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Thursday, May 30, 2019

शब्दों के बीज



आज हफ्तों बाद सुबह लिखने का सुयोग मिला है. कल रात से लगातार वर्षा हो रही है. भीषण गर्जना के कारण रात को एक बार नींद खुल गयी, जब आई तो बहुत दिनों बाद एक दुःस्वप्न देखा. पिताजी व माँ को भी स्वप्न में काफ़ी देर तक देखा. उन्होंने कोई फोटो खोजने को कहा था, जब पूछा, मिल गया तो याद आया, अभी तो खोजना भी शुरू नहीं किया. एक स्वप्न में उन्हें मदद के लिए बुलाती है, आवाज भी दी है, और कानों से उसे सुना भी. स्वप्नों की दुनिया कितनी विचित्र होती है. आज धौती व नेति दोनों की, तन हल्का लग रहा है. जून ने कहा है अपना सोनी का नोटपैड मृणाल ज्योति के एक टीचर को दे देंगे. कोई वस्तु किसी के काम आये, इसीमें उसकी सार्थकता है. दीवाली के लिए घर की सफाई का कार्य चल रहा है, पर हो सकता है इस दीवाली पर वे बंगलूरू जाएँ. वहाँ की दीवाली भी देखने योग्य होगी.

आज 'हिंदी दिवस' है. व्हाट्सएप पर संदेश भेजे. फेसबुक पर हिंदी दिवस की शुभकामनायें दीं. इसके अलावा तो हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कुछ नहीं किया. छोटा सा लेख या कविता जो हिंदी के महत्व को दर्शाती हो, अभी भी लिखी जा सकती है. बचपन से हिंदी की कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते हिंदी के लेखकों-कवियों का सान्निध्य प्राप्त करते-करते यह भाषा इस तरह भीतर घुल-मिल गयी है कि थोड़े से प्रयास से ही कुछ भीतर से झरने लगता है. शब्दों के बीज जो बचपन में बोये थे मन की धरती पर, वह आज विचारों की पत्तियां और शाखाओं के रूप में खिल रहे हैं. वे ऋणी हैं इस भाषा के, जिसने उन्हें सूर, तुलसी के रूप में कृष्ण और राम का अवतार दिया. गीतों और कविताओं की एक लम्बी श्रंखला जो हिंदी के साहित्य को समृद्ध कर रही है, उनकी धरोहर है. इसे सम्भालना है, इससे पोषित होना है और इसे पल्लवित भी करना है !

शाम के सात बजे हैं, कुछ देर पूर्व ही वे डिब्रूगढ़ से आये हैं. उसने कुछ वस्त्र खरीदे और जून ने विवाह के कार्ड्स पर लगाने के लिए स्टिकर्स लिए. नन्हे से बात की, वह परसों मुम्बई जा रहा है. कोकिला बेन और हिंदुजा अस्पताल के मैनेजमेंट से मिलने, वे उसकी कम्पनी के बड़े क्लाइंट हैं. अपनी मेहनत के बल पर कम्पनी आगे बढ़ रही है, पर वह अपनी सेहत का ध्यान ठीक से नहीं रख पाता है. आज जून ने दोपहर का लंच अकेले किया, दोपहर को उसे महिला क्लब द्वारा चलाये जाने वाले छोटे बच्चों के स्कूल जाना पड़ा. डेढ़ घंटे से भी कुछ ज्यादा समय सभी अध्यापिकाओं के साथ अध्यक्षा का भाषण सुनते हुए बिताया. उसे आश्चर्य होता है, वह इतना समय तक बिना थके कैसे बोल लेती हैं. आज श्वास लेते हुए कई बार पूल की चौड़ाई पार की. प्राणायाम करते समय भी श्वास को पूरी तरह अनुभव किया, इतने वर्षों से श्वास को देखने का ध्यान किया है पर श्वास को आरम्भ से अंत तक इस तरह महसूस पहले नहीं किया था. सुबह टहलने गयी तो चलने में जरा भी प्रयास नहीं करना पड़ रहा था. उठने से पूर्व एक स्वप्न में अपने किसी पूर्व जन्म का दृश्य देखा, एक कहानी जैसा. जिसमें एक लड़की दरजिन के पास कपड़े सिलवाने जाती है, जिसे किसी शाह ने उसके लिए खरीदे हैं. इस जन्म के कई सवालों के जवाब इस स्वप्न में मिल गये.  

