Showing posts with label भोजन. Show all posts
Showing posts with label भोजन. Show all posts

Wednesday, June 26, 2019

सिस्टर निवेदिता



ठंड बढ़ गयी है. आज पहली बार इन सर्दियों में धूप में बैठकर लिख रही है. बाहर निकली तो एक बगुला बैठा था, हल्की सी आहट से ही उड़ गया, कितना संवेदनशील रहा होगा. सुबह उठे तो कोहरा बहुत घना था, तापमान बारह डिग्री था. लेकिन उसी ठंड में वे टहलने गये, आकाश पर तारे थे और सब कुछ शांत था. आज जून को लंच पर घर नहीं आना है, इसलिए किचन बंद है. कल शाम का भोजन भी फ्रिज में पड़ा है. जब भूख ज्यादा सताएगी तभी कुछ खाएगी. पिछले दिनों स्वप्न में खाने-पीने की वस्तुएं देखीं. मन भोजन के प्रति कितना आसक्त रहता है, जब तक देह भाव बना हुआ है भोजन के बिना वे रह सकते हैं, यह विचार भी नहीं आ सकता. वे भूख के बिना भी खाते हैं, केवल स्वाद के लिए भी खाते हैं. चाय से अम्लता होती है, इसका अनुभव होने के बाद भी उसके प्रति मोह बना ही हुआ है. कितने ही साधु-संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने क्षुधा पर विजय पायी है. मन निर्विकल्प स्थिति में रहे इसका निर्णय भी अडिग नहीं रहता. पुरानी स्मृतियाँ कब मन को घेर लेती हैं, ज्ञात ही नहीं होता, स्मरण आते ही मन वर्तमान में आ जाता है पर इतनी देर ऊर्जा का व्यर्थ ही अपव्यय होता है. नैनी के बच्चे आंवला चुनने आए हैं, जो घास पर गिरे ही रहते हैं. कल शाम की मीटिंग ठीक थी, अध्यक्षा का भाषण हमेशा की तरह बहुत लम्बा था. अगले हफ्ते वह उन तीन महिलाओं से मिलेगी जिनका विदाई समारोह होना है, सभी के लिए कुछ लिखेगी. मृणाल ज्योति की पत्रिका पढ़ी, और वार्षिक रिपोर्ट भी, आज मीटिंग है, अब शायद कुछ ही समय और वह उनके साथ काम कर पाएगी. सुबह एक सखी को व्हाट्स एप पर संदेश भेजा, उसने कोई इमोजी भेजा जो उसके फोन पर खुल ही नहीं पाया. मन में विचार उठा पता नहीं क्या भेजा है.यही तो माया है, महामाया की उपासना करने से माया के पार जाया जा सकता है.

कुछ देर पहले ठंड थी, कोहरा था और अब सूरज निकल आया है, धूप कितनी भली लग रही है. आज हवा भी चल रही है. सुबह पूजा के बाद जल डालने आई तो सूर्य देव बादलों के पीछे छिपे थे, देखते ही देखते प्रकाश झलकने लगा, एक ही चेतन सत्ता से यह सारा जगत बना है, गुरूजी का यह वाक्य स्मरण हो आया. उनके भीतर जो तत्व है वही सूरज की गहराई में में है, उस तक संदेश पहुँच जाता होगा तत्क्षण ! आज शनिवार है, कल रात सोने में कुछ देर हुई, जून के बहुत पुराने मित्र भोजन के लिए आए थे, लग रहा था पहले के दिन लौट आए हैं. इधर-उधर की बातें भी ज्यादा हुईं. अख़बारों की सुर्खियाँ, राजनीति, कम्पनी की नई नीतियाँ, देश का वातावरण आजकल मिश्रित है.. देश जैसे बंट रहा है, गणतन्त्र में ऐसा होता ही है, सबको अपनी बात कहने का अधिकार है आदि आदि.  क्लब से किसी कार्यक्रम में गाने की आवाजें भी आ रही थीं. सुबह उठने में कुछ देर हुई. आज नये वर्ष का छठा दिन है. पिताजी से बात हुई. उन्होंने अपनी उम्र के कारण होने वाली तकलीफों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेने की बात कही. आत्मा का अल्प मात्र भी अनुभव हुए बिना कोई ऐसा कह नहीं सकता, अपने भीतर शक्ति और शांति के उस अमृत स्तम्भ को पाकर ही कोई निर्भार हो सकता है.

अब दोपहर हो गयी है. धूप में वे अब भी बैठे हैं. लॉन के कोने में, शायद एक दो घंटे और रहेगी धूप. आज लंच में कर्ड-राईस बनाये थे. शाम के लिए बगीचे से मेथी व हरे प्याज के पत्ते तोड़े हैं मकई के आटे में मिलाने के लिए. इस माह गुरूजी के जीवन पर लिखी उनकी छोटे बहन भानु दीदी की पुस्तक प्रकाशित हो रही है. जून ने आज ही आर्डर कर दी है. इंटरनेट पर बनी मित्र वाणी जी की कविता पर अपने विचार अभी तक नहीं लिखे हैं, उन्हें इंतजार होगा, समय कितनी शीघ्रता से गुजर जाता है, वे वहीं खड़े रह जाते हैं. योग सीखने आने वाली एक सखी ने सिस्टर निवेदिता द्वारा लिखी एक पुस्तक उपहार स्वरूप दी है. स्वामी विवेकानन्द के भीतर जगत के कल्याण की कितनी तीव्र पिपासा उनके गुरू ने जगाई थी. जैसे उनके गुरूजी सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उनके कर्म सहज हों, निस्वार्थ हों और कतृत्व अभिमान न हो. मनसा सेवा तो हर क्षण की जा सकती है. जब भी उनके मन अस्तित्त्व के साथ एक हो जाते हैं, वे प्रेम ही तो बहने देते हैं स्वयं के माध्यम से !

Friday, February 2, 2018

नन्ही योगिनी


वर्षा सुबह से लगातार हो रही है. ग्यारह बजने में चंद मिनट शेष हैं, भोजन बन गया है, सो उसने डायरी उठा ली है. नैनी को बुखार हो गया है, पिछले दो दिनों से उसके पति को था सो माली की पत्नी को बुलाकर काम करवाया. दूधवाले की घंटी गेट से सुनाई दे रही है. पियक्कड़ है यह भी नैनी के ससुर की तरह. कह गया है, गोबर है उसके पास, गाड़ी भेज कर मंगवा लें. सुबह माली को बुलाकर समझाया कि पत्नियों पर हाथ न उठाए. कैसा नाटक का सा जीवन जीते हैं ये, पर समझते नहीं. माली की माँ एन.आर.सी के लिए गाँव गयी थी, कुछ कागज-पत्र लाने, कहने लगा, अब उसे भी जाना होगा एक दिन, नहीं तो सरकार उसके बच्चों को कोई सुविधा नहीं देगी. 

