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Friday, September 23, 2016

नई गाड़ी में सैर


तू ही रस्ता, तू ही मंजिल, तू ही राही है..!

कहाँ जा रहा यह मानवदल, किसे ढूँढ़ते होता बेकल
सुबह-सवेरे उठते ही क्यों, चिंता ने आ इनको घेरा
गगन, फूल, कलियां तो छोड़ो, पंछी सुर न सुनते देखा
कदम-कदम पर निशां हैं जिसके, ढूँढा करते जाकर मन्दिर
जिसके कारण हैं दुनिया में, ढूँढा करते हैं उसका घर
कैसे बेसुध दीवाने हैं, आग लगाते स्वयं ही मन में
कभी क्रोध की, कभी ईर्ष्या, अकुलाते सुंदर जीवन में
स्वयं जगाते तृष्णा, आशा, सुखी रहें करते अभिलाषा
सुख से ही तो बने स्वयं हैं, थमकर न सीखें यह भाषा
तन में एक आग जलती है, मन हारा चिन्तन कर करके
फिर भी रुकना न जानें, क्या पाना कुछ साबित करके
पीना और पिलाना सीखा, जीना न आया अब तक
चाहा जिसको सदा भुलाना, मन वह वश में किया न अब तक
तन के लिए सभी उपाय, दौड़, खुराक कभी जिम जाये
मन पाता विश्राम जहाँ, उस निज घर जाना न आये
तन पाता विश्राम नींद में, मन पाता आराम कहाँ
जाना जिसने भेद वह ज्ञानी, मिलते उसको राम यहाँ
नैन थके तो मुंद जाते हैं, श्रवण कहाँ सुनते निद्रा में
बैन हुए चुप अधर शांत हैं, मन फिर भी दौड़े निद्रा में
घर से निकले पहुंचे मंजिल, पैरों ने पाया विश्राम
मन की गति न थमती देखो, कैसे हो हमको आराम
तन के सेवक पांच इन्द्रियां, खुद के तीन सिपाही सच्चे
मन, बुद्धि व अहंकार के, आगे होते अनगिन बच्चे
स्वयं की महिमा स्वयं ही जाने, सेवक न बखान कर पाए
स्वयं में टिक जाये पल भर तो, तीनों को तुष्टि मिल जाये
जीने का है यही सलीका, लौट के कुछ पल घर में आये !

आज क्लब में मीटिंग है, उसे संचालन का कार्य करना है. कल रात्रि देर तक ज्ञान श्रृंखला सुनती रही. दोपहर को नींद आ गयी, उठकर एक नये ब्लॉग पर पूर्व की लिखी कविताएँ डालीं. कल जून नई गाड़ी में उन्हें घुमाने ले गये, कुछ देर एक मित्र के यहाँ रुके. परमात्मा जब तक अपना नहीं बन जाता तब तक जीवन से दुःख नहीं जाता, पर उसे जो हर वक्त एक नामालूम सी ख़ुशी घेरे रहती है, लगता है वह आसपास ही है. सद्गुरू के शब्दों में पास-पास. मन से परे, बुद्धि से परे एक और सत्ता है जो प्रेम से ही बनी है, उसमें और नूना में दूरी नहीं है, वे दोनों एक ही हैं, कितना अद्भुत ज्ञान है यह.     


  

