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Friday, April 3, 2026

बोटेनिका में फूलों के पेड़

बोटेनिका में फूलों के पेड़


परसों शाम वे नन्हे के घर गये, छोटे भाई की छोटी बिटिया से मिलने, जो दोपहर को आयी और उसी रात की बस से अपनी एक मित्र से मिलने चिकमगलूर जा रही है।कल जून का जन्मदिन था, नूना ने उनके लिए एक कविता लिखी।आज पंद्रह अगस्त के अवसर पर स्वतंत्रता दिवस का उत्सव सोल्लास मनाया, वहाँ भी एक कविता उसने पढ़ी। उसके बाद सभी मिलकर पहली बार मेद्दूर के लिए रवाना हुए, पहली बार मेदु वड़ा खाया। 


सुबह नींद खुलने से पूर्व स्वयं को देखा, अचानक एक चेहरा सम्मुख आया, और उसके भीतर किसी ने कहा, अरे, यह तो वह ख़ुद है ! गुरुजी कहते हैं, परमात्मा की भक्ति पहले अन्य पुरुष फिर मध्यम पुरुष तथा अंत में उत्तम पुरुष पर समाप्त होती है। ‘वह’ से ‘तुम’ और ‘तुम’ से ‘मैं’ पर, जब तक ऐसा न हो, दूरी बनी ही रहती है। भीतर जाना अब सहज हो गया है, जैसे कोई बाहर से घर के भीतर आये। प्रातः भ्रमण से आकर प्राणायाम किया और सूर्य नमस्कार के छह चक्र। नाश्ते में जून ने उत्तपम बनाया। दिन में नूना अनुवाद कार्य करती रही, जब जून पूरे घर में लकड़ी का फ़र्श लगवाने की बात करने शहर गये थे। दिवाली से पहले घर का रूप काफ़ी बदल जाएगा। इस इतवार को नन्हा घर में होम ऑटोमेशन लगाने वाला है। वर्टिकल गार्डन के लिए आटोमेटिक इरीगेशन सिस्टम भी लग जायेगा। लिए पापाजी ने फ़ोन पर ओशो की किताब में पढ़े एक प्रश्न और उसके उत्तर का ज़िक्र किया,जो उन्हें अच्छा लगा। बड़े भाई का फ़ोन आया, वह बिटिया का सामान ‘गति’ से मँगवाने की बात कह रहे थे, जो महीनों से यहाँ स्टोर में पड़ा है। 


अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हुकूमत क़ायम हो गई है। दुनिया के लगभग सभी मुल्क चिंता कर रहे हैं कि वहाँ मानव अधिकारों का हनन होगा। कल बड़े भांजे का जन्मदिन है, अगले हफ़्ते छोटे भाई का, जो मेहसाना के ओशो आश्रम में रहा दो दिनों के लिए, वह दोनों के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखेगी।जून खाद व मिट्टी के लेकर आज नन्हे के यहाँ गये हैं, वहाँ माली गमलों की मिट्टी बदलने वाला है। आज पूरे दक्षिण भारत में देवी लक्ष्मी को समर्पित ‘वरलक्ष्मी’ का विशेष उत्सव मनाया जा रहा है।नन्हा-सोनू और उसके माँ-पापा आये थे, उन्होंने पापा जी से भी बात की, उनके लिए असम की चाय भेजी है। सोनू अगले हफ़्ते गोहाटी जा रही है, ननिहाल का पुश्तैनी घर किराए पर चढ़ाना है।  


आज सुबह उन्होंने रक्षा बंधन का उत्सव सोल्लास मनाया, सभी बहनों-भाइयों से भी बात हो गयी। सुबह पहली बार वे बोटेनिका में टहलने गये। वहाँ हरे-भरे खेतों व मैदानों की हरियाली देखते ही बनती है, ख़ाली सड़कें और उनके किनारों पर लगे गुड़हल, कंचन के फूलों के वृक्ष, नीला आसमान, दूर से पहाड़ भी नीले लगते हैं, सभी कुछ शोभायमान व सुंदर था। जून की पीठ में हल्का दर्द है, वे थोड़ी देर में ही लौट आये। घर में वुडेन फ़्लोरिंग का काम समाप्त होने वाला है। नन्हे ने डीजेआई ओस्मो मोबाइल सेल्फ़ी स्टिक लाकर दी है, जिसमें तस्वीरें ले सकते हैं और वीडियो बना सकते हैं।पापाजी से बात हुई, छोटी भाभी, छोटी बिटिया का घर सेट करने जा रही है। 


आज नैनी नहीं आयी, उसके दामाद की भतीजी की मृत्यु हो गयी है, पाँच दिन पहले जिसने संतान को जन्म दिया था। मृत्यु किसी भी क्षण, किसी भी रूप में आ सकती है। पिछले कई दिनों से अफ़ग़ानिस्तान में लोग जान पर खेल रहे हैं। कल के बम ब्लास्ट में अमेरिकी सैनिक मारे गये। अतीत में की गई भूलों का फल आज की पीढ़ी को भोगना पड़ रहा है। आज सुबह यू ट्यूब पर गरुड़ पुराण का कुछ अंश सुना था, मृत्यु के बाद कुछ हफ़्तों तक आत्मा विचरती है। मृत्यु से पहले आवाज़ चली जाती है, फिर मानव को दिव्य दृष्टि मिलती है, वह अपने पूरे जीवन को एक साथ देख पाता है, फिर उसे ले ज़ाया जाता है, तथा दो दिन बाद वापस लाया जाता है, तब वह अपने शरीर की अंतिम क्रियाएँ होते हुए देखती है। तेहरवीं के बाद वह आगे की यात्रा पर जाती है और कर्मों के अनुसार सुख या दुख का अनुभव करती है। कल इतवार है, जून नाश्ते में पोहे की एक मीठी डिश बनाने वाले हैं, जो वर्षों पूर्व सिंगापुर में खायी थी। दोपहर को सब लोग आश्रम जाएँगे। 


आज सुबह उठी तो एक ख़ुशनुमा स्वप्न देख रही थी। स्वप्न में क्या था, यह तो जरा भी याद नहीं, पर मन बहुत आनंद से भरा था, उठकर ऐसा लगा। दोपहर का लंच आश्रम के रेस्तराँ में खाया। आश्रम से दो किताबें भी ख़रीदीं, जो सोनू की मॉम ने उसे उपहार में दीं।आश्रम जाना सदा ही अच्छा लगता है, वहाँ की हवा में गुरुजी की उपस्थिति है।शाम को निकट स्थित मुनिरत्ना नर्सरी से वे मधु मालती का एक पौधा लाये हैं, कल सुबह माली लगा देगा, उस स्थान पर, जहाँ पैशन फ़्रूट लगा हुआ था।नैनी ने पपीते के पेड़ से दो पपीते तोड़कर दिये।कच्चे पपीते के पराँठे की बात सोचते ही उसे माँ की स्मृति हो आती है।  

   

आज कृष्ण जन्माष्टमी है, नूना ने कृष्ण पर लिखी पुरानी कविताओं को पढ़ा और कुछ सुधार किया।सुबह उठी तो मन रात को देखे विचित्र स्वप्न की याद से भरा था।जून साइकिल लेकर फूल ख़रीदने गये, एक बड़ी सी माला भी लाए, जो उन्होंने कृष्ण की तस्वीर पर लगायी है। मंदिर बहुत सुंदर लग रहा है। दिन भर फलाहार किया। दोपहर को कुछ कविताएँ टाइप कीं, जो डायरी में इक्कठी हो गई थीं। 


अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाने वालों के लिए आज अंतिम दिन है, कल से तालिबान का शासन चलेगा। कल रात कोई स्वप्न नहीं देखा, आज सुबह आत्मा का बोध दृढ़ हुआ। अब अचेतन, चेतन, अवचेतन मन जैसे कोई भी हिस्से अनजाने नहीं रह गये हैं, अतीत की कोई स्मृति, कोई भी कृत्य, कोई भी बात न ही दबाने लायक़ है, न ही छिपाने लायक़। अतीत आत्मा के अंतर में झलक भी जाता है तो कोई अंतर नहीं पड़ता। जैसे दर्पण में आग झलक जाये तो दर्पण नहीं जलता। आत्मा को कुछ भी छू नहीं सकता। होश में किए कृत्य अपने साथ फल नहीं लाते पर बेहोशी में किए कृत्यों का फल तो भोगना ही पड़ता है। 


आज नाश्ते  में पहली बार ज्वार का दोसा खाया। शाम को टहलने गये तो पार्क-सात के पास एक बड़ा सा सारस पक्षी देखा, जो शायद भटक कर आ गया था, या आहत था। छोटी बहन का फ़ोन आया, बहनोई की आँख में धुँधलापन आ गया है, जो कैट्रेक के बाद हो जाता है, जून उनकी रिपोर्ट लेकर शेखर नेत्रालय जाएँगे। कल नन्हे के साथ जून के एक पुराने अधिकारी के यहाँ नाश्ते पर जाना है। काव्यालय पर ‘भाषा उत्सव’ के लिए हिन्दी का एक लेख लिखना है।

