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Tuesday, July 21, 2020

विनोबा भावे के विचार


शाम के पौने पांच बजे हैं. बाहर धूप है, पंखे के बिना बैठना नहीं भा रहा है. आज नवरात्रि की सप्तमी तिथि है. कल कन्या पूजन करेंगे. सुबह नैनी व माली की बेटियां बीहू नृत्य की ड्रेस पहनकर आयीं, स्कूल के कार्यक्रम में जा रही थीं. उसने उनकी तस्वीरें उतारीं. अभी कुछ देर पहले मालिन आयी आशीर्वाद लेने, किसी ने उसे कह दिया है कि आज के दिन बड़ों का आशीर्वाद लेना चाहिए. उसने मन ही मन प्रार्थना की परमात्मा इन सबको ढेर सारी खुशियाँ दे. सुबह उठने से पूर्व जैसे कोई भीतर कह रहा था, उन्हें किसी को बदलने की आवश्यकता नहीं है, वे जैसे हैं अति प्रिय हैं. सभी अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर्म करते हैं , यदि उन्हें वे संस्कार कष्ट देते हैं तो वे खुद ही उन्हें बदलने का प्रयास कर सकते हैं परमात्मा भी आकर यह काम नहीं कर सकता. बगीचे में जैसे बैंगन, आलू, भिंडी सभी कुछ जैसे बीज हों वैसे ही उगते हैं. वे यदि किसी को दोषी  देखते हैं तो वह दोष उनमें भी होता है. यदि वे स्वयं को आत्मा देखते हैं तो अन्यों को भी निर्दोष ही देखेंगे. परमात्मा के सिवा जब इस जगत में कुछ है ही नहीं तो कौन दोषी और कौन निर्दोष ! 

कुछ देर पहले नन्हे से बात की वह नए घर में था, काफी काम हो गया है पर काफी कुछ बाकी भी है. दो सप्ताह बाद वे वहाँ जा रहे हैं, शेष कार्य उनके जाने के बाद होगा. आज रामनवमी भी है और बैसाखी भी, बीहू का अवकाश भी शुरू हो गया है. उन्हें इस समय का अच्छा उपयोग करना है. सुबह अष्टमी की पूजा का कार्यक्रम ठीक रहा. मौसम आज भी गर्म है. पीछेवाली सब्जी बाड़ी में मजदूर काम कर रहे हैं, सीवर की पाइप बदलनी है जो इलेक्ट्रिकल विभाग के लोग जब खुदाई करने आये थे टूट गयी थी. छोटा भाई बहुत दिन बाद घर गया है. पिताजी के साथ तस्वीर भेजी है, वह बहुत शांत लग रहे हैं. सामने वाले लॉन में माली सफाई कर रहा है. कल रात आंधी बारिश के बाद ढेर सारे पत्ते गिरे. सुबह टहलते समय देखा, बस स्टैंड के पास एक फूलों वाले पेड़ की बड़ी सी डाल टूटकर गिरी हुई थी. बाद में नैनी ने बहुत से फूल लाकर सजा दिए. दोनों ननदों से बात की, दोनों का स्वास्थ्य नासाज था, नियमित दिनचर्या व व्यायाम कितने जरूरी हैं स्वस्थ रहने के लिए ! 

आज बाबा रामदेव का दीक्षा दिवस है, छोटे-छोटे बच्चों को अष्टाध्यायी के सूत्र सुनाते हुए देखा टीवी पर. उनके गुरुकुल में सैकड़ों बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं. लता मंगेशकर ने पीएम के द्वारा गायी पंक्तियों को गीत बनाकर रिकार्ड किया है. प्रधानमंत्री के रूप में वह उनके सम्मान के पात्र हैं, उन्हें रशिया का एक पुरस्कार भी मिला है. 

उसने विनोबा भावे का यह विचार पढ़ा- दूसरों को प्रेम करने से ही प्रेम मिलता है. वर्षों पहले लिखा  था इसे पढ़कर, कल शाम पिताजी की टाई ढूंढते समय वह बिलकुल यही बात सोच रही थी. यह दुनिया एक दर्पण है कोई जो कुछ करता है वही उन्हें दिखाई देता है. सब लोग एक जैसे होते हैं, थोड़ा बहुत अंतर हो तो हो, नीचे गहराई में सबका मन भरा हुआ है लबरेज प्याले की तरह छलक पड़ने को आतुर ! वैली ऑफ़ फ्लावर का सुंदर पोस्टकार्ड मिल गया टाई ढूंढते- ढूंढते उसके लिए ! उसे लगा, यह किसी और की बात है, पिताजी कभी टाई भी बांधते थे, यह तो जरा भी याद नहीं आता. 

Thursday, July 9, 2020

भोर का आकाश


कल शाम बच्चों के स्कूल में अध्यापिकाओं का साक्षात्कार था। उसे भी बुलाया गया था, इंटरव्यू लेने का पहला और एक बिलकुल नया अनुभव था और स्वयं को परखने का एक स्थल भी. मेज के इस तरफ बैठी है, यह भाव आया तो भीतर के सूक्ष्म अहंकार का बोध हुआ. प्रश्न पूछते समय खुद को ही लगा, वाणी में अभी भी मधुरता नहीं आयी है. एक क्षण के लिए भीतर हलचल भी हुई, जो बाद में व्यर्थ ही प्रतीत हुई. परमात्मा उन्हें उनसे बेहतर जानते हैं. वह उन-उन परिस्थितियों में भेजते हैं जहाँ से वे चाहें तो सीखकर आगे बढ़ सकते हैं. यह सृष्टि उसी परमात्मा का विस्तार है, वह सर्वज्ञ है और यदि कोई आत्मा उसकी ओर कदम बढ़ाती है तो वह उसे स्वीकार करता है. जैसे धूल से सन हुआ शिशु माँ की तरफ हाथ बढ़ाता है तो माँ उसे झट गोद में उठा लेती है, वह अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करती. शिशु को साफ-सुथरा करती है, वैसे ही परमात्मा उन्हें निखारता है. वह प्रेरणाएं भेजता है  जिन्हें वे सुनी-अनसुनी कर देते हैं, पर वह असीम धैर्यशील है. वह बार-बार अपनी ओर खींचता है, क्योंकि उनकी अभीप्सा उसने भांप ली है. संस्कारों के कारण या पूर्व कर्मफल के कारण वे उस पथ से विमुख हो जाते हैं ,पर उसका हाथ उन्हें कभी नहीं छोड़ता. कल एक स्वप्न में स्वयं को कहते सुना कि  जून के जीवन में सच्चाई बढ़ रही है. वह भोजन के प्रति भी पहले के जैसे आग्रही नहीं रहे. परमात्मा उनके हृदय पर भी अपना अधिकार कर रहा है. आज दोपहर मृणाल ज्योति जाना है, सेवाभाव से बच्चों को पढ़ाना है. संध्या को श्लोक उच्चारण का अभ्यास करना है. शेष समय में लिखना-पढ़ना. व्यर्थ अपने आप छूट जाता है जब वे सार्थक  को पकड़ लेते हैं. 

घर के बायीं तरफ वाले मैदान में बीहू नृत्य की शूटिंग चल रही है. कभी संगीत की आवाज आती है कभी ‘कट’ की और सब थम जाता है. छोटी लड़कियाँ भी हैं और बड़ी भी. अप्रैल में तो यहाँ चारों ओर ढोल की थापें सुनाई देती हैं, इस बार मार्च से ही बीहू आरंभ हो गया है. जून दो दिन के लिए आज टूर पर गए हैं. दोपहर को क्लब गयी थी,  शाम के आयोजन की तैयारी चल रही थी, एक अन्य सदस्या भी आयी थी, जो पहले बहुत बीमार रहा करती थी, एक वर्ष पूर्व योग करना आरंभ किया और अब पूर्ण स्वस्थ है. उसने ज्ञान के पथ पर कदम रख दिया है और तेजी से आगे बढ़ रही है.  नैनी भी ढेर सारे फूल लेकर वहाँ आयी और चार गुलदान सजा दिए, वह इस कार्य में दक्ष हो गयी है. घर पर भी शाम के लिए उसने कुछ व्यंजन बनाये हैं.अगले हफ्ते महिला क्लब की तरफ से कम्पनी की एक महिला उच्च अधिकारी का विदाई समारोह है. वह उनसे वर्षों पहले एक बार विदेश में मिली थी. उसके बाद दो-तीन बार क्लब की मीटिंग में. नई प्रेसीडेंट ने कहा, उनके लिए कुछ लिखना है. 

और अब उस पुरानी डायरी का एक पन्ना - रात्रि के ग्यारह बजने वाले हैं. सुचना और प्रसारण मंत्रालय के ‘नाटक व गीत विभाग’ के ‘दुर्गे कला केंद्र’ के कलाकारों का नृत्य-गीत देखकर बहुत अच्छा लगा. सचमुच नृत्य और संगीत में जादू है, लोक नृत्य का तो कहना ही क्या, उसके पाँव थिरकने लगते हैं धुन सुनते ही, अफ़सोस कि उसने कक्षा सात के बाद कभी नृत्य नहीं किया. कल उसे दादाजी के घर जाना है. किताबें और एक ड्रेस लेकर जाएगी. फिर उसके कमरे में छोटी बहन रहेगी. परीक्षाएं इतनी नजदीक हैं और उसकी पढ़ाई अभी तक गति नहीं पकड़ पायी है. खैर ! अब वह क्या कर सकती है, ऐन वक्त पर उसका पागल मन धोखा दे जाता है. उसे तो केवल नीला आसमान, फूल, नदी, छोटे बच्चों की मुस्कान... देखकर ही ख़ुशी मिलती है. 

