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Tuesday, November 14, 2017

नया सवेरा


मृत्यु और जीवन – ६     


रहती है एक अव्यक्त देह..इस देह के भीतर
वह सूक्ष्म देह ही धारण करती है नई देह
इच्छाओं, कामनाओं और अभीप्साओं से बनी है सूक्ष्म देह
जो धारण किये है पिछले जन्मों की स्मृतियाँ
जो जान लेता है यह सत्य  
धारण करता है अपार वैराग्य
और मुक्त हो जाता है वासनाओं और कामनाओं से
क्या अर्थ है बार-बार उसे दोहराने का
जो मिटता रहा है हर बार देह के साथ ही
फिर शुरू हो जाती रही है नई दौड़
हो जाता है जारी एक बार फिर अपने को भुलाने का प्रयास भी
अंतहीन है यह प्रक्रिया
कभी तो जागना होगा
मौत का सच जानना होगा
चक्रव्यूह से निकलना होगा बाहर
अन्यथा बार-बार सहना होगा दर्द
बार-बार बहाने होंगे आँसू
न जाने कितनी बार देखी जा चुकी है यह जीवन की फिल्म
फिर भी नहीं चुकती वासना
फिर-फिर दोहराया जाता है वही खेल 
और खोया रहता है एक भ्रम में जीवन
फिसलता जाता है हाथों से
वह जीवन जो वास्तव में मृत्यु है
मात्र आवरण है जीवन का  !

मृत्यु और जीवन – ७     

मृत्यु से घिरे हुए भला
कोई जी कैसे सकता है
जिसे भय है मरने का वह जी कहाँ पाता है
यात्रा करनी होगी हर चेतना को
अपने आप को जानने के लिए
जगानी होगी प्यास भीतर उस अनाम की
मौत असत्य कर देती है जीवन के अनुभवों को
लेकिन एक ऐसा जीवन भी है जो सत्य है
 परम मुक्ति को प्राप्त आत्मा नहीं धरती देह कोई
क्योंकि नहीं शेष है कोई कामना अब उसकी
मृत्यु एक छाया है जीवन की
उससे कोई भागेगा कैसे
भला लड़ेगा कैसे...
उसका सामना नहीं करता कोई
ड़ाल कर आँखों में आँखें
मुक्त हुआ जा सकता है जानकर ही उसको
ज्ञान से जगाना होगा एक नया सवेरा

जिसमें मृत्यु का कोई नहीं है डेरा !

Friday, November 27, 2015

चाँदी की पायल


आज सदगुरु ने अभ्यास और वैराग्य पर प्रकाश डाला, जिसे साधक चित्त की वृत्तियों को शांत कर सकें. अभ्यास के लिए समय की आवश्यकता है पर वैराग्य काल निरपेक्ष है. जिस क्षण किसी को चैतन्य सत्ता से प्रेम हो जाता है जगत तत्क्षण फीका पड़ जाता है, यही तो वैराग्य है. एक बार जिसने अमृत चख लिया हो वह पुनः विष की तरफ कैसे जायेगा ? सदगुरु कितने सहज होकर सरल शब्दों में पुनः पुनः पथ पर लौटा लाते हैं, उन्हें जो बार-बार रास्ते से भटक जाते हैं. आज बहुत दिनों के बाद ध्यान की गहराई को महसूस किया. मन कितना गहरा है उन्हें इसकी कोई खबर ही नहीं है. भीतर अनंत शक्ति छिपी है इसकी भी खबर नहीं है. छोटी-छोटी चीजों के पीछे जाकर वे अपना समय और शक्ति नष्ट करते रहते हैं. उस खजाने को अनछुआ ही छोड़ देते हैं. बहुत हुआ तो थोड़ा सा ही पाकर संतुष्ट हो जाते हैं. झलक मात्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं. पुनः-पुनः लौटकर आने में जो अब तक का कमाया था वह नष्ट प्रायः ही हो जाता है जैसे कोई एक तरफ से झोली में डाले और नीचे से निकलता जाये तो कैसे भरेगी झोली और फिर वे भरने का प्रयास ही छोड़ देते हैं. अध्यात्म का पथ निरंतर सजगता का पथ है, एक-एक क्षण में सजग. कभी भी यह न मानें कि जान लिया, पा लिया, यह तो जीवन भर की साधना है !

