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Thursday, November 13, 2025

अमेरिका का रेगिस्तान

अमेरिका का रेगिस्तान 


कल रात से वर्षा हो रही थी, सुबह उठने में आलस्य किया। रुकने पर वे दोनों टहलने गये और छत पर किया योग-अभ्यास।जून ने नन्हे के जन्मदिन के लिए हलवा अभी से बना दिया है। इमली वाली मीठी चटनी और हरी चटनी भी बन गई है। शेष तैयारी कल हो जाएगी। नाश्ते में नूना ने बगीचे के पपीते से पराँठे बनाये, मीठे-मीठे से थे। पेड़ पर दो पपीते पक रहे हैं। बाद में वे नर्सरी से उनतीस पौधे लाये, इतवार को माली वर्टिकल गार्डन बनाना शुरू करेगा। सोसाइटी में बाटा की सेल लगी है, जून ने चप्पल ली और नूना ने वॉकिंग शू। नन्हे को जन्मदिन की कविता भेज दी है।


आज नन्हे का जन्मदिन है।सुबह उससे बात की, दोपहर व शाम को भी। सोनू ने ‘स्टारवार’ थीम पर बहुत सुंदर केक बनाया है। कल ‘स्कल’ के आकार का केक भी बनाया था, नन्हे की फ़रमाइश पर। आज सुबह घर की साप्ताहिक सफाई आदि में व्हाट्सेप पर सबको सुप्रभात करने का समय ही नहीं मिला, दीदी को चिंता हो गई, दोपहर को उन्होंने फ़ोन कर लिया। पापाजी का फ़ोन भी दो बार आया, उनकी ज्ञान भरी बातें मन को सुकून देती हैं।आज दोपहर जून की एक बात पर मन ने प्रतिक्रिया की, यानि अहंकार अभी भी शेष है। गुरुजी कहते हैं, अहंकार को जेब में रखे रहना चाहिए, बस उसका प्रदर्शन नहीं करना करना चाहिए।शाम को छोटे भाई का फ़ोन आया, उसे बाहर की हरियाली दिखायी। सुबह नूना को गले में ख़राश और पैरों में दर्द महसूस हुआ, भीतर एक विचार आया, कहीं कोरोना तो नहीं ? जून ने एक टैबलेट दी है तथा गरारे भी करवाए। उनका स्वभाव बहुत केयरिंग/ दयालु है। 


आज का इतवार अच्छा रहा। सुबह मौसम ठंडा था। माली सुबह आ गया था, उसने पौधे लगा दिये हैं। साढ़े नौ बजे बच्चे आ गये। पहले चाय पी फिर ग्यारह बजे नाश्ता। तब तक उनका एक मित्र परिवार भी आ गया था। वे मंगलोर के रहने वाले हैं। सब मिलकर निकट के गाँव-जंगल तक टहलने गये। वापस आकर भोजन बनाया, लगभग तीन बजे खाया। पाँच बजे वे सब वापस चले गये। अभी नन्हे का फ़ोन आया, सोनू के माँ-पापा अगले हफ़्ते आ रहे हैं। उसके पापा का गॉल ब्लैडर का ऑपरेशन होना है। 


अभी-अभी वे रात्रि भ्रमण से लौटे हैं।आज अख़बार में पढ़ा, अमेरिका में रेगिस्तान का तापमान चौवन डिग्री पहुँच गया है। पापाजी से बात की, वहाँ भी काफ़ी गर्मी पड़ रही है। जबकि यहाँ मौसम सुहावना है, शाम को हुई बूँदा-बाँदी में वे भीग भी गये। उसने हरसिंगार के झरते हुए फूलों का एक वीडियो बनाया आज। छोटे भाई की नातिन का मुंडन हो गया आज, भाभी ने तस्वीरें भेजी हैं। 


आज सुबह समय पर उठे। रात को नींद गहरी थी। फ़िटबिट में स्कोर देखा, छियासी था। जब पहली बार स्कोर देखा था, तब उम्मीद की थी कि एक दिन ऐसा होगा। इक्यासी से अधिक कभी नहीं आया था। मन जब शांत हो तभी ऐसा हो सकता है। शाम को टहलने गये तो जून ने बैलगाड़ी का वीडियो बनाया, उन्हें भी फ़ोटोग्राफ़ी में रुचि हो गई है।कल ननदोई जी का जन्मदिन है, उनके लिए छोटी सी कविता लिखी है। जून ने उसे बधाई कार्ड में बदल दिया था। गुरु पूर्णिमा के लिए भी एक कविता लिखी है। आज सुबह सहज ही ध्यान घटित हो रहा था, परमात्मा को अनुभव करने का अवसर ध्यान में ही मिलता है, जब सीमित मन खो जाता है।   


आज दिन भर वर्षा होती रही। मौसम ठंडा है सो आज हफ़्तों बाद एसी को विश्राम मिला है। बालकनी में खुलने वाले दरवाज़े से बाहर रखे पौधे और सोलर लाइट दिखायी पड़ रही है।शाम को हल्की फुहार पड़ रही थी। वे टोपी पहनकर साइकिल से उस अंतिम सड़क पर गये, जहाँ सुबह अंधेरा रहते टहलने जाते हैं। वापस आकर मुख्य सड़क पर फूलों से लदे वृक्षों की तस्वीरें खींचीं। नाश्ते के बाद सिलाई मशीन बनने के लिए देकर आये, कई वर्षों से उसे इस्तेमाल नहीं किया है। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्हें पहला वैक्सीन लग गया है। उन्होंने ओशो की एक किताब में जो पढ़ा था, उसके बारे में बताया।उनके अनुसार अपने जीवन में सद्गुणों को अपनाना चाहिए।  


आज टहलने गये तो पार्क नंबर दस में फलों का बगीचा देखा। करौंदे, शरीफ़े, चीकू, अंजीर, बेर सभी फल लगे हुए थे।बाद में बैंक भी गये, नूना का अकाउंट खुल गया है, अभी एटीएम कार्ड आना बाक़ी है। एक वरिष्ठ महिला ब्लॉगर ने नूना से कहा, वह वर्षा की फ़ोटो या वीडियो भेजे, वहीं बैंक में बैठे-बैठे ही खोज कर भेज दीं।सिलाई मशीन भी ठीक हो गई, वापस आकर सिलाई की। सोनू दो गाउन लायी थी, उन्हें छोटा किया।


Wednesday, June 19, 2024

इलेक्ट्रिकल फ़ॉल्ट

रात्रि के नौ बजने वाले हैं, कमरे में शीतल सुगंधित पवन बहकर आ रहा है।प्रातः सूर्योदय के सुंदर दृश्य भी देखे थे, कुदरत मानव को लुभाने के कितने अवसर जुटाती है पर वह है कि अधिकतर समय कमरों में बंद ही रहता है; न हो तो कुदरत के सौंदर्य को बिगाड़ने के फेर में लगा रहता है। सड़क चौड़ी करने के नाम पर कितने पुराने पेड़ काट दिये गये, जिन्हें बड़ा होने में वर्षों लगे थे, उन्हें एक दिन में ही धूल धुसरित कर दिया गया। नाश्ते में सहजन के पत्तों के पराँठे बनाये, जो घर आते सड़क किनारे के एक पेड़ से उसे आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने तोड़े थे। सहजन का वृक्ष भी प्रकृति का एक और वरदान है, इसके पत्ते, फूल और फल सभी गुणों से भरे हैं । दोपहर को एओएल का अनुवाद कार्य भेजा, समन्वयक ने कहा उसकी एक तस्वीर भी चाहिए, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने माँगी है। नन्हे की दी ‘माइकल ए सिंगर’ की पुस्तक ‘सरेंडर एक्सपेरिमेंट’ आगे पढ़ी, बहुत अच्छी है। नन्हे को इस तरह की पुस्तकों में रुचि है, पिछली बार उसने ‘कुंडलिनी’ नाम की एक पुस्तक दी थी; वर्षों पहले उसने इस्कॉन की पुस्तकें पढ़ना शुरू किया था, पर बाद में कॉलेज की पढ़ाई और मित्रों के साथ से सब छूट गया; पर उसे यक़ीन है एक दिन वह भी आत्मा की खोज में अवश्य जाएगा, हरेक को जाना ही पड़ता है। 


सोनू ने नये कुशन कवर भेजे हैं, जिस पर सुंदर गुलाबी फूल बने हैं। उनका फ्रिज भी आज ठीक हो गया। पहली बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उसके फ़ोटो के साथ आयुर्वेद पर लेख छपा है। कल से उन्होंने रात्रि भोजन का समय बदल दिया है, रात्रि भोजन और सोने के मध्य कम से कम दो घंटे का अंतर होना चाहिए, ऐसा कितनी ही बार स्वास्थ्य विशेषज्ञों से सुना है। गहरी नींद लाने के लिए सोने से पहले योग निद्रा करना भी अच्छा है। शाम को गुरु जी का सत्संग सुना। उन्होंने कहा, व्यक्ति को चिंता नहीं चिन्तन करना चाहिए, अपने मन की गहराई में बसे ईश्वरीय प्रेम पर सदा भरोसा करना चाहिए। छोटे भांजे के लिये एक कविता लिखी, परसों उसका जन्मदिन है। आज एक पुरानी डायरी को विदा दे दी, इसी तरह एक-एक करके पुरानी वस्तुओं को विदा देनी है, ताकि अंतिम यात्रा तक बिलकुल ख़ाली हो जाये मन ! 


