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Tuesday, June 28, 2016

मंजिल और रास्ता


‘मृत्यु के साथ यदि किसी की मित्रता हो तभी वह धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख सकता है. ऐसा हो नहीं सकता तो धर्म का पथ चुनना ही पड़ेगा. सजगता का वरण, समता की साधना भी तभी होती है. भीतर आग्रह हो तो अहंकार शेष है, अहंकार की तृप्ति करनी है तो उसे दुःख सौंपना ही होगा. स्वयं को जानना ही धर्म में अर्थात स्वभाव में स्थित होना है. जो स्वयं को जानता है उसे संसार से कोई अपेक्षा नहीं रहती, वह दाता बन जाता है. वह जानता है कि द्वेष करने से वह स्वयं भी उसी की भांति बन जायेगा जो उसके द्वेष का पात्र है. मन रुग्ण होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. नकारात्मक भावनाएं देह पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. जितना जितना कोई स्वयं में स्थित रहता है मुक्ति का अनुभव करता है. मुक्ति विकारों से, द्वेष से, दुखों से, वासनाओं से, क्रोध से और व्यर्थ चिन्तन से !’ आज सद्गुरु को सुनकर लगा वह उसके लिए ही बोल रहे थे.
यह जगत एक दर्पण है, उसमें वही झलकता है जो उनके भीतर होता है. भीतर प्रेम हो, आनन्द हो, विश्वास हो तथा शांति हो तो चारों ओर वही बिखरी मालूम होती है, अन्यथा यह जगत सूना-सूना लगता है. यहाँ किस पर भरोसा किया जाये ऐसे भाव भीतर उठते हैं. भीतर की नदी सूखी हो तो बाहर भी शुष्कता ही दिखती है. लेकिन भीतर का यह मौसम कब और कैसे बदल जाता है पता भी तो नहीं चलता. कर्मों का जोर होता है अथवा तो पापकर्म उदय होते हैं या वे सजग नहीं रह पाते. कोई न कोई विकार उन्हें घेरे रहता है तो वे भीतर के रब से दूर हो जाते हैं. हो नहीं सकते पर ऐसा लगता है. यह होना ठीक भी है क्योंकि भीतर छिपे संस्कार ऐसे ही वक्त अपना सिर उठाते हैं. पता चलता है कि अहंकार अभी गया नहीं था, सिर छिपाए पड़ा था, कामना अभी भीतर सोयी थी. ईर्ष्या, द्वेष के बिच्छू डंक मारने को तैयार ही बैठे थे. अपना आप साफ दिखने लगता है. साधना के पथ पर चलते-चलते जब वे यह सोचने लगते हैं कि मंजिल अब करीब ही है तो अचानक एक घटना ऐसी घटती है जो इशारा करती है कि रुको नहीं, अभी और चलना है. इस यात्रा का कोई अंत नहीं, इसमें मंजिल और राह साथ-साथ चलते हैं. जैसे कोई क्षितिज की तरह पास आता मालूम होता है निकट पहुंचो तो फिर उतना ही दूर..जिसने माना कि उसने जान लिया है उसका ज्ञान चक्षु बंद हो जाता है. वह खुला रहे इसके लिए सतत जिज्ञासु बने रहना होगा, सदा सजग रहना होगा, सदा स्वयं के भीतर झाँकने का काम करना होगा, कौन जाने कहाँ कोई विकार छिपा हो जो सही मौसम की प्रतीक्षा कर रहा हो !

स्वराज चेतना क्या है ? सत्य की खोज और मानव मात्र को जिसकी तलाश है क्या वही नहीं है स्वराज्य चेतना..आज मुरारी बापू की ‘मानस महात्मा’ को कुछ देर सुना. भीतर सद्विचारों की प्रेरणा जगाती है उनकी कथा. उन्हें भी अब कुछ करना होगा, मात्र विचार ही पर्याप्त नहीं है. उसे अपने लेखन को गति देनी होगी. हर कोई अपना-अपना कार्य ठीक से करे तो समाज पुनः अपने मूल्यों के प्रति जागरूक हो सकता है. उनकी परिचिता बुजुर्ग महिला आज गिर गयीं, उनका कंधा अपने स्थान से खिसक गया है, अस्पताल में हैं, वे मिलने गये थे. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, शाम को पार्टी में जाना है. कल सिंगापुर का शेष विवरण लिखा, अभी टाइप करना शेष है. सुबह प्राणायाम के बाद परमात्मा के साथ एक करार किया, वह उसे प्रकट करेगी और वह उसे अप्रकट करेगा. वह उसके जीवन में झलकेगा बाहर और वह भीतर खत्म होती जाएगी. उसका नाम उसकी शक्ति है और उसका पवित्र स्मरण उसका एकमात्र कर्त्तव्य, शेष तो अपने आप होता जायेगा. परमात्मा उनके भीतर सोया रह जाता है और वे बार-बार खुद को दोहराते चले जाते हैं, व्यर्थ का रोना रोते हैं. वह हर क्षण तैयार बैठा रहता है, सत्य सर्वदा सर्वत्र है ! 

