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Wednesday, November 1, 2017

पंछियों के गीत


बगीचे में पत्ते बिखरे हैं. कल आंधी-बारिश आई थी, उसके बाद से सफाई नहीं हुई है. माली की पत्नी को बुलवाया था पर शायद वह व्यस्त है. उसकी दूसरी पत्नी का बच्चा छोटा है. कुल मिलाकर घर में पांच बच्चे हैं, व्यस्तता तो रहेगी ही, शायद थक कर सो रही हो. इस समय भी बदली छाने को है, शाम को पुनः वर्षा होगी, मौसम विभाग का भी यही कहना है, लो, बूँदें पड़नी शुरू भी हो गयी हैं, जबकि कहीं-कहीं नीला आकाश झांक रहा है. शाम को शोकाकुल परिवार में जाना है, आज उनका दामाद आ रहा है. मालिन आ गयी है, सोचा, उसके साथ कुछ देर बगीचे में ही रहेगी. कल शाम क्लब में मीटिंग थी, एक गायिका ने ऊंची आवाज में गीत गाये, संगीत बहुत तेज था. एक ने नृत्य किया, छह ढोलकिये थे साथ में, उसे जरा नहीं भाया. कार्यक्रम का स्तर बढ़ने की बजाय घटने लगे तो दर्शकों की संख्या घटना स्वाभाविक है. नन्हे का फोन आया था, वह चेन्नई के रास्ते में होगा इस समय. वह स्वतंत्र है और इसका आनन्द ले रहा है.

रात्रि के सवा आठ बजे हैं. आज बुजुर्ग आंटी का श्राद्ध था, वे सुबह से ही व्यस्त थे. कल मई दिवस के कारण जून का दफ्तर बंद था, सुबह सब कार्य धीमी गति से हुआ, फिर अस्पताल गये. माली के पिता को साईकिल से गिरने के कारण चोट लग गयी है.

आज यूँ ही ख्याल आया, कितने दिनों से किसी से फोन पर लम्बी बात नहीं की है. इतना ही लिखा- चलो कुछ बातें करें
फोन पर ही सही मुलाकातें करें
कहें सुख-दुःख अपने सुनें कुछ औरों से
पकड़ रखे हैं व्यर्थ ही जो जोरों से
चलो बहा दें हर आंसू जो छिपा रखा है
किसी बहाने तो सही घातें प्रतिघातें करें

सवा तीन बजे हैं दोपहर के, कैसी प्यारी पवन बह रही है. सामने खड़ा युक्लिप्टस का वृक्ष मस्ती में झूमे जा रहा है. मई का आगमन हो चुका है पर गर्मी का नामोनिशान नहीं, सुबह घनघोर वृष्टि हुई. प्रातः भ्रमण पर भी नहीं जा सके. जून आज शिवसागर गये हैं, एक कनिष्ठ सहकर्मी के विवाह भोज में सम्मिलित होने. शाम तक लौट आयेंगे. लॉन में बैठकर लिखने का सुयोग बहुत दिनों बाद बना है. एक पक्षी लगातार कूक रहा है, दूर से दूसरा पक्षी भी उसके साथ युगलबंदी पर उतर आया है. आज बुद्ध पूर्णिमा है. भगवान बुद्ध की संसार को कितनी बड़ी देन है विपश्यना, यानि विशेष तरह से देखना, देह और चित्त की सच्चाई को अनुभव के स्तर पर जानकर सारे विकारों से मुक्त होने की कला. आज सुबह जून को तमस में घिरे देखकर वह उससे भी ज्यादा तमस में घिर गयी जब उनके कृत्य की निन्दा की. तत्क्षण हृदय पर कैसा भार लगने लगा था, विपश्यना के द्वारा ही इससे मुक्त हुई. वे सदा ही दूसरों के निर्णायक बन जाते हैं यह सोचे बिना कि इससे स्वयं की कितनी हानि होती है. बड़ी भांजी से बात की, उसके ससुर को दुर्घटना में चोट लग गयी है, आपरेशन कुछ दिनों बाद होगा. असजगता का परिणाम कितना दुखद होता है, किन्तु नेपाल में जो हजारों पीड़ित हैं, वे कहां असजग थे? इस देह में आना ही असजगता की निशानी है. उनका अस्तित्त्व देह के बिना भी रहता है शुद्ध रूप में, तृष्णा ही उन्हें बांधती है, सत्व गुण भी बांधता है,, मात्र तमो या रजो गुण ही नहीं बांधता !  


Wednesday, October 9, 2013

गर्मागर्म पकौड़े


आज दिन बदली भरा है, सो हल्की ठंडक महसूस हो रही है आज काम जल्दी समाप्त करके उसे टोपी बनानी है. शाम को एक सखी के घर जाना है, उसका जन्मदिन है, उसके हाथ में हरी मिर्च छूने से जलन हो रही है, किसी पत्रिका में इसके मिटाने का उपाय पढ़ा था पर याद नहीं है, वक्त पर याद न आये ऐसे पढने से क्या लाभ, वह पत्रिकाएँ पढकर बहुत जल्दी ही भूल जाती है. लेडीज क्लब की मीटिंग में एक सरप्राइज गेम था, पर न तो वह विज्ञापन ही पहचान सकी न कलाकारों के चित्र, किसी ने कहा आप इतनी पत्रिकाएँ पढ़ती हैं, ठीक ही कहा, उसे ज्यादा पहचान होनी चाहिए, पर वह विज्ञापन न तो देखती है न पढ़ती है. टीवी पर ‘झूठी’ फिल्म आ रही है, माँ-पिता बहुत शौक से देख रहे हैं. कल शाम असमिया सखी बहुत दिनों बाद आयी, उसने पकौड़े बनाये, और लगा कि उसमें तेल बहुत लगता है, इतना तेल स्वास्थ्य के लिए शायद ठीक नहीं है, अच्छा है कि वह साल में एक या दो बार ही बनाती है. कल दोपहर ‘बुनियाद’ देखा, अच्छी लगती है लाजो जी की बातें और हवेलीराम का उसे ‘लाजो जी’ कहना. नन्हे का आज हाफ डे है, २६ से उसकी परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं शायद इसीलिए. नैनी बगीचे से मूला का साग तोड़ कर लायी है, इस वक्त काट रही है.