‘कुछ हूँ’ से ‘हूँ’ तथा ‘हूँ’ से ‘है’ तक की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है. जब ‘है’ की अनुभूति होती है तो कोई भेद नहीं रहता. मुक्त अवस्था तभी मिलती है. आज सुना अभ्यास के द्वारा जो समाधि मिलती है वह असम्प्रज्ञात है, प्रेम, श्रद्धा तथा वीरता से भी समाधि घटती है. मन जब अपने मूल स्वरूप में टिक जाये तत्क्षण समाधि घटती है. आज ध्यान में उसे कुछ अनोखे दृश्य दिखे. चाँदी की पायजेब पहने सुंदर पैर, सम्भवतः कृष्ण के वे चरण जो वह उनकी मूर्ति में देखती है. रंग, प्रकाश और ध्वनि..यह आत्मा का ही स्फुरण है, उसी की ज्योति है, उसी का नाद है, उसके ही रंग हैं, मन जब ठहर जाता है तो ये सब दीखते हैं, इनसे परे वह दृष्टा है जो इन्हें देखता है और द्रष्टा से भी परे  जो है वही वह सत्ता है जिसका कोई नाम नहीं है, कोई रूप नहीं है. जो है. मन न रहे अर्थात मन ठहर जाये तो जगत भी लुप्त हो जाता है. मन ही तो जगत है. उन्हें मन को खाली करना है तब वह प्रकाश और नाद से भरेगा जब उससे भी खाली होगा तब केवल परमात्मा ही रहेगा. सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा, उसे कोई भी नाम दें वह एक ही सत्ता है.


आत्मा में रहना जिसे आ जाये उसे मन परेशान कैसे कर सकता है. आत्मा शुद्ध, बुद्ध, चिन्मात्र सत्ता है, वह आकाशवत् है, मन उसमें उठने वाला एक आभास ही तो है, आभास से न तो डरने की आवश्यकता है न ही उसमें बंधने की जरूरत है ! मन को जब वे अलग सत्ता दे देते हैं तभी दुःख का शिकार होते हैं. जहाँ द्वैत है वहीं दुःख है. विचार भी उसी आत्मा की लहरें हैं जो आनन्दमयी है. भीतर उठने वाले सारे संशय, डर तथा भ्रम उसी आत्मा से ही उपजे हैं, वे दूसरे नहीं हैं, उनसे कैसा डर, विचार तो शून्य से उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाने वाला है. सागर क्या अपनी लहरों से कभी डरेगा, चाहे लहर कितनी भी विशाल क्यों न हो, आकाश क्या बादलों की गर्जन से डरेगा ? वे क्यों अपने मन से डरते हैं, वे सागर की तरह गहरे तथा आकाश की तरह अनंत हैं, वे निर्मल हैं, स्वच्छ पावन हैं. एक भी दुर्गुण उनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकता. वे जो हैं वहाँ न कोई गुण है न दुर्गुण वहाँ कुछ भी नहीं है. निर्दोष अनछुए वे शुद्ध प्रकाश हैं, प्रकाश का कोई आकार नहीं. वे उससे भी सूक्ष्म हैं, ऐसा प्रकाश जो भौतिक नहीं है, जो पदार्थ से परे है, ऐसी ध्वनि जो अनाहत है ऐसे स्पंदन जो स्वतः हैं, वे उन सबसे भी परे हैं, मन, बुद्धि आदि तो सहायक हैं उनके न कि दुश्मन, जिनसे बचने के लिए वे ..?  