 

Thursday, July 13, 2023

दिवाली के दीपक

दिवाली के दीपक 

रात्रि के पौने नौ बजे हैं। आज मौसम ठंडा है। सुबह वे टहलने गये तो तापमान सत्रह डिग्री था, जैकेट पहनकर नहीं गये थे, शुरू में ठंड लगी फिर तेज चलने से गर्माहट आ गई; साइकिल चलाने से तो ठंड भाग ही गई।आज विज्ञानमय कोष के बारे में सुना। अथाह ज्ञान है शास्त्रों में। मानव शरीर में कितना बल, ज्ञान और शक्ति का भंडार छुपा  है। इसी देह में जन्म लेकर कोई मानव देवता बन जाता है। अवतारी पुरुष, संत, साध्वी स्त्रियाँ सभी के पास तो वही मानव देह तथा मन, बुद्धि है, जिसे साधकर कोई भी चाहे तो अपने जीवन को उन्नत कर सकता है। दोपहर को कपूर तथा सिट्रेनेला की सुवास डालकर पहली बार मोमबत्तियाँ बनायीं। दिवाली पर जलकर वे प्रकाश तथा सुगंध  फैलायेंगी। उत्सव को तीन-चार दिन ही रह गये हैं। उनके पड़ोसी हुसूर जाकर ढेर सारे पटाखे लाए हैं, उन्हें लाने की ज़रूरत ही नहीं है, देख-सुन कर ही काम चल जाएगा। कुछ पिछले वर्ष के बचे हुए हैं। बहुत दिनों बाद छोटी बहन से बात हुई, कुछ उदास थी, पर हर दुख उन्हें आगे ले जाता है। गुरू माँ से ‘गुरु गीता; का पहला भाग सुना। कह रही थीं, यदि रात को स्वप्न आते हैं तो मन अभी भी विचारों से मुक्त नहीं है। उसे स्वप्न तो आते हैं पर कुछ न कुछ सिखाने के लिए, किसी न किसी समाधान के लिए। छोटी भांजी के जन्मदिन पर एक कविता लिखी।


आज धन तेरस है। सुनील इलेक्ट्रीशियन ने छत पर व गैराज में बिजली की झालरें लगा दी हैं। दिवाली के विशेष भोज सूची भी बनाकर वे दिवाली की ख़रीदारी करने गये और इसी एरिया में स्थित वृद्धाश्रम में मिठाई देने भी। फ़ेसबुक पर उसकी कविता की पापा जी ने सुंदर शब्दों में तारीफ़ की है। महादेव में गणेश को गज का सिर लगा दिया गया है, कितनी विचित्र गाथा है गणपति के जन्म की और शिव से उनके प्रथम मिलन की।वैसे शिव से मिलने के लिए सभी को अपना सिर कटवाना ही पड़ता है। 


आज नरक चतुर्दशी है यानि छोटी दिवाली, कल के लिए बैठक में विशेष सजावट की है। विशेष भोज की भी थोड़ी बहुत तैयारी कर ली है।बच्चे सुबह-सुबह आ जाएँगे। अभी फ़ोन किया तो पता चला वे घर से बाहर दिये जला रहे थे। छोटी बहन से बात की, वे लोग भी घर में लाइट लगवा रहे थे। आज वह प्रसन्न थी, इंसान का मन कितना नाज़ुक होता है। आत्मा दृढ़ होती है, जिसे कुछ भी छू नहीं पाता।


सुबह समय पर उठे, वातावरण में जैसे उत्साह फैला हुआ था। नन्हा व सोनू आये तो उन्हें रवा इडली का नाश्ता करवाया। दोपहर को पंजाबी छोले-चावल व आलू-परवल की लटपटी सब्ज़ी। शाम को विधिवत दिवाली की पूजा की, बाहर दीपक जलाये। एक-दूसरे को उपहार दिये। जून के लिए लाल सिल्क का कुर्ता लाए हैं वे और उसके लिए भी सिल्क की एक ड्रेस। वर्षों से इसी तरह उत्सव मानते आ रहे हैं, पर हर बार एसबी कुछ जैसे नया-नया सा लगता है। दीपकों के प्रकाश में सबके चेहरे कैसे किसी अनजानी ख़ुशी से दमकने लगते हैं। रात के भोज में नन्हे के कुछ मित्र आये। वे अपने साथ पटाखे लाये थे, सभी मिलकर बाहर जलाते रहे। उसने पनीर मसाला, सूरन के कोफ़्ते, ग्वारफली व आलू की सब्ज़ी, रायता और पुलाव बनाया, मिठाइयों की पूरी एक क़तार थी, पर सभी की ज़्यादा रुचि आतिशबाजी में थी।कुल मिलकर यादगार दिवाली रही। 


आज गोवर्धन पूजा है, अर्थात गायों की वृद्धि के लिए कामना करने का दिन, प्राचीन  काल में पशु धन से ही किसी की सपन्नता का भान होता था। आज साइकिल के गियर आये, एक्स बॉक्स पर कार रेस का गेम खेला। दोपहर को बच्चे वापस चले गये। शाम को तेज वर्षा हुई थी पर रात होते-होते रुक गई। इस समय पड़ोसी के यहाँ से बम फूटने की आवाज़ें आ रही हैं।संभवत: दिवाली के पटाखे अभी तक समाप्त नहीं हुए हैं और न ही उनका जोश ! 


Tuesday, May 26, 2020

नागालैंड फेस्टिवल



आज सुबह वे उठे तो बाहर गहन कोहरा था. इस वर्ष ठंड जल्दी शुरू हो गयी है और ज्यादा भी है. दो वर्ष पहले वे इस समय पंखा चलाते थे, आज ही पुरानी डायरी में कुछ देख रही तो पढ़ा. जून टीवी पर नागालैंड के बारे में यू ट्यूब का एक वीडियो देख रहे हैं, जिसमें ग्रीन विलेज खोनोमा पर एक डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही है. ‘खोनोमा’ एक गाँव है, जहाँ पहले जंगल काटे जा रहे थे तथा शिकार के द्वारा जंगली जानवरों को खत्म किया जा रहा था पर वहां की जनता सजग हो गयी और अब वह स्थान पुनः हरा-भरा हो गया है. इस माह के अंत में वे वहाँ जाने वाले हैं. नागालैंड की यात्रा में उन्हें अपने साथ कुछ रेडी टू ईट वाला भोजन भी ले जाना होगा. वहां शाकाहारी भोजन मिलने में कुछ परेशानी हो सकती है. आज से क्लब के वार्षिक कार्यक्रम के लिए रिहर्सल भी आरंभ हो गयी है. आज बंगाली सखी का जन्मदिन है, दो वर्ष पहले तक वे उनके घर जाकर बधाई देते थे पर आज व्हाट्सएप पर ही शुभकामनाएँ दे दीं. वक्त बदलता है तो लोग भी बदलते हैं और रिश्ते भी बदलते हैं. छोटी बहन के यहाँ दो दिन बाद सत्संग है, गुरूजी के यूएई आने की ख़ुशी में. 

फिर कुछ दिन का अंतराल ! दिन जैसे पंख लगाकर उड़ रहे हैं. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं. जून आज देश की राजधानी गए हैं, नन्हा भी जाने वाला था पर अभी तक उसे उस अस्पताल के मैनजमेंट ने डेट नहीं दी जो उनके क्लाइंट हैं. जून ने उसे देने के लिए सामान भी खरीद लिया था, जो अब घर ले आएंगे. गुरूजी ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन लिखे उसके कमेंट पर कमेंट किया है यू ट्यूब पर, यह अवश्य ही उनकी टीम ने किया होगा, उनके पास इतना समय नहीं होता होगा, पर वह चाहें तो सब कर सकते हैं. उनकी कृपा का ही फल है कि आज विश्व में लाखों व्यक्ति अध्यात्म से जुड़ रहे हैं. वह कहते हैं, जीवन में जो भी दुःख आता है वह अज्ञान का फल है, उन्होंने कभी न कभी इस दुःख का बीज डाला था. वे जितना-जितना बाहर सुख खोजते हैं भीतर का सुख ढक जाता है. भीतर का सुख भुलाकर जब बाहर से लेने जाते हैं तो इसे ही मोह कहते हैं. सुख के लिए बाहर किसी को दुःख नहीं देना है, संसार की कोई वस्तु इतनी कीमती नहीं है जिसके लिए संसार को दुःख दिया जाये. भीतर का सुख खो न जाये इसके लिए भी सजग रहकर किसी को दुःख न हो जाये, इसका ध्यान रखना है.

नागालैंड की यात्रा से वे लौट आये हैं, यात्रा सुखद थी और यादगार भी. वर्ष का अंतिम महीना आ गया है. देखते ही देखते यह वर्ष भी विदा हो जायेगा. इस महीने कई कार्यक्रम हैं, पहले सप्ताह में घर में डिनर पार्टी है, जो चार परिवार एक साथ मिलकर नागालैंड गए थे, वे सभी एक साथ मिलकर उन तस्वीरों को देखेंगे और एक नागा परिवार को बुलाएँगे जिसने इस यात्रा में उन्हें सहयोग दिया. दूसरे सप्ताह में महिला क्लब का वार्षिक उत्सव है. जिसकी तैयारी में उसे भी काफी समय देना पड़ेगा. उसके अगले दिन ही जून के पूरे विभाग की पिकनिक पार्टी है. उसके तीन दिन बाद उन्हें दुबई की यात्रा पर निकलना है. जहाँ से नए वर्ष के आरंभ  होने के बाद ही लौटना होगा. आज छोटे भाई के विवाह की सालगिरह है. 

कल का पूरा दिन विभागीय पिकनिक के नाम था. वे लोग सुबह जल्दी ही निकल गए थे, नदी किनारे टैंट लगाया, एक मेज भी ले गए थे जिसपर सुबह का नाश्ता लगा दिया गया था. फुटबाल, बैडमिंटन, रस्साकशी आदि खेलने का भी प्रबंध था. नदी में उतरे वे लोग फिर धूप में रेत पर लेटे रहे, कुछ लोगों ने गाने गाये, कुछ ने अभिनय किया. कुछ यूँही टहलते रहे. दोपहर का भोजन एक रेस्तरां वाला लेकर आया, वह अपने साथ ही सब कुछ लाया था बड़ी सी वैन में. दो मेजें जोड़कर उसने लन्च सजा दिया. उसे वह पुराने दिन याद आये जब पूरा भोजन खुद बनाया जाता था, लकड़ी का चूल्हा जलाकर, दो-तीन पत्थर जोड़कर वे चूल्हा बनाते थे. घण्टों खाना बनाने में ही लग जाते थे, पर उस भोजन का स्वाद ही अलग होता था. अब कोई भी यह ज़िम्मेदारी उठाना नहीं चाहता सो बना-बनाया भोजन ही मंगवाना पड़ता है. 

Friday, January 24, 2020

कर्म का बंधन


 कल दोपहर पहली बार अकेले कार चलायी। सुबह गैराज से गाड़ी निकाली और वापस डाली, पर अभी बहुत अभ्यास करना है. संकरी जगह से कैसे गाड़ी निकाली जाती है, और ट्रैफिक में से कैसे बाहर लायी जाती है, इसे सीखने में काफी समय लगेगा, लेकिन अभ्यास तो जारी रखना होगा. शाम को भजन सन्ध्या थी. उसके पूर्व अस्पताल गयी. एक सखी दो दिनों से एडमिट है. उसका पुत्र युवा हो गया है पर मानसिक रूप से बालक है. शारीरिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं है. चौबीस घण्टे उसका ध्यान रखना पड़ता है. घर में सास-ससुर भी आये हैं. काम का बोझ ज्यादा है. रात को नींद पूरी न होने के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया. आज गुरू माँ को सुना, पित्त की अधिकता से कितने रोग हो जाते हैं. कफ व वात बिगड़ने से भी षट क्रियाओं को करके शरीर को शुद्ध किया जा सकता है. आज सुबह सुंदर वचन सुने, ‘सुख और दुःख के ताने-बाने से बुना है जीवन, यह जानकर उन्हें दोनों से ऊपर उठना है. राम चाहते तो वन जाने से मन कर सकते थे, पर उन्हें वन जाने में दुःख प्रतीत नहीं होता था. वह राजमहल में रहकर सब सुख भोग चुके थे, वहाँ कोई सार नहीं है, यह जान चुके थे. कर्म का फल सदा के लिए नहीं रहता, कोई भी दुःख आता है जाने के लिए. इसलिए दुःख के कारण आये बुरे वक्त को साधना के द्वारा काट लेना चाहिए.’ जो घट चूका वह खुद के ही कर्मों का फल मिलना था, वर्तमान में भूख-प्यास व नींद के अलावा कोई दुःख है ही नहीं. प्रकृति उनकी परीक्षा लेती है पर श्रद्धा रूपी देन भी उन्हें परमात्मा से मिली है. श्रद्धा को मजबूत करने के लिए ही प्रकृति उनके सामने नयी-नयी परिस्थितियाँ लाती है. जब वे दृढ रहते हैं तो प्रकृति सहायक बन जाती है. शाम के साढ़े छह बजने को हैं. सदगुरू कितनी सरलता से कर्म बंधन से मुक्त होना सिखा रहे हैं. उन्होंने कार्य सिद्धि के तीन उपाय बताये, पहला है प्रयत्न, दूसरा है जो प्राप्त करना है, वह मिला ही हुआ है, यह विश्वास. तीसरा है धैर्य. जैसे बीज हमें मिला है, उसे पोषित करना है. कार्य को सिद्ध करने के लिए, कार्य को सिद्ध हुआ मानकर ही प्रयत्न करने से मन सन्तुष्ट रहता है. यह रहस्य है. परमात्मा को पाना है तो यह मानना है कि वह मेरे पास है, और उसके बाद सत्संग, साधना आदि करना है. सुखी है मानकर जो बढ़ता जाता है, वह सुखी ही रहता है. साधन व साध्य में भेद नहीं मानना है. योगी है मानकर योग करने से योग सिद्ध होता है. मानसिक शांति ज्ञान से ही मिलती है. इसी माह गुरू पूर्णिमा है, गुरूजी के लिए एक कविता लिखेगी. प्रेम, ज्ञान सभी कुछ परमात्मा की देन है, जब कोई यह जान लेता है तो खुद के साथ-साथ समाज के लिए भी उपयोगी बन जाता है. उनके जीवन से एक महक फैलेगी तो वे भी सुखी रहेंगे औरों को भी उनसे सुख मिलेगा ! पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, इस समय पौने ग्यारह बजे हैं, भोजन बन गया है. जून थोड़ी देर में आने वाले हैं. भागते हुए समय से कुछ मिनट निकाल कर खुद से बात करने का सुअवसर ! आज एक वरिष्ठ रिश्तेदार का जन्मदिन है, पर सुबह भूल ही गयी, उन्होंने स्वयं ही याद दिला दिया, उम्र ने उन्हें परिपक्व बना दिया है. कल क्लब की एक सदस्या से बात की, उनके लिए कुछ लिखा और संबन्धी के लिए भी, उन्होंने वाह ! वाह ! कहकर तारीफ़ की है, पर उसे उसका प्रतिदान लिखने में ही मिल गया. हिंदी लेखन प्रतियोगिता में उसे पुरस्कार मिला है, लिखने वाले कम हैं शायद इसलिए.. उत्सव मनाना अहंकार को पोषित करना ही हुआ न. तारीफ होने पर जो प्रसन्नता का अनुभव करता है वही अपमान होने पर दुःख का भी अनुभव करने वाला है. मन जब इससे ऊपर उठ जाता है, संकल्प रहित हो जाता है. तब संसार नहीं रहता, यानि पल भर में ही इस संसार से मुक्त हुआ जा सकता है. परमात्मा जो अचल, घन, चेतन स्वरूप है, उसमें टिका जा सकता है.


Friday, June 28, 2019

मेजी की आग



रात्रि के पौने आठ बजे हैं. रात्रि भोजन हो चुका है. कल गायत्री समूह की सदस्याएं 'सत्संग पिकनिक' का आयोजन कर रही हैं. उनके लॉन में ही सब मिलेंगे. सभी अपने घर से कोई पकवान बना कर लायेंगी. भजन, नृत्य, 'सूर्य ध्यान' के बाद भोजन, फिर वे मिलकर नन्हे के विवाह की व अन्य तस्वीरें देखेंगे. हाँ, पहले फूलों को निहारने रोज गार्डन भी जायेंगे. आज सुबह वे टहलने गये तो देखा, बच्चों के पुराने स्कूल का कुछ भाग गिरा दिया गया है. नये स्कूल का मुख्य द्वार अब स्पष्ट दिखाई देता है. शाम को स्कूल की मीटिंग में गयी. क्लब की प्रेसिडेंट काफ़ी बदलाव ला रही हैं. कुछ पुराने लोग जा रहे हैं, नये आ रहे हैं. स्कूल का भविष्य अच्छा नजर आ रहा है. सुबह उसकी एक पुरानी हिंदी की छात्रा अपनी माँ के साथ मिलने आई. कोहिमा स्थित अपने गाँव के चावल लायी थी  और स्थानीय कला का एक लकड़ी का कटोरा. उसने भी उसे एक उपहार दिया. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अनुभव आज शाम को योग साधना के दौरान हुआ और सुबह ध्यान में भी. परमात्मा उनके कितने करीब है, उन्हें उसकी प्रतीति करनी है प्राप्ति नहीं, वह तो सदा ही सब जगह है !  