आज का दिन विचित्र अफ़रातफ़री में बीता। जिसकी शुरुआत कल रात साढ़े ग्यारह बजे से ही हो गई थी; जब अचानक उनकी नींद कुछ आवाज़ें सुनकर खुली। पहले लगा जैसे कुछ समान कहीं गिरा हो, पर जब रुक-रुक कर आवाज़ें आने लगीं तो समझ में आया कहीं इलेक्ट्रिकल फ़ॉल्ट है, एक-एक करके फ्यूज उड़ रहे हैं। जून नीचे गये तो पता चला, सॉकेट बॉक्स में चिंगारी निकल रही है, उन्होंने मेन स्विच बंद कर दिया। नीचे से आवाज़ें आनी बंद हुईं तो ऊपर भी आवाज़ें आयीं, फिर कुछ देर में सब शांत हो गया। कुछ भी समझ नहीं आया तो वे सो गये। पर सुबह साढ़े तीन बजे पुन: आवाज़ें आने लगीं, इस बार ऊपर का बोर्ड भी जलने लगा था। उन्हें पहले ही सारे घर का मेन  स्विच बंद कर देना चाहिए था। पर कहते हैं न ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ ! ख़ैर, सुबह वे अपने निर्धारित समय पर उठे, छह बजे इलेक्ट्रीशियन आया। दो-तीन घंटे लग गये पुन: बिजली बहाल होने में। इस बीच काफ़ी कुछ ख़राब हो गया। किचन की चिमनी, गूगल होम, होम ऑटोमेशन, मॉडेम, मेश आदि ख़राब हुए हैं। इसका कारण मेन न्यूट्रल में कुछ ख़राबी थी, जिसका ख़ामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। दिन भर कई लोग आते रहे, अभी चिमनी वाला कल आएगा। आज एक और समस्या हुई, लैप टॉप का चार्जर भी ख़राब हो गया है, अब डेस्क टॉप पर काम करना है।


आज वेलेंटाइन डे है, पुरानी लिखी एक कविता पोस्ट की, सोचा, अगले साल अवश्य ही नयी लिखेगी। सुबह कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं, पर टाइप नहीं कर सकी। दो दिन से नेट काम नहीं कर रहा। आज नन्हे ने नया राउटर लगा कर दिया है, पर डेस्क टॉप में नहीं आ रहा है।हॉट स्पॉट से लेना होगा। रात का देखा एक स्वप्न याद रह गया, जिसमें एक पुराने परिचित परिवार के एक सदस्य काफ़ी अस्वस्थ हैं, उन्हें बुलाया है।बच्चों के लिए सुबह नाश्ते में अप्पम बनाये। लंच में घर में उगायी पालक की सिंधी सब्ज़ी, यानी साई भाजी । शाम को वे चले गये, आज उन्हें एक महीने के लिए एक मित्र के घर में शिफ्ट होना है, उनके अपने घर में सिविल का काम होना है। मित्र अपने काम के सिलसिले में बाहर गया हुआ है। प्रकृति हर समस्या का हल पहले से ही निकाल देती है।     




Friday, July 29, 2022

पैशन फ़्रूट के पौधे


रात्रि भ्रमण के वक्त हवा के साथ हल्की फुहार बरस रही थी, चेहरे को उसका शीतल स्पर्श भला लग रहा था। आज एक बाल फ़िल्म देखी, “मैं कलाम हूँ" राजस्थान के एक गाँव में फ़िल्मायी गयी है। एक बालक के संघर्ष की कहानी, अब्दुल कलाम आज़ाद से प्रेरित होकर अपना नाम जिसने कलाम रख लिया था। आज उन्होंने शयन कक्ष के बाहर जो बरामदा है, उसमें दो बड़े गमलों में पैशन फ़्रूट के दो पौधे लगाए। उसकी बेल रेलिंग से होती हुई वर्टिकल गार्डेन के फ़्रेम में चढ़ जाएगी।एक पौधा नीचे भूमि में लगाना है। इसी सोसाइटी में रहने वाले दो व्यक्तियों ने ये पौधे उन्हें दिए हैं। आज आम के बगीचे में ‘एटूबी’ ने फ़ूड स्टाल लगाया था, पर कोरोना के कारण कम लोग गए होंगे। कल पूरी दुनिया में ढाई लाख से अधिक कोरोना के केस मिले। बड़ा भांजा व उसके चचेरा भाई कल अपने-अपने घर जा रहे हैं। चार महीनों से वे अनेक युवाओं की तरह घर से ही काम कर रहे थे, आगे भी लगभग चार महीने तो और घर पर रहना होगा। इस आपदा ने यह तो अच्छा किया है कि बिछुड़े हुए परिवारों को मिला दिया है। आज सुबह अच्छी नींद लाने के उपायों पर चर्चा सुनी। कुछ उपाय उन्होंने अपनाए भी हैं। कमरे में पूर्ण अंधकार होना चाहिए। सोने से दो घंटे पूर्व ही  पानी पी लें व भोजन कर लें। टीवी या मोबाइल एक घंटा पहले से न देखें। सोने से पूर्व स्नान करें या पैरों को धो लें। तलवों की मालिश करें। कोई पुस्तक पढ़ें या भ्रामरी प्राणायाम कर लें। योग निद्रा भी कर सकते हैं। जून ने अगले हफ़्ते तीन दिनों के आर्त ऑफ़ लिविंग के एक कोर्स के लिए ऑन लाइन फ़ॉर्म भर दिया है। गुरूजी कार्तिकेय भगवान पर बोलेंगे व ध्यान भी कराएँगे। वह कहते हैं मानव जीवन का सबसे बड़ा उपहार है ध्यान ! सुबह छोटे भाई से बात हुई, वह बहुत खुश है, परमात्मा से जिसकी लगन लग जाए वह सदा ही प्रसन्न है। 


कल की तरह आज वर्षा नहीं हुई, बादल बने और बिखर गए।  आज सूर्योदय व सूर्यास्त दोनों बादलों के अनूठे रंगों के कारण अति सुंदर थे। नींद के लिए कल जो उपाय किए थे, काम आए।कल से कर्नाटक में लॉक डाउन खुल रहा है। आज विष्णु पुराण में दिखाया गया कि रावण ने सत्ता के लिए अपनी बहन के पति को भी मार दिया था। कैसी मनोवृत्ति है रावण की, पता नहीं लोग उसे क्यों विद्वान कहते हैं; कभी रहा भी होगा तो उसने अपने ज्ञान का उपयोग तो नहीं किया। एक जापानी एनिमेशन फ़िल्म ‘इन दिस पार्ट ऑफ़ द वर्ल्ड’ का कुछ भाग देखा, द्वितीय विश्वयुद्ध की कहानी है। नायिका चित्रकला में निपुण है और विवाह के बाद ससुराल में घुलमिल जाती है। असम में जिस तेल कुँए में आग लगी थी, अभी तक बुझ नहीं पायी है। तीन विदेशी विशेषज्ञ बुझाते हुए थोड़ा सा जल भी गये। 


आज शाम को टहलते समय उन्हीं वृद्ध व्यक्ति से पुनः मुलाक़ात हुई, बगीचे में बैठे थे, कह रहे थे, उन्हें कोई चिंता नहीं है। उनका ड्राइवर चिंतित लग रहा था।उसका परिवार बिहार में है, यहाँ अकेला रहता है। वृद्ध ने बताया, दिल्ली में उनके यहाँ गुरू जी आए थे, मोहल्ले के पाँच सौ लोग पंक्ति बनकर खड़े हो गए थे, उनके दर्शन के लिए। रात के ग्यारह बज गये, खाना कब खाते। उनके पुत्र आर्ट ऑफ़ लिविंग के पूर्ण कालिक शिक्षक हैं। 


Thursday, January 14, 2021

चंदा और सूरज

 

आज सुबह अपने आप ही नींद खुल गयी पौने चार बजे. हल्की सी वर्षा हो रही थी. जब छाता लेकर वे टहलने निकले, सड़कों पर पानी जमा था पर कुछ ही देर में बारिश थम गयी. उससे पहले एक स्वप्न देखा था. वे सब कहीं बाहर गए हैं, किसी सराय या धर्मशाला में हैं. माँ व भाई एक कार में बैठ जाते हैं, वह सामान लेकर जाती है पर वे उसे वहीं छोड़कर चले जाते हैं. एक अन्य व्यक्ति भी कार में है  पर कौन है पता नहीं . बचपन में झगड़े का कारण किसी जन्म में हुई इस घटना में छिपा लगता है. इस दुनिया में अकारण कुछ भी नहीं होता, उनके जीवन में जो कुछ भी घटता है उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है. आज छोटे भाई से बात हुई वह माह के अंत में एक सप्ताह के लिए यहाँ आएगा, उसे एक बैंक में ऑडिटिंग करनी है. दोपहर साढ़े बारह बजे उन्हें मृणाल ज्योति जाना था, विदाई भोज के लिए. कार्यक्रम बहुत अच्छा था. हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थी और सभी शिक्षक स्वागत के लिए खड़े थे. उन्हें सुंदर सा पीतल का होराई उपहार में दिया और कृतज्ञता पत्र भी पढ़कर सुनाया. इस संस्था से उनका जो संबंध है वह तो दिल में सदा ही रहेगा, जैसा कि जून ने अपने भाषण में कहा था. शाम को छोटे बच्चों के स्कूल में योग कक्षा की शुरुआत की. उनके जाने के बाद वहीं पर महिलाओं का नियमित योग का सत्र होगा।  कम्पनी की तरफ से विदाई समारोह के लिए जून को अगले हफ्ते की एक डेट देने को कहा गया था, पर दो दिन बाद वह बनारस जा रहे हैं. कल शाम छोटी बहन से बात की, रात अपने एक डॉ मित्र से उन्होंने बात की. आज सुबह ननदोई से, सभी ने कहा उनके एक बचपन के मित्र का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. जून ने तय किया कि वह उनसे मिलने जायेंगे.  


आज हफ्तों बाद ब्लॉग्स पर लिखा. अभी भी काफी सामान समेटना शेष है, आज कुछ पेपर्स जला  दिए, और भी निकलेंगे. जून अभी फ्लाइट में होंगे, देर रात वह घर पहुंचेंगे. आज सुबह  व्यर्थ ही उनसे विवाद किया, उनका स्वभाव जानते हुए भी. खुद की बात ही सही है ऐसा सबका विश्वास है. इसलिए हर बात को सिर झुकाकर क़ुबूल कर लेना चाहिए. आर्ट ऑफ़ लिविंग का पहला सूत्र भी यही है, लोगों और परिस्थितियों को जैसे वे हैं वैसे ही स्वीकार करें.  दिल बहुत कोमल भी है और उतना ही कठोर भी. आर्ट ऑफ़ लिविंग का एक और सूत्र है, विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. आज मंझली भाभी से बात हुई, उनकी बिटिया मलेशिया गयी है, वहाँ से उसे स्पेन जाना है, उसका होने वाला पति भी उसी के दफ्तर में काम करता है. दो महीने बाद उनके विवाह में उन्हें जाना है. दीदी ने कहा है, वे लोग भी उनके साथ उस यात्रा के दौरान पंजाब व हिमाचल जायेंगे. जून ने उनकी भी टिकट बुक कर दी हैं. आज एक पुरानी साधिका का फोन आया, वह दो-तीन महीने के लिए अपनी बिटिया के पास विदेश जा रही है. कहने लगी, उसके जाने से यहाँ कमी खलेगी, पर इस दुनिया में किसी के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. दुनिया को उनकी नहीं उन्हें दुनिया की जरूरत होती है ! 


