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Monday, December 9, 2019

मन की शांति



“दुःख, उदासी, शरीर में अस्थिरता, श्वास में कंपन आदि समाधि में अंतराय होते हैं. आध्यात्मिक दुःख यदि न हों तो अन्य दो प्रभावित नहीं कर सकते”. आज सुबह टीवी पर उपरोक्त वाक्य सुना. वैदिक चैनल पर डॉ सुमन विद्यार्थियों को ‘पतंजलि योग सूत्र’ पढ़ाते समय कह रही थीं. समाधि शब्द सुनते ही उसके भीतर कोई कमल खिल जाता है. सम्भवतः योग के हर साधक का यही लक्ष्य होता है, वह भाव समाधि का अनुभव कर चुकी है, निर्विकल्प समाधि का अनुभव इसी जन्म में होगा, ऐसा स्वप्न भी कितनी बार देखती है. परमात्मा की कृपा से ही यह सम्भव होगा. कल सुबह की तैयारी हो चुकी है, सामान काफी हो गया है इस बार. ग्यारह दिनों के लिए वे बाहर जा रहे हैं. चार रात्रियाँ कोलकाता में, सात भूटान में. तीन थिम्पू, दो-दो पुनाखा और पारो में। आज योग कक्ष का रेगुलेटर बदल गया है. पुराने में अंक स्पष्ट नहीं दिखते थे, पर इतने वर्षों से काम चला रहे थे वे. कई बार समस्या का हल कितना आसान होता है पर उन्हें समस्या के साथ रहने की आदत पड़ जाती है. जैसे मानव देह के रोग, कमजोरी आदि से परेशान रहता है, पर आत्मा की खोज नहीं करता. परेशानी के साथ जीने की आदत डाल लेता है. आज सुबह अकेले ही प्राणायाम किया, जून तैयारी में लगे थे. उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने का अब मन नहीं होता, वह स्वयं के लिए निर्णय लेने में समर्थ हैं. वाणी का दोष स्पष्ट नजर आने लगा है, सो बोलने से पूर्व बोलने का तरीका भी स्पष्ट हो रहा है. परमात्मा कितना धैर्यपूर्वक उन्हें सिखाते हैं, वैसे वे खुद हैं ही कहाँ, वही तो है, वही खुद को संवार रहा है, उसी का एक अंश... जिसने स्वयं को उससे जुदा मान लिया था भ्रम वश ! 

अभी कुछ देर पहले ही यात्रा से वह घर लौटी है, जून घर नहीं आये, सीधा दफ्तर चले गए. उन्हें किसी मीटिंग में जाना था. नैनी ने सफाई का काम करवा  दिया है. सफाई कर्मचारी भी आ गया था और धोबी भी, घर कुछ ही घण्टों में व्यवस्थित हो गया है. सुबह की फ्लाइट से आने का कितना फायदा है. आज पूरे ग्यारह दिनों बाद यह डायरी खोली है. भूटान में हर दिन का यात्रा विवरण लिखा था, छोटी डायरी में. आज दोपहर से टाइप करने आरंभ करेगी. मृणाल ज्योति के लिए भी कुछ लिखना है. पिछले दिनों जे कृष्णामूर्ति की किताब पढ़ती रही. कोलकाता में कल काफी समय मिला. बहुत कुछ स्पष्ट होता जा रहा है. मन किस तरह स्वयं ही स्वयं का विरोध करता है, फिर स्वयं के जाल में फंस जाता है. मन यदि स्थिर हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति जैसे ही मन कोई राय बनाता है उससे दूर हो जाता है. अब वह राय ही उसकी आँख पर पर्दा बन जाती है. जैसे गोयनका जी  कहते हैं, प्रतिक्रिया करने के बाद उनका मन प्रतिक्रिया से उत्पन्न संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, मूल कारण तो पीछे छूट जाता है. मन जो भी विचार करता है वे  अतीत के अनुभवों पर आधारित होते हैं, यानि अतीत की लहरें वर्तमान के तट से टकराती हैं और भविष्य का जन्म होता है. शुद्ध वर्तमान को वे देख ही नहीं पाते. मन अपनी धारणाओं, मान्यताओं और विश्वासों के आधार पर एक मशीन की तरह काम करता है. ‘ऐसा होगा तो ऐसा करना है’, उसका अपना नियत एजेंडा है. 

