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Monday, June 10, 2019

जीवन का अंत



दो दिनों का अन्तराल ! परसों लक्ष्मी पूजा का अवकाश था, वे सुबह-सुबह फोटोग्राफी के लिए निकट के एक गाँव में गये. जून ने कमल के फूलों के सुंदर चित्र लिए. आज शनिवार है. सुबह टाइनी टॉटस की मीटिंग में शामिल हुई, शाम को क्लब में मीटिंग है. प्रेसिडेंट बहुत अच्छा बोलती हैं, पर कुछ अधिक ही. वह निरंतर काम में व्यस्त रहती हैं, ऊर्जावान हैं. दोपहर को प्रेस जाना है. मृणाल ज्योति से फोन आया, 'विश्व विकलांग दिवस' के लिए पेपर कार्ड या बुक मार्क बनाने के लिए सुझाव माँगा है. एक परिचिता की माँ अस्पताल में दाखिल हैं, एक के पति की ओपन हार्ट सर्जरी हुई है दिल्ली में.  जून को यात्रा से लौटने के बाद से सर्दी लगी है व गले में खराश है. उसे भी आज पाचक लेना पड़ा है. कल लोभ के कारण खान-पान  में परहेज नहीं रखा. मिठाई खाई, स्कूल में प्रसाद भी लिया और लाल चाय. क्लब में भी औपचारिकता वश कुछ खाना पड़ा. शरीर किसी का भी हो बद परहेजी उसे जरा भी नहीं भाती. नैनी आज अपनी बेटियों के स्कूल की मीटिंग में गयी. सरकारी स्कूल में पढ़ाई को लेकर माता-पिता व शिक्षक पहले से सजग हुए हैं. मोदी सरकार की पहल से कई सुधार देश में हो रहे हैं.  

आज सुबह तैरने गयी. कोच ने आज दोनों हाथों को लगातार चलाने के लिए कहा. तैरना अपने आप में एक सुखद अनुभव है. नाक से पानी आ रहा है, पर कुछ देर में अपने आप ठीक हो जायेगा. वापस आई तो जून ने उपमा लगभग बना ही लिया था. आज बगीचे में गोबर की खाद डलवाने का दिन था. ड्राइवर अपनी बड़ी गाडी लेकर आया था. दोनों माली अन्य दो मजदूरों को लेकर सुबह से शाम तक चार बार में पूरे वर्ष के लिए गोबर ले आये हैं. मृणाल ज्योति के एक कर्मचारी के द्वारा एक दुखद समाचार मिला, स्कूल के एक अध्यापक ने आत्महत्या कर ली है, जो कई दिनों से अस्वस्थ था और छुट्टी पर था. उस क्षण उसका यह वाक्य जैसे असत्य प्रतीत हुआ. मन उसे स्वीकारने को तैयार नहीं था. पर खबर देने वाले ने कहा, मृतक की भाभी ने उन्हें यह सूचना दी है. उसने भाभी का नम्बर लिया, बात की. उसने कहा, सुबह वे उठे तो अध्यापक बिस्तर पर नहीं था. आज उसके भाई उसे लेकर स्कूल आने वाले थे. उसे ढूँढ़ते हुए वे गाय बाँधने के स्थान पर गये तो  वह मृत अवस्था में मिला. पुलिस आयी, शव को पोस्टमार्टम के लिये ले जाया गया है. पिछले कई महीनों से वह अस्वस्थ था. पहले उसकी आँख में कुछ समस्या हुई थी फिर मोटरसाईकिल से गिर जाने के कारण हाथ की हड्डी टूट गयी, यहाँ इलाज भी ठीक से नहीं हुआ. पटना जाकर दुबारा ऑपरेशन हुआ, शायद वह भी ठीक से नहीं हो पाया हो. दुखी होकर उसने अपनी जान ही लेली. स्कूल की सभी अध्यापिकाएं और अध्यापक दुखी हैं और शायद वे भी यही सोच रहे होंगे की काश समय रहते बात कर लेते और उसका दुःख बाँट लेते. उसने लगभग एक वर्ष पूर्व अपनी समस्याओं से उसे अवगत कराया था. उसके बाद ही सभी अध्यापकों के लिए एक कार्यक्रम भी हुआ था, वह खुश था. ऐसा उसने जाहिर भी किया था. पर वह शायद स्कूल में अलग-थलग पड़ गया था. स्कूल में हो रहे बदलावों को भी स्वीकार नहीं पाया था. जो भी हुआ हो पर अब वह उनके मध्य नहीं है. उसने प्रार्थना की, वह जहाँ भी रहे, परमात्मा उसे शांति प्रदान करें.   
 
आज भी धूप तेज है. मृणाल ज्योति से फोन आया, एक अध्यापिका दो सौ दीये बिक्री के लिए उनके घर रखवाना चाहती है, उसने 'हाँ' कह दी है. दीपावली तक अथवा तो उसके पूर्व ही बिक जायेंगे. कोई आये या जाये, संसार अपनी गति से चलता रहता है. दोपहर को बड़ी ननद का फोन आया. उसकी बड़ी बिटिया को ससुराल में कुछ समस्या हो गयी है. बात बढ़ गयी है. वह कह रही थी, नन्हा उसे जाकर ले आये. जून ने मना कर दिया पर बाद में पता चला नन्हा और सोनू दोनों उसे लेने गये थे. उनसे ही बात की, वे लोग घर पहुँच गये थे. भांजी के जीवन में जो भी उलझन है शायद अब उसका कोई हल निकल आये. अब व्हाट्स एप पर संदेश भेजने का मन नहीं होता. इतने सारे ग्रुप हो गये हैं और इतना समय भी व्यर्थ ही जाता है. कल जून ने विवाह के कार्ड्स पर पते के लेबल चिपकाये. अभी कुछ दिनों तक यह कार्य चलेगा. बंगलूरू से वापस आने पर वे कार्ड्स वितरण का कार्य आरंभ करेंगे.

Saturday, August 4, 2018

पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन



सुबह के साढ़े दस बजे हैं, भोजन लगभग बन गया है. मौसम आज अपेक्षाकृत गर्म है. सुबह स्कूल गयी थी, बच्चों को खेल-खेल में ध्यान कराया, अध्यापिकाएं असेम्बली में खड़ी नहीं होती हैं आजकल, प्रधानाचार्या के न होने से स्कूल में ऐसा होना स्वाभाविक है. कल रात बल्कि सुबह-सुबह स्वप्न में कितने चेहरे दिखाई दिए, शायद उसके पिछले जन्मों के चेहरे..कितनी बार वे इस पृथ्वी पर आ चुके हैं. कितना अच्छा हो, वे जन्म तो लें पर अपनी इच्छा से...स्वतंत्र हों कि कब और कहाँ उन्हें जन्मना है. आत्मा स्वतंत्र होना चाहती है, अपनी ख़ुशी के लिये वह किसी पर निर्भर नहीं है. देह को रखने के लिए कितने सारे प्रयत्न करने होते हैं, किंतु स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए देह तो चाहिए ही, मन भी. मन से परे जो वह स्वयं है उससे परिचय भी तो चाहिए. आज सुबह भी टहलते समय बीच-बीच में वे दौड़े, जून को भी अच्छा लग रहा है. वह कल शाम को कह रहे थे, कुछ दिनों के लिए छुट्टी चाहिए, उन्हें किसी आश्रम में जाना चाहिए कुछ दिनों के लिए.

पिछले दो दिन क्लब के कार्यक्रम के लिए पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन बनाने में व्यस्त रही. परसों सुबह एक सखी ने आकर सहायता की, बताया, क्या होता है. जून ने एक बना-बनाया पीपीटी भी भेज दिया था देखने के लिए. दोपहर को जब सेक्रेटरी आई, तब तक कुछ उसका बनाया भी कुछ आकार ले चुका था. कल सुबह स्कूल से आकर नये सिरे से बनाना शुरू किया, काफी तस्वीरें डालनी अभी शेष हैं. आज दोपहर सेक्रेटरी फिर आने वाली है. कल उसके कहने पर एक नाराज सदस्या को फोन किया, उन वरिष्ठ सदस्या का क्रोध अभी तक कम नहीं हुआ है, वह सत्य सुनना ही नहीं चाहतीं, व्यर्थ ही दोनों परेशान हो रही हैं, ईश्वर सभी को सदबुद्धि दे. चार दिन बाद एक कार्यक्रम है, तब तक सभी के मन शांत हो जाएँ और मेल-मिलाप का वातावरण बन जाये. दो-तीन दिन पूर्व बिल्ली का जो बच्चा घर में आ गया था, अभी तक है, उसे दूध दिया, फोटो उतारी, अगले महीने तक रह जाये तो अच्छा होगा. बच्चे आने वाले हैं, उन्हें ख़ुशी होगी. जून की ट्रेनिंग आज भी है, सुबह गुरूजी को सुनकर उन्हें लोगों व परिस्थिति को स्वीकारने की बात समझ में आयी, अच्छा लगा उन्हें.