आज का दिन स्मृति पटल पर एक सुखद अनुभव बनकर अंकित हो गया है. उन्होंने ढेर सारी तस्वीरें उतारीं. भजन गाए, ध्यान किया, कई खेल खेले. सभी लोग आये और स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ लाये. उसने विवाह की तस्वीरें दिखाईं तथा वह कविता भी सुनाई जो नन्हे के विवाह के अवसर पर पढ़ी थी. पिताजी से बात की, धूप में बैठे थे. अब उनका स्वास्थ्य ठीक है पहले की अपेक्षा. आज गुरूजी को सुना, 'भक्ति सूत्रों' पर उनकी व्याख्या पहले भी सुनी है. वह बहुत सरल भाषा में बोलते हैं, अध्यात्म को बिलकुल सहज बना दिया है उन्होंने. जून की फरमाइश पर मूड़ी के लड्डू बनाये आज. कल लोहरी है.

आज पूरे उत्तर भारत में लोहरी का उत्सव मनाया जा रहा है. नये वर्ष का प्रथम उत्सव ! उन्होंने भी अग्नि जलाई, एक मित्र परिवार आया था. मूंगफली, फुल्ले, लड्डू, गजक खाने खिलाने का दिन. कल मकर संक्रांति है, यानि पतंग उड़ाने का दिन. कल इतवार है और परसों जून का अवकाश है, वे डिब्रूगढ़ का जगन्ननाथ मंदिर देखने जायेंगे तथा मन्दिर के निकट स्थित पार्क में भी. आज दोपहर को तिनसुकिया गये थे. सुबह नींद खुली पर दस मिनट तक उठने का मन नहीं हुआ, उस समय मन कितना शांत होता है. जब देह बिलकुल निस्पंद होती है, मन भी रुक जाता है. दोपहर को योग दर्शन पुनः पढ़ना आरम्भ किया. चित्त की अवस्थाओं का वर्णन पढ़ा आज.   

आज सुबह टहलने गये तो हर तरफ धुआं था, कोहरा और धुआं मिलकर धुंधलका फैला रहे थे. क्लब में सुबह मेजी जलाई गयी थी, आवाजें आ रही थीं. इस समय शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वे भ्रमण पथ पर टहल कर आये हैं. उससे पूर्व गमले से तोड़े एलोवेरा का जूस बनाया लौकी और आंवले के साथ. आधा घंटा बैडमिंटन खेला. नन्हा आज नये घर गया है. दो वर्ष बाद जनवरी तक तो वे वहाँ रह रहे होंगे, यानि बस एक और लोहरी उन्हें असम में मनानी है.  

Thursday, November 15, 2018

सरदार पटेल की जयंती




आज धनतेरस है, कोऑपरेटिव जाकर नैनी के लिए कुकर खरीदना है तीन लिटर का, आज के दिन  दिन बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है. अपने पास अब इतना सामान है कि लगता है, जितना जीवन बचा है आराम से गुजर जायेगा. सुबह सवा चार बजे आँख खुली, अब दिन देर से निकलने लगा है. प्रातः भ्रमण के लिए निकले तो बाहर हल्का कोहरा था. रात्रि को भीतर आग की लपट दिखी. अध्यात्म के साथ-साथ कहीं इसका संबंध स्वास्थ्य से तो नहीं है. दाहिने कान में एक रुनझुन सी ध्वनि  सुनाई दे रही है, कितने आश्चर्यों से भरा है जीवन..आज ही वे घर को कल के लिए सजा रहे हैं, वैसे भी आज से पांच दिनों का उत्सव आरम्भ हो गया है. दोपहर बाद मृणाल ज्योति जाना है. कल शाम योग कक्षा में कितना अनोखा अनुभव था, देह जैसे महसूस ही नहीं हो रही थी. कल दोपहर उस सखी से मिलने गयी जो पति के न रहने पर सदा के लिए अपने गृह स्थान को जा रही है.

आज सरदार पटेल की जयंती है और इंदिरा गांधीजी की पुण्य तिथि ! टीवी पर सुबह से विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है. सरदार पटेल ने देश की एकता बनाये रखने के लिए महान योगदान दिया है. महापुरुषों के जीवन को नई पीढ़ी के सामने रखना चाहिए. १९३० में उन्होंने महिलाओं के आरक्षण की बात कही थी. गाँधी जी ने उनके बारे में कहा है कि अहमदाबाद म्युनिसिपल कारपोरेशन में कौन बैठा है यह इस बात से पता चलता है कि विक्टोरिया गार्डन में किसका राज है, जहाँ तिलक की मूर्ति उन्होंने लगाई थी. मोदी जी की वक्तृत्व क्षमता अद्भुत है. सरदार साहब के जीवन के अनोखे प्रसंग वे सुना रहे हैं. वह कह रहे हैं, हर भारतीय को अपना विस्तार करना चाहिए, यह सारा देश उनका है. उन्हें हर प्रदेश की भाषा सीखनी चाहिए, एक-दूसरे से और भी बहुत कुछ सीखना चाहिए. सुबह उठी तो कान फिर बंद था, अस्पताल गयी, मोम जम गया है, इसी वजह से भारी था. कम्प्यूटर भी खराब था जो जून इस समय मकैनिक के साथ बैठ कर ठीक करवा रहे हैं.

वर्ष का ग्याहरवाँ महीना, मौसम अभी भी गर्म है. दो हफ्ते बाद ही ठंड शुरू होगी. सुबह वे समय पर उठे, प्रातः भ्रमण के लिए गये, आकाश पर तारे चमक रहे थे. लोगों के घरों में अभी भी प्रकाश की झालरें लगी थीं. सभी को भाईदूज के संदेश भेजे. मृणाल ज्योति ले जाने के लिए उपहार एकत्र किये. कैलेंडर बदले, शरीर का वजन लिया और इस महीने आने वाले मित्र-संबंधियों के जन्मदिन व विवाह की वर्षगांठ के दिनों का पता लगाया. इस महीने दो सखियों का जन्मदिन है और एक भांजी का, ननद के विवाह की वर्षगांठ भी है. जून परसों गोहाटी जा रहे हैं, उन्हें एक मीटिंग में भाग लेना है. उसे शनिवार को मृणाल ज्योति में प्रोजेक्टर आदि स्वयं ही मैनेज करना होगा. आज कम्प्यूटर भी ठीक हो जायेगा. भाई दूज पर भेजे टीके सम्भवतः अभी नहीं मिले, छोटे भाई ने कहा, उसे भेजने की जरूरत नहीं है, पर दिल है कि मानता नहीं. दोपहर को नर्सरी जाना है, चार तरह की गोभी की पौध लानी है, हरेक के लिए दो क्यारियां हैं. शिमला मिर्च की पौध, आलू व लहसुन के बीज भी लाने को माली ने कहा है.  

उसका कान खुल गया है पर अभी भी पूरी तरह से आवाज सुनाई नहीं देती. दीवाली पर खायी मिठाई और नमकीन का असर है या मन्दाग्नि का, भीतर कफ सूख गया है, कुछ दिन लगातार नेति करने से ठीक हो जायेगा. कम्प्यूटर ठीक हो गया है, पीपीटी भी बन गया है, जून ने वीडियोज के लिंक भी उसमें डाल दिए हैं. आज शाम को एक बार अभ्यास करना ठीक रहेगा. माली वह पौध लगा रहा है जो वह कल लायी थी.

आज बृहस्पतिवार है, साढ़े तीन बजे हैं दोपहर के, जून आज गोहाटी गये हैं, सोमवार को लौटेंगे. तब तक उसे अपने समय व ऊर्जा का भरपूर उपयोग करना है. कुछ देर में बाजार जाना है, शायद ड्राइवर आ गया हो. नन्हे ने लिखा है, उसका फोन कार में छूट गया था, आज मिल जायेगा.


Tuesday, September 4, 2018

बगिया या जंगल



पौने दस बजे हैं रात्रि के. जून कल आ रहे हैं. अभी कुछ देर पहले उसने नन्हे से बात की. उसके एक मित्र की पत्नी को स्लिप डिस्क की समस्या हो गयी है. डाक्टर ने बताया, छींक को कभी रोकना नहीं चाहिए, उसके कारण भी स्लिप डिस्क हो सकती है. बहुत दिनों बाद शहनाज हुसैन की किताब का कुछ अंश पढ़ा जो कई वर्ष पहले पुस्तक मेले से खरीदी थी. शाम को कार्यक्रम के लिए योगाभ्यास किया. क्लब की दो सदस्याओं का विदाई समारोह भी उसी दिन होगा, उनसे कल कुछ जानकारी उसने ली, दोनों के लिए कविताएँ लिखेगी. कल रात घर आने में दस बज गये, और सोते-सोते काफी देर हो गयी. एक स्वप्न भी देखा, जिसमें वह नृत्य कर रही है, पता नहीं, किसी जन्म में वह नृत्यांगना भी रही हो. कितना अजीब सा स्वप्न था. जून के जिस सहकर्मी की बेटी के पहले जन्मदिन की पार्टी में गयी थी, उसकी माँ को भी एक अन्य स्वप्न में देखा. वह ऊपर से छलांग लगाती है, उसने नई-नई जॉब शुरू की है, सुबह भाग-दौड़ कर स्कूल जाती है, शायद यही सब सुनने से ऐसा स्वप्न आया हो. हो सकता है उसके नृत्य वाले स्वप्न का भी ऐसा ही अर्थ हो. कुछ दिनों बाद जून को एक महीने के लिये बाहर जाना है, उसे काफी दिन अकेले रहना होगा. वे कुछ दिनों के लिए बड़े भाई को यहाँ आने के लिए कहेंगे.