Tuesday, June 28, 2016

मंजिल और रास्ता


‘मृत्यु के साथ यदि किसी की मित्रता हो तभी वह धर्म के पथ से विमुख रहकर भी प्रसन्न रहने की आशा रख सकता है. ऐसा हो नहीं सकता तो धर्म का पथ चुनना ही पड़ेगा. सजगता का वरण, समता की साधना भी तभी होती है. भीतर आग्रह हो तो अहंकार शेष है, अहंकार की तृप्ति करनी है तो उसे दुःख सौंपना ही होगा. स्वयं को जानना ही धर्म में अर्थात स्वभाव में स्थित होना है. जो स्वयं को जानता है उसे संसार से कोई अपेक्षा नहीं रहती, वह दाता बन जाता है. वह जानता है कि द्वेष करने से वह स्वयं भी उसी की भांति बन जायेगा जो उसके द्वेष का पात्र है. मन रुग्ण होता है तो शरीर अस्वस्थ होने ही वाला है. नकारात्मक भावनाएं देह पर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकतीं. जितना जितना कोई स्वयं में स्थित रहता है मुक्ति का अनुभव करता है. मुक्ति विकारों से, द्वेष से, दुखों से, वासनाओं से, क्रोध से और व्यर्थ चिन्तन से !’ आज सद्गुरु को सुनकर लगा वह उसके लिए ही बोल रहे थे.
यह जगत एक दर्पण है, उसमें वही झलकता है जो उनके भीतर होता है. भीतर प्रेम हो, आनन्द हो, विश्वास हो तथा शांति हो तो चारों ओर वही बिखरी मालूम होती है, अन्यथा यह जगत सूना-सूना लगता है. यहाँ किस पर भरोसा किया जाये ऐसे भाव भीतर उठते हैं. भीतर की नदी सूखी हो तो बाहर भी शुष्कता ही दिखती है. लेकिन भीतर का यह मौसम कब और कैसे बदल जाता है पता भी तो नहीं चलता. कर्मों का जोर होता है अथवा तो पापकर्म उदय होते हैं या वे सजग नहीं रह पाते. कोई न कोई विकार उन्हें घेरे रहता है तो वे भीतर के रब से दूर हो जाते हैं. हो नहीं सकते पर ऐसा लगता है. यह होना ठीक भी है क्योंकि भीतर छिपे संस्कार ऐसे ही वक्त अपना सिर उठाते हैं. पता चलता है कि अहंकार अभी गया नहीं था, सिर छिपाए पड़ा था, कामना अभी भीतर सोयी थी. ईर्ष्या, द्वेष के बिच्छू डंक मारने को तैयार ही बैठे थे. अपना आप साफ दिखने लगता है. साधना के पथ पर चलते-चलते जब वे यह सोचने लगते हैं कि मंजिल अब करीब ही है तो अचानक एक घटना ऐसी घटती है जो इशारा करती है कि रुको नहीं, अभी और चलना है. इस यात्रा का कोई अंत नहीं, इसमें मंजिल और राह साथ-साथ चलते हैं. जैसे कोई क्षितिज की तरह पास आता मालूम होता है निकट पहुंचो तो फिर उतना ही दूर..जिसने माना कि उसने जान लिया है उसका ज्ञान चक्षु बंद हो जाता है. वह खुला रहे इसके लिए सतत जिज्ञासु बने रहना होगा, सदा सजग रहना होगा, सदा स्वयं के भीतर झाँकने का काम करना होगा, कौन जाने कहाँ कोई विकार छिपा हो जो सही मौसम की प्रतीक्षा कर रहा हो !

स्वराज चेतना क्या है ? सत्य की खोज और मानव मात्र को जिसकी तलाश है क्या वही नहीं है स्वराज्य चेतना..आज मुरारी बापू की ‘मानस महात्मा’ को कुछ देर सुना. भीतर सद्विचारों की प्रेरणा जगाती है उनकी कथा. उन्हें भी अब कुछ करना होगा, मात्र विचार ही पर्याप्त नहीं है. उसे अपने लेखन को गति देनी होगी. हर कोई अपना-अपना कार्य ठीक से करे तो समाज पुनः अपने मूल्यों के प्रति जागरूक हो सकता है. उनकी परिचिता बुजुर्ग महिला आज गिर गयीं, उनका कंधा अपने स्थान से खिसक गया है, अस्पताल में हैं, वे मिलने गये थे. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, शाम को पार्टी में जाना है. कल सिंगापुर का शेष विवरण लिखा, अभी टाइप करना शेष है. सुबह प्राणायाम के बाद परमात्मा के साथ एक करार किया, वह उसे प्रकट करेगी और वह उसे अप्रकट करेगा. वह उसके जीवन में झलकेगा बाहर और वह भीतर खत्म होती जाएगी. उसका नाम उसकी शक्ति है और उसका पवित्र स्मरण उसका एकमात्र कर्त्तव्य, शेष तो अपने आप होता जायेगा. परमात्मा उनके भीतर सोया रह जाता है और वे बार-बार खुद को दोहराते चले जाते हैं, व्यर्थ का रोना रोते हैं. वह हर क्षण तैयार बैठा रहता है, सत्य सर्वदा सर्वत्र है ! 