पिछले कुछ दिन व्यस्तता बनी रही, डायरी नहीं खोली. अभी छोटी बहन से बात हुई. उसने भतीजी का सामान भिजवाया भाभी को, पर उन्हें लगता है कुछ सामान अभी भी छूट गया है. लोग वस्तुओं को ज्यादा और व्यक्तियों को कम महत्व देते हैं, दुख का यह एक कारण हो सकता है. जीवन का हर पल कितना सुंदर है. आज सुबह जो निर्णय लिया कि उसे मन की छाया नहीं बनना है, बल्कि मन को उसकी छाया बनकर रहना है. मौसम बाहर बेहद गर्म है पर यहाँ अंदर सामान्य है. कल शाम को आंधी-तूफान आये थे पर वर्षा नहीं हुई. पूसी भी किसी कोने में छाया में बैठी होगी, लगता है जैसे वह उन्हें पहले से जानती है, शायद वर्षों पूर्व जो बिल्ली गुजर गयी थी, पुनः जन्म लेकर आई हो. उसकी एक पुरानी छात्रा की माँ का फोन आया, उसे अगले महीने कालेज में दाखिला लेना है, मनोविज्ञान ले या मास कम्युनिकेशन, अभी तय करना है. कुछ देर पहले बगीचे से गाजरें निकालीं, फोटो डाला व्हाट्सएप पर, कमेंट्स आने शुरू हो गये हैं, मोबाइल ने दूरियां घटा दी हैं. भोजन में भी कटहल बनाया है बगीचे से तोड़कर. आज छोटे भांजे का पेन ड्राइव से दिया हुआ एओएल का कलेक्शन देखा, गुरूजी के कई प्रवचन हैं, भजन हैं और भगवद गीता का आडियो भी. कई ध्यान की विधियाँ भी हैं, जून को भी अवश्य देगी आज. ब्लॉग पर आज की पोस्ट भी लिखी, सात वर्ष पूर्व वह मृणाल ज्योति की सदस्या बनी थी, समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ता है. उस दिन जल्दी के कारण किचन के दरवाजे का जो शीशा टूट गया था, आज लग गया है. ‘सिया के राम’ देखने की जल्दी थी. राम को प्रेम करती है शूर्पनखा पर उसे अपमानित होना पड़ता है, उसी अपमान का बदला था सीता हरण. कई दिनों से कोई कविता नहीं लिखी, टिककर बैठना ही नहीं हुआ, अचानक कभी प्रेरणा मिलेगी, इस इंतजार में रही तो शायद लिखना हो ही न पाए ! मृणाल ज्योति के लिए भी लेख लिखना है.

Thursday, October 12, 2017

जीवन के बाद


आज वह अकेले ही भाई के घर जा रही है. पिछले दिनों कई यात्रायें कीं, सो यात्रा का कोई भय नहीं है. शाम को सात बजे तक भाई के घर पहुँच जाएगी. बड़ी बहन भी नौ बजे तक आ जाएँगी, ऐसा उन्होंने लिखा है व्हाट्सएप पर. अभी कुछ देर पहले मंझली भाभी ने बताया, उनकी बिटिया एयरपोर्ट पर लेने आएगी. भाई को और बहुत से काम देखने होंगे, कल उठाला है, काफी लोग आयेंगे. पंडितजी ने भी सामान की एक लिस्ट पकड़ा दी होगी. आज सुबह अलार्म सुनते ही नींद खुल गयी, पर पांच-दस मिनट उनींदा बना रहा. महसूस हुआ जैसे भाभी बातें कर रही हैं. उन्होंने कहा, वह बहुत खुश हैं और उनके लिए आंसू बहाने की जरा भी आवश्यकता नहीं है. उन्हें प्रेम से याद करना है, दुःख से नहीं (देह से मुक्त आत्मा कितना सुख अनुभव करती है इसका भी पता चला), उठी तो मन शांत था बल्कि प्रसन्न भी. कल कैसा बुझा-बुझा सा था मन दिन भर ही, जून ने ही नाश्ता व खाना बनाया. शाम का टिफिन व रात के लिए सब्जियों को भी छौंक लगा दिया. वह बहुत ही ध्यान रखते हैं. उसकी भावनाओं का बहुत ही सम्मान करते हैं. भाभी जी के जाने का दुःख उन्हें भी कम नहीं हुआ है. कल शाम को उनकी तस्वीरें निकाल कर एक कोलाज बनाया, उसने एक कविता भी लिखी थी श्रद्धांजलि स्वरूप. इतवार को वह लौटेगी. ये छह दिन जून के बिना बिताने होंगे. मोह-माया के बन्धनों से पार जो होना है ! उसने सोचा पिताजी से बात कर लेनी चाहिए. वह अपनी नाजुक सेहत के कारण नहीं आ पा रहे हैं. उन्हें वृद्धावस्था के कारण क्या तकलीफें हैं, किसी से कहते तो नहीं पर उसके कारण कहीं आ जा नहीं सकते.

सुबह के आठ बजे हैं. कल वह समय पर पहुंच गयी थी, घर का वातावरण भारी था, पर उसके कहने पर सभी ने अपने हृदय की बात कही और कुछ ही देर में भाई सहित सबके मन हल्के हो गये. सुबह कुछ मेहमान आये, फिर सब भाई मिलकर फूल चुनने गये. सफाई वाला आया तो उसे रात का बचा खाना दे दिया गया. सफाई के बाद घर ठीक लग रहा है. सुबह उसकी नींद पांच बजे खुल गयी थी. रात को साढ़े ग्यारह बजे तक नींद नहीं आ रही थी. भतीजी एक बार कमरे में आई तो उसने ट्यूब लाइट जलाई, शायद खराब है, उसने स्विच खुला छोड़ दिया होगा. भाभी जी से संवाद पुनः आरम्भ हो गया. वे हर प्रश्न का उत्तर दे रही थीं. फिर भी उसने पूछा, आप इस बात का सबूत दें कि आप यही हैं, तत्क्ष्ण बत्ती जली-बुझी फिर जल गयी. उसका मन हर्ष से भर गया. उनकी शुभकामनायें उन तक पहुंच रही हैं.


आज सुबह नींद अपने आप ही पांच बजे से कुछ पहले खुली. इस समय साढ़े आठ बजे हैं. भतीजी सो रही है, भांजी नहा रही है. मंझली भाभी ने खाना बनाने के लिए एक नौकरानी का इंतजाम कर दिया है. कल दोपहर सभी लोग नीचे हॉल में चले गये थे, फिर एक घंटा शोक सभा हुई. काफी लोग आये थे, हॉल भर गया था. दुःख की खबर सुनकर किसी से भी आये बिना रहा नहीं जाता. सभी लोग उन्हीं बातों को बार-बार दोहरा रहे हैं, जिन्हें याद करके कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है, पर उनके मन में और कुछ है ही नहीं. अतीत ही तो मन है और भावी की आशंका ही तो मन है. जब तक मन है तब तक चैन नहीं मिल सकता पर मानव इस बात को समझने में बहुत समय लगा देता है, कई जन्म भी शायद. अभी कुछ देर में वे नीचे टहलने जायेंगे. जून घर पर अकेले हैं पर वे ठीक हैं. नन्हा आने वाला था, पर अभी तक उसका कोई संदेश नहीं आया है. कुछ काम न हो तो ध्यान ही करना चाहिए, वही ठीक रहेगा, उसने सोचा.

Thursday, July 6, 2017

सूर्य नमस्कार



आज सुबह उस सखी का फोन आया जो बोलना शुरू करती है तो रुकने का नाम ही नहीं लेती. परसों भी आया था, खुश थी, अपने पिता के आगमन के बारे में बताया था. वह यहाँ आ रहे थे पर कल रात्रि ट्रेन में ही उनकी तबियत बिगड़ गयी और रास्ते में एक स्टेशन पर उन्हें उतारना पड़ा, अस्पताल में उन्होंने देह त्याग दी. उसका भाई जो खुद एक डाक्टर है, वही उन्हें ला रहा था. बताते हुए वह बहुत रो रही थी. कुछ दिनों में दुःख हल्का हो जायेगा और उसका मन इस कमी को सहने की क्षमता प्राप्त कर लेगा. उससे मिलकर आई तो स्वयं का मन भी भर आया था, कुछ शब्द एक कविता के रूप में कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उतर आये.

सुबह अलार्म बजा, दो मिनट बाद ही एक दृश्य दिखा, गेट पर कार खड़ी है. फौरन उठ गयी याद आया शोकग्रस्त परिवार से मिलने जाना है. परमात्मा की कृपा का अनुभव किस-किस तरह होता है, वे समझ नहीं पाते. उस सखी की दोनों भाभियाँ आ गयी हैं, एक नेपाली है दूसरी राजस्थानी, जबकि वह बंगाली है. शाम को जब दुबारा गयी, उसके पिता को ले जाया जा रहा था. वापस आकर कुछ देर साहित्य अमृत पढ़ा, अब गहराई से पढ़ने की आदत तो है नहीं. कुछ कविताएँ अवश्य दिल को छू गयीं. मनसा, वाचा, कर्मणा एक हो जाये कोई तो जीवन खिल उठता है. वे मन से जो विचार करते हैं, वे वाणी में उतरते-उतरते कुछ तो परिवर्तित हो ही जाते हैं और कर्म में परिणत होंगे या नहीं यह भी नहीं जानते हैं. उसका अंतर सृजन की एक असीम सम्भावना है, भीतर गहरे में कोई है जो प्रकटना चाहता है. शब्दों की कमी है, पढ़ना चाहिए तभी नये-नये शब्द मिलेंगे.

आज बहुत दिनों बाद कलम उठायी है. यात्रा से आये चार दिन हो गये हैं. घर व्यवस्थित हो गया है. कल बहुत दिनी बाद स्कूल जाना है, सूर्य नमस्कार सिखाना है. बनारस में एक आयुर्वैदिक पंचकर्म केंद्र में गये. सीखा कि बालों और तन पर नियमित तेल लगाना आयुर्वेद के अनुसार बहुत लाभदायक है. टीवी पर राजनीतिक समाचार आ रहे हैं. सभी नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. सभी जीतना चाहते हैं. देश की चिंता किसी को है ऐसा उनकी बातों से नहीं लगता. आजकल मौसम अच्छा है, शाम को बगीचे में ठंडी घास पर नंगे पांव चलता बहुत भाता है. मनुष्य को खुश रहने के लिए कितना कम चाहिए. कितनी मुक्ति है उसके पास, वह व्यर्थ ही बंधन खोजता है फिर स्वयं ही दुखी होता है. आज पिताजी से बात की, उन्हें नन्हे के विवाह की फ़िक्र है, उसकी बात की तो उन्होंने पूछा.

शाम को अचानक वर्षा होने लगी, मूसलाधार वर्षा ! अभी भी हो रही है. टीवी पर आनंदी चुनाव के लिए प्रचार कर रही है. पूरे देश में चुनावी माहौल है. सुबह समय पर उठी पर साधना ठीक से नहीं हुई, कल रात साढ़े बारह बजे के लगभग नींद खुल गयी, एक पुराना संस्कार जग उठा था. कितने दृढ़ होते हैं संस्कार, पत्थर पर लकीर जैसे, साक्षी भाव से उन्हें देखने पर भी कभी न कभी वे सर उठा ही लेते हैं. मन की सफाई तो ध्यान से ही होती है.