आज सुबह नींद खुली तो कोई भीतर कह रहा था, भोजन के प्रति आसक्ति को त्यागना होगा. रात भर सोने के बाद भी देह हल्की नहीं हुई थी. कल शाम जून आये तो ढेर से फल खाए जो वे लाये थे. वैसे भी आहार के प्रति कुछ ज्यादा ही सजग रहती है. परमात्मा हर चीज की खबर रखता है. वर्षों पहले की बातें भी याद आने लगीं. शुरू-शरू में ससुराल में एक बार जब समय से भोजन नहीं मिला तो रोने का मन हो गया था. आर्ट ऑफ़ लिविंग के कोर्स के दौरान सेवा करने से पूर्व स्वयं खा लेने की प्रवृत्ति भी याद आई. चेतना जब देह में ही अटकी रहेगी तो साधना आगे कैसे बढ़ेगी. चेतना को देह से मुक्त करना है. धरती का आकर्षण त्यागना है तभी आकाश में मुक्त्त उड़ान सम्भव है. पड़ोसिन से बात हुई, वे लोग रिटायर्मेंट के बाद जा रहे हैं. क्लब की तरफ से विदाई देने उसके घर कुछ महिलाएं गयी थीं. ऐसा लगता है, काम के दबाव में आकर सभी लोग काम को निपटा लेना चाहते हैं, काम कैसे हुआ इसकी चिंता कम ही रहती है. उसने भी हजारों बार ऐसा ही किया होगा, पर अब लगता है, चाहे कम काम करें वे पर काम सही ढंग से होना चाहिए. समारोह क्लब में होने पर पड़ोसिन के लिए लिखी कविता वह सबके सम्मुख पढ़ सकती थी, अब उसके घर जाकर देनी होगी. कल शाम वह नवजात कन्या को पुनः देखने गये. नन्ही-नन्ही उसकी अंगुलियाँ कितनी मुद्राएँ बना रही थीं. पैरों को मोड़कर भी जैसे आसन कर रही थी.  

आज भी बादल बरस रहे हैं, सुबह से, प्रातः भ्रमण भी नहीं हुआ. नैनी काम पर आ गयी है, घर पुनः व्यवस्थित लग रहा है. आज पुरुषार्थ के बारे में सुना. पुरुषार्थ का अर्थ है पुरुष के लिए अर्थात आत्मा के लिए. उन्हें स्वयं की मुक्ति के लिए ही कर्म करने हैं. परमात्मा तो सदा है ही, उसकी उपस्थिति को भीतर महसूस करते हुए स्वयं की शक्ति बढ़ानी है. उसके आनंद व शांति को स्वयं में जगाकर जगत में बांटना है. परमात्मा उन्हें मुक्त रखता है, कभी कोई मांग नहीं रखता, उन्हें भी स्वयं को छोटी-छोटी बातों से मुक्त रखकर उसे अपने द्वारा व्यक्त होने देना है. आज शाम को वे रामदेव जी का बताया दलिया बनाकर रखेंगे, चावल, मूंग दाल, गेहूँ का दलिया, ज्वार की जगह ओट्स, अजवायन और तिल.. इन सभी को भूनकर मिलाकर रखना है. अगले पांच-छह महीनों के लिए पर्याप्त होगा.      

Friday, July 28, 2017

अंकुरित सलाद का पैकेट


आज उनकी यात्रा का चौथा दिन है. शनिवार को सुबह असम से चले और दो उड़ानों के बाद रात्रि दस बजे बंगलुरू पहुँचे. फोन पर बात हुई थी तो नन्हे ने कहा था लेने आयेगा पर उतरने पर संदेश आया, गाड़ी भेज दी है. घर जाकर पता चला दोपहर को ही उसने एक डाइनिंग टेबल का आर्डर दिया था, दो घंटे में पहुंचने वाली है ऐसा कहकर पूरे छह घंटे लगा दिए दुकानदार ने भेजने में, उसी के इंतजार में घर से निकल ही नहीं पाया. जब वे पहुंचे तो डिलीवरी मैन बाहर निकल रहा था. पहली बार घर देखा, काफी आरामदायक है घर...भोजन कक्ष कम बैठक, दो छोटे कमरे, एक स्नानघर और ठीकठाक सा किचन. कमरों में काफी प्रकाश आता है और हवा के आवागमन का भी प्रबंध है. सफेद मार्बल का फर्श है, ज्यादा फर्नीचर नहीं है, बेड की ऊँचाई काफी कम है और एक कमरे में तो एक के ऊपर एक गद्दे रखकर ही बेड बन गया है. नन्हा अकेला रहता है कभी-कभी उसके मित्र आ जाते हैं सो जगह काफी है. उसने खाने का आर्डर भी कर दिया था, थोड़ी ही देर में मसाला भिन्डी, अरहर की  दाल और तन्दूरी रोटी के पैकेट पहुंच गये. बंगलुरू में दिन हो या रात चौबीसों घंटे भोजन मिल जाता है. 

इतवार की सुबह आसपास के किसी घर से आती आवाज से नींद खुली. यह काफी बड़ी सोसाइटी है, पंक्तियों में दुमंजिला घर बने हैं. घरों के आगे सुंदर बागवानी है इसी तरह पीछे व कहीं-कहीं छत पर  भी. जून प्रातः भ्रमण के लिए निकल गये और लौटे तो सब्जियां और फल लेते आये, आते ही दुबारा चले गये और दूध व कुछ और सामान, अब उन्हें तो घर का बना खाना ही भाता है. कुछ देर में निफ्ट में पने वाली भतीजी आ गयी और इंजीनियरिंग कर रहे दो भांजे भी, बंगलुरू में देश भर से बच्चे पढ़ने व नौकरी करने आते हैं. तभी घंटी बजी, नन्हे ने अंकुरित सलाद का आर्डर कर दिया था, यहाँ सभी के पास समय की कमी है शायद इसी कारण कटी हुई सब्जियां, सलाद आदि सब पैकेट बंद मिल जाता है, अब उससे कितना पोषण मिलता है यह तो शोध का विषय है. बहरहाल सलाद स्वादिष्ट था. बातें करते-करते समय का आभास ही नहीं हुआ, बच्चों ने खाना बनाने में सहायता की और लंच भी तैयार हो गया. तब तक एक पुराने मित्र का बेटा भी आ गया जिसे बचपन से बड़ा होते हुए देखा था. अब यहाँ रह कर जॉब करता है. कुछ देर आराम करने के बाद वे निकट स्थित एक झील पर टहलने गये, वर्षा के मौसम के बावजूद पानी बेहद कम था पर ज्यादातर जगह हरियाली से भरी थी. उसके चारों ओर लाल मिट्टी से बने फुटपाथ पर टहलते हुए सूर्यास्त के दर्शन किये.

सबका निर्णय हुआ निकट ही स्थित ‘टोटल मॉल’ में जाने का, बंगलुरू में हर तरह के अनगिनत छोटे-बड़े मॉल हैं. आकर्षक स्कीमों के साथ सुंदर परिधान और अन्य सभी आवश्यक वस्तुएं मिलती हैं, पर अक्सर जो वस्तु पसंद आती है उस पर कोई छूट नहीं होती. वापस आये तो डिनर का समय हो चुका था, नन्हे ने कहा आज सब्जी वही बनाएगा, सो जल्दी से खाना बन गया, बच्चों को अपने हॉस्टल वापस जाना था. उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने गये तो ठंडी हवा बह रही थी, जिसमें से आती हुई फूलों की खुशबू नासापुटों को छू रही थी. सड़क के किनारे, इमारतों के आस-पास  तथा घरों के बाहर लगे वृक्ष यहाँ के लोगों के प्रकृति प्रेमी होने की गवाही देते हैं.

Thursday, December 19, 2013

लिखे जो खत तुझे


आज भी मौसम मेहरबान है, उनके उस महान स्वीपर ने आज कुछ ढंग से सफाई की है, नैनी ने किचन में रैक्स साफ की, उसका काम सुपरविजन का है. आज शाम को एक मित्र परिवार यात्रा पर जा रहा है, जाने से पहले यहाँ आएंगे, भोजन के लिए और फिर जून उन्हें विदा करने बस स्टैंड भी जायेंगे, ऐसी परम्परा सी बन गयी है, जो वे सदा निभाते हैं अन्यों की तरह सुविधा का ख्याल रखकर नहीं. खैर, उसे अपने मन में किसी प्रकार का क्षोभ, झुंझलाहट देखकर आश्चर्य क्यों नहीं होता, इस बात का दुःख है. बेचैन है यह देखकर बेचैनी भी तो होनी चाहिये न, अपनी आदत ही बना ली है परेशान होने की और...फिर इन बातों पर बजाय नाराज होने के मुस्कुराने की, यानि मर्ज हद से आगे बढ़ चुका है.