Monday, May 23, 2016

द सीक्रेट - रोंडा बर्न की किताब

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मई का महीना आरम्भ हुए दो हफ्ते होने को हैं. आज पहली बार डायरी खोली है. कितना कुछ हुआ, हो रहा है और होने वाला है, भीतर भी और बाहर भी ! परहेज न करने के कारण सर्दी-जुकाम हो गया. सेहत बनाने के चक्कर में एक बार पुनः सेहत का बिगाड़ कर लिया. दो बार मृणाल ज्योति जाना हुआ, उनकी समस्याओं से रूबरू हुई. उन्हें आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है, उनका सेंटर जहाँ पर है वह स्थान बहुत नीची जगह पर है. मैदान बनवाने के लिए अथवा निर्माण कार्य करने से पहले जमीन को मिट्टी से भरवाना पड़ता है, जिसमें बहुत खर्च आता है. उनके पास बच्चों को लाने व छोड़ने के लिए एक वैन है जो पुरानी हो गयी है और उसके रख-रखाव पर काफी खर्चा आ रहा है, कोई बाऊँड्री वाल नहीं है, जिसे बनवाने के लिए फंड चाहिए. बूंद –बूंद से सागर बनता है, अगर वह क्लब में सहायता के लिए अपील करे तो कुछ लोग मदद करने के लिए आगे आ सकते हैं.

संतजन कहते हैं सभी मंजिल पर पहुंच सकें, इसलिए देह रूपी वाहन मिला है, जीवन की लालसा उन्हें इस वाहन में बैठे रहने पर विवश करती है. क्योंकि वे मंजिल तक पहुंच नहीं पाते, मृत्यु से भय लगता है. जिसे मंजिल का पता चल गया वह मृत्यु से नहीं डरता, असली जीवन इस ज्ञान के बाद ही शुरू होता है ! भय मुक्त मन ही अस्तित्त्व के प्रति प्रेम से भर जाता है और ऐसा मन ही परमात्मा के प्रति समर्पित हो सकता है ! लेकिन मानव इस सत्य से अनभिज्ञ रहता है और सारा जीवन गुजार देता है ! मृत्यु उसे डराती है और वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है. अविद्या, अशिक्षा व अज्ञान सबसे बड़े रोग हैं, स्कूली व कालेज की शिक्षा नहीं बल्कि जीवन की शिक्षा ! जो सद्गुरु देते हैं, लेकिन वे सद्गुरु के द्वार तक ही नहीं पहुंच पाते. गुरु परमशान्ति का द्वार है लेकिन उस शांति का अनुभव बिरले ही कर पाते हैं.

पिछले हफ्ते सास-ससुर यहाँ आये तब उन्हें माँ की बीमारी के बारे में ठीक से पता चला. वृद्धावस्था की कारण वह भूलने की बीमारी से ग्रसित हो गयी हैं. उन्हें दिन का, समय का, महीने का कोई बोध नहीं रह गया है. जब से यहाँ आई थीं, शारीरिक रूप से वह स्वस्थ हो रही हैं पर मानसिक रूप से अस्वस्थ ही हैं, वृद्धावस्था अपने आप में एक रोग है. वह स्वयं भी तो उसी की ओर कदम बढ़ा रही है, आँखों की शक्ति घट रही है, मन सदा विचारों से भरा रहता है. पिछले कई दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं. जून बाहर गये हैं, अभी तीन दिन और हैं उन्हें लौटने में, समय की कमी नहीं है. कल लाइब्रेरी से दो किताबें लायी. पहली The Secret  दूसरी पुस्तक बराक ओबामा पर है. इस बार कई अच्छी पुस्तकें आई हैं. 

एक दिन और बीत गया, माँ की बीमारी घटती नजर नहीं आती. सम्भवतः उन्हें मतिभ्रम हो गया है. हर बात में शिकायत करना स्वभाव बन गया है, सहन शक्ति बिलकुल खत्म हो गयी है. पिताजी कितने उपाय करके उन्हें समझाते हैं पर कोई असर होता नजर नहीं आता. इस समय रात के साढ़े नौ बजे हैं. परसों दोपहर जून आ रहे हैं, सबके लिए कुछ न कुछ ला रहे हैं.