Thursday, May 14, 2015

रेत के महल


“नित्य-अनित्य, पुण्य-पाप का भेद जानना ही विवेक है, आसक्ति मिटाना वैराग्य है. तृष्णा ही दरिद्रता है, जब तृष्णा न हो, मन में समृद्धि हो, वही वैराग्य है. जब विवेक और वैराग्य सध जाये और साधना का सहयोग भी मिले तभी भक्ति का उदय होता है.” सद्गुरु के वचन उसके हृदय को शीतलता से भर देते हैं. कैसी अद्भुत शांति का अनुभव होता है, उनके वचन सुनने से जैसे तृप्ति नहीं होती, पर मन में कहीं गहरे संतुष्टि भरती जाती है. मन उसी तृप्ति को चाहने लगता है. तब इस जगत की बातें बहुत छोटी महत्वहीन लगने लगती हैं. यह माया जाल अपने पुर्जे खोल कर रख देता है. तब कहीं भी मन टिकता नहीं, सिवाय उसके. यह पल-पल बदलता संसार और रेत के महलों से इन्सान के स्वप्न ढहते नजर आते हैं. सब छलावा ही लगता है, सच्चा सिर्फ वही एक लगता है. सारे संबंधों के पीछे टिके स्वार्थ स्पष्ट दीखते हैं. इस जगत की सीमाएं भी दिखती हैं, देह की सीमाएं, रिश्तों की सीमाएं और मनों की सीमाएं. मन जो पल-पल रूप बदलते हैं, जो निश्छल नहीं रह पाते, जो कभी असत्य का सहारा भी ले लेते हैं और कभी सत्य से न डिगने का प्रण लेते हैं, बुद्धि भी रूप बदल लेती है तो फिर कोई किसका भरोसा करे. एक उसी का जो इन सबसे परे है, सभी प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर कार्य कर रहे हैं. मन परवश है, मुक्त वही  है जिसने मुक्त की बाँह थामी है, अपने स्व को जाना है. निज का आनंद जिसने पा लिया वह क्यों जायेगा जगत से आनंद का प्रसाद पाने, वह तो अपने आनंद को लुटाने का ही कार्य करेगा न. सद्गुरु ने उसके भीतर आनंद के जिस स्रोत का पता बताया है, वह अनंत है !

पिछले दो-दिनों से उसका मन संशय ग्रस्त है. संसार उसे अपनी ओर खींच रहा है और ईश्वर की भक्ति अपनी ओर. ऐसा विरोधाभास पहले तो प्रतीत नहीं हो रहा था. हृदय में जैसे कोई कुहरा छा गया है और यह कुहरा दम्भ का हो सकता है. कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा, दम्भ का कुहरा उतना घना होगा. मन पर कोई घटना कितनी देर तक प्रभाव डालती रहती है, इससे भी उसके घने होने का सबूत मिलता है. ऐसे में कोई उसकी सहायता कर सकता है तो वह है कृष्ण का प्रेम. उसे अपने स्वभाव में स्थित रहना होगा पूरी निष्ठा के साथ और दिखावे की आडम्बर की कोई आवश्यकता ही नहीं हैं. अंतर का प्रेम अन्तर्यामी उठने से पूर्व ही स्वीकार लेते हैं. जीवन का लक्ष्य एक हो, रास्ता एक हो और मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर के प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे बूंद-बूंद ही सही ताकि संवेदना भीगी-भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आए, न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समान रूप से बरसे ! साधक के लिए करने योग्य एक ही कर्त्तव्य रह जाता है, वह है इस संसार को असत्य मानना अथवा स्वप्न  मानना. उसके शरणागत होकर उसके संसार में काम आने का प्रयत्न करना, जीवन का लक्ष्य हो ईश्वर, रास्ता हो समर्पण और कर्म हो सेवा तभी वह  मुक्त है !