आज जून का दफ्तर बंद है, अल्फ़ा ने बंद कॉल किया है बारह घंटों का. सुबह न ही कोई पैदल न साइकिल पर जाता दिखाई दिया. आज यहाँ प्रधानमन्त्री आ रहे हैं, उनके स्वागत का यह तरीका अजीब है. डिब्रूगढ़ तक रेलवे लाइन ब्रॉड गेज हो गयी है, उसी का उद्घाटन करेंगे, तथा उत्तर भारत के अन्य प्रदेशों में भी जायेंगे. देवेगौडा जी भी आये थे, ६००० करोड़ रुपयों की योजनायें शुरू करने का आश्वासन देकर गये थे, पता नहीं कितनों में काम शुरू हुआ भी है या नहीं..इन राजनीतिज्ञों पर भरोसा करना बेहद मुश्किल है. कल शाम उसने वर्षों पूर्व मंगनी के बाद दोनों के लिखे कुछ पत्र पढ़े, आनन्द आया, मन फूल सा हल्का हो गया, जिन्दगी के तनाव भरे क्षणों में ऐसे पत्र रहबर का काम करते हैं. प्रेम में सराबोर ऐसे मधुर पत्र...कि पढ़ने के बाद घंटों मन एक खुमारी में डूबा रहा, तब मन कितना विश्वासपूर्ण था भविष्य के प्रति और वे सारी बातें जो उन्होंने तब सोची थीं सच हुई हैं. कल इतवार था, इतवार की तरह ही बिताया, सुबह से दोपहर तक स्नान, सफाई, लंच नन्हे की पसंद का था, जून कस्टर्ड के लिए tinned फ्रूट्स भी लाये थे. नन्हे को रोज पांच नये शब्द सिखाना भी शुरू किया है कल से.

वर्षा का एक दिन ! कल रात्रि आये तूफान से बंगलादेश में जान-माल का काफी नुकसान हुआ, उसी का असर है कि यहाँ भी कल से लगातार वर्षा हो रही है. सुबह पौने छह बजे नींद खुली एक स्वप्न से.. जिसमें देर शाम तक वह घर से बाहर है एक ऐसी गली में जहां मार-पिटाई रोज का मंजर है. एक बाबा जी भी कुछ दूर पर रहते हैं, पर लगता है उन्हें अपने शिष्यों से ही फुर्सत नहीं मिलती. नाश्ते में उसने आज परांठे बनाये पर उसका असर अभी तक है, जून को भी शायद ऐसा लग रहा हो. नैनी की शक्ल देखकर लग रहा था, जैसे उसके पेट में दर्द है, और स्वीपर का काम तो वैसे ही माशा अल्लाह ही, न बाहर ड्राइववे पर झाड़ू लगाया है न भीतर कारपेट पर, बाहर तो खैर अब हवा और पानी ही सफाई करेंगे, भीतर वह खुद कर सकती है. नन्हा एक घंटा टीवी देख चुका है, आधा घंटा और देखेगा, जब वे छोटे थे तो ज्यादा वक्त घर के बाहर खेलने में गुजरता था आजकल के बच्चे टीवी के सामने बैठ-बैठे ही बड़े हो जाते हैं. एक परिचिता का फोन आया, उनका बेटा आज दोपहर फिर पढ़ने आएगा, सो ले देकर बात यहाँ पर अटकी है कि इतनी सारी  बातों के बाद बेचारा...दिल जाये तो जाये कहां ?


Friday, May 24, 2013

चन्द्रकान्ता संतति- एक रोचक उपन्यास


कल दोपहर का भोजन उसने दो सखियों के साथ खाया, अच्छा लगा, संयोग था कि सभी अकेली थीं. आज राई का पेस्ट बनाया गाजर की कांजी के लिए. शाम को टी.टी खेलने गये, बहुत दिनों बाद, बाहर हरी घास पर स्किपिंग भी की, ठंडी हवा चेहरे पर भली मालूम पडती थी. आज साइकिल से एक सखी के यहाँ जाएगी. कल तीन पत्र आये, एक दीदी का भी जो चाहती हैं, अगला पत्र वह अंग्रेजी में लिखे. उनके भारत आ जाने पर तो वे उनसे मिल ही पाएंगे अगले एक दो वर्ष में. आज अभी तक नैनी नहीं आई है, लगता है चावल आज कड़ाही में बनाने होंगे.

 दोपहर के डेढ़ बजे हैं, मन में कई विचार लिए वह अपने करीब आना चाहती है. आज सुबह  सब कार्य समय पर हो गया, यहाँ तक कि नन्हे के फोटो के लिए भी पांच मिनट का समय मिल गया. लेकिन उसने आज तक कैमरा हैंडल ही नहीं किया था सो बैटरी बदलने के चक्कर में रील एक्सपोज हो गयी लगती है, जून ने कहा तो है, पूरी रील खराब नहीं होगी, कैमरे के बारे में कितनी कम जानकारी है उसे, परसों लाइब्रेरी से इस विषय पर कोई किताब लाएगी. जून आज सासोनी गये हैं, देर से आने को कहा है, उसने स्पेशल बाथ लिया समय का सदुपयोग करते हुए. सुबह फूफाजी का पत्र आया, उन्हें कई बार नया पता लिखने के बावजूद वह जून के पुराने पते पर ही पत्र भेजते हैं, यह तो अच्छा है, वे लोग उनके विभाग में भेज देते हैं. उनकी असमिया की कक्षा आज है पर उसे लगता है, जब तक बोलने का अभ्यास नहीं होगा कोई लाभ नहीं है. आज उसने पहली बार करी पत्ते की चटनी बनाई जो जून को पसंद आई.

आज ऐसा लग रहा है जैसे गर्मियों का मौसम आ गया हो. नन्हे को दिगबोई में गर्मी लग रही होगी, आज वह दोस्तों के साथ वहाँ गया है, स्कूल की तरफ से. कल रात उनके पुराने परिचित, पंजाबी दीदी के पति खाने पर आये, साढ़े दस बजे वे गये. उसे लगता है, उन्हें भोजन अच्छा लगा. पर हर बार किसी को खाने पर बुलाने से सब्जियां बच जाती हैं, उसे बासी खाना पसंद नहीं, पर...वे तेजपुर से बेंत की जो बैलगाड़ी लाये थे, वह उसने दीदी के लिये भिजवाई, वे मट्ठियाँ और बर्फी लाये थे. आज सुबह वह पड़ोसिन के यहाँ अपने बगीचे की एक पत्तागोभी लेकर गयी पर उसने उससे बहुत बड़ी गोभी अपने बगीचे से निकल कर उसे दे  दी. पिछले दरवाजे पर दस्तक हुई है शायद, शिबू आया है, उसकी किताब का एक पेज थोड़ा सा फट गया है, वह थोड़ा परेशान है, उसे सेलोटेप से जोड़ देना चाहिए. कल उन्हें तिनसुकिया जाना है, अगले महीने घर भी जाना है और उसके बाद दो माह की गर्मी की छुट्टियाँ...वे चन्द्रकान्ता सन्तति के शेष भाग तब पढ़ेगी, नन्हे को भी बहुत अच्छा लग रहा है तिलिस्म भरा कथानक. जून आज भी कोई पत्रिका नहीं लाये, पहले जब वह मैगजीन क्लब के ऑर्गेनाइजर नहीं थे, हर दिन घर में एक पत्रिका आती थी, पर अब वह भूल जाते हैं.