Thursday, March 28, 2019

ओस की बूँदें



तीन दिनों का अन्तराल ! डायरी लेखन की कला अब जैसे छूटती जा रही है. रात्रि के पौने नौ बजे हैं. जून बंगलूरु हवाई अड्डे से नन्हे के घर जा रहे हैं. पांच-छह दिन बाद आयेंगे. उसे इस समय का उपयोग अपनी साधना में करना होगा. सुबह कितने सुंदर वचन सुने थे, जिनकी सुगंध से मन का कण-कण अभी तक भीगा हुआ है पर क्या कहा था, कुछ भी याद नहीं है. कल से साथ-साथ नोट कर लेना उचित होगा, पर शब्दों का उद्देश्य तो पूर्ण हो ही गया. गुरूजी कहते हैं जो शब्द मौन में ले जाते हैं, वे ही सार्थक हैं. शाम को एक पुरानी परिचिता का फोन आया, दोपहर को भी एक सखी का फोन आया था, कल से इन दोनों को व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल कर लेगी. दोपहर वाली सखी नन्हे की तारीफ कर रही थी. उसने इन्हें न केवल अपने घर आने का निमन्त्रण दिया, बल्कि कहा, नाश्ता भी यहीं करें और यहीं से उनकी बिटिया कालेज जाये. उसका कालेज यहाँ से निकट है. वह नन्हे के बचपन की बातें भी बता रही थी, उसका पुत्र और नन्हा साथ ही बड़े हुए हैं. कल ही एक अन्य पुरानी सखी ने फेसबुक पर वर्षों पहले की एक समूह तस्वीर पोस्ट की, उसमें की एक महिला ने कल से ही योग कक्षा में आना आरंभ किया है. वक्त कैसे बिछुड़े हुओं को बार-बार मिलाता है. आज दोपहर मृणाल ज्योति गयी थी. नेट पर दिव्यांगों के लिए सरकार की तरफ से चलाई जाने वाली योजनाओं के बार में पढ़ा. उसे उनके लिए एच आर पालिसी बनाने के लिए कुछ सुझाव देने को कहा गया है. नन्हे और सोनू से बात की, सोनू ड्राफ्ट बनाकर कल तक भेजेगी.  

परमात्मा स्वयं की उपस्थिति जताता है. वह अनंत ज्ञान का सागर है. वही आत्मा रूप से इस देह में व अनंत देहों में विद्यमान है. इस सृष्टि का चक्र कितनी कुशलता से चला रहा है. वास्तव में प्रकृति में सारी क्रियाएं हो रही हैं. यह हाथ कलम के माध्यम से लिख रहा है, चेतन इसका साक्षी मात्र है. बुद्धि में चिन्तन चलता है, मन में भाव उठते हैं, इन्हें भी कोई देखता है. रात्रि के नौ बजने को हैं, जून अपने गन्तव्य पर पहुँच गये हैं. सुबह नन्हे के आसन करते हुए फोटो उन्होंने भेजे, अच्छा लगा. मौसम आज काफी गर्म है. तापमान चौंतीस डिग्री है. दीदी घर आ गयी हैं, और छोटी बहन अपने घर. मंझला भाई अपनी नई पोस्टिंग पर चला गया है. जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहता है.

आज सुबह सवा चार बजे नींद खुली. सुबह होने के बाद भी वातावरण में उमस थी, हवा बंद थी, हरी घास पर नंगे पैर चलने से गर्मी का असर कुछ कम हुआ. प्राणायाम करने बैठी तो एक सखी का फोन आया. उसकी तबियत कल रात से ही खराब है, पतिदेव टूर पर हैं. बुखार, पेट दर्द और सिर दर्द भी. नहाकर हार्लिक्स पीया, फिर सात बजे से कुछ पहले ही उसके घर गयी फिर अस्पताल. नौ बजे घर लौटी, उसके लिए नाश्ता बनाकर आई. उसकी बिटिया को दोपहर के भोजन के लिए निमन्त्रण देकर. उसे चिल्ड्रेन मीट के लिए डांस प्रेक्टिस में भी जाना है. सबसे बड़ा बल है आत्मा का बल और वह जन्मता है श्रद्धा और प्रेम से. स्वयं तथा परम के प्रति आस्था से. किताब जो लाइब्रेरी से लायी थी काश्मीर पर, काफी रोचक है, कुछ देर बाद पढ़ेगी.