उसे अपने अवगुणों पर नजर रखनी होगी, वे पनपें नहीं बल्कि जड़ को उखाड़ फेंकना है. सबसे अधिक तो वाणी का दोष है. ज्यादा बोलना हानिप्रद है. बल्कि ज्यादा सोचना भी क्योंकि बोलने और सोचने में ज्यादा अंतर नहीं है. मन के भीतर भी बोलना नहीं होना चाहिए. लोगों से मिलते वक्त भी स्मरण बना रहे, तभी याद रहेगा कितना बोलना है. ईश्वर तो दूर वह स्वयं को भी भुला देती है और परिस्थिति की गुलाम बनकर कुछ भी बोल देती है जिसका परिणाम कभी भी सुखद नहीं होता. दूसरा अवगुण है, समय का दुरूपयोग. जीवन सीमित है, इसका एक-एक क्षण कीमती है. जीवन मिला है जीवन के लक्ष्य को पाने के लिए, सुख-सुविधाएँ जुटाकर देह को आराम देने के लिए नहीं बल्कि नियमों का पालन कर तन, मन, व आत्मा को निर्मल बनाने के लिए. चित्त की शुद्धि ही उसके पाने का मार्ग खोलती है. वही साध्य है और वही साधना !


Friday, January 9, 2015

ईश्वर का विधान


विवेक रूपी बाण और वैराग्य रूपी धनुष सदा अपने साथ रखना है, जैसे ही कामना रूपी राक्षसी प्रकट हो तो उसका विनाश किया जा सके. ईश्वर की भक्ति का अर्थ है माया से युद्ध, मन की शक्ति का विकास ईश्वर भक्ति में ही होता है. कल उसने चौथी बार सुदर्शन क्रिया की. हर बार की तरह कल भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ. सुख की अनुभूति तो हुई ही फिर स्लेटी फूलों के मध्य नील रंग का कमल दिखा जो बेहद चमक लिए था, फिर कई रंगों के प्रकाश दीखते रहे. कल की क्रिया के दौरान एक बार भी भय का अनुभव नहीं हुआ और समय भी बहुत कम लगा. कुछ देर और क्रिया चलती तो ठीक था पर बुद्धि में अनाग्रह रहे तो ही उचित है. कल योग शिक्षक से उसने कहा कि उसे लग रहा है आज परमात्मा से उसका appointment है. और वह कल उस क्षण से उसके साथ है, बल्कि उसके पहले से ही, हर पल हर क्षण उसके साथ है, वह ख़ुशी बनकर उसके पोर-पोर में समा गया है. सुदर्शन क्रिया में सचमुच सु-दर्शन होते हैं, अद्भुत अनुभव होते हैं. श्री श्री के प्रति मन कृतज्ञता से भर जाता है और उनके योग शिक्षक के प्रति भी. जीवन में एक उजाला बनकर, आनंद का स्रोत बनकर वह उनके जीवन में आए हैं. जून का कहना है कि वे उन्हें एक बार फिर खाने पर बुलाएँ. इस समय साढ़े दस बजे हैं, सब कुछ कितना शांत लग रहा है. आज एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है.

मन प्रशांत होगा तभी उत्तम सुख की प्राप्ति होगी. संशय, आलस्य, प्रमाद से विमुक्त मन ही शांत होगा. शांत मन ही प्रसन्न रहेगा और यही प्रसन्न मन ही ईश्वर को पा  सकता है. वह देह से स्वयं को पृथक जानता है. स्वयं को आत्मा के स्तर पर ले जाकर परमात्मा के सान्निध्य का सुख प्राप्त करता है. वह पूर्ण अमृत का स्वाद लेता है, उसके आनंद की निरंतर वृद्धि होती है. प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है. वह ईश्वर जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने की समझ देता है, पग-पग पर उनका हाथ थाम लेता है, वह नितांत अपने से भी अपना ईश्वर ही सच्चा मित्र है. उसका नाम ही अंतर्मन को वर्तमान की शांत जलधारा पर स्थिर रखता है. ऐसे प्रभु का सत्संग गुरू कृपा से आज शाम उन्हें प्राप्त होने वाला है.

अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक से बात हुई, उनका जन्मदिन पहली जुलाई को है. अभी वह ऋषिकेश जायेंगे फिर डिब्रूगढ़ और फिर तेजपुर ‘साधना’ के लिए, और कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है. मन को पवित्र रखने तो सब कुछ अपने आप होता जाता है. ईश्वर हर जगह है उसको देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सभी में ईश दर्शन करके सभी को अपने समान जानकर कोई ईश्वर की अनुभूति कर सकता है. कल शाम क्लब में योग शिक्षक को सुना, फिर एक सखी के यहाँ उनके भजन सुने. एक व्यक्ति इतना शांत, इतना पवित्र, इतना मधुर, समदर्शी और भक्तिभाव से पूर्ण हो सकता है, गुरू के सभी लक्षण उनमें हैं. मन श्रद्धा से भर जाता है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जीवन में भी प्रभु प्रेम की वर्षा हो रही है. लेकिन ईश्वर के प्रति वह तड़प, वह खिंचाव जो प्रथम क्रिया के बाद उसने अनुभव किया था वह शांत हो गया है. अब वह उससे एक पल को भी दूर नहीं है, उसके नाम का मानसिक जप वर्तमान में रहने की प्रेरणा देता है. वर्तमान में जीना व्याधियों से मुक्त रखता है. मन फूल की तरह नित नवीन बनकर खिला रहत है.

कल कोर्स का अंतिम दिन था, ध्यान किया फिर सामूहिक भोज व सत्संग, लौटते-लौटते उन्हें साढ़े दस हो गये. सुबह पांच बजे उठाने का वादा जून ने शिक्षक से किया था. उन्होंने उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व पूरी तरह निभाया है. चार बजे ही उसकी नींद भी खुली पर उठने की चेष्टा नहीं की. पांच बजे उसे एक स्वप्न आया, कोई कह रहा है, 'पांच बज गये', 'पांच गये'. वह ईश्वर थे या उसकी चेतना.
उसके अंतर में न जाने कहाँ से एक कसक या कचोट ने प्रवेश पा लिया है. यह महीनों बाद हुआ हुआ है, सो यह अपरिचित, अनजाना मेहमान अप्रिय लग रहा है. कल दोपहर से इसका आरम्भ हुआ होगा, एक क्षण को भी सजग न रहो तो कामनाएं मन पर अधिकार जमा लेती हैं. अपने आत्मभाव से वे च्युत हो जाते हैं. ईश्वर का विधान बहुत कठोर है, जिस क्षण उसका पथ छोड़ा अथवा छोड़ने का भाव भी मन में आया तो उसका फल मिले बिना नहीं रहता. मन यदि सद् मार्ग पर चले तो आत्मसुख में रहता है. पूरा प्रभु आराधिया, पूरा जाका नाम. वह ईश्वर जब तक पूरा नहीं मिलता, ज्ञान पूर्ण नहीं होता तभी तक यह विचलन, विक्षेप मन पर छाने का साहस कर सकते हैं. उसका लक्ष्य तो उस पूरे को पाना ही है. वही इसका रास्ता बता सकते हैं. मन और देह में जब तक आसक्ति रहेगी तब तक वह नहीं मिलेगा. अपने अहं को तुष्टि देने का भाव, सुख-सुविधाओं का आकर्षण जब तक रहेगा वह अनवरत सुख इसी तरह बीच-बीच में लुप्त होगा. यही दुःख लेकिन उसी मार्ग पर स्थित करेगा, जब प्रार्थना और हृदय एक हो जाते हैं तभी उसका अभ्युदय होता है. ध्यान ही उसे पावन करेगा. उसकी कृपा अपार है, वे अकृतज्ञ होकर उससे और-और मांगते हैं. उलटी चल चलते दीवाने, दीदारे यार करते आँख बंद करके !