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Saturday, July 18, 2020

श्री मद देवी भागवत



रात्रि के पौने आठ बजे हैं. पिछले चार दिन खुद से मिलना नहीं हुआ, भला ऐसी भी क्या व्यस्तता ... कल एक सखी आयी, वे लोग कुछ वर्ष पहले तबादला होने पर चले गए थे, अब पुनः वापस आ गए हैं, अपना घर देखने आयी थी. सम्भवतः अगले महीने वे लोग सामान लेकर आ जायेंगे. आज से चैत्र नवरात्र आरंभ हो रहे हैं. सात्विक भोजन और देवी पुराण का पाठ, अष्टमी को कन्या पूजन, नवरात्र साधना के लिए उत्तम समय है. जीवन को उच्च बनाने ले लिए कुछ व्रतों को धारण करना बहुत आवश्यक है. सुबह मृणाल ज्योति गयी, जून ने अपने बहुत से वस्त्र दिए जो भविष्य में काम नहीं आएंगे. हॉस्टल के बच्चे थे और कुछ टीचर्स, उसने योगासन करवाये और एक खेल भी. स्कूल में पीले रंग की मुख्य दीवारों पर बच्चों ने सुंदर कलाकृतियां बनायी हैं. लगभग सभी बच्चे आर्ट में कुशल हैं. 

सुबह उठे तो मौसम खुला था, धूप थी, दस बजे जब क्लब गयी तो हल्की गर्मी भी, पर एक घण्टे बाद जब बाहर आयी तो हवा चलने लगी थी और बाद में वर्षा भी हुई, शाम तक बूंदा बांदी जारी रही. क्लब का सेल का आयोजन अच्छा रहा है आज, आज किसी को भी ज्यादा काम का अहसास नहीं हुआ. भूतपूर्व अध्यक्षा दिन भर स्वयं भी वहीं रहकर अन्यों को भी रुके रहने के लिए प्रेरित करती थीं.  उसने भी कुछ सामान खरीदा. मृणाल ज्योति का भी एक स्टाल था, उन्होंने कहा, ‘बोहनी हो गयी’. दोपहर को योग कक्षा के लिए बच्चे व महिलाएं प्रतीक्षारत थे. बच्चों ने बाद में चित्र बनाये और कागज के फूल बनाना भी उन्हें सिखाया. सुबह पिताजी से फोन पर बात हुई, वह बदले हुए मौसम से खुश हैं और अब रोज स्नान करने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती. उन्होंने कहा, मोदी जी बहुत ज्ञानवान हैं और वही भारत को आगे ले जा सकते हैं. करोड़ों भारतवासी मोदी जी के साथ हैं, उनके विरोधी कितना भी प्रयास कर लें, उनसे जीत नहीं पाएंगे. वह हर दिन तीन रैलियां कर रहे हैं. देश में चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गयी हैं. टीवी, अख़बार, या मोबाइल सभी पर नेता और पार्टियां अपना प्रचार करती नजर आ रही हैं. नवरात्रि का दूसरा दिन है आज. प्रकृति के देवी स्वरूपों के विषय में ‘देवी भागवतम’ में पढ़ा, अद्भुत व्याख्या है देवियों के रूप में जीवन की. 

अहंकार कितने सूक्ष्म रूप में मन में रहता है, इसको प्रकट करने के लिए परमात्मा ही भिन्न परिस्थितियों को उत्पन्न करते हैं. आज फेसबुक पर एक लेखिका द्वारा उसकी एक कविता को  अपरिपक्व कहे जाने पर उसने हटा लिया, यह अहंकार ही तो है. आलोचना को सहने के लिए निरहंकार होना है और दूसरों की राय से प्रभावित होना भी उचित नहीं. उसने देखा है, वह दूसरों की राय से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाती है, वह स्वयं को दिखावा करते हुए भी देख पाती  है कभी-कभी. अभी तक अपने समय और ऊर्जा का सही उपयोग भी नहीं कर पाती। समय बीतता जा रहा है, आसक्ति से मुक्ति अभी नहीं हुई. ‘मैं ‘की सही पहचान हो भी गयी है, पर ‘मैं’ की मिथ्या पहचान अभी भी बनी हुई है. समाधि का अनुभव सतत नहीं बना रहता. आज बीजेपी ने अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी कर दिया है. उनका संकल्प पत्र एक मिशन को लेकर आगे बढ़ने का पत्र है जिसमें अंत्योदय, राष्ट्रवाद तथा सुशासन की बात कह़ी गयी है. 

और अब वह पुरानी डायरी... जिसकी बातें पढ़कर उसे लगता है जैसे किसी और ने लिखी हैं... यूँ तो वर्तमान में भी वह केवल साक्षी है जो भी घट रहा है, जिसके साथ घट रहा है उससे वास्तविकता का जरा सा भी तो मेल नहीं...उस दिन के पन्ने पर ऊपर लिखी सूक्ति पढ़कर उसे लगा था, फिर वही बदमिजाज वाक्य उसे चिढ़ाने आ गया है. वाक्य था, ‘लोमड़ी खाल बदलती है आदत नहीं’ आज तो और भी, पर आज तो उसे खुश रहना चाहिए. उसने किसी को मुक्त कर दिया है, उसने ऐसा चाहा नहीं फिर भी उसने कहा, वह उसे आजाद करती है. आज उसकी समझ में आ रहा है कि वे व्यर्थ के जंजाल में फंसे थे. कुछ नहीं होता यह सब.... अर्थात मित्रता आदि. यह ठीक है कि वह अच्छा है और इसलिए वह उसका आदर करे उसकी अच्छाई के लिए पर वह नहीं जो वह समझता है या वह समझना चाहती थी. आज उसका पत्र मिला, पढ़कर कुछ भी नहीं हुआ. उसे निहायत बचकाना पत्र लगा, वह घिसापिटा चुटकुला और नसीहतें. उसका टाइम टेबल जानने की उत्सुकता या फिर आई एम ओके यू आर ओके पुस्तक की बात. वह उसे पत्र नहीं लिखेगी. वह जिस ओर जा रहा है उधर क्या है, कभी इधर कभी उधर कभी नौकरी, कभी  कुछ, उसकी तो कुछ समझ नहीं आता. कभी शोध कार्य करने की बात. एक लक्ष्य क्यों नहीं है. परीक्षाओं की भी चिंता नहीं उसके पेन की चिंता है. उसने सोचा दूसरा पत्र आने से पूर्व वह कोई पत्र नहीं लिखेगी. लगता है ज्यादा मीठा खाने को मिल गया है सो अब अच्छा नहीं लगता. अब वह हवा से हल्की है, कोई बोझ नहीं, कोई बंधन नहीं, मुक्त, बिलकुल मुक्त ! सिरदर्द मोल ले लिया था या पता नहीं क्या था वह, खैर ! अब तो सब ठीक है. अभी पढ़ाई करनी है जब तक नींद नहीं आएगी, और नींद आने का वक्त निकल चुका है अब जाग सकती है देर तक. कल विवेकानन्द की किताब से एक वाक्य पढ़ा था - मुक्ति का संदेश ! कुछ देर पहले एक अपनी जैसी एक लड़की से भेंट हुई रेडियो पर. गाड़ी में यात्रा करते-करते वह कितनी कल्पनाएं करती जाती है, स्वप्न देखती है कि .. कि .. और फिर स्टेशन आ जाता है. समांतर पटरियों पर चलने वाली गाड़ी !  


Thursday, August 30, 2018

आठ शक्तियाँ




नन्हा कल वापस चला गया. एक हफ्ता उसके रहने से घर का माहौल ही बदल गया था. पता ही नहीं चला एक हफ्ता कैसे बीत गया. मित्र के विवाह में वह आया तो अपने साथ एक मित्र को भी ले आया, दोनों ने ड्रोन उड़ाया और वह खो गया. उसे यकीन है कि एक न एक दिन वह मिल जायेगा. उसकी मित्र भी पहली बार घर आई, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है. नन्हे ने पूसी के लिए जो घर बनाया उसमें रेशमी वस्त्र बिछाया, काफी आरामदेह है, वह रात को उसमें सो भी सकती है. अगले हफ्ते मृणाल ज्योति में वार्षिक सभा है. जिसके लिए उसे एक कविता लिखनी है. जून कल चार दिनों के लिए शिलांग व गोहाटी जा रहे हैं. इस दौरान उसे एक जन्मदिन की पार्टी में जाना है और उसी दिन महिला क्लब की थैंक्स गिविंग पार्टी भी होने वाली है. अगले दो दिन घर की सफाई में लगने वाले हैं, पिछले हफ्ते इसकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

सुबह टीवी पर एक ब्रह्मकुमारी बहन आठ शक्तियों के विषय में बता रही थीं. हर आत्मा में ये आठ शक्तियाँ हैं. पहली है सिकोड़ने और फ़ैलाने की शक्ति, कछुए की तरह विपत्ति आने पर स्वयं को सिकोड़ लेना और सामान्य काल में विस्तार कर लेना यदि वे सीख जाते हैं तो हर परिस्थिति का सामना कर सकते हैं. दूसरी है समेटने की शक्ति, जो भी विस्तार उन्होंने जगत में किया है, अंत में एक क्षण में उसे छोड़ कर जाना होगा. यदि जीवन काल में भी समय-समय पर सब प्रवृत्ति त्याग कर गहन ध्यान में जाने की क्षमता है तो मोह से मुक्ति सहज ही मिल जाती है. मन की समता बनाये रखने के लिए सहन शक्ति या तितिक्षा का भी सबको अभ्यास करना है. यदि मन में सबके प्रति शुभभावना होगी तो किसी की बात बुरी नहीं लगेगी और सबके साथ निभाना सरल हो जायेगा. किसी भी बात को अपने भीतर समाने की शक्ति को भी पोषित करना है, जो विशाल बुद्धि से आती है, जीवन जितना मर्यादित होगा, अनुशासन का पालन सहज होगा उतना ही विपरीत को समाना आसान होगा. सार-असार, नित्य-अनित्य को परखने की शक्ति भी हर आत्मा में छुपी है. ज्ञान को अपने भीतर धारण करने से ही यह पोषित होती है. किसी भी विषय में शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता भी हरेक के भीतर है पर वे कई बार गलत निर्णय ले लेते हैं या निर्णय को टालते रहते हैं और समय निकल जाता है. सांतवी शक्ति है सामना करने की, जीवन में किसी भी परिस्थिति का बहादुरी से सामना करने की शक्ति भी जगानी होगी. अंतिम लेकिन एक महत्वपूर्ण शक्ति है सहयोग करने की शक्ति, जगत म,एन सभी को किसी न किसी का सहयोग चाहिए, जो सबके साथ मिलकर काम करना जानता है, वह कभी अकेला नहीं होता.

