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Monday, September 8, 2014

सीता का वनवास


फरवरी महीने का प्रथम दिन, मन की तरह आकाश पर भी बादल छाये हैं. जून आज मोरान गये हैं, शाम तक आयेंगे. सुबह वे जल्दी उठे. जून के जाने के बाद उसने फोन पर बात की, पिता अभी सोकर नहीं उठे थे, सो बात नहीं हो पायी. दीदी से बात की, उन्होंने एक अच्छी बात बतायी कि सभी लोग जो जीवित हैं अभी इस संसार में स्वप्न देख रहे हैं, माँ का स्वप्न पूरा हो गया, उनकी नींद खुल गयी है और वह इस सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पा गयी हैं. कल शाम वे टहलने गये तो मन में भरा विषाद फूट पड़ा. जून ने उसे सहारा दिया, कहा कि सुबह सभी से बात करे. नन्हे की परीक्षाओं के बाद फरवरी में घर जाने के लिए राजी किया. उन्हें उसकी मनः स्थिति का पूरा भान है. माँ कभी भी कोरी भावुकता की पक्षधर नहीं थीं. मोह, माया और ऊपरी दिखावा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. जो उचित हो और जिससे किसी का अहित नहीं होता हो सोच-विचार कर ऐसा काम ही करना चाहिए.

उसके भीतर कभी ख़ुशी का एक झरना हुआ करता था, जिसमें से ख़ुशी रिस-रिस कर अधरों पर, कभी आँखों से झलका करती थी. दुनिया हसीन लगती थी पर आज वह सोता कहीं सूख गया सा लगता है. भीतर एक खालीपन उतर आया है और साथ ही एक नया  स्रोत उभर आया है, खरे पानी का स्रोत. आँसूं बेबात ही छलका करते हैं. दिल कमजोर हो गया है. दुनिया पर से विश्वास हटने लगा है. भूचाल की त्रासदी से पीड़ित लोगों को देखकर सिहरन होती है, उनका दुःख अपना सा लगता है. यह इतना सारा दुःख कहाँ से आ गया है. माँ जो इन सब दुखों से परे चले गयी हैं, उनके जाने से भी जिन्दगी में एक खालीपन आ गया है. कल एक परिचिता मिलने आयी, रोने लगी और फिर उसे चुप कराना पड़ा. संभल-संभल कर फिर कुछ ऐसा हो जाता है. जून उसके मन की हालत  समझते हैं और हर क्षण वह साथ देते हैं. लेकिन यह खालीपन बाहर से नहीं भरेगा, भीतर से ही इसे भरना होगा. बाहरी संबंध तो माने हुए हैं, स्थायी नहीं हैं. समय के साथ बदलते रहने वाले हैं. जीवन को पुनः परिभाषित करना होगा. स्वयं के सहारे जीना होगा. जीवन की क्षणभंगुरता को कौन समझ सकता है, जानते तो सब हैं. अन्यों से किसी बात की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. कुछ भी स्थायी नहीं है. इतने दिनों से जो उसके मन में साध पल रही थी कि कोई तो कह दे, माँ नहीं है तो दुःख मत करो, हम तो हैं. पर कोई नहीं कहेगा. सभी बेबस हैं, जैसे वह खुद !

आज कोई फोन नहीं आया. मन स्थिर है. टीवी पर ‘उत्तर रामायण’ आ रहा है. लक्ष्मण को सुमन्त्र और राम को गुरु वसिष्ठ ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं. सीता को वनवास होगा, राम को पत्नी वियोग सहना होगा यह सब बातें सुमन्त्र को पहले से ही ज्ञात थीं, फिर भी ऐसा होने पर वह दुखी थे, विह्वल थे. ऐसे ही सबको पता था कि हरेक की मृत्यु निश्चित होती है, कि माँ की हालत ठीक नहीं थी, कि उन्हें अंततः जाना ही था फिर भी इससे उनके जाने का दुःख कम तो नहीं हो जाता. वे सभी संवेदना की डोर से बंधे हैं. उनके मन सुख-दुःख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के वाहक हैं. दुःख के वक्त कोई किस तरह अपना कर्त्तव्य धर्म निभाता है वही उसके चरित्र को दर्शाता है. वह इस वक्त अपने आप को दुखी नहीं मान रही. रामायण के पात्रों ने जैसे उसकी चोट पर मरहम रख दिया है. एकाएक भूचाल आने पर जैसे सारे रास्ते और पथ गायब हो जाते हैं वैसे ही दुःख आने पर प्राणी हतप्रभ हो जाता है. ऐसे में उसे ज्ञान व दर्शन की बातें ही सहारा देती हैं. भूचाल से पीड़ित लोगों में नये जीवन की आशा का संचार करना होता है. उन्हें पुनः नये पथों का निर्माण करना होगा.