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Friday, July 24, 2015

विश्व विकलांग दिवस


आज एक परिचिता का फोन आया. तीन दिसम्बर को ‘विश्व विकलांग दिवस’ है, उसे कुछ स्लोगन लिखकर तख्तियां बनानी हैं. उस दिन नेहरू मैदान में कार्यक्रम है. उससे पूर्व एक बार ‘मृणाल ज्योति’ भी जाना है. आज सत्संग थोड़ी देर ही सुन पायी. सब बातों का सार तो यही है कि “वे किसी को पीड़ा न पहुंचाएं, दूसरों के काम आयें और अहंकार न करें. आत्मा का क्या मान-अपमान और शरीर तो जड़  है उसका क्या मान-अपमान ! ईश्वर से संयोग ही वास्तविक सुख है उससे वियोग ही वास्तविक दुःख है !”

आज सुबह ध्यान के बाद उसे लगा जैसे भीतर से कोई कह रहा है कि उसे कुछ वक्त पूरी तरह माँ के साथ बिताना चाहिए. वह ऊँचा सुनने लगी हैं, सो बातचीत चाहेन हो पर साथ तो रहे. यूँ तो सुबह की चाय, नाश्ता, दोनों वक्त भोजन था पाठ सुनाते वक्त साथ रहता है पर तब मुख्य कार्य को ही प्रमुखता दी जाती है, ऐसा समय जब दुनिया का कोई भी कार्य प्रमुख न हो, बस वे ही प्रमुख हों. लगता है उनका हृदय ऐसी तरंगें भेज रहा है तभी उसे ईश्वर ने ऐसी प्रेरणा दी है. भीतर की आवाज इतनी स्पष्ट रूप से कम ही सुनाई देती है. सुबह सद्गुरु को टीवी पर देखा व सुना. वह कह रहे थे, सेवा करो तो तुम मेरे निकट आ सकते हो. वह तो सेवा किये बिना भी स्वयं को उनके निकट ही मानती है. वह ईश्वर की नाईं सर्व व्यापक हैं. उनकी चेतना इतनी विशाल हो गयी है कि उसमें सब समा गया है. वह उस हवा की तरह हैं जो परमात्मा रूपी फूल की खुशबू उन तक लाती है. वह उन्हें परिष्कृत करते हैं. वह पत्थर को तराश कर हीरा बनाते हैं. वह पुकार सुनते हैं. आज तक जितने भी सद्गुरु संत हुए हैं, वे सभी परमात्म स्वरूप होकर सदा विद्यमान हैं. कल उसने सच्चे हृदय से नानक को याद किया तो ध्यान में फूलों और प्रकाश बिन्दुओं की अनुपम छवि उन्होंने दिखाई. उन्हें शरण भर लेनी है ! जैसे शक्कर को मिठास खोजनी नहीं पड़ती, वैसे ही शरण में गये हुए को सुख की खोज नहीं करनी है.  


पिछले दिनों दिनचर्या में कुछ ढील आ गयी थी, आज से पुनः व्यवस्थित करने का प्रयास है. योगासन भी रोज नहीं कर पा रही थी जो अति आवश्यक है. तन स्वस्थ होगा तो मन स्थिर होगा, ध्यान होगा तथा सेवा होगी. ‘साहित्य सेवा’ भी तो एक सेवा है. बच्चों को पढ़ाना भी सेवा है. कल शाम को पुस्तकालय से दो पुस्तकें लायी है. क्लब की पत्रिका के लिए एक लेख लिखना है, अध्यात्म उसके हृदय के निकट का विषय है, उसी पर लिखे तो अच्छा रहेगा. आजकल क्लब में गाने का अभ्यास चल रहा है. अगले हफ्ते मीटिंग है. उसे कविता पाठ भी करना है. उसके लिए कविताओं का चुनाव भी करना है. मौसम वर्षा के कारण ठंडा हो गया है, बगीचे में सब्जियों और फूलों की पौध लग गयी है. अब वर्षा होने से भी कोई परेशानी नहीं होगी. वैसे तो उसकी सारी परेशानयों को प्रभु ने एक साथ ही दूर कर दिया है. जब उसका कुछ रहा ही नहीं तो दुःख क्या ? अब उसके सिवाय अंतर में कोई दूसरा नहीं रहता ! आज जून ने लंच में गोभी पुलाव बनाने को कहा है.     