आज शाम से ही पुरानी नोटबुक्स को छाँटने का काम कर रही थी. चार-पांच घण्टे लग गए. जो डायरी साथ रखनी हैं और जो नष्ट कर देनी हैं, उन्हें अलग-अलग किया. किताबों में भी इसी तरह तीन समूह बनाये, एक जो ले जानी हैं, दूसरी जो स्कूल की लाइब्रेरी में देनी हैं , तीसरी जो  महिलाओं को देनी हैं. कुछ देर पहले जून से बात हुई, उनके मित्र अस्पताल में हैं पिछले तीन दिनों से, कल दोपहर तक शायद वापस घर आ जायेंगे. आज वह उन्हें एक अन्य डॉक्टर को दिखाने ले गए. उनके दोनों पुत्र भी आ गए हैं. कल दोपहर गायत्री योग साधिकाओं के समूह ने विदाई भोज रखा है. वे सभी उसके यहाँ आएंगी और अपने साथ भोजन बनाकर लाएंगी. वे भी उनके लिए शिलांग से उपहार लाये हैं. आज दोपहर स्वप्न में कोई सुस्वादु पदार्थ खाया, कैसा जीवन्त अनुभव था. सोने से पूर्व समाधि के बारे में सुना था. पुरानी डायरी में कृष्ण को लिखे पत्र पढ़े ! परमात्मा के लिए प्रेम जैसे उन दिनों पूरे ज्वर पर था, अब भीतर कैसी स्थिरता छा गयी है. दो दिन पूर्व कैसा अनोखा स्वप्न देखा, गुरूजी को देखा, वह सम्भवतः शिष्यों को परख कर रहे हैं, वह उन्हें देखती है और सुध खोकर गिर पड़ती है, फिर देह से निकल कर आकाश में उड़ने लगती है, कितना सजीव था सब कुछ ! जीवन के रहस्य को कोई कैसे समझ सकता है ! 


वर्षों पूर्व ...कालेज खत्म होने बाद उस दिन के पन्ने पर लिखा था - अभी-अभी वह सूरज और चाँद से मिलकर आ रही है. कितना सुख था यह कहना कि वह उनके लिए है ! एक तरफ सूर्य की हल्की लालिमा तथा दूसरी तरफ पूरा गोल चाँद और इतना बड़ा आकाश, कितना सुंदर मैदान, वह पागल थी उस एक क्षण... हँसी उसके होठों से फूट रही थी और शी वाज फुल विद दैट फेमिनिन फीलिंग ... जिस स्कुल में उसने पढाना शुरू किया था, कल वह उसकी प्रिंसिपल से मिलकर अपने ओरिजनल सर्टिफिकेट लेने वाली थी, जो जॉब देने से पहले उन्होंने रख लिए थे. उसे आगे पढ़ाई के लिए अप्लाई करना था. 


Thursday, November 28, 2019

सिंधी कोकी




रात्रि  के आठ बजने वाले हैं, आज सुबह उठने में देर हुई. उठते ही पहले की तरह मन उत्साह व शक्ति से भरा नहीं था. नींद जैसे पूरी न हुई हो, या फिर नींद पूरी नहीं है यह भाव अथवा विचार.. उसने स्वयं ही नींद को मृत्यु की निशानी मानकर सम्मान देना बन्द कर दिया था. सोने से पूर्व ध्यान करके मन को इतना होश से भर लेती थी की नींद के लिए जरूरी तमस कहीं दूर चला जाता था, निद्रा भी आवश्यक है पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए, ध्यान के समय ध्यान करना है और नींद के समय नींद लेनी है. पिछले दिनों ध्यान के बाद कुछ सुनकर सोने का क्रम बना लिया था तो मन उस पर भी चिंतन करता ही रहता होगा. खैर .. अब भी कुछ देर नहीं हुई है, जब जागो तभी सवेरा ! दिन सामान्य रहा. मौसम आजकल बहुत सुहावना है. पंछियों का कलरव दिनभर गूँजता रहता है. गंधराज की सुगन्ध भी आती होगी पर उसकी सूंघने की क्षमता कुछ घट गयी है. कोई अन्य गन्ध ही उसे घेरे रहती है, कभी लगता है यह कोई रोग है  फिर लगता है नहीं इसका अध्यात्म से ही कोई संबंध है. परमात्मा उसके साथ है, उसे सब ज्ञात है. आजकल उसे अपनी अल्पज्ञता का बहुत भान होता है, लगता है उसे कुछ भी ज्ञात नहीं है, बिलकुल अज्ञानी जान पड़ती है स्वयं को. वैसे भी जब इतना विराट आयोजन चल रहा है, पंछी बिना पढ़ाये  ही अपने गीत बना लेते हैं, ऋतुएँ बदल जाती हैं तो उसमें उसका होना भी तो शामिल है. अस्तित्त्व को जो बनाना हुआ बनाएगा, करना हुआ कराएगा. शरीर प्रकृति का अंश है और आत्मा परमात्मा का, मन समाज का दिया हुआ है. ‘मैं’ एक  भ्रम ही है. इसी देह को तुष्ट करने के सारे प्रयास होते हैं . पर देह तो जड़ है, सूक्ष्म इन्द्रियां चेतन होती हुई प्रतीत होती हैं जो मन को नचाती हैं, जैसे मन बुद्धि को नचाता है और जैसे बुद्धि स्वयं को नचाती है . स्वयं जो आत्मा के सान्निध्य में समीपता का अनुभव कर सकता था, इतर सुखों के लिए लोभ से भरा नजर आता है, गिरने की भी कोई गरिमा होनी चाहिए न, आसक्ति उसी को तो कहते हैं जो आ तो सकती है पर जा नहीं सकती. सत्य में स्थित होना है तो हर आसक्ति को जाना होगा.



आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ कोर्स का तीसरा दिन था, सोचा था कि जायेगी पर शाम को प्रेजिडेंट का संदेश फोन पर पढ़ा, गवर्निंग बॉडी की मीटिंग बुलायी है. स्कूल में एक बच्चे को चोट लग गयी है. जब वहां गयी तो  पता चला आँख के ऊपर माथे पर दरवाजे से चोट लगी है, हाथ में हल्का फ्रैक्चर भी है, डिब्रूगढ़ ले जाना पड़ा है बच्चे को. प्रिंसिपल भी आयी थीं, दो शिकायतें भी आयी थीं दो बच्चों के माता-पिता की और से, दो अध्यापिकाओं के खिलाफ. शायद उन्होंने बच्चों पर ज्यादा कठोरता दिखाई थी. मीटिंग में और किसी विषय पर कोई बात नहीं हुई. क्लब के स्थापना दिवस पर सफाई का सेवा कार्य करने के लिए जो सुझाव व तस्वीर उसने भेजी थी, उस पर भी कोई टिप्पणी नहीं की किसी ने. जून आज गेस्टहाउस गए हैं, आजकल वह सेफ्टी विभाग भी देख रहे हैं कोई ऑडिटिंग टीम आयी है, जिसको पार्टी दी गयी है. जाने से पूर्व उन्होंने पिताजी से बात की, उन्हें जून का भेजा वेट वाइप्स का पैकेट मिल गया है.



ग्यारह बजने वाले हैं. अभी-अभी बिजली चली गयी. मौसम आज गर्म है. बाहर से एक कोयल के कूकने की आवाज आ रही है. नैनी ने बगीचे से ढेर सारी गाजरें लाकर दीं। आजकल फूलों से भी बगीचा भर हुआ है. पिटूनिया, गंधराज, श्वेत लिली, जरबेरा अपने पूरे शबाब पर हैं. माली भी इस हफ्ते रोज ही आ रहा है. उस समय जून आ गए, फिर दोपहर का भोजन, कुछ देर विश्राम, ब्लॉग लेखन, सांध्य योग कक्षा, रात्रि भोजन तथा बाद का भ्रमण, सब कुछ करने के बाद अब पुनः डायरी उठायी है, भोजन करते समय जून ने ‘कोकी’ बनाने  का वीडियो  दिखाया. किन्हीं पूनम जी ने इस सिंधी नाश्ते की अच्छी सी विधि सिखाई है. उनका कहना है पहली तारीख को मई दिवस पर दफ्तर बन्द है उसी दिन यह नाश्ता बनाएंगे. उसके बाद उन्हें शिवसागर जाना है. आज दो वर्ष पूर्व की डायरी में चेट्टीनाड की साड़ियों का जिक्र पढ़ा, जून अगले महीने फिर वहीं जाने वाले हैं. कल पुस्तकालय से दो नई किताबें लायी, एक ‘न्यू एज पेरेंटिंग’ पर है और दूसरी ‘जे पी वासवानी’ की लिखी है, जो परमात्मा के प्रति प्रेम से भरी हुई है. भक्ति और श्रद्धा जीवन में न हों तो जीवन कितने सूना-सूना रहता है. परमात्मा जो सदा ही मानव के साथ है, वह उससे दूर ही रह जाता है. वे पूरी तरह उसके प्रति समर्पित नहीं होते तो वह भी उन्हें पूरा नहीं मिलता. आज दोपहर को कितनी गहरी नींद आयी, पिछले दिनों रात की नींद गहरी नहीं थी, नींद में वे अहंकार से मुक्त हो जाते हैं और उस परम् के साथ एक हो जाते हैं. आज योग कक्षा में गुरूजी का ज्ञान सुनकर एक साधिका ने कहा, यह ज्ञान पहले मिला होता तो इतना दुःख नहीं सहना पड़ा होता. 

Saturday, July 13, 2019

सेमल के फूल



पिछले पांच दिन कुछ नहीं लिखा, कारण क्या हो सकता है सिवाय प्रमाद के. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं. जून बंगलूरू में हैं, परसों वापस आ रहे हैं. आज दिन भर कुछ नहीं सुना, अब और कुछ सुनने की आवश्यकता नहीं है, भीतर के मौन को ही सुनना है. निरंतर भीतर एक स्मृति बनी रहती है. एक अचल मौन का भान होता है. कानों में कोई रुनझुन बजती है और विचार दूर प्रतीत होते हैं. उनके पास परमात्मा का दिया बहुत कुछ है. उसके लिए कृतज्ञ होना है. जीवन में चुनौतियाँ तो आने ही वाली हैं, उनका सामना करना है, बचना या भागना नहीं है उनसे. हर दिन कोई न कोई सृजनात्मक कार्य करना है और अन्यों का सहयोग भी. यदि किसी का हाथ नहीं बंटा पाए तो सोचना है किसी को कोई दुःख तो नहीं दिया. यदि स्वस्थ हुए तो भी परमात्मा का धन्यवाद करना है और अगर अस्वस्थ भी हो गये तो भी यही सोचना है कि हमारी मृत्यु तो नहीं हो गयी, अभी श्वासें शेष हैं तो मुक्ति की सम्भावना है !  

