिर पर रखा दुप्पटा बल से ऊपर उठ गया और शरीर पर किसी आघात का अनुभव हुआ और अगले ही क्षण अभूतपूर्व आनंद तथा हँसी उसके सारे अस्तित्त्व से फूट पड़ी तो उसके आसपास के लोग भी चकित हो रहे थे, तभी अलार्म बजने लगा और उसकी नींद खुल गयी. आज जब ध्यान में बैठी तो निर्विचारिता के क्षण अधिक देर तक टिके तथा मौन का अनुभव भी हुआ. कितना अनोखा अनुभव था, आँखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था. आज की अनुभूति अलग थी. वैसे तो हर दिन का ध्यान अलग होता है. 

Friday, February 14, 2014

उड़िया फेस्टिवल



आज क्रिसमस ईव है और एक मित्र के विवाह की वर्षगाँठ भी. शाम को उनके यहाँ जाना है, नन्हे को क्लब जाना है, जहां बच्चों को सांता क्लाज उपहार व स्नैक्स देते हैं. आज ही उनका कम्प्यूटर भी आने वाला है. कल शाम जून ने दीदी का पत्र दिया, वह आध्यात्मिक रूप से कहीं आगे हैं. उनकी सहनशक्ति कहीं ज्यादा है, उसे लगा, इस तरह तुलना नहीं करनी चाहिए, उनका दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट है कहीं शंका की गुंजाइश नहीं जबकि वह इधर-उधर बिना पतवार की नौका की तरह डोलती रहती है. उसे उनके पत्र से कुछ जवाब तो मिले हैं पर कुछ नये सवाल भी खड़े हो गये हैं. कल जून ने शिकायत की कि उसके पास उनके लिए समय नहीं है. वह कर्त्तव्य मात्र समझकर किसी कार्य को करना नहीं चाहती पर उसे लगा जीवन में संतुलन के लिए ऐसा करना जरूरी है. कल उन्हें पिकनिक पर जाना है, दिसम्बर के महीने में गुनगुनी धूप में नदी के ठंडे पानी की छुअन, सोचकर अच्छा लगता है, माँ-पापा के आने पर उन्हें भी ले जायेंगे वे नदी के तट पर.

नये साल का आखिरी दिन...कभी तो यह साल भी नया ही था, हर वर्ष नया बनकर ही आता है और कल...यह इतिहास बन जायेगा. पिछले कई दिनों से वह कुछ नहीं लिख सकी, पिकनिक अच्छी रही, उसके अगले दिन जून तिनसुकिया गये उसके सिर में दर्द था. उनका एसी भी बनकर आ गया है. नन्हे के साथ सुबहें कैसे बीत जाती हैं पता ही नहीं चलता, आज उसके शीतावकाश का अंतिम दिन है. कल से यानि नये साल के पहले दिन से स्कूल खुल रहे हैं, जिसे आने में अब कुछ ही घंटों का वक्त रह गया है.

नये वर्ष की सुबह नशीली भी है और सुहानी भी ! सुबह अलसाये से सात बजे के थोड़ा बाद ही उठे, सभी को फोन पर नये वर्ष की शुभकामनायें दीं, सभी को उनके कार्ड्स भी मिल गये होंगे. एक उत्सव की तरह सेवइयों की खीर से नये वर्ष का स्वागत किया, उसे याद आया, धर्मयुग का विशेषांक निकलता था नये साल पर, अब तो उन्हें महीनों, वर्षों हो जाते हैं धर्मयुग पढ़े हुए. हिंदी की कोई पत्रिका वह इस वर्ष मंगाएगी, सृजनात्मक लेखन का कोर्स जो करना है. हसबैंड नाईट के लिए एक skit भी लिखनी है. पाठ और योगासन करने के बाद उसने मन ही मन संकल्प लिया है,  इन दोनों कार्यों के साथ साथ प्रतिदिन कुछ लिखेगी भी. अभी काफी काम पड़ा है लेकिन उन कामों के कारण अपने निजी कार्यों की बलि नहीं चढने देगी. जून अपनी कार को वैक्यूम क्लीन कर रहे हैं और नन्हा पास खड़े होकर खुद भी करने की जिद करके उन्हें झुंझला रहा है. कल रात जून ने प्रेस जाकर हिंदी की कम्पोजिंग का काम पूरा करा दिया. मेहमानों के आने में ग्यारह दिन का वक्त रह गया है, उसे सारे घर की सफाई करनी है और सिलाई का कार्य भी अभी शेष है. आज शाम को क्लब में ‘उड़िया टी’ का आयोजन किया गया है, उसकी उड़िया पड़ोसिन सुबह से तैयारी में व्यस्त है.




Wednesday, July 24, 2013

इम्तहान इम्तहान

पिछले चार दिन व्यस्तता में बीते. पहला दिन रविवार था, सोमवार को एक सखी के यहाँ गयी थी, शाम को नन्हे को पढ़ाने में व्यस्त थी, मंगल, बुध को शाम को खेलने भी नहीं जा पाई. आज नन्हे का पहला इम्तहान है, गणित का तैयारी ठीक हुई है, अब उसके अपने ऊपर है. जितनी चिंता उसे है उससे ज्यादा नहीं तो उतनी उन्हें भी है, जून से थोड़ी ज्यादा उसे है, अभी सोशल साइंस का पेपर बनाना है. इस तरह छोटे-छोटे इम्तहान देते वह एक दिन जिन्दगी के बड़े इम्तहान देने के योग्य भी बन जायेगा. सुबह के दस बजे हैं, अभी-अभी ‘सोना चाँदी’ पीटीवी का एक हास्य धारावाहिक देखा. आज बगीचा बहुत साफ-सुथरा लग रहा है, कल ही घास काटी गयी है. गुलाबी फूल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं. कल जून ने क्लब की पत्रिका के लिए लिखी उसकी दूसरी रचना भी टाइप कर दी है कम्प्यूटर पर. उन्होंने यह भी कहा, वह लिख सकती है और उसे कुछ कविताएँ हिंदी पत्रिकाओं को भी भेजनी चाहिएं. उसने सोचा कि उन्हें कहेगी वह सिर्फ लिख सकती है उन्हें टाइप करने, भेजने का काम उसके बस के बाहर है. वह  जानती है उसके कहने पर वे ये काम भी कर देंगे. उन्हें अगले महीने शायद मद्रास जाना पड़े, उनकी विवाह की सालगिरह पर उसे अकेले रहना होगा.
कल नन्हे ने परीक्षा में एक प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा, आते हुए भी भूल से छूट गया, बहुत देर तक परेशान था, लेकिन बाद में भूल गया, अपनी गलतियों पर देर तक दुःख मनाते रहना भी कहाँ की बुद्धिमानी है? हाँ, इतना जरुर है कि वही  गलती भविष्य में न करे. आज ठंड ज्यादा नहीं है, धूप निकली है चाहे धुंधली सी ही है. नन्हे और उसके मित्र को बस में बैठकर जब वह और पड़ोसिन लौट रहे थे तो उसने अपनी परेशानी के बारे में बताया, वह अपनी लम्बी बीमारी से घबरा गयी है. नूना को लगता है, किसी भी तरह से उसकी सहायता करे, उसने सोचा जब भी समय मिलेगा वह कुछ देर के लिए उसके पास जाएगी. उसे मेडिकल गाइड में दिल के बारे में पढ़ना भी चाहिए.
पिछले कई दिनों से कुछ नहीं लिखा. इस पल अचानक महसूस होने लगा, कहीं कुछ छूट रहा है, जो पकड़ में नहीं आ रहा. दिल में एक हौल सा उठ रहा हो जैसे, अकेलेपन का एक अहसास कचोटने लगा है. यह साल विदा लेने को है, सिर्फ तीन दिनों के बाद एक नया साल आ जायेगा कुछ नई उम्मीदें और नये सपने लिए. इस बार आने वाले साल के लिए कोई कविता नहीं लिखी, कोशिश ही नहीं की. नये वर्ष के कार्ड आने शुरू हो गये हैं जैसे उन्होंने भी सभी को भेजे हैं, उन सभी को जिन्हें इस विशाल संसार में अपना कहते हैं, जिनसे उनका  परिचय है अगर वे लोग भी न होते तो वे कितने अकेले होते....
वर्ष का अंतिम दिन, समय, शाम के सात बजे हैं. वे लोग डिश एंटीना पर ‘जी टीवी’ पर नये वर्ष के उपलक्ष में कार्यक्रम देख रहे हैं. वे बहुत खुश हैं. कल एक मित्र परिवार के साथ तिनसुकिया गये थे, खाना भी बाहर खाया, जून ने उसे एक पुलोवर उपहार में दिया, विवाह की वर्षगाँठ के लिए. आज साल के अंतिम दिन बीते साल की की बातें याद आ रही हैं, कुल मिलाकर यह वर्ष अच्छा बीता लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी हुईं जो दुखद थीं जैसे हरियाणा में हुआ अग्निकांड.





Thursday, May 16, 2013

चॉकलेट, फूल और कार्ड्स



दोपहर के पौने एक बजे हैं, वह पीछे वाले बरामदे में चटाई पर धूप में बैठी है, हल्की खुमारी वातावरण में है. भोजन के बाद उन्होंने धूप में ही विश्राम किया रोज की तरह और झपकी लग गयी, दही, खिचड़ी व मीठी गाजर की सब्जी का भी योगदान रहा होगा इस नींद में. जून ने कहा है, उनका मोजा आज पूरा कर दे, शाम को वह पहनना चाहते हैं, वह संडे मैगजीन पढ़कर ही बुनना शुरु करेगी. धूप एकाएक चली गयी है, शायद बादल का कोई बड़ा टुकड़ा सूरज के सामने आ गया है. नन्हा आज सुबह ठंड से बहुत डर रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया. उसने सोचा, अपने आप होस्टल में सभी काम कैसे कर पायेगा. कल शाम उन्होंने स्क्रेम्ब्लर खेला, वह जीत गया बहुत खुश था जीतकर.

आज सुबह कुछ वक्त “फिरदौस” देखने में गुजरा, और कुछ जमीन-आसमान. आयशा की हालत देखकर ही अशरफ को समझ आयेगी. उधर स्मृति को एक बार फिर जुगल धोखा देकर जा रहा है, बेचारा जुगल अपनी अब तक की करनी का फल भुगत रहा है. आज जून उसके लिए एक चॉकलेट लाये और बहुत स्नेह से शुभकामनायें भी दीं, उसे उम्मीद थी कि एक कार्ड भी लायेंगे, उसने शिकायत भी कर दी मजाक में ही सही कंजूस कहकर, पर उनके जाने के बाद सोचती रही, फूल, कार्ड आदि उतने महत्वपूर्ण नहीं जितना मन का प्यार. महीनों पहले से इस दिन के बारे में सोचती आ रही थी की विवाह की दसवीं सालगिरह कुछ विशेष होगी, पर रोज की तरह ही आज का दिन भी बीत जायेगा और जिन्दगी यूँ ही चलती चली जाएगी. यदि कल नन्हे का टेस्ट न होता तो आज शाम वे एक छोटी सी पार्टी का आयोजन करते. माँ-पिता और मंझले भाई की शुभकामनायें मिली हैं. अभी थोड़ी देर बाद वे शादी का अलबम देखेंगे  फिर टहलने जायेंगे जनवरी की ठंडी शामों को स्कार्फ, स्वेटर से लदे-फदे टहलने जाने का अपना ही आनन्द है.

जून की फरमाइश है, मैदे के नमकपारे बना कर रखे, अभी शुरू करने से दो बजे तक बन जायेंगे.
उसी दिन जिस दिन नमकपारे बनाये थे शाम को गिरकर नन्हे ने अपना सामने वाला दांत तोड़ लिया पूरा नहीं सिर्फ एक कोना, पर वे तीनो ही उस शाम बेहद उदास हो गये थे. जिसका असर अगले दिन भी रहा, पर शाम को लोहड़ी मनाते मनाते वे उसका दर्द भूल गये. शनी और इतवार अरुणाचल की अलौकिक सुन्दरता को निहारते गुजरे. कल यानि बीहू का अंतिम अवकाश, आराम करते हुए. आज नन्हा स्कूल गया है और जून दफ्तर. कल शाम खांसी से नन्हे को वमन हो गया, नागमणि अच्छी है रजाई का खोल खंगाल कर गयी है. अब बाकी का काम जून करेंगे, आज उसका रेस्ट डे है इस तरह के कामों के लिए. वर्षों पहले स्कूल में थी तब डायरी में यह बात लिखी थी तो उसकी सखी कितना हंसी थी, जाने कहाँ होगी अब वह ?