  
ठंड एकाएक पिछले दो दिनों से बढ़ गयी है, कल सारे स्वेटर, स्कार्फ आदि निकाल दिए, आज धूप दिखाने के लिए रखे हैं. जून आज सुबह माँ-पिता को गोहाटी तक छोड़कर वापस आ गये, उस दिन जब वे जा रहे थे उसकी आँखें भर आई थीं. उनका रहना उसे अच्छा भी लगा और कुछ बंधन सा भी था. फिर इतवार और कल का दिन नन्हे को पढ़ाते व पढ़ते बीते. इस बार उसे पढ़ाने में मेहनत कम लग रही है, जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है उसे याद करने की अथवा रटने की जरूरत कम होती जा रही है.

पिछले दो दिन फिर मौन, कल सुबह आशा पारेख और धर्मेन्द्र के अभिनय में उलझी रही और परसों एक पुराने मित्र के लिए लंच बनाने में, पता नहीं क्यों उनसे मिलकर वह जिसे कहते हैं न दिल से ख़ुशी होना, वह नहीं हुई, जून भी उतना खुलकर नहीं मिले जैसे अन्य मित्रों से मिलते हैं. वह अपने दिल्ली वासी होने के या विदेश भ्रमण करने के गरूर में खोये से लगे खैर.. नन्हे से कहकर उनके बेटे के लिए कार्ड अवश्य बनाना है. कल रात जून से और भी कार्ड बनाने की बात कही थी, नया साल आने वाला है और उन्हें कई जगह कार्ड भेजने हैं. आज धूप नहीं निकली है सूरज बादलों के पीछे छिपा है, सर्दियों में धूप की कीमत कितनी बढ़ जाती है. जून आजकल खुश रहते हैं, कुछ दिनों की नियमित दिनचर्या से मिली आजादी को अच्छी तरह enjoy करते हुए ! कल पूरे एक महीने बाद उसने पत्रों के जवाब दिए, फोन और पत्र दूरियों को कम कर देते हैं.

अपने–अपने घरों में कैद
खुद से बतियाते
अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग
क्या जानें कि नदी क्यों बहती है
दूर बीहड़ रास्तों से आ
ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे
तटों को भिगोती, धरा को ठंडक
पहुंचाती चली जाती है
क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता
नदी की गोद से उछल कर शाम हुए उसी में सो जाता है
आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब
संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स
सदियों से सर्द हुआ मन
धूप की गर्माहट पाकर पिघल कर
बहने लगता है नदी की धरा के साथ
बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना
जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें
नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में
मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप
की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आयें
हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा
जब निकल जाये
तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर
नदी के साथ समुन्दर तक चले जाँए..
धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब
सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में
अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न 

Sunday, July 1, 2012

प्याज के पकौड़े


चार बज गए हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, कोई काम होगा नहीं तो...दोपहर को आये थे एक बार सामान रखने. नूना दस-पन्द्रह मिनट बाहर बरामदे में खड़ी होकर उनकी राह देख रही थी फिर सोचा इतने समय में कुछ लिख लिया जाये. कितने-कितने दिन निकल जाते हैं हाथ में कलम उठाये. क्या यह वही है जो लेखिका बनने का स्वप्न देखा करती थी. आज उसकी चचेरी बहन का जन्म दिन है पहले याद आया होता तो कार्ड जरूर भेजती और पत्र भी भेजती. उसे याद आया कि इस हफ्ते कोई खत भी नहीं आया है. आज उनका घर फिर से साफ और सुंदर दिख रहा है कल दोनों ने मिलकर सफाई की थी पहले के दिनों की तरह, जब उनकी नई-नई शादी हुई थी. आजकल कितनी जल्दी अँधेरा हो जाता है, जून को पता है कि शाम को नन्हें को घुमाना भी है, वह और तेजी से उसका इंतजार करने लगी. जैसे कि इस तरह वह जल्दी आ जायेंगे. अगले महीने ननद की शादी है पर अभी तक वे निश्चय नहीं कर पाए हैं कि इतने छोटे बच्चे के साथ इतना लम्बा सफर वे कैसे करेंगे, जून के अकेले जाने पर भी तो सभी को निराशा होगी...

उस शाम अचानक बदली घिर आयी थी. कहीं जाने का सवाल ही नहीं था, जून को प्याज के पकौड़े बनाने का जोश सवार हो गया. पहले बोले प्याज कम है, प्याज और डाला तो बेसन कम हो गया, फिर बेसन ज्यादा हो गया तो पानी और डाला. और फिर इतने सारे ...पर बेहद कुरमुरे पकौड़े बने थे. रात का भोजन वैसे ही पड़ा रहा उन्हीं से काम चल गया.