जून इतवार दोपहर को गये, शाम तक शिलांग पहुंच चुके थे, अगले दिन गोहाटी आ गये. सम्भवतः परसों वह लौट आयेंगे. रविवार को उसने बच्चों के साथ गुरूपूर्णिमा का उत्सव मनाया, सोमवार को संध्या के योग सत्र में फिर से महिलाओं के साथ. अगले सप्ताह उन्हें महिला क्लब की मीटिंग में योग पर एक कार्यक्रम प्रस्तुत करना है. इस समय रात्रि के ग्यारह बजने को हैं. शाम को लिखना आरम्भ किया था कि योग कक्षा का समय हो गया. उसके बाद तैयार होकर वह एक नन्ही बच्ची के जन्मदिन की पार्टी स्थल पर गयी, वहाँ होटल के स्टाफ के अतिरिक्त कोई नहीं था. लौट कर उनके घर गयी फिर बच्ची की नानी के संग वहाँ पहुँची. काफी अच्छा इंतजाम था. केक काटा गया और बिना अंडे का केक खाकर वह महिला क्लब की आभार प्रकटीकरण के भोज में आ गयी. जहाँ सभी महिलाएं आ चुकी थीं. मेहमान पौने नौ बजे आने शुरू हुए. दस बजे तक औपचारिक भाषण आदि होते रहे, उसके बाद जूस पव अन्य पेय आदि दिए गये, मेहमानों में कुछ उच्च अधिकारी भी थे. दस बजे वह वापस आ गयी, एक सखी ने रोटी व रायता पैक करके दे दिए, दिन की भिंडी की सब्जी पड़ी थी, सो डिनर घर पर ही खाया. सुखबोधानन्द जी को बहुत दिनों बाद सुना और अब ‘पीस ऑफ़ माइंड’ पर गूढ़ चर्चा चल रही है. वे आत्मायें हैं, हर अपने शुद्ध रूप में आत्मा पवित्र हंस है, देवदूत है, कमल वत है ! कर्मों के द्वारा ही वे आत्मा के शुद्ध स्वरूप से नीचे गिरते हैं और ज्ञान, कर्म व धारणा के द्वारा ही वे पुन शुद्ध स्वरूप को पा सकते हैं. स्वयं को दाता से जोड़कर उन्हें भी कर्मों तथा वाणी के द्वारा जगत को देते ही जाना है. वे जब स्वयं के असली स्वरूप को भूल जाते हैं तो ही द्वंद्व में पड़ते हैं. यदि हर क्षण यह याद रहे कि वे कौन हैं, तो सदा आत्मा में ही रमण करेंगे.  

Friday, February 2, 2018

नन्ही योगिनी


वर्षा सुबह से लगातार हो रही है. ग्यारह बजने में चंद मिनट शेष हैं, भोजन बन गया है, सो उसने डायरी उठा ली है. नैनी को बुखार हो गया है, पिछले दो दिनों से उसके पति को था सो माली की पत्नी को बुलाकर काम करवाया. दूधवाले की घंटी गेट से सुनाई दे रही है. पियक्कड़ है यह भी नैनी के ससुर की तरह. कह गया है, गोबर है उसके पास, गाड़ी भेज कर मंगवा लें. सुबह माली को बुलाकर समझाया कि पत्नियों पर हाथ न उठाए. कैसा नाटक का सा जीवन जीते हैं ये, पर समझते नहीं. माली की माँ एन.आर.सी के लिए गाँव गयी थी, कुछ कागज-पत्र लाने, कहने लगा, अब उसे भी जाना होगा एक दिन, नहीं तो सरकार उसके बच्चों को कोई सुविधा नहीं देगी. 

आज सुबह नींद खुली तो कोई भीतर कह रहा था, भोजन के प्रति आसक्ति को त्यागना होगा. रात भर सोने के बाद भी देह हल्की नहीं हुई थी. कल शाम जून आये तो ढेर से फल खाए जो वे लाये थे. वैसे भी आहार के प्रति कुछ ज्यादा ही सजग रहती है. परमात्मा हर चीज की खबर रखता है. वर्षों पहले की बातें भी याद आने लगीं. शुरू-शरू में ससुराल में एक बार जब समय से भोजन नहीं मिला तो रोने का मन हो गया था. आर्ट ऑफ़ लिविंग के कोर्स के दौरान सेवा करने से पूर्व स्वयं खा लेने की प्रवृत्ति भी याद आई. चेतना जब देह में ही अटकी रहेगी तो साधना आगे कैसे बढ़ेगी. चेतना को देह से मुक्त करना है. धरती का आकर्षण त्यागना है तभी आकाश में मुक्त्त उड़ान सम्भव है. पड़ोसिन से बात हुई, वे लोग रिटायर्मेंट के बाद जा रहे हैं. क्लब की तरफ से विदाई देने उसके घर कुछ महिलाएं गयी थीं. ऐसा लगता है, काम के दबाव में आकर सभी लोग काम को निपटा लेना चाहते हैं, काम कैसे हुआ इसकी चिंता कम ही रहती है. उसने भी हजारों बार ऐसा ही किया होगा, पर अब लगता है, चाहे कम काम करें वे पर काम सही ढंग से होना चाहिए. समारोह क्लब में होने पर पड़ोसिन के लिए लिखी कविता वह सबके सम्मुख पढ़ सकती थी, अब उसके घर जाकर देनी होगी. कल शाम वह नवजात कन्या को पुनः देखने गये. नन्ही-नन्ही उसकी अंगुलियाँ कितनी मुद्राएँ बना रही थीं. पैरों को मोड़कर भी जैसे आसन कर रही थी.  

आज भी बादल बरस रहे हैं, सुबह से, प्रातः भ्रमण भी नहीं हुआ. नैनी काम पर आ गयी है, घर पुनः व्यवस्थित लग रहा है. आज पुरुषार्थ के बारे में सुना. पुरुषार्थ का अर्थ है पुरुष के लिए अर्थात आत्मा के लिए. उन्हें स्वयं की मुक्ति के लिए ही कर्म करने हैं. परमात्मा तो सदा है ही, उसकी उपस्थिति को भीतर महसूस करते हुए स्वयं की शक्ति बढ़ानी है. उसके आनंद व शांति को स्वयं में जगाकर जगत में बांटना है. परमात्मा उन्हें मुक्त रखता है, कभी कोई मांग नहीं रखता, उन्हें भी स्वयं को छोटी-छोटी बातों से मुक्त रखकर उसे अपने द्वारा व्यक्त होने देना है. आज शाम को वे रामदेव जी का बताया दलिया बनाकर रखेंगे, चावल, मूंग दाल, गेहूँ का दलिया, ज्वार की जगह ओट्स, अजवायन और तिल.. इन सभी को भूनकर मिलाकर रखना है. अगले पांच-छह महीनों के लिए पर्याप्त होगा.      

Monday, July 11, 2016

होली के रंग


मौसम भीगा-भीगा सा है, गरज रहा है मेघ और छम-छम बरस रही हैं बूँदें ! मन भी भीगा है किसी अनजाने प्रेम की मस्ती में ! सद्गुरु क्या आये उसकी आध्यात्मिक यात्रा को पंख लग गये हैं, कितनी असीम करुणा है उनकी, वह जानते हैं सब कोई तो उन तक पहुंच नहीं सकते, सो उन्हें खुद ही आना पड़ा. ईश्वरीय कृपा का कोई पार नहीं पा सकता, वह दिन-रात अखंड अनवरत उन पर बरस रही है. वे ही अनदेखा किये अपने क्षुद्र मन का शिकार होते रहते हैं और झूठे अहम को सजाते रहते हैं, एक बार जब आभास होता है कि परमात्मा उनके साथ है ओर उनसे नितांत एकान्तिक प्रेम करता है, वे कृत-कृत्य हो जाते हैं, भीतर हिलोरें उठती हैं, तन-मन हल्का हो जाता है, फूल सा हल्का और ऐसा लगता है जैसे जन्मों का भार सिर से उतर गया हो...मुक्ति इसी को कहते हैं न ? भक्ति की दासी है मुक्ति यह कभी सुना था, सच ही सुना था !

गुरू का आदेश यही है कि वे हुकुम में रहें, उसका संदेश है कि हुकुम में रहकर जो शांति, आनंद और सुख उन्हें मिला है वह सभी को बाँटें. आज सुबह स्नान के बाद अनुग्रह हुआ और भीतर ध्यान का सूत्र मिला. उन्हें कुछ नहीं करना है, कुछ नहीं पाना है और वे कुछ नहीं हैं. कितना आसान है ध्यान करना सद्गुरु की कृपा के बाद. परमात्मा ने उन्हें अपने जैसा बनाया है और वे हैं कि अपने होने से ही संतुष्ट नहीं हो पाते, वे अपने होने को भी जान नहीं पाते. सबमें उसी परमात्मा का नूर है, जो एक ओंकार, अकाल मूरत, निर्भव, निर्वैर, अजूनी है. वह सत्य स्वरूप परमात्मा उनका अपना आप होकर भीतर ही बैठा है. वह कितना निकट है उनके, वह प्रकाश रूप है, वह चिन्मय है ! वह उनके हर कार्य हर भाव को देखता है, वह द्रष्टा है ! टीवी पर मुरारीबापू राम कथा सुना रहे हैं. उन्होंने भी अपने भीतर उस परमात्मा को अनुभव किया है. वह कह रहे हैं, हरि उनका फैमिली डाक्टर है, वह सारे अस्तित्त्व को सम्भालने वाला है. यदि वे भी अस्तित्त्व का हिस्सा बन जाएँ तो उनका भी ध्यान अपने आप होने लगता है !


कल होली है और परसों दुलहण्डी, इस वर्ष वे होली नहीं मना रहे. न ही गुझिया बनाने का उत्साह है, न ही सबको बुलाकर रात्रिभोज करने का, न ही सबके लिए टाइटिल लिखने का. कुछ खल तो रहा है तभी तो बार-बार ख्याल इसी बात की ओर जा रहा है, पर हर अच्छी चीज भी आखिर कभी न कभी तो खत्म होती है. इस साल ऐसे कई कारण हैं. सबसे बड़ा तो माँ का गिरता हुआ स्वास्थ्य, पिताजी के दातों की समस्या है. एक सखी के बेटे के बारहवीं के इम्तहान हैं. दूसरी की सासूजी को हाथ में चोट लगी है. एक अन्य को लोहरी पर बुलाया था तो बहुत बुलाने पर आये थे, इन सब बातों से जैसे भीतर उत्साह नहीं है. नैनी का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है, काम बढ़ जायेगा तो वह भी परेशान हो जाएगी और इन सब बातों से बढकर जो कारण है वह है सद्गुरु का आना, उस पर कृपा करना और भीतर जागृति दिलाना कि समय बहुत कीमती है. व्यर्थ गंवाने की जरा भी गुंजाइश नहीं है. इस वर्ष वे ध्यान करते हुए ईश्वर के प्रेम के रंगों से भीगने की होली खेलने वाले हैं. बाहर की होली बहुत खेल ली, अब भीतर जाने का वक्त है. मैदे की वस्तुएं उन्हें रास नहीं आतीं, सो गुझिया कैंसिल, हाँ गुलाब जामुन बनायेंगे, जो भी मिलने आये, खुले दिल से उनका स्वागत किया और उन्हीं का रंग लगाकर खिला दिया गुलाब जामुन ! 