शाम के पांच बजे हैं. बाहर धूप है, शायद शाम तक बदली छा जाये. जून मदुराई से वापस बंगलूरू पहुँच गये हैं. आज वे उनका नया घर विला देखने जाने वाले हैं. परमात्मा ने उन्हें कितना कुछ दिया है. इस सुंदर सृष्टि में मानव जन्म दिया, सद्गुरू का सान्निध्य दिया. यह सृष्टि कितनी रहस्यपूर्ण है. यहाँ वे कुछ भी तो नहीं जानते. गुरूजी के सुंदर वचन सुने. कितना अद्भुत ज्ञान उन्होंने सरल शब्दों में दे दिया. आज की सुबह सुंदर थी. हरी घास पर ओस की बूंदे थीं, उन पर टहलना व ज्ञान के मोतियों को भीतर समेटना एक साथ हो रहा था. दोपहर को नैनी बगीचे से ढेर सारी सब्जियां लेकर आई. पड़ोसी के यहाँ भिजवाई, पर उनके यहाँ भी इतनी ही सब्जी हो रही है. इसी बहाने उससे बात हो गयी. कल क्लब की प्रेसिडेंट से ‘योग दिवस’ पर ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘बेसिक कोर्स’ कराने के सिलसिले में बात की. अब वह सखी स्वस्थ है पर उसकी बिटिया के हाथ में चोट लग गयी है, एक्सरे कराया है, परसों रिपोर्ट मिलेगी. मिलने गयी तो उसने औरा देखना सिखाया और एक ध्यान के बारे में बताया जिसमें सभी चक्रों पर विभिन्न रंगों का ध्यान करना होता है.

Tuesday, September 27, 2016

लैप टॉप पर कविता


आज जून लंच पर घर नहीं आ रहे हैं. सुबह-सवेरे वे दोनों टहलने गये थे, ठंडे मौसम का सामना करो तो सारी ठंड काफूर हो जाती है. नया वर्ष आने वाला है, उसके मन में नये-नये सूत्र आने लगे हैं, नये साल के लिए लोग कितने प्रण लेते हैं. सर्दियों की सुबह में कैसी शांति पसरी है चहुँ ओर, कोई जल्दी नहीं है. समाचारों में सुना, कल बनारस में शीतला घाट पर बम विस्फोट हुआ, आरती का वक्त था, विदेशी सैलानी भी थे, घायल हुए कुछ, एक बच्ची की मौत भी हुई. आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी चली गयी हैं, और कितने हृदयशून्य हैं आतंकवादी.

नेट नहीं चल रहा है आज, ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. वह डायरी में एक कविता खोज रही थी, माना सुंदर है जग, सुंदर... फिर से लिख सकती है, बहुत समय व्यर्थ किया उसकी खोज में, कई बार वे यूँही व्यर्थ के कामों में लग जाते हैं. सोये हुए व्यक्ति की यही निशानी है. दोपहर को भोजन के बाद जब आराम कर रही थी, मन में कितनी पंक्तियाँ गूँज रही थीं, नये वर्ष की कविता के लिए. आज मौसम ने फिर करवट ली है, बदली छायी है, ठंड बढ़ गयी है, सब घर के भीतर ही बैठे हैं. कल वर्षों बाद गुरूजी की पुस्तक God loves fun दुबारा पढ़ी. बहुत अच्छी लगी, आज उन्हें सुना भी, कितने सहज रहते हैं वह और कितने केन्द्रित भी..अनोखे हैं वह और वे भी कितने भाग्यशाली हैं कि उनके होते हुए वह आए हैं धरती पर ! कह रहे थे, शब्दों को अर्थ मानव देते हैं, लोगों को नाम भी वे देते हैं, धारणाएँ वे बनाते हैं, सब उनका खुद का ही किया धरा है. वे व्यर्थ ही अपने विचारों को इतना महत्व देते हैं, जो उन्हें कहीं का नहीं रखते, आज तक इन शब्दों ने क्या भला किया है जो आगे करेंगे.. जो शब्द मौन में ले जाकर छोड़ दें वही काम के हैं !

शनिवार को वे पिकनिक पर गये, रविवार को मैराथन में भाग लिया, आज प्रेस जाना है और कल विशेष बच्चों के स्कूल. जून के दफ्तर में ऑडिट चल रहा है, अभी तक आये नहीं हैं. बादल नहीं हैं पर बाहर घना कोहरा है. परसों धूप इतनी तेज थी जैसे मई-जून में होती है, कल दिन भर वर्षा होती रही और आज.. कुदरत अपना सारा खजाना खोल के बैठी है, अलग-अलग मौसम के रंग बिखर रहे हैं. भीतर साक्षी भाव दृढ़ हो रहा है या नहीं इसका भी पता नहीं चलता..परमात्मा और आत्मा तो एक ही हैं फिर भान किसे हो, कोई हो तो उसे भान होगा, वहाँ एक मौन है..एक शून्य..एक आकाश. कल पिताजी ने उसकी कविताएँ पढ़ीं, बल्कि सुनीं, छोटा भाई उन्हें पढ़कर सुना रहा था. सम्भवतः वह स्वयं भी लैप टॉप ले लें, फिर स्वयं ही पढ़ सकेंगे.