Friday, August 22, 2014

गोभी की पौध


आज फिर बादल छाये हैं आकाश पर, पिछले कुछ दिन धूप भरे थे, उनका बगीचा खिल रहा था. आज सुबह उसने एक पपीता तोडा, और सोच रही है उन परिचिता को दे आये या भिजवा दे कल जिनसे फोन पर बात हुई थी, उसे लगा शायद उन्हें बुरा लगा हो. नन्हा आजकल सुबह फिर देर से उठने लगा है, फिर जल्दी-जल्दी चुपचाप सारे काम करता है, एक किशोर के लिए ये लक्षण क्या ठीक हैं. आज बड़ी भाभी के जन्मदिन पर उन्हें शुभकामना दी तो वह प्रसन्न हुईं, कहने लगीं, सबसे पहली बधाई उनकी ही है. रात एक स्वप्न में उसने बंगाली सखी को देखा, जून से कहेगी, इ-मेल से उन्हें  दीवाली की शुभकामनायें भेज दें. आज जे.कृष्णामूर्ति को सुना, वह कहते हैं, जो प्रतिकूलता को नहीं स्वीकारता वहीं संघर्ष पैदा होता है, सब कुछ अनुकूल होता रहे ऐसा तो सम्भव ही नहीं है, जीवन जिस रूप में सम्मुख आए उसे ही सच्चे दिल से स्वीकारना ईश्वर भक्ति है.
“बाहर के दीये तो बहुत जला लिए अब तो आत्मदीप जलाना है. मिठाई भी बहुत खा ली, अब तो अंतर की मधुरता चाहिए, बाहर की सफाई भी बहुत हो गयी अब तो अंतर्मन को स्वच्छ करना है. एहिक दीवाली तो बहुत मना ली अब प्रज्ञा दीवाली मनानी है”. आज बाबाजी ने दीवाली का तात्विक अर्थ बताया. नैनी का स्वास्थ्य आजकल ठीक नहीं है फिर भी वह काम पर आती है, विवशता कहें या कर्त्तव्य परायणता, अपने काम को वह महत्व देती है वरना घर में भी बैठ सकती थी. उससे भी नूना को कुछ सीखने को मिलता है. आज जून सम्भवतः गोभी की पौध लायेंगे. पालक, मेथी, गाजर, मटर, धनिया और प्याज के बीज पड़ चुके हैं पर गोभी की क्यारी खाली पड़ी है. आज सुबह एक और पपीता तोड़ा, उसने पड़ोसिन को दिया और कल के लिए उसे निमंत्रित भी किया. कल क्लब में दीवाली पर विशेष उत्सव है पर वे घर पर व्यस्त रहेंगे. सात परिवारों को उसने विशेष भोज के लिए आमंत्रित किया है. कल उसकी संगीत अध्यापिका ने आखिर कह ही दिया, अब वह नहीं सिखा पाएंगी, यह उसका अंतिम महीना होगा, इसके बाद नई शिक्षिका खोजनी होगी या घर पर ही अभ्यास जारी रखना होगा. संगीत तो एक वरदान है जिसकी जितनी संभाल की जाये उतनी कम है.

पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोल सकी, उस दिन रात के आयोजन की तैयारी करनी थी, अगले दिन पार्टी के बाद की सार-संभाल तथा कल आराम करने के कारण. वे तीन जगह आमंत्रित थे, ज्यादा गरिष्ठ भोजन करने के बाद कल दिन भर उपवास करना पड़ा. कल शाम भी यहाँ दीवाली का ही माहौल था. सभी ओर दिए और रोशनियों की झालरें लगी थीं. पटाखों का शोर बढ़ता ही जा रहा था. आज दोपहर को जून के साथ बैंक जाना है, उसके अकाउंट को उन्हें जॉइंट अकाउंट बनाना है. कल जून ने उसे पैसे लाकर दिए, उसे कुछ भी रोमांचक नहीं लगा, बल्कि कुछ भी नहीं लगा, नये नोट देखकर भी कोई ललक नहीं उठी, लगता है मुक्ति की राह पर कदम तेजी से बढ़ रहे हैं. आज असमिया सखी ने ‘नीति वचन’ सुनने का फिर आग्रह किया, उसका मन भी अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रहा है. जीवन अद्भुत है, यह नित नवीन रूपों में प्रकट होता है. कभी सुख और आनन्द की वर्षा कर उसे निहाल कर जाता है तो अगले ही पल अचानक विपत्ति बन प्रश्नचिह्न लगा जाता है. कभी सहज लगता है कभी अनबुझ पहेली की तरह प्रतीत होता है. साहित्य भी इन रसों व रंगों से अछूता नहीं रहता. वह सजग बनाता है, कठिन परिस्थितियों से पार पाने की प्रेरणा देता है.