Friday, February 24, 2017

अंतिम यात्रा


आज सत्संग का दिन है, पिछले हफ्ते की तरह सम्भवतः आज भी उसे सद्गुरू और परमात्मा के साथ भजन गाने हैं. दोपहर को नेहरू मैदान गयी, जहाँ मृणाल ज्योति स्कूल के विशेष बच्चे गणतन्त्र दिवस के लिए नृत्य की रिहर्सल कर रहे थे. एक सहयोगी महिला मिलीं वहाँ, सुंदर गोल गोर चेहरे पर लाल बड़ी सी बिंदी, स्नेह भरी ! एक अन्य परिचिता भी आयीं थीं. जून और माँ-पिता जी डिब्रूगढ़ से कल लौटेंगे. दीदी से बात की, उन्हें भी अपने अनुभव लिखने को कहा है, देखें, कब लिखती हैं. कल छोटी बहन के विवाह की सालगिरह है, उसे कविता भेजनी है. अभी-अभी एक सखी का फोन आया वह शाम को सत्संग में उसका साथ देगी.

जून माँ-पिताजी को डिब्रूगढ़ से लाये और यहाँ के अस्पताल में उन्हें छोड़कर सीधा दफ्तर चले गये, वह शाम को जाएगी. उसने सूप की तैयारी कर ली है. कल गाजर का हलवा भी बनाया था, मिठाई भी है, सो शाम का नाश्ता काफी है.
 ‘गणतन्त्र की क्या पहचान
न्याय, समानता, व सम्मान’
कल उसने सभी को गणतन्त्र दिवस पर संदेश भेजे.

कल यहाँ भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम आये थे, आज भी यहीं हैं. जून इसलिए क्लब गये हैं, जहाँ उनका सम्बोधन होगा. आज बसंत पंचमी भी है. माघ शुक्ल पंचमी, भीतर मौन छाया है. मौन ही सत्य है, शब्द जैसे ही जन्मे, कुछ असत्य भी जन्मा साथ ही, अविद्या यही है, विद्या ही आत्मा है, वही परा है. शेष सब क्रीड़ा है, लीला है. मौन में जितना अधिक देर रहा जाये अच्छा है. टीवी पर बापू की कथा आ रही है. अभी नरेंद्र कोहली अपना मत रख रहे थे.

अगला माह आरम्भ हो गया, दो दिन बीत गये, वह लिखने का समय नहीं निकाल पायी. घर और अस्पताल आते-जाते आजकल दिन कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए अभी तक कुछ नहीं लिखा. कल एक दूसरी सखी की सासुमा से मिली, कह रही थीं, औरत तो सहनशील होती ही है, उसके पास धैर्य होता है. छोटी बहन ने बताया, महिला होने के कारण उसे कम वेतन दिया जा रहा है. एक महिला ब्लॉगर लिखती हैं, औरत जब बेगारी करना नहीं चाहती तो उसे बुरा मान लिया जाता है. उसे लगता है, हरेक का सम्मान उसके अपने हाथ में है, कि वह कितनी समझ से काम लेती है, जीवन को एक विशाल दृष्टिकोण से देखती है. अध्यात्मज्ञान के बिना कोई भी पूर्ण संतुष्ट नहीं हो सकता.

फिर दो दिनों का मौन, आज कई दिनों बाद पुनः बदली छाई है. ठंड बढ़ गयी है. जून देहरादून गये हैं. चार दिन बाद आयेंगे. कुछ देर में ड्राइवर आकर माँ का दोपहर का भोजन ले जायेगा.

कल शाम माँ ने देह त्याग दी. देह जर्जर हो गयी थी. पिताजी बहुत रो रहे हैं कल से. इस समय सभी लोग उन्हें लेकर गये हैं. मिट्टी की देह मिट्टी में ही मिल जाएगी और आत्मा अभी तक यहीं होगी या नई देह भी ले चुकी हो, कौन जानता है ? कल रात सभी लोग अस्पताल पहुंच गये थे. जून के मित्र व दफ्तर के कई लोग. एक सखी रात भर उसके साथ ही रही, वह परिवार के सदस्य की तरह अपना फर्ज निभा रही है. सुबह से ही अन्य सभी सखियाँ कुछ परिचित महिलाएं सभी लोग आये. दुःख के इस क्षण में सभी ध्यान रख रहे हैं. दोपहर तक जून व नन्हा भी आ गये. उसका मन पूर्ववत् शांत है. जो कुछ घट रहा है वह ऐसा ही होना था, एक नाटक को जैसे मंचित किया जा रहा है, ऐसा ही लग रहा है, इससे अधिक कुछ नहीं. जो लोग दूर हैं उन्हें भी ज्यादा अंतर नहीं पड़ रहा होगा. दोनों ननदों के मन जरूर यहीं पर होंगे. समय के साथ सारे दुःख कम होते जाते हैं, आने वाले दस दिन उनके जीवन के एकदम अलग से दिन होंगे.

पिछला एक हफ्ता डायरी को हाथ भी नहीं लगाया, न ही समय था न ही मन हुआ. उस दिन शाम को जून और नन्हा शमशान घाट से लौटे तो साथ में उनके दो मित्र भी थे. एक सखी ने दलिया भेजा था ढेर सारा, दूसरी ने सब्जी.. रात को सबने खाया. अगले दिन दोपहर को उसके दो भाई आ गये और जून के एक ममेरे भाई. गरुड़ पुराण का पाठ चल रहा था. दिन भर लोग आते रहे. दोपहर को माँ की एक सखी ने बहुत कुछ भेज दिया था. शाम को भी भोजन बाहर से आ गया. उसके अगले दिन सुबह नन्हा स्टेशन पर दोनों बुआजी को लेने गया डिब्रूगढ़, कल उन्हें छोड़ने भी गया, आज उसे वापस जाना है. श्राद्ध का सारा इंतजाम आराम से हो गया था, सुबह पंडितजी ने हवन किया, फिर पांच पंडितों का भोजन तथा दोपहर बारह बजे से श्राद्ध भोज आरम्भ हुआ. काफी लोग आये, कुछ नहीं भी आये. भाई लोग अगले दिन चले गये थे. उसका मन अशांत रहा. अचेतन में बैठी प्रवृत्तियां उभर कर ऊपर आ गयीं. साधना कुछ हो नहीं पायी. उनके मन में न जाने कितना कुछ भरा हुआ है. जून भी पता नहीं क्या सोचते होंगे. जीवन में कभी उथल-पुथल होती है तो कभी गहराई में दबा विकार भी ऊपर आ जाता है. खबर देता है कि अभी मंजिल दूर है. नौ बज गये हैं, आज भी अभी तक नन्हा सोकर नहीं उठा है, साढ़े ग्यारह बजे उसे जाना है.

पिछले दो दिन पुनः नहीं लिख सकी. आज जून को यात्रा पर निकलना है. बनारस की यह यात्रा दो उद्देश्यों के लिए है. माँ की अस्थियों के विसर्जन के लिए तथा बीएचयू में एक कांफ्रेंस में शिरकत करनी है. पिताजी का मन अभी तक उदास है.             

   

Tuesday, June 21, 2016

टैगोर की गीतांजलि



नन्हे से बात करके हमेशा बहुत अच्छा लगता है. उसकी कम्पनी तरक्की कर रही है. nabbo solutions नाम है उसका, तथा turbodor.in उसके वेबसाइट का नाम है. अगले वर्ष तक सम्भवतः वे संख्या में बढ़ जायेंगे, अभी कुल ७-८ लोग हैं और काम बढ़ेगा तो लोग भी चाहिए. वह जनवरी में आयेगा तब विस्तार से बतायेगा, अभी तो फोन पर हर दिन कोई न कोई बात बताता है. मार्च-अप्रैल में वे उसके पास जायेंगे, जब माँ-पिताजी घर जायेंगे. माँ की सेहत पहले से ठीक है, बस मानसिक रूप से वह कुछ असुरक्षित महसूस करती हैं. पिताजी अपने को व्यस्त रखते हैं और खुश भी !

कितना कुछ पढ़ने को एकत्र हो गया है, ढेर सारी पत्रिकाएँ हैं ही. नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, चित्रा बनर्जी की ‘illusions of palace’, रवीन्द्र नाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ भी लाइब्रेरी से लायी है. हिंदी पुस्तकालय से लायी आठ पुस्तकों में से ‘मीरा’ पर आधारित उपन्यास पढ़ना आरम्भ किया है. दिसम्बर का आरम्भ हो गया है. अभी-अभी एक बुजुर्ग परिचिता का फोन आया, वह अपनी बहू के व्यवहार से दुखी हैं, वह भी उनके व्यवहार से दुखी होगी. कल दोपहर को नैनी आई थी, वह अपनी नई मालकिन के बर्ताव से दुखी थी, यकीनन मालकिन उसके आचरण से दुखी रही होगी. यहाँ उनके घर में काम करने वाली नैनी भी दुखी है अपने पति से, जो उससे नाराज है. इस जगत में सभी तो दुखी दिखायी देते हैं. कोई एक-दूसरे को नहीं समझता. लेकिन यही तो होना ही चाहिए. जब सभी की बुद्धि पर मोह का पर्दा पड़ा हो तो कोई खुश कैसे रह सकता है. उनका मन ही दुःख का जनक है और मन नाम है अहंकार का, अहंकार पुष्ट होता है अपनी छवि को पुष्ट करने से, छवि पुष्ट होती है अपने बारे में सत्य-असत्य धारणाएं पालने से. इच्छाओं की पूर्ति होती रहे तो भी ‘मैं’ पुष्ट होता है. अपने में कोई सद्गुण हो या न हो पर होने का वहम हो तो भी अहम पुष्ट होता है और यह अहंकार दुःख का भोजन करता है. जब वे अपने ही बनाये भ्रम को टूटते देखते हैं तो भीतर छटपटाहट होती है, यह सब सूक्ष्म स्तर पर होता है इसलिए कोई इसे समझ नहीं पाता. वही समझता है जो अपने भीतर गया हो जिसने मन का असली चेहरा भली-भांति देखा हो, जो मन को ही स्वयं मानता हो वह कैसे इसे पहचानेगा. इसलिए जगत में कोई दोषी नहीं है अथवा तो सभी दोषी हैं. संतजन यही तो कहते आए हैं, जो जगा नहीं है, वह दुःख पाने ही वाला है !