Thursday, March 28, 2013

एक घर आस-पास


  

 आज उन के जाने के बाद कामों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि अब जाकर वह थोड़ा वक्त निकाल पाई है, सुबह देर हुई उन्हें उठने में सो सब काम ही लेट होते चले गए, कल की सुबह अच्छी रही, दोपहर भी और शाम भी..वे बाहर गए थे एक मित्र के यहाँ बीहू की चाय पीने. माँ ने नन्हे के लिए एक स्वेटर बनाकर भेजा है, बहुत सुंदर है, कभी वह भी ऐसे ही स्वेटर बना सकेगी अपने.. के लिए. लेकिन अभी जो स्वेटर वह जून के लिए बना रही है, आगे बढ़ ही नहीं पा रहा है, आज से ज्यादा समय देगी, नहीं तो सर्दियाँ खत्म हो जाएँगी और..नन्हा चम्पक पढ़ रहा है इस समय, कल उसके स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम है, वे जायेंगे. आज धूप खिली है पूरी तरह, पहले दो दिनों की वर्षा ने धरती को कितना हर-भरा कर दिया है, पौधों में जैसे जान आ गयी है, और ऐसे ही उजाला भर गया है उसके दिल में जून के आने से. अभी कुछ देर में वह आ जायेंगे, अभी भोजन पूरा नहीं बना है, पर ये चंद लाइनें ...जिसमें नूना वह सब लिखना चाहती है जो महसूस कर रही है. थोड़े दिनों की दूरी स्नेही जनों के लिए टॉनिक का काम करती है. दूर होने पर वे एक-दूसरे को ज्यादा अच्छी तरह देख सकते हैं, नजदीकियां कभी-कभी दृश्य को धुंधला कर देती हैं न, उसकी सारी खूबियाँ वह महसूस कर रही थी जब वह उसके पास नहीं थे..विवाह के नौ वर्षों बाद जैसे वे एक-दूसरे को नए सिरे से पहचान रहे हैं...कितनी बातें करनी हैं उससे, पर वक्त ही नहीं मिलता क्योंकि अब जितना भी वक्त मिले उसे कम लगता है...

  पिछले पांच दिन व्यस्त थी, नन्हे का स्कूल बंद था, फिर ‘क्लब मीट का सप्ताह’, रोज ही शाम को क्लब जाते थे वे, समय निकाल ही नहीं पायी, समय शायद मिलता भी पर एकांत नहीं, सो मन स्थिर नहीं, एकाग्र भी नहीं. आज नन्हा स्कूल गया है और जून डिपार्टमेंट, और वह अपने विचारों के साथ है. काफी कुछ घटा पिछले दिनों, कई लोगों से मिलना भी हुआ. कोलकाता से उनके एक पुराने परिचित आये. कल खत लिखने का दिन है, उसने सोचा, इस बार पंजाबी दीदी को भी लिखेगी. मौसम आजकल मेहरबान है, सो क्लब के कार्यक्रम भी सुसम्पन्न हो गए, पर जिसका उसे इंतजार था, यानि पत्रिका, वह तो मिली नहीं, शायद कुछ दिनों बाद मिले, छपी तो है ही, पहले कभी इतनी उत्सुकता से प्रतीक्षा नहीं की, इस बार जाने क्या बात है, जिसका उसे भी पता नहीं, इसका अर्थ हुआ कि अचेतन मन में ऐसे कितने विचार हैं, जिनका चेतन मन तक को भान नहीं है. शनिवार को फिल्म देखी, “वह छोकरी” मन आक्रोश से भर उठा और कल की फिल्म में भी सड़क पर, फ़ुटपाथ पर पलने वाले बच्चों की दयनीय स्थिति देखकर बहुत दुःख हुआ, इतनी सुख-सुविधाओं में रहकर कभी-कभी वे ईश्वर से, जीवन से शिकायत करते हैं लेकिन अनाथ जिनका इतनी बड़ी दुनिया में कोई नहीं, कैसे जीते होंगे, बड़े होकर अपराधी बन सकते हैं ऐसे ही कुछ लोग शायद...इस दुनिया में सभी को अपने-अपने सुखों व दुखों के साथ जीना ही है. कोई क्या कर सकता है, वह क्या कर सकती है ? हाँ, इतना तो कर सकती है कि उन अनाथों का दुःख शब्दों में व्यक्त कर सके, लेकिन इससे उनका दुःख कम तो नहीं होगा, न सही, उनके दुःख को महसूस करने वाला कोई है यह संतोष तो होगा, तो पिछ्ले पन्नों पर यही लिखेगी, उसने घड़ी की ओर देखा, साढ़े दस बजने को हैं और अभी ढेर सा कम बाकी है.

  आज एक नया स्वीपर आया है, बुद्धू सा लग रहा है, ऐसे व्यक्तियों को देखकर और पिछले दिनों टीवी पर एक घर आस-पास में अज्जू को देखकर भी बचपन में मिली पिता के एक सहकर्मी की बेटी की स्मृति हो आती है कितनी मासूम थी वह, जिसे उसके माता-पिता छिपा कर रखते थे, और अपनी संतानों में भी नहीं गिनते थे. साढ़े दस हो गए है न, अभी उन्हें  आने में आधा घंटा है, आते ही उन्हें भोजन मेज पर लगा हुआ चाहिए, ताकि आराम से झपकी ले सकें, जितना लम्बा लंच ब्रेक यहाँ होता है शायद ही कहीं और होता हो, पूरा डेढ़ घंटा, कोई चाहे तो एक घंटा आराम से सो सकता है, पर उसे लगता है इतना भी क्या आराम पसंद होना, अति हर चीज की बुरी होती है, कितने सारे काम पड़े हैं घर के, समय ही नहीं मिल पाता जिन्हें करने का, शाम को तो बिलकुल नहीं...कल शाम वे पुस्तक मेला गए थे, पर वहाँ केवल असमिया किताबें थीं. कल नन्हा एक जन्मदिन की पार्टी में गया था, उसे रिटर्न गिफ्ट इतना अच्छा मिला है, वह जो उपहार ले गया था उसकी तुलना में, जून भी कभी-कभी कंजूसी कर जाते हैं. कल उसने छह खत लिखे, अच्छा लगा इतने दिनों बाद सबसे बातें करके. अबसे हर सोमवार को कम से कम दो पत्र तो लिखेगी ही, अभ्यास बना रहता है. दोपहर को पडोसिन के यहाँ जाना है, स्वेटर का नया डिजाइन सीखने, वह बहुत स्वेटर बनाती है हर साल ही. आज उसने दाल-पालक यानि साई-भाजी (सिंधी में) बनाया है, अभी फुल्के बनाने हैं. सचमुच यह स्वीपर अज्जू से कम नहीं है.  


Tuesday, October 30, 2012

लौंग-इलाइची वाली तहरी



कल के बादल अभी घिरे हैं, कालेज गयी थी, लौटी तो देखा नन्हा फिर सोया नहीं था दोपहर को. जून को पत्र लिखा, गोंद नहीं थी सो सेलो टेप से चिपकाया, पर ठीक से नहीं हो पाया है. सारनाथ के बारे में अभी तक नहीं लिखा है, सिन्हा व सुधा मैम से कहा किताब के लिए पर उन्होंने नहीं दी, लड़कियों का हक है जिन पर उन किताबों पर भी अध्यापिकाएं अपना अधिकार जमा लेती हैं. उसने तय किया भविष्य में कभी उनसे कुछ नहीं मांगेगी. एक किताब खरीदी उसने, पर विशेष लाभ नहीं हुआ, खैर कुछ ही सही. कल से तीन दिनों के लिए कालेज बंद है. ढेर सारे काम करने हैं और पढ़ाई तो करनी ही है.