Friday, May 24, 2013

चन्द्रकान्ता संतति- एक रोचक उपन्यास


कल दोपहर का भोजन उसने दो सखियों के साथ खाया, अच्छा लगा, संयोग था कि सभी अकेली थीं. आज राई का पेस्ट बनाया गाजर की कांजी के लिए. शाम को टी.टी खेलने गये, बहुत दिनों बाद, बाहर हरी घास पर स्किपिंग भी की, ठंडी हवा चेहरे पर भली मालूम पडती थी. आज साइकिल से एक सखी के यहाँ जाएगी. कल तीन पत्र आये, एक दीदी का भी जो चाहती हैं, अगला पत्र वह अंग्रेजी में लिखे. उनके भारत आ जाने पर तो वे उनसे मिल ही पाएंगे अगले एक दो वर्ष में. आज अभी तक नैनी नहीं आई है, लगता है चावल आज कड़ाही में बनाने होंगे.

 दोपहर के डेढ़ बजे हैं, मन में कई विचार लिए वह अपने करीब आना चाहती है. आज सुबह  सब कार्य समय पर हो गया, यहाँ तक कि नन्हे के फोटो के लिए भी पांच मिनट का समय मिल गया. लेकिन उसने आज तक कैमरा हैंडल ही नहीं किया था सो बैटरी बदलने के चक्कर में रील एक्सपोज हो गयी लगती है, जून ने कहा तो है, पूरी रील खराब नहीं होगी, कैमरे के बारे में कितनी कम जानकारी है उसे, परसों लाइब्रेरी से इस विषय पर कोई किताब लाएगी. जून आज सासोनी गये हैं, देर से आने को कहा है, उसने स्पेशल बाथ लिया समय का सदुपयोग करते हुए. सुबह फूफाजी का पत्र आया, उन्हें कई बार नया पता लिखने के बावजूद वह जून के पुराने पते पर ही पत्र भेजते हैं, यह तो अच्छा है, वे लोग उनके विभाग में भेज देते हैं. उनकी असमिया की कक्षा आज है पर उसे लगता है, जब तक बोलने का अभ्यास नहीं होगा कोई लाभ नहीं है. आज उसने पहली बार करी पत्ते की चटनी बनाई जो जून को पसंद आई.

आज ऐसा लग रहा है जैसे गर्मियों का मौसम आ गया हो. नन्हे को दिगबोई में गर्मी लग रही होगी, आज वह दोस्तों के साथ वहाँ गया है, स्कूल की तरफ से. कल रात उनके पुराने परिचित, पंजाबी दीदी के पति खाने पर आये, साढ़े दस बजे वे गये. उसे लगता है, उन्हें भोजन अच्छा लगा. पर हर बार किसी को खाने पर बुलाने से सब्जियां बच जाती हैं, उसे बासी खाना पसंद नहीं, पर...वे तेजपुर से बेंत की जो बैलगाड़ी लाये थे, वह उसने दीदी के लिये भिजवाई, वे मट्ठियाँ और बर्फी लाये थे. आज सुबह वह पड़ोसिन के यहाँ अपने बगीचे की एक पत्तागोभी लेकर गयी पर उसने उससे बहुत बड़ी गोभी अपने बगीचे से निकल कर उसे दे  दी. पिछले दरवाजे पर दस्तक हुई है शायद, शिबू आया है, उसकी किताब का एक पेज थोड़ा सा फट गया है, वह थोड़ा परेशान है, उसे सेलोटेप से जोड़ देना चाहिए. कल उन्हें तिनसुकिया जाना है, अगले महीने घर भी जाना है और उसके बाद दो माह की गर्मी की छुट्टियाँ...वे चन्द्रकान्ता सन्तति के शेष भाग तब पढ़ेगी, नन्हे को भी बहुत अच्छा लग रहा है तिलिस्म भरा कथानक. जून आज भी कोई पत्रिका नहीं लाये, पहले जब वह मैगजीन क्लब के ऑर्गेनाइजर नहीं थे, हर दिन घर में एक पत्रिका आती थी, पर अब वह भूल जाते हैं.