चार दिनों का अन्तराल, शुक्र को जून आये, शनि को मृणाल ज्योति की वार्षिक सभा थी. इतवार को वैसे भी दिन भर व्यस्तता बनी रहती है. आज शाम को क्लब में परसों के कार्यक्रम के लिए रिहर्सल है. शनिवार को सुबह स्वप्न में देखा, एक लम्बे श्वेत दाढ़ी वाले बाबा ने कहा, दही खाना बंद करो. जून के घुटने में दर्द है, शायद दही खाना उन्हें नुकसान कर रहा है. उन्हें कुछ भी खट्टा नहीं खाना है. आज अस्पताल में चेकअप कराया है. उसने भी आँख दिखाई, टीयर ड्रॉप्स दी हैं, दिन में तीन-चार बार डालनी हैं. उम्र के साथ-साथ शरीर में कुछ टूट-फूट होना स्वाभाविक है. वर्षा लगातार हो रही है. धूप निकले जैसे कई दिन हो गये हैं, ऐसा लग रहा है. ग्यारह बज गये हैं, जून आने वाले होंगे. कल भाई को सितम्बर में यहाँ आने का निमन्त्रण दिया, संभवतः वे मान जायेंगे.

वर्षा ने आज सुबह सारे रिकार्ड तोड़ दिए, सारा लॉन जल से आप्लावित हो गया. इस समय धूप झाँकने लगी है, अजब है प्रकृति की लीला ! बरसात का वीडियो फेसबुक पर डाला है. दोपहर भर कितने पंछी बगीचे में गाते रहते हैं, बिलकुल जंगल का सा आभास होता है. जून के घुटनों का दर्द पहले से कम हुआ है. वे बहुत सारी सावधानियां बरत रहे हैं. सुबह योग साधना करते हैं. प्रातः भ्रमण में जो समय जाता था, अब प्राणायाम में जाता है. प्रकृति उन्हें किसी न किसी तरह मार्ग पर लाकर खड़ा कर ही देती है. भाई से अभी बात की, वह बिल्डिंग की सोसाइटी के दफ्तर में थे, उनके आने की टिकट बुक हो गयी है. स्वयं को व्यस्त रखना ही सबसे जरूरी है. कर्म ही आत्मा को शुद्ध करता है. विकर्म उसे शुद्ध करता है और अकर्म उसे आता नहीं. अकर्म का विज्ञान जिसने सीख लिया हो, उसके लिए कर्म भी आवश्यक नहीं रह जाता. सहज ही कर्म होते हैं तब. कल का कार्यक्रम अच्छा हो गया, उसने सुझाव दिया, पूरे समूह को एक साथ मिलकर एक दिन उत्सव मनाना चाहिए.

Wednesday, March 14, 2018

यूनिवर्स के संदेश



दीवाली भी आकर चली गयी. घर फिर पहले का सा हो गया है, जो पहले जगमग-जगमग करने लगा था. जून के एक मित्र ने बहुत सुंदर तस्वीरें उतारी हैं दीवाली भोज के दिन की. आज भाई-दूज है. एक-एक करके सभी भाइयों से बात हुई. उत्सव एक पुल है जो परिवारों को जोड़ता है. उत्सव एक डोर है जो दिलों को जोड़ती है या फिर उत्सव एक बहाना है निकटता का अहसास दिलाने का, वरना आजकल किसी के पास फुर्सत नहीं है, दिल की बात कहने और सुनने के लिए. उत्सव एक मंच है एकदूसरे के होने को याद कराने का. कल उन्हें यात्रा पर निकलना है. आज सुबह कैसा अजीब सा स्वप्न देखा. कीचड़ और गोबर..इन्सान स्वयं ही अपने लिए स्वर्ग और नर्क का निर्माण करता है. कल रात सोने से पूर्व देह कुछ भारी लग रही थी शायद इसीलिए, इस समय भी तन हल्का नहीं है, शाम को योग करने से ही ठीक होगा. सुबह जब जून ने कहा, उनके दांत का दर्द ठीक नहीं हुआ है, तो भीतर से कोई प्रेरणात्मक शब्द बोलने लगा, वह स्वयं भी उन शब्दों को पहली बार सुन रही थी. ज्यादातर समय तो वे सुने हुए शब्दों को ही दोहराते हैं. कभी-कभी ही ऐसे क्षण आते हैं जब शब्द किसी गहरे स्रोत से आते हैं. इस समय शाम के चार बजने को हैं. बगीचे में मालिन काम कर रही है और पाकघर में नैनी, दोनों को दीवाली का विशेष उपहार देना है, कल जाने से पहले देगी. आज मृणाल ज्योति में बच्चों के लिए मिठाई व सूखे मेवे भिजवाये. कल उस स्कूल में ले गयी थी जहाँ हफ्ते में एक बार योग कक्षा लेने जाती है. दीवाली पर उन्हें जो उपहार मिले उन्हें बाँटने का इससे अच्छा उपाय और क्या हो सकता था. नन्हे के पुराने वस्त्र भी दिए एक अन्य महिला को, जो गाँव में एक चिकित्सा शिविर लगाने वाली हैं. आज ‘यूनिवर्स’ संस्था से संदेश भी आया जो वे बांटते हैं, वही उन्हें मिलता है. परमात्मा उन्हें वही लौटाता है जो वे भीतर से बाहर फैलाते हैं !  

कल रात साढ़े दस बजे वे बंगलूरू नन्हे के घर पहुंच गये. दोपहर बारह बजे असम से निकले थे. वह चश्मा घर पर ही भूल गयी सोचा था पढ़ने की जरूरत तो रास्ते में पड़ेगी ही, जाते समय पहन कर ही जाना है, पर अभी तक हर समय चश्मा पहनने की आदत नहीं पड़ी है, सो घर पर ही रह गया. यात्रा ठीक रही. ब्रह्मपुत्र को आकाश से देखने एक अनुपम अनुभव था, तस्वीरें उतारीं. सुबह साढ़े छह बजे वे उठे तो पता चला उसका फोन कार में ही छूट गया है. जून ने ड्राइवर को फोन किया, उसने दस मिनट बाद ही बताया, फोन कार में है और वह एयरपोर्ट पर है. कुछ देर बाद दे जायेगा, वाकई वह एक घंटे बाद दे गया, और एक पुराना चश्मा उसने रख लिया था, सो यह समस्या भी हल हो गयी. यानि एक बार फिर तीर टोपी लेकर गया, गर्दन बच गयी. नन्हा और जून इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि इस सोसायटी में उन्हें घर लेना है या नहीं. आज दोपहर को एक मकान मालिक उनसे मिलने आ रहे हैं, इसी सोसायटी में उनका घर दूसरे ब्लॉक में है, जिसे वह बेचना चाहते हैं. मौसम यहाँ ठंडा है. आज धूप भी नहीं निकली है. उसके मना करने के बावजूद नन्हे ने सुबह के नाश्ते का आर्डर दे दिया है. सुबह की चाय के साथ उसने लड्डू खिलाये जो वे बनाकर लाये थे.

मौसम आज भी ठंडा है, रुक-रुक कर वर्षा होती रही. दोपहर को एक बार तो एक तेज गंध आई, बाद में पता चला मधुमक्खियों को भगाने के लिए किसी ने बेगॉन स्प्रे करवाया था. काफी अधिक मात्रा में करवाया होगा, नीचे ढेर सारी मधुमक्खियाँ मरी हुई पड़ी थीं. जून की आंख का कैट्रेक आपरेशन कल ठीक से हो गया. वे नौ बजे घर से निकले थे. साढ़े दस बजे पहुंचे और साढ़े बारह बजे वापस घर आ गये थे. समय-समय पर दवा डालनी है तथा काला चश्मा पहने रखना है, पानी से बचना है. आज सुबह नाश्ते में उसने वेजरोल बनाये और राइस नूडल्स. कल सैंडविच बनाएगी. यहाँ कुछ ज्यादा काम तो है नहीं. कम्प्यूटर पर कुछ देर काम किया, अभी शेष है. आज नन्हा देर से आएगा शायद साढ़े नौ बजे तक.

रात्रि के नौ बजने वाले हैं. नन्हा आ गया है. मौसम आज भी फुहारों भरा है. दिन भर वे घर पर ही रहे. ‘बैटमैन’ की दूसरी फिल्म देखी, कल पहली देखी थी.