लगभग दो हफ्ते पहले जो स्वप्न देखा था आज वह सत्य हो गया. सुबह छह बजे छोटे भाई का फोन आया कि बड़े चाचाजी का कल रात को देहांत हो गया. उनके पुत्र से बात हई तो उसने कहा, रात को बारह बजे उठकर उसने देखा तो उनके हाथ-पाँव ठंडे थे तथा आँख नहीं खोल रहे थे, पता नहीं कब उनके प्राण निकल गये थे. रात को ही एक बुजुर्ग महिला को वह ले आया था जो रिश्ते में स्वर्गीया चाचीजी की मामी हैं. आस-पास की महिलाएं भी आ गयी हैं तथा छोटी बहन को सांत्वना दे रही हैं. उसके पति भी आ गये हैं. 

Wednesday, June 15, 2016

एकांत - एक का अंत


वे कैसे बेहोशी में जीये चले जाते हैं. ऊपर-ऊपर से सब ठीक लगता है पर सब लीपा-पोती ही है, जरा सा खरोंचो तो भीतर की सच्चाई का अहसास हो जाता है. भीतर ज्वालामुखी है, जहर है, क्रोध की आग है, ईर्ष्या है, जलन है और न जाने क्या-क्या है. सारी शुभकामनायें एक झूठ है, सारा स्नेह एक दिखावा है, इन्सान अपने लिए जीता है, अपने स्वार्थ सिद्ध होते रहें तभी तक उसके संबंध सुमधुर हैं. सदियों से, हजारों सालों से संतजन सत्य ही कह रहे हैं. इस संसार से जो आशा लगाता है, उसके हिस्से में दुःख के सिवाय कुछ भी नहीं आता. दुःख से यदि मुक्ति चाहिए तो अपनी आत्मा का आश्रय लेना होगा, परमात्मा का आश्रय लेना होगा, सद्गुरु का आश्रय लेना होगा. जीवन की कटु सच्चाई को कोई जितना शीघ्र समझ ले उतना ही अच्छा है. यहाँ सारे नाते स्वार्थ पर टिके हैं, इन्सान अकेला ही आता है, वह अकेला ही रहता है, और अकेला ही जाता है. इस अकेलेपन को एकांत बनाकर जो अपने भीतर चला जाये और वहाँ सत्य को पा ले तभी उसका जीवन सफल है, वरना तो चिता की आग तक जाते-जाते उसके मन में चिंता की आग कई बार जल-जल कर बुझेगी और बुझ-बुझ कर जलेगी ! इस आग को बुझाने वाला शीतल जल केवल भीतर ही मिल सकता है, उसे तो उस जल का पता मिल गया है !  

आज नई ड्रेस पहनी है जो खास सर्दियों के लिए जून लाये हैं, वह चार-पांच दिनों के लिए गुवाहाटी गये हैं. वह इस कमरे में हैं जहाँ कम्प्यूटर टेबल लगा दी है, जो उनका योग-ध्यान कक्ष है, तथा नन्हा घर आने पर वह यहीं रहना पसंद करता है. पिछली बार आया था तब उसने असमिया, बंगाली तथा पाकिस्तानी गीतों का एक अच्छा संग्रह नेट से किया. आज कुछ देर तक सुना.


जून कल आ रहे हैं, फ्रिज में सब्जियां भी खत्म हो रही हैं और दालें भी, अपने आप भी बाजार जा सकती है पर सोचती है कि एकाध समय यदि कुछ विकल्प ढूँढ़कर काम चलाया जाये तो अच्छा रहे, सभी कुछ हर समय मौजूद हो तो आदमी का मस्तिष्क जड़ हो जाता है. आवश्यकता आविष्कार की जननी है. शाम को यूँ तो क्लब की तरफ से बाल दिवस के लिए उपहार लेने जाना है. इस बार लेडीज क्लब सामान्य बच्चों के लिए केवल एक फिल्म दिखा रहा है और विशेष बच्चों के लिए सैंडविच, उबले अंडे, चार्ट पेपर, साबुन, टॉवल व एक बाथ टब भी दे रहा है, साथ ही कुछ गेंदें व गुब्बारे भी ! बबल मेकर भी दिया जा सकता है. अगले दिन वे भी बाल दिवस मनाएंगे ‘अंकुर’ के बच्चों के साथ, केक या अन्य़ कोई मिठाई वह घर से बना कर ले जा सकती है. उन्हें पेपर प्लेट्स भी खरीदनी होंगी. इस समय माँ-पिताजी चाय पीकर आराम कर रहे हैं. माली बगीचे में काम कर रहा है, चारों ओर सन्नाटा है, एक शांति ! उसके भीतर भी गहन शांति है, तभी भीतर का संगीत सुनाई दे रहा है. आज ध्यान में एक नवीन अनुभव हुआ, कुछ क्षणों के लिए स्वयं का बोध भी जाता रहा. सद्गुरु का शिव सूत्र सुना, कितना अद्भुत ज्ञान है, बात तो वही एक है, लेकिन उसे कहने के हजार-हजार तरीके हैं. सदियों से संत कहते आ रहे हैं, लेकिन हर किसी का ढंग अनोखा है, एक ही चेतना अनंत रूपों में विराज रही है. वह स्वयं अद्भुत है तो उसका बखान करने वाले भी अनोखे क्यों न हों ?

Monday, August 31, 2015

कृष्ण का जादू


आज पूरा एक महीना हो जायेगा बच्चों को आये हुए, कल ननद-ननदोई जी यानि उनके माँ-पापा आ रहे हैं, घर में गहमा-गहमी और बढ़ जाएगी. एक हफ्ता वे रहेंगे. दोपहर को किचन साफ करवाना है. कल व परसों जून ने भी घर की सफाई पर विशेष ध्यान दिया. मौसम अपेक्षाकृत गर्म है, नये कमरे की छत परसों डाल दी गयी, वर्ष के अंत तक सम्भवतः कमरा तैयार हो जायेगा. टीवी पर गुरूजी बता रहे हैं, ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों साथ-साथ चलते हैं. वह यह भी कह रहे हैं कि think globally and buy locally.
फिर एक अन्तराल.. आज सभी वापस चले गये, सासु माँ यहीं हैं. उसे लगा था कि उन सबके जाने पर एक क्षण के लिए भी उसे कोई दुःख नहीं होगा, पर एक पल को मन भारी हो गया, बस एक पल को ही. पिछले एक-सवा महीने से घर में चहल-पहल थी, अब फिर पहले की सी शांति है. वह साक्षी है मन की इस दुर्बलता की, इसका अर्थ हुआ कि वह उनके होने से सुख पा रही थी, तो भीतर का अनंत सुख कहाँ चला गया ? लेकिन विरह का दुःख तो कृष्ण को भी सताता था. प्रेम में विरह स्वाभाविक है ही, सम्भवतः यह विशुद्ध प्रेम है जो हल्की सी कसक बन कर उसे सता रहा है, पर उसे पता है यह क्षणिक है. अभी कुछ देर में वह टहलने जाएगी तथा लौटकर अलमीरा सहेजनी है. टीवी पर एक वक्ता ओजस्वी प्रवचन दे रही है.. ओज और तेज के पुंज बनकर उन्हें समाज में क्रांति लानी है, संबंधों में गर्मी को पैदा करना है. पिछले महीने वह सेवा कार्य में जा सकी, एक दिन ईर्ष्या ने ग्रसित किया तथा एक दिन क्रोध की हल्की अग्नि ने भी, पर इस वक्त जो भीतर घट रहा है वह इस सबसे अलग है, वह है हल्की सी पीड़ा..उसके भीतर यह भी एक दोष है कि दूसरों की गलतियाँ बहुत देखती है. छोटों की तो दूर, बड़ों की भी. मुस्कान पर भी पहरे लगा दिए हैं. गुरूजी कहते हैं, ‘हँसों और हँसाओ’ उनकी बात पर चलना तो उसका फर्ज है, तब जीवन कितना सरल हो जायेगा. चार दिनों का यह जीवन उन्हें इसलिए तो नहीं मिला है कि दूसरों की पुलिस बनें तथा अपने सिर पर कर्जा चढ़ाएं, बल्कि मुस्कुराते-मुस्कुराते जीवन के पथ पर आगे बढ़ने के लिए मिला है. गाना, नाचना, मुस्काना और कविता करना..ध्यान तो इन सबकी परिणति होगा तब ! कल शाम नन्हा भी दो-तीन दिनों के लिए बाहर जा रहा है. 
टीवी पर भजन आ रहा है. तिरछी चितवन, बांकी मुस्कन मेरे नन्द गोपाल, संग में राधा रानी सोहें शोभा बड़ी कमाल ! कान्हा को याद न करना पड़े वह अपने आप ही याद आता रहे तब जो रस आता है..उसकी कोई तुलना नहीं..पर कृष्ण को याद करना पड़े या वह याद आए लाभ तो दोनों ही स्थितियों में है. फिर उसे याद करे, यह प्रेरणा भी तो भीतर से वही देता है न..भगवान भी भक्त से दूर नहीं रह सकता, जब उसे याद न करो तो उसे भी ही उतना ही खलता है. दरअसल वह एक बार जिसे अपना बना लेता है या मान लेता है तो वह अनंत जीवन तक उसका साथ नहीं छोड़ता. तभी तो जब उसका मन संसार में उलझ जाता है तो वह मनमोहन भीतर से कोहनी मारता है, चुटकी काटता है. परमात्मा से प्रेम करो तो वह सौ गुना लौटाता है. वह होगा अनंत ब्रह्मांडों का नियंता..पर भक्त के लिए तो वह उसका अपना है, जिसके गीत गाते-गाते वह थकता नहीं है. जो प्रीत की साकार प्रतिमा है, ऐसा कान्हा उसका मीत है..