आज एक अनोखा अनुभव कुछ पल के लिए हुआ ही होगा. शास्त्रों के वचन घटित होते स्पष्ट दिखे. स्वयं को पानी की तरह जिस जगह गयी उसी रूप में ढलते देखा, फिर स्वयं में टिकते हुए भी देखा. वृत्ति जैसी हो वैसा ही रूप स्वयं भी धर लेता है मन और वृत्ति कब कौन सी उठ जाएगी, उन्हें भी पता नहीं होता और वे उन विचारों को इतना महत्व देते हैं..सब माया है..सम्भवतः अब जाके उसे ध्यान का सूत्र समझ में आया है. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखने की कोशिश करेगी..

एक चुलबुली हंसमुख कन्या
पढ़ती होटल मैनेजमेंट
पहली बार है घर छोड़ा

मस्ती करना शौक है उसका
पाक कला में हुई निष्णात
रंगत गोरी सुंदर मुखड़ा..

Friday, March 13, 2015

बारिश और छाता


कबिरा इस जग में आय के अनेक बनाये मीत
जिन बाँधी एक संग प्रीत वही रहा निश्चिंत !

उस एक से जब लौ लग जाती है तो जीवन फूल सा हल्का हो जाता है, कोई रूई के फाहों की तरह गगन में उड़ने लगता है. वह एक इतना प्यारा है, इतना अपना कि दिल भर जाता है उसकी याद में. वह हर पल मित्र की तरह साथ रहता है, कुशल-क्षेम को वहन करता है. उसकी कृपा असीम है, अपार है, उस पर किसी का जितना अधिकार है उतना संसार की किसी भी वस्तु पर नहीं. उसकी सारी बातें ही निराली हैं, उसका बखान करना जितना कठिन है उतना ही आसान भी ! एक शब्द में कहें तो प्रेम वही तो है, सभी में उसका ही प्रकाश है. सद्गुरु की आँखों में उसकी ही तो चमक है, उनकी मुस्कान में उसका ही रहस्य झलकता है, उनके हृदय की गहराई में एकमात्र वही बसता है. उस अशब्द परमात्मा को शब्दों से नहीं जाना जा सकता. वह मौन है उसे मौन में ही ढूँढना होगा. कोई जितना-जितना अपने आस-पास की ध्वनियों के प्रति सजग होता जाता हैं उतना-उतना ही उसे मौन का भी आभास होता है. दो ध्वनियों के बीच का मौन और वह बेहद प्रभावशाली होता है, शब्दों से कहीं ज्यादा, उस मौन में उसे अपने होने का अहसास तीव्रता से होता है. अपने वास्तविक शून्य रूप का ! वही उन्हें पहुंचना है, जहाँ न राग है न द्वेष, न संयोग हैं न वियोग, न अच्छा न बुरा ! उस अद्भुत लोक में प्रवेश करने के लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है. ध्यान का अर्थ है कोई अपने को जो आज तक मानता आया है उससे अलग सच्चे स्वरूप को जानना. ईश्वर को जानना हो तो अपने आप को जानना होगा.

आज सुबह ध्यान में नवीन अनुभव हुआ, जैसे वह एक गहरी सुरंग में उतरती जा रही है, फिर कुछ शब्द सुने जो अप्रिय थे. एक बार विपासना में सुना था आत्म मंथन के समय सभी तरह के अनुभव होंगे लेकिन यह याद रखना है जो उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है अत किसी भी अच्छी या बुरी संवेदना को महत्व नहीं देना है. मन को समत्व भाव में स्थिर रखना है. आज सुबह संगीत की कक्षा हुई. दोपहर को एक हास्य फिल्म देखी. अख़बार पढ़ा. नन्हा अभी तक कोचिंग से आया नहीं है, वर्षा हो रही है उसके पास छाता तक नहीं है. परसों शाम वह डांट खाने के कारण बहुत नाराजगी व्यक्त कर रहा था पर कल दोपहर उतनी ही ख़ुशी व्यक्त कर रहा था. हर रात के बाद सवेरा आता है, हर दुःख के बाद सुख. पिछले हफ्ते छोटी बहन का फोन सुनकर उसने उसे व्यर्थ ही सुझाव दिए. अस्वस्थ होना तो कोई भी नहीं चाहता पर अगर कोई किसी कारणवश हो भी जाता है तो दुखी होने का कारण नहीं है. “जो पहले नहीं था वह बाद में भी नहीं रहेगा” और वे मात्र शरीर तो नहीं हैं जो थोड़ी सी परेशानी से ही व्यथित हो जाएँ, भविष्य में ध्यान रखेगी. उन्हें अपनी आत्मिक शक्ति पर भरोसा रखना है. रोग तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं. बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, संत यही तो कहते आए हैं कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग ये चार व्याधियाँ ऐसी हैं जिनका भाजन हरेक को बनना है. इनसे कोई जीवात्मा बच नहीं सकता. आत्मा जो परमात्मा का ही अंश है अपनी जीने की इच्छा के कारण ही देह धारण करता है और फिर इन चारों के चक्रव्यूह में फंस जाता है. माया का बंधन काट दें तो इन चारों का अस्तित्त्व नहीं रहता ! 


आज तीन महीनों की छुट्टियों के बाद नन्हा स्कूल गया है. उसका हृदय उसके लिए शुभाशीष और शुभकामनाओं से युक्त है. जैसे आज तक वह अपनी पढ़ाई में सफल रहा है वैसे ही आगे भी रहेगा. आज सुबह वे तीनों सुबह चार बजे उठे. वह समय से पहले ही तैयार हो गया था. जून और उसने सुबह साधना भी की. ईश्वर के सम्मुख होकर यदि वे अपने दिन का आरम्भ करें तो दिन भर मन सात्विक भावों से पूर्ण रहता है. कृष्ण उनके अंतर में ज्ञान का दीपक जलाकर स्वयंमेव तम को मिटने का संकल्प करते हैं. कल इस का अनुभव हुआ, गीता का एक श्लोक उसे अपने आप याद आया और मन में विचारों की एक अनवरत श्रृंखला.. जो एक भाव को ही पोषित कर रही थी, प्रवाहित होने लगी, जैसे तेल की धार. उसे विश्वास है कि एक दिन एक ऐसा क्षण इसी जन्म में आयेगा जब उसके मन में ऐसा ठहराव आयेगा जिसके बाद और दौड़ नहीं करनी होगी. जब मन ध्यान में टिकाना नहीं पड़ेगा बल्कि टिका रहेगा. अभी उस लक्ष्य से दूर है, पर कृष्ण उसके साथ हैं. अंतर में उसी का उजाला, बुद्धि में उसी का प्रकाश और आत्मा में उसी का प्रेम...वह प्रिय से भी प्रिय उसके मन पर अपना पूर्ण अधिकार कर चुका है ! वही उसे मुक्त करता है इस जग से !

Thursday, February 20, 2014

धूप के कतरे


क्लब की प्रेसीडेंट का फोन आया, उन्होंने कार्यक्रम की थीम के लिए कुछ नाम पूछे, वह फोन पर बहुत विनम्रता से, मधुर आवाज में बात कर रही थी. उसने कुछ शब्द बताये, आड़ोलन, आह्वान, आह्लाद, स्फुरण, स्पंदन, समन्वय, तारतम्य, अनुराग, शुचिता, अनुरक्ति, मकरंद, पराग, किसलय आदि, पर कोई भी शब्द उनके दिल को स्पर्श नहीं कर सका. आज नन्हे ने सुबह उठने में फिर नखरे किये, ठंड में बिस्तर से निकलने का उसका मन ही नहीं था. उन्होंने टीवी पर एक साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा, भारत ने पाकिस्तान को हरा कर बांग्लादेश का independence cup  जीत लिया.

रात्रि के पौने दस बजे हैं, सुबह से लिखने का समय अब मिला है, वह भी उसने चुराया है, जून तो सो जाने को ही कह रहे हैं. आज दिन अच्छा था, सुनहरी धूप से भरा हुआ. एक दिन की धूप से ही ठंड कम हो गयी है. संगीत की कक्षा ठीक रही पर उसे लगता है जितना सहज होकर वह  अभ्यास करती है वहाँ वह सहजता खो जाती है. अगले हफ्ते उनका हारमोनियम भी आ जायेगा. सुबह माँ ने कपड़े प्रेस कर दिए थे. उसने नाश्ते में पोहा बनाया था, उन्हें पसंद आया, माँ-पापा को भी यहाँ रहना अच्छा लग रहा है, और उनका जीवन भी पहले से कहीं ज्यादा भरा हुआ हो गया है. उसने ध्यान दिया है कि आजकल मन एक अलग तरह से शांत रहता है. बैकडोर नेबर के यहाँ गयी, जिसने घर में ही ब्यूटी पार्लर खोला है, पर वहाँ वह ‘मिस इंडिया’ की माँ का फेशियल करने में व्यस्त थी, उनके गर्व भरे शब्दों व उनकी बेटी की बातें उनके मुंह से सुनीं, TOI में उसका फोटो भी देखा. पहली बार असम की कोई सुन्दरी प्रतियोगिता में विजयी हुई है. शाम को उनकी मीटिंग सामान्य रही, इतने से काम के लिए सभी area coordinators को बुलाना व दो घंटे बिठाए रखना सार्थक नहीं लगा, खैर ! अभी तक भी थीम के लिए सही शब्द नहीं चुना जा सका है, महिलाओं से सम्बन्धित ऐसा शब्द उन्हें चाहिए जो उनके बारे में सब कुछ कहता हो !

जून अभी-अभी गये हैं छाता लेकर, सुबह से जो बादल झींसी के रूप में बरस रहे थे अब तेज हो गये हैं. आज भी पार्लर का अनुभव कुछ अलग ही रहा, एक तो समय बहुत लगाया, दूसरे घरों में काम करने वाली चार-पांच लडकियाँ भी आ गयीं, उस छोटे से कमरे में इतने लोग, क्यों न हों, आखिर वे उसकी क्लाइंट थीं. माँ सुबह से जून के स्वेटर में डिजाइन डालने का प्रयास कर रही थीं, काम चाहे कठिन हो अगर उन्हें विश्वास हो कि कर सकेंगी तो वह उसे छोडती ही नहीं हैं और अगर थोड़ा सा गलत हो जाये तो पूरा खोलने में जरा भी हिचकिचाती नहीं हैं. दोपहर को टीवी पर दूर दर्शन के धारावाहिक देखती हैं, औरत, अपराजिता और वक्त की रफ्तार....आदि. पिता दिन भर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं, लाइब्रेरी से वे किताबें लाये थे, एक लता मंगेशकर पर लिखी किताब दूसरी सरदार पटेल के जीवन पर. शाम को जून उन्हें सांध्य भ्रमण पर ले जाते हैं. उसने सोचा, जून हैरान होते होंगे यह देखकर कि आजकल नूना दोपहर के भोजन से पहले फल और बाद में कोई स्वीट डिश वह कितने आराम से खा लेती है, इन्सान का बचपन साये की तरह सदा उसके साथ लगा रहता है.

नेता जी का जन्मदिन, आज धूप सुबह से ही भरपूर निकली है, जमीन का कतरा-कतरा धूप से भर गया है. दोपहर उन्होंने लॉन में गुजारी, घास पर फूलों के बीच, मगर सूरज की तरफ पीठ करके. नन्हा आज सर्दी खांसी के कारण स्कूल नहीं गया था. जून का फोन आया है, वह उसे डॉ के पास ले जाने आ रहे हैं. एक परिचिता अस्पताल में है, उसने सोचा वह भी उसे देखने चली जाएगी.

पिछले दो-तीन दिन डायरी नहीं खोली, इतवार को वे तिनसुकिया गये थे, माँ-पापा ने केन का कुछ सामान खरीदा और कुछ तांत की साड़ियाँ भी. उसका चिर-प्रतीक्षित हारमोनियम खरीदने का स्वप्न भी पूरा हो गया, पर अभी उँगलियाँ अभ्यस्त नहीं हो पा रही हैं, संकोच वश पूरी आवाज से गा भी नहीं सकी, सभी लोग घर में थे. कल छब्बीस जनवरी का अवकाश था, टीवी पर ‘सरदार बेगम’ देखी, श्याम बेनेगल की एक फिल्म. आज सुबह उसने बहुत दिनों बाद statistics पढ़ाई. हिंदी का कोर्स समाप्त हो गया है. उस दिन बहुत दिनों बाद असमिया सखी आई, पहले की तरह कुछ नुक्ताचीं और कुछ प्रशंसा के भाव से भरी...कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, वे यहाँ के जीवन से अन्तुष्ट हैं, कहीं भी और जाना चाहते हैं, पर उसे यह स्थान पसंद है, यहाँ की हवा, मिटटी, सुगंध सभी कुछ ! उसकी खुशियाँ उसके विचारों और कार्यों पर आधारित हैं न कि किसी बाहरी वस्तु पर.