आज कोई फिल्म नहीं देखी, शाम को यहीं निकट ही मॉल गये थे, अब दो दिन यहाँ और रह गये हैं, फिर घर जाना है. दोपहर को रामकृष्ण परमहंस की किताब पढ़ी. नन्हे का एक मित्र और उसकी पत्नी भोजन पर आ रहे हैं. उसने दाल व सब्जी बना दी है. जून ने रायता बना दिया है. वे लोग आने वाले होंगे. इसी हफ्ते नन्हे की मित्र असम जा रही है. जून ने उससे कहा है, घर अवश्य आये, उनका दिल बहुत बड़ा है. दिन में दो-तीन बार वे लोग नीचे उतर कर टहलने जाते हैं, ताज़ी हवा के लिए. फ्लैट्स में हवा के आवागमन की सुविधा नहीं होती. हवा बंद ही रहती है, इसलिए उन्हें खुली हवा में जाने का मन सदा ही बना रहता है. भविष्य में वे जिस घर में रहेंगे, वहाँ शायद खुली हवा का आवागमन ज्यादा अच्छा होता हो !

Monday, January 29, 2018

उड़ीसा के मंदिर


सवा दस बजे हैं, दोपहर का भोजन लगभग बन गया है. आज भी गर्मी बहुत है. पंखे के नीचे  बैठकर भी पसीना सूख नहीं रहा है. परसों दोपहर वे लौटे. सफाई का काम शुरू किया है. अगले महीने छोटी बहन आ रही है. उसके आने से पहले सभी कुछ ठीक-ठाक करना है. यात्रा विवरण लिखन आरम्भ किया  है. कल नन्हे का जन्मदिन है, कोई अच्छा सा व्यंजन बनाकर बंगाली सखी को भेजेगी. उसने परसों पनीर की स्वादिष्ट सब्जी भिजवाई थी, जब वे लौटे थे. उन्हें जो कुछ भी मिलता है, प्रकृति से, जगत से, वह उन्हें भरने के लिए है. उन्हें बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार करना आ जाये तो वे हर क्षण भरे जा रहे हैं. परमात्मा हर क्षण बरस रहा है. भीतर खाली आकाश है, जिसे जितना भी भरें वहाँ जगह है. यदि वे किसी का विरोध भी बिना विरोध के स्वीकारने की कला सीख जाते हैं तो हर क्षण उनके लिए एक नया अनुभव लेकर आता है. उनका अहंकार ही जगत से दूरी सिखाता है. उस दिन लेह में एक सखी का फोन आया, उनका तबादला पुनः यहाँ हो गया है. सम्भवतः इसी वर्ष वे लोग आ जाएँ. दुनिया गोल है, उनका जीवन भी लौट-लौट कर वहीं घूमता है. मन खाली है और भीतर एक गहन शांति है. अब जीवन जो भी लायेगा, सहज स्वीकार्य होगा !

आज गर्मी अपेक्षाकृत कम है. सुबह वर्षा के आसार नजर आ रहे थे. कल शाम काफी तेज वर्षा हुई. जून तिनसुकिया गये थे, ढेर सारे फल व सब्जियां लाये. आज नन्हे का जन्मदिन है उसने बायीं तरफ के दो दांत निकलवाये हैं, कह रहा था, काफी दर्द है. शाम को एक मित्र परिवार आ रहा है, दक्षिण भारतीय भोजन बनाया है यानि इडली, सांबर और नारियल की चटनी साथ में सेवईं की खीर और आम रस. बगिया से कच्चा नारियल भी तोड़ा है, उसके मीठे पानी के लिए. एक पका अनानास भी मिल गया. बगीचे में कटहल पकने लगे हैं, आज धोबी ने देखे, पर उसे तोड़ना नही आता. कह गया है, अगली बार ले जायेगा. वह माली से कह कर तुड़वा देगी.

साढ़े आठ हुए हैं, रात्रि के. जून को आज ही टूर पर निकलना पड़ा है, कार्य तो सोमवार को ही है, पर कल की कोई टिकट ही नहीं मिल रही थी. नन्हा घर से काम कर रहा है, उसका संदेश आया. आज नूना ने कटहल के बीजों की सब्जी बनायी थी. शाम को बगिया में कुछ देर काम किया, आजकल तितलियाँ बहुत आती हैं. गोयनका जी को सुनकर सोयी थी, स्वप्न में उन्हें देखा. सुबह स्नान के बाद एक गीत रचा पर बाद में भूल गयी, कुछ पंक्तियाँ ही याद रहीं. परमात्मा जिस क्षण मुखर होता है, तभी उन्हें अंकित कर लेना होगा. कभी-कभी ही ऐसे पल आते हैं. अब उसी का घर है उसका मन, स्वयं का होना ही तो दुःख है. मन का दूसरा नाम उलझन है, माया है, तो ऐसे मन को खाली रखना ही बेहतर है. अमन इसी में है और जब भी किसी का मन खाली हो जाता है, वही रहता है वहाँ !

इतवार की शाम. योग कक्षा में उड़िया सखी ने कोणार्क मन्दिर की कहानी बताई. मन्दिर का कलश नहीं लग पा रहा था तब एक कारीगर के बारह वर्षीय पुत्र ने आकर उसे लगाया था और स्वयं पानी में कूद गया. पुरी में सुभद्रा, बलराम व कृष्ण की मूर्तियाँ बनाने की कथा भी बहुत रोचक है. एक वृद्ध कारीगर मूर्तियाँ बना रहा था. वायदे के खिलाफ जब राजा ने उसे बीच में ही टोका तो हाथ नहीं बने थे. कितनी अनोखी कथाएं हैं भारत के अद्भुत मन्दिरों से जुड़ी. कृष्ण के पास तुलसी की सुगंध से भरा राधा का पत्र आया ऐसा एक गीत में उसने सुना था, यह भी उसने बताया. अगले हफ्ते रथयात्रा का त्यौहार है. उसी दिन ईद का उत्सव भी है. नन्हे से शाम को बात हुई, अब वह ठीक है.


Wednesday, October 12, 2016

अ टाउन कॉल्ड मालगुडी

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तीन दिन देखते-देखते बीत गये, उत्सव के दिन. लिखने का समय ही नहीं मिला. आज सुबह से बदली छायी है. कल रात भर वर्षा होती रही, ठंड बढ़ गयी है. उसने दो स्वेटर पहने हैं. फिर भी ध्यान में कंपकंपी होने लगी थी. सुबह-सुबह बाबा रामदेव मात्र धोती पहने योग सिखाते हैं. जून शिवसागर गये हैं, शाम तक आ जायेंगे. सुबह पिताजी ने कहा, रात को तीन बजे उठने पर उन्हें ठंड लगी, उसे ऊनी टोपी बनाने को कहा है. उसने कहा, उठते ही कुछ पहन लेना चाहिए, आल्मारी में उनके लिए मफलर व ऊनी मोज़े भी रखे हैं, पर वे पहनना नहीं चाहते. उन्हें इस बात से ही ख़ुशी होगी कि उसने उनके लिए टोपी बनाई, पहनें या नहीं, इससे ज्यादा अंतर नहीं पड़ता. जून ने कहा, वे चाहते हैं कोई उन्हें याद दिलाये. इंसान अपनी भी जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहता. उधर छोटी ननद उनके बिना अकेलापन महसूस कर रही है, वे लोग चाहते हैं घर के पास तबादला हो जाये. मानव को कितने प्रकार के भय सताते हैं. आज वर्षों पहले मंझले भाई द्वारा डायरी में लिखी कविता से प्रेरित होकर लिखी कविता ब्लॉग पर डाली. सुबह दृश्य और द्रष्टा के भेद का वर्णन सुना. सुख में छिपे दुःख को पहचानकर उससे मुक्ति पाने का उपाय समाधि है.

आज धूप निकली है अपने घर से, बल्कि कहें कि बादलों ने उसका रास्ता नहीं रोका है न कुहरे न न कुहासे ने. चारों तरफ कैसी रौनक हो गयी है, रंग निखर आते हैं धूप में, पिछले दो दिन सारा दृश्य एक ही रंग का प्रतीत होता था. जून के ऑफिस में एक विदेशी भूवैज्ञानिक आये हैं क्रिस्टोफर कॉनकार्ड, कल शाम वह एक मित्र परिवार के यहाँ उनसे मिली. वे लन्दन के एक गाँव में रहते हैं. पैंतीस वर्ष के थे तो अपनी पत्नी के साथ मिलकर तेल के क्षेत्र में अपनी कंसल्टेंसी की कम्पनी शुरू की, पत्नी प्रबंध करती है और वह पूरे विश्व में घूम-घूमकर अपना ज्ञान बांटते हैं. दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी, बेटी के तीन बच्चे हैं, लिखती है, बेटा सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता है. दोनों के बचपन की बातें बड़े चाव से बता रहे थे, बातें करने में कुशल हैं. उनके पूर्वज भारत में रहे, काम किया. पत्नी के दादा भी यहाँ रहे थे, हिंदी से परिचित हैं क्योंकि बचपन में सुनी थी. असम कई बार आ चुके हैं, आसपास के तेल क्षेत्र से परिचित हैं. बासठ वर्ष के हैं, इस उम्र में भी बच्चों का सा जोश है. बच्चों से प्यार भी है. जहाँ भी जाते हैं, वहाँ के स्कूलों में जाकर बच्चों से मिलते हैं और दान भी करते हैं. कुल मिलाकर सीधे, सरल व एक सहृदय कोमल दिल वाले इन्सान हैं. सेन्स ऑफ़ ह्यूमर भी बहुत है. उनके बारे में एक छोटी सी कविता वह लिखेगी. आज वे उनके साथ मृणाल ज्योति जा रहे हैं.