Thursday, May 7, 2015

ईसा की वाणी


ईसा ने जगत के लिए अपने प्रेम का प्रदर्शन स्वयं मरकर किया. वह कहना चाहते हैं कि यदि कोई उससे प्रेम करता है तो उसे भी मरना होगा, ध्यान में जो हर दिन मरता है वह आत्मा में जीता है. ईसा भी जी उठे थे इसका अर्थ उसे यही लगता है कि देह की सुख-सुविधाओं को ताक पर रखकर उसे परहित में लगाना है. देह जितना-जितना सधेगी आत्मा उतनी-उतनी जगेगी. ज्यादा सुख भी दुःख का कारण बन जाता है, सुविधा भोगी की आत्मा कभी जागृत नहीं होती. सेवा से ही जीवन का विकास होता है. जीवन में प्रमाद न हो, तंद्रा, निद्रा कम से कम हो, आलस्य न हो, इन्द्रियों की न सुने बल्कि उस चैतन्य की सुने जो भीतर निरंतर देख रहा है, साक्षी है, जो उन्हें चमकाना चाहता है ताकि वे अपना सच्चा स्वरूप देख सकें, जो अनंत है अविनाशी है. ईश्वर से प्रेम है यह सिर्फ होठों से नहीं जीवन से दिखाई पड़ना चाहिए. जीवन तो वैसा ही रहा जैसे पहले था तो सारा प्रेम मात्र मनोधर्म बन कर रह जायेगा !

अभी-अभी पिछले कुछ पन्नों पर लिखे अपने मन के विचार-भाव उसने पढ़े. एक और वर्ष खत्म होने को है. वर्ष के अंतिम माह का दूसरा दिन है. पिछले दो दिन व्यस्त रही, सो कुछ नहीं लिखा. आज भी सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे, और इस समय यानि दोपहर के एक बजे का कार्य भी तय था, फिर डायरी का ध्यान आया. अध्यात्मिक पथ पर ले जाने वाले अपने सद्गुरु की शिक्षाएं वह इसमें लिखती आ रही है. अपने अनुभव भी और अपने मन के भाव भी. अटूट सम्पत्ति जो इस पथ के राही को मिलती है वह है ज्ञान, धैर्य, संतोष और आनंद. सद्गुरु ने उन्हें आनंद और प्रेम से ओतप्रोत कर दिया है. हृदय न जाने किस लोक में रहता है कि भौतिक बातें अब किसी और ही दुनिया की लगती हैं. ईश्वर को कोई यदि अपने जीवन से जोड़ता है तो व्यर्थ के कार्य-कलाप अपने आप ही छूटते चले जाते हैं. सार को सम्भालने की आदत रहती है तब संसार छूटने लगता है. व्यर्थ का शब्द मुँह से निकले तो मन स्वयं को कचोटता है. कोई गलत कार्य न हो, किसी प्राणी की हिंसा न हो, ये सारी बातें मन सचेत होकर देखता है. आते-जाते, खाते-पीते वह मनमोहन याद आता रहता है, आता ही रहता है, उसे अर्पित करके भोजन किया जाता है, उससे इतनी निकटता का अनुभव होता है कि हर कार्य में उसे शामिल किया जाये ऐसे प्रेरणा होती है. संतों के प्रति कृतज्ञता, सम्मान की भावना और शास्त्रों के स्वाध्याय की प्रेरणा जगती है. ध्यान करना नहीं पड़ता होने लगता है. तन हल्का-हल्का सा रहता है, मन खिला-खिला से, वह कान्हा अगर किसी का मीत बनता है तो वह निर्भार होकर रहता है. उसके संकल्प अपने-आप ही पूर्ण होने लगते हैं, कहीं कोई अभाव नहीं रहता !      



Tuesday, January 13, 2015

भागवद पुराण की कथाएं



आजकल धूप आँख-मिचौली खेलती रहती है, मौसम ठंडा-ठंडा सा ही रहता है. उन्होंने मोज़े, स्वेटर पहनना शुरू कर दिया है. आज दोपहर को जब जून ऑफिस चले गये वह प्रमाद वश नहीं उठी तो अजीब सा स्वप्न आया. सड़क पर चलते हुए कुछ खिलौने उससे मिलने आ रहे हैं. स्वप्न चेताने आते हैं और स्वप्न भी तो वही भेजता है. आज सुबह कृष्ण कथा सुनी, उसकी कथाएं अनुपम हैं, अगली बार घर जाने पर वह अवश्य ही ‘भागवद् पुराण’ खरीदेगी. कल रात दीदी का फोन आया. सुबह उसने छोटे भाई को किया था. उसने गर्मी की छुट्टियों में वहाँ आने के लिए कहा है. जून भी घर जाने को कह रहे हैं. हिमाचल जाने का भी उनका मन है. परीक्षाओं के बाद यात्रा का योग काफी प्रबल है. ईश्वर उनके साथ है, वही सही मार्ग सुझाएगा. आज पिता का पत्र भी आया है. कल ‘श्री शंकर देव’ के लिए लिखा लेख हिंदी पत्रिका के लिए भिजवाया. नन्हे की पूर्व परीक्षाएं  चल रही हैं. मात्र दो महीने उसके फाइनल्स में रह गये हैं. आजकल वह स्वयं ही पढ़ता है.

ध्यान में यदि उतरना हो तो एक भी व्यर्थ का ख्याल नहीं आना चाहिए नहीं तो वही एक ख्याल रस्सी बन जाता है जो ऊपर ले आती है. मन पूरा का पूरा खाली हो जाये तो ध्यान गहरा होता जाता है. आज जून ने छुट्टी ली है, साल का आखिरी महिना है छुट्टियाँ व्यर्थ हो जाएँगी, इसलिए आज वह घर पर हैं. उन्हें दोपहर को कोपरेटिव स्टोर जाना है और शाम को नन्हे के साथ कनज्यूमर फोरम भी जाना है. यानि आज का दिन खरीदारी को समर्पित होगा. नये वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स भी उन्हें खरीदने हैं. मौसम आज खिला हुआ है. कल रात स्वप्न में एक घायल महिला को जो खून से लथपथ थी वह अस्पताल ले जाती है. शायद रात को देखी ‘Matilda’ फिल्म के कारण यह स्वप्न आया था. यह किताब उसने काफी पहले पढ़ी थी.

क्रोध कब आकर उन्हें परास्त कर देता है पता ही नहीं चलता. लेकिन यह आध्यात्मिक प्रगति के लिए बहुत बड़ी बाधा है. कल शाम जून ने उसकी बात नहीं सुनी तो चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही उसे क्रोध आया तो था. मन, वाणी और क्रोध के वेगों को रोकना ही होगा, अन्यथा वे जहाँ है वहीं रह जायेंगे बल्कि पीछे जाने का डर अधिक है. इन सारे वेगों को नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है कृष्ण का नाम. उसकी स्मृति बनी रहे तो कोई ताप नहीं सताता भौतिक जगत में कोई न कोई दुःख तो रहेगा ही, जब तक ईश्वर की स्मृति बनी रहेगी तभी तक वे इन दुखों से अलिप्त रह सकते हैं ! उसे दिल से चाहो तो वह विश्रांति के रूप में तत्क्षण अपना अनुभव करा देता है. आत्मा जो उसी का अंश है उसी की भाषा बोलती है परदेश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाये तो कैसी ख़ुशी होती है. मन जब शांत होकर आत्मा का आश्रय लेता है तो वह भी उसी की भाषा बोलता है.


Tuesday, November 25, 2014

अज्ञेय की कविताएँ


दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने वार्ता को असफल नहीं बताया है, उम्मीद की किरण अभी भी रोशन है. कल रात से वर्षा हो रही है, मौसम कल जितना गर्म था आज उतना ही सुहावना है. बाबाजी आज कीर्तन करवा रहे थे. उससे पहले टैगोर की जापान यात्रा का एक संस्मरण सुनाया. गुरूमाँ ने ऐसे नृत्य का जिक्र किया जो किया नहीं जाता, हो जाता है. बहुत दिनों से उसके साथ ऐसा नहीं हुआ है शायद आज शाम को ही इसका अवसर आए, क्योंकि वर्षा यदि थमी नहीं तो घर पर ही टहलना होगा जो उसके मामले में कैसेट लगाकर थिरकना होता है. कल दोनों पत्र भी लिखे और दीदी को जवाब भी दिया है. कल रात छोटी बहन व पिता से बात हुई. आज दोपहर स्टोर की सफाई करनी-करवानी है.

सुबह-सवेरे भजन जब अपने आप होने लगे, मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग वे करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो उन्हें एक-दसरे से अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बना है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है, बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो यह जो गड्डमड्ड, खिचड़ा हो गया है, देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना, छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. उन्हें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी वे मुक्त हैं.

आज अमावस्या है. सुबह से ही मन में उत्साह है. एक वक्त के भोजन में फलाहार लेना है आज, जितना हो सके उतना व्रत पालना ही चाहिए. कल दोपहर और शाम को अज्ञेय की कविताएँ पढ़ीं, अनुपम हैं और भावना के उस लोक में ले जाती हैं जहाँ प्रेम है, शरद की चाँदनी, टेसू के फूल हैं, जहाँ इष्ट की आराधना है, “मैं संख्यातीत रूपों में तुम्हें याद करता हूँ” अज्ञेय की कविता अंतर को गहरे तक छू जाती है. अभी-अभी गुरू माँ ने कहा ईश्वर को प्रेम करने का अर्थ संसार का विरोधी हो जाना नहीं है. जब जीवन में प्रेम होता है, तब वह सभी के लिए होता है. उसमें समष्टि समा जाती है. ईश्वर, प्रकृति, मानव उससे कुछ भी अछूता नहीं रहता, प्रेम में महान ऊर्जा छुपी है, वह आस-पास की हर वस्तु को एक नये दृष्टिकोण से दिखाती है. उसे लगता है, मन को एकाग्र करना हर वक्त संभव नहीं पर यह सम्भव है कि इस बात का बोध रहे कब मन एकाग्र है और कब एकाग्र नहीं है, और कब एकाग्र नहीं है ? जब मन गुण ग्राही होता है, बुरी से बुरी परिस्थिति में भी कोई न कोई अच्छाई खोज लेता है, तब वह एकाग्र होना सीख लेता है. उसने प्रार्थना की, आज का दिन ईश्वर के प्रति समर्पित हो, दिन भर वह उसकी याद अपने मन में बनाये रखे, सभी के प्रति मंगल कामना से मन युक्त रहे !   