Tuesday, June 28, 2016

मंजिल और रास्ता


‘मृत्यु के साथ यदि किसी की मित्रता हो तभी वह धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख सकता है. ऐसा हो नहीं सकता तो धर्म का पथ चुनना ही पड़ेगा. सजगता का वरण, समता की साधना भी तभी होती है. भीतर आग्रह हो तो अहंकार शेष है, अहंकार की तृप्ति करनी है तो उसे दुःख सौंपना ही होगा. स्वयं को जानना ही धर्म में अर्थात स्वभाव में स्थित होना है. जो स्वयं को जानता है उसे संसार से कोई अपेक्षा नहीं रहती, वह दाता बन जाता है. वह जानता है कि द्वेष करने से वह स्वयं भी उसी की भांति बन जायेगा जो उसके द्वेष का पात्र है. मन रुग्ण होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. नकारात्मक भावनाएं देह पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. जितना जितना कोई स्वयं में स्थित रहता है मुक्ति का अनुभव करता है. मुक्ति विकारों से, द्वेष से, दुखों से, वासनाओं से, क्रोध से और व्यर्थ चिन्तन से !’ आज सद्गुरु को सुनकर लगा वह उसके लिए ही बोल रहे थे.
यह जगत एक दर्पण है, उसमें वही झलकता है जो उनके भीतर होता है. भीतर प्रेम हो, आनन्द हो, विश्वास हो तथा शांति हो तो चारों ओर वही बिखरी मालूम होती है, अन्यथा यह जगत सूना-सूना लगता है. यहाँ किस पर भरोसा किया जाये ऐसे भाव भीतर उठते हैं. भीतर की नदी सूखी हो तो बाहर भी शुष्कता ही दिखती है. लेकिन भीतर का यह मौसम कब और कैसे बदल जाता है पता भी तो नहीं चलता. कर्मों का जोर होता है अथवा तो पापकर्म उदय होते हैं या वे सजग नहीं रह पाते. कोई न कोई विकार उन्हें घेरे रहता है तो वे भीतर के रब से दूर हो जाते हैं. हो नहीं सकते पर ऐसा लगता है. यह होना ठीक भी है क्योंकि भीतर छिपे संस्कार ऐसे ही वक्त अपना सिर उठाते हैं. पता चलता है कि अहंकार अभी गया नहीं था, सिर छिपाए पड़ा था, कामना अभी भीतर सोयी थी. ईर्ष्या, द्वेष के बिच्छू डंक मारने को तैयार ही बैठे थे. अपना आप साफ दिखने लगता है. साधना के पथ पर चलते-चलते जब वे यह सोचने लगते हैं कि मंजिल अब करीब ही है तो अचानक एक घटना ऐसी घटती है जो इशारा करती है कि रुको नहीं, अभी और चलना है. इस यात्रा का कोई अंत नहीं, इसमें मंजिल और राह साथ-साथ चलते हैं. जैसे कोई क्षितिज की तरह पास आता मालूम होता है निकट पहुंचो तो फिर उतना ही दूर..जिसने माना कि उसने जान लिया है उसका ज्ञान चक्षु बंद हो जाता है. वह खुला रहे इसके लिए सतत जिज्ञासु बने रहना होगा, सदा सजग रहना होगा, सदा स्वयं के भीतर झाँकने का काम करना होगा, कौन जाने कहाँ कोई विकार छिपा हो जो सही मौसम की प्रतीक्षा कर रहा हो !

स्वराज चेतना क्या है ? सत्य की खोज और मानव मात्र को जिसकी तलाश है क्या वही नहीं है स्वराज्य चेतना..आज मुरारी बापू की ‘मानस महात्मा’ को कुछ देर सुना. भीतर सद्विचारों की प्रेरणा जगाती है उनकी कथा. उन्हें भी अब कुछ करना होगा, मात्र विचार ही पर्याप्त नहीं है. उसे अपने लेखन को गति देनी होगी. हर कोई अपना-अपना कार्य ठीक से करे तो समाज पुनः अपने मूल्यों के प्रति जागरूक हो सकता है. उनकी परिचिता बुजुर्ग महिला आज गिर गयीं, उनका कंधा अपने स्थान से खिसक गया है, अस्पताल में हैं, वे मिलने गये थे. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, शाम को पार्टी में जाना है. कल सिंगापुर का शेष विवरण लिखा, अभी टाइप करना शेष है. सुबह प्राणायाम के बाद परमात्मा के साथ एक करार किया, वह उसे प्रकट करेगी और वह उसे अप्रकट करेगा. वह उसके जीवन में झलकेगा बाहर और वह भीतर खत्म होती जाएगी. उसका नाम उसकी शक्ति है और उसका पवित्र स्मरण उसका एकमात्र कर्त्तव्य, शेष तो अपने आप होता जायेगा. परमात्मा उनके भीतर सोया रह जाता है और वे बार-बार खुद को दोहराते चले जाते हैं, व्यर्थ का रोना रोते हैं. वह हर क्षण तैयार बैठा रहता है, सत्य सर्वदा सर्वत्र है ! 

Monday, September 21, 2015

गोपी गीत का माधुर्य


वर्षा की बूंदों की आवाजें कितने भिन्न-भिन्न रूपों में कानों में पड़ रही हैं. जिस किसी जगह या वस्तु पर पड़ती हैं उसकी सतह के कारण उनकी ध्वनि बदल जाती है. यही बूंदें जब टीवी डिश पर पड़ती हैं तो वह सिग्नल लेना ही बंद कर देता है. इस समय घर में कितनी शांति है, रिमझिम के अलावा सारी आवाजें बंद हैं. हाँ..दूर से किसी बांसुरी की आवाज आ रही है. सासु माँ स्वेटर बना रही हैं, नैनी चुपचाप अपना काम कर रही है. उसके पैरों का दर्द अब ठीक है, आज डाक्टर के पास जाना है सारी रिपोर्ट लेकर. सुबह ध्यान में उतरते समय मन ने प्रश्न उठाया कि कौन है जो ध्यान करता है ? आत्मा तो नित्य आनंद रूप है, साक्षी है, द्रष्टा है, उसे तो कुछ करना ही नहीं है. कृष्ण ने गीता में कहा है कि कोई एक क्षण भी बिना काम किये नहीं रह सकता तो उनका तात्पर्य जीव से होगा, जीव जो मन, देह तथा स्मृतियों को धारण करता है. किन्तु सदा ही क्रिया संतप्त करती है और क्रिया हीनता संतृप्त करती है..आनंद के बिना कर्म भी अधूरे हैं. यदि अनावश्यक चेष्टा न हो, वाणी से व्यर्थ काम न हो तथा मन सदा सुमिरन में रहे तो कोई मुक्ति का अनुभव हर पल कर सकता है. उसका मन इस क्षण कृतज्ञता का अनुभव कर रहा है. जीवन का इतना सुंदर उपहार उसे मिला है, अस्तित्त्व ने इस पल उसे चुना है. स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए वह उसके माध्यम से प्रकट हो रहा है. इतने सारे नजारों की वह साक्षी है साथ ही साक्षी है उसकी भी जो भीतर छुपा है, हर शै के पीछे छुपा है. पर अब वह उससे छुपा नहीं है क्योंकि उसका होना ‘उसके’ होने से ही है, वह है क्योंकि ‘वह’ है, वह ‘वही’ है. वह स्वयं के माध्यम से स्वयं को व्यक्त कर रही है. इस क्षण उसे कितनी पावनता का अनुभव हो रहा है, पावनता...जो कितनी प्रकाश पूर्ण, कितनी तृप्त.. कितनी आनंद से भरी..ऐसे अनंत क्षणों से यह जीवन बना है. प्रभु की कृपा की छाया में वह पलती आई है. वह प्रभु जो अनंत है सबके भीतर समाया है ! आज से पूजा का अवकाश आरम्भ हो गया है. गुरूजी कहते हैं पूजा का अर्थ है पूर्णता से उत्पन्न कृत्य..वह पूर्ण है तो उसके सारे कर्म पूजा ही हुए. आज उन्होंने घर की वार्षिक सफाई का आरम्भ किया. घर साफ हो तो लक्ष्मी जी का प्रवेश होता है. टीवी पर जो कल ही नया आया है मुरारी बापू के गोपी गीत का प्रसारण हो रहा है. आज शाम को सत्संग है एक दक्षिण भारतीय सखी के यहाँ.

उस दिन उसे अपनी गुलामी का अहसास कितनी तीव्रता से हुआ. गुलामी से बड़ा कोई दुःख हो सकता है क्या ? मोह के कारण ही वे जीवन में दुःख पाते हैं. मोह के कारण ही उसे जीवन में सुख मिलता हुआ प्रतीत होता है. परिवार जनों के द्वारा, मित्र-संबंधियों के द्वारा तथा वस्तुओं के द्वारा जो सुख मिलता हुआ लगता है वह मात्र आभास है, वह दुःख ही है जो सुख का लबादा ओढ़े हुए आता है. जीवन को बनाये रखने के लिए वे न जाने कितनी बार असत्य का सहारा लेते हैं. जीवन तो उस परमात्मा की कृपा से चल रहा है, उन्हें जो कुछ भी प्राप्त हुआ है वह उनके ही कर्मों का फल है, उसके लिए उन्हें किसी की गुलामी करने की क्या आवश्यकता है ? माया का पर्दा आँखों पर पड़ा है तभी तो वे सत्य का साथ नहीं देते और बार-बार छले जाते हैं. दुःख से घबराकर गलत मार्ग पर चल देते हैं. जो कष्टों से घबराकर सत्य का मार्ग छोड़ देता है वह कभी कष्टमुक्त नहीं हो सकता. वे जिनकी गुलामी करते हैं, सोचते हैं उन्हें प्रसन्न कर लेंगे पर इस दुनिया में कोई क्या किसी को सदा के लिए प्रसन्न कर पाया है ? बार-बार वे डरते रहेंगे बार-बार अहसानों के बोझ तले कुचले जायेंगे, बार-बार वे वही गलतियाँ करते रहेंगे. कभी तो उनका सोया हुआ आत्म सम्मान जगे, कभी तो वे पूर्ण रूप से उस परमात्मा पर विश्वास कर सकें. उसी ने उन्हें इस जगत में भेजा है, उसके सिवा उन्हें किसी का आश्रय नहीं चाहिए, असत्य का तो बिलकुल नहीं, वे मुक्ति के अभिलाषी हैं !  