कल उसने एक छोटी सी कविता लिखी, श्री क्रिस्टोफर के लिए, मृणाल ज्योति का ट्रिप अच्छा रहा. शाम को उन्होंने कविता का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया. आज धूप बहुत तेज है, माँ-पिताजी बाहर धूप में ही बैठे हैं. सुबह सुना मानव को अपने बल का उपयोग संसार की सेवा के लिए करना है न कि अपने सुख के लिए !

आज नेताजी पर एक कविता लिखी. मौसम अब कम ठंडा है, बदली के बावजूद. कल पुनः आग जलायी और आग के चारों ओर बैठकर सर्दियों में मिलने वाली वस्तुएं गजक आदि खायीं, विदेशी मेहमान को बुलाया था. जो भारतीय भोजन आराम से खा लेते हैं. रात को और सुबह भी तमस भर गया था, ध्यान किया तो सत् पुनः प्रबल हो गया. साक्षी होकर इन तीन गुणों का खेल देखते ही बनता है. इस वक्त मन शांत है अर्थात सत् की प्रमुखता है. जून कल लाइब्रेरी से लायी पुस्तक पढ़ रहे हैं आर के नारायण की ‘अ टाउन कॉल्ड मालगुडी’ उसकी पढ़ाई आजकल नहीं हो पाती है. सुबह पाठ करने व नेट पर कवितायें पढ़ने के अलावा कुछ नहीं पढ़ पाती है.      


Monday, May 30, 2016

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !


Wednesday, April 6, 2016

राखी के धागे


आज ‘अंकुर बाल संस्कार केंद्र’ में बच्चों से राखियाँ बनवानी हैं, अगले शनिवार को रक्षाबंधन का त्योहार है. वे सभी मिलकर मनाएंगे. कल शाम मीटिंग में साहित्य सभा ‘जोनाली सारू’ के बारे में पता चला. मंगल को है शाम चार बजे. वह जा सकती है, जून को बताना होगा. धीरे-धीरे उसका कार्य क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. कृष्णाय अर्पणमस्तु सब उसी की लीला है. जो कुछ भी इस सृष्टि में हो रहा है वही करा हो रहा है, मूल तो वही है, जो हो सो हो उसके सारे कर्म उसी को अर्पित हैं, मन द्वारा सोचना भी तो एक कर्म है, वाणी का कर्म तथा स्थूल कर्म, सभी उसी की लिए हों. कल रात सुना अहंकार का भोजन दुःख ही है, दुःख के कीट खाकर ही वह जीवित रहता है और अहंकार किये बिना मानव रह नहीं सकता. कितना सही कहते हैं सद्गुरु, ‘मैं’ को मिटाए बिना उनके दुखों का अंत नहीं हो सकता और ‘मैं’ को दिन-रात पोषने का वे उपाय करते हैं, चाहते हैं शीतलता और मिलती है जलन, क्योंकि बढ़ते हैं आग की तरफ, दुःख को सम्भाल कर रखते हैं, शायद वे दुःख ही चाहते हैं.
परसों उन्हें मृणाल ज्योति जाना है, राखी का त्यौहार मनाने. उसने स्कूल की हेड मिस्ट्रेस से बात की, उन्होंने हिंदी में स्कूल का एक एक छोटा सा परिचय लिखने को भी उसे कहा है. कल पुस्तकालय का कार्यक्रम ठीक हो गया, दुलियाजान कालेज के एक रिटायर्ड अध्यापक से मिलना हुआ. कल कवि गोष्ठी है, उससे कहा गया है कि हिंदी के लिए भी ऐसी ही शुरुआत वह करे ! उनके पास ऊर्जा है, काम करने की इच्छा है तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं है. आज दोपहर को वस्त्रों की आलमारी ठीक करनी है, पुराने वस्त्र निकलने हैं नयों को सहेज कर रखना है, ऐसे ही उनका मन है, पुराने सड़े-गले अनुभवों को, विचारों को निकाल कर नये ताजे शुभ विचारों से इसे भरना है ताकि निरंतर आगे बढने की प्रेरणा मिलती रहे ! इसी हफ्ते दोनों कमरों में पेंट भी होना है, दीवाली से पूर्व की सफाई ! आज ध्यान में परमात्मा से एकता का अनुभव कितना स्पष्ट था, उसे आँखें बंद करते ही आत्मा का अनुभव करवाता है वही, उससे परे भी वही है, कितनी गहन शांति का अनुभव मन करता है. वे ध्यान नहीं जानते तो जीवन के एक सुंदर अनुभव से वंचित रह जाते हैं, अपने आपको जाने बिना जीवन कितना सूना होता होगा, लेकिन जब तक इसका अनुभव नहीं होता तब तक यह सूनापन भी कहाँ दिखता है ?  

कल शाम वह साहित्य सभा की मीटिंग में गई, उसे जून को बताना याद ही नहीं रहा, वहीं से फोन करके बताया, वे थोड़ा क्रोधित हुए पर जल्दी ही सामान्य हो गये, जब देखा कि उनके क्रोध का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है. पर बाद में उसे अहसास हुआ अपनी ख़ुशी के लिए किसी को परेशान करने का उसे कोई हक नहीं है. उसे उनके लिए एक कविता भी लिखनी है कल उनका जन्मदिन है, दोपहर को उन्होंने पहली बार उसे एक मनोवैज्ञानिक की तरह समझाया, जैसे पहले कई बार वह उन्हें कुछ कहती रही है. ईश्वर कितने-कितने रूपों में उनके सम्मुख आता है. वह परिपक्व हो रहे हैं, जीवन में हर एक को धीरे-धीरे ऊपर आना है, कोई जल्दी कोई देर से, पर कोई-कोई ही आत्मा को लक्ष्य बनाकर चलता है. अहंकार मुक्त होकर ही कोई शुद्ध चेतना के रूप में स्वयं को जानता है. अहंकार का अर्थ ही है वह अन्यों से भिन्न है, श्रेष्ठ है, तथा उसे संसार के सारे सुख-आराम चाहिए, उसे जीना भी है और स्वयं को कुछ मनवाकर जीना है, लोग कहें, देखो, यह फलाना है, अर्थात इस ‘मैं’ का भोजन  है द्वेष, स्पर्धा, भेद और यही सब क्रोध का कारण है, क्रोध दुःख का कारण है अर्थात अहंकार का भोजन दुःख ही हुआ, जैसे ही कोई अपने शुद्ध स्वरूप को जान लेता है, सारा विश्व एक ही सत्ता से बना है, प्रकट हो जाता है, माया का खेल खत्म  हो जाता है, अब न कुछ पाना है न किसी से आगे बढ़ना है, न कुछ करके दिखाना है, अब तो बस खेलना है, लीला मात्र शेष रह जाती है. वह असीम सत्ता जैसे छोटी सी देह में, मन में समा जाती है, अब जो भी होगा वह उसी के द्वारा होगा और वह तो एक ही काम जानता है, खेल उत्सव, मस्ती और उसके लिए सुख-दुःख, मान-अपमान समान है, वह कालातीत है, द्वन्द्वातीत है, गुणातीत है, अपरिमेय है, आनन्द, शांति, प्रेम, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और सुख का भंडार है. उसे कुछ करके कुछ पाना ही नहीं है, तो अब सारी दौड़ समाप्त हो गयी, सारा दुःख समाप्त हो गया, जन्मों-जन्मों की तलाश समाप्त हो गयी, अब तो बस होना मात्र शेष है !  

Tuesday, September 29, 2015

दीपों का उत्सव


कल दीपावली है, उन्होंने रात को दीवाली भोज का आयोजन करने का निश्चय किया है. छह-सात परिवारों को बुलाया है. आज छोटी दीवाली है, दोपहर को गुलाबजामुन बनाने का विचार है, कुछ देर के लिए क्लब भी जायेंगे. कल सुबह बच्चों को मिठाई बांटने तथा योग की कक्षा लेने भी जाना है, सो कल का दिन व्यस्तता में बीतने वाला है. आज जून को लंच पर घर आने में एक घंटे की देर हो गयी है, फोन भी नहीं किया, उसके शरीर पर भूख के लक्षण अथवा तो कहें समय पर भोजन न  मिलने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं. कल शाम को कई रिश्तेदारों से फोन पर बात हुई, त्योहार पर भीतर से जुड़ने की स्वाभाविक इच्छा जगती है. उत्सव मानव के जीवन में सरसता तो लाते ही हैं, उन्हें जोड़ते भी हैं. अभी-अभी उसने जून को फोन किया तो उन्होंने काट दिया, शायद किसी मीटिंग में हैं, और अब फोन आया, दस मिनट में आ रहे हैं.
खो जाता है छोटा मन
उत्सव घटता है
दुखों से मुक्ति का मिलता है प्रसाद
उजाले की प्रसाद युक्त आभा भर जाती है भीतर
कृतज्ञता और आनंद के मध्य में है वह
एक सौभाग्य है जिसका मिलना..
अंधकार में छिपे ढके
कुछ रह जाते हैं विहीन उससे
वंचित जीवन की एक बड़ी उपलब्धि से
खो देते हैं इस सुंदर संपदा को...   