छुट्टी का पहला दिन कैसे शुरू हुआ और कैसे बीत गया वह स्वयं भी नहीं समझ पायी, सुबह का वक्त तो रोज ही व्यस्तता में गुजरता है, फिर नन्हे को पढ़ाने लगी, दोपहर का भोजन, उसे सुलाना और तीन बजे जब पढ़ने आई तो बिजली गायब, दस मिनट बिना बिजली के पढ़ा तो माँ ने ऊपर बुला लिया, घर का वातावरण सामान्य हो गया है. फिर ननद का फोन आया, उसकी किसी मित्र के यहाँ जाना है. तभी पोस्टमैन आ गया, जून के दो पत्र थे, पढते ही सुधबुध खो गयी पर उन्हें देर तक एन्जॉय करने का समय ही नहीं था, अर्थात वह फौरन उसे जवाब नहीं लिख सकी. वहाँ से लौटे तो आठ बज चुके थे. भोजन बनाया, पत्र लिखा..आम पत्र नहीं , प्यार का दस्तावेज, चालीस नम्बर का नहीं पैंतालीस...पिछले दिनों वह  नम्बर गलत डाल रही थी
शुभ प्रभात ! आज वह सुबह जल्दी उठ गयी है, रात को आशिक चन्द्र ग्रहण देखा था, मकान मालकिन के यहाँ गांव से कुछ महिलाएं आयीं थीं कल गंगा स्नान करने. अभी समाचार देखने के बाद टीवी बंद क्र रही थी कि पेन नीचे गिर गया, रिफिल बेकार हो गयी, कितना प्रयास करना पड़ रहा है उसे चंद पंक्तियाँ लिखने में. दक्षिण अफ्रीका में पुलिस कितनी बर्बर है, अभी महिलाओं पर लाठी चार्ज होते देखा समाचारों में.

जैसे नियमित वह लिख रहे हैं वैसे ही नियमित आजकल उसे खत मिल रहे हैं. माँ-पिता जी का भी पत्र आया है, उन्होंने लिखा है, अप्रैल में वे तीनों वहाँ आएंगे, इसकी प्रतीक्षा वे लोग कर रहे हैं. उसने सोचा तब की तब देखेंगे, अभी से कुछ नहीं कह सकती. उसने एक सप्ताह में एक विषय पढ़ने का निश्चय किया, ग्यारह बजे उसने बत्ती बंद कर दी.

तीन दिन बाद कालेज गयी, आरती मैडम जब लेक्चर दे रही होती हैं, उसे बहुत अच्छा लगता है, उनकी क्लास ही सबसे अच्छी होती है. और एक मेहरा मैम हैं, कल के लिए पढ़ने को कहा  है पर..कल या तो वह खुद अनुपस्थित हो जाएँगी या भूल ही जाएँगी. फिर भी उसे पढ़ना तो है ही. यह प्रथम पेपर है भी द्रौपदी के चीर की तरह कहीं भी इसका ओर-छोर दिखाई नहीं देता.

आज उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं लग रहा है, हल्का ज्वर सा लग रहा है, कालेज में थकान लग रही थी. सुबह अंगूर खाए, अच्छे लगे, बाकी चीजें कड़वी या फीकी लग रही हैं.

आज फिर वह सुबह कालेज चली तो गयी पर बीच में छोड़ कर आना पड़ा, बुखार बढ़ गया था. अब लगता है कुछ दिन घर पर ही आराम करना होगा.

आज स्नान किया उसने पूरे आठ दिनों बाद, अभी भी मुंह कड़वा है, पिछले आठ दिनों में मन में न जाने कितने बवंडर उठे हैं पर उन्हें याद करना क्या बहुत जरूरी है.

आज शिव रात्रि है, काफी ठीक महसूस कर रही है पर सब्जी में कोई स्वाद नहीं आ रहा. सोच रही है रात को खाना खुद ही बनाएगी. यहाँ खाने में विविधता नहीं है, रोज वही मसूर की दाल या मूंग मिली अरहर, इसके अलावा भी दुनिया में कुछ होता है, यहाँ लोग जानते ही नहीं. सब्जी भी वही आलू गोभी टमाटर, खूब भुनी हुई. वड़ी वाले चावल, गोभी वाले चावल, लौंग बड़ी इलाइची वाली तहरी, मूली, गोभी के परांठे..सब सपने की चीजें होकर रह गयी हैं. यहाँ खाने का मतलब पेट भरने से है, सच है आजादी से बढकर कोई वस्तु नहीं , अपने घर में वह आजाद थी, खुश, निर्द्वन्द्व कुछ भी करने को स्वतंत्र !



Saturday, September 22, 2012

जश्न का माहौल



कल रात वे लोग साढ़े दस बजे वापस आए. कार्यक्रम अच्छा था, पर पार्टी का या शादी-ब्याह का भोजन गरिष्ठ तो होता ही है, पेट अभी भी इसकी खबर दे रहा है. समारोह में न सादगी ही थी, न कोई नियम, बस अपने आप चलता जा रहा था, नन्हा तो वहाँ की भीड़, रोशनियों और बच्चों में कैसा घुलमिल गया, उसे बड़ा आनंद आ रहा था था. माँ पहले तो वहाँ जाने के नाम से ही मना कर रही थीं, शुरू में वहाँ अपने को अनफिट भी समझती रहीं पर बाद में बहुत आनंद ले रही थीं. सब मिलाकर देखा जाये तो सब ठीकठाक ही था. आज उसने सभी भाई-बहनों को पत्र लिखे, और एक छोटा सा पत्र जून को भी, उसे कैसा लगेगा इतना छोटा पत्र देख कर. वह उसे एक पेज पर लिख कर ले जायेगी, बाजार से पुस्तकें भी लाएगी और भी कुछ सामान यदि सम्भव हुआ. आज सुबह तीन बजे ही वह छत से नीचे आ गयी थी, ऊपर ठंड बढ़ गयी थी. नन्हे की नाक बंद हो गयी है, उसका बिस्तर पिताजी ने नीचे लगा दिया. वह भी कुछ देर सोयी एक स्वप्न देखा कि कॉलेज में या हॉस्टल में उसके कमरे का ताला बदमाशों ने तोड़ दिया है और उसकी किताब कॉपी चुरा ली है. रो ही पड़ी होती कि नींद खुल गयी. पर अब पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें बंद हो रही हैं, उसने सोचा पहले स्नान करना ही ठीक रहेगा.