टीवी पर मुरारी बापू बोल रहे हैं. वे झकझोर देते हैं, कभी तो भीतर की सुप्त चेतना पूरी तरह से जागेगी, कभी-कभी करवट लेती है फिर सो जाती है. वे कब तक यूँ पिसे-पिसे से जीते रहेंगे. अब और नहीं, कब तक अहंकार का रावण भीतर के राम से विलग रखेगा, जीवन में विजयादशमी कब घटेगी. संत जन प्रेरित करते हैं, कोई जगे तो प्रेम से भरे, आनंद से महके.. वे जो राजा का पुत्र होते हुए कंगालों का सा जीवन जीते हैं. सूरज बनना है तो जलना भी सीखना पड़ेगा, अब और देर नहीं, न जाने कब मृत्यु का बुलावा आ जाये, कब उन्हें इस जगत से कूच करना पड़े, कब वह घड़ी आ जाये जब ‘उससे’ सामना हो तब वे क्या मुँह दिखायेंगे ? 

Thursday, September 3, 2015

यस कोर्स की टीचर


कल जून रहे हैं, सो समय का ध्यान रखना होगा. समय की पाबंदी ठीक है पर क्या यह भी एक बंधन नहीं है. सभी तो मुक्ति चाहते हैं, पर भीतर से मुक्ति मिल जाये तो बाहर के बंधन कुछ नहीं बिगाड़ पाते. उन्हें भीतर से मुक्त होना है. अपने विचारों से, आदतों से, परनिंदा से, दुर्बलता से, भय से तथा हर समय कुछ न कुछ करते रहने की खुदबुद से. वे पूर्ण विश्राम में ही राम को पा सकते हैं. आजकल गुरूजी ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर बोल रहे हैं. प्रेम की पराकाष्ठा ही भक्ति है, वह भक्ति पूर्ण विश्राम में मिलती है, जब भीतर सारी चाह मिट जाये. इस जगत में वे कितना भी पालें कभी पूर्णता का अनुभव हो ही नहीं सकता, प्रेम में ही वह पूर्ण हो सकते हैं. अभी जो भीतर कभी-कभी एक बेचैनी सी छा जाती है वह इसी पूर्णता की तलाश है. उनके मन में जो विभिन्न कल्पनाएँ चलती हैं, वे जो राय बना लेते हैं व्यर्थ ही दूसरों के बारे में, वह सबसे बड़ी बाधा है इस पूर्णता की प्राप्ति में. वे अपनी ऊर्जा व्यर्थ ही गंवा देते हैं. जैसे ही स्वयं में आ जाते हैं, वैसे ही पूर्ण शांति का अनुभव होता है. मन से आत्मा में आने में उतना भी समय नहीं लगता जितना पलक झपकने में. साधना सरल है पर उसे कठिन समझ रखा है ! जो अप्रमादी है वही प्रगति करता है. मन तथा आत्मा को अलग-अलग देखना यदि आ जाये तो बाहर का व्यवहार भीतर को छू नहीं पाता, बाहर का व्यवहार तो इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के आधार पर होता है पर आत्मा तो इन सबसे अलग है और वह आत्मा ही वे हैं. उसका व्यवहार सासुमाँ को अवश्य थोड़ा खलता होगा, उसकी उदासीनता !

जून आज वापस आ गये हैं, इस समय ऑफिस गये हैं. कुछ देर में वह टहलने जाएगी और मिसेज परमार के साथ टहलकर वापस आ जाएगी. पिछले तीन दिनों से वह शाम को उसके साथ घर आती हैं, उनकी बेटी आर्ट ऑफ़ लिविंग का बच्चों का ‘यस कोर्स’ करवा रही है. उन्होंने कई रोचक बातें अपने रिश्तेदारों के बारे में बतायीं. नन्हे की फोन पर बातचीत जारी है. आज की पीढ़ी जो सामने है उससे बात नहीं करती, जो दूर है उनसे बात करती है. उसकी खुद की पीढ़ी, जो सामने है न उनसे और जो दूर हैं न उनसे, किसी से भी बात नहीं करती और उनसे पहले की पीढ़ी सबसे बात करना चाहती है, यही जनरेशन गैप है.  


फिर एक अन्तराल..आज पूरे दस-ग्यारह दिनों बाद डायरी खोली है. उसे यात्रा पर जाना था. नन्हा भी साथ गया. जून के साथ होने पर वह निश्चिंत रहती है पर अब सजग रहकर यात्रा करनी थी. कुछ भी परेशानी उन्हें न हो इसके लिए सारा इंतजाम जून ने कर दिया था. दिल्ली से आगे की ट्रेन की टिकट भी यहीं से बुक कर दी थीं. कल ही वे वापस आए हैं, जून भी यहाँ ठीक रहे, यह बड़ी उपलब्धि है वरना पहले उन्हें उसका बाहर जाना बहुत खल जाता था. जब कोई स्वयं संतुष्ट होता है तोआस-पास के लोग भी धीरे-धीरे वैसा ही व्यवहार करना सीखने लगते हैं. इस यात्रा में पिताजी, दीदी, दोनों छोटे भाईयों, बड़ी भाभी, छोटी बहन सभी से अध्यात्म चर्चा हुई. छोटे भाई ने तो अपने भीतर छुपी प्यास तथा गुरू के प्रति प्रेम का वर्णन बहुत सहज शब्दों में किया. ट्रेन यात्रा के दौरान उसने बताया, जब ध्यान में बैठता है तो उसे अपने साथ ही ईश्वर की उपस्थिति सद्गुरु के रूप में होती है. मंझले भाई को ज्ञान तथा योग दोनों की प्यास थी. वे सभी उच्च जीवन की ओर बढ़ रहे हैं, एक ही परिवार के अंश होने के कारण उनके भीतर बहुत कुछ साझा है. यहाँ इस जगत में वे किसी कारण से एक ही साथ इकट्ठे हुए हैं. उसकी यह यात्रा सफल रही ऐसा लगता है. पिता का धैर्य तथा प्रेम, छोटी भाभी की उदासीनता तथा भीतर की लगन, बच्चों की सहजता.. सभी कुछ अपने आप में पूर्ण थे. सभी के रहन-सहन का स्तर भी ऊंचा हुआ है. दीदी ने एक सत्संग हॉल बनाया है, जहाँ हर हफ्ते कीर्तन होता है. उनके भीतर भी ज्ञान तथा प्रेम का प्रकाश स्पष्ट झलकता है 

Monday, August 3, 2015

खून की होली


उसे इस बात का पता तो चल गया है कि कर्मों की गठरी जितनी छोटी होगी मुक्ति उतनी ही जल्दी मिलेगी और जितनी बड़ी होगी, उतनी ही देर लगेगी. यह तो तय है कि साधक की गठरी बढ़ती नहीं है, धीरे-धीरे खाली हो जाती है, तब अहंकार जो पहले सजीव था, निर्जीव हो जाता है. उसके बाद ही वास्तविक पुरुषार्थ आरम्भ होता है. मुक्ति के बिना भक्ति भी नहीं होती, जब मन क्षुद्र बातों से मुक्त होगा तभी न अनंत की ओर जायेगा.

कल रात स्वप्न में अपने हाथों पर, बाँहों पर खून लगा देखा. बनारस में कुछ दरिंदों ने बम विस्फोट किये भीड़ भरी जगहों पर, उनसे तो समाचार भी देखे नहीं जा रहे थे, जो लोग शिकार हुए होंगे, उनकी हालत का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है. वर्तमान समाज को कितने हमले झेलने पड़ रहे हैं, पहले बाहर से आक्रमण होते थे तो लोग उसके लिए तैयार रहते थे लेकिन आज के युग में हिंसा कितनी घिनौनी हो गयी है, हिंसा सदा से ही घृणित है लेकिन उसका यह रूप वीभत्स है. निर्दोष लोग, बेखबर अपने कामों में लगे लोग इस बेरहमी से उड़ा दिए जाते हैं मानो कोई खिलौना हों. यह एक बड़ी साजिश है, या नियति का चक्र, यह प्रारब्ध है अथवा मानव की हैवानियत. मानव के भीतर का पशु जागता है तो वह खून का प्यासा हो उठता है. उसके भीतर उन आतताइयों के प्रति भी सहानुभूति जगती है, उन्हें किस कदर अंधकार ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है. वे अनजान हैं इसके परिणाम से. कर्मों के खेल में क्या वे बचे रह पाएंगे ? एक साधक ऐसी स्थिति में क्या करे, क्या वह हाथ पर हाथ धर कर बैठा रहे अथवा तो सब कुछ परमात्मा पर छोड़ दे. आए दिन देश में कहीं न कहीं बम फटते रहते हैं, काश्मीर, असम था अब बनारस भी नहीं बचा. उसके भीतर भी एक विषैला कारखाना है जहाँ कटु शब्दों के बम बनते हैं. विपासना करते-करते उसका उसका पता चला है. उन कारखानों को ही उड़ाना है, ताकि उसकी भाषा संयत हो, मधुर हो, उसके लायक हो तथा प्रेम से भरी हो !


आज का दिन और दिनों से कुछ अलग है. सुबह नाश्ता भी नहीं किया था, अभी व्यायाम ही करके उठी थी कि मिस्त्री/ मजदूर आ गये, नये कमरे के लिए द्वार तो भीतर से ही बनेगा, कमरे को फटाफट खाली किया. शोर में ही पाठ किया और नाश्ता. तब तक हेयर ड्रेसर आ गयी. जून की पसंद के बाल काटे हैं हैं उसने, छोटे-छोटे कर दिए हैं, अब तीन-चार महीनों तक कटवाने की जरूरत नहीं, शायद साल भर तक ही. घर कैसा फैला-फैला लग रहा है, मौसम भी गर्म हो गया है, बाहर बगीचा भी बिखरा-बिखरा सा पड़ा है, माली कई दिनों से नहीं आया. बाहर जो तीसरा कमरा बन रहा है उसके कारण भी लॉन गंदा हो गया है. कल शाम जून ने कहा कि मई में वह मलेशिया जा सकते हैं, दो हफ्ते लगेंगे, चाहे तो वह घर जा सकती है, पर उसका बैरागी मन इसके लिए तत्पर नहीं है, बल्कि इन दिनों का उपयोग वह साधना के लिए कर सकती है. एडवांस कोर्स या विपश्यना का दस दिनों का कोर्स, यही उन दिनों का सबसे अच्छा होगा. इस समय दोपहर के तीन बजे हैं, वह अभी दायें तरफ की पड़ोसिन से बात करके आई है उसके माली के लिए जो फ़िलहाल तो बुखार में पड़ा है.  