दीपों का यह उत्सव अंतर्मुख होने के लिए है, पूरे वर्ष का लेखा-जोखा करने के लिए है. पाप और पुण्य की बैलेंस शीट बनाने के लिए है. पुण्य होने से जमा होता है और पाप से उधार होता है. क्रोध आदि पाप बाँधते हैं और प्रेम पुण्यशाली है. उन्हें देखना है कि किस तरह यह बैलेंस शीट ठीक रहे, नुकसान न हो, मुनाफा बढ़े. उनसे किसी को दुःख न हो, यदि हो भी गया तो तुरंत प्रतिक्रमण कर लें. यह जगत प्रतिध्वनित करने वाला कुआं है, उनके कर्मों के अनुसार ही उन्हें फल मिलते हैं. दीवाली पर वे यह तय करें कि सुख की दुकान खोलनी है. उनके जीवन में जो भी कोई आये उसे उनसे केवल सुख ही मिले..उनके जीवन का पूर्ण लाभ इस जगत को मिल सके, वे स्वयं को पूर्ण अभिव्यक्त कर सकें तभी उनका इस जगत में आना सार्थक होगा. उनका वास्तविक कर्त्तव्य क्या है ? धर्म क्या है ? यह गुरू ही बताते हैं. टीवी पर मुरारी बापू कह रहे हैं कि मानव जीवन पाकर भी जो भीतर की मुस्कान को जाग्रत नहीं कर सका वह पूर्ण जीया ही नहीं और वह धर्म भी धर्म नहीं जो सहज मुक्त रूप से हँसना नहीं सिखा देता.

पिछले हफ्ते मंगल को वे गोहाटी गये, माँ-पापा वापस चले गये हैं. उस दिन के बाद आज सोमवार को डायरी खोली है. इस समय सिर में हल्का दर्द है, सम्भवतः अपच के कारण. किसी ने ठीक ही कहा है, पहला सुख नीरोगी काया, उधर ससुराल में माँ को भी सिर में थोड़ी सी चोट लग गयी है वह गिर गयी थीं जब शाम को गली में टहलते समय भैंस ने उन्हें गिरा दिया. जीवन में सुख-दुःख एक क्रम से आते ही हैं. आज सुबह ध्यान करने बैठी तो कितने सारे विचार आ रहे थे, मन अपनी सत्ता बनाये रखना चाहता है. यात्रा के दौरान कई बार ऐसा लगा कि मन खाली हो गया है, कितनी शांति का अनुभव होता था तब, कल पिताजी से बात हुई, उनका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया. बड़ी बुआ व फुफेरी बहन का फोन नम्बर उन्होंने दिया, दोनों अस्वस्थ हैं, शाम को वह बात करेगी.

पुनः-पुनः वह असजग होती है और पुनः-पुनः सद्गुरु के वचन मन को नये विश्वास से भर देते हैं. वह फिर अज्ञात की ओर चल पड़ती है, वह परमशक्ति जो अपना अनुभव तो कराती है पर दिखाई नहीं देती. जगत दीखता है, मन दीखता है, विचार तथा भावनाएं दिखती हैं पर वे जहाँ से प्रकटे हैं वह स्रोत नहीं दीखता. ध्यान में वह उसी में स्थित होती है पर ध्यान भी तो ज्यादा गहरा नहीं हो पाता, यहाँ-वहाँ का कोई विचार आ ही जाता है. सद्गुरु से की गयी प्रार्थना ही मनोबल बढ़ाती है.  




Monday, May 18, 2015

लॉन में पिकनिक


नववर्ष की सुबह भी सुहानी थी, दोपहर भी पर शाम होते-होते बादल छा गये और वर्षा शुरू हो गयी. उनकी पिकनिक समाप्त हो गयी थी, सब अपने-अपने घर चले गये थे. ऐसे ही एक दिन इस जगत से उन सभी को चले जाना है. दीदी का फोन आया, कल यानि वर्ष के अंतिम दिन चाचाजी का उठाला भी इस संसार से हो गया. नये वर्ष की शुभकामना का फोन और कहीं से नहीं आया. ससुराल से अवश्य सुबह जब वे सो रहे थे पिताजी ने फोन किया था. नन्हे का स्कूल कल खुल रहा है, आज उसने पहली बार शेव की, जून ने उसकी सहायता की. आजकल नूना ने भी उसे गणित पढ़ाने में सहायता करना शुरू किया है. अच्छा लगता है अपना विषय पढ़ना. सुबह वे लगभग साढ़े पांच बजे उठे, ‘क्रिया’ आदि करके सात बजे सुबह की चाय ली. ग्यारह बजे से पिकनिक की तैयारी शुरू की जो उनके लॉन में ही होने वाली थी. शाम होने से पहले साढ़े तीन बजे सभी वापस गये और उन्होंने थोड़ा आराम किया. सुबह गुरूजी ने कहा था कि राम विश्राम में ही है, काम में नहीं. सो नींद की जगह उसने शवासन किया. देह में उठने वाली छोटी से छोटी संवेदना को भी महसूस करना एक सुखद अनुभव है. प्राण को विचरते हुए भी देखा जा सकता है और सुबह-सुबह स्टील के गिलास में पानी पीते समय उसके किनारों को कई परतों में बंटे देखा और उस पर प्रकाश के सातों रंगों की चमक भी एक अच्छा अनुभव है. त्राटक में फर्श की अथवा दीवार की सतह का आकर्षक रूप धरना, प्रकाश के एक बिंदु का विस्तृत होते जाना और कानों में एक मधुर ध्वनि का निरंतर गुंजन...ये सरे अनुभव उसे इस जगत में होते हुए भी इस जगत से परे रखते हैं. स्नानघर में वस्त्रों से भरे टब का हिलना तथा आँखें बंद करके भी टीवी स्क्रीन का दिखाई देना भी सुखद अनुभव हैं. यह जगत उन्हें जैसा दिखाई देता है वैसा ही नहीं भी हो सकता. यह उनकी नजर पर ही निर्भर करता है, उनका मन ही इस जगत की उत्पत्ति का कारण है !
आज उसने नैनी के बेटे पर ट्रांजिस्टर तेज बजाने के लिए क्रोध किया, क्रोध करते समय या पहले इसका भान ही नहीं था, बाद में इसकी व्यर्थता का अनुभव हुआ, उसे यही बात धीरे से भी कही जा सकती थी. स्वीपर समय पर नहीं आया तो सेनिटेशन दफ्तर में फोन किया, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने के बजाय आधा घंटा बाद पुनः फोन कर दिया, अर्थात उस पूरे समय मन में वही बात घूम रही थी. साधक के लिए जरूरी है कि मन को खाली रखे. धर्म को धारण करना होगा, इस जगत के सागर को पार करने के लिए तैरना सीखना पड़ेगा. स्वयं में परिवर्तन लाना है और स्वयं में आया सुधार ही आस-पास के वातावरण को शुद्ध करेगा. सद्गुरु कहते हैं जीवन को उत्सव बनाना है. समर्पण जब जीवन की रीत बनती है तभी ऐसा सम्भव है.
अज सुबह ‘क्रिया’ के बाद अनोखा अनुभव हुआ, सम्भवतः योग वशिष्ठ में पढ़े हुए वचनों का असर हो पर ऐसा लगा जैसे समस्त ब्रह्मांड उसके सम्मुख है, घूम रहा है और वह उससे पृथक है परमपद को प्राप्त ! मन तब से फूल सा खिला है. वास्तविक जीवन भी यही है जब कोई भीतर के आनंद को पाले, बाहरी किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति का मोहताज न रहे. आज उनके विवाह की वर्षगाँठ है, जून ने कहा, नूना का कार्ड तो वही है और उसने कहा जब स्वयं को ही दे दिया तो उपहार में और क्या दे ? जून और वह गुरुकृपा से से ही इस प्रेम को पा सके हैं जो वस्तुओं का अथवा सामीप्य का भी मोहताज नहीं है. जून दोपहर को दिल्ली जा रहे हैं. वे प्रेम में हैं उसी तरह जैसे विवाह से पहले थे. ईश्वर को पा लेने के बाद हृदय से यूँ ही प्रेम छलकता है, और जून भी अब प्रभु की ओर कदम बढ़ा चुके हैं. आज सुबह पिताजी का फोन आया, फिर फूफाजी, बुआ जी का भी. सभी सखियों के भी फोन आ चुके हैं. कल रात छोटी बहन का फोन आया, वह थोड़ी सी उदास थी, ईश्वर से उसके लिए भी प्रार्थना है ! मौसम आज भी खुशनुमा है. सुबह नन्हे ने भी शुभकामना दी और उससे भी पूर्व कान्हा ने भी...वह प्रेममय ईश्वर सदा उनके साथ है, हर क्षण वह उनके निकटतम है...सब कुछ वही तो है !