Friday, March 29, 2013

बूंदी का रायता



आज पैतालीसवां गणतंत्र दिवस है, उसने सोचा, क्यों नहीं मिलते वे शब्द जो भावों को बिना मुलम्मा चढ़ाए व्यक्त कर सकें, ऐसे भाव जो दबे ढके पड़े हैं, मन के ब्रह्मांड की असीमता में, अनुभव सीमित हैं लेकिन उम्मीदें हजार, इन छोटे-छोटे टुकड़ों को धो-पोंछकर, संवार कर  एक गलीचा बनाना है जो रंगदार तो हो ही, कोमल भी हो, जो आकाश के नीले रंग से मिलता-जुलता हो और धरती की हरियाली से भी ! कभी तो यह भटकाव खत्म होगा और उसकी कलम से झर-झर करते झरने की मानिंद गीत फूट पड़ेंगे, अभी तो रास्ते पर चलते-चलते एक दीवार सी खड़ी हो जाती है आगे, वापस लौटना पड़ता है हर बार. लेकिन यह बेचैनी, यह खामख्याली सी, यह सुगबुहाहट यूँ ही तो नहीं है, कहीं कुछ है जिसे रूप नहीं मिल पा रहा है, व्यक्तित्वहीन...बेचेहरा..कोई है जो दस्तक तो दे रहा है पर उसकी आवाज अभी पहुंच नहीं रही है. अकेलेपन का अहसास ऐसे में और बढ़ जाता है...क्या दुनिया का हर रचनाकार अकेला नहीं है अपनी रचना के साथ. कौन जाने..वह तो किसी से मिली भी नहीं, मिलने का प्रयत्न ही नहीं किया.

   कल रात एक स्वप्न देखा, जिसका शीर्षक दिया जा सकता है, “प्यार”, वह अभी कॉलेज में पढ़ती है, पहली नजर में ही उसे उनसे प्यार हो गया है, जून एक स्कूल टीचर हैं, वह किसी सिलसिले में स्कूल गयी है, एक बच्चे को वे दोनों झुककर एक साथ कुछ कहते हैं तो दोनों के सिर मिल जाते हैं, फिर दूसरी बार जानबूझकर वे ऐसा करते हैं, वह घर आ जाती है पर कुछ दूरी तक वह उसके पीछे है, घर की सीढियाँ चढ़ने से पहले पलटकर देखती है, वह अपना हाथ बढ़ाते हैं, वह बढ़ाती उसके पूर्व उसकी नौकरानी वहाँ से गुजरती है, रुक जाती है फिर हाथ बढ़ाने ही वाली थी कि पिता सीढियों से उतरते हैं और वह बिना कुछ कहे ऊपर चढ़ जाती है और छत से देखती है ...और लो..वह भी ऊपर देखते हैं और उनकी नजरें मिल जाती हैं, सुबह से इस स्वप्न का नशा दिलोदिमाग पर छाया है, प्यार में इतनी कशिश है कि स्वप्न में भी इसका जादू सिर चढ़ कर बोलता है...उठते ही यह स्वप्न उसने जून को बताया, अगर रोज ऐसे मधुर स्वप्न आकर जगाएं तो..सवा नौ हुए हैं अभी कितने काम बाकी हैं पर नन्हे को स्कूल बस तक छोड़ने के बाद सबसे पहले उसने डायरी उठायी, कल दोनों घर पर ही थे, सुबह एक परिवार आया, शाम को दूसरा, दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला.

  कल सुबह मधुर थी, दोपहर मदभरी, शाम सजीली थी और रात को लेकिन नींद गायब थी, किसी का उदास रहना अच्छा नहीं लग रहा था, लोग आखिर इतने निराश क्यों हैं, कभी वह  भी ऐसे ही निराश रही होगी पर अब वे सब कल की बातें हैं..जिंदगी के छोटे-छोटे सुखों को, वर्तमान को जीने का रहस्य जान लिया है उसने और जून ने भी, उनका असीम प्रेम ही तो बल देता है, परिस्थिति कैसी भी हो, उससे निकल जाने का कोई न कोई रास्ता तो रहता ही है हमेशा. थोड़ी देर पहले वह पड़ोसिन को थोड़ी सब्जी देकर आयी अपने बगीचे की, अच्छा लगा, उसके यहाँ नई नौकरानी आ गयी है. स्वीपर आज दूसरे दिन भी नहीं आया है, पर अब समय नहीं है, पौने ग्यारह बजे हैं यानि उसके पाकगृह में जाने का वक्त, आज बूंदी का रायता बना रही है नन्हे और जून को अच्छा लगेगा यह सोचकर. कल असमिया भाषा का पहला पाठ पढ़ा अ, आ इ... ऊ तक सिर्फ स्वर, कल जून हिंदी की पत्रिकाएँ भी लाए हैं, धर्मयुग और सरिता, कितने दिनों बाद पढ़ेगी, क्लब गए तो काफी दिन नहीं हुए पर पुस्तकालय गए हो गए हैं, आज से वे टीटी खेलने भी जायेंगे.

Thursday, January 31, 2013

प्रतीक्षा स्कूल बस की



कल जुलाई का प्रथम दिन था, नन्हे का नए स्कूल में प्रथम कक्षा में प्रथम दिन ! सारी सुबह उसी में व्यस्त रही वह, पहले उसे तैयार करने में फिर उसके स्कूल भी गए वे. नन्हा खुश था, स्कूल से आकर भी बहुत सी बातें बतायीं उसने. इस समय सुबह के साढ़े दस बजे हैं, उसका मन शांत नहीं है इस समय, कारण वही उसकी नैनी...लक्ष्मी प्रसंग..लेकिन अब लगता है कि उसे इनके मामलों में ज्यादा उलझना ही नहीं चाहिए. मुश्किल तो यह है कि उसका मन कठोर नहीं है, खैर..सब लिख देने से मन कुछ हल्का होगा.

ढूँढते ढूँढते उसकी आँखें थक गयी थी
बोझिल हो गए थे पैर
दिल एक सवाल की तरह हर श्वास से यही
पूछ रहा था
कहाँ ? किधर ? कब ? कौन ?
लेकिन कोई जवाब नहीं होता कुछ सवालों का...

उसे याद आया कल घर से पत्र आया है, पिताजी ने लिखा है..’वह उसके विचार और सुझाव पढ़कर आनन्दित हुए’. आज शाम को उनके यहाँ एक असमिया परिवार आने वाला है, उसकी सखी की बहन, जीजा जी, तथा माँ आए हुए हैं, यहाँ परिवार से इतने दूर रहने पर किसी के भी यहाँ मेहमान आने पर ऐसा लगता है कोई अपना ही आया है.


अभी-अभी कहीं जाने के लिए घर से बाहर निकली पर जून के आने का समय हो गया है, आज सुबह से वर्षा हो रही है, नन्हे की स्कूल बस जब आई तो वर्षा काफी तेज थी. जून ने फोन करके मना कर किया उसे स्कूल भेजने के लिए, पर वह तैयार था और उसका मन भी उदास हो गया उसे उदास देखकर, स्कूल जाना ही चाहिए, पड़ोस का बच्चा उसकी ही कक्षा में पढ़ता है, वह भी गया. फिर जून उसे कार से छोड़ने गए. कल शाम वे लोग मेहमानों की प्रतीक्षा ही करते रहे, पर वे नहीं आए, तिनसुकिया चले गए थे.

उलझ गए सब मन के धागे
गुलझे तार हृदय वीणा के
कैसे उर का बोझ संभालूं
कैसे मन की गिरहें खोलूं
बंध कर गांठ हृदय पर बैठी
जैसे सर्प उठाये फन हो
फिर कैसे होगा मन हल्का
कैसे खिलेगा अंतर उपवन
रहूँ दूर गर जग प्रपंच से
बस अपने में अपने में बस
न कुछ लेना न कुछ देना
जीवन है इक ऐसी दलदल
गए निकट तो धंसना होगा
छीटें फिर अपने आंचल पर
बादल काले अपने मन पर छाने होंगे

दूर से आयी है हवा खुश्बुयें समोए हुए
कितनी खामोश है नदी साये डुबोए हुए

कल वह  किताब आ गयी, “हजार वर्ष की हिंदी कविता”, जो उन्होंने पिछले महीने मंगाई थी. जून ने कहा यह किताब इतने पैसों की नहीं लगती, उन्हें डाक का खर्च भी देना पड़ा था, लेकिन पैसों से नहीं आंकी जा सकती कीमत इन कालजयी कविताओं की. एक सौ पचासी कवियों की कविताएँ हैं इसमें. कुछ पढ़ी हैं उसने, इतनी सारी कवितायें एक साथ..कुछ तो इतनी अच्छी हैं कि मन में कहीं अंदर तक छू जाती हैं. आज उसके पास काफी वक्त है, नन्हा आज जल्दी उठ गया था सो सभी काम जल्दी जल्दी हो गए, कल उसकी स्कूल बस छूट गयी थी, कितना रोया था वह, कितना प्यारा है वह और कैसी बड़ी-बड़ी बातें करता है, स्कूल जाना उसे बहुत अच्छा लगता है. और अब शब्दों का खेल- यानि एक प्रयास- विषय क्या होना चाहिए, हाँ ‘कविता’ का विषय भी कविता ही होना चाहिए
कविता रस की धार जो प्रस्तर में भी बहा करती है
कविता मीठी कटार जो दिल में गहरे चुभा करती है
कविता इक आधार जिस पर मन पीड़ा आश्रय बनाती है
कविता इक संसार जिसे स्वप्नों की धूप जगाती है
कविता मन का प्यार जिसे पा बगिया खिल जाती है