बिलकुल वही अनुभूति, बल्कि उससे भी अच्छी ! इस समय वह दादी जी के घर पर है. आस पड़ोस की छोटी-छोटी बच्चियाँ मिलने आयीं, ये सब बहुत अच्छी हैं, भोली.. मगर दुनिया इन्हें ऐसा रहने कहाँ देगी. वह सबसे छोटी रेणु उसने कैसा चुटकुला सुनाया.. एक ने कहा, आप क्यों आजकल हर वक्त सपने बुनती हैं ! ...और दादाजी ने भी एक चुटुकुला सुनाया, कहा, वे वैष्णव हैं सो एक अंडा खाएंगे और फूफा जी यदि आएं तो उन्हें दो खिला देना. कल सम्भवतः बुआ जी आएं. शाम को उसकी घड़ी खो गयी, सारा कमरा ढूंढ लिया तो मिली बड़े सन्दूक के पीछे. चचेरे भाई ने कहा, एक दिन पता चल जाये कि सुबह पांच बजे आकाश में तारों की स्थिति या प्रकाश कितना है तो रोज समय पर उठने में आसानी होगी. उसने सोचा, वह भी कल जल्दी उठेगी और आकाश दर्शन करेगी. 

Thursday, August 1, 2019

रसगुल्ले और समोसे



आज 'विश्व महिला दिवस' है, अभी कुछ ही देर में वे इसे मनाने भी वाले हैं. आस-पास की नैनी क्वाटर्स की महिलाओं को बुलाया है उसने एक कप चाय के लिए और कुछ बातें करने के लिए, पर उनके पास उसके लिए भी समय कहाँ है ? परिवार व बच्चे उनकी पहली प्राथमिकता हैं, अपने लिए वक्त बचाना उन्होंने कभी जाना ही नहीं. तीन बजे बुलाया था पर सवा तीन होने वाले हैं, अभी तो कोई नहीं आई हैं. जून के भेजे समोसे ठंडे हो रहे हैं, उन्होंने रसगुल्ले भी भेजे हैं. सुबह उन्होंने व्हाट्स एप पर सौ संदेश भेजे 'महिला दिवस' पर, उनका हृदय विस्तृत हो रहा है, समाज और राष्ट्र की सभी इकाइयां उसमें शामिल हो रही हैं. जीवन को सहजता से जीना है, उसको सम्पूर्णता के साथ अपनाना है. जीवन को स्नेह भरी दृष्टि से देखें तो विष भी अमृत हो जाता है ! वह लिख ही रही थी कि वे सब आ गयीं, उन्होंने कुछ देर भजन गाये फिर कुछ बातचीत की, नैनी ने सबके लिए चाय बना दी फिर हँसते-हँसते वे सब खाने लगीं. बाद में उसने पूछा, आज कौन सा दिन है, उन्हें महिला दिवस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन एक ने जब बताया उसका पति नशा करके आता है और वह डर जाती है, तो बाकी सब उसे समझाने लगीं. डरने की जगह उसे हिम्मत से काम लेना चाहिए. उसने कहा यदि वे नियमित रूप से कुछ देर योग-प्राणायाम करें तो भीतर की शक्ति जगा सकती हैं. पर वह जानती है ऐसा कर पाना उनके लिए सम्भव नहीं है. हफ्ते में दो बार उन्हें वह बुलाती है पर नियम से तो एक या दो ही आती हैं.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. टीवी पर हास्य धारावाहिक आ रहा है. अभी कुछ देर पहले वे अस्पताल से आये. उस सखी की बिटिया को इंजेक्शन लगना था, उसे थोड़ा सा आश्चर्य भी हुआ दस-बारह वर्ष की बालिका को इंजेक्शन लगवाने से इतना डर लगता है कि तीन लोग उसे संभालने के लिए चाहिये. बच्चों के प्रति ज्यादा मोह से माता-पिता ही उन्हें कमजोर बना देते हैं. ऐसी सोच जगी ही थी कि स्मरण आ गया उसे दोष दृष्टि रखने के अपने पुराने संस्कार का एक और बार अनुभव हुआ, इसका अर्थ हुआ यदि कोई सचेत न रहे तो मन किसी भी क्षण पुराने रंग-ढंग अपना लेता है.

आज सुबह नींद काफी पहले खुल गयी थी पर योग निद्रा करने लगी और फिर स्वप्न कब आरंभ हो गया पता ही नहीं चला. उठने से पूर्व स्वप्न में अज्ञेय की कोई किताब पढ़ रही थी. सफेद पृष्ठ पर काले अक्षर बिलकुल स्पष्ट थे और किसी-किसी वाक्य को दोहराया भी, ताकि बाद में भी याद रहे, यानि उस समय भी यह अनुभव था कि यह स्वप्न जैसा कुछ है, पर अब कुछ भी याद नहीं है. परमात्मा कितने-कितने ढंग से अपनी उपस्थिति का समाचार देता है. कल रात्रि मन कुछ क्षणों के लिए पुरानी व्यवस्था में लौट गया था, पर आज मन स्वच्छ है. वर्षा के बाद धुले आकश सा निर्मल ! भीतर जो चट्टान जैसी स्थिरता है उसके रहते हुए भी ऐसा होता है, इस पर आश्चर्य ही करना होगा. इसका कारण यही है कि उस क्षण वह परमात्मा को भुला देती है, पर वह इतना कृपालु है और सुहृदयी है कि बिना कोई दोष देखे संदेशे भेजता ही रहता है. वे सर्व शक्तिमान परमात्मा की सन्तान हैं, उनके भीतर ज्ञान, बल और प्रेम का अभाव हो ही कैसे सकता है ? सुख के लिए वे जगत पर निर्भर रहे तो उनमें और देहाभिमानियों में क्या अंतर रहा? उसे उस परम की ध्रुवा स्मृति बनाये रखनी है, सुख व आंनद का स्रोत वह परमात्मा उनका अपना है, वह अनंत है, प्रेम व शांति का सागर है ! वह सहज ही प्राप्य है, उसे अपने संस्कारों पर विजय पानी ही होगी, यह केवल कपोल कल्पना बन कर न रह जाये, हर बार की तरह उसका संकल्प टूट न जाये इसका पूरा ख्याल रखना  है.

Wednesday, July 3, 2019

नारियल का वृक्ष



आज सफाई कर्मचारी नहीं आया, नैनी को भी अपना काम खत्म कर बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना था, सफाई का काम अधूरा ही पड़ा है. कुछ वर्ष पहले यदि ऐसा हुआ होता तो वह झुंझला जाती फिर खुद ही करने में जुट जाती पर अब मन में एक ख्याल भर आया, उम्मीद पर दुनिया टिकी है, हो ही जायेगा सब जून के आने से पहले. अभी पौन घंटा शेष है न. आज धूप अच्छी निकली है, ठंड पहले से कम है फिर भी काफ़ी है, क्योंकि इनर पहनने के बाद भी स्वेटर तो पहनना ही पड़ा है. आज सुबह आचार्य प्रद्युम्न का प्रवचन सुना. सगुण ईश्वर व निर्गुण ब्रह्म का भेद स्पष्ट हुआ. जीव माया के अधीन है और माया ईश्वर के अधीन है. सतोगुण बढ़ने पर जीव माया के पार जा सकता है और ईश्वर की भक्ति करने से भी. मन को दूषित करते हैं रजोगुण तथा तमोगुण. सतोगुण आत्मा को हल्का बनाता है. समाधि की अवस्था में तमोगुण घटता है, संस्कार मिटते हैं तथा आत्मा को नई ऊर्जा मिलती है.

सुबह टहलने गये तो ठंड अधिक नहीं थी. सूरज का लाल गोला उनके साथ साथ चल रहा था. मौसम अब बदल रहा था. आज बहुत दिनों बाद उसने दोपहर के भोजन में इडली बनाई है. माली ने बगीचे से नारियल लाकर दिया था, उसकी चटनी बनाई. सुबह क्लब की सेक्रेटरी के साथ जाना था, एक पुराने कमरे को देखने जो भविष्य में क्लब का दफ्तर बन सकता है. हालत अच्छी नहीं है, काफ़ी काम करवाना होगा. स्कूल का पुराना फर्नीचर भी एक बड़े हॉल में रखवा दिया गया है, उसने सुझाव दिया, इसे दान कर देना चाहिए. कितने ही पुराने ब्लैक बोर्ड भी थे. आजकल वह योग दर्शन में 'समाधि पाद' के श्लोकों का भाष्य सुन रही है. संस्कार के रूप में ज्ञान उनके भीतर रहता है, जो वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है. क्लिष्ट व अक्लिष्ट दोनों तरह की वृत्तियाँ भीतर हैं तथा दोनों से संस्कार भी बनते हैं. वे संस्कार फिर वृत्तियों को जन्म देते हैं. हर वृत्ति एक संस्कार को छोड़ जाती है, चित्त में वृत्ति-संस्कार चक्र अनवरत चलता रहता है. ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी क्लिष्ट वृत्तियाँ उठ सकती हैं पर उनमें उतनी तेजी नहीं रहती. जब चित्त शांत हो जाता है तब क्लिष्ट वृत्तियाँ नहीं उठतीं.

पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. कारण सोचे तो कुछ भी नहीं है. स्मरण ही नहीं रहा. आज इस समय शाम के सात बजे हैं. अभी-अभी 'अष्टावक्र गीता' पर गुरूजी की व्याख्या सुनी, जिसमें भिन्न-भिन्न आसक्तियों की चर्चा गुरूजी कर रहे थे. जून भी सुन रहे हैं आजकल. उन्हें तरह-तरह के व्यंजन बनाना पसंद है, क्या यह भोजन के प्रति आसक्ति कही जाएगी ? आज दोपहर को बच्चों के साथ 'सरस्वती पूजा' का उत्सव मनाया. जून सुबह वाग्देवी की एक तस्वीर प्रिंट करके लाये थे, घर में फ्रेम मिल गया जो नन्हे को उपहार में मिला था. काले चनों और नारियल का प्रसाद बांटा. दो दिन पहले धोबी ने अपने हाथ से लगाये नारियल के पेड़ से नारियल लाकर दिया था. बच्चों ने तस्वीर देखकर अपने हाथों से उसकी अनुकृति बनाई. आज माली ने गमलों में फूलों के पौधे लगाये. फ्लॉक्स और डायंथस अब खिलने लगे हैं. फरवरी के अंत तक बगीचा फूलों से भर जायेगा. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बहुत लोग आये थे. पिछले वर्ष लगे एक कैम्प में सौ परिवारों का चयन किया गया था, जिन्हें सरकार की तरफ से दिव्यांग बच्चों एक लिए किट बांटे गये. स्थानीय एम एल ए महोदय भी आये थे. कल वहाँ भी सरस्वती पूजा है, उसने लड्डू मंगाए हैं कल लेकर जाएगी.   