आज चौथा दिन हैं उन्हें वापस लौटे, अभी भी मन भूटान की स्मृतियों से भरा है. जून ने जिस किताब का ऑर्डर वहाँ से किया था, वह आ गयी है. काफी मोटी पुस्तक है, भूटानी इतिहासकार की. उसे पढ़ना शुरू किया है, अभी यात्रा विवरण लिखना आरम्भ नहीं किया. आज सुबह स्वप्न में भगवान शिव की एक मूर्ति देखी। अंग स्पष्ट नहीं थे, पत्थर की आकृति से जान पड़ता था कि शिव हैं, फिर कुछ क्षण बाद श्वेत पत्थर की नन्दी की मूर्ति की झलक मिली. कल सुबह भी शिव-पार्वती दोनों की मूर्ति दिखी थी और बाद में भीतर शब्द प्रकट हुए थे दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती.... भीतर कोई पुरानी स्मृति जाग उठी थी शायद ! आजकल भिन्न-भिन्न गंधों को महसूस करती है, ज्यादातर समय कोई मधुर गन्ध, कभी-कभी धुंए की गन्ध, पता नहीं यह कोई अनुभव है या रोग.. कुछ भी तो नहीं ज्ञात ! कल गुरूजी को सुना, उन्होंने बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बतायीं. एक लेखक को क्या और कैसे लिखना चाहिए, यह भी बताया. आज शाम को मीटिंग है, क्लब की एक सदस्या की बेटी का स्वागत समारोह, वह आईएएस में उत्तीर्ण हुई है. कुछ देर पूर्व छोटी बहन से बात हुई, वह खुश थी, परसों से उसे अपने भीतर शांति का अनुभव हो रहा है, ईश्वर उसे सदा इसी तरह प्रसन्न रखे ! उसके भीतर भी शांति का साम्राज्य है, जो अब खण्डित नहीं होता, होता भी है तो कुछ क्षणों के लिये. मन अपने पुराने स्वभाव में लौटना चाहता है, पर मन वास्तविक नहीं है, एक मिराज है ! एक इंद्रधनुष जैसा... मन का कहना नहीं मानना चाहिए अर्थात मन का भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मन को कोई तवज्जो नहीं देनी चाहिए जब यह कुछ नासाज हो ! 

Tuesday, August 16, 2016

ब्रह्म मुहूर्त


आज कई दिनों के बाद धूप निकली है. समय वही दोपहर का है पर वह भीतर है, सिर में हल्का दर्द है, आइसपैक का इलाज बेहतर रहेगा. आज जून बहुत खुश हैं. वह अध्यात्म के मार्ग पर चलने को तत्पर हैं, भीतर के प्रेम को महसूस ही नहीं कर रहे, प्रकट भी कर रहे हैं..सद्गुरु की अपार कृपा है उन दोनों पर..वह दूर होकर भी इतने पास हैं..आज भी ध्यान में उनके ही चरणकमल थे, परमात्मा को जब वे अपने जीवन का केंद्र बना लेते हैं तो प्रसन्नता उनके अंग-संग छाया की तरह रहती है, आज ब्लॉग पर एक नयी कविता पोस्ट की !

पिछले पांच दिन डायरी नहीं खोली. कल दिन भर शाम के सत्संग की तैयारी में बीता. आए कुल जमा तीन लोग. सद्गुरू उसे कुछ संदेश देना चाह रहे हैं. परसों वे डिब्रूगढ़ गये थे. जून का दर्द कम होता था फिर बढ़ जाता था. वहाँ एक डाक्टर को दिखाया, उसने एक इंजेक्शन दिया, अब काफी कम है. उससे पूर्व इतवार था, एक सखी को रात्रि भोजन पर बुलाया था, शनिवार को एक सखी का जन्मदिन था, वे पार्टी में गये. शुक्रवार को दोपहर बहुत गर्म थी, शाम को एक बुजुर्ग आंटी से मिलने गये. सो ये पिछले पांच दिन खुद से दूर ही बीते. आज पुनः खुद की सुध आई है. साधना भी कई दिन बाद मन से की. इस समय साढ़े दस बजे हैं सुबह के, दोपहर का भोजन बन गया है. थोडा सा वक्त है. भीतर सदा की तरह शांति है और है एक दृढ़ संकल्प कि कितना भी आवश्यक कार्य हो साधना नहीं छोड़नी है और न ही लिखना छोड़ना है, इससे खुद का पता रहता है कि वे किधर जा रहे हैं. जून भी शायद एकाध दिन से नहीं लिख रहे हैं. कल से वह सुबह के कीमती वक्त का पूरा उपयोग करेगी. एक पल भी व्यर्थ नहीं खोना है. ब्रह्म मुहूर्त की बेला इधर-उधर की बातों में नहीं खोयी जा सकती ! माँ-पिताजी बाहर बैठे हैं. मौसम पुनः बदली वाला हो गया है. नन्हा इतवार की रात को चेन्नई से नहीं चला, बल्कि सोमवार को मोटरसाईकिल पर एक मित्र के साथ आया. जून को इस बात की जानकारी नहीं है, वह व्यर्थ ही परेशान हो जायेंगे. छोटी बहन ने लिखा है वह फिलोसफी की अध्यापिका से मिलेगी, पर उसे अपने सवालों के जवाब भीतर ही खोजने होंगे, बाहर केवल भटकन है, हर एक को अपना रास्ता स्वयं ही बनाना पड़ता है. सद्गुरू की पहचान भी तभी होती है जब खुद से पहचान हो जाये. बड़ी भांजी को अब सन्तान की जरूरत महसूस होने लगी है. उसे जिस सहयