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Wednesday, April 6, 2022

उपनिषद गंगा


लॉक डाउन का तीसरा दौर  प्रारम्भ हो गया है। अब संक्रमण की दर बढ़ गयी है, भारत में अड़तालीस हज़ार व्यक्ति संक्रमित हो चुके हैं। अमेरिका में यह संख्या भारत से कहीं ज़्यादा है। रात्रि के सवा नौ बजे हैं, नन्हे से बात हुई, खाना बनाने की आज उसकी बारी थी, कह रहा था अभी वे लोग मेड व कुक को नहीं बुलाएँगे। खुद काम करने की आदत हो गयी है। घर भी साफ़ रहता है। अच्छा है, अपन हाथ, जगन्नाथ ! सुबह टहलते समय कुछ सुंदर जंगली गुलाबी पुष्प देखे थे, शाम को देखने गए तो वे सो गए थे, फूलों में इतना संज्ञान होता है, प्रकाश का स्पर्श उन्हें जगाता और सुलाता है। आज महाभारत में देखा भीष्म पितामह तीरों की शैया पर हैं, द्रोणाचार्य उनके पास आकर कहते हैं, वह उनसे पहले जाएँगे, कैसे महावीर थे वे लोग, मृत्यु का ज़रा भी भय नहीं था उन्हें ! जून को आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुसंधान विभाग में सेवा का कुछ काम मिल गया है। 


आज बुद्ध पूर्णिमा है, उनके वचन पढ़े, उनके उपदेशों पर आधारित दो आलेख भी लिखे। कल भागवद में कपिल मुनि द्वारा अपनी माँ देवहूति को दिये गये सांख्य शास्त्र के ज्ञान के बारे में पढ़ा था। सुबह गहरे ध्यान का अनुभव हुआ। दोपहर को वाणी का दोष हुआ तो कितनी शीघ्रता से जगाया किसी ने भीतर से। सुबह उठने से पूर्व कोई वाणी भीतर से कह रही थी, तुम वही हो ! ज्ञान उन्हें मुक्त करता है और गुरू भी ज्ञान स्वरूप है। आज नैनी काम पर नहीं आयी, उसने पूर्णिमा का उपवास रखा है ! कल असम से उसकी पुरानी नैनी का फ़ोन आया था। उनके योग ग्रुप की एक महिला का फ़ोन भी आया, जिन्हें कोर्स करने के लिए उसने बहुत बार कहा था आख़िर उन्होंने ऑर्ट ऑफ़ लिविंग  का बेसिक कोर्स ऑन लाइन किया, बहुत खुश थीं। 


आज सुबह टहलने गए तो रात की वर्षा के बाद सड़कें भीगीं थीं। मधु मालती की एक बेल और कंचन का एक वृक्ष पूरे खिले थे, उनकी तस्वीरें उतारीं। टीवी कार्यक्रम ‘उपनिषद गंगा’ में आज का अंक दारा शिकोह पर था, जिसने उपनिषदों का अध्ययन किया था। उसकी मृत्यु का दृश्य देखा, वह आत्मा का ज्ञान पाकर भीतर से मुक्त हो गया था। ‘महाभारत’ में कर्ण ने अर्जुन को मारने का अवसर गँवा दिया क्योंकि सूर्यास्त हो गया था, वह नियमों के अनुसार युद्ध करना चाहता है, संभवतः वह अर्जुन को मारना नहीं चाहता, वह जान चुका है कि अर्जुन उसका सगा भाई है। उसका जीवन कितने विरोधाभासों से घिरा है।


आज का एक दिन एक तरह से उसके लिए बहुत ख़ास है। पूरे पचपन दिनों के बाद वह जून के साथ कार से सोसाइटी के मुख्य गेट से बाहर गयी। उन्होंने एक नर्सरी से गमलों के लिए पौधे ख़रीदे। वहाँ एक भोली-भाली सी लड़की मिली, भुवनशोम की नायिका जैसी। सुबह  छोटी भांजी के स्नातक होने पर पूरे परिवार की एक ज़ूम मीटिंग हुई, अच्छा लगा। शाम को दो पुराने मित्र परिवारों को भी ज़ूम पर देखा। गुरूजी की संजय दत्त से बातचीत का वीडियो देखा। मोबाइल और कम्प्यूटर सबके जीवन का अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं। 


आज नैनी एक फार्म हाउस से, जहाँ उसका पति काम करता है, ताज़ा हरा कुम्हड़ा, आँवला और कच्चे आम लायी। कुम्हड़े की सब्ज़ी, आम की मीठी चटनी और आँवले का अचार उसने बना लिया है। शाम को निकट स्थित खेत से कच्चा कटहल लाए, पहले तो माली तोड़ने को तैयार नहीं था, कहने लगा पकने पर यही दो सौ में बिकेगा, यहाँ सभी इसे पका हुआ खाते हैं। गाँव के निकट रहने के कितने लाभ हैं। 


Wednesday, June 13, 2018

अच्छाई की कठिनाई



Just now she saw some documentary on solar system. It is amazing to see the Sun,  Moon , movement of earth and other planets. The universe is so vast and no one knows how vast it is! Only God knows but no one knows God! He only knows himself. Today she went to school, did some yoga exercices. Children love to laugh, elders also. Peace and happiness, they feel after each session is contagious. Yesterday Jun said she may go to Delhi for three-four days during world cultural festival of art of living. In the morning she saw once again the dream of nice food, she has food vasnaas, will get rid of them also with the grace of God! He is so powerful and so loving. While coming back from school, she went to see the company guest house garden. It is an amazingly beautiful garden with so many flowers at one place. Today she also saw the video of Anita Moorjani, who had cancer and went in coma, then she came back and got healed up. She experienced her true self.
अभी-अभी दीदी व बड़े भाई से बात की. ढेर सारे समाचार मिले. भाई बिटिया के घर पर रह रहे हैं, परसों नन्हे से मिलने जायेंगे. दीदी के घर छोटे बेटे की वधू तथा उसकी माँ आने वाले हैं. होली से पहले लंच पार्टी होगी. आजकल वह गुरूचरणदास की किताब पढ़ रही है ‘अच्छाई की कठिनाई’. जिसमें महाभारत के पात्रों को लेकर जीवन के मूलभूत प्रश्नों का विश्लेष्ण किया गया है. समाधि के बार में सुना, समाधि में वही जा सकता है जिसे मृत्यु का भय न हो. कल उन्हें मृणाल ज्योति जाना है. विशेष बच्चों को योग कराके ख़ुशी मिलती है. ख़ुशी बांटने से ही बढ़ती है, इसका तो पता चल चल गया है, और उनके पास है ही क्या बांटने को..वही तो एकमात्र अपनी संपदा है, ख़ुशी, प्रेम, शांति और आनन्द ...
पिछले दिनों एक स्वपन देखा, अथवा तो दृश्य देखा, पूरा होश था देखते समय कि किसी जन्म में उसका विवाह एक ऐसे परिवार में होता है जो चोरी के कर्म में लिप्त है. इसलिए भीतर चोरी के भय का संस्कार समा गया है, यदि कोई वस्तु निर्धारित स्थान पर नहीं मिलती है तो झट पहला ख्याल आता है चोरी न हो गयी हो. एक क्षण का शतांश भी नहीं लगता इस विचार को आने में पर अगले ही क्षण अपनी मूर्खता पर हँसी आती है. उनके संस्कार कितने दृढ़ होते हैं. इन्सान उनके हाथों का एक खिलौना ही तो है यदि सजग न रहे, यदि ज्ञान में स्थित न हो ! इसी तरह देह के प्रति आकर्षण का संस्कार जिसका जितना गहरा होता है, वह अन्यों को वस्तु रूप में ही देखता है, जड़ वस्तु के रूप में. चेतन का उसे बोध ही नहीं होता, मन ही मनुष्य के बंधन का कारण है ! योग वसिष्ठ में इसी बात को समझाया गया है.
पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. जून के आने पर दिनचर्या बदल जाती है, समय की सीमा का ध्यान रखना होता है. आज वह दिल्ली जा रही है. भाई लेने आयेंगे. कल वहीं से पिताजी से मिलने तीन दिनों के लिए घर जाएगी. बाद में दिल्ली में ‘विश्व सांस्कृतिक सम्मेलन’ का तीन दिन का कार्यक्रम है. आज महा शिवरात्रि है, हो सका तो रात को जागरण करेगी, कल दोपहर को फ्लाइट में सोया जा सकता है. उसकी अनुपस्थिति में भी घर में योग कक्षा चलती रहे इसका प्रबंध करके जाना है. आज एक परिचिता के यहाँ किसी काम से गयी तो उनका बगीचा देखा, बहुत सुंदर है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, कुछ देर पहले उसने मंझली भाभी से बात की थी. जून ने भाई से बात की, शाम को एयरपोर्ट से वह मेट्रो से घर ले जायेंगे. उनके घर की सफाई भी करवानी है, कल करेंगे, भाभी की स्मृति में होने वाले हवन की तैयारी भी. जब जिस वक्त जहाँ जो जरूरत होती है. अस्तित्त्व उसकी तैयारी कर ही देता है, वे निमित्त मात्र ही बनते हैं.

Monday, November 30, 2015

गीता और रामायण


जैसे ईश्वर सभी के हृदयों में निवास करता है वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति के अंतः करण में विश्वास भी होता है और संदेह भी. विश्वास बढ़ता रहे तो व्यक्ति भक्त हो जाता है और संदेह बढ़ता रहे तो जिज्ञासु और अंत में ज्ञानी. लेकिन जहाँ संदेह तो है पर ज्ञान की जिज्ञासा अभी नहीं उपजी है वह वहीं का वहीं रह जाता है. भक्ति भगवान से संबंध जोडती है ज्ञान असंग रहकर दर्शन करता है, पर जिसका हृदय बालक सा निर्दोष है वह सान्निध्य और सायुज्य दोनों पाते हैं. कल रात जून और उसकी चर्चा इस बात पर हुई कि मानव का आनन्द भौतिकता से उपजे या आध्यात्मिकता से ! इस बहस का कोई अंत होने वाला नहीं है.

आज एकादशी है. टीवी पर रामकथा आ रही है. संत पूछ रहे हैं राम-रावण युद्ध कितने दिन चला. रामायण में लिखा है कभी पढ़ा भी होगा पर उसे याद नहीं. उनकी कथा प्रकाश से भर देती है. आज उन्होंने ध्यान का महत्व भी बताया. भीतर स्वरूप अनुसन्धान ही ध्यान है. जब अपनी खबर मिलने लगती है तब परिवर्तन शुरू होता है. उनके अनुसार रामायण और महाभारत जैसे दो अंतर आँखें हैं, हरि ने जैसे उड़ने के लिए ये दो पंख दिए हैं, दो पंखों से ही जीवन की पूर्णता होती है. रामायण जीवन की पांख है और महाभारत मृत्यु की. मानव रूपी पंखी को यदि नील गगन में उड़ान भरनी है तो जीवन के साथ मृत्यु भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जीवन उजाला है तो मृत्यु रात्रि है. दिन के साथ रात न हो तो जीना कठिन हो जाये. नीरू माँ कह रही हैं की मृत्यु के बाद जो कर्मकांड किये जाते हैं उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मृतक की आत्मा के लिए की गयी प्रार्थना तो उस तक पहुंच सकती है पर भौतिक वस्तु तो वहाँ नहीं पहुंच सकती. कल दोपहर सुना कि देव योनि, प्रेत योनि तथा पशु योनि में कर्म करने का अधिकार नहीं है. कर्ता मन है और भोक्ता भी मन है. जब कर्मों की बढ़ोतरी हो जाती है तो पशु योनि मिलती है तथा जब संचित कर्म कम हो जाते हैं तब देव योनि मिलती है. आत्मज्ञान पाए बिना कर्म नष्ट नहीं होते और मानव जन्म उन्हें मिला ही इसी विशेष कार्य के लिए है.

जब तक वे द्रष्टा में सहज रूप से नहीं रहते तब तक मन की ग्रन्थि बनी रहती है और व्यर्थ ही मन विचार करता है. जैसे वे तन का उपयोग करते हैं जब जरूरत पडती है और जब जरूरत नहीं होती तब शांत होकर बैठ जाते हैं वैसे ही विचार करने की जरूरत हो तभी मन का उपयोग करें तो मनसा कर्म नहीं होंगे. आत्मा में रहना ही सुख से रहना है, निर्भय और निर्वैर रहना है, निर्विकल्प होकर रहना है ! पर आत्मा में रहना पल भर को ही होता है, जाने कहाँ से मन हावी हो जाता है, मन में जैसे कोई गहरा कुआँ हो जिसमें से विचार निकलते ही आते हैं, लाखों, करोड़ों, अरबों विचार..व्यर्थ के विचार, जो तन को भी पीड़ित करते हैं मन को भी, आखिर मन चाहता क्या है, वह स्वयं को आहत कर कैसे सुखी हो सकता है.वह स्वयं ही नकारात्मक भाव जगाता है फिर बिंधता है, उसे क्यों नहीं समझ में आता ? पर वह तो जड़ है, आत्मा चेतन है, यदि आत्मा असजग रहे तो मन इसी तरह करता रहेगा. सजग उन्हें स्वयं को होना है, वे जो मन से परे हैं. वे नादान बच्चे को घातक हथियार हाथ में लिए देखें तो क्या उसे रोकते नहीं, वे क्यों सो जाते हैं जब मन मनमानी करता है. उन्हें अपने आप पर भरोसा नहीं, तभी तो ईश्वर को पुकारते हैं. ईश्वर हँसते होंगे, उन्होंने तो उन्हें निज स्वरूप में ही रचा है. वह कहते होंगे पुकारने से पहले एक नजर खुद पर भी डाल ली होती !

उसके जीवन में प्रमाद तो साफ दिखाई पड़ता है. उसे ज्ञात है कि बड़ों का असम्मान करना गलत है, उन्हें प्रेम ही दें, आदर ही दें, आदर न दे सकें तो असम्मान तो हरगिज न करें. ऐसा करके वे अपनी ही हानि करते हैं. उनके दिल को जो दुख होगा वह व्यर्थ तो नहीं जायेगा, कर्म बंधेगा. उसका प्रमादी मन बार-बार यही गलती करता है. साधना के पथ पर सबसे बड़ी बाधा है. सद्गुरु की शरण गये बिना इससे छुटकारा नहीं, उन्होंने बताया कि जप इन दोषों से मुक्त करा सकता है. मन में जप चलता रहे तो मन शुद्ध होने लगेगा, शुद्ध मन प्रमादी नहीं होगा.

साधक को कभी भी सन्तोषी नहीं होना चाहिए. प्रेक्षा ध्यान के बारे में पढ़कर पता चला कि जिस अनुभव को वह उच्च मानती थी वह तो भूमिका से भी पूर्व की स्थिति है, भीतर इतने विकार होते हुए भी वे स्वयं को ध्यानी-ज्ञानी मानने की भूल कर बैठते हैं. आनन्द और शांति की प्राप्ति ही साधक का लक्ष्य नहीं है बल्कि मन को सारे दोषों से मुक्त करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य है. अपने से श्रेष्ठ को देखकर मुदिता, हीन को देखकर करुणा, दुष्ट के प्रति उपेक्षा तथा गुणी के प्रति प्रेम, यही उनके व्यवहार का आधार होना चाहिए, वे न तो अहंकारी बनें, न ही अन्याय के सामने झुकें, एक विनम्र प्रतिरोध की आवश्यकता है, प्रेम भरी दृढ़ता तथा सत्य के लिए कुछ भी सहने की क्षमता !  


Saturday, February 7, 2015

स्वेटर्स की धुलाई


कल शाम वह पहली बार aol के सत्संग में गयी. ॐ के उच्चारण से आरम्भ हुआ और फिर एक के बाद एक कई भजन गए गये. कृष्ण, राम, शिव और गणेश के नामों का उच्चारण संगीत के साथ श्रद्धापूर्वक किया गया. प्रसाद बंटा फिर एक महिला ने अपने अनुभव सुनाये. तेजपुर से इटानगर तक उनकी कार में गुरूजी ने सफर किया उनसे बातें की, पूरा परिवार बेहद उत्साहित व प्रसन्न था मानों उन्हें गुरू रूप में अमूल्य निधि मिल गयी हो. गुरू की महिमा ऐसी ही होती है. वापस लौटने में उसे देर हो गयी, पौने आठ बज गये जबकि चर्चा अभी जारी थी, जून को लेने भी जाना पड़ा और उन्हें इतनी देर होना भी नहीं भाया. खैर...भविष्य में क्या होगा भविष्य ही बतायेगा. रात को देर तक गुरूजी के बारे में सोचती रही. मन में कई विचार आ जा रहे थे, सब कुछ जैसे अस्पष्ट सा हो गया था. दो नावों पर पैर रखने वाले की स्थिति सम्भवतः ऐसी ही होती है. उसे अपना मार्ग स्वयं ही खोजना होगा. उपासना की भिन्न-भिन्न विधियों के जाल में स्वयं को उलझाना ठीक नहीं है. कृष्ण को अपने जीवन का आधार मानकर उससे ही ज्ञान पाना होगा. इस बार ‘महाभारत’ भी वे लाये हैं. स्टेशन पर ही मिल गया. अभी आरम्भ से पढ़ना शुरू नहीं किया है. कल द्वितीय खंड की भूमिका पढ़ी. सफाई का कार्य अभी चल रहा है, दो-एक दिन और चलेगा.

आज ‘जागरण’ में ध्यान की विधि सिखा रहे थे. सुंदर वचनों से हृदय प्रफ्फुलित हो उठा. कुछ देर संगीत अभ्यास किया फिर एक परिचिता आयीं अपने तीन-चार वर्ष के पुत्र को लेकर. जाते समय वह नन्हे के तीन-चार खिलौने लेता गया जो उसकी आदत है. अगले दिन माँ सबको वापस भिजवाती हैं. पुत्र मोह इन्सान से क्या-क्या करवाता है. आज नन्हा वाशिंग मशीन में स्वेटर धोने का कार्य कर रहा है. सभी स्वेटर धोकर अगली सर्दियों तक सहेज कर रखने होंगे. कल कुछ वस्त्र मृणाल ज्योति में देने के लिए निकाले, सोमवार को एक अन्य महिला के साथ वह वहाँ जाएगी. एक अन्य परिचिता का फोन आया, मुख्य अधिकारी की विदाई के लिए उन्हें दो कविताएँ चाहियें.


आज सुबह पौने पांच बजे उठी. जून ने मच्छरों के कारण नेट के अंदर ही क्रिया करने की तैयारी कर रखी थी जब वह ब्रश आदि करके कमरे में आयी. कल पहली बार एसी भी चलाया, गर्मी एकाएक बढ़ गयी थी. आज फिर बादल छा गये हैं. सुबह घर में सभी से बात हुई, पिताजी काफी ठीक लगे. छोटी बहन मेजर बनने वाली है मई में, उसे बधाई देनी है. गुरू माँ ने कहा, जिसके हृदय में प्रेम नहीं वह धार्मिक नहीं हो सकता, दिल में प्रेम हो, सरलता, सहजता हो, विश्वास हो तो ईश्वर की तरफ चलने के पात्र बन सकते हैं वे. ईश्वर जो उनके भीतर है उन्हें उनसे भी ज्यादा अच्छी तरह जानता है. उसे बाह्य आडम्बरों से कुछ भी लेना-देना नहीं है, वह तो मन, बुद्धि का साक्षी है. वे कितने भले हैं अथवा कितना ढोंग क्र रहे हैं, उसे सब पता है इसलिए उसके सम्मुख कोई दुराव नहीं चल सकता. खुले मन से उसे पुकारना है, खुली आँखों से उसे निहारना है. जिस मन में कोई छल न हो, जिन आँखों में कोई भ्रम न हो..  

Monday, January 19, 2015

नरेंद्र कोहली का "महासमर"


पिछले चार दिनों से डायरी नहीं खोली, तभी तामसिकता ने अपनी जड़ें गहरी कर लीं. आध्यात्मिक मार्ग पर जितना ऊंचा चलो गिरने का भय उतना ही अधिक होता है. आज सुबह भी अलार्म सुनने के बावजूद रजाई उठाने का छोटा सा कार्य हाथों ने नहीं किया क्योंकि मन अलसाया था. तन गर्मी चाहता था. देह को इतना सुविधाभोगी बनाना और मन को प्रमाद्युक्त रखना तो नीचे गिरने का साक्षात् प्रमाण है, फिर पिछले चार दिनों से सत्संग भी ठीक से नहीं सुना. डायरी में कुछ लिखा नहीं अर्थात मनन-चिन्तन भी नहीं हुआ, बल्कि पठन हुआ. पिछले दो-तीन दिन नरेंद्र कोहली जी की ग्रन्थमाला ‘महासमर’ का प्रथम भाग पढ़ती रही. महाभारत के पात्रों में कितना काम-क्रोध-लोभ-मोह भरा हुआ है, सम्भवतः उसी का प्रभाव अचेतन मन पर पड़ता रहा हो, कुछ भी हो, ये लक्षण उत्तम नहीं हैं. कल योग शिक्षक से भी भेंट हुई, क्रिया में सु-दर्शन भी हुए. आज सुबह उठाने के लिए उसने प्रार्थना भी की थी. स्वप्न में नीली आकृति भी देखी पर जब मद का राक्षस बैठ हो तो दैवी शक्तियाँ भी क्या करें. उसके पापों का ढेर जितना बड़ा है, पुण्यों का संचय उतना ही कम है, सो पाप प्रबल हैं किन्तु गुरू के चरणों में प्रार्थना करने से उनकी कृपा मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं फिर उसके आराध्य तो गुरुओं के परम गुरू कृष्ण हैं. इस क्षण से हर पल सजग रहना होगा ताकि भक्ति मार्ग की ओर बढ़ते कदम ठिठके नहीं, पीछे तो हरगिज न आयें ! आज नन्हा भी घर पर है, पिछले कुछ दिनों से वह ज्यादा गम्भीर हो गया है परीक्षा की तैयारी ठीक चल रही है, स्कूल व घर दोनों जगह ही. गणित का अभ्यास उतना ही करता जितना करना चाहिए, लेकिन ज्यादा कहने का कोई लाभ नहीं. वह स्वयं समझदार है. वह उन्हें हर हाल में प्रिय है.

आज संगीत की परीक्षा का फार्म भर दिया. अगले हफ्ते शुल्क जमा करना है. मई में परीक्षा होगी. कल वे हिंदी पुस्तकालय गये. श्रील प्रभुपाद की ‘भगवद गीता’ लायी है, वहाँ भागवद के भी सभी भाग हैं. ‘महासमर’ का प्रथम भाग भी वहीं से लायी थी. महाभारत पढ़ने के लिए योग शिक्षक ने कहा था सो पढ़ने का अवसर मिल गया है. भगवद गीता अमूल्य ग्रन्थ है. इसमें अभय को जीवन में प्रमुखता सड़ने का संदेश है. भयभीत व्यक्ति मृत्यु से पहले ही मर जाता है. भय ही व्यक्ति को जीवन में कई समझौते करने पर विवश करता है. निर्भीक व्यक्ति को कोई झुका नहीं सकता.

आज क्रिसमस है. एक सखी को शाम को चाय पर बुलाया है. फूलों से उसे प्यार है और उनके लॉन में ढेरों फूल खिले हैं. वह अपनी पुस्तक भी उसे देना चाहती है लेकिन यह सब करते हुए अहंकार की हल्की सी भावना भी नहीं आनी चाहिए. नहीं आएगी क्योंकि यह सब उसने कहाँ किया है. प्रकृति ने उससे करवाया है, इसमें उसका कोई योगदान नहीं है.

आज दोपहर उन्होंने aol के बच्चों के कोर्स ‘आर्ट एक्सेल’ की एक शिक्षिका को खाने पर बुलाया है. aol से उनका नाता धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है. मौसम आज सुहावना है. महासमर में कल पहली बार कृष्ण का उल्लेख हुआ, मन जैसे भावों से भर गया. उसका नाम अंतर में कैसी शांति भर देता है.



Friday, October 19, 2012

बड़ा दिन ठंडा सा



आज उसने तीन फाइलों का काम खत्म किया, अभी फाइनल का लेसन प्लान बनाना है. बैठे-बैठे उसकी कमर अकड़ गयी है, काफी देर से कुर्सी पर बैठी है और कपड़े सिलने में भी सीधा बैठना पड़ा, कितने ही सलवार-कमीज की सिलाई खुल गयी थी वही ठीक करती रही. लिखने का काम अभी भी बहुत है. शेष पढ़ाई तो बिलकुल नहीं हो रही है. लाइब्रेरी से कुछ किताबें ली थीं, उनसे भी नोट्स बनाने हैं.

इतवार के कारण कल टीवी पर महाभारत आया, सभी के साथ नन्हा भी बहुत शौक से देख रहा था. उन्हें एक परिचित परिवार के यहाँ जाना था, दो घंटे तो लग ही गये. आज कालेज शायद बंद है, अब न भी हो तो क्या, वह तो नहीं गयी है, लिखने का काम आज तो पूरा कर ही लेना चाहिए. आज सुबह उसने जून को पत्र लिखा, पोस्टमैन भी एक घंटे में आ जायेगा. आज उन्होंने दोपहर का भोजन जल्दी बना लिया है, अब कोई चिंता नहीं. सिर्फ लिखना और आराम करना दिन भर..पढ़ना-लिखना बस...एक बजे नन्हे को सुलाएगी, अभी बारह बजे हैं.
आज जून के पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स मिले, हमेशा की तरह मधुर से पत्र..ऐसा लगता नहीं कि उससे दूर है...या उससे दूर रहने की आदत पड़ गयी है. धीरे धीरे सम्बन्धों में स्थिरता आती है, फिर यह भौतिक दूरी मायने नहीं रखती. इतनी दूर रहकर भी वे एक-दूसरे को उसी तरह समझ सकते हैं जैसे पास रहकर. छोटी बहन का पत्र आया है, वह खुश है. माँ-पिताजी का पत्र भी आया है, छोटा भाई भी गुड़िया का पापा बन गया है. उसने सोचा आज ही जवाब दे दे तो ठीक रहेगा, फिर बाद में उपहार भेजेगी, एक स्वेटर या फ्रॉक !

अब रात को ठंड बढ़ गयी है, आज से रजाई लेनी होगी. अभी तक कम्बल से ही काम चल रहा था. परसों कालेज खुल रहे है. मेजर का काफी कार्य हो गया है, अब चार्ट बनने का काम शेष है, कल बाजार जाकर चार्ट पेपर खरीदेगी. आज क्रिसमस है, बड़ा दिन, पर उनके लिए आज का दिन बड़ा किसी भी तरह से तो नहीं है. मन बेचैन है, एक घुटन सी महसूस कर रहा है, और माहौल भी वही है कल का सा बेचैनी भरा. कल उसने जून को अधूरा पत्र लिखा अब उसका पत्र आने पर ही पूरा करेगी.

साल का अंतिम दिन और साल का अंतिम रविवार भी. कल से नववर्ष का शुभारम्भ हो रहा है और उसका मन हर वर्ष की तरह कई मधुर कल्पनाओं से ओत-प्रोत है...जून की स्मृति भी है तो..स्नेह की मधुर यादों के साथ उन्हें एक अच्छा खत लिखेगी और पुराने वर्ष के सभी पत्रों के जवाब भी देने हैं न...नए वर्ष में नए खत नए जवाब..!