Friday, October 31, 2014

बादल का टुकड़ा


वाणी मधुमंडित, सुवासित हो जिसमें अहंकार की गंध न हो, स्वार्थ की महक न हो. ऐसी वाणी निर्वासनिक मन से ही उपजती है. निष्कपट भक्ति भी ऐसे ही मन में जगती है. प्रार्थना भी ऐसी ही भावदशा में  की जा सकती है. ऐसा मन सभी तरह के विक्षेपों को पचाने योग्य बनता है. कल रात वह प्रार्थना करते-करते सोई. स्वप्न में कन्याकुमारी के दृश्य देखे. सुबह उठी तो मन शांत था. बाबाजी कहते हैं देर सबेर ईश्वर सबके हृदयों में अवश्य प्रकट होगा, उसके स्वागत के लिए मन का दरवाजा हमेशा खुला रखना होगा, मन को निष्कपट, स्वच्छ और कोरा रखना होगा. कामना हर पल नीचे गिराने का प्रयत्न करती है और प्रार्थना ऊपर उठाने का. कल शाम कुछ पुरानी कविताओं को पूर्ण किया. कादम्बिनी को भी दो कविताएँ भेजी हैं, उसके अंतर में कई कविता संग्रह अभी भी दबे हुए पड़े हैं. थोड़ा सा प्रोत्साहन मिले तो बाहर आ जायेंगे, न भी मिले तो कोई हर्ज नहीं, अपने सुख के लिए कविता रचना तो सदा ही जारी रहेगा !

कल अंततः उसकी इच्छा फलवती हुई जून और वह मार्किट गये, उसके जन्मदिवस पर पहनने के लिए हल्के हरे रंग की एक ड्रेस लाये, थोड़ी लम्बी है उसे ठीक किया जा सकता है. आभी आज और कल दो दिन का वक्त शेष है. कल उसने अपना इमेल अकाउंट खोला. आज सुबह हरिद्वार मामीजी के लिए पहले इमेल लिखा, अभी भेजा नहीं है. नन्हे का आज टेस्ट है. गर्मी पूर्ववत है. सुबह नींद खुली तो स्वप्न में कम्प्यूटर, इमेल यही सब देख रही थी, उसके चेतन मन से ज्यादा अवचेतन मन पर इसका प्रभाव पड़ा दीखता है. आज बाबाजी और गोयनका जी दोनों को कपड़े प्रेस करते-करते सुना, एक जो कहता है दूसरा उसका विपरीत कहता हुआ सा लगता है पर दोनों का लक्ष्य एक है. गोयनका जी का मार्ग ज्यादा कठिन है, बाबाजी का बिलकुल सहज ! सहज भाव से अपने भीतर के आत्मदेव पर भरोसा करना है. सुख में ललक पैदा न हो बल्कि सुख बांटने की प्रवृत्ति हो और दुःख में सिकुड़े नहीं, सम भाव रहे यही उनकी शिक्षा का सार है. जैसे-जैसे व्यवहार में समता आती जाएगी, ममता छूटती जाएगी और एक दिन मन सुख-दुःख से ऊपर उठ जायेगा. देह या मन में कोई पीड़ा हो तो यह याद रखना होगा कि यह अनित्य है, सदा रहने वाली नहीं है. परसों उसके जन्मदिन के दिन ही लेडीज क्लब की मीटिंग है, एक सीनियर सदस्या का विदाई दिन भी है. पर वह नहीं जा पायेगी, दो साल पूर्व जब वह जाते-जाते रह गयी थीं, उनके लिए जो लेख लिखा था वह ऐसे ही रखा रह जायेगा. जून और नन्हे को मनाना आसान नहीं होगा, सो जो हो रहा है उसे होने देना चाहिए, वैसे भी इतने वर्षों में कुल मिलाकर दस-पन्द्रह बार से ज्यादा नहीं मिली होगी उनसे, उनके लिए शुभकामनायें घर से ही भेज सकती है.


जो हमारे पास है उसका महत्व जानें और जो नहीं है उसके पीछे न भागें तो जीवन में सुख ही सुख है. लेकिन जो भी है वह सदा के लिए नहीं रहेगा यह भी याद रखना है. लक्ष्मी सदा खड़ी रहती है और सरस्वती सदा बैठी रहती है. ज्ञान कभी साथ नहीं छोड़ता लेकिन धन-दौलत व वस्तुएं साथ छोड़ भी सकती हैं. सत्संग को सुनकर गुनने से ही उसका लाभ मिलता है. “एक बुढ़िया थी वह बचपन में ही मर गयी”. यह कहानी बताती है कि सारी उम्र लोग नादान ही बने रहते हैं. ईश्वर स्मरण बना रहे तो यही नादानी समझदारी में बदल जाती है. कल वह ध्यान में ज्यादा देर तक नहीं बैठी, इतर कार्यों में लग गयी सो रात को मन अशांत था, नींद नहीं आ रही थी, कोई कारण नजर नहीं आ रहा था. आज बाबाजी के संगम तट पर दिए गये प्रवचन की रिकार्डिंग सुनाई गयी. हजारों लोगों को पल में हँसा व रुला सकने की सामर्थ्य है. वह लोगों के मन में स्थित ईश्वर को जगा देते हैं. मन उच्च केन्द्रों की ओर चला जाता है, दुनियावी बातें सारहीन लगती हैं. सभी के प्रति मन प्रेम से भर जाता है. आज सुबह उसने बगीचे में काम करने की इच्छा व्यक्त की पर धूप तेज थी, न जाने कहाँ से बादल का एक टुकड़ा आ गया. हवा भी बहने लगी. आधा घंटा वह काम कर सकी. कल उसके जन्मदिन पर भी मौसम अच्छा हो जायेगा, ऐसा उसका पूर्ण विश्वास है.   

Monday, October 27, 2014

सत्यकाम-धर्मेन्द्र की फिल्म


सुख लेने की इच्छा का त्याग कर सुख देने की कला सीख लें तो अंतर से सुख का वास्तविक स्रोत उजागर होगा, जिन वस्तुओं से भौतिक सुख मिलता है उन्हें बांटने से भी आंतरिक सुख मिलेगा. बाबाजी बहुत सरल शब्दों में मन को संयमित करने के उपाय बताते हैं, ऐसे व्यक्ति इस धरा पर हैं तभी यहाँ रौनक है वरना धरती पर सत्य के लिए स्थान कहाँ हैं. कल ‘सत्यकाम’ फिल्म देखी, वर्षों पहले इसका नाम सुना था, धर्मेन्द्र की प्रसिद्ध फिल्म है. रात को देखकर सोयी थी सपने में भी वही देखती रही. सत्य के कारण कितने दुःख उन्हें झेलने पड़े लेकिन सत्य ने ही अंततः उनकी रक्षा की. जून को भी अच्छी लगी, देर रात तक जग कर वह कम ही टीवी देखते हैं. कल गोयनका जी भी आये थे, कहा, “प्रतिक्रिया ही सुख-दुःख का कारण है, यदि पहले क्षण में कोई प्रतिक्रिया न करे तो संवेगों से बच सकता है.”

आध्यात्मिकता आखिर है क्या ? मन को खाली करना ही तो, ऐसा मन फूल की तरह हल्का होगा, निर्झर की तरह निर्मल होगा, स्फटिक के समान चमकीला होगा और ऐसे मन में उठा संकल्प शुद्ध ही होगा और वह पूर्ण भी होगा. धर्म भीतर है, उसमें टिकने की कला भी आध्यात्मिकता है, उसके बाद ही जीवन में उत्सव का आगमन होता है, अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाने का प्रयत्न होता है.

आज जैन मुनि को सुना, “जीवन रहते ही जीवन का बहीखाता सही कर लेना चाहिए, जीवन का हिसाब-किताब यदि ठीक रहेगा तो मृत्यु के महोत्सव को मनाने की प्रेरणा जगेगी. मरण यदि सजगता में हो तो मन शरीर से अतीत हो जाता है और आत्मा में टिक जाता है. राम को घासफूस की कुटिया में भी चैन था और रावण को स्वर्ण महलों में भी नींद नहीं आती थी. पर न वह कुटिया रही न महल, क्योंकि यहाँ सब नश्वर है. यह मकान भी मरघट है हर क्षण प्राण मर के घट रहे हैं”.  इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. सुबह उठे तो पिता को फोन किया. उन्होंने मकान खरीदने वालों के बारे में बातें कीं, अपनी तथा परिवार के अन्य सदस्यों की एक वाक्य में ‘सब ठीक है’ कहकर ही टाल दिया. छोटी बुआ को फोन करने का मन था पर नहीं किया. एक सखी ने कल शाम ‘रेकी’ के कोर्स के लिए पूछा था पर जून साफ मना कर रहे हैं. उसे लगता है वह भी इस वक्त इसके लिए तैयार नहीं है. आज वह पुस्तक फिर से पढ़नी शुरू की है. कल शाम नन्हे के न पढ़ने पर सखी की टिप्पणी ने उसे दो पल के लिए विचलित कर दिया था. पढ़ाई की कोई सीमा नहीं है, दसवीं में तो बिलकुल नहीं. इस वक्त वह टीवी देख रहा है. गणित और हिंदी कुछ देर पढ़ाया पर समय का पूरा उपयोग नहीं हुआ. आज कुछ नया लिखा भी नहीं.

जीवन क्या है ? इसका उत्तर छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ दास ने दिया – गति और सतर्कता ही जीवन है, प्रवाह में ही मानव प्रगति को पा सकते हैं. जिज्ञासा और जागरूकता भी जीवन है. जिस दिन हृदय में जिज्ञासा न रही वह मृत हो जायेगा. संक्षेप में कहें तो गति, जिज्ञासा और प्रयत्न ही जीवन है. आज भी वही कल का सा मौसम है. कल शाम एक फिल्म देखी, ‘हमारी बहू अलका’. अभी सुबह के आठ बजे हैं पर पंखे से गर्म हवा आ रही है. बाबाजी ने आज कहा कि शीत और ग्रीष्म को सहने की शक्ति भी शरीर में उत्पन्न की जा सकती है. गीता में भी सुख-दुःख के साथ शीत-ग्रीष्म का जिक्र भी आता है. साधक को इन छोटी-मोटी बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि मन को सम रखने का प्रयत्न सदा करते रहना चाहिए.