Friday, November 6, 2015

रस्ता और मुसाफ़िर


वाणी का दोष पुनः हुआ, उसने नये माली की तारीफ़ की और पुराने माली की निंदा, अब निंदा का दोष जो लगा वह तो है ही, नया माली प्रशंसा सुनकर दो घंटे से पहले ही चला गया. इन्सान अपनी जिह्वा के कारण कितनी बार फंस जाता है. वाणी पर संयम रखना कितना कठिन है, एक बार वे बोलना शुरू करते हैं तो खत्म कहाँ करना है, यह भूल जाते हैं. आज शाम को सत्संग में जाना है, नॉलेज पॉइंट्स लेकर जाने हैं. सुबह सुना जिस तरह मिट्टी आग में तपकर प्याला बन जाती है और उपयोग में आती है वैसे ही उनका यह मिट्टी का तन जब ईश्वर की लगन रूपी लौ में तप जाता है तब यह उसके हाथों का उपकरण बन जाता है और काम में आता है. ईश्वर की लगन भी क्रमशः तीव्रतर होती जाती है, पहले राख में छिपे अंगारे की तरह जो ऊपर से दिखती भी नहीं, फिर तपते हुए लाल अंगारे की तरह, जो प्रकाश भी देता व ताप भी, फिर गैस के चूल्हे की नीली लपट की तरह और फिर माइक्रोवेव की तरह जो नजर भी नहीं आती, बस चुपचाप अपना काम कर देती है. सद्गुरु ने कहा कि ज्ञान पा लिया है यह अहंकार भी छोड़ना होगा पर नहीं मिला है सदा यह संदेह भी नहीं रखना है. मध्यम मार्ग पर चलना श्रेष्ठ है. आत्मा का परमात्मा से नित्य का संबंध है. उन्हें बनाना नहीं है, वे स्वयं आत्मा हैं यह बात जितनी दृढ़  हो जाएगी तो उतना ही वे परमात्मा से अभिन्नता अनुभव कर सकेंगे, और तब शेष ही क्या रहा ?

आज गुरूजी ने कहा शब्दों से वे लाख चाहें, अपनी बात समझा नहीं सकते जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. वे अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से अपने विरोधी को प्रभावित कर सकते हैं किसी हद तक. आज भगवद्गीता पर उनके प्रवचन का प्रथम भाग सुना, कल दूसरा सुनेगी, भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़े, सुने तृप्ति नहीं मिलती, वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता फिर उसे सामने बिठाकर पूजता है पर दो के मध्य की दूरी भी उससे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है, केवल एक ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है. और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

मैं हूँ मंजिल, सफर भी मैं हूँ, मैं ही मुसाफिर हूँ...

आज सद्गुरु ने कितना सुंदर गीत गाया. मन व् बुद्धि भी उसी आत्मा से निकले हैं, यानि वही हैं जिन्हें आत्मा तक पहुंचना है ..मन रूपी यात्री विचार रूपी रस्ते को पार करके घर पहुँचता है. कितना सरल और सहज है अध्यात्म का रास्ता..न जाने कितना पेचीदा बना दिया है इसे लोगों ने. सीधी- सच्ची बात है जब मन स्वार्थ साधना चाहता है तो आत्मा से दूर निकल जाता है जब यह अपनी नहीं सबकी ख़ुशी चाहता है तो यह आत्मा में टिक जाता है. यह जान जाता है कि जगत एक दर्पण है जो यहाँ किया जाता है वही प्रतिबिम्बित होकर वापस आता है, तो यह खुशियाँ देना आरम्भ करता है. अहंकार को पोषने से सिवाय दुःख के कुछ हाथ नहीं आता, क्योंकि अहंकार उसे सृष्टि से पृथक करता है, जबकि वे सभी सृष्टि के अंग हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं. स्वतंत्र सत्ता का भ्रम पलने के कारण ही वे सुखी-दुखी होते हैं. वे ससीम मन नहीं असीम आत्मा हैं !