एक सुंदर पन्ने पर उसने लिखा- मिसेज एस ने बैठक के दरवाजे पर खड़े होकर कमरे पर आखिरी नजर डाली, हाँ, अब ठीक है. कल ही उन्होंने सारे पर्दे, कुशन, चादरें आदि धुले-धुलाए प्रेस किए हुए बिछाये थे. कमरे की एक-एक वस्तु को पोंछ कर नए सिरे से रखा गया था. कमरा निखरा-निखरा सा लग रहा था. दूसरे कमरों में भी कुछ न कुछ बदलाव तो आए थे और रसोईघर में भी. हों भी क्यों न मिस्टर एस अगले हफ्ते सेवा निवृत्त हो रहे थे. उस अवसर पर उनके सभी बच्चे अपने-अपने परिवारों के साथ आ रहे थे. घर में जश्न का सा माहौल रहेगा. पति-पत्नी दोनों अपने-अपने विचारों में खोये रहते थे. एक-दूसरे से कहे या पूछे बिना ही उनके चेहरे देखकर जाना जा सकता था की वे अपने भविष्य के बारे में सोच रहे हैं. पत्नी प्रसन्न थी कि सेवा निवृत्ति के बाद दोनों साथ-साथ समय बिताएंगे. कम बोलने वाले उनके पति यह सोचा करते थे की अपना समय संगीत, पुस्तकों और बागवानी को देंगे. जाहिर है इसमें पत्नी का साथ तो रहेगा ही. दोनों को साथ-साथ बिताए वर्षों की खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बार-बार आकर घेर लेती थीं. मिसेज एस की आँखों में कई बार एक शिकायत झलक जाती थी जो कड़वी स्मृतियों का परिणाम थी और कभी-कभी एक स्निग्ध आभा जो सार्थक क्षणों की देन होती थी. वह  कब चाहती थीं कि उन सब बीती बातों को याद करें पर स्मृतियों पर किसी का वश तो नहीं. यही हाल कमोबेश श्री एस का था, यह अलग बात थी कि उनकी यादों का दायरा कभी घर-परिवार में सिमट जाता था और कभी कार्यालय व सहयोगियों में. अपने विभाग में एक उच्च अधिकारी रहे थे पिछले कई वर्षों से, जिम्मेदारियां काफी थी, जिन्हें वह अच्छी तरह से निभा रहे थे. स्वभाव से मितभाषी, उदार, कोमल हृदयी वह कभी अपने परिवार के प्रति कठोर हो सके थे अब सोचकर जैसे उन्हें विश्वास नहीं होता था. हो सकता है ऐसे किन्हीं दुर्बल क्षणों में उनका हृदय अपनी जीवन संगिनी के प्रति किये गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए क्षमा मांग चुका हो. बड़ा पुत्र उनके कठोर अनुशासन में पला जिसका असर उसके मन-मस्तिष्क पर कितना पड़ा यह तो नहीं कहा जा सकता पर यह जरूर है कि वह अंतर्मुखी है मंझले और छोटे बेटे के आते-आते यह अनुशासन काफी ढीला पढ़ गया और सबसे छोटी बेटी तक तो समाप्त प्रायः ही हो गया. अब सभी आ रहे हैं. कभी-कभी किसी विवाह अथवा त्यौहार के अवसर पर ही ऐसा हो पाता है.
आज वह दिन आ ही गया. पिछली रात देर तक बातें होती रहीं. वे दोनों तो मुश्किल से दो-तीन घंटे ही सो पाये होंगे. और सुबह पाँच बजे ही आदत के अनुसार उठ गए हैं. प्रातः भ्रमण उनका पुराना शौक है. पिछले कुछ वर्षों से श्रीमती एस का भी, पहले उन्हें कहाँ वक्त मिल पाता था. जब सब बच्चे छोटे थे. सुबह उठते ही घर के कामों में लग जाना पड़ता था. बच्चे जब तक जगें वह कितना कम निपटा चुकी होती थीं. तब खर्च अधिक था सभी काम उन्हें अपने हाथों से करने होते थे. घर में गैस का चूल्हा भी नहीं था तब. वे दिन क्या वह कभी भूल सकती हैं, सर्दी हो या गर्मी उनके दिन की शुरुआत पाँच बजे ही हो जाती थी. अपनी पूरी मेहनत और आंतरिक शक्ति के बल पर उन्होंने सभी बच्चों को अच्छे संस्कार दिए, आधुनिक माता-पिता की तरह उन्होंने बच्चों के पालन-पोषण पर पुस्तकें तो नहीं पढ़ी थीं बस जो कुछ अपने आस-पास देखा था और जो उनके मन को अच्छा लगा वही शिक्षा उन्हें दी. पर जब परिवार बड़ा हो तो कोई न कोई पक्ष छूट ही जाता है बच्चों को बाहर की दुनिया के जिस कुप्रभाव से बचाकर रखा वहीं घर में उन पर होता अन्याय शायद वे देख नहीं पाए. रोजी-रोटी की फ़िक्र ने तथा परिवार पर विश्वास ने जो कि सामान्यतः हर घर मे होता ही है. बड़ा पुत्र और उसकी पत्नी परसों ही आ गए थे. बेटा अच्छे पद पर है, पत्नी भी मिलनसार और शौक़ीन मिजाज की पाई है. पर ईश्वर जहां फूल खिलाता है कांटे भी उगाता है. बेटे की शादी को दस-ग्यारह साल हो गए हैं पर आंगन अभी तक सूना है. मंझले बेटे की नौकरी भी अच्छी है, वह पत्नी के साथ दो हफ्ते पहले आ गया है. और तीसरे बेटे की शादी अभी हाल में ही हुई है. छोटी बेटी अभी पढ़ाई कर रही है, उसकी शादी को छोडकर सभी बच्चे अपने अपने परिवार में व्यवस्थित हैं. सांसारिक दृष्टि से देखें तो सभी खुश हैं.
वह जो शब्द-चित्र लिख रही थी लगता है, पूरा हो गया है क्योंकि अब कलम रुक-रुक जाती है.

Wednesday, September 12, 2012

गंगा घाट पर सुबह की सैर



आज उन्हें यहाँ पूरा एक हफ्ता हो गया, बाजार गयी थी, किताब तो मिली नहीं..कला संकाय के लिए थी वह किताब वैसे फार्म में तो ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं था. अगले हफ्ते विज्ञान संकाय की पुस्तक भी आ जायेगी ऐसा दुकानदार ने कहा तो है. कल रात उसने पत्र लिखा, कल संभवतः उसका पत्र भी आयेगा, थोड़ा-थोड़ा गुस्सा तो वह जरूर होगा न..पर लगता है इस गुस्से में भी एक अजीब तरह की मिठास है, प्यार है. मौसम भी आज अच्छा रहा और यहाँ सभी का व्यवहार सभी के प्रति बहुत अच्छा है. स्नेह भरा, ऐसे वातावरण में रहकर ही वह बड़ा हुआ है. तभी उसका दिल भरा हुआ है प्यार से. आज दोपहर को उसके एक मित्र अपनी पत्नी के साथ आए थे, कुछ देर रुके फिर चले गए.

कल दोपहर और कल रात भी अपने घर की बहुत याद आयी. नन्हे को सुलाना था कि मेहमान आ गए. वह इतनी जिद करता है पर उसे यहाँ डांटा नहीं जा सकता, सब उसकी पैरवी करने लगते हैं. सोचा है आज से कम से कम वह तो समय से भोजन कर लेगी. और सोनू को भी साढ़े नौ बजे तक सुला देगी. ग्यारह बजे रात तक जागना उसके लिए ठीक नहीं है. इस समय सुबह के छह बजे हैं, कुछ देर पूर्व माँ को उठया गंगा जी जाने के लिए, पर शायद वह उठना नहीं चाह रही हैं. लगता है कल रात वर्षा हुई, अभी भी हवा में ठंडक है.

कल उनका असम जाने के बाद पहला खत आया. गोहाटी से भेजा है. उनकी ट्रेन १२ घंटे देर से पहुंची, सो शनिवार को दफ्तर नहीं जा सके. दूसरे खत से मालूम होगा कि सीएल की जगह पीएल तो नहीं लेनी पड़ी. अब जबकि वह दूर है तो इतना याद आता है, इतना ख्याल रहता है उसका और जब वह नजदीक था उसे...चलो अब मिलने पर सारी शिकायतें दूर हो जाएँगी. घाट तक माँ के साथ घूमने जाना है पर वह हैं कि आ ही नहीं रही हैं. लगता है वह मन से जाना नहीं चाहती हैं टालना चाहती है, हम सभी के कहने पर. बेमन से हाँ कह देती हैं. वह चाहती है कि जल्दी जाकर जल्दी लौट आये जिससे नन्हा सोया रहे जब तक वे आयें. कल का दिन सामान्य था, हाँ, चिट्ठी आयी यह बात तो थी.