Wednesday, June 19, 2019

कच्चे केले का चोखा



रात्रि के आठ बजे हैं. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी. नये वर्ष का कैलेंडर और डायरी लेकर गयी थी, और क्लब के कुछ सदस्यों का दिया सामान भी. रास्ते में व्हाट्स एप पर कितने ही सुंदर संदेश पढ़े, जीवन का हर पल शुभ हो, मन अहंकार से मुक्त रहे, न मोह का शिकार हो न दैन्यभाव का. कोई पाखंड जीवन में रहे. योग में स्थित रहे बुद्धि और आत्मभाव कभी भी विस्मृत न हो. योग की महिमा को स्वयं जानकर व अनुभव करके वे अन्यों को भी बताएं. परस्पर आदान-प्रदान से प्रीति भी बढ़ती है.

सुबह के सवा आठ बजे हैं. सुबह से सुवचनों को सुनकर मन-प्राण शांति का अनुभव कर रहे हैं. आत्मा सदा ही परमात्मा के सान्निध्य में है. मन जो आत्मा रूपी सागर की ही एक लहर है सदा अपना राग अलापता रहता है. यदि उसे यह ज्ञात हो जाये कि उसका मूल अनंत है तो वह अपनी क्षुद्रता को भूल जायेगा और अपने भीतर ही विश्राम का अनुभव कर लेगा. अनंत स्वरूप का विस्मरण ही उन्हें दुःख की ओर ले जाता है तथा मन में कामना का उदय होना ही उसे विस्मृत करा देता है. कामना पूर्व संस्कार से उत्पन्न होती है. भीतर जो संस्कार हैं उनसे मुक्त होने का उपाय ध्यान है और समाधि का अनुभव. मन जब तक भय, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष के संस्कारों  से मुक्त नहीं होगा, तब तक कोई न कोई संस्कार सिर उठाता रहेगा और आत्मा व्यर्थ ही दुखी होती रहेगी. जिसका खामियाजा देह को भी उठाना पड़ता है. विनाशकाले विपरीत बुद्धि होती है सो उस वक्त ज्ञान की बाते भी नहीं भातीं.

रात्रि के पौने आठ बजे हैं. सोनू से बात हुई. उसने पिता जी व मंझले भाई से बात की, वह रिश्ते निभाना जानती है. दीदी वहाँ पहुँच गयी हैं. दो दिन रुकेंगी, फिर बड़े भाई आ जायेंगे. सभी भाई-बहन मिलजुल कर पिताजी की देखभाल कर रहे हैं. आज काव्यालय पर लिखा. जून कल गोहाटी जा रहे हैं. दोपहर को देर से आये. आयकर भरने के लिए सीए के साथ घंटों बैठे रहे, अभी भी काम पूरा नहीं हुआ है. अख़बार वाले ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की जगह आज टेलीग्राफ दे दिया है, बहुत दिनों बाद जम्बल पहेली हल की.

हर दिन पूर्व से अलग होता है. हर दिन की शुरुआत भी अलग होती है और समाप्ति भी. आज का दिन फोन पर सबसे बातें करते ही बीता है. सुबह पांच बजे से थोडा पहले उठी. टहलने गयी. गुरूजी को सुना, ज्ञान प्राप्ति के चार साधन-विवेक, वैराग्य, षट सम्पत्ति व मुमुक्षत्व ! मन प्रसन्न हो गया. पिताजी से बात हुई. कल रात उन्हें फिर तेज दर्द हुआ. लगता है दिल की ही समस्या है उन्हें. दीदी, बड़े भाई, दोनों भाभियों सभी से बात हुई. वृद्धावस्था में व्यक्ति कितना असहाय हो जाता है. आगे कोई मार्ग नहीं सूझता. देह साथ नहीं देती. ऐसे में घर वालों का साथ ही उसका सम्बल होता है. उसे भी एक बार वहाँ जाना है, पर उससे पूर्व स्वयं को पूर्ण स्वस्थ करना होगा. इस समय काफ़ी ठीक है.

सुबह ग्यारह बजे जून आ गये थे. लंच में उनकी पसंद की कढ़ी बनाई. उससे पूर्व साप्ताहिक सफाई. सुबह रोज की तरह थी पर एक खास बात हुई. कल रात पहले समाचार सुनते हुए, फिर सर्वेंट लाइन में होते झगड़े की आवाजों के कारण देर से सोयी. सुबह नींद खुली तो झट उठने का मन नहीं हुआ. स्वप्न और जागरण के मध्य की स्थिति थी कि अचानक सिर के पीछे किसी के श्वास लेने की आवाज आई और अगले ही क्षण ऐसा लगा जैसे जून रजाई ओढ़कर धीरे से आकर लेट गये. उसे आश्चर्य हुआ, दरवाजे पर ताला लगा है, वह अंदर कैसे आये, आंख खुल गयी और वहाँ कोई नहीं था, स्वप्न टूट गया. कितना सजीव था वह दृश्य, कितना वास्तविक लग रहा था. इसी तरह जो उन्हें  जगते हुए वास्तविक लगता है एक स्वप्न ही है ऐसा ही तो संत कहते हैं. रात्रि के पौने नौ बजे हैं, टीवी पर तारक मेहता..आ रहा है. डिनर में मकई की रोटी के साथ कच्चे केले का चोखा बनाया. नैनी ने मेथी काट दी है, कल सुबह उड़द दाल की बड़ी बनानी है.


Wednesday, November 21, 2018

गुलदाउदी की कलियाँ



नवम्बर की सुहानी सुबह ! जून बाहर धूप में बैठे हैं, जैसे कभी पिता जी बैठते थे, जब वह छड़ी लेकर चलते हैं तो माँ का स्मरण हो आता है. पहले से बेहतर हैं. आज ही के दिन वे गोहाटी से आये थए, एक सप्ताह उन्हें विश्राम करते हो गया है. अभी कुछ देर में वे बाहर जाने वाले हैं, बैंक, दफ्तर तथा बाजार. नवम्बर का मध्य आ गया है पर अभी भी पंखा चला कर रहना पड़ रहा है. रात्रि में देखे स्वप्न अब याद नहीं रहते, दिन में खुद पर नजर रखने वाला मन रात्रि को भी सजग रहता है. अन्य के संस्कारों के साथ निबाह करना ही सबसे बड़ी साधना है. वे स्वयं के संस्कारों को बदल नहीं सकते और उम्मीद करते हैं कि दूसरे अपने संस्कारों को बदल लेंगे. वे अपने स्वभाव से जैसे ही हटते हैं, खाई या खड्ड में गिरते हैं. हर समस्या का हल आत्मा में है और हर समस्या का जन्म आत्मा से हटने पर है. अभी-अभी जून के पुराने ड्राइवर का फोन आया, उनका हाल-चाल लेने के लिए. नैनी को सुबह आकर ‘हरे कृष्णा’ बोलना सिखाया पर वह भूल जाती है. उसका यह संस्कार नहीं है, परमात्मा का नाम सहज ही अधरों पर आ जाये, इसके लिए कोई प्रयास न करना पड़े तभी सार्थक है. आत्मा में रहना भी ऐसा ही सहज हो जाये तभी बात बनती है.

दोपहर के ढाई बजे हैं. महीनों बाद झूले पर बैठकर लिखने का सुअवसर मिला है. धूप पेड़ों से छनकर आ रही है. हवा में हल्की धुंए की गंध है, कहीं किसी माली ने पत्तों को सुलगाया होगा. बगीचा साफ-सुथरा है, आज के बाद इसे तीन हफ्ते बाद देखेंगे वे, पौधे बड़े हो जायेंगे तब तक, अभी जो नन्हे-नन्हे हैं. गेंदे के फूल शायद तब तक मुरझा जाएँ जो इस समय पूरे निखार पर हैं, गुलदाउदी कलियों से भर जाए. जून इस समय ऑफिस गये हैं. आज उनके यहाँ एक कर्मचारी की विदाई थी. लंच वहीं था. उनको चलने में तकलीफ होती है फिर भी दफ्तर जाते हैं. उनमें जीवट बहुत है, अपने अधिकारों के प्रति भी सजग हैं और कर्त्तव्यों के प्रति भी. आज आचार्य सत्यजित को सुना. कह रहे थे, कोई जिनसे ज्ञान लेता है, उनके पुण्य बढ़ते हैं और लेने वाले का कर्माशय क्षीण होता है. यदि वह उस ज्ञान का उपयोग करे और बांटे तो उसके पुण्य भी बढ़ सकते हैं. मन को सदा समता में रखना तथा आत्मा में स्थित रहना सबसे बड़ी साधना है. जिसे ध्यान में रहना अधिक भाता है, उसके भीतर कैसी सी शांति बनी रहती है किन्तु यदि इस शांति का भी भोग करना उसने आरम्भ कर दिया तो पुण्य क्षीण ही होने लगेंगे. इसे भी साक्षी भाव से स्वीकारना होगा’. कल उन्हें यात्रा पर निकलना है. घर से बाहर ज्यादा सजगता की आवश्यकता है और ज्यादा समझदारी की भी !   

Tuesday, July 24, 2018

फूलों की माला



रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं, समाचारों में देश के कई राज्यों में बढती हुई गर्मी के समाचार आ रहे हैं, जबकि यहाँ असम में तेज वर्षा हो रही है. इसके पूर्व ‘सिया के राम’ देखा. शिवानी को सुनते हुए रात्रि भोजन किया. शाम को वर्षा रुकी तो कुछ देर ड्राइव वे पर ही टहलते रहे. आज से उज्जैन में ‘सिंहस्थ कुम्भ’ आरम्भ हो रहा है, आज दस लाख लोगों ने स्नान किया शिप्रा नदी में. नर्मदा और शिप्रा का संगम है उज्जैन में. समाचारों में सुना, प्याज की फसल इतनी हो गयी है कि दाम बहुत घट गये हैं.
आज एक बार फिर अनुभव हुआ कि स्वयं के संस्कारों को स्वीकारना जिसने सीख लिया, वही अन्यों के संस्कारों को भी स्वीकार कर सकता है. जो भी और जैसे भी संस्कार उन्हें मिले हैं, कर्मों को दोहराते रहने से बने हैं. यदि उनको बदलने में उन्हें इतना वक्त लगता है तो वे दूसरों से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि उनके एक या दो बार कहने से वे बदल जायेंगे. सबकी गहराई में जो बेशर्त प्रेम का झरना बह रहा है उसे बहने देने का एकमात्र यही उपाय है कि हरेक को वह जैसा है वैसा ही स्वीकार लिया जाये और फिर उसके वास्तविक रूप से उसका परिचय कराया जाये ! जब वे स्वयं का निरीक्षण करते हैं और उस पर निर्णय सुनाते हैं तो भीतर एक संघर्ष चलता है, जिसका परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकता. वे इस दुनिया में अपने मूल स्वरूप को अनुभव करने तथा उसे व्यक्त करने के लिए आए हैं. उसकी झलक उन्हें कई बार मिलती रही है, स्वयं को अन्यों से ऊंचा बनाने के चक्कर में वे अपनी ही नजरों में छोटे बनते जाते हैं ! वे अपनी शक्ति को उन बातोँ में खर्च करते हैं जो उनके ही विरुद्ध हैं, ख़ुशी भी एक ऊर्जा है और जितना वे इसका निर्माण करते हैं, उतना यह उन्हें स्वस्थ करती है. प्रेम, विश्वास ये सभी सकारात्मक ऊर्जाएं हैं, जिनका निर्माण उन्हें करना है और बाहर व्यक्त करना है. भीतर की वृत्ति यदि श्रेष्ठ हो तो दृष्टि भी पावन हो जाती है.

आज रविवार है, दिन में वर्षा कम हुई थी, रुकी थी पर इस समय रात्रि के साढ़े आठ बजे पुनः मूसलाधार वर्षा आरम्भ हो गयी है. ‘सिया के राम’ देखना शुरू ही किया था, जिसमें जटायु की कथा दिखाई जा रही थी, कि टीवी पर सिगनल आना बंद हो गया. सब्जी बाड़ी से तोड़ी सब्जियाँ आज भोजन का अंग बनीं, सुबह हरे प्याज की रोटी, शाम को सहजन की सब्जी. दोपहर को नन्हे से बात हुई, वह नया बेड खरीद रहा है. दीदी ने बताया, उनके  छोटे पुत्र ने अपनी नयी कम्पनी शुरू की है. बड़ी नन्द की जेठानी को फोन किया, उनके पुत्र के विवाह में उन्होंने बुलाया था, पर वे जा नहीं पाए.
कल शाम की योग कक्षा में एक नयी साधिका आई, उसे वर्षों से पीठ में दर्द है, कोई आसन नहीं कर सकती. शाम को बंगाली सखी के यहाँ गयी, उसने विदेश से लाया एक छोटा सा उपहार दिया और आलू परांठा खिलाया. टीवी पर सुंदर संदेश सुना, ‘रहमदिल, देह अभिमान से मुक्त, एक रस, सभी के प्रति जिसमें सद्भावना हो, चाहे वे विरोधी ही क्यों न हो, ऐसे सद्गुणों से सजी आत्मा, परमात्मा के गुणों की याद दिलाती है. देवताओं के गले में जो फूलों की माला पहनाई जाती है, वह वास्तव में उनकी गुण माला होती है. देने की भावना सदा बनी रहे. स्वयं को देवता रूप में तैयार करना है. जब मूर्ति तैयार हो जाती है तो उसको दर्शन देने के लिए खोल दिया जाता है. साधक भी जब तैयार हो जाता है तो पर्दा खुल जाता है. परमात्मा की कृपा सहज ही बरसने लगती है, जब कोई इस पथ पर चलता है और पूर्णता प्राप्त होने पर संसार भी कृपा करने लगता है’. आज सुबह स्कूल जाते समय सड़क के दोनों ओर पानी ही पानी दिखाई दिया, हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं. बंगलूरू में सूखा पड़ रहा है, वहाँ वर्षा नहीं हुई है पिछले कई दिनों से.

Tuesday, April 24, 2018

सिया के राम



कल रात्रि संदेह के संस्कार को भीतर स्पष्ट देखा, सद्गुरू कहते हैं, विकार को देखना ही उससे मुक्त होने की क्रिया है. व्यर्थ ही मन संदेह से ग्रस्त रहता है, व्यर्थ ही वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति के प्रति मन में आशंका होती है, किसी से मिलने जाना हो तो मन कहेगा, शायद वह घर पर न हो, अथवा हो तो व्यस्त हो, शायद ऐसा हो शायद वैसा हो..! कितना हल्का लग रहा है भीतर, मन अब अस्तित्त्व के प्रति अर्थात सभी के प्रति विश्वास से भर गया है. सुबह घने कोहरे के मध्य टहलने गये वे. स्नान के बाद सभी के फोन व संदेश आने लगे, आज उनके विवाह की सालगिरह है. दोपहर को क्लब की मीटिंग है, शाम को मेहमान आयेंगे. वह गाजर-ब्रोकोली और पनीर भी बना रही है शेष व्यंजनों के साथ. नन्हे का भी मुबारकबाद का फोन आया, उसे एक अच्छा रसोइया मिल गया है पर दिन में एक ही बार आता है. बड़ी बुआ ने भी शुभकामना दी, अब उनका स्वास्थ्य पहले से काफी ठीक है. पिताजी का फोन आया, ‘सिया के राम’ उन्हें भी अच्छा लग रहा है. वह कह रहे थे, सीता का अभिनय कर रही कलाकार में उन्हें उसकी झलक मिलती है, पिता का हृदय सन्तान के प्रति कितना स्नेह से भरा होता है. पिछले दो-तीन दिनों में ड्राइव-वे पर किसी ने खाली बोतल फेंकी, कांच बिखर गया. जून ने आज शिकायत की है. समाचारों में सुना, पठानकोट में हुए आतंकी हमले में कितने जवान मारे गये, सभी आतंकवादी भी मारे गये. जब से दुनिया बनी है शायद तभी से यह संघर्ष चल रहा है, जैसा संघर्ष मानव के भीतर चलता रहता है !

नकारात्मकता का कीट एक क्षण के लिए सिर उठाता है और ज्ञान का प्रकाश उसे पुनः भाग जाने के लिए विवश करता है. माया का जादू अब और नहीं चल सकता. माया ने बहुत नचा लिया अब भीतर जो स्थिरता डिग-डिग जाती थी, अचल होने लगी है. यूनिवर्स से कितना सुंदर संदेश मिला आज, कुछ बातें तर्क से परे होती हैं. इन संदेशों के लेखक एक आधुनिक संत हैं जो लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं, कल का संदेश बिलकुल वही है जो आजकल वह स्वयं भी अनुभव कर रही है. उनकी दुनिया उनके मन का ही खेल है. मन में ड़ू’बे रहकर वे वस्तविकता से दूर ही रह जाते हैं और व्यर्थ ही ऊर्जा गंवाते हैं. जिस क्षण भी वे सत्य से हटते हैं, माया के घेरे में आ जाते हैं. इसीलिए संत कहते आये हैं, ज्ञान का पथ तलवार की धार पर चलने जैसा है. कल शाम का उत्सव अच्छा रहा, उन्होंने शकरकंद भूना और विशेष भोज ग्रहण किया. सुबह मृणाल ज्योति गयी, क्लब के लिए खरीदा गया बड़ा सा कार्पेट लेकर, जिसपर बैठकर बच्चों ने योगासन किये.

चीजें अब स्पस्ट होती जा रही हैं, उनके व्यर्थ के संकल्प ही सबसे बड़ी बाधा हैं. उनकी वाणी की अस्पष्टता ही उनके विकास में बाधा है. मन जितना-जितना शांत होगा, सहजता में रहेगा, वाणी भी सहज होती जाएगी. उसे अपने जीवन में क्या चाहिए, एक सहज मन और स्पष्ट, सुमधुर वाणी, इसके होने पर शेष तो आ ही जायेगा. परमात्मा के प्रति जितना गहन समर्पण भाव होगा, जितना प्रेम होगा उसी अनुपात में मन शांत होगा, उसी अनुपात में व्यर्थ के शब्द मुख से नहीं निकलेंगे. सुबह समय पर उठे, रात देर तक क्लब से गाने की आवाजें आती रहीं, पर नींद कब आ गयी पता ही नहीं चला. भीतर एक होश बना रहा फिर भी कुछ याद नहीं है, टहलने गये तो वापसी में वर्षा आरम्भ हो गयी, लौट कर घर आये ही थे कि वर्षा तेज होने लगी, जैसे उसे पता चल गया हो कि वे सुरक्षित घर लौट आये हैं.     