Thursday, May 29, 2014

धूल का बादल


आज सुबह उसके घर के दरवाजे पर एक deaf and dumb (उसके हाथ में पकड़े फोल्डर के अनुसार ) सहायता मांगने आया पर अभ्यास वश उसने उसकी पुकार (मूक) सुनी ही नहीं, अनसुनी कर दी. बाद में सोचा, अगर उसकी कुछ सहायता कर दी होती तो उनका क्या घट जाता.
फिर कुछ दिनों का अन्तराल, उस दिन माँ-पिता को जाना था, अगले चार दिन घर की सफाई, स्वेटर्स की धुलाई आदि में व्यस्त रही. धूप भी दिखानी थी गर्म कपड़ों को, पर धूप निकल ही नहीं रही है, अख़बार में आया था कि पूरे असम के ऊपर धूल का एक बड़ा बादल छा गया है., वर्षा पिछले कई हफ्तों से नहीं हुई है. कल शाम वे अपने पड़ोसी के यहाँ गये, साथ-साथ रहते हुए उन्हें वर्षों होने को आये हैं, अच्छे किन्तु औपचारिक ही कहे जाएँ, ऐसे सम्बन्ध हैं उनके मध्य, जो उन दोनों परिवारों को सूट करते हैं. जब मिले तो पूरे मन से नहीं तो किसी के व्यक्तिगत जीवन में कोई झांक-ताक नहीं. उसकी आँखें जाने क्यों आज बंद हो रही हैं, हल्का सा दर्द है, उस दिन पढ़ा था कि डायरी में न ही मौसम का जिक्र होना चाहिए और न ही छोटी-मोटी बीमारियों का, लेकिन लिखने के लिए उसके पास और भी बहुत कुछ है, खुद की शिकायत भी तो करनी है, पिछले तीन-चार दिनों से संगीत का अभ्यास भी नहीं हुआ है. दो दोपहरें सिलाई के काम में गुजर गयीं. मन पर नजर रखने का अभ्यास भी शिथिल हुआ एक दो बार, माँ-पापा के साथ चाहकर भी बहुत खुला व्यवहार नहीं कर पाती वह, निकटता से घबराहट होती है. अपनी आजादी, अपना आप इतना महत्वपूर्ण लगता है कि अपने इर्द-गिर्द एक घेरा सा बना लिया था. उस समय वही ठीक लगता था अब भी वही ठीक लगता है, कम से कम उनकी अपेक्षाएं बढ़ेंगी तो नहीं.

जिन्दगी यूँ ही चली जा रही है, बेमकसद, बेमजा, हर वक्त मन अपने आप से पूछता है ? क्या समाचार है ? और मन अंजान सा बना टप-टप बरसती बूंदों को तकता, धरती से उमड़ती सोंधी गंध को सूँघता ठगा सा खड़ा रहता है. जीवन कुछ और भी तो हो सकता था, कुछ खोज लिए, कोई तलाश लिए, बामकसद और अर्थपूर्ण. सांसें क्यों व्यर्थ सी जाती प्रतीत होती हैं, क्यों लगता है कि हीरा जन्म गंवाया, आकाश भी तो बस है, धरती भी तो बस है, वे भी सिर्फ हों ऐसा क्यों नहीं होता. उनका मन भी बस हो, जैसा है वैसा का वैसा, न एक रत्ती भर इधर न उधर, बस एक पेड़ की तरह सिर्फ होना भर क्या मनुष्य के लिए कभी नहीं, नहीं जी, मनुष्य को तो बड़े-बड़े काम करने हैं, नाम करना है.


मंजिल अभी दूर है, लेकिन रास्ते का पता है सो भय की कोई बात नहीं, पिछले कई वर्षों से वह आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ती आ रही है, अपने मन को समझने लगी है अब. जिस ओर हवा बह रही है उसी ओर मन की नाव नहीं बह जाती बल्कि सोच-समझ कर नियंत्रित कर सकती है, अपने अंदर के विकारों को खूब देख पाती है और मन यदि कोई गलती कर रहा होता है तो बखूबी जानता है, मात्र जानना ही पर्याप्त नहीं है, मानना भी पड़ेगा कि स्वार्थ सिद्धि और आत्म कल्याण य आत्म सुख की प्राप्ति ही जीवन का लक्ष्य न बन जाये. अध्यात्म की साधना में व्यक्ति नितांत अकेला होता है, उसे एकांत चाहिये और सांसारिक बन्धनों से जितना मुक्त हो सके उतना ही श्रेष्ठ है. यदि अपने आप को शांत या मुक्त रखना आ गया तो जीवन में कहीं भी दुःख या रोष तो नहीं व्यापेगा.