Thursday, May 29, 2014

धूल का बादल


आज सुबह उसके घर के दरवाजे पर एक deaf and dumb (उसके हाथ में पकड़े फोल्डर के अनुसार ) सहायता मांगने आया पर अभ्यास वश उसने उसकी पुकार (मूक) सुनी ही नहीं, अनसुनी कर दी. बाद में सोचा, अगर उसकी कुछ सहायता कर दी होती तो उनका क्या घट जाता.
फिर कुछ दिनों का अन्तराल, उस दिन माँ-पिता को जाना था, अगले चार दिन घर की सफाई, स्वेटर्स की धुलाई आदि में व्यस्त रही. धूप भी दिखानी थी गर्म कपड़ों को, पर धूप निकल ही नहीं रही है, अख़बार में आया था कि पूरे असम के ऊपर धूल का एक बड़ा बादल छा गया है., वर्षा पिछले कई हफ्तों से नहीं हुई है. कल शाम वे अपने पड़ोसी के यहाँ गये, साथ-साथ रहते हुए उन्हें वर्षों होने को आये हैं, अच्छे किन्तु औपचारिक ही कहे जाएँ, ऐसे सम्बन्ध हैं उनके मध्य, जो उन दोनों परिवारों को सूट करते हैं. जब मिले तो पूरे मन से नहीं तो किसी के व्यक्तिगत जीवन में कोई झांक-ताक नहीं. उसकी आँखें जाने क्यों आज बंद हो रही हैं, हल्का सा दर्द है, उस दिन पढ़ा था कि डायरी में न ही मौसम का जिक्र होना चाहिए और न ही छोटी-मोटी बीमारियों का, लेकिन लिखने के लिए उसके पास और भी बहुत कुछ है, खुद की शिकायत भी तो करनी है, पिछले तीन-चार दिनों से संगीत का अभ्यास भी नहीं हुआ है. दो दोपहरें सिलाई के काम में गुजर गयीं. मन पर नजर रखने का अभ्यास भी शिथिल हुआ एक दो बार, माँ-पापा के साथ चाहकर भी बहुत खुला व्यवहार नहीं कर पाती वह, निकटता से घबराहट होती है. अपनी आजादी, अपना आप इतना महत्वपूर्ण लगता है कि अपने इर्द-गिर्द एक घेरा सा बना लिया था. उस समय वही ठीक लगता था अब भी वही ठीक लगता है, कम से कम उनकी अपेक्षाएं बढ़ेंगी तो नहीं.

जिन्दगी यूँ ही चली जा रही है, बेमकसद, बेमजा, हर वक्त मन अपने आप से पूछता है ? क्या समाचार है ? और मन अंजान सा बना टप-टप बरसती बूंदों को तकता, धरती से उमड़ती सोंधी गंध को सूँघता ठगा सा खड़ा रहता है. जीवन कुछ और भी तो हो सकता था, कुछ खोज लिए, कोई तलाश लिए, बामकसद और अर्थपूर्ण. सांसें क्यों व्यर्थ सी जाती प्रतीत होती हैं, क्यों लगता है कि हीरा जन्म गंवाया, आकाश भी तो बस है, धरती भी तो बस है, वे भी सिर्फ हों ऐसा क्यों नहीं होता. उनका मन भी बस हो, जैसा है वैसा का वैसा, न एक रत्ती भर इधर न उधर, बस एक पेड़ की तरह सिर्फ होना भर क्या मनुष्य के लिए कभी नहीं, नहीं जी, मनुष्य को तो बड़े-बड़े काम करने हैं, नाम करना है.


मंजिल अभी दूर है, लेकिन रास्ते का पता है सो भय की कोई बात नहीं, पिछले कई वर्षों से वह आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ती आ रही है, अपने मन को समझने लगी है अब. जिस ओर हवा बह रही है उसी ओर मन की नाव नहीं बह जाती बल्कि सोच-समझ कर नियंत्रित कर सकती है, अपने अंदर के विकारों को खूब देख पाती है और मन यदि कोई गलती कर रहा होता है तो बखूबी जानता है, मात्र जानना ही पर्याप्त नहीं है, मानना भी पड़ेगा कि स्वार्थ सिद्धि और आत्म कल्याण य आत्म सुख की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य न बन जाये. अध्यात्म की साधना में व्यक्ति नितांत अकेला होता है, उसे एकांत चाहिये और सांसारिक बन्धनों से जितना मुक्त हो सके उतना ही श्रेष्ठ है. यदि अपने आप को शांत या मुक्त रखना आ गया तो जीवन में कहीं भी दुःख या रोष तो नहीं व्यापेगा.