डायरी लिखती है पर कल ध्यान ही नहीं था तिथि कौन सी है, कल ड्राईक्लीनर से साड़ियां मिलनीं  थीं, आज सुबह तो माँ बीस मिनट में ही तैयार हो गयीं, मगर पन्द्रह मिनट में ही वे लोग लौट आये, अखबार लेने का मन हुआ पर पर्स नहीं ले गयी थी. कल रात स्वप्न में जून को देखा, उसे भी आते होंगे ऐसे स्वप्न, अगर वह उसे एक बार लिख दे कि अप्रैल में आ जाये तो वह आ जायेगा पर वह ऐसा नहीं करेगी. वे जून में ही मिलेंगे. और उसके बाद अक्तूबर में. यहाँ सब ठीक चल रहा है. माँ कभी कभी पुरानी बातें दोहराने बैठ जाती हैं, और जानबूझ कर उदास होती हैं, जैसे दुखी होना उनके लिए जरूरी हो. पिता ठीक रहते हैं समझ गए हैं और ननद भी. अभी विशेष गर्मी शुरू नहीं हुई है, सुबह-शाम मौसम बेहद अच्छा रहता है.



Saturday, July 21, 2012

जन्मदिन ही याद दिलाता


सुबह के साढ़े नौ बजे हैं, नन्हा दिन की पहली निद्रा में मग्न है. सुबह के काम हो चुके हैं, वह जून का इंतजार करते हुए उसी किताब को पढ़ेगी. पिछली शाम वे क्लब गए, दोसा खाने, पर कल केवल सांबर बड़ा ही बना था, पहले की तरह बहुत अच्छा भी नहीं था. पिछली रात से आकाश ढल रहा है बीच-बीच में लगता है थम गया पर नन्ही नन्ही बूंदें कहीं न कहीं अधर में तब भी होंगी ही. उसने सोचा कि उसे कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में लिखना चाहिए बजाय इन रोजमर्रा की इतर बातों के. ऐसा लगता है कि उसके चारों ओर ऐसा कुछ भी नहीं लेकिन उसके भीतर कुछ ऐसा जरूर है जिसे उसे जगाना होगा. वह अपने इस जीवन में इतना डूब गयी है कि खुद को एक अलग व्यक्ति के बारे में सोच ही नही पाती. वे आपस में इस तरह गुंथे हैं.

आज छोटी बहन का जन्मदिन है, उसे अवश्य ही उनका कार्ड मिल गया होगा. आधा घंटा पहले वह उसी मित्र के यहाँ से आयी है जिसका बेटा नन्हे की ही उम्र का है, वे दोनों डेढ़ घंटा आपस में खेलते रहे और वे दोनों उन्हें देखते हुए बातें करती रहीं. इस समय वह दिन की दूसरी निद्रा में खोया है. उसने फेमिना में भार-ऊँचाई की सूची देखी. उसके अनुसार उसका वजन ठीक है. उसने वह किताब भी आज सुबह पूरी पढ़ ली. इस समय वातावरण कितना शांत है, केवल चिड़ियों की चहचहाहट गूंज रही है, और थोड़ी देर बाद स्कूटर, मोटरसाइकिल, कारें, वैनेट सभी दौड़ने लगते हैं, आवाजें ही आवाजें रात होने से पूर्व तक. कल शाम भी वे किसी परिचित के यहाँ गए थे, कुछ बातें हुईं अन्य लोगों के बारे में, ज्यादातर नन्हे के बारे में, आज वे एक बच्चे को देखने जायेंगे, वह छोटा सा बच्चा कितनी बुरी तरह जल गया था, अब ठीक हो रहा है.

उसने जून से कहा था कि वह नियमित पत्र लिखेगी पर पहले की तरह फिर भूल गयी. आज छोटे भाई का जन्मदिन है, यानि तीन हफ्ते बीत गए पत्र उसे लिखे. अब जैसे-जैसे नन्हा बड़ा हो रहा है, उसकी नींद कम हो गयी है, और उस पर हर वक्त नजर रखनी पड़ती है, कितनी तेजी से वह घुटनों के बल इधर से उधर भाग जाता है, हर वस्तु उठाकर मुँह में डाल लेता है. सुबह के समय उसे नहाने व खाना बनाने का भी समय नहीं मिल पाता, सो कामवाली को उसने एक घंटा अलग से बुलाया है जब वह उसे संभालेगी, ताकि वह स्नान कर सके व भोजन बना सके. आज उसका पहला ही दिन था, उसका सब काम हो गया और लिखने का वक्त भी मिल गया.


 

Wednesday, June 27, 2012

पल-पल रंग बदलता मौसम


ग्यारह बजने को हैं, भोजन भी बन गया है और स्नान भी हो गया, कभी-कभी एक ही काम हो पाता है, दूसरा जून के आने के बाद और कभी एक भी नहीं, जब नन्हा पूरी सुबह जगता है. वैसे  पिछले दो-तीन दिनों से उसका उठने-सोने का समय कुछ-कुछ निश्चित होता जा रहा है. सो अब उतनी जल्दबजी नहीं होती. धीरे-धीरे वह बड़ा हो जायेगा. एक साल का फिर दो तीन वर्ष का, स्कूल जाने लगेगा फिर वह अकेली रह जायेगी, उन दोनों की प्रतीक्षा करते हुए. वह मुस्कुराई, अभी बहुत दिन हैं उस बात को, फ़िलहाल तो आज की बात करनी है. नन्हे की दायीं आँख से पानी आ रहा है, डॉक्टर को दिखाना होगा. उसे डिब्बे का दूध देना भी बंद कर दिया है, शायद अभी इसकी जरूरत ही नहीं थी. उसे घर की याद आयी, छोटी बहन के पत्र की प्रतीक्षा थी, पहली बार घर से बाहर गयी है अभ्यस्त होने में थोड़ा वक्त लगेगा. उसने अगस्त माह की सर्वोत्तम उठा ली, लगभग हर अंक में वैवाहिक जीवन पर एक न एक लेख होता है, जो बहुत व्यवहारिक होता है, सीधी-सादी भाषा में. जून आज बाइक से दफ्तर गया है थोड़ा जल्दी आ सकता है.

एक सप्ताह बीत गया, सब कुछ सामान्य चलता रहा. कल नन्हें के फोटो भी बन कर आ गए, कितना छोटा सा लगता है वह उनमें. जून अपनी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा है. उसे अवश्य ही सफलता मिलेगी. आजकल यहाँ छात्र संगठन के कारण तनाव है. वह तो दिन भर घर में ही रहती है. जून कहता है कि शाम पांच-छह बजे के बाद बाजार या क्लब जाना सुरक्षित नहीं है. मौसम आजकल रोज ही कितने रूप बदलता है, सर्दी, गर्मी, वर्षा तीनों एक ही दिन में.  


Tuesday, May 15, 2012

श्र्द्दावान लभते ज्ञानं


जून उसके लिये हिंदी अनुभाग से दस किताबें लाया है, ज्यादातर उपन्यास हैं, कुछ कहानियों की किताबें हैं. इन्हें पढ़ लेने पर वह और भी लाएगा. नूना बहुत खुश है इन्हें पाकर. कल शरत चन्द्र की  एक कहानी पढ़ी, शाम को विमल मित्र की डेढ़ कहानी, दूसरी पूरी नहीं पढ़ पायी, रात को जून ने कहा, उसे नींद आ रही है, बत्ती बुझा दो. उसे पता नहीं क्यों पढ़ने के नाम पर जोरों से नींद आने लगती है, पर बत्ती बंद होने के बाद आधे से एक घंटा वह जगता रहा था. सुबह उठकर जून के जाने के बाद उसने वह कहानी पढ़नी शुरू की, काम वाली महरी तब तक आयी नहीं थी, पढ़ते-पढ़ते कब उसकी भी आँख लग गयी उसे भी नहीं पता, एक बार उठने का ख्याल आया तो मन ने कहा अभी काम वाली आकर घंटी बजाएगी, पर उसे आना ही नहीं था, फिर उठ कर भोजन बनाया जून के आने में आधा घंटा शेष था. फिर स्नान किया और रोज का गीता पाठ किया, पढ़ा, “ईश्वर को केवल श्रद्धा से जाना जा सकता है, उसके विषय में तर्क करने से कुछ हाथ नहीं आयेगा, वह है, यह मानना होगा पूरे मन से. संशय ग्रस्त मन कभी रास्ता नहीं पा सकता, संशय से ऊपर रहकर अपने आप में व ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखकर वे कहीं अधिक सबल हो सकते हैं.      