Monday, March 26, 2018

अंतरलोक का जाल



फिर एक अन्तराल, आज पाँच दिनों बाद लिखने का सुयोग मिला है. जून कल देहली गये हैं और वहाँ से सूरजकुंड जायेंगे, जहाँ एक दिन की कोई कांफ्रेस है. सो इस समय किसी भी कार्य की शीघ्रता नहीं है. साढ़े दस बजे हैं, कुछ देर पहले वह विशेष बच्चों के स्कूल से आई है. वहाँ बच्चों को व्यायाम करवाया और जून के लाये रेनकोट आदि दिए. लडकियों का हॉस्टल भी बन गया है, उसके लिए कुछ नियम आदि के लिए कुछ सुझाव उससे मांगे थे, लिखकर दिए. शाम को मीटिंग में जाना है. आज मन एक गहन चिन्तन में डूबा है. कल देर शाम को क्लब से फिल्म देखकर अकेले लौटते समय मन में जो भय की लहर दौड़ी वह व्यर्थ थी. भय का एक संस्कार कहीं गहरे बैठा है मन में, जो हल्की सी उत्तेजना से उभर आता है, लेकिन इससे मुक्ति पानी होगी. रात को नींद में थी, अचानक कुछ गिरने की आवाज आई. वही संस्कार जाग गया और मन ने कैसे-कैसे दृश्य दिखाने शुरू कर दिए. चाहिए तो यही था कि रौशनी करके देख लेती क्या गिरा है पर भय के कारण मन कल्पना करने लगा. एक स्वप्न में देखा, जून भी हैं और वे दोनों देखने गये हैं कि कौन सी तस्वीर गिरी है. फिर पूजा के कमरे में जाकर देखते हैं, कम्प्यूटर गायब है, यानि कोई चोर आया था. कितना स्पष्ट था सब कुछ. दूसरे स्वप्न में गैलरी में कोई पीला पेंट बह रहा है, जो छत से आती किसी पाइप से आ रहा है. छत पर देखा तो नैनी है, उसने एक प्लेट में पीला रंग रखा है, पानी उस पर से बह कर आ रहा है. माया इस तरह मानव को नचाती है. ये स्वप्न किस तरह उन्हें भ्रमित करते हैं, ये उनकी ही कल्पना होते हैं अक्सर. फिर सुबह उठी तो स्वयं पर ही आश्चर्य हो रहा था, क्या इतने दिनों की साधना भी भीतर का भय नहीं निकाल पायी. ध्यान करने बैठी तो राज खुलने लगे. सबके मूल में है मृत्यु का भय, यानि देह छूट जाने का भय. एक स्वप्न ने ही यह भ्रम पैदा कर दिया है कि अभी बीस वर्ष तो और जीवन है ही, सो बीस वर्ष तक देह को बचाए रखना होगा, पर कौन जानता है, कौन सा पल अंतिम होगा. देह बनी रहे इसलिए व्यायाम के प्रति भी गहन आसक्ति है. फिर दूसरे के शब्दों को, दूसरे के ज्ञान को प्रस्तुत करना, यह तो चोरी का संस्कार है, इसी कारण कई बार मन में यह भाव आता है कहीं चोरी तो नहीं कर रहा कोई उनकी. उनका स्वयं का मन जो कृत्य करता है, उसी की आशंका उन्हें होती है. संसार तो दर्पण है, उनका खुद का मन ही उसमें झलकता है. भावों की चोरी तो महानतम चोरी है. जब तक मन पूरी तरह से भय व आशंका से मुक्त नहीं हो जाता, समाधि नहीं घटती और समाधि ही तो लक्ष्य है. परमात्मा उसके भीतर के साारे विकारों को एक-एक कर दूर करने में उसकी सहायता कर रहे हैं. वृथा बोलना तो छूट गया है पर वृथा सोचना नहीं छूटा है, उसे भी छोड़ना होगा, मन को खाली करना होगा !

कल कुछ नहीं लिखा, सुबह बंगाली सखी के यहाँ गयी, वृद्धा आंटी से मिली. दोपहर बाद प्रेस, शाम को योग कक्षा और ऐसे ही दिन बीत गया. आज सुबह क्लब की एक सदस्या के साथ बाजार गयी, रेशमी कपड़े से बने गुलाब के फूल लेने थे, वार्षिक उत्सव के लिये, अगले हफ्ते मिलेंगे. वह थाईलैंड जा रही है, दो सप्ताह बाद लौटेगी. उसे सभी सदस्याओं के नामों की नई सूची बनानी है. योग पर भी कुछ और लिखना है. इस समय दिन के साढ़े तीन बजे हैं. जून दिल्ली से आ चुके हैं पर आते ही सीधे दफ्तर चले गये, शायद पांच बजे तक आयेंगे. ड्राइवर सामान दे गया है, ढेर सारे फल लाये हैं, देसी-विदेशी दोनों तरह के. एक स्टील का पतीला और छह कटोरी-प्लेट्स. उन्हें खरीदारी करने में काफी आनन्द आता है. परमात्मा की कृपा है कि इस समृद्धि के योग्य बनाया है. आज सुबह उठने से पूर्व एकतारता का अनुभव हो रहा था, तैलधारवत ध्यान का अनुभव ! परमात्मा के लोक में अपूर्व शांति है, उस शांति का प्रस्फुटन उन्हें उनके विचारों, कार्यों और शब्दों द्वारा करना है, यही तो आध्यात्मिकता है. रामकृष्ण परमहंस की कथा पढ़ते समय कितना आनन्द आता है. वे जीते-जागते परमात्मा ही थे, जैसे सद्गुरू हैं. उनका सान्निध्य उसे इस जन्म में मिलेगा अथवा नहीं ? किन्तु परमात्मा के साथ अभिन्नता का अनुभव जिसे होता हो, उसके लिए संत सान्निध्य का क्या अर्थ है, सद्गुरू के पास रहकर भी कुछ लोग भीतर के लोक में प्रवेश नहीं कर पाते हों शायद. दीदी कुछ दिनों के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप से चली गयी थीं, फिर लौट आई हैं और ग्रुप का नाम भी बदल दिया है, भाई ने नया नाम दिया है, अच्छा चिह्न है यह, सबके मध्य दूरी कम होगी.

Wednesday, February 28, 2018

योग का योगदान



अक्तूबर आरम्भ हुए चार दिन हो गये, आज पहली बार डायरी खोली है. योग की दो कक्षाएं हो चुकी हैं. तीसरी सम्भवतः परसों सुबह होगी. कल शाम शायद क्लब में पार्टी है, सो हॉल नहीं मिलेगा, ऐसा संयोजिका ने कहा, इस ‘शायद’ का अर्थ वही जानती है. गुरूजी कहते हैं, इस दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं, सच्चे, कच्चे व..ज्ञानी सभी को साक्षी भाव से देखता है, व मस्त रहता है. सामाजिक क्षेत्र में कदम रखने पर इन सबका सामना तो करना ही होगा. बच्चों को योग सिखाना कितना सहज है, कितने मासूम होते हैं वे ! आज सुबह स्कूल में सिखाते वक्त तितली के रूप में अस्तित्त्व फिर आया, वह तो यूँ भी हर क्षण, हर पल साथ ही है. उसके ही नहीं, सबके साथ, वे सजग रहें तो उसका अनुभव सहज ही होता है. असजग होते ही भीतर स्वप्न चलने लगता है, ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है. कुछ भी हाथ नहीं आता. वह परमात्मा अकारण ही दयालु है. प्रेम उसका स्वभाव है, शांति उसका वस्त्र है, ज्ञान और शक्ति के रूप में वह परिपूर्ण है. सुख और पवित्रता उसके भीतर रचे-बसे हैं. वह पतितपावन है. उसमें रहकर वे भी पवित्र हो जाते हैं. जीवन कितना अनमोल है यदि उसका साथ हो, अन्यथा एक बोझ..ईश्वर उन सभी को सद्बुद्धि दे जो उससे विमुख हैं और दुखपूर्ण हैं..ग्यारह बजने को हैं, कुछ देर में जून आने वाले हैं, उनका जीवन भी समृद्धि की ओर जा रहा है. उन्हें तरक्की मिली है. कुछ ही  दिनों में एसी कार भी मिल जाएगी.

कल दिन भर व्यस्तता रही. शाम को क्लब गयी. आज भी दो मीटिंग्स हैं. पहली मृणाल ज्योति में विश्व विकलांग दिवस के लिए और दूसरी महिला क्लब की. आज सुबह योग कक्षा में दो महिलाएं ही  उपस्थित थीं. कल व परसों उन्हें घर पर आने को ही कहा है. मन कैसी शांति का अनुभव कर रहा है, किसी को कुछ देने के बाद मन कैसा तृप्त हो जाता है. परमात्मा ही बंटता है जैसे..ऊर्जा ही तो बंटती है. आज योगनिद्रा का अभ्यास कराया, यकीनन उन्हें अच्छा लगा होगा. कुछ देर पहले असमिया सखी से बात की, आवाज से लगा वह काफी परेशान है. स्वास्थ्य ठीक न रहे तो व्यक्ति का जीवन एक भार बन जाता है, लेकिन उन्हें अपने जीवन को सुंदर बनाने का प्रयत्न प्रतिपल करना है. ईश्वर का अनुग्रह तो बरस ही रहा है.  
कल की दोनों मीटिंग्स अच्छी रहीं और अच्छा रहा आज का योग अभ्यास भी. आज चार लोग आये थे. सुबह उठी तो गला कुछ खराब लग रहा था. कल शाम को तली हुई कुछ वस्तुएं खायीं, फिर वापस आकर ठंडा पानी पिया, शायद इसी कारण. उपाय आरम्भ कर दिये हैं. तीर टोपी ही लेकर जायेगा, गर्दन नहीं. आज एकादशी है, भोजन भी हल्का रहेगा. कल क्लब में ‘सेल’ है, सुबह नौ बजे ही उन्हें जाना है. आज संध्या भी तैयारी हेतु जाना होगा. विश्व विकलांग दिवस पर एक लेख लिखना है, जो एक बुलेटिन में छपेगा, जिसका भार उसे सौंपा गया है. बुलेटिन में अन्य लेखों के लिए आग्रह पत्र भी लिखकर भेजने हैं. जब कोई किसी काम को करने में सक्षम  होता है, तभी अस्तित्त्व उसे उस काम के लिए चुनता है.

कल का आयोजन भी हो गया. उसने भी काफी कुछ खरीदारी की. अब दिसम्बर में उन्हें पुनः एक सेल आयोजित करनी है. आज सप्ताहांत है, सुबह घर की साप्ताहिक विशेष सफाई भी हुई और तन की भी, मन की तो हर क्षण  होती है, जब चाहा अमनी भाव में चले गये, वही उसकी सफाई है. अब परमात्मा और संसार दो नहीं रह गये हैं, एक ही है सब. जून विशेष साप्ताहिक खरीदारी करने बाजार गये हैं. नैनी की छोटी बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए उपहार भी लायेंगे. मृणाल ज्योति की मीटिंग कल होगी, इतवार को वह व्यस्त रहती है, एक व्यस्तता और सही. जिसे स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए उसका सारा समय संसार के लिए या भगवान के लिए. एक सखी के परिवार के किसी सदस्य ने एक बंगाली लघु फिल्म बनाई है, अच्छी लगी. बताया गया है, परिवार में संस्कार कैसे एक पीढ़ी से दूसरी में जाते हैं. उसके भीतर जो ऊर्जा थी वही नन्हे को मिली है, साहसी है वह भी और उसे भी अपनी ऊर्जा को सकारात्मक बनाना होगा, समय ही सिखाएगा उसे ! महिला क्लब की प्रेसीडेंट का विदाई दिन भी नजदीक आ रहा है, उनसे मिलकर कुछ जानकारी लेनी है. वह एक बेबाक, खरी-खरी सुना देने वाली महिला हैं. रोबदार बुलंद आवाज है उनकी, अपने रुतबे का लाभ उठाती हैं और मस्त रहती हैं !



Monday, September 4, 2017

धम्म गंगा


वे घर लौट आये हैं. मन अधिक शांत है और स्मृतियों से भरा है. दस दिनों तक ध्यान के गहन प्रयोग के बाद भीतर कितना शून्य जग गया है. उसने मन को पीछे ले जाकर देखा और लिखना आरम्भ किया - उस दिन शांत दोपहरी को दो बजे कोलकाता के IIMC से सोदपुर स्थित विपासना केंद्र ‘धम्म गंगा’ के लिए रवाना हुई थी. कोलकाता से लगभग तीस किमी दूर गंगा के तट पर स्थित केंद्र तक पहुंचने में दो-ढाई घंटे लग गये. ड्राइवर को बाहर छोड़कर लोहे के गेट के बायीं तरफ छोटे द्वार से अंदर पता करने के लिए चली गयी कि कार अंदर जा सकती है या नहीं, लौटी तो कार कहीं नजर नहीं आ रही थी. मन के भीतर छिपा भय का  संस्कार सामने आ गया, गोयनका जी कहते हैं कोई भी विकार दुख का कारण ही बनता है. अब भय जगा तो झट प्रतिक्रिया हुई, पतिदेव को फोन कर दिया, उनके आशाजनक शब्दों ने विश्वास दिलाया. ड्राइवर दूसरी गली में जाकर गाड़ी मोड़ने चला गया था. वह वापस आया तो मन ही मन उससे क्षमा मांगी. धैर्य का दामन छोड़कर जो मन झट प्रतिक्रिया करने में जुट जाता है वह गलत निर्णय पर ही पहुंचता है. यह पाठ आते ही सीख लिया था.
भीतर पहुंच कर कुछ समय औपचारिकताओं में बीत गया. फार्म भरवाया गया. प्यास भी लग रही थी और लम्बे सफर से सिर में हल्का दर्द भी था. अगले दस दिनों तक रहने के लिए जो कमरा मिला उसका नम्बर आठ था, एक युवा बंगाली लड़की जो बैंगलोर में रहकर काम करती है, पर उसका घर कोलकाता में है, उस कमरे में पहले से ही थी. उसने दो-चार बातें ही की होंगी कि पता चला ऑफिस में जाकर मोबाइल व अन्य कीमती सामान लॉकर में रखवाने हैं. वहीं पता चला छह बजे घंटा बजेगा तब नाश्ता व चाय मिलेगी, जो आज का अंतिम भोजन होगा. शाम का वक्त था, सूर्यास्त का समय. केंद्र का बगीचा जहाँ खत्म होता था, वहाँ बरगद के एक विशाल वृक्ष के चारों तरफ एक बड़ा चबूतरा था. जिसपर चढ़कर गंगा का चौड़ा पाट देखा. नदी का शांत पानी और उस पर नाचती हुई छोटी-छोटी लहरें, सूर्य की लाल रश्मियाँ उन लहरों के साथ नृत्य करती हुई बहुत आकर्षक लग रही थीं. अगले कुछ दिनों तक रोज ही शाम को बल्कि दिन में कई बार गंगा को निहारना उसका प्रिय कार्य बन जायेगा यह उस वक्त मालूम नहीं था. उसी वृक्ष के नीचे तितलियों से गुफ्तगू भी रोज का हिस्सा बन जाएगी यह भी नहीं जानती थी. जैसे ही शाम के वक्त वहाँ जाती, हवा चल रही होती और जाने कहाँ से उड़ती-उड़ती दो काली तितलियाँ आ जातीं और कभी सिर कभी बांह पर बैठ जाती थीं, आश्चर्य होता था, भरोसा भी होता था कि परमात्मा ही उनके द्वारा संदेश भेजता है. कुछ पंक्तियाँ तभी एक दिन जेहन में आई थीं-
तितलियाँ परमात्मा की दूत होती हैं
पुष्प उसके चरणों की शोभा बढ़ाते हैं
उन पुष्पों पर मंडराती हैं तितलियाँ...
उसी का संदेश ले आती हैं !

जब घंटा बजा, सभी डाइनिंग हॉल में गये जिसमें तीन ओर दीवारों से सटी हुई सीमेंट की पतली मेजें थीं, जिनपर काला मोजाइक लगा था तथा जिनके सामने प्लास्टिक की कुर्सियां रखी हुई थीं. चौथी तरफ लम्बा सा बेसिन था, कुछ दूरी पर कई नल लगे थे, बर्तन धोने का सामान रखा था, जहाँ नाश्ते व खाने के बाद सभी को स्वयं बर्तन धोकर रखने होते थे. कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की दो मेजें सटाकर रखी गयी थीं जिनपर बर्तन व भोजन की सामग्री थी. उस दिन ‘पोहा’ मिला जो स्वादिष्ट था तथा हल्की मिठास लिए था. बाद के दिनों में भी कई व्यंजनों में मीठे से खबर मिलती रही थी कि बंगाल में हैं, जहाँ छाछ में भी मीठा डाला जाता है.

Thursday, July 13, 2017

मनसा देवी का मंदिर


कुछ संस्कार इतने गहरे होते हैं कि मिटने का नाम ही नहीं लेते, आज सुबह प्राणायाम करने बैठी तो सहज ही ध्यान लग गया पर उठी तो किसी बात पर हल्की सी धूमिल रेखा मन पर छा गयी. द्रष्टा बन कर उसे देखा पर मन में एक संशय तो छा ही गया. कल रात छोटे भाई से बात हुई, उसे ध्यान व समाधि का अनुभव सदा होता रहता है. परमात्मा अकारण दयालु है, प्रेमिल है, आनंद स्वरूप है और सहज ही प्राप्य है ! वह वसंत है, हर पीड़ा का अंत है ! सद्गुरू, परमात्मा और आत्मा में कोई भेद नहीं ! भीतर से जो ज्ञान का पथ दिखलाता है, वही तो गुरू है !

आज स्कूल गयी, योग की कक्षा आखिरी कक्षा में होनी थी, चटाई की दीवार है उस कमरे की, शेष को बरामदे में खड़े होकर करना पड़ा, खैर, न से तो हाँ भली. अगले हफ्ते से स्कूल में छमाही परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं, इसके बाद स्कूल बंद हो जायेगा, फिर अगस्त में खुलेगा, यानि अब हर सोमवार को जल्दी-जल्दी काम निपटा कर स्कूल नहीं जाना है. शाम को भांजियों को लेकर क्लब जाना है, बच्चों का वार्षिक सम्मेलन चल रहा है इन दिनों. मौसम गर्म है आज भी, दिल्ली का तापमान कल अड़तालीस डिग्री था, अब तक का सबसे अधिक ! कल मेहमान वापस जा रहे हैं. जैसे वह उन्हें लिवाने गयी थी, कल उन्हें छोड़ने भी जा रही है. वे ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर पहुंच जाएँ और बड़ी भांजी के जीवन में सब कुछ पहले का सा ठीक हो जाये तभी माना जायेगा कि उनका यहाँ आना सफल रहा. परमात्मा उनके साथ है और वह उन्हें सही मार्ग दिखायेगा. ज्ञान हो जाने के बाद पुराने कर्मों का क्षय होता है, नये कर्म नहीं बंधते. आज मृणाल ज्योति में एक कार्यक्रम है. विकलांग व्यक्तियों को सरकार की ओर से व्हील चेयर व साइकिल वितरित किये जायेंगे. उसे जाना है.

आज पूरे छह दिनों के बाद डायरी खोली है. उस दिन मेहमानों को छोड़ने गयी, कल उनके लिए कविता लिखी. हर कविता के अवतरण का एक समय होता है, उससे पहले वह आती ही नहीं, जबकि विद्यमान तो रहती ही है. माली से कह कटहल व नारियल तुड़वाकर एक सखी के यहाँ भिजवाने हैं. दो मालियों में से एक काम छोड़कर जा रहा है, उसने लाइन में किसे के साथ झगड़ा कर लिया है, उसे अपने क्रोध पर नियन्त्रण नहीं है. उसे गमले रंगने के लिए कहा था, अभी तक उसने शुरू नहीं किये हैं. कुछ लोग दीर्घसूत्री होते हैं, काम को टालने वाले, जैसे उसने भी अभी तक आत्मा को जानने का काम पूरा नहीं किया है. यह एक अंतहीन यात्रा है. गुरू के बिना मार्ग नहीं मिलता. कदम-कदम पर सहायता चाहिए. सब कुछ ज्ञात होते हुए भी मन पुरानी लकीरों पर पल भर के लिए ही सही चलता तो है. पर अब उसे देखने वाला मौजूद है. आत्मा वे स्वयं हैं, खुद को जानने के लिए तो खुद को ही होश बनाये रखना होगा !