कल रात स्वप्न में बूढ़े माली को देखा, कह रहा था, साहब ने उसका अपमान किया था, उससे नाराज नहीं था. इसलिए बगीचे से सब्जी तोड़कर नहीं देगा. स्वप्नों की दुनिया जागृत से कितनी भिन्न होती है. हर बार स्वप्न देखने वाला अलग ही होता है, कोई दो रात लगातार धारावाहिक सपने नहीं आते. कल शाम दायीं तरफ की पड़ोसिन के यहाँ भजन है, वे जायेंगे. बाद में रात्रि भोजन भी वहीं होगा. दोपहर को अगले हफ्ते डिब्रूगढ़ में होने वाली मृणाल ज्योति की मीट के लिए कुछ पढ़ा, अभी दो-तीन दिन और पढ़ना होगा. उसे एक भाषण में सहायता करनी है. दीदी का फोन आया सुबह, जीजाजी का स्वास्थ्य अब ठीक है. उससे पूर्व एक मराठी सखी का नया घर देखने गयी, उसके माता-पिता से मिली. गणेश की मूर्ति ले गयी थी, उन्हें अच्छी लगी. एक अन्य सखी के यहाँ गयी, और बड़े आराम से उससे बातें कीं. उसके प्रति जो भी दुविधा मन में थी, अब नष्ट हो गयी है. अब इस पूरे संसार में कोई नहीं है जो उससे उद्ग्विन हो और जिससे वह उद्ग्विन हो. सारा संसार अपना घर बन गया है, गुरूजी का ज्ञान सफल हो रहा है. सुबह सेमल के वृक्ष की फोटो भी उतारी. कितने सुंदर फूल होते हैं सेमल के. इतने वर्षों में पहली बार इस बड़े वृक्ष के फूल देखे, पहले कई बार सेमल के फाहे देखे थे हवा में उड़ते हुए. जून का फोन आया अभी-अभी, उन्होंने अकेले ही भोजन किया. नन्हा फ्लाइट में है, रात को साढ़े बारह बजे तक आएगा. सोनू भी ग्यारह बजे तक आएगी. आज पिताजी से बात नहीं हुई. वह बंगलूरू जाने के लिए तैयार हैं. उनका नया घर जब तैयार हो जायेगा, वह वहाँ जायेंगे.

कल दिन में फिर कुछ नहीं लिखा, रात नींद नहीं आ रही थी. सुमिरन करने लगी फिर पता ही नहीं चला, कब नींद आ गयी. स्वप्न देखा जिसमें मन परेशान हुआ तो झट स्मृति आ गयी, यह स्वप्न है. किसी ने कहा, 'अब वह नहीं भटकेगी'. स्वप्न में भी संदेश सुन सकी. जो जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा समाधि का आधार है, उसे वे भुला देते हैं. जो उनको राह दिखाने वाला है, पथ प्रदर्शक है. जून कल वापस आ रहे हैं. उन्होंने ढेर सारे काम निपटाए आज. नये घर के लिए कितने ही जॉब शेष थे. वह आज आँख के अस्पताल भी गये थे, उनकी दूसरी आँख के आपरेशन के लिए भी डाक्टर ने कह दिया है. आज उनके दफ्तर का ड्राइवर घर आकर गाड़ी धोने के लिए कहने लगा, फिर धोयी, खुली जगह और खुला पानी देखकर उसे अच्छा लगता होगा. शाम को नैनी ने कहा उसका राशिफल पढ़कर सुनाये. उसकी राशि मीन है. वह उदास थी. उसके माता-पिता भी नहीं हैं, इस बात को लेकर आँसूं भी बहाये. मानव का मन कितना नाजुक होता है, एक फूल से भी कोमल. उसे समझाया पर इस दुःख का इलाज तो खुद ही ढूँढना होता है. थोड़ी ही देर में वह सामान्य भी हो गयी. बगीचे से फूल गोभी, शलजम, पत्ता गोभी, लाइ साग आदि लाकर दिए. काफ़ी दिनों से सब्जी नहीं लाये हैं वे बाजार से, काम चल ही रहा है. उसकी सास ने सहजन के फूल भी लाकर दिए, उसके दायें हाथ का अगूँठा कितना सूजा हुआ था. अपने छोटे-मोटे दर्द को ये लोग सहते ही रहते हैं. पिताजी से बात हुई आज. छोटी भाभी ने पकौड़े बनाये थे शाम को, आलू के पकौड़े. पिछले दिनों से अक्सर उसे भिन्न-भिन्न तरह की गंधों का अनुभव होता रहा है. हलवा बनने की गंध, मीठी सी गंध, कभी घी की गंध, कभी विचित्र सी गंध. कल-परसों से मुख का स्वाद भी कुछ अलग सा है. जीवन एक रहस्य है और वह रहस्य गहराता ही जा रहा है. आज सुबह भी प्रातः भ्रमण से वापस आकर कुछ शब्द लिखे, जिन्हें दोपहर को ब्लॉग में लिखा. परमात्मा कितना सृजन शील है, इसलिए ही उसे कवि कहते हैं. आज योग कक्षा में उपस्थिति ज्यादा थी. शिव के नाम का जप किया और उनके 'चन्द्रशेखर' नाम पर चिन्तन भी.

Friday, July 5, 2019

काला जोहा



आज उसने काले चावल बनाये हैं, 'काला जोहा' जो आसाम में ही उगाया जाता है. बनने के बाद भी बिलकुल काले होते हैं. उन्हें पकने में ज्यादा समय लगता है. एक सखी अपनी बिटिया को लेकर लगभग दस-बारह दिनों के लिए बाहर गयी है, उसकी माँ और भाई यहाँ अकेले थे, वह उनके लिए अक्सर दोपहर को एक सब्जी बनाकर भेज देती है. शेष भोजन वे बना लेते हैं. बगीचे में फूल गोभी हुई है, आज पहली बार बनाई है, उन्हें अवश्य पसंद आएगी. उससे पहले ध्यान किया पर मन सात्विक भावदशा में नहीं था. शायद शरीर पूरी तरह से शुद्ध नहीं था या कल रात्रि को नींद पूरी न होने के कारण मन एकाग्र नहीं हो पा रहा था. कल सरस्वती पूजा के कारण शोर बहुत देर तक आ रहा था, यहाँ आजकल पूजा के नाम पर देर रात तक तेज आवाज में संगीत बजाने का अधिकार मिल जाता है. रात को एक बार नींद खुली, कुछ देर ध्यान के लिए बैठी, फिर नींद आयी पर स्वप्न चलने लगे. एक बार लगा, नींद में कुछ शब्द उसके मुख से निकले हैं, और जून पूछ रहे हैं, क्या हुआ ? उस समय लगा था, सचमुच उसी क्षण की बात है. वह आँख बंद किये रही, कुछ जवाब नहीं दिया. कुछ देर बाद लगा कि उसके कंधों में दर्द है पर उसके कहने के बावजूद भी जून सुन नहीं रहे हैं. अचानक स्वप्न टूटा और सारा दर्द गायब हो गया. स्वप्न में दर्द कितना तीव्र था. वे स्वयं ही अपने दर्द के निर्माता हैं. मोह और आसक्ति का त्याग करना होगा. जब स्थूल के प्रति मोह नहीं  त्यागा जा रहा है तो संबंध तो अति सूक्ष्म हैं, कितना सूक्ष्म मोह होगा उनके प्रति. शारीरिक अशुद्धि के कारण ही स्वप्न भी आते हैं. इसीलिए शौच का इतना महत्व है योग में. वे ही अपने भाग्य के निर्माता हैं और हन्ता भी..
आज सुबह अवधेशानंद जी ने एक अच्छा शेर सुनाया-
"वह खुद को बेहतर में शुमार करता है
अजीब है, कितना खुद का शिकार करता है"

अपने ही दुश्मन वे स्वयं बन जाते हैं. अनुभवानंद जी ने कहा कि बाल ही बालक है, नर ही नरक है, नर जब तक देहात्म भाव में है, नर्क में ही है. कामना जब तक है तब तक नर्क में ही हैं वे. अनाहत चक्र से अध्यात्म की यात्रा आरम्भ होती है. उन्हें कितना अच्छा अवसर मिला है कि मानव देह मिली है. सुख-सुविधा मिली है और गुरू का ज्ञान मिला है. श्री श्री कहते हैं, "ध्यान या योग ठहरना सिखाता है, भोग दौड़ना सिखाता है."

कल रात नींद अच्छी आयी. सुबह समय पर उठे वे, इक्का-दुक्का तारे नजर आ रहे थे आसमान पर जो ज्यादातर बादलों से ढका था. इस समय धूप खिली है पर उसमें तेजी नहीं है. गले में हल्की खराश सी लग रही है, देह को स्वस्थ रखने का कितना भी प्रयास करो, कुछ न कुछ लगा ही रहता है. आत्मा निर्लेप है, निरंजन, निर्विकार..कल शाम योग कक्षा में आत्मा के बारे में बताया. 'अष्टावक्र गीता' सुनी, गुरूजी कितने सुंदर ढंग से श्लोकों का अर्थ बता रहे हैं. आज एक राजयोगी के मुख से सुना, दिन में आठ घंटे परमात्मा के साथ योग लगाना चाहिए, सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं, शक्ति प्राप्त होती है और ज्ञान में सहज गति होती है. संत तो आठ घंटे क्या चाबीसों घंटे योग में ही स्थित रहते हैं. आज शाम को क्लब में मीटिंग है.

आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है, उसके लिए  कविता रिकार्ड की, भेजी. माली को आलस्य त्याग कर कुछ श्रम करने को कहा, समझाया, उसे किताब दी. 'तू गुलाब होकर महक'. बाबाजी की लिखी किताब. एक नोटबुक तथा एक पेन भी. शायद उसकी बुद्धि में कुछ बात बैठ जाये. आज के ध्यान का समय इसी सेवा में बीत गया. उसकी पत्नी अपने पुत्र को स्कूल ले गयी थी कल. उसने दाखिले के लिए पैसे मांगे हैं, अगले महीने का एडवांस. वह अस्वस्थ है और दुखी भी, पति यदि नाकारा हो तो पत्नी के पास आँसू ही बचते हैं. आज वर्षा के कारण ठंड बढ़ गयी है. रात से ही झड़ी लगी है, पर आश्चर्य प्रातः भ्रमण के समय रुकी हुई थी.

