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Tuesday, July 24, 2012

पौधे पर जोंक




आज एकाएक इतने दिनों बाद डायरी उठा लेने के पीछे कारण है, कल जून उसके लिये एक स्लैक्स लाए हैं जिसे पहन कर वह व्यायाम करेगी और एक अलार्म घड़ी, सुबह-सुबह उठाने के लिये. सुबह इतनी सुंदर होती है वह तो जैसे भूल ही गयी थी. प्रातः कालीन शांत वातावरण, शीतल हवा और रात की वर्षा के कारण धुला-धुला सा सब कुछ जैसे एक कविता लिखने का आमन्त्रण हो. सामने वाली उड़िया निवासिनी शायद अभी सो ही रही है उस दिन उसने कहा था कि सुबह पांच बजे वे दोनों साथ-साथ घूमने जायेंगे. जून अभी सोये हैं वह उठाकर तो आयी है पर नींद शायद टूटी नहीं. उनकी लेन में लगाये गए वृक्षों पर पहली बार फूल लगे हैं, बयार में धीरे धीरे झूल रहे हैं. आज शुक्रवार है क्लब में फ़िल्म का दिन, वे जायेंगे पर नन्हा आधा घंटा भी बैठने नहीं देता, उसे भला फिल्म में क्या रूचि हो सकती है. आजकल हर बात अपनी मनवाना चाहता है. जून परेशान हो जाते हैं. उसे भी कभी-कभी झुंझलाहट होती है पर अगले ही पल लगता है प्यार से ही समझाना होगा.

आज की सुबह कल की तरह शीतल नहीं है, वह उठकर बाहर आयी तो खिड़कियाँ खोल दीं व पंखा बंद कर दिया था कि सुबह की ताजी हवा कमरे में भर जायेगी, लेकिन बाहर हवा नहीं है सो उसने पुन पंखा चला दिया यह सोचकर कि नन्हे और जून को गर्मी लगेगी. तभी उसने देखा कि उड़िया लड़की साइकिल चलाकर लौट रही है, तो वह वजन घटाने के लिये यह करती है, इसका अर्थ हुआ कल भी वह सोयी नहीं थी. कल बड़ी भांजी को जन्मदिन कार्ड भेजा और आज चचेरी बहन को स्वेटर का पार्सल भेजना है. वातावरण की उमस उसे परेशान करने लगी, सुबह-सुबह तो मन शांत होना चाहिए, मधुरतम भावनाओं से भरा हुआ. उसे लगा वह भीतर से कठोर हो गयी है, लिखना छोड़ वह शेष कार्य करने भीतर चली गयी.

कल इतवार था वह उस पड़ोसन के साथ घूमने गयी थी, उन्होंने काफ़ी लम्बा चक्कर लगाया एक घंटा लग गया. आकर लेट गयी और पांच मिनट बाद ही जून भी उठ गए, सो लिख नहीं सकी, बाद में याद आया तो सोचा कि इतवार के लिये डायरी में जगह ही कहाँ होती है. आज वह हरसिंगार के फूल लायी है. जहाँ वह बैठी है उसकी चप्पल के पास एक जोंक का बच्चा है दो सेंटीमीटर लम्बा होगा  होगा. उस रात को जून के पैर पर एक जोंक चिपक ही जाती उसे पता चल गया. आज थोड़ी ठंड है अब हर दिन ज्यादा ही होती जायेगी, वे शिलांग से जो फूलों के पौधे लाए थे उन्होंने जमीन पकड़ ली है, अभी गुलाब की कलम में अंकुर नहीं फूटे हैं जीवन के. कल रात उनके बायीं ओर वाले पड़ोसी वापस आ गए पूरे पन्द्रह दिनों के बाद, अभी अभी गृहणी बाहर आयी थीं, लाइब्रेरी से वह दो पुस्तकें लायी थी, अभी पढ़ी नहीं हैं. 

Tuesday, January 17, 2012

बूंदाबांदी


कल बड़े मजे की बात हुई, महरी जब काम करके चली गयी, पांच-दस मिनट कुछ छोटा-मोटा काम करने के बाद नूना ने घड़ी की ओर देखा तो दस बजे थे, सो रोजाना की तरह खाना बनाने रसोई में  गयी. एक घंटे बाद खाना बना कर कमरे में आयी तो फिर दस बजे थे. घड़ी देखी, चल रही थी तो इसका अर्थ हुआ कि पूरा एक घंटा पहले उसने भोजन बना दिया था. उस समय नौ ही बजे थे. जून भी सुनेगा तो हँसेगा. आज वर्षा नहीं हो रही है पर गर्मी नहीं है, जुलाई में भी कल रात ठंड थी, चादर लेकर नहीं सोयी थी सो ठंड के कारण नींद नहीं आ रही थी, फिर मन सपने देखने लगा, कहाँ- कहाँ के सपने. कल लाइब्रेरी में धर्मयुग के दो नए अंक दिखे, सारिका पढ़े कितने दिन हो गए हैं. उसके आने में अभी वक्त है सो टाल्सटाय की पुस्तक पढ़ने का उपयुक्त समय है.

कल प्रेमगीत फिल्म देखी, बड़ी हँसी आयी, हँसी आयी सो फिल्म देख कर ही उठे. संगीत अच्छा था, यही बात फिल्म के पक्ष में जाती है. आज वह फिर भीग कर आया था, जबकि नूना को मना करता है भीगने से.
आज भी वर्षा का ही साम्राज्य रहा, लाइब्रेरी गए तो भीगते हुए और लौटे तब भी बूंदाबांदी हो रही थी. घर पर भी वर्षा होती होगी, रसोई से कमरे तक जाने में माँ भीग जाती होंगी.