Thursday, May 14, 2015

रेत के महल


“नित्य-अनित्य, पुण्य-पाप का भेद जानना ही विवेक है, आसक्ति मिटाना वैराग्य है. तृष्णा ही दरिद्रता है, जब तृष्णा न हो, मन में समृद्धि हो, वही वैराग्य है. जब विवेक और वैराग्य सध जाये और साधना का सहयोग भी मिले तभी भक्ति का उदय होता है.” सद्गुरु के वचन उसके हृदय को शीतलता से भर देते हैं. कैसी अद्भुत शांति का अनुभव होता है, उनके वचन सुनने से जैसे तृप्ति नहीं होती, पर मन में कहीं गहरे संतुष्टि भरती जाती है. मन उसी तृप्ति को चाहने लगता है. तब इस जगत की बातें बहुत छोटी महत्वहीन लगने लगती हैं. यह माया जाल अपने पुर्जे खोल कर रख देता है. तब कहीं भी मन टिकता नहीं, सिवाय उसके. यह पल-पल बदलता संसार और रेत के महलों से इन्सान के स्वप्न ढहते नजर आते हैं. सब छलावा ही लगता है, सच्चा सिर्फ वही एक लगता है. सारे संबंधों के पीछे टिके स्वार्थ स्पष्ट दीखते हैं. इस जगत की सीमाएं भी दिखती हैं, देह की सीमाएं, रिश्तों की सीमाएं और मनों की सीमाएं. मन जो पल-पल रूप बदलते हैं, जो निश्छल नहीं रह पाते, जो कभी असत्य का सहारा भी ले लेते हैं और कभी सत्य से न डिगने का प्रण लेते हैं, बुद्धि भी रूप बदल लेती है तो फिर कोई किसका भरोसा करे. एक उसी का जो इन सबसे परे है, सभी प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर कार्य कर रहे हैं. मन परवश है, मुक्त वही  है जिसने मुक्त की बाँह थामी है, अपने स्व को जाना है. निज का आनंद जिसने पा लिया वह क्यों जायेगा जगत से आनंद का प्रसाद पाने, वह तो अपने आनंद को लुटाने का ही कार्य करेगा न. सद्गुरु ने उसके भीतर आनंद के जिस स्रोत का पता बताया है, वह अनंत है !

पिछले दो-दिनों से उसका मन संशय ग्रस्त है. संसार उसे अपनी ओर खींच रहा है और ईश्वर की भक्ति अपनी ओर. ऐसा विरोधाभास पहले तो प्रतीत नहीं हो रहा था. हृदय में जैसे कोई कुहरा छा गया है और यह कुहरा दम्भ का हो सकता है. कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा, दम्भ का कुहरा उतना घना होगा. मन पर कोई घटना कितनी देर तक प्रभाव डालती रहती है, इससे भी उसके घने होने का सबूत मिलता है. ऐसे में कोई उसकी सहायता कर सकता है तो वह है कृष्ण का प्रेम. उसे अपने स्वभाव में स्थित रहना होगा पूरी निष्ठा के साथ और दिखावे की आडम्बर की कोई आवश्यकता ही नहीं हैं. अंतर का प्रेम अन्तर्यामी उठने से पूर्व ही स्वीकार लेते हैं. जीवन का लक्ष्य एक हो, रास्ता एक हो और मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर के प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे बूंद-बूंद ही सही ताकि संवेदना भीगी-भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आए, न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समान रूप से बरसे ! साधक के लिए करने योग्य एक ही कर्त्तव्य रह जाता है, वह है इस संसार को असत्य मानना अथवा स्वप्न  मानना. उसके शरणागत होकर उसके संसार में काम आने का प्रयत्न करना, जीवन का लक्ष्य हो ईश्वर, रास्ता हो समर्पण और कर्म हो सेवा तभी वह  मुक्त है !

उसे अपने अवगुणों पर नजर रखनी होगी, वे पनपें नहीं बल्कि जड़ को उखाड़ फेंकना है. सबसे अधिक तो वाणी का दोष है. ज्यादा बोलना हानिप्रद है. बल्कि ज्यादा सोचना भी क्योंकि बोलने और सोचने में ज्यादा अंतर नहीं है. मन के भीतर भी बोलना नहीं होना चाहिए. लोगों से मिलते वक्त भी स्मरण बना रहे, तभी याद रहेगा कितना बोलना है. ईश्वर तो दूर वह स्वयं को भी भुला देती है और परिस्थिति की गुलाम बनकर कुछ भी बोल देती है जिसका परिणाम कभी भी सुखद नहीं होता. दूसरा अवगुण है, समय का दुरूपयोग. जीवन सीमित है, इसका एक-एक क्षण कीमती है. जीवन मिला है जीवन के लक्ष्य को पाने के लिए, सुख-सुविधाएँ जुटाकर देह को आराम देने के लिए नहीं बल्कि नियमों का पालन कर तन, मन, व आत्मा को निर्मल बनाने के लिए. चित्त की शुद्धि ही उसके पाने का मार्ग खोलती है. वही साध्य है और वही साधना !


Wednesday, January 21, 2015

जीवन के पुरुषार्थ


आत्म समर्पण किये बिना मुक्ति नहीं ! अहंकार का त्याग कर ध्यान में बैठे तो कोई अपने कोमल स्पर्श से मन को शांत करता है. सारा ताप हर लेता है फिर उसे स्वच्छ करते हुए निर्दोष और सात्विक भावों से भर देता है, जो सबकी पीड़ा हर लेना चाहता है, सबको क्षमा कर देना चाहता है ! सांसारिक कार्य-व्यापार, उपलब्धियां, सांसारिक सुख तब अर्थहीन हो जाते हैं. मन किसी और दुनिया में पहुंच जाता है. जहाँ कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं, मात्र शांति और संतोष का साम्राज्य होता है ! यदि कोई इस शांति का भी उपभोग नहीं करता, उससे संतुष्ट होकर नहीं बैठ जाता तो अंत में मंजिल को पा लेता है !
आज ‘जागरण’ में सुना, संसार रूपी सागर में पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए उस बंदरगाह की तरह है जो तूफान में घिरे जहाज का आश्रय होता है. आज जून और उसके विवाह की वर्षगाँठ है. सुबह-सुबह जून ने उसे शुभकामना दी, फिर ससुराल से फोन आया. पिता ने शुभाशीष दी तो मन उनके प्रति कृतज्ञता से भर गया. सखियों, भाई-बहनों, सभी का फोन आया. परिवारजनों की शुभकामनाएँ पाकर मन खिल उठता है. ईश्वर के प्रति भी मन झुक जाता है कि उसे जून जैसे जीवनसाथी से मिलाया. वे दोनों इस समय एक-दूसरे के मन, भावों और विचारों में पूरी तरह समा गये हैं. हृदय में ईश्वर भक्ति हो तो सारे संबंध मधुर हो जाते हैं और जून उसके सहायक हैं हर क्षेत्र में. वह ही अपने आप में मग्न रहकर कभी न कभी उनकी उपेक्षा( अनजाने में) कर जाती है पर उनका एकनिष्ठ प्रेम उसे अनवरत प्राप्त होता रहता है.

सारी सृष्टि उसी एक का विस्तार है, एक को चाहो तो सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है, लेकिन उस एक को पाना जितना सरल है उतना ही कठिन भी. उसका माधुर्य जीवन के पुरुषार्थ से ही मिल सकता है. जब मन झुक जाता है तभी वह अंतर में प्रवेश करता है और तब उसे याद नहीं करना पड़ता जीवन का मार्ग मधुमय हो जाता है. हर दुःख उसका प्रसाद प्रतीत होता है और हर सुख उसकी कृपा ! वह जो स्वयं रस का सागर है, प्रेम का प्रतिरूप है, ऐसा वह कृष्ण जिसके जीवन में हो उसे धरती पर ही स्वर्ग का सुख मिल जाता है. उसकी मोहक छवि, उसकी बांसुरी का मधुर स्वर, आँखों का अथाह स्नेह और मधुर वचन सभी तो ऐसे उपहार हैं जिनको पाने के लिए मन एक क्षण में संसार को त्याग देगा !   

कल उसने ‘महासमर’ के सारे उपलब्ध भाग पढ़ लिए. अभी भी कथा पूरी नहीं हुई है, युद्ध जारी है, जैसे युद्ध मानवों के मनों में निरंतर चलता रहता है जब तक वे ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं हो जाते. लेकिन उस समर्पण के बाद गुरूमाँ के शब्दों में हृदय में एक पीड़ा का जन्म होता है जो उसके वियोग की पीड़ा है और अधरों पर एक रहस्यमयी मुस्कान का जन्म होता है जो उसके सान्निध्य में हर पल रहने के कारण उत्पन्न होती है, ऊपर से देखें तो विरोधाभास होता है पर जो इस स्थिति तक पहुंच चुका है उसके लिए सारे पर्दे खुल चुके होते हैं, सत्य प्रकट हो चुका होता है और उसका सत्य है कि कृष्ण उसके जीवन के आधार हैं. मात्र वही तो हैं जो चारों ओर विस्तारित हो रहे हैं फिर उनकी बनायी इस सृष्टि में किसी से कैसा विरोध. सभी की प्रकृति उनके अपने-अपने गुणों के अनुसार काम करवाती है. यह सारा चक्र उसी के इशारे पर तो चल रहा है. उनकी सीमा कर्म करने तक की भी नहीं है क्यों कि अपने स्वभाव के वशीभूत होकर वे कार्य करते हैं यदि अपने स्वभाव को परिवर्तित करने की क्षमता कोई पाले तो आत्मा का विकास सम्भव है अर्थात जीवन का विकास ! उसके लिए स्वाध्याय, सजगता, सात्विकता का पालन करना होगा, क्यों कि ईश्वर का निवास पवित्र हृदयों में ही तो है !




Monday, January 12, 2015

ब्रोकोली की पौध


भक्ति मुक्ति की सीढ़ी है, भक्ति हृदय में उत्पन्न हो तो ईश्वर की सत्ता, प्रेम और माधुर्य स्वतः प्रकटते हैं. ईश्वर के लिए यदि भाव दृढ़ हो तो वह उससे अनभिज्ञ नहीं रह सकता. उसके सारे कार्य वही तो संवारता है, बचपन से आजतक ईश्वरीय कृपा का सदैव अनुभव किया है. सुमिरन का भाव अंतर को पवित्र करता है अन्यथा मन इतना वेगवान है कि कोई आश्रय न मिले तो तो व्यर्थ इधर-उधर भटकता फिरेगा. बाबाजी कहते हैं, श्वास रूपी खंभे पर ऊपर-नीचे उतरने का कार्य इस मन रूपी सेवक को सौंप दे तभी कोई मुक्त रह सकता है अन्यथा यह भरमाता है. चित्त की झील यदि शांत होगी तो ही परमात्मा का प्रतिबिम्ब उसमें झलकेगा. सतत् जागरूक रहकर ही इसे अनुभव किया जा सकता है. शास्त्र कहते हैं वह निकट से भी निकट है और दूर से भी दूर है. देखा जाये तो हर दिन मानव का एक नया जन्म होता है हर रात एक छोटी मृत्यु होती है, एक दिन एक रात ऐसी भी आएगी जिसकी सुबह परिचित माहौल में नहीं होगी, उस वक्त ज्ञान और ईश्वर ही साथ होंगे.

आज गुरुनानक जयंती है, पूर्णिमा का दिन , पिता का जन्मदिन भी, सुबह उनसे बात की. मौसम बेहद ठंडा है, धूप में जरा भी तेजी नहीं है. नींद कुछ देर से खुली, रात को ठंड की वजह से नीद में खलल पड़ा था, शायद यही कारण रहा हो, पर आजकल उसके स्वप्न बहुत सुखद हो गये हैं. आज ध्यान में मन्त्र अपने आप छूट गया और मन सिर्फ एक भाव में स्थित हो गया. अद्भुत अनुभव था. साढ़े दस बजे वह गुरुद्वारे भी गयी, वहाँ अखंड पाठ का भोग लग रहा था. गुरुनानक वाणी सुनी, ज्ञान की वह गंगा जो हिंदू धर्म ग्रन्थों में भी है. जून तब ब्रोकोली की पौध लेने गये थे, बाद में उसने स्वयं ही लगाई. कल मूली के बीज डाले थे, अगले तीन महीनों में इसकी फसल तैयार होगी. खतों के जवाब लिखने का आज अच्छा अवसर है. जून ने जो दो लेख लिखने को कहा था वह सम्भव नहीं हो पाया है, गद्य लिखना ज्यादा कठिन है, कठिन कार्य से वह घबराती नहीं है पर लिखने के लिए मौलिक विचार भी होने चाहियें, इधर-उधर से पढ़ी-सुनी बातों को नीरस भाषा में लिख देने से तो बेहतर न लिखना ही होगा ! कविता लिखना उसके लिए सहज है हालाँकि पिछले दो-तीन महीनों से वह भी नहीं लिखी है, जून ने कहा है किताब छप कर  आने वाली है.

उसने मन में उठने वाले विचारों को क्रम बद्ध किया..मानव का मूल तो वही है, वही उन्हें पोषता है. सारी कलाओं का स्रोत भी वही है. वह बेहद निकट है पर उन्होंने खुद पर न जाने कितने लेप चढ़ा रखे हैं. मन में हजार तरह के संकल्प-विकल्प उठते हैं. कल्पना की दुनिया में विचरने वाला मन खुद से तो दूर है ही, परमात्मा से भी दूर चला जाता है. पर एक क्षण में ही यदि वह यह मुल्लमा उतार फेंके तो वही क्षण मिलन का होगा. एक पुकार यदि दिल से उठे तो वह सारे पर्दे खोलकर अपनी झलक दिखाता है. वह हितैषी हर पल बाट जोहता है कि कब भूला भटका कोई घर लौट आये. घर लौटना मानो जीवन में उत्सव का प्रवेश होना है !




Friday, January 2, 2015

मुक्त उड़ान

 

आज उस सखी के यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन किया गया है. उन्हें वहाँ नौ बजे के बाद पहुंचना है. कल शाम उस समस्याग्रस्त सखी का फोन आया, उसके घर में सुलह होने की शुरुआत तो हुई है. गुरूजी की वह कृतज्ञ है, उन्हीं की कृपा से यह चमत्कार ( उसी के शब्दों में ) हुआ है. उसकी भी सारी उलझनों को गुरू की स्मृति एक चुटकी में दूर कर देती है. भक्त के लिए भगवान सदैव तत्पर है, वह आने में एक क्षण भी नहीं लगाता. भगवान के लिए प्रेम ही परमधर्म है. अपने अंतर में छिपे प्रेम को प्रकट करना है. इस प्रेम को प्रकट करने में गुरू सहायक है. उसका अर्थ ही है जो अज्ञान को दूर करे, क्योंकि वह स्वयं मुक्त है, वही मुक्त कर सकता है. जो स्वयं बंधा हो वह क्या मुक्त करेगा. सद्गुरु को सुबह-शाम वह एक ज्योति के रूप में अपने साथ पाती है. शास्त्र माँ है और गुरू पिता है, उनकी शरण में आकर ही कोई द्विज होता है. दूसरा जन्म पाता है. ज्ञान का अभ्यास करने से और सेवा करने से ही कोई ज्ञान का अधिकारी बनता है. सतोगुण से ऊपर शुद्ध सतोगुण में स्थित होना है.

उसे लगता है सुख-दुःख मान्यता और कल्पना के आधार पर होता है. सुख-दुख को सच्चा मानना ईश्वर को सच्चा न मानना है. मन एक वृत्ति है, सागर की तरंग की तरह, वही सुख-दुःख का अनुभव करता है. है कुछ भी नहीं पर अनादि कल से वे इससे बंधे जा रहे हैं. अज्ञान का आधार तो मन ही है, मन की दीवारें गिर जाएँ तो यह अज्ञान उसी तरह लुप्त हो जायेगा जैसे अँधेरे कमरे की दीवारें गिर जाने पर वहाँ अंधेरा नहीं टिकता. या फिर मन एक चलते-फिरते रस्ते की तरह है जिस पर तरह-तरह के लोग हर समय चलते रहते हैं, यदि वह इनसे नाता न रखे और किसी भी वृत्ति का आग्रह न करे तो ही अविचलित रहेगी. आत्मा सभी को स्पर्श करते हुए भी किसी को स्पर्श नहीं करता, जैसे सूर्य की किरणें छूती हुई भी किसी को भी नहीं छूतीं. मन को भी आत्मा सा मुक्त होना सीखना होगा. निस्सीम गगन सा मुक्त, अनंत ब्रह्मांड सा मुक्त और पवन सा मुक्त..इसी मुक्ति को तो मोक्ष कहा गया है और यह मुक्ति पल भर को भी मिले तो भी अमूल्य है. जैसे बादल की सत्ता सूर्य से है पर बादल सूर्य को ढक लेते हैं वैसे ही आत्मा की सत्ता से से ही अज्ञान की सत्ता है. मृग-मरीचिका ही अज्ञान है, जो है ही नहीं उसके पीछे दौड़ते रहना ही तो अज्ञान है.

कल शाम उसे कुछ आवाजें जैसे दूर से बजते ढोल की आवाज सुनाई दे रही थी, कभी किसी वाद्य की आवाज, पर बाद में नींद आ गयी. कल शाम से ही जून कुछ चुप-चुप थे पर आज सुबह उन्होंने साथ-साथ क्रिया की और दफ्तर जाते वक्त वह सामान्य थे. दीदी को फोन किया वे लोग स्वयं भी नर्सिंग होम के मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. उसे याद आया, छोटी बुआ को पत्र लिखना है. टीवी पर आत्मा में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली भगवद गीता का पाठ आ रहा है. ईश्वर हर वक्त उसके निकट हैं. तीनों गुणों से परे अत्रि और सूया से परे अनसूया के पास वे बिन बुलाये ही चले जाते हैं.


दस बजे हैं, अभी विचार आया कि एक परिचिता से किये वादे को निभाने के लिए उनके यहाँ जाये. उनका बगीचा देखा, जगह ज्यादा है पर सूझ-बुझ से उसका उपयोग हुआ हो ऐसा नहीं लगता, खैर, वापस आयी तो लंच का समय होने ही वाला था. जून के दफ्तर जाने के बाद संगीत का अभ्यास किया, नये शिक्षक के सिखाने का तरीका बिलकुल अलग है और शुल्क भी तिगुना. पर संगीत को पैसों से नहीं तोला जा सकता. परसों शाम को तेजपुर की साधिका का फोन आया. योग शिक्षक तेजपुर में आ चुके होंगे. आज सुबह  जागरण में सुना, आसक्ति ही मानव को बांधती है. वास्तव में वह मुक्त है. अनंत शक्ति का भंडार है, लेकिन असली रूप को भुला बैठा है. उस दिन उसे अंतरतम की झलक मिली थी, अतिशय आनंद की अनुभूति हुई थी. वही आनंद थोडा थोड़ा करके रोज रिसता है और उसके अंतर को हरा-भरा रखता है. 

Monday, September 8, 2014

सीता का वनवास


फरवरी महीने का प्रथम दिन, मन की तरह आकाश पर भी बादल छाये हैं. जून आज मोरान गये हैं, शाम तक आयेंगे. सुबह वे जल्दी उठे. जून के जाने के बाद उसने फोन पर बात की, पिता अभी सोकर नहीं उठे थे, सो बात नहीं हो पायी. दीदी से बात की, उन्होंने एक अच्छी बात बतायी कि सभी लोग जो जीवित हैं अभी इस संसार में स्वप्न देख रहे हैं, माँ का स्वप्न पूरा हो गया, उनकी नींद खुल गयी है और वह इस सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पा गयी हैं. कल शाम वे टहलने गये तो मन में भरा विषाद फूट पड़ा. जून ने उसे सहारा दिया, कहा कि सुबह सभी से बात करे. नन्हे की परीक्षाओं के बाद फरवरी में घर जाने के लिए राजी किया. उन्हें उसकी मनः स्थिति का पूरा भान है. माँ कभी भी कोरी भावुकता की पक्षधर नहीं थीं. मोह, माया और ऊपरी दिखावा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. जो उचित हो और जिससे किसी का अहित नहीं होता हो सोच-विचार कर ऐसा काम ही करना चाहिए.

उसके भीतर कभी ख़ुशी का एक झरना हुआ करता था, जिसमें से ख़ुशी रिस-रिस कर अधरों पर, कभी आँखों से झलका करती थी. दुनिया हसीन लगती थी पर आज वह सोता कहीं सूख गया सा लगता है. भीतर एक खालीपन उतर आया है और साथ ही एक नया  स्रोत उभर आया है, खरे पानी का स्रोत. आँसूं बेबात ही छलका करते हैं. दिल कमजोर हो गया है. दुनिया पर से विश्वास हटने लगा है. भूचाल की त्रासदी से पीड़ित लोगों को देखकर सिहरन होती है, उनका दुःख अपना सा लगता है. यह इतना सारा दुःख कहाँ से आ गया है. माँ जो इन सब दुखों से परे चले गयी हैं, उनके जाने से भी जिन्दगी में एक खालीपन आ गया है. कल एक परिचिता मिलने आयी, रोने लगी और फिर उसे चुप कराना पड़ा. संभल-संभल कर फिर कुछ ऐसा हो जाता है. जून उसके मन की हालत  समझते हैं और हर क्षण वह साथ देते हैं. लेकिन यह खालीपन बाहर से नहीं भरेगा, भीतर से ही इसे भरना होगा. बाहरी संबंध तो माने हुए हैं, स्थायी नहीं हैं. समय के साथ बदलते रहने वाले हैं. जीवन को पुनः परिभाषित करना होगा. स्वयं के सहारे जीना होगा. जीवन की क्षणभंगुरता को कौन समझ सकता है, जानते तो सब हैं. अन्यों से किसी बात की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. कुछ भी स्थायी नहीं है. इतने दिनों से जो उसके मन में साध पल रही थी कि कोई तो कह दे, माँ नहीं है तो दुःख मत करो, हम तो हैं. पर कोई नहीं कहेगा. सभी बेबस हैं, जैसे वह खुद !