आज महादेव देखा. वे स्वयं को पृथक समझते हैं, यही द्वंद्व है. ‘मनसा’ शिव की मानस पुत्री है और स्वयं को देवी बना हुआ देखना चाहती है, स्वयं की पूजा करवाना चाहती है. पार्वती स्वयं ही दूसरा रूप धारण कर शिव से विवाह करना चाहती है. उनका मन भी आत्मा से पृथक अपनी सत्ता जमाना चाहता है और व्यर्थ ही बंधता है. मनसा और पार्वती शिव को नहीं जानती, मन कितना ही प्रयास करे आत्मा को नहीं जान सकता. आत्मा ही आत्मा को जान सकती है. आज मंगलवार है, शाम को बच्चे आयेंगे. अभी प्रसाद बनाना है.  



Thursday, June 29, 2017

स्वप्नों का संसार


परसों सुबह पुनः दो स्वप्न देखे, एक में कोई व्यक्ति बाँह में सूई के द्वारा कुछ डाल रहा है, कई लोग हैं, उनमें से एक वह भी है ऐसा कुछ भास हुआ, दुसरे में मृत्यु का अनुभव हुआ, अब दूसरा स्वप्न जरा भी याद नहीं है, पर यह ज्ञात हुआ था कि इस तरह मृत्यु हुई थी. पिछले जन्मों की स्मृतियाँ भी हो सकती हैं ये. परमात्मा ही जानता है. आज सुबह एक स्वप्न में समय बता रही थी कि किसी ने कहा, दस पैंतालीस नहीं दस तिरालिस और नींद खुल गयी. उनके घर का नम्बर तक उसे पता है, उनकी चेतना से कुछ भी छिपा नहीं है, आखिर वह स्वयं ही तो हैं !

फिर छह दिनों का अंतराल, कल रात्रि एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह स्नानगृह में है. एक ऊर्जा गले तक चढ़ती है, थोडा भय लगता है पर वह स्वयं को तैयार कर लेती है, पुनः एक ऊर्जा चढ़ती है और उसके बाद होश नहीं रहता, फिर अचानक एक सुंदर चित्र दीखता है, फिर तो एक के बाद एक चित्रों की श्रृंखला शुरू हो जाती है. रंगीन चित्र थे, कला कृतियाँ थीं, जैसे कोई टीवी देख रहा हो. स्वप्न उनके मन में छिपी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं. ध्यान का गहन अनुभव जागृत में नहीं हुआ सो स्वप्न में कुछ हो गया !

कल रात्रि कोई स्वप्न नहीं देखा, ध्यान की स्मृति आती रही. परमात्मा उस पर अवश्य ही नजर रखे हैं. अभी कुछ देर पूर्व सद्गुरू को बहुत दिनों बाद पत्र लिखा. उन्हें अपने प्रति ईमानदार होना चाहिए, साधना का यह पहला सूत्र है. भीतर जो कुछ भी चल रहा है उसका साफ-साफ पता होना चाहिए. अतीत में जो भी हुआ वह स्वप्न मात्र है. संस्कारों के वश होकर जो भी किया उसको अब बदल नहीं सकते पर अब जो हर क्षण हो रहा है वह होश में रह कर हो. क्लब की पत्रिका छप कर आ गयी है. एक लेख की लेखिका के नाम के आगे भूल से डॉ लिखा गया है, उनसे बात की, पहले तो वह कुछ नाराज दिखीं फिर संतुष्ट हो गयीं. अगले हफ्ते क्लब की मीटिंग में कवियत्री सम्मेलन का आयोजन करना है. सुबह नैनी ने कुछ माँगा तो उसने ले लेने को कह दिया, उसे शायद अच्छा लगा हो, अपने आप ही कुछ काम कर दिए, बिना कहे ही. उसके ससुर के झगड़े से घर के सभी लोग परेशान हो गये हैं. उसे उनके प्रति सहानुभूति होती है. मन के भीतर न जाने कितने संस्कार दबे पड़े हैं, खुद को भी आश्चर्य होता है. परमात्मा हरेक के हृदय में है. वह उसे हर तरह के बंधन से मुक्त देखना चाहते हैं. अहंकार की हल्की सी छाया भी न रहे. मन बिलकुल सपाट नीले आकाश सा हो जाये निरभ्र..निर्मल..तभी तो होगा उसका पदार्पण !

कल शाम को गुरु माँ का अद्भुत प्रवचन सुना. सभी जगे हुए एक ही बात कहते हैं. उनके भीतर जब चैतन्य की शिखा अखंड जलने लगती है, कोई भी घटना उसे कंपाती नहीं, वह स्वयं भी मन, बुद्धि के रूप में व्यर्थ ही नहीं चुकती, तब ही भीतर अखंड प्रेम का साम्राज्य छा जाता है. वही सत्य है, वह अबदल है, सारे द्वंद्व तभी समाप्त हो जाते हैं जब सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, सारी चाहें गिर जाती हैं. प्रकृति का खेल समाप्त हो जाता है, आत्मा निसंग हो जाती है, कैवल्य का अनुभव घटता है. द्रष्टा भाव में जो टिक जाता है उसके लिए जगत का क्रिया कलाप एक खेल सा ही जान पड़ता है. रात्रि को फिर कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं पड़ता. सारे स्वप्न अधूरी इच्छाओं के कारण ही जगते हैं.


Monday, June 5, 2017

आंवले की डाल


छोटे भाई का फोन आया था परसों रात सोने से पूर्व, छोटी बुआजी जो दो वर्ष पूर्व घर से चली गयीं थीं, उनकी खबर मिल गयी है. वह बंगलूरू स्टेशन पर थीं, जब पुलिस द्वारा टाइम्स ग्रुप के करुणा ट्रस्ट में पहुंचायी गयीं और वहाँ उनका मानसिक इलाज होता रहा. जब उन्हें अपने घर की याद आयी तो वहाँ के लोगों ने लखनऊ पुलिस से सम्पर्क किया और आज सुबह वे घर आ गयीं. उनका पुत्र उन्हें लेने गया था, वह जहाँ नौकरी करती थीं उस दफ्तर के लोगों ने  सहायता की. नन्हे ने उनसे बात की पर मिलने नहीं जा सका. कल सुबह उसने हिटलर की आत्मकथा पढनी शुरू की है, अभी तो रोचक लग रही है, देखे, क्या मनोदशा है उसकी, परमात्मा किससे क्या करवायेगा, कौन जानता है. हरेक को पूर्णता की ओर जाना है. जिस क्षण भी कोई अपूर्णता का अनुभव करता है वही क्षण उसे चुभन देता है. भूत में जिस क्षण उन्होंने अपूर्णता का अनुभव किया है, वे सारे क्षण उनके मन पर संचित हो गये हैं, उन सबका भार उठाए वे आगे बढ़ते हैं, बढ़ते क्या हैं, घिसटते हैं. उन्ह किसी से कुछ कहना था, पर कह नहीं पाए तो एक भार सिर पर बैठ गया. वे चाहें तो इसी क्षण में पूर्ण हो सकते हैं, हल्के और खाली, क्योंकि वे सारी घटनाएँ जैसी घटनी थीं, घट चुकी हैं. दीदी से बात की, वह भी यही कह रही थीं, एक ही चेतना  है सबमें जो विभिन्न नाम रूपों के द्वारा काम करवा रही है. वह परसों आस्ट्रेलिया जा रही हैं, अब शायद वहीं से अगली बात हो.

जून कल दोपहर गोहाटी चले गये. दोपहर को वह क्लब के काम से बाहर गयी और शाम को मीटिंग में, लौटने में पौने नौ बज गये थे. इसी माह क्लब की पत्रिका निकलेगी, उसके लिए एक नाम का चुनाव करना है. ऐसा नाम जो क्लब की सदस्याओं में जोश भी भरे और कुछ नया करने का जज्बा भी. बगीचे में आंवले के पेड़ की एक बड़ी डाल टूट कर गिर गयी थी कल रात की आंधी में, उसे साफ करवाया. आज फिर दीदी से स्काइप पर बात हुई, वह अभी देहली में हैं, बड़ी बेटी के यहाँ गयी थीं, उनकी दोहती को देखा, उसके लिए एक कविता भेजी, बहुत प्यारी है वह. जून परसों आ रहे हैं. नन्हे से पूछा उसने, कैमरे से वीडियो टीवी पर कैसे देख सकते हैं, उसने जो बताया वह काफी आसान था. उसे पिताजी का एक वीडियो एक सखी को दिखाना है. आज भी तेज वर्षा हो रही है. उसने भीगी-भीगी सी एक कविता लिखी, जो ब्लॉग पर डाल रही है. कल ईद है, वे सेवइयां बनायेंगे.   

जून आज वापस आ गये हैं, घर जैसे भर गया है. ढेर सारे फल, टिंडे, नींबू, सूखे मेवे, कुकीज और उसके लिए नये कंगन लाये हैं अपने साथ. नन्हे का एक सूटकेस यहाँ पड़ा था, जिसकी चाबी उसने खो दी थी. जिसे पिछले महीने खुलवाया था. उसके कालेज के फोटो, ग्रीटिंग कार्ड्स आदि उसमें पड़े हैं और कुछ चिठ्ठियाँ भी. हर व्यक्ति का अपना एक अतीत होता है. हर व्यक्ति अपने भीतर कितना कुछ छिपाए रहता है. उसने भी खुद को पहचाना है, कितना कुछ अनुभव किया है और आज जो भी है वह उन्हीं का परिणाम है. वह बहुत संवेदनशील है, बहुत स्नेह भरा है उसके भीतर पर साथ ही सबसे अलग भी, एक वैराग्य की भावना भी है. उसका जन्म जिन परिस्थितियों में हुआ, बचपन में उसे जैसे संस्कार मिले, उसी के अनुसार ही तो वह बड़ा हुआ. वे स्वयं ही जब आवेगों के वशीभूत थे, अपना ही पता नहीं था तब उन्होंने उसे बड़ा किया. उसके दुःख उनके ही हैं. हर आत्मा अपनी यात्रा कर रही है. वह कुछ संस्कार अवश्य ही पूर्व जन्म के लाया होगा लेकिन वे उनके सजातीय होंगे तभी तो वह उनके जीवन में आया. अच्छा है कि अब वह सजग है, अब उसके जीवन में ऐसी कोई बात नहीं है जो उन्हें ज्ञात नहीं है. 

Monday, March 27, 2017

चाँद और सूरज


परमात्मा के खेल निराले हैं. वह कितना-कितना चाहता है कि वे उसके पथ पर चलें. वह उन्हें कई मार्गों से शुद्ध करता है, कभी सुख देकर कभी दुःख देकर. इतने वर्षों से जो संस्कार उसके भीतर था, जिसके कारण उसका तन अस्वस्थ हुआ, मन अस्वस्थ हुआ, वह संस्कार अंततः कल रात्रि उसे मिटता हुआ प्रतीत हुआ है. अहंकार की जो काली छाया उसके और परमात्मा के मध्य अभी तक पड़ी हुई थी; आज वह गिर गयी लगती है, वह छाया ही थी. अहंकार लगता है ठोस पर कुछ होता नहीं है, परमात्मा लगता है सूक्ष्म पर होता है ठोस..वह उनका सच्चा हितैषी है, सुहृद है, वह उनका सद्गुरू है. मन अब रंच मात्र भी नकारात्मकता स्वीकार नहीं कर पाता. जीवन कितने-कितने रंग दिखाता है, जब शुभ नहीं टिका तब अशुभ कैसे टिकेगा.

यह सृष्टि एक गीत है
आकाश गंगाएँ छंद है जिसकी
झिलमिलाते तारे अलंकार
और चाँद-सूरज दो अंतरे
मुक्ति आधार है जिसकी
नये शब्द खोजने होंगे
नई इबारत लिखनी होगी
उसका गुणगान करने के लिए
जो पुरातन है
जब नहीं थी सृष्टि
जो उससे भी पूर्व था..

भीतर कैसा ठहराव छा गया है. जैसे कोई ज्वर उतर गया हो. अब कोई दौड़ नहीं है. न कुछ पाना है, न ही करना है, जीवन जो देगा उसे स्वीकारना है. भीतर कोई जाग गया है. सदा एकरस सत्ता है, जो पूर्ण तृप्त है. सारे संस्कार नष्ट हो गये लगते हैं. अब कोई कोना खुद से छिपा नहीं रह गया है भीतर का. मन को उसकी गहराई तक जाकर खंगाल लिया है, सारे कोने साफ कर लिए हैं, कहीं कोई दुराव नहीं है, अब नहीं कुछ सिद्ध करना है. जून कल बाहर जा रहे हैं, पांच दिन बाद लौटेंगे. अभी कुछ देर पहले ही पुरानी डायरी के कुछ अंश लिखे, उसका यह संस्कार तब भी कितना दृढ था, पर अंततः अब इससे मुक्ति हुई लगती है. उसकी साधना शायद इसी के लिए थी. परमात्मा उन्हें कितना आनंद कितनी शांति देना चाहता है. वे अज्ञानवश अपने व उसके बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं. उनका सारा नकार अपनी ही जड़ों पर चोट करने जैसा है. एक ही सत्ता से सारा जगत बना है. अन्य पर किया क्रोध स्वयं पर ही लौटता है. लौटता भी है और स्वयं से ही होकर जाता भी है. हर हाल में अपना ही नुकसान होता है. इसी तरह दूसरे को दी ख़ुशी भी खुद से होकर गुजरती है और लौट कर भी खुद तक ही आती है. जब तक मन को खुद की खबर नहीं थी तब तक वह बाहर ही ख़ुशी खोजता था, अब भीतर ही सब कुछ मिल गया है, कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है. असजगता के कारण वे अपने जीवन का बहुत सा कीमती समय नष्ट कर देते हैं.

एक शिशु जैसा छोड़ दिया है
स्वयं को निसर्ग के हाथों
अब खो गये हैं सारे लक्ष्य, सारा ज्ञान
खाली है मन, शून्य उतर आया है भीतर
और बाहर परमात्मा हर तरफ बाहें फैलाएं..
न कुछ करना है
न जानना है
न पाना है
बस एक निर्दोष फूल सा खिले रहना है
अस्तित्त्व के चरणों में !

   

Friday, October 14, 2016

बगीचे में झूला


आज बसंत पंचमी है. सुबह मृणाल ज्योति में पूजा में सम्मिलित हुई और दोपहर बाद एक सखी के यहाँ हवन में, पहले सत्य नारायण की कथा भी थी. बच्चों की कहानी सी लगती है. भगवान भी बात-बात पर रूठ जाते हैं, फिर प्रसन्न हो जाते हैं, भोले-भाले लोगों के भगवान भी तो वैसे ही होंगे, लेकिन पूजा करने से बाहरी वातावरण सात्विक बन जाता है. मन के भीतर भी तरंगें पहुंचती हैं और वातावरण सात्विक होने में मदद मिलती है. हर कोई अपनी-अपनी समझ से काम करता है, जो जैसा करता है वैसा ही भरता है. यदि कोई घबरा कर कोई शब्द बोल रहा है तो वह घबराहट का संस्कार ही बना रहा है और यदि कोई दूसरों के व्यवहार पर कोई निर्णय दे रहा है तो वह भी एक संस्कार बना रहा है. आज सुबह उसे बिजली के उदाहरण से आत्मा, मन व बुद्धि का भेद स्पष्ट हुआ. आत्मा जिसके साथ जुड़ जाती है उसी का रूप धर लेती है. जैसे विद्युत हीटर के साथ जुड़कर गर्मी का, एसी में ठंड का, टीवी में आवाज व चित्र का तथा विभिन्न उपकरणों में विभिन्न रूप, वैसे ही उनके भीतर की ऊर्जा भिन्न-भिन्न भावों, विचारों तथा धारणाओं के रूप में व्यक्त होती है. जब यह परमात्मा के साथ जुड़ जाती है तब उसी के रूप में स्वयं को जानती है. शेष सब बाहर की यात्रा में काम आते हैं और अंतिम भीतर की यात्रा में !

आज ध्यान में सुंदर अनुभव हुआ. जब, वे जब चाहें तब अपने-आप में स्थित हो पाते हैं तभी मानना चाहिए कि साधना में गति हो रही है. मन में यदा-कदा इधर-उधर के व्यर्थ संकल्प उठते हैं पर वे सागर में उठी लहर, बूंद या बुदबुदों से ज्यादा कुछ नहीं. सागर का उससे क्या बिगड़ता है, उसी की सत्ता से वे उपजे हैं और उसी में लीन हो जाने वाले हैं. इस ज्ञान में स्थिति बनी रहे तो मन व बुद्धि से मैल की परत छूटने लगती है, झूठ बोलने का जो संस्कार है, जड़ता का जो संस्कार है, अहंकार का जो संस्कार है और ईर्ष्या का जो सबसे गहरा संस्कार है, इन सबसे मुक्त होना है. इन्हें मानकर यदि स्वयं की सत्ता दी तो मुक्त होना असम्भव है. सद्गुरु कहते हैं कि माने सत्य ही उसका संस्कार है. उत्साह व जोश ही उसके भीतर कूट-कूटकर भरे हैं. इर्ष्या तो उसे छू भी नहीं गयी, क्योंकि उसे ज्ञात हो गया है कि नदी-नाव संजोग की तरह लोग आपस में मिलते हैं, मोह के कारण संबंध बना लेते हैं, फिर बिछड़ जाते हैं. उनके साथ मृत्यु के बाद कोई जाने वाला नहीं है, केवल परमात्मा ही उनके साथ रहेगा और रहेंगे उनके कर्म. आज वर्षा के कारण पुनः ठंड हो गयी है. जून को देहली जाना है. चार दिन बाद पिताजी को साथ लेकर आयेंगे. एक सखी ने बगीचे में लगाने के लिए झूला माँगा है, प्रतियोगिता में भाग ले रही है. उनके बगीचे में फूल अब कम हो गये हैं. माँ उठकर बाहर जा रही हैं, फिर लौट आई हैं, शायद देखने गयीं थी, पिताजी बैठे हैं या नहीं.

बादल आज भी बने हैं, ठंड बढ़ गयी है. शाम को जो कविता लिखी थी, ज्यादा लोगों ने नहीं पढ़ी, आत्मा को चाहने वाले ज्यादा नहीं हैं. सुबह एक स्वप्न देखकर नींद खुली. एक सखी का भाई घर से भागकर यहाँ आया है. रातभर उनके बरामदे में लिनन बॉक्स में बैठा रहा. सुबह जैसे ही वह दरवाजा खोलकर बाहर आयी तो उसने बताया. स्वप्न कितना सत्य प्रतीत हो रहा था. रात भी मन ने एक स्वप्न बुना और तभी समझ में आ गया यह स्वप्न है. इसी तरह उनका जीवन भी एक स्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है, उनका अतीत तो स्वप्न बन ही चुका है, भविष्य एक स्वप्न है ही पर वर्तमान का यह दौर भी स्वप्न ही है. अब कोई पढ़े या नहीं क्या फर्क पड़ता है क्योंकि सोये हुए लोगों की बात का क्या आदर और क्या अनादर, सत्य इस सबके पीछे छिपा है. झलकें मिलने लगी हैं पर पूरा सूर्य अभी नजर नहीं आया है, यह कामना भी छोडनी होगी, साधो सहज समाधि भली !