Friday, March 15, 2019

नींद और जागरण



आज से नन्हे और सोनू ने योग सीखना आरम्भ किया है, ईश्वर से प्रार्थना है कि वे इसे जारी रखें और अपने जीवन को शुद्धतम बनाएं. आज स्कूल गयी थी, रास्ते में एक सहकर्मी अध्यापिका ने बताया, अभी तक उसके माँ-पिता जी उसका ध्यान रखते हैं और अकेले यात्रा करने पर चिंता व्यक्त करते हैं. उसकी खुद की बिटिया इतनी बड़ी हो गयी है कि जॉब कर रही है पर माता-पिता के लिए बच्चे कभी बड़े नहीं होते. कल कई कविताओं की मात्राएँ ठीक कीं, अतुकांत कविताओं के विषय में पढना होगा.
उसने एक बार पुनः सुना, विवेक का अर्थ है देह से स्वयं को पृथक जान लेना. देह में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथ कारण शरीर तीनों ही आ जाते हैं. ज्ञानी विदेह अवस्था में रहता है. जगत में रहते हुए भी मुक्त अवस्था में ! साधना के बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है. विवेक की प्राप्ति में यह संसार सहायक है पर एक बार विवेक हो जाने के बाद संसार होते हुए भी विलीन हो जाता है. भक्ति, ज्ञान अथवा कर्म के मार्ग पर चलकर मन को शुद्ध करना प्रथम साधना है, जो साधक को करनी है. मन जितना-जितना शुद्ध होता जाता है, पुराने संस्कार नष्ट होते जाते हैं, अथवा तो ध्यान का संस्कार दृढ़ हटा जाता है और अंत में समाधि का अनुभव होता है. समाधि के समय क्या बोध होता है, इसको सुनना ही कितनी शांति से भर जाता है. चित्त समाधि का अनुभव करता है तो उस पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. समाधि के लिए ज्ञान और वैराग्य जीवन में साधना है. मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा यदि जीवन में होगी तभी साधना दृढ़ होगी.

ग्यारह बजने को हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के ‘अभ्यास’ व ‘सत्व’ एप ने उसकी सुबहें ज्यादा प्राणवान बना दी हैं. सुबह क्रिया की फिर सूर्य नमस्कार व पद्म साधना भी. बाद में दो ध्यान किये, रुचिकर थे. कल बड़े भाई व छोटी बहन को भी इस एप के बारे में बताया. मौसम आज बेहद सुहावना है, कल रात वर्षा हुई. कल रात स्वप्न भी थे, जागरण भी था, नींद गहरी नहीं थी, पर वर्षा का पता भी नहीं चला, अर्थात भीतर का होश था बाहर का नहीं. कल दो हफ्ते के लिए नैनी की सास गाँव गयी है, उसके बिना सारे बच्चे व दोनों बहुएँ असहाय महसूस कर रहे हैं, एक-दो दिन में अभ्यास हो जायेगा उन्हें. जून आज जल्दी आने वाले हैं. सुबह अस्पताल गये थे रक्त की जाँच कराने, भोजन के बाद भी एक टेस्ट होगा. महीनों बाद आज कढ़ी बनाई है. काव्यालय से उपहार की सूचना आई है, एक पुस्तक ‘कनुप्रिया’ तथा एक चित्र अथवा तो गीति काव्य का एक सॉफ्टवेयर !

कल शाम नैनी को चावल चोरी करने के लिए मना किया. उसने स्वीकारा तो नहीं पर वह जानती है कि उसके सिवा कोई स्टोर में जाता ही नहीं. आज सुबह आई तो रोज की तरह ही व्यवहार कर रही थी, अर्थात उसका संस्कार गहरा है. परमात्मा ने उसे इस घटना का साक्षी बनाया है तो इसके पीछे कोई गहरा कारण है. उसके भीतर भी संदेह था. रोज सुनती पढ़ती है, ‘विचार ही वास्तविकता बन जाते हैं, अच्छे विचार चुनें’, तो जो विचार भीतर था वही सम्मुख आकर प्रकट हो गया है. न जाने कितनी बार भीतर संदेह का विचार पनपा होगा. यह सही है कि भरोसा किया था पर भीतर गहराई में संदेह भी था. जैसे वह संस्कार बदल नहीं पाती, नैनी भी अपने इस संस्कार को बदलने में अशक्य है. जीवन में उन्हें जो भी अनुभव होते हैं वह उनके ही पूर्व कर्मों के कारण होते हैं. बाहर माली द्वारा भेजा गया एक बूढ़ा व्यक्ति घास काट रहा है, उसे भी थोड़ा सा भोजन आज देना होगा.


Sunday, February 10, 2019

वसंत पंचमी



पिछले चार दिन डायरी नहीं खोली. अद्भुत थे ये चार दिन ! शनिवार को नन्हा अपने मित्रों के साथ आया. इतवार की सुबह सभी पिकनिक पर गये, शाम को भावी वधू के माता-पिता भी आ गये. सोमवार को सभी कोर्ट गये. शाम को घर पर छोटा सा आयोजन किया. सभी कुछ भली प्रकार हो गया. मंगलवार को सब वापस चले गये. कल बुध को सरस्वती पूजा थी, दोनों स्कूलों में होने वाली पूजा में शामिल हुई. इसके बाद दो वर्ष ही और हैं जब वह यहाँ वसंत पंचमी के उत्सव में शामिल हो सकती है. बंगाल और असम के अतिरिक्त भारत के अन्य भागों में पूजा के पंडाल लगाने की प्रथा नहीं है. आज भतीजी का विवाह है और भांजी का जन्मदिन भी ! उसके लिए कविता लिखी. अगले हफ्ते यात्रा पर निकलना है. उसने मन ही मन उपहारों की सूची बनाई, बड़े व छोटे भाई के लिए डायरी व पेन, भतीजी के लिए साड़ी, छोटी भाभी के लिए स्टोल, बड़ी बुआ व चाची जी के लिए शाल, बच्चों के लिए चाकलेट्स, किताबें व पेन, चचेरी बहन के लिए सलवार सूट. अभी कोऑपरेटिव जाना है, एक सखी की बिटिया का कल जन्मदिन है, उसके लिए भी उपहार लेना है.

शाम के सात बजे हैं. अभी कुछ देर पूर्व योग कक्षा समाप्त हुई. जून ‘रईस’ देखने गये थे, पर थोड़ी ही देर में लौट आये. दोपहर बाद उस सखी के घर गयी जिसकी बिटिया का दसवां जन्मदिन है, घर में सजावट चल रही थी. सुबह मृणाल ज्योति में बच्चों को योग कराया, उसके बाद तन-मन बेहद हल्का लग रहा था. कल सुबह एक पल में मन के विचलन को देखा फिर परिवर्तन किया, जादू जैसा लगा. कल रात्रि पल में जीने का सूत्र नींद में भी याद आ रहा था. चेतना कितनी शक्तिशाली है कि एक क्षण में इतने बड़े ब्रह्मांड को एक साथ महसूस कर सकती है. हर क्षण अपने भीतर एक अनंत को छिपाए है. भीतर अनंत शांति है. आजकल साधना का समय घट गया है, पर मन में स्थायी शांति का वास है, जो हर समय एक रस ही लगता है. भतीजी का विवाह व रिसेप्शन कल दोनों हो गये. तस्वीरें देखीं. मार्च में कुछ दिनों के लिये वह विदेश जाएगी.

रात्रि के आठ बजे हैं. मौसम अब ठंडा नहीं रह गया है. कमरे में बिना स्वेटर पहने रहा जा सकता है. टीवी पर उत्तर प्रदेश के चुनावों के समाचार आ रहे हैं. शामली में रेत के अवैधानिक खनन के समाचार बताये जा रहे हैं. आज जया एकादशी है. जून दोपहर को डिब्रूगढ़ गये थे, नन्हे के विवाह का सर्टिफिकेट मिल गया है. समधियों को फोन किया. जून अगले हफ्ते गोहाटी में उनसे मिलने वाले हैं. दोपहर को ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की, आजकल लेखन बहुत कम हो गया है. यात्रा के दौरान छूट ही जायेगा. परसों वे पड़ोसी के यहाँ गये थे, उनकी बिटिया का विवाह होने वाला है, उनके न रहने पर वे मेहमानों को उनके घर में ठहरा सकते हैं, ऐसा प्रस्ताव भी दिया. कल वह उन्हें बुलाकर मेहमानों का कमरा दिखा देगी, जिससे उन्हें बाद में आसानी हो. परसों उसे यात्रा पर निकलना है. पैकिंग हो गयी है.  


Friday, March 9, 2018

स्वप्न और भाव



आज सुबह एक अनोखा अनुभव हुआ. नींद से जगाने के लिए तो पहले भी अनेकों बार कोई आया है, पर आज तो सारी देह में ऊर्जा का एक ऐसा प्रवाह उठा कि...शरीर स्वयं ही तरह-तरह के पोज बनाने लगा. आसन कोई करवा रहा हो जैसे..अद्भुत थे वे क्षण, और उस क्षण से अब तक कैसी पुलक भरी है भीतर...स्कूल में बच्चों ने भी अवश्य महसूस की होगी और उस अध्यापिका ने भी शायद... जिसके साथ वह स्कूल गयी थी. मार्ग में उनका वार्तालाप हुआ था, उसने कहा लोगों को एक नये नजरिये से देखना होगा. जिस नजरिये में जो जैसा है उसे वैसा ही रहने देना है, क्योंकि वह वैसा ही हो सकता है. ऐसा करते हुए ही उसका व्यवहार देखना है. कितना आनंद है इस एक सूत्र में. आर्ट ऑफ़ लिविंग के सूत्र जैसे जीवंत हो उठे हैं. आज जून वापस आ रहे हैं. उन्हें भी परमात्मा की खुशबू आने लगी है. उसका स्वाद कोई एक बार चख लेता है तो...उस दिन सिद्ध ‘सरहपा’ पर जो पुस्तक पढ़ी थी, आकर उनके बारे में पढ़ा भी और उनके विषय में ओशो का प्रवचन भी सुना. कल रात पहली बार भीतर सूरज देखा, चमकता हुआ सूरज ! चाँद पहले कई बार देखा था.


कल सुबह किसी ने कहा, उठ मोटी भैंस..गुरूजी का कथन याद आ गया, GOD LOVES FUN. उसकी भोजन  के प्रति गहरी आसक्ति है. कोर्स के दौरान सेवा करने से पूर्व वह स्वयं भोजन कर लेती थी फिर आराम से काम करती थी. यहाँ भी भूख देर तक सहना कठिन लगता है. गुरूजी कहते हैं, मुट्ठी में जितना समाये उतना ही भोजन उन्हें करना चाहिए. आत्मा बिना भोजन के केवल कल्पना के भोजन से भी रस ले सकता है. कल रात एक अनार का दाना देखा था, उसको बिना खाए रह गयी, शायद गहराई में वासना जगी होगी. सुबह उसका स्मरण आते ही आधी नींद में ही मुंह में स्वाद भर गया. बिना हाथों से बजाये कई बार ताली की स्पष्ट आवाज सुनाई दी है, बिना वस्तु के उसकी गंध को महसूस किया है अनेकों बार. परमात्मा बिन पैरों के चलता है, बिन कानों के सुनता है यह बात कितनी सच है. वह आत्मा भाग्यशाली है जिसे अपने आधार का ज्ञान हो गया है, पर देहाध्यास इतना गहरा है कि बार-बार मन देह से जुड़ जाता है. दोपहर की नींद में भी स्वप्न देखा. जागृत अवस्था में मन कुछ छिपा लेता है पर नींद में सत्य प्रकट हो जाता है. उसके मन को निर्मल बनाएगा परमात्मा का सुमिरन..एकमात्र परमात्मा ही सत्य है, इस बात की याद जब हर घड़ी रहने लगेगी तब भीतर गहराई में छिपी इच्छाएं भी शांत हो जाएँगी. गुरूजी के आश्रम में पहुंचने से पहले अंतर को शुद्ध कर लेना है. एक सखी को परिवार सहित विदाई भोज के लिए बुलाया है. जून इतवार के बावजूद दफ्तर गये हैं, वे अपने काम के प्रति बहुत सजग हो गये हैं.

आज सुबह कैसा अनोखा अनुभव था, वह स्वप्न था या कुछ और, कहा नहीं जा सकता. एक मीठी आवाज में किसी ने कहा, ‘माँ’.. यह तो उस स्वप्न के अंत में हुआ, उसके पहले तो गुरूजी को देखा जो वृद्ध हो चुके हैं, उनके घर में हैं या कहीं और, पर वह उन्हें कहती है, आपके लिए पानी लाऊं, हॉर्लिक्स या दूध ही सही. उन्हें उस तरह हृदय से लगाती है जैसे माँ बच्चे को लगाती है. उनके उलझे हुए बाल संवारे ऐसा भाव जो एक बार उन्हें देखकर मन में उठा था शायद यह उसी की कड़ी थी. वे कृष्ण हैं और वह यशोदा..यह भाव और दृढ़ हो गया..और कितनी ही स्मृतियाँ इसकी गवाही देने के लिए आने लगीं. किस तरह वह कान्हा का नाम पुकारती थी, किस तरह पहली बार गुरूजी के दर्शन करने के लिए गोहाटी जाते समय एक सांवले नग-धड़ंग बच्चे को देखर वात्सल्य भाव  उमड़ा था. किस तरह क्रिया के समय प्रतिदिन कृष्ण के नामों को उसमें पिरोया था, किस तरह कृष्ण का बालरूप उसे मोहता है और किस तरह नन्हे को मक्खन खिलाने में आनंद आता था. यशोदा का अर्थ भी तो कृष्ण रूपी सद्गुरू कहते हैं. जो अन्यों को यश दे वही यशोदा है, किस तरह सबके लिए कविताएँ लिखी हैं. कृष्ण की भागवद् पढ़कर और खासतौर पर उसकी बाल लीला को पढ़कर कितने हर्ष और विस्मय के अश्रु बहाये हैं..किस तरह हर दरोदीवार पर उसका चेहरा देखती थी, किस तरह रात को सोने से पूर्ण उसकी बांसुरी की धुन सुनाई देती थी, कैसे एक दिन गाय को देखकर एक गीत भीतर उमड़ आया था, कैसे उस दिन स्नान करते समय एक गीत प्रकटा था जिसमें शिवालय और कान्हा का जिक्र था. इतने वर्षों के प्रेम ने उसके अंतर को खाली कर दिया है और तभी उस कृष्ण की, जो सारे जहाँ से भी सुंदर है, आवाज सुनाई दी, ‘माँ’ और जैसे जन्मों की साध पूरी हो गयी, कितनी मधुरता थी उस आवाज में.. 

Sunday, January 24, 2016

कविता का अहसास


आज सद्गुरु ने कहा, इन्द्रियगत ज्ञान सीमित है, वह विस्मय से नहीं भरता, स्वरूपगत ज्ञान अनंत है, जो आनन्द की झलक दिखाता है. अपने अज्ञान को स्वीकारने से ऐसा ज्ञान मिलता है. ज्ञेय सदा ज्ञान से छोटा है, दृश्य से हटकर द्रष्टा में आना योग का प्रथम चरण है. विस्मय से परे वह तत्व है जहाँ स्तब्धता है, मौन है, आनन्द है तथा प्रेम है. अपने आप में मस्त रहने की कला वहीं सीखी जाती है. जिस क्षण कोई साधक द्रष्टा के भाव से नीचे गिरता है, राग-द्वेष से वशीभूत हो जाता है. जून चार-पांच दिनों के लिए एक कांफ्रेंस में भाग लेने आज मुम्बई गये हैं. अगले चार दिन भगवद् ध्यान में बीतेंगे, जैसे आजकल बीत रहे हैं. परमात्मा से कोई प्रेम करे तो वह स्वयं ही उसका ख्याल रखने लगता है. वह खुद को भूलने नहीं देता. उसे तो अब सोचते हुए भी अजीब लगता है कि कभी ऐसा भी था जब उसका मन उससे दूर था. तब कितना खाली रहा होगा जीवन. अब तो हर पल एक नया संदेश लेकर आता है. आज भी ठंड काफी है, इनर व दो स्वेटर पहने हैं उसने. अभी कुछ देर पहले ही वह सांध्य भ्रमण से लौटी है. अब कुछ देर कम्प्यूटर पर काम करना है. कल ‘मृणाल ज्योति’ विशेष बच्चों के स्कूल  जाना है. उन्हें फोटो भी दिखाने हैं तथा नये वर्ष का उपहार देना है. एक सखी ने कल कहा, उसकी छोटी बहन को ‘अहसास’ शीर्षक पर एक कहानी या कविता चाहिए, उसने एक कविता लिखने का प्रयास किया है, इसी नाम से एक कहानी वर्षों पूर्व लिखी थी.

कल रात ठंड के कारण नींद खुल गयी. सुबह उठने में देरी हुई. कल शाम ही वह सखी बिना फोन किये आ गयी, अब कविता ऐसे थोड़ी ही लिखी जाती है. मृणाल ज्योति स्कूल के विशेष बच्चे उसे देखकर खुश हुए, वे उसे पहचानने लगे हैं. फोटो देखकर भी वे आनन्दित हुए. एक अध्यापिका ने उसे आते रहने को कहा, वह होली पर फिर जाएगी. इस समय दोपहर के सवा दो बजने वाले हैं, एक छात्रा पढ़ने आयेगी. नेहरु मैदान में फुटबाल प्रतियोगिता का उद्घाटन समारोह है, एक सखी ने उसमें आने को कहा था, पर सम्भव नहीं है. उसकी नन्ही बिटिया का वीडियो देखा, सहज ही उसके लिए एक कविता लिखी, वह उनके जीवन में सुखद परिवर्तन लेकर आयी है. फिर भी यदि वे संतुष्ट नहीं है तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकता. खुश रहना या न रहना मन पर ही निर्भर है और मन बुद्धि पर और बुद्धि विवेक पर, विवेक सत्संग पर और सत्संग गुरु पर, गुरू भगवान की कृपा से मिलते हैं तो अंततः भगवान ही कारण हुए पर भगवान ने तो उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता दी है. वे यदि ठान लें तो खुश रहने से कौन रोक सकता है ? यह ठानना ही तो विवेक है न ? आज बापू की पुण्यतिथि है. शहीद दिवस, कुष्ठ निवारण दिवस तथा अन्य भी कई तरह के दिवस इस दिन मनाये जाते हैं. गांधीजी सत्य के मार्ग के राही थे, तभी तो राजनीति के शुष्क वातावरण में मुस्का सकते थे.


आज गुरूजी ने समाधि के विषय में कल से आगे बताया. कई तरह की समाधि होती है. समाधि में अपने होने का भान रहता है. ‘मैं हूँ’ से ‘यह है’ अर्थात आनन्द है इसका भान रहता है. असम्प्रत्याग समाधि में अपना ज्ञान नहीं रहता. वह अभ्यास के द्वारा मिलती है. भाव समाधि, लय समाधि तथा अन्य भी कुछ समाधियों का अनुभव साधक करते हैं. अंत में तो समाधि का लोभ भी छोड़ना पड़ता है, जैसे साबुन मैल छुड़ाने के लिए लगाया फिर साबुन को भी हटाना होता है. टीवी पर मुरारी बापू अपने चिर-परिचित अंदाज में कथा सुना रहे हैं, एक कविता को वह भजन की तरह गा रहे हैं. आज ध्यान में सुंदर दृश्य दिखे. चाँदी के चमकते आभूषण तथा ताम्बे या कांसे की मूर्तियाँ, भीतर कितनी बड़ी दुनिया है, ध्यान में जिसकी झलक मिलती है. अभी तो उसने पहला कदम रखा है इस मार्ग पर, अभी बहुत चलना है. जीवन तभी तो जीवन कहलाने योग्य है जब तक उसमें कुछ नया-नया मिलता रहे, नये फूल खिलते रहें, एक प्रतीक्षा बनी रहे भीतर. प्रतीक्षा में कितना आनन्द है, कुछ बेहतर घटने वाला है, कुछ ऐसा मिलने वाला है जो आज तक नहीं मिला, जो अमूल्य है. परमात्मा की राह पर चले कोई तो हर क्षण उपहार मिलते जाते हैं और हर अगला उपहार पहले से बेहतर होता है.     

Wednesday, December 9, 2015

संकल्प की छत


अपने अभ्यास के द्वारा जो वे प्राप्त करते हैं वही टिकता है, गुरू की शरण में जाने का अर्थ है गुरू बनने की प्रक्रिया की शरण में जाना. सत्य के समान कोई मंगल नहीं, जिसने अपने अभ्यास और वैराग्य से सत्य की झलक देख ली वही ऊँची उड़ान भर सकता है. आनन्द की चरम अवस्था का अनुभव वही कर सकता है, वह तृप्ति के सुख को जानता है वह पूर्णकाम होता है. वह अपने उदाहरण द्वारा कितनों को आनन्द व सुख का रास्ता बता सकता है. उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण हो तभी सत्य की झलक मिलती है. उन्हें डर भी किस बात का है, वे इस जगत में कुछ भी तो लेकर नहीं आये थे, न ही कुछ लेकर जाने वाले हैं, उन्हें जो भी मिला है यहीं मिला है, वे तो सदा लाभ में ही हैं. जगत का उन पर कितना बड़ा उपकार है, उसे लौटाने का तरीका यही हो सकता है कि वे किसी पर भी अपना अधिकार न मानें, यहीं की वस्तु यहीं लौटा दें. स्वयं सदा मुक्त रहें, खाली ! तब इससे भीतर वह भरेगा जो उनका अपना है, उसे वे लेकर जायेंगे और वही वे लेकर आये थे !  

सद्गुरु कहते हैं, क्यों न दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें, जैसे दुःस्वप्न नींद को तोड़ देते हैं. दुःख में वे पूर्ण जागृत हो सकते हैं सुख में बेहोशी छा जाती है. भूख के समय वे जागृत रहते हैं, उपवास का तभी इतना महत्व है, उपवास में कोई अपने पास रह सकता है, जगा रहता है, शरीर के कष्ट के समय भी मन सोया नहीं रह सकता. भय की अवस्था में भी पूर्ण जागरूक होते हैं, तेज गति में भी मन निर्विचार हो जाता है, जीवन की हर परिस्थिति का साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. यह जीवन निरंतर जल रहा है, यहाँ हर घड़ी खुद की तरफ ले जाना चाहती है, पर वे इसका उपयोग और बेहोश होने के लिए करते रहते हैं. होश पूर्ण विश्रांति ही तो ध्यान है, परिधि पर कुछ न हो रहा हो, केंद्र पर सजगता बनी रहे तभी ध्यान घटता है.

जाने कब से वे माया के बंधन में हैं और जाने कब से परमात्मा की कृपा भी बरस रही है. मन जब व्यर्थ बातों से हटकर उसकी तरफ मुड़ता है तो वह बाहें खोले ही मिलता है. वह परम सत्ता सदा जागृत है, पर वे उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं. परमात्मा के चिह्न चारों और बिखरे हैं, वही भीतर भी है जो उनके होने का कारण है, कितना आश्चर्य है कि वे उसे नहीं जानते, वह जो जानकर भी नहीं जाना जाता, वह जब होता है तो वे नहीं रहते, वहाँ से लौटकर कोई आया ही नहीं, वास्तव में परमात्मा ने ही परमात्मा का अनुभव किया है !

आज भी उसने एक सुंदर संदेश सुना, सर्वोत्तम पद है आत्मपद, इसकी शपथ उन्हें ग्रहण करनी है, नकारात्मक भाव से मुक्त रहना, कटुवचन नहीं कहना और सभी को प्रेम देना..ये तीन बातें इस शपथ में शामिल करनी हैं. उन्हें इस शपथ रूपी संकल्प की छत बनानी है, जिससे मन खाली रहे, यह व्यर्थ की बातों से नहीं भरता. नया संकल्प, नयी कल्पना, नया चिंतन तभी मन में आ सकता है, जब पुराना वहाँ न हो, जगह खाली हो तो आत्मा मुखरित हो जाती है. मन बाह्य संसार से ही विचारों को ग्रहण करता है यदि शपथ रूपी छत हो तो उनकी वर्षा से वे बच सकते हैं. अनावश्यक बातों को त्यागकर वे केवल आवश्यक को ही ग्रहण करें तो कितनी ऊर्जा बचा सकते हैं. फिर वही ऊर्जा भीतर जाने में सहायक होती है और वे मनुष्यत्व के पद की प्रतिष्ठा तभी बनाये रख सकते हैं जब भीतर जाकर आत्मा के प्रदेश में प्रवेश हो ! तभी जीवन सुंदर बनता है. ज्ञानी कर्म बाँधते नहीं हैं, कर्म छोड़ते रहते हैं, उन्हें भी प्रतिपल सजग रहकर अपने कर्मों को छोड़ते जाना है.     



Wednesday, September 9, 2015

भीनी-भीनी गंध



उस दिन स्वप्न में ( एक-दो दिन पूर्व ) देखा कि एक मृत देह के साथ वे एक ही बिस्तर पर सो रहे हैं. वे जानते हैं कि यह मृत देह है शायद उसकी बहन का, पर वे नींद में इतने मग्न हैं कि उठकर उससे अलग होना ही नहीं चाहते, कैसा स्वप्न था वह ? उसे बचपन से ही एक मृत्यु की याद बेचैन करती रही है, उसकी आठ वर्षीय बहन की मृत्यु जो रात में हुई और घर में सभी सो रहे थे. माँ अकेली उस मरती हुई बच्ची के पास थी, रात को एकाएक वह चिल्लाई...गयी! सारे घर में रोना-धोना मच गया. वह छोटी थी शायद पांच या छह वर्ष की. मृत्यु को नहीं जानती थी पर इतने वर्षों तक वह दुखद स्मृति उसे बेचैन कर देती थी. उस स्वप्न के बाद से जैसे मन से उस घटना का विलोप हो गया है, ऐसे ही एक बार बहुत बचपन में घटी घटना पुनः स्वप्न में देखी और उसका असर जाता रहा. उसकी आत्मा उसके मन पर मरहम लगा रही है, वह चेतना उसके मन का इलाज कर रही है. वह सद्गुरु से जुड़ी है, सद्गुरु परमात्मा से जुड़े हैं तो परमात्मा ही है जो उसके भीतर से सारे कांटे चुन-चुन कर निकाल रहे हैं. वह किसी महान उद्देश्य के लिए तैयार की जा रही है. उसकी निजी कोई चाह शेष नहीं रही, चाह तो मन में होती है जो मन से पार चला गया हो, जो अमृत का स्वाद चख चुका हो उसे इस नश्वर जगत से क्या मिल सकता है ! शाश्वत जीवन के द्वार पर खड़ी वह स्वयं को नवीन अनुभव कर रही है. उसे बहुत कार्य करना है. प्रेम तथा सेवा के कार्य. जिन्हें करने वाली वह नहीं, अर्थात उन सीमित अर्थों में नहीं जिसमें जगत उसे देखता है. जगत अपनी राह चलेगा, वह उससे दूर निकल गयी है.


आज ध्यान करते हुए एक भीनी-भीनी मधुर( चम्पा के फूलों की सी ) गंध का आभास हुआ, कैसा विचित्र अनुभव. परमात्मा की तरफ कोई कदम तो रखे, कैसे-कैसे अनुभव होने लगते हैं. वे जितना-  जितना भीतर से खाली होते जाते हैं, चैतन्य उतना-उतना उसमें भरता जाता है. जब कोई इच्छा नहीं रहेगी तो पुनः जन्म नहीं होगा, अभी तो न जाने कितनी इच्छाएं अवचेतन में दबी पड़ी हैं. चेतन मन में इच्छाएं अब कम ही उठती हैं सिवाय उस परमात्मा की इच्छा के. इस जगत में इच्छा करने योग्य एक वही तो है ! पर वह भी तभी मिलता है जब उसकी भी इच्छा न रहे... कल उसने स्वप्न में एक संत महात्मा को देखा, जिन्हें देखते ही किसी पूर्वजन्म की स्मृति हो आयी और भाव विह्वल होकर उनके चरणों पर गिर पड़ी. सम्भवतः सद्गुरु उसे जगाने आए थे पर वह उसके बाद भी सोती रही. साधना के पथ पर जब उसने कदम रखा है तो सबसे पहले यह लक्ष्य दृढ़ होना चाहिए कि उसे भाव शुद्धि, वाक् शुद्धि तथा कर्म शुद्धि प्राप्त करनी है. आज सुबह सद्गुरु ने बताया कि जिसकी वाणी, भाव तथा कृत्य तीनों शुद्ध होते हैं वही परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है. उसका लक्ष्य यही है, ध्यान में गहराई आने से यह सहज ही होने लगता है. उसका एक कृत्य आज शुद्ध नहीं रहा. अभी तक भी वह स्वयं को सहज रखना नहीं सीख पायी, सहयोग की भावना जरा भी नहीं है अर्थात भाव भी शुद्ध नहीं हुए. नीरू माँ कहती हैं जिसके प्रति अपराध बनता है वह शुद्धात्मा है यह ज्ञान न रहे तो प्रतिक्रमण ही एक मात्र उपाय है.  

Monday, July 27, 2015

ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया


लगता है उसकी विद्यार्थिनी आज फिर भूल गयी है. पिछले शुक्रवार भी वह नहीं आई थी. उसे एक कविता लिखनी है ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिये समय मिल जायेगा. शाम को क्लब जाना है कोरस के अभ्यास के लिए. रात को एक सखी के यहाँ खाने पर जाना है, उसकी शादी की सालगिरह है. सुबह उठने से पूर्व कितने स्वप्न देखे. बर्फ गिर रही है, आकाश एक बड़ी सी फिल्म की स्क्रीन बन गया है, वहाँ लोग एक दूसरे पर बर्फ के गोले बनाकर डाल रहे हैं. सब कुछ इतना स्पष्ट था जैसे सामने घट रहा हो. रात को देर तक नींद नहीं आई, पर इससे उसे कोई परेशानी तो महसूस नहीं होती, शायद वह जगते हुए भी सोती रहती है अर्थात सोते हुए भी जगती है, शायद ध्यान करने से ऐसा होता है. आज नीरू माँ का कार्यक्रम देखा, ऑंखें भर आयीं. कितनी करुणा, कितना प्रेम है उनके भीतर. प्रश्न पूछने वाले तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं पर बिना जरा भी विचलित हुए सभी को जवाब देती हैं. जैन मुनि आचार्य महाप्राज्ञ ने बताया मस्तिष्क का एक प्रकोष्ठ विकसित हो जाय तो मानव का व्यवहार ही बदल जाता है. भीतर की सुप्त शक्ति जब तक जाग्रत नहीं होती वह अज्ञान से मुक्त नहीं हो पाता. उसे जाग्रत करने का पुरुषार्थ तो करना ही है, उसे भाग्य पर नहीं छोड़ा जा सकता. सद्गुरु के बताये मार्ग पर तो चलना ही पड़ेगा. कल पता चला बड़ी भाभी के बड़े भाईसाहब नहीं रहे, उन्हें फोन करना है. कल से नन्हे के इम्तहान हैं. वह कुछ पल नियमित जप करता है. उसे शांति का अनुभव होता है. जब मन शांत होता है तो आत्मा का सहज स्वभाव मुखर हो जाता है. मन को अपने सही स्थान पर रखना ही साधना है.

कल का कार्यक्रम ठीकठाक हो गया. आज शाम को सत्संग में जाना है, कल एक शादी में तथा परसों तीन दिसम्बर है, नेहरू मैदान जाना है. आचानक ही उनके शामें व्यस्त हो गयी हैं. सुबहें और दोपहर तो पहले से ही थीं. कल सद्गुरु को समर्पित उसकी पुस्तिका की उन्नीस प्रतियाँ निकल गयीं, अगले हफ्ते.. और इसी तरह अगले कुछ हफ्तों में और भी लोग इसे लेकर पढ़ेंगे. अभी-अभी वह धूप में गयी, दिसम्बर में भी धूप इतनी तेज है कि दस मिनट से अधिक उसमें नहीं बैठा जा सकता. इसी तरह संसार रूपी धूप में भी देर तक अब रहा नहीं जाता, आत्मा की छाँव में लौट-लौट कर आना होता है, तभी भीतर शीतलता छायी रहती है. ऐसी शीतलता जो अलौकिक है, दिव्य है, प्रेम से पूर्ण है !

पिछले दो दिन फिर नहीं लिखा, रात्रि के पौने आठ बजे हैं. मन में विचार आया कि दिन भर का लेखा-जोखा कर लिया जाये. सुबह उठते ही जैसे पहले अधरों पर प्रार्थना आ जाती थी, “दूर दुनिया की हर बुराई से बचाना मुझको, नेक जो राह हो उस राह पर चलाना मुझको” अब नहीं आती. रात्रि को आने वाले स्वप्न भी पहले से आध्यात्मिक नहीं रह गये हैं, लेकिन होते बहुत अद्भुत हैं. आज दोपहर को Paul Bruntun की पुस्तक A search in secret india पढ़ती रही. शिक्षक ने कहा, विलम्बित ठीक से नहीं हो रहा है, अभ्यास बढ़ाना होगा. शाम को कोपरेटिव जाकर नन्हे के लिए कुछ समान खरीदा, वह परसों आ रहा है, उसकी आलमारी भी पिछले दिनों ठीक कर दी थी. 

Tuesday, May 19, 2015

गुलाबी धूप



उसे लगता है, अन्तर्मुखी होकर जिसे भीतर पाया है, ऑंखें खोलकर उसे गंवा देती है. मौन रहकर जो शक्ति एकत्र होती है, बड़बोलेपन के एक झटके में वह बह जाती है. अपनी भाषा अपने मन पर नियन्त्रण कभी-कभी नहीं रहता, कभी क्रोध का भाव कुछ क्षणों के लिए हावी हो जाता है और कभी वाणी सुमधुर नहीं रहती, अपना होश नहीं रहता न, पर फौरन मन चपत लगाता है और वह सचेत हो जाती है पर तब तक हानि तो हो चुकी होती है. साधना के पथ पर चलना हो तो छोटी-मोटी इच्छाओं को तिलांजलि देनी ही पड़ती है बल्कि वे सहज रूप से स्वयं ही छूटती जाएँ तभी ठीक है. अभी-अभी जून का फोन आया. कल रात को साढ़े सात बजे वे गन्तव्य पर पहुंचे फिर पौने नौ बजे तक गेस्ट हाउस. रूम न. तथा फोन न. दिया है, वह कल से सुबह उन्हें फोन कर सकती है. आज सुबह की शुरुआत ठीक वैसे ही हुई जैसे जून के होने पर होती थी. मौसम आज भी मधुमय है, सर्दियों की गुलाबी धूप खिली है, नन्हा भी समय से उठकर स्कूल जा सका. उसकी ओर पहले से अधिक ध्यान देना है.

आज सुबह नींद अपने आप खुल गयी. नन्हा ट्यूशन गया तो बाहर अँधेरा था, ठंड भी बहुत थी. उसने सुबह के सभी आवश्यक कार्य किये, टिफिन बनाया पर बस स्टैंड तक जाकर वह लौट आया, आज ‘असम बंद’ है. किसने किया है, कितने समय का है कुछ पता नहीं है. जून से बात हुई, वहाँ भी धूप निकली है. कुछ देर पूर्व ससुराल से फोन आया, पिताजी ने कहा माँ कह रही थीं कि जून उन्हें भी फोन करें. आज सुबह जून ने भी उससे कहा, वह घर पर फोन करे. उसने किया तो वह अभी सो रही थीं. शायद वहाँ ठंड बहुत है. गुरूमाँ ने कहा जब तक कोई ध्यान में उतरकर अपने अकेलेपन से प्रेम करना नहीं सीखेगा, उसे बार-बार जन्मना पड़ेगा. मृत्यु के बाद और जन्म से पहले हरेक अकेला होता है अपने मन के साथ और उससे बचने के लिए ही जन्म लेता है. उसे तो उसका अकेलापन बेहद प्रिय है अर्थात वह मृत्यु के बाद भी प्रसन्न रहेगी. बाबाजी ने कहा, जीवन में सुख,शांति व समृद्धि सदा बनी रहे, ऐसी कामना को प्रश्रय देना भी मूर्खता है बल्कि होना यह चाहिए कि सदा वह मनसा, वाचा, कर्मणा सद्मार्ग पर स्थित रहे, सजग रहे. अपना हित अथवा अहित मात्र उसके हाथ में है. अपने सुख-दुःख, शांति-अशांति के लिए वह स्वयं ही जिम्मेदार है, बल्कि अपने सद्कर्मों से जो फल की आशा से न किये गये हों, वह पुराने कर्मों को काट भी सकती है. नया बीज तो बोना ही नहीं है, यही साधना है !

जगजीत सिंह की गजल नैनी का बेटा सुन रहा है, आवाज यहाँ तक आ रही है. उनकी आवाज में एक कशिश है जो अपनी ओर खींचती है. वह पीछे बरामदे में धूप में चटाई बिछाकर बैठी है, नन्हा स्कूल गया है. कल रात्रि उसे मैथ्स बताते-बताते सोने में देर हुई, सो सुबह भी सब काम देर से हुए. कल शाम जून का किसी के हाथ भेजा सामान मिला, अखरोट, रेवड़ी, बड़ी आदि.. शाम को सत्संग में गयी, माँ का भजन गाते-गाते सचमुच माँ की स्मृति हो आई और आँखें भर आयीं. भजन गाने में एक अनूठा ही आनंद है, पूरे मन से गाने का आनंद, सही-गलत की परवाह किये बिना ! आज सुबह से कई सखियों से फोन पर बात हुई, परसों शाम एक सखी आई, थी उसके पहले दिन एक और, सो दिन ठीक-ठाक बीत रहे हैं. वैसे भी जब अंतर्मन में कृष्ण का वास हो तो अकेलेपन की बात ही नहीं रहती, बल्कि कभी-कभी मन स्वयं ही परेशान हो जाता है दुनियादारी में ज्यादा व्यस्त रहने पर, उसे अपने प्रेम और भाव में डूबने का जब पर्याप्त समय नहीं मिलता. कृष्ण को स्मरण करने के लिए वैसे अलग से समय निकलने की भी जरूरत नहीं है. सुबह क्रिया में, फिर काम करते वक्त, भजन सुनने में, सत्संग सुनने में, व्यायाम करने व भोजन बनाने में वह हर वक्त उसके साथ ही रहता है, सिवाय तब जब पढ़ती या पढ़ाती है. उसके दौरान भी उसकी स्मृति रहती ही है, बल्कि उसके होने से ही वह है, बल्कि वही तो है...ये सारे प्राणी उसी का तो विस्तार हैं..सबमें उसी की तलाश है.



Monday, May 4, 2015

बरामदे में गमले


जून कल दोपहर दो बजे मुम्बई के लिए रवाना हुए, वह दिल्ली होते हुए रात्रि साढ़े दस बजे वहाँ पहुंचें. उनकी याद कल दिन में कई बार आयी. शाम को वह टहलने गयी, दिन में आलमारी सहेजी. सर्दियों के वस्त्र निकले, गर्मियों के रखे. बरामदे के गमले बाहर रखवाए थे, आज माली ने निराई की. अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया. उन्होंने भी ‘क्रिया’ की, उसने भी सुबह पौने पांच बज उठकर वे सभी कार्य किये जो वे रोज करते हैं. सद्गुरु का ज्ञान उसके साथ है. उसे लगता है यह देह कृष्ण का मन्दिर है, इसे स्वस्थ-सुंदर रखना उसका कर्त्तव्य है, स्वस्थ रखना तो और भी आवश्यक है, मन में उसकी मूरत जो बसी है. वह उसके इतने निकट है कि कभी-कभी उसका स्पर्श भी महसूस होता है, सारा जगत जैसे अदृश्य हो जाता है, सिवाय एक उसकी स्मृति के वह अन्य किसी छोटी-बड़ी बात को स्थान देना नहीं चाहती. वह नितांत अपने लगते हैं, पूर्व हितैषी, पुराने मित्र, जाने पहचान से और बेहद प्रिय ! कृपा उसपर अवश्य हुई है अन्यथा इतने सारे सालों में पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ.

आज सुबह चार बजे से पहले ही नींद खुल गयी थी, वर्षा हो रही थी. स्नान-ध्यान आदि किया, समय की यदि कोई कद्र करे तो समय भी संभालता है. आज ‘जागरण’ में ध्यान के सूत्र सुने. सरल शब्दों में धीरे-धीरे बड़े प्यार से सद्गुरु ने कुछ बातें बतायीं, कि ध्यान करते समय यदि शरीर में कहीं दर्द हो तो उसे गहराई से महसूस करना है, उसके भीतर जाना है. शरीर का वह अंग उस बच्चे की तरह है जो माँ का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है. ध्यान धारणा पर आधारित होना चाहिए, कल्पना पर नहीं. अपने शरीर के अंग-प्रत्यंग की भाषा को सुनते हुए, श्वास-प्रश्वास पर अपना ध्यान टिकाते हुए जब मन एकाग्र हो जाये तो वही ध्यान है. उसके बचपन से किये कितने ही छोटे-बड़े अपराध आजकल याद आते हैं और तब लगता है इतना कलुषित था तब मन फिर भी ईश्वर की निकटता का अनुभव वह कर सकी, अर्थात उसका आश्रय लो तो सारे कलुष धुल जाते हैं. वह स्वच्छ कर देता है. भीतर से भी बाहर से भी. अपने सारे अपराधों की क्षमा मांगते हुए उसने कुछ आँसूं बहाये तो मन हल्का हो गया और आश्चर्य तो इस बात का कि ज्यादातर ऐसे में सिर भारी लगता है. सदगुरुओं की कही सारी बातें सच प्रतीत होती लगती हैं. उसके अंतर में लगा भक्ति का बीज अंकुरित हो रहा है और यह बेल बढ़ती ही जाएगी. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को उन्हें जाना है.

आज फिर तमस ने अपना प्रभाव दिखाया. सुबह नींद नहीं खुली. नन्हे के मित्र ने फिजिक्स ट्यूशन पर जाने के लिए पांच बजे फोन करके उठाया. नन्हा अब समझदार हो गया है, फौरन उठकर चला गया. कार ले गया था, वापस आया तो स्कूल के लिए तैयार हुआ और दौड़ते हुए बस स्टैंड तक पहुंचा. नूना की गलती की सजा उसे उठानी पड़ी, खैर अंत भला तो सब भला ! जून से फोन पर बात भी की, आज वे वहाँ किसी संबंधी से मिलने वाले हैं.