आज कोई फोन नहीं आया. मन स्थिर है. टीवी पर ‘उत्तर रामायण’ आ रहा है. लक्ष्मण को सुमन्त्र और राम को गुरु वसिष्ठ ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं. सीता को वनवास होगा, राम को पत्नी वियोग सहना होगा यह सब बातें सुमन्त्र को पहले से ही ज्ञात थीं, फिर भी ऐसा होने पर वह दुखी थे, विह्वल थे. ऐसे ही सबको पता था कि हरेक की मृत्यु निश्चित होती है, कि माँ की हालत ठीक नहीं थी, कि उन्हें अंततः जाना ही था फिर भी इससे उनके जाने का दुःख कम तो नहीं हो जाता. वे सभी संवेदना की डोर से बंधे हैं. उनके मन सुख-दुःख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के वाहक हैं. दुःख के वक्त कोई किस तरह अपना कर्त्तव्य धर्म निभाता है वही उसके चरित्र को दर्शाता है. वह इस वक्त अपने आप को दुखी नहीं मान रही. रामायण के पात्रों ने जैसे उसकी चोट पर मरहम रख दिया है. एकाएक भूचाल आने पर जैसे सारे रास्ते और पथ गायब हो जाते हैं वैसे ही दुःख आने पर प्राणी हतप्रभ हो जाता है. ऐसे में उसे ज्ञान व दर्शन की बातें ही सहारा देती हैं. भूचाल से पीड़ित लोगों में नये जीवन की आशा का संचार करना होता है. उन्हें पुनः नये पथों का निर्माण करना होगा.


  

Sunday, September 7, 2014

गुजरात का भूकंप


परसों सुबह छोटी बहन ने फोन पर खबर दी, बात करते वक्त वह सामान्य थी पर फोन रखते-रखते ही रुलाई फूट पड़ी. मन जानता था कि यह होने ही वाला है. गुजरात में आए भूचाल में लाखों प्रभावित हुए हैं, हजारों की मौत हो गयी. एक झटके में वे गहरी नींद में सो गये. जीवन कितना क्षण भंगुर है. इलाहबाद में महाकुम्भ में एक ओर लाखों स्नान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गुजरात के लोग दुःख और पीड़ा में डूबे हुए हैं. इन्सान प्रकृति के आगे कितना बेबस है.

कुछ देर पूर्व मंझली भाभी से बात की. आज वहाँ सभी फूल चुनने गये हैं. आज चौथा रस्म है, शनिवार को दसमी और छह को तेहरवीं. कल दिन भर जून बेहद उदास दिखे, उन्हें ऐसा देखकर उसने सामान्य रहने का प्रयास किया, पर सहज रूप से रहना अलग बात है कोशिश करना अलग. नन्हे का स्कूल आज बंद है, आज बसंत पंचमी है. सरस्वती पूजा का आयोजन जगह-जगह किया जा रहा है.

जीवन के सच बहुत कड़वे होते हैं, मानव आँखों पर रेशमी पर्दे डाले रहता है पर सच्चाई सारे पर्दे उठा सामने आ खड़ी होती है. मृत्यु भी एक ऐसी सच्चाई है. आज बापू की पुण्य तिथि भी है ‘शहीद दिवस’, सो आज मरण दिवस ही है. पर मृत्यु के बाद नया जन्म भी तो होता है. आत्मा को नव शिशु का कलेवर मिलता है एक बार फिर मृत्यु का ग्रास बनने के लिए. इसलिए ही संतों ने इस चक्र से मुक्ति को ही मानव का अंतिम लक्ष्य माना है. कितने जन्मों में कोई कितना कुछ पाए अथवा खोये, अंततः मृत्यु सब समेट लेगी. किन्तु इससे जीवन की महत्ता कम तो नहीं हो जाती. जीवन चाहे एक क्षण का हो या कुछ वर्षों का, अपने आप में एक उपहार है. जैसे और भौतिक वस्तुएं सदा साथ नहीं देतीं वैसे ही शरीर भी एक दिन नष्ट हो जायेगा. यही सनातन सत्य है. फूल खिलता है झरता है फिर खिलता है फिर झरता है, इससे फूल की महत्ता कम तो नहीं होती. जिसका जितना साथ मिला है उतना ही कृतज्ञ होते हुए उसे सम्मान देना चाहिए. गुजरात के उन हजारों लोगों को जो भूकम्प से आहत हुए हैं या मृत हो गये हैं, सच्ची श्रद्धांजलि वे सैनिक और समाज सेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता दे रहे हैं जो दिन-रात वहाँ काम में जुटे हैं.


मन के आकाश पर काले घने बादल छा गये कहीं कोई रोशनी की लकीर नहीं, फिर एकाएक बादल छंटने लगे और नीला आकाश धूप की चमक लिए स्पष्ट हो उठा, यह आकाश जिस तरह है नहीं पर दीखता है, उसी तरह मन का यह भ्रम उहापोह है नहीं, दीखता है. सब कुछ स्वप्नवत है आज जागरण में फिर शरीर की अनित्यता और परमात्मा की नित्यता के बारे में सुना, वर्षों से सुनती आ रही है कि देह मरण धर्मी है. लगता था कि समझ भी लिया है पर ऊपर-ऊपर से समझना और उसे वास्तव में जानना, इन दोनों में काफी फर्क है. पता नहीं कहाँ से यह दुःख मन में आकर बैठ गया है जो माँ के इस तरह चले जाने से ही उत्पन्न हुआ है. पहले-पहल लगा था कि मन सम्भला रहेगा पर पिछले दिनों की तरह उनकी स्मृति के अलावा कोई और बात मन में नहीं टिकती. शायद उसे स्वयं को ज्यादा समय देना चाहिए, धीरे-धीरे सब स्वयं ही सामान्य हो जायेगा. जून भी आजकल बहुत चुप रहते हैं. कल जब वह आये और यह बताया कि वे नहीं जा रहे हैं तो उसे बहुत दुःख हुआ. उन दोनों में से एक को वहाँ पहुंचना है ऐसा निर्णय वे कर चुके थे क्यों कि नन्हे को ले जाना ठीक नहीं होगा. कल उसके स्कूल में कवि सम्मेलन प्रतियोगिता थी. उसका हाउस अंतिम स्थान पर रहा, उसने भाग लिया और आज working model competition में भी भाग ले रहा है. सुबह दो सखियों के फोन आये उनके साथ भी वही बात हुई. गुजरात में मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है. प्रकृति निर्मम है. 

Friday, August 22, 2014

गोभी की पौध


आज फिर बादल छाये हैं आकाश पर, पिछले कुछ दिन धूप भरे थे, उनका बगीचा खिल रहा था. आज सुबह उसने एक पपीता तोडा, और सोच रही है उन परिचिता को दे आये या भिजवा दे कल जिनसे फोन पर बात हुई थी, उसे लगा शायद उन्हें बुरा लगा हो. नन्हा आजकल सुबह फिर देर से उठने लगा है, फिर जल्दी-जल्दी चुपचाप सारे काम करता है, एक किशोर के लिए ये लक्षण क्या ठीक हैं. आज बड़ी भाभी के जन्मदिन पर उन्हें शुभकामना दी तो वह प्रसन्न हुईं, कहने लगीं, सबसे पहली बधाई उनकी ही है. रात एक स्वप्न में उसने बंगाली सखी को देखा, जून से कहेगी, इ-मेल से उन्हें  दीवाली की शुभकामनायें भेज दें. आज जे.कृष्णामूर्ति को सुना, वह कहते हैं, जो प्रतिकूलता को नहीं स्वीकारता वहीं संघर्ष पैदा होता है, सब कुछ अनुकूल होता रहे ऐसा तो सम्भव ही नहीं है, जीवन जिस रूप में सम्मुख आए उसे ही सच्चे दिल से स्वीकारना ईश्वर भक्ति है.
“बाहर के दीये तो बहुत जला लिए अब तो आत्मदीप जलाना है. मिठाई भी बहुत खा ली, अब तो अंतर की मधुरता चाहिए, बाहर की सफाई भी बहुत हो गयी अब तो अंतर्मन को स्वच्छ करना है. एहिक दीवाली तो बहुत मना ली अब प्रज्ञा दीवाली मनानी है”. आज बाबाजी ने दीवाली का तात्विक अर्थ बताया. नैनी का स्वास्थ्य आजकल ठीक नहीं है फिर भी वह काम पर आती है, विवशता कहें या कर्त्तव्य परायणता, अपने काम को वह महत्व देती है वरना घर में भी बैठ सकती थी. उससे भी नूना को कुछ सीखने को मिलता है. आज जून सम्भवतः गोभी की पौध लायेंगे. पालक, मेथी, गाजर, मटर, धनिया और प्याज के बीज पड़ चुके हैं पर गोभी की क्यारी खाली पड़ी है. आज सुबह एक और पपीता तोड़ा, उसने पड़ोसिन को दिया और कल के लिए उसे निमंत्रित भी किया. कल क्लब में दीवाली पर विशेष उत्सव है पर वे घर पर व्यस्त रहेंगे. सात परिवारों को उसने विशेष भोज के लिए आमंत्रित किया है. कल उसकी संगीत अध्यापिका ने आखिर कह ही दिया, अब वह नहीं सिखा पाएंगी, यह उसका अंतिम महीना होगा, इसके बाद नई शिक्षिका खोजनी होगी या घर पर ही अभ्यास जारी रखना होगा. संगीत तो एक वरदान है जिसकी जितनी संभाल की जाये उतनी कम है.

पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोल सकी, उस दिन रात के आयोजन की तैयारी करनी थी, अगले दिन पार्टी के बाद की सार-संभाल तथा कल आराम करने के कारण. वे तीन जगह आमंत्रित थे, ज्यादा गरिष्ठ भोजन करने के बाद कल दिन भर उपवास करना पड़ा. कल शाम भी यहाँ दीवाली का ही माहौल था. सभी ओर दिए और रोशनियों की झालरें लगी थीं. पटाखों का शोर बढ़ता ही जा रहा था. आज दोपहर को जून के साथ बैंक जाना है, उसके अकाउंट को उन्हें जॉइंट अकाउंट बनाना है. कल जून ने उसे पैसे लाकर दिए, उसे कुछ भी रोमांचक नहीं लगा, बल्कि कुछ भी नहीं लगा, नये नोट देखकर भी कोई ललक नहीं उठी, लगता है मुक्ति की राह पर कदम तेजी से बढ़ रहे हैं. आज असमिया सखी ने ‘नीति वचन’ सुनने का फिर आग्रह किया, उसका मन भी अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहा है. जीवन अद्भुत है, यह नित नवीन रूपों में प्रकट होता है. कभी सुख और आनन्द की वर्षा कर उसे निहाल कर जाता है तो अगले ही पल अचानक विपत्ति बन प्रश्नचिह्न लगा जाता है. कभी सहज लगता है कभी अनबुझ पहेली की तरह प्रतीत होता है. साहित्य भी इन रसों व रंगों से अछूता नहीं रहता. वह सजग बनाता है, कठिन परिस्थितियों से पार पाने की प्रेरणा देता है.