Tuesday, October 30, 2012

लौंग-इलाइची वाली तहरी



कल के बादल अभी घिरे हैं, कालेज गयी थी, लौटी तो देखा नन्हा फिर सोया नहीं था दोपहर को. जून को पत्र लिखा, गोंद नहीं थी सो सेलो टेप से चिपकाया, पर ठीक से नहीं हो पाया है. सारनाथ के बारे में अभी तक नहीं लिखा है, सिन्हा व सुधा मैम से कहा किताब के लिए पर उन्होंने नहीं दी, लड़कियों का हक है जिन पर उन किताबों पर भी अध्यापिकाएं अपना अधिकार जमा लेती हैं. उसने तय किया भविष्य में कभी उनसे कुछ नहीं मांगेगी. एक किताब खरीदी उसने, पर विशेष लाभ नहीं हुआ, खैर कुछ ही सही. कल से तीन दिनों के लिए कालेज बंद है. ढेर सारे काम करने हैं और पढ़ाई तो करनी ही है.

छुट्टी का पहला दिन कैसे शुरू हुआ और कैसे बीत गया वह स्वयं भी नहीं समझ पायी, सुबह का वक्त तो रोज ही व्यस्तता में गुजरता है, फिर नन्हे को पढ़ाने लगी, दोपहर का भोजन, उसे सुलाना और तीन बजे जब पढ़ने आई तो बिजली गायब, दस मिनट बिना बिजली के पढ़ा तो माँ ने ऊपर बुला लिया, घर का वातावरण सामान्य हो गया है. फिर ननद का फोन आया, उसकी किसी मित्र के यहाँ जाना है. तभी पोस्टमैन आ गया, जून के दो पत्र थे, पढते ही सुधबुध खो गयी पर उन्हें देर तक एन्जॉय करने का समय ही नहीं था, अर्थात वह फौरन उसे जवाब नहीं लिख सकी. वहाँ से लौटे तो आठ बज चुके थे. भोजन बनाया, पत्र लिखा..आम पत्र नहीं , प्यार का दस्तावेज, चालीस नम्बर का नहीं पैंतालीस...पिछले दिनों वह  नम्बर गलत डाल रही थी
शुभ प्रभात ! आज वह सुबह जल्दी उठ गयी है, रात को आशिक चन्द्र ग्रहण देखा था, मकान मालकिन के यहाँ गांव से कुछ महिलाएं आयीं थीं कल गंगा स्नान करने. अभी समाचार देखने के बाद टीवी बंद क्र रही थी कि पेन नीचे गिर गया, रिफिल बेकार हो गयी, कितना प्रयास करना पड़ रहा है उसे चंद पंक्तियाँ लिखने में. दक्षिण अफ्रीका में पुलिस कितनी बर्बर है, अभी महिलाओं पर लाठी चार्ज होते देखा समाचारों में.

जैसे नियमित वह लिख रहे हैं वैसे ही नियमित आजकल उसे खत मिल रहे हैं. माँ-पिता जी का भी पत्र आया है, उन्होंने लिखा है, अप्रैल में वे तीनों वहाँ आएंगे, इसकी प्रतीक्षा वे लोग कर रहे हैं. उसने सोचा तब की तब देखेंगे, अभी से कुछ नहीं कह सकती. उसने एक सप्ताह में एक विषय पढ़ने का निश्चय किया, ग्यारह बजे उसने बत्ती बंद कर दी.

तीन दिन बाद कालेज गयी, आरती मैडम जब लेक्चर दे रही होती हैं, उसे बहुत अच्छा लगता है, उनकी क्लास ही सबसे अच्छी होती है. और एक मेहरा मैम हैं, कल के लिए पढ़ने को कहा  है पर..कल या तो वह खुद अनुपस्थित हो जाएँगी या भूल ही जाएँगी. फिर भी उसे पढ़ना तो है ही. यह प्रथम पेपर है भी द्रौपदी के चीर की तरह कहीं भी इसका ओर-छोर दिखाई नहीं देता.

आज उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं लग रहा है, हल्का ज्वर सा लग रहा है, कालेज में थकान लग रही थी. सुबह अंगूर खाए, अच्छे लगे, बाकी चीजें कड़वी या फीकी लग रही हैं.

आज फिर वह सुबह कालेज चली तो गयी पर बीच में छोड़ कर आना पड़ा, बुखार बढ़ गया था. अब लगता है कुछ दिन घर पर ही आराम करना होगा.

आज स्नान किया उसने पूरे आठ दिनों बाद, अभी भी मुंह कड़वा है, पिछले आठ दिनों में मन में न जाने कितने बवंडर उठे हैं पर उन्हें याद करना क्या बहुत जरूरी है.

आज शिव रात्रि है, काफी ठीक महसूस कर रही है पर सब्जी में कोई स्वाद नहीं आ रहा. सोच रही है रात को खाना खुद ही बनाएगी. यहाँ खाने में विविधता नहीं है, रोज वही मसूर की दाल या मूंग मिली अरहर, इसके अलावा भी दुनिया में कुछ होता है, यहाँ लोग जानते ही नहीं. सब्जी भी वही आलू गोभी टमाटर, खूब भुनी हुई. वड़ी वाले चावल, गोभी वाले चावल, लौंग बड़ी इलाइची वाली तहरी, मूली, गोभी के परांठे..सब सपने की चीजें होकर रह गयी हैं. यहाँ खाने का मतलब पेट भरने से है, सच है आजादी से बढकर कोई वस्तु नहीं , अपने घर में वह आजाद थी, खुश, निर्द्वन्द्व कुछ भी करने को स्वतंत्र !



Friday, July 13, 2012

कच्चे बेल


कई दिनों से ससुराल के घर से चिट्ठी नहीं आयी है, जून ने तार भेजा है, उम्मीद है सोमवार तक जवाब आ जायेगा. छोटू जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है समझ आती जा रही है उसे, ज्यादा ध्यान और समय माँगने लगा है. कल सारी दोपहर और शाम पांच बजे तक वह उसके साथ ही खेलती रही पर वह मान ही नहीं रहा था. इस समय सो रहा है, उसके लिये हरे मटर और फूलगोभी के चंद टुकड़े उबालने हैं. जून तिनसुकिया गया है, घर फोन करने का प्रयत्न किया, पर यह संभव नहीं हो सका, एक टेलीग्राम और भेजा है उसने, वह उदास है इस बात से. इसी हफ्ते पत्र आ जाये तो कितना अच्छा हो. आज सुबह से वर्षा हो रही है, कितना अन्धेरा है उस कमरे में, जहाँ नन्हा सोया है. माँ का पत्र आया है वे लोग यहाँ आएँगे ऐसा लिखा है, शायद मई, जून में या नन्हें के पहले जन्मदिन पर. चाची का पत्र भी आया है बहुत दिनों बाद. आज पहली बार टीवी पर दूरदर्शन में सुबह का नया कार्यक्रम देखा, ‘राजा रामन्ना’ का इंटरव्यू अच्छा था और कन्नड़ गीत भी.

एक नया दिन, सुबह के सात बजे हैं, अभी-अभी जून ऑफिस गया है, रात भर वह कितने सपने देखती रही. वह बैगन के पकौड़े तल रही है पर वे हैं कि खत्म होने को ही नहीं आते. एक बहुत बड़ा सा जुलूस निकल रहा है सड़क पर..कल वह बाजार से दो बेल के फल लायी थी. सोच रही है उसका शर्बत बनाएगी, लेकिन माँ कैसे बनाती थीं उसे याद ही नहीं आ रहा.

वही कल का सा समय है और कल का सा मौसम, कल दोपहर बाद ही बादल एकत्र हो गए और रात भर बहुत बरसे. रात दो बजे बादलों के शोर से नन्हा उठ गया और उसके बाद सोने का नाम ही नहीं, जून ने दूध बनाया वह उसे चुप कराती रही कितनी देर उसे सुलाने का प्रयत्न किया एक बार सोया फिर उठ गया, अब कैसे सो रहा है मस्ती से. पत्र आज भी नहीं आया न ही तार का जवाब, आज हो सकता है जून डाकघर जाकर पता करें. वे बेल तो कच्चे निकले.