Thursday, March 15, 2012

लाल मिर्च


उस दिन नूना के पैर की अंगुली में चोट क्या लग गयी, जून ने उसे कहा, पलंग पर बैठ जाओ. वह खुद किचन में गया है, भोजन लाने. आज वह मोरान भी नहीं गया. उसे अकेला छोड़कर जाना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगता. दवा लगा कर पट्टी भी बांध दी है. उसका यह स्नेह देखकर कभी कभी उसे लगता है क्या वह इसके योग्य भी है. पर अगले ही पल वह सोचती है अगर वह न होती तो उसका प्रेम किस तरह प्रकट हो पाता. आज वे एक अच्छी सी श्वेत-श्याम फिल्म देखने गए, ‘दोस्ती’. गीत बहुत मधुर थे. मुहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज का तो कहना ही क्या. दोपहर को उनकी तेलुगु मित्र आयीं थीं, शाम को दक्षिण भारतीय भोजन का निमंत्रण देने. वे गए थे और दोसे के साथ लाल मिर्च के पाउडर की चटनी पहली बार देखी.
आज वह पिता से उपहार में मिले पार्कर पेन से लिख रही है, जब उन्होंने दिया तो उसने कहा इतना महंगा पेन, वे बोले, तुम भी तो महंगी हो, और वह उनका मुख देखती रह गयी कुछ न कह सकी. उसने सभी को पत्र भी लिखे. रेडियो पर गाना आ रहा है, 
जब शाम का आंचल लहराए
और सारा आलम सो जाये
तुम मुझसे मिलने शमा जलाये
ताजमहल में आ जाना

उन्होंने स्वेटर निकाल लिए हैं और स्नान भी गर्म पानी से शुरु कर  दिया है. कल वे डॉक्टर के पास भी गए थे. कुछ दिनों में पता चलेगा कि उनके जीवन में क्या कोई गुल खिलने वाला है. पिछले दिनों वे इस बात को लेकर भी कुछ परेशान थे पर अब नहीं हैं. वे दोनों तो इस दिन को लेकर कितने सपने भी देखते थे.
  

Monday, March 5, 2012

सूना सूना घर



आज जबसे जून गया है वह उसे याद कर रही है. जानती है वह भी उसे याद कर रहा होगा चाहे वह कितना ही व्यस्त क्यों न हो. सुबह उसकी जीप अभी मोड़ तक ही गयी थी कि उसकी आँखें...और  दिल जैसे बैठने लगा. अंदर आयी तो याद आयी उसकी बात खुश रहना..सो सम्भल गयी. कुछ खाकर क्रोशिया उठा लिया. दस बजे तो खाना बनाया सब कुछ वैसे ही क्या जैसे उसके होने पर करती. किताब पढ़ी फिर भोजन किया. सोचा वह भी पहुँच गया होगा. दोपहर को कढ़ाई की फिर सोने का प्रयास किया पर नींद नहीं आयी. फिर प्रेमचन्द का उपन्यास कायाकल्प पढ़ती रही. तभी उसका  फोन आया हँस कर बात की पर वापस आयी तो वह और भी याद आया. पांच बजे तक तो किसी तरह रही फिर अकेला घर किसी तरह अच्छा नहीं लगा किसी तरह नहीं सो पड़ोस में उसी उड़िया परिचिता के घर चली गयी उसे खुद नहीं पता था कि उससे दूर रहना इतना कठिन होगा. 

Tuesday, January 17, 2012

बूंदाबांदी


कल बड़े मजे की बात हुई, महरी जब काम करके चली गयी, पांच-दस मिनट कुछ छोटा-मोटा काम करने के बाद नूना ने घड़ी की ओर देखा तो दस बजे थे, सो रोजाना की तरह खाना बनाने रसोई में  गयी. एक घंटे बाद खाना बना कर कमरे में आयी तो फिर दस बजे थे. घड़ी देखी, चल रही थी तो इसका अर्थ हुआ कि पूरा एक घंटा पहले उसने भोजन बना दिया था. उस समय नौ ही बजे थे. जून भी सुनेगा तो हँसेगा. आज वर्षा नहीं हो रही है पर गर्मी नहीं है, जुलाई में भी कल रात ठंड थी, चादर लेकर नहीं सोयी थी सो ठंड के कारण नींद नहीं आ रही थी, फिर मन सपने देखने लगा, कहाँ- कहाँ के सपने. कल लाइब्रेरी में धर्मयुग के दो नए अंक दिखे, सारिका पढ़े कितने दिन हो गए हैं. उसके आने में अभी वक्त है सो टाल्सटाय की पुस्तक पढ़ने का उपयुक्त समय है.

कल प्रेमगीत फिल्म देखी, बड़ी हँसी आयी, हँसी आयी सो फिल्म देख कर ही उठे. संगीत अच्छा था, यही बात फिल्म के पक्ष में जाती है. आज वह फिर भीग कर आया था, जबकि नूना को मना करता है भीगने से.
आज भी वर्षा का ही साम्राज्य रहा, लाइब्रेरी गए तो भीगते हुए और लौटे तब भी बूंदाबांदी हो रही थी. घर पर भी वर्षा होती होगी, रसोई से कमरे तक जाने में माँ भीग जाती होंगी.

  

Sunday, January 15, 2012

कुकर का वाल्व


कल शाम उन्होंने एक फिल्म देखी सारांश, कुछ दृश्य तो इतने भावपूर्ण थे कि महीनों तक याद रहेंगे. हेड मास्टर का रोल करने वाला अभिनेता, लड़की, और पार्वती सभी तो इतने सशक्त थे. उसके पहले वे मोटरसाइकिल पर घूमने गए, जून बहुत अच्छी तरह चलाना सीख गया है. लाइब्रेरी में साप्ताहिक धर्मयुग में राजीव-सोनिया के इंटरव्यू पढ़े, बहुत रोचक थे. नूना के छोटे भाई की शादी तय हो गयी है, उन्हें पूजा की छुट्टियों का कार्यक्रम बदलना होगा, दिसम्बर में विवाह है, पूरे दस महीनों के बाद वह घर जायेगी सबसे मिलकर बहुत खुशी होगी. बाहर लॉन में एक छोटे कद का सरदार लड़का घास काट रहा है, अभी उन्हें पूर्णकालिक माली नहीं मिला है. आज दूधवाला ज्यादा दूध दे गया है आइसक्रीम बनानी है.
आज सुबह भी पिछले दिनों की तरह नूना ने रोजमर्रा के कार्य किये, आँख में हल्का दर्द हुआ तो लेट गयी और फिर नींद खुली पौने ग्यारह बजे, ग्यारह बजे भोजन का समय है जब वह घर आता है, कल शाम कुकर का वाल्व भी उड़ गया था, दाल पतीले में बनानी थी, पूरे चालीस मिनट लगे, जून आते समय वाल्व ले आया था. उसने कुकर में लगा दिया है. कल वह भीग कर आया था तब पूर्णिमा, पड़ोस में रहने वाली लड़की यहीं बैठी थी, उसने दो पौधे लाकर दिये व अपने पेड़ के जामुन भी. उसने बताया कि कैसे वह अपने भाई को बिना बताए फिल्म देखने जाती है चुपके-चुपके अपनी सहेलियों के साथ.