Tuesday, August 12, 2014

अटल जी की चुटकियाँ


मन ही मुक्ति के आकाश में उड़ना सिखाता है, मन ही बंधन की खाई में पटक देता है. मन को सात्विक आहार, एकाग्रता और अनासक्ति मिले तभी वह ऊंचे केन्द्रों में रह सकेगा, ये सुंदर वचन आज ही उसने सुने थे. आजकल उसके मन ने एक नई आसक्ति पैदा कर ली है, टीवी के एक कार्यक्रम के प्रति, निश्चित समय होते ही अपने आप कदम टीवी की ओर बढ़ते हैं, इस आसक्ति की जड़ों को गहरा होने से पूर्व ही काटना होगा. अपने को आगे ले जाना है न कि पीछे, मुक्त होना है न कि नये-नये बंधनों में स्वयं को बांधना है. माँ-पिता का पत्र आये हफ्तों हो गये हैं, उसे पत्र लिखे हुए भी, नन्हे की बात लिखने का मन ही नहीं होता, क्यों, सही कारण शायद उसे खुद भी मालूम नहीं है. उन्हें बुरा लगेगा और माँ जो पहले ही अस्वस्थ हैं, उन्हें दुखद समाचार न ही दिए जाएँ तो बेहतर है. चचेरे भाई का पत्र आया है, जिसका जवाब देना ही पड़ेगा. वर्षों बाद बिन माँ के बच्चों के जीवन में खुशियाँ आने वाली हैं. बहन की शादी तय हो गयी हैं, भाई के लिए भी बात चल रही है. उन्हें एक बधाई कार्ड भेजना चाहिए. जून को कहेगी तो वे अवश्य ला देंगे. जून ने उसे कभी निराश नहीं किया, विवाह में वे क्या देंगे यह भी उन्होंने उस पर ही छोड़ दिया है. माँ से फोन करके इस बारे में बताना होगा. अगले हफ्ते भांजी का जन्मदिन है, उसे बधाई देते समय मंझले भाई से भी बात हो जाएगी.

आज इस क्षण ऐसा लग रहा है कि दिनों बाद स्वयं से मिल रही है. पिछले दिनों जीवन क्रम चलता रहा, कुछ सहज, कुछ असहज क्षण आये, किन्हीं पलों में मन कृतज्ञ हुआ, आनन्दित भी हुई जब ओलम्पिक खेलों का उद्घाटन समारोह देखा, कुछ दृश्य अद्भुत थे. फिर कुछ लोगों से मिलना भी हुआ, उनके परिचित ही हैं पर कई बार वर्षों जानने के बाद भी कुछ अनजाना रह ही जाता है. नन्हा स्कूल से आया तो बहुत खुश था, उसके मित्रों ने बहुत सहायता की और उसे जरा भी परेशानी नहीं हुई बस में, ऐसा उसने कहा. कल विश्वकर्मा पूजा थी, जून ने ऑफिस में ही लंच लिया. उनका दूधवाला भी इस दिन अपनी साइकिल की पूजा करता है, अच्छी तरह धो-पोंछ कर माला चढ़ाता है. लोगों को आस्था के लिए कुछ तो चाहिए, गोयनकाजी कहते हैं कि नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई नाम नहीं, किसी परम्परा का सहारा नहीं, बस प्रतिक्षण अपनी श्वास को देखते जाना है. साँस का सीधा संबंध मन से है जहाँ मन में उद्ग्विनता जगी कि साँस तेज हो जाती है. मन शांत है तो साँस भी नीरव धारा की तरह समान गति से चलती है. अपने मन में किसी आत्मा या परमात्मा के दर्शन करने के उद्देश्य से नहीं बैठना है बल्कि मन को विकारों से मुक्त करते जाना है. पहले तो विकारों के दर्शन होंगे फिर धीरे-धीरे संस्कार मिटेंगे, गांठे खुलेंगी, पर्दे हटेंगे तो मुक्त आकाश सा मन सम्मुख होगा जिसे कोई भी नाम दे दें, आत्मा या परमात्मा. मन में ऊपर-ऊपर से तो लगता है कि स्वच्छता आ गयी है निर्मलता आ गयी है पर जरा प्रतिकूल परिस्थिति आते ही कैसा बेचैन हो उठता है, किसी को को कुछ देकर पछताने लगता है, किसी के कुछ मांगने पर व्याकुल हो उठता है. यह विकारों का ही तो सूचक है. जो हो रहा है चाहे वह शरीर के स्तर पर हो या बाहर, साक्षी भाव से देखना आ जाये तो मन शांत रहना सीख लेगा.

आज सुबह माँ से बात की, वे सोलन में हैं, बहन, बच्चे व पिता जी घूमने गये थे. सुबह ध्यान में बैठी तो एक फोन आया, एकाएक उठना सम्भव नहीं था, पता नहीं किसका था. बगीचे से एक पपीता तोड़ा है जरा सा पकते ही पक्षी खाना शुरू कर देते हैं, उनका यह पपीते का वृक्ष बहुत मीठे व रस भरे फल देता है निस्वार्थ भाव से, ऐसे ही मानव को चाहिए कि दूसरों के काम आए. अभी तक तो वे संचित पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त वैभव का आनंद ले रहे हैं, लेकिन कभी तो ये संचित पुण्य समाप्त हो जायेंगे. भविष्य के लिए नये पुण्यों का संचय इसीलिए करना चाहिए. सद्विचारों से, सद्कर्मों से तथा सद्भावों से. ईश्वर से प्रार्थना भी इसी बात की करनी चाहिए कि कोई असद्विचार न जन्मे, यदि एक बार बीज पड़ गया तो अनुकूलता पाते ही वह पनपेगा अवश्य. कभी-कभी क्रोध व् द्वेष के भाव जो न चाहने पर भी मन को घेर लेते हैं वे इसी का सूचक हैं कि कभी न कभी बीज बोये जरूर गये थे. सुबह जल विभाग के लोग आये थे जो कल दोपहर को भी आए थे, पानी आजकल बहुत कम आता है, ऊपर चढ़ता ही नहीं, अपनी आँखों से देखकर गये हैं शायद अगले कुछ दिनों में सुधार हो. ओलम्पिक में भारत ने अर्जेंटीना को तीन गोल से हरा दिया अपने पहले मैच में. अटलजी ने उस दिन अमेरिका में कहा, पाकिस्तान से क्या बात करें, मौसम की अथवा बीवी-बच्चों की, उनकी चुटकियाँ लाजवाब थीं.




Friday, August 8, 2014

कान्हा का जन्मदिन


“एहिक विद्या, योगविद्या और आत्मिक विद्या ये तीन प्रकार की विद्याएँ होती हैं. जिनमें से पहली विद्या आजीविका के लिए है, दूसरी मानसिक उन्नति के लिए, तीसरी पर ध्यान कम ही दिया जाता है. इसी का परिणाम है की छात्र जीवन समाप्त होते ही अधिक से अधिक आमदनी वाली नौकरी की तलाश शुरू हो जाती है”. आज बाबा जी बच्चों को सम्बोधित कर रहे थे. आज अपेक्षाकृत उसका सात्विक भाव जागृत है, कल की उहापोह से मुक्ति मिल गयी है, जैसे पौधा जल के बिना मुरझा जाता है वैसे ही इन्सान प्रेम के बिना सूख जाता है, धन-दौलत से भी ज्यादा जरूरी है प्रेम, अहैतुक एकान्तिक प्रेम ! ऐसा प्रेम जो दुराव नहीं करता, क्षमा करना जानता है और जो जीवन को जीवन बनाता है. जून आजकल व्यस्त हैं, कल शाम देर से घर आये बाद में वे एक मित्र के यहाँ गये, उनका घर भी एक अजीब सा मंजर लिए होता है, पर वे वहाँ बिना किसी लागलपेट के, बिना किसी संकोच के बातें करते हैं, हंसते हैं, पुरानी मित्रता है ऐसे ही असमिया सखी के यहाँ जाने पर होता है. आज सुबह छोटे भाई को जन्मदिन की शुभकामनायें दीं, माँ ने दवा लेना अपने आप बंद कर दिया था सो अस्वस्थ हो गयीं थीं, अब ठीक रही हैं पर उनसे बहुत कम देर बात हो पाई, पिता भी घूमने गये थे. उसने सोचा कल सुबह फिर फोन करेगी. कल जन्माष्टमी है उसने व्रत रखने का निश्चय किया है, कल का दिन कृष्ण को अर्पण, कृष्ण जो कितने नामों और रूपों में जग में आते रहे हैं. जिनकी वंशी की मोहक धुन ने सारे ब्रज को ही नहीं सारे विश्व को मोह लिया था, मोह लिया है और मोहती रहेगी. जो अर्जुन के सारथी भी हैं और गुरु भी, वही उसके जीवन के सारथी बन गये हैं.

आज जन्माष्टमी है. जून को आज अवकाश के दिन भी दफ्तर जाना पड़ा है. नन्हा घर पर ही है उसे उसका छोटा सा मन्दिर जिसे आज फूलों से सजाया है अच्छा लगा, वैसे तो कृष्ण उसके मन में हैं उसने उन्हें मानसिक पुष्पों को अर्पण किया है. गीता में सत्व, रज और तम से भी ऊपर उठने का पाठ पढ़ा, स्थितप्रज्ञ होने के वचन को दोहराया. सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ, ग्रीष्म-शीत आदि में सम भाव बनाये रखना है यह भी पुनः पढ़ा.

ईश्वरीय प्रसाद के रूप में वर्षा आज भी बरस रही है, बाहर शीतलता है और भीतर भी. कल दिन भर मन पर सद्विचारों का प्रभाव रहा पर रात को सोते समय कुछ ही पलों में मन कहाँ पहुंच गया. मन की शक्ति अपार है, आवश्यकता है इसका सदुपयोग करने की. काश जितनी तेजी से विचार पनपते हैं उतनी ही शीघ्रता से वे कहीं अंकित भी होते जाते, हजारों मन कागज खप जाता एक मन के विचारों को अंकित करने के लिए. कल रात छोटी ननद का फोन आया, वह नया मकान खरीद रही है, दशहरे में सम्भवतः गृहप्रवेश करेंगे. वे लोग इसी वर्ष उनके पास जायेंगे. उसके घर में माँ पिछले दिनों फिर अस्वस्थ हो गयी थीं. आजकल माँ-पिता दोनों मृत्यु के विषय में अवश्य सोचते होंगे, Tibetan book..पढकर वह भी सोचने लगी है. मरना जीने की शर्त है, उन सभी को एक न एक दिन तो मरना ही है, फिर क्यों न पहले से ही इसके लिए स्वयं को तैयार करें. यह बात जितनी अटपटी लगती है उतनी है नहीं, इन्सान हमेशा तो जिए चला नहीं जा सकता, कहीं न कहीं तो फुल स्टॉप लगाना ही होगा, किसी के जीवन में यह प्रक्रिया सहज भाव से होती है तथा किसी को बहुत दर्द व पीड़ा सहनी होती है. उसकी तो ईश्वर से प्रार्थना है कि मृत्यु लम्बी अस्वस्थता के बाद न हो, उतनी ही प्रिय हो जितना जीवन है. मृत्यु वैसे जीवन का अंत नहीं है पर यदि हो भी तब भी इसमें दुखी होने की क्या बात है, वे हों या न हों यह दुनिया तो वैसी ही रहेगी !