Monday, September 15, 2014

यादों की परछाइयाँ




 ध्यान वह स्थिति है जहाँ मन नहीं रहता अथवा तो मन समाहित हो जाता है, न भूतकाल की चिंता न भविष्य की कल्पनाएँ ! संसार समय की बदलती हुई स्थिति को दर्शाता है. ध्यान समय, संसार और विचार तीनों से पार ले जाता है. ध्यानस्थ मन ही ज्ञान का अधिकारी हो सकता है. ध्यान एक तरह से मन का स्नान है, मन उज्ज्वल होता है, हल्का होता है, स्वस्थ होता है अर्थात स्व में टिक जाता है, स्वच्छ होता है अर्थात निर्मल होता है. आज बाबाजी ने कितनी सुंदर बातें कहीं, जगत का अभिन्न उपादान ईश्वर है, जो इस जगत को ईश्वरमय जान लेता है उसका ध्यान टिकता है. आज सुबह छोटी बहन से बात की उसे इसी माह पुनः फील्ड ड्यूटी जाना है, अगले माह ही पूरा परिवार पुनः मिलेगा. कल शाम जून ने उसकी डायरी पढ़ी, वर्षों बाद उन्होंने ऐसा किया है. नन्हे की आज बायोलॉजी की प्रयोगात्मक परीक्षा है. कल रात खाने के समय उसका मनपसन्द कार्यक्रम टीवी पर देखने को नहीं मिला तो कैसे चुप हो गया था, हरेक के पास नाराजगी जाहिर करने का कोई न कोई उपाय है.

इस क्षण ऐसा लग रहा है, सब ठीक है. आज से दो हफ्ते पहले आज ही के दिन वे कितने उदास थे. एक बार पढ़ा था कि जब भी किसी दुःख या विपत्ति का सामना करना पड़े तो उसे दो हफ्ते या दो महीने बाद कल्पना में देखना चाहिए कि उस वक्त उसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा. दुःख की घड़ी में बुद्धि भ्रमित हो जाती है, सही निर्णय लेना तो दूर सही वार्तालाप भी नहीं कर पाते. अब माँ की यादें ही उनके साथ रह गयी हैं, वह स्वयं पूर्ण विश्रांति पा चुकी हैं. उसने याद करने की कोशिश की, पिछले वर्ष या पिछले महीने आज के दिन वे किस मनः स्थिति में थे. दुःख या सुख का अनुभव किया होगा किन्तु कुछ याद नहीं आया, वह समय बीत गया परन्तु वे फिर भी हैं ऐसे ही आज के सुख-दुःख भी बीत जाने वाले हैं. वे साक्षी भाव में उसे देखते चलें. उसमें डूब कर अपनी मानसिक, आत्मिक व शारीरिक ऊर्जा का हनन न करें. सन्त कहते हैं, सारा संसार सपना  है और जो उसे देखने के योग्य बनाता है वह परमात्मा ही अपना है. कल उसने बैक डोर पड़ोसिन के यहाँ, जो घर में ही पार्लर चलाती है, हेयर कट करवाए. बहुत अच्छे तो नहीं कटे पर जून ने कहा ठीक हैं, और उसके जीवन की नैया की पतवार तो उनके ही हाथ में है. गुजरात में कल फिर भूकम्प के झटके महसूस किये गये, भयभीत और पीड़ित लोग और घबरा गये. ईश्वर इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है. धीरे-धीरे वहाँ जीवन सामान्य होता जा रहा था. पुनर्निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका है.

कल सुबह जून को उसने जब परेशान होकर कहा कि छोटे भाई ने फरवरी में आने के लिए मना किया था अपने बच्चों की परीक्षाओं के कारण और इस विषय में बहनों से ही उसकी बात हुई है तो वे सोच में पड़ गये. उन्होंने भी तो नन्हे की परीक्षाओं को महत्व देते हुए उनके बाद ही यात्रा करने का निर्णय लिया था. दोनों का ही दिन सोच-विचार में बीता, पर शाम होते-होते उन्होंने निर्णय ले लिया कि अब इस बात को यहीं छोड़कर आगे बढ़ने का वक्त आ गया है. बड़े भाई का फोन आया, उन्हें उसकी फ़िक्र है ऐसा लगा, उन्होंने पुनः फोन करने को कहा है. कल रात वे ठीक से सो पाए, फिर भी एक स्वप्न तो उसने पिछली कई रातों की तरह देखा जो माँ से जुड़ा था. अभी अभी ससुराल से फोन आया वे लोग इस महीने के अंत तक नये मकान में चले जायेंगे.

कल रात छोटे भाई का फोन आया, उसके अनुसार उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि आने को मना करना इतना बुरा लगेगा. उन्होंने सामान्य तौर पर यह बात कही थी. छोटी बहन ने माना कि उसने ही पिता को इसके बारे में बताया था. जून ने भी सभी से बात की, इतने दिनों का उहापोह खत्म हो गया. उसने दीदी को भी धन्यवाद देने के लिए फोन किया जिन्होंने भाई को नूना की मनः स्थिति से परिचित कराया पर वह पूजाघर में थीं, उसने जीजाजी को संदेश दे दिया.  

आज सुबह बहुत दिनों बाद वे आराम से उठे, क्यों कि रात आराम से बीती. कल ‘जनगणना’ कार्यालय के कर्मचारी आये, उसने उनके प्रश्नों के उत्तर दिए. उनका घर जाना अब तय हो गया है. मन जैसे हल्का हो गया है. इस दौरान उन्हें भाई व दीदी के शहर भी जाना है. हो सका तो एक दिन के लिए मामीजी से मिलने उनके शहर भी जाना है. बड़ी बुआ जी के साथ भी एक दिन बिताना है. पैतृक निवास पर भी जाना होगा. चचेरी बहन से मिलना है. फुफेरी व ममेरी बहन से फोन पर बात करनी है. छोटी बुआ से भी वह बात करेगी, हो सका तो रास्ते में मासी के घर भी जाएगी. वह उन सब के साथ मिलकर माँ की उन यादों को बांटना चाहती है जो उनके मध्य साझी हैं. इसके अलावा अपनी किताब के लिए प्रकाशक की तलाश करनी है.   


दुःख का अस्तित्त्व


कल शाम दीदी व छोटी बहन का फोन आया, वे दोनों टहलने निकलीं थीं तो पीसीओ से फोन कर लिया, जबकि घर पर दो फोन हैं. कल तेहरवीं है, जिस पर उसे जाना चाहिए था पर परिस्थिति वश नहीं जा पा रही है. उसका अपने परिवार के प्रति कर्त्तव्य आड़े आ गया. घटनाएँ कब क्या मोड़ लेंगी कोई कुछ नहीं कह सकता. अब माँ को याद करके उसे दुःख नहीं होता बल्कि शांति का अनुभव होता है. वह अब मुक्त हैं तथा हर समय उसके पास हैं. उनके बचपन से लेकर अपने बचपन तक फिर अपने बचपन से उनकी वृद्धावस्था तक के सारे चित्र सजीव हो उठते हैं. जून आज भी हमेशा की तरह पहले उठे वह एक स्वप्न देख रही थी जिसमें वह अपना मान तथा धन दोनों बचाने में सफल हो जाती है. एक लुटेरा उसके पीछे था पर वह स्वयं अपमानित होता है.

उसने सुना, अहंकार का त्याग और समर्पण की भावना का विकास ही शांति प्रदान करता है. अहंकार और स्वाभिमान में अंतर है, स्वाभिमान की आहुति देने के बाद तो पास में कुछ भी नहीं रह जाता. एक सखी ने पूछा वे घर जा रहे हैं या नहीं, यह उनके लिए एक अबूझ प्रश्न बन गया है जिसका उत्तर समय ही बतायेगा. सुबह-सुबह एक अन्य का फोन आया. कल सुबह दो परिचित महिलाएं मिलने आई थीं. दुःख इन्सान को इन्सान से जोड़ता है. इस समय सुबह के नौ बजे हैं, आज धूप तेज है, पिछले दिनों दोपहर तक कोहरा रहता था फिर मद्धिम सी धूप के दर्शन होते थे. अभी उसे भोजन तैयार करना है फिर रियाज और दोपहर से कविताएँ टाइप करने का काम. कल का दिन तो गंवा दिया पर अब और नहीं, कहीं उसके इस आलस्य के कारण उसका सपना अधूरा न रह जाये और जिन्दगी की शाम आ जाये. मृत्यु हर मोड़ पर बाट जोहती खड़ी रहती है. जीवन इतना अल्प, इतना कीमती है कि हर पल का सदुपयोग होना ही चाहिए.

आज सुबह एक स्वप्न देखा जिसमें वह अकेले विदेश यात्रा पर जा रही है. माँ को भी देखा. जून ने उठकर विश किया और दफ्तर जाने से पूर्व उसने उन्हें फिर उस फोन की याद दिलाकर नाराज कर दिया. ससुराल से फोन आया था, पिता को भी यही उम्मीद थी कि जून अवश्य तेहरवीं में शामिल होने गये होंगे. कल छोटी बहन का फोन आया उसने किन्हीं मामीजी से उसकी बात करवाई, वह पहचान नहीं पायी. सभी रिश्तेदार वहाँ आये हुए हैं. छोटी बुआ व ममेरी बहन भी आए हैं, उसे एक बार फिर न जा पाने का दुःख हुआ, शायद जीवन भर यह अपराध बोध उसे सालता रहेगा. बाबाजी कहते हैं, सुख-दुःख मिथ्या हैं सिर्फ मानने से होता है न मानें तो इसका कोई अस्तित्व  ही नहीं है. यदि वह जाती तो यहाँ जून और नन्हा परेशान रहते किसी को सुखी करके किसी को दुखी होना ही पड़ता, फिर जो नितांत उसके अपने हैं उन्हें दुखी करने का उसे क्या हक है ? कल स्वप्न में बहुत दिनों बाद कॉलेज भी देखा, गणित के अध्यापक को भी. जैसे सुबह नींद खुलने पर स्वप्न टूट जाता है वैसे ही ये स्मृतियाँ भी कुछ वर्षों बाद भुला दी जाएँगी. जीवन फिर भी चलता रहेगा. नन्हा आज फिर देर से उठने के कारण हाथ-मुंह धोकर ही स्कूल गया है, उनके समझाने का उस पर कोई असर नहीं होता, कभी-कभी जिन्दगी इतनी मुश्किल हो जाती है कि.. कल शाम फिर दो मित्र परिवार मिलने आये थे, वे भी उनके घर जाने के बारे में पूछ रहे थे. भविष्य के गर्भ में ही छिपा है इसका उत्तर, कौन जाने तब तक असम में भी भूचाल आ जाये, उन्हें इसका जवाब अपने आप ही मिल जायेगा.
कल रात पहले छोटी बहन का फोन आया, फिर मंझले व बड़े भाइयों का, उन्हें कल उसका वह पत्र मिला जिसमें “हमारी माँ - एक सम्पूर्ण व्यक्त्तित्व” में माँ के बचपन से लेकर जैसा उन्हें देखा, समझा लिखा था. इतने दिनों से संबंधों में जो बर्फ जम गयी थी पिघली. सुबह उठते ही पिता को फोन किया, वह चाय बना रहे थे. माँ के बिना रहने की आदत उन्हें धीरे-धीरे पड़ती जा रही है. आज फिर बदली छाई है, नन्हे की आज संगीत की लिखित परीक्षा है. सोमवार से मुख्य विषयों की परीक्षाएं शुरू हो रही हैं.   


  

Monday, September 8, 2014

सीता का वनवास


फरवरी महीने का प्रथम दिन, मन की तरह आकाश पर भी बादल छाये हैं. जून आज मोरान गये हैं, शाम तक आयेंगे. सुबह वे जल्दी उठे. जून के जाने के बाद उसने फोन पर बात की, पिता अभी सोकर नहीं उठे थे, सो बात नहीं हो पायी. दीदी से बात की, उन्होंने एक अच्छी बात बतायी कि सभी लोग जो जीवित हैं अभी इस संसार में स्वप्न देख रहे हैं, माँ का स्वप्न पूरा हो गया, उनकी नींद खुल गयी है और वह इस सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पा गयी हैं. कल शाम वे टहलने गये तो मन में भरा विषाद फूट पड़ा. जून ने उसे सहारा दिया, कहा कि सुबह सभी से बात करे. नन्हे की परीक्षाओं के बाद फरवरी में घर जाने के लिए राजी किया. उन्हें उसकी मनः स्थिति का पूरा भान है. माँ कभी भी कोरी भावुकता की पक्षधर नहीं थीं. मोह, माया और ऊपरी दिखावा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. जो उचित हो और जिससे किसी का अहित नहीं होता हो सोच-विचार कर ऐसा काम ही करना चाहिए.

उसके भीतर कभी ख़ुशी का एक झरना हुआ करता था, जिसमें से ख़ुशी रिस-रिस कर अधरों पर, कभी आँखों से झलका करती थी. दुनिया हसीन लगती थी पर आज वह सोता कहीं सूख गया सा लगता है. भीतर एक खालीपन उतर आया है और साथ ही एक नया  स्रोत उभर आया है, खरे पानी का स्रोत. आँसूं बेबात ही छलका करते हैं. दिल कमजोर हो गया है. दुनिया पर से विश्वास हटने लगा है. भूचाल की त्रासदी से पीड़ित लोगों को देखकर सिहरन होती है, उनका दुःख अपना सा लगता है. यह इतना सारा दुःख कहाँ से आ गया है. माँ जो इन सब दुखों से परे चले गयी हैं, उनके जाने से भी जिन्दगी में एक खालीपन आ गया है. कल एक परिचिता मिलने आयी, रोने लगी और फिर उसे चुप कराना पड़ा. संभल-संभल कर फिर कुछ ऐसा हो जाता है. जून उसके मन की हालत  समझते हैं और हर क्षण वह साथ देते हैं. लेकिन यह खालीपन बाहर से नहीं भरेगा, भीतर से ही इसे भरना होगा. बाहरी संबंध तो माने हुए हैं, स्थायी नहीं हैं. समय के साथ बदलते रहने वाले हैं. जीवन को पुनः परिभाषित करना होगा. स्वयं के सहारे जीना होगा. जीवन की क्षणभंगुरता को कौन समझ सकता है, जानते तो सब हैं. अन्यों से किसी बात की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. कुछ भी स्थायी नहीं है. इतने दिनों से जो उसके मन में साध पल रही थी कि कोई तो कह दे, माँ नहीं है तो दुःख मत करो, हम तो हैं. पर कोई नहीं कहेगा. सभी बेबस हैं, जैसे वह खुद !

आज कोई फोन नहीं आया. मन स्थिर है. टीवी पर ‘उत्तर रामायण’ आ रहा है. लक्ष्मण को सुमन्त्र और राम को गुरु वसिष्ठ ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं. सीता को वनवास होगा, राम को पत्नी वियोग सहना होगा यह सब बातें सुमन्त्र को पहले से ही ज्ञात थीं, फिर भी ऐसा होने पर वह दुखी थे, विह्वल थे. ऐसे ही सबको पता था कि हरेक की मृत्यु निश्चित होती है, कि माँ की हालत ठीक नहीं थी, कि उन्हें अंततः जाना ही था फिर भी इससे उनके जाने का दुःख कम तो नहीं हो जाता. वे सभी संवेदना की डोर से बंधे हैं. उनके मन सुख-दुःख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के वाहक हैं. दुःख के वक्त कोई किस तरह अपना कर्त्तव्य धर्म निभाता है वही उसके चरित्र को दर्शाता है. वह इस वक्त अपने आप को दुखी नहीं मान रही. रामायण के पात्रों ने जैसे उसकी चोट पर मरहम रख दिया है. एकाएक भूचाल आने पर जैसे सारे रास्ते और पथ गायब हो जाते हैं वैसे ही दुःख आने पर प्राणी हतप्रभ हो जाता है. ऐसे में उसे ज्ञान व दर्शन की बातें ही सहारा देती हैं. भूचाल से पीड़ित लोगों में नये जीवन की आशा का संचार करना होता है. उन्हें पुनः नये पथों का निर्माण करना होगा.


  

Friday, September 5, 2014

कोहरे का जाल


आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. उस दिन जून उसे छोड़ने एयरपोर्ट गये थे. वह दिल्ली पहुंच गयी थी शाम साढ़े सात बजे, घर पहुंचते नौ बज गये. अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे ही भाई के साथ टैक्सी स्टैंड गयी. कोहरा घना था और स्टेशन तक के रास्ते में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, लग रहा था कोई स्वप्न चल रहा है. उड़ान के दौरान भी और ट्रेन में भी सारा वक्त मन में एक वही ख्याल मंडरा रहा था. कोहरे के कारण उनकी ट्रेन बहुत रुक-रुक कर चल रही थी. दोपहर बाद वे गन्तव्य पहुंचे, मंझला भाई लेने आया था पर उसकी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया, भागदौड़ में उसे भरवाने का वक्त ही नहीं मिला था, बस से वे अस्पताल पहुंचे. जहाँ शेष सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. थोड़ी देर में ही अस्पताल गयी, उनको ऑक्सीजन दी जा रही थी और भी कई नलियां उनके विभिन्न अंगों से जुडी थीं, देखकर उसकी आँखें भर आयीं. वह उसे देखकर पहले तो खुश हो गयी थीं, जिसे उन्होंने ताली बजकर भी दर्शाया पर उसके आँसूं देखकर दुखी हो गयीं. वह बोल नहीं सकती थीं. उन्हें इतनी पीड़ा सहते देख सभी दुखी हैं पर कोई कुछ नहीं कर सकता. उसके बाद वह चार दिन वहाँ और रही. एक बार माँ ने उसका लिखा संदेश पढ़ा और आशीर्वाद भी दिया. लिखना भी चाहा पर इस बार उनकी लिखाई ठीक नहीं रह गयी थी. एक दिन बाद वह वापस दिल्ली आ गयी और अगले दिन असम, जहाँ जून और नन्हा उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

कल रात भर उसे वही स्वप्न आते रहे. ऑक्सीजन, हीमोग्लोबिन, ICU, और डॉक्टर, अस्पताल शब्द कानों में गूँजते रहे. एक बार माँ को बोलते हुए भी सुना. वह ठीक होकर आ गयी हैं और किसी बारे में पिता के सवाल का जवाब दे रही हैं. कल शाम वे लाइब्रेरी भी गये और माँ की बीमारी पर जानकारी हासिल की. उन्होंने बहुत कष्ट सहा है इस रोग के कारण. ईश्वर ही अब उनका सहायक है. उसका सिर भारी है, मस्तक के दोनों ओर की नसें तन गयी हैं. कल शाम को जून को तनावमुक्त रहने का उपदेश दे रही थी पर स्वयं तनावमुक्त रहना कितना मुश्किल है. आज सुबह सुना विजयाराजे सिंधिया तेईस दिन ICU में रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं तो दिल धक से रह गया. माँ को भी अस्पताल में दो हफ्ते हो गये हैं. अभी-अभी छोटी बहन को फोन किया, शायद वह व्यस्त थी, फोन नहीं उठाया. जून भी उसे उदास देखकर परेशान हो गये हैं. उसे स्वयं को सामान्य रखने का प्रयास करना चाहिए, जिस बात पर उनका कोई वश नहीं है उसके बारे में चिन्तन करते रहने से क्या लाभ ? आज से संगीत का अभ्यास शुरू करेगी, मन को व्यस्त रखने से ही वह शांत रहेगा. सबसे बड़ा दुख संसार में है इच्छा, इच्छा पूरी हो जाये तो दूसरी उत्पन्न होगी, पूरी न हो तो दुःख देगी.

“कबिरा सब ते हम बुरे हम तज भलो सब कोई
जिन ऐसा करि देखिया मीत हमारा सोई”

मन को जितना धोते हैं उतना पता चलता है कि मैल की कितनी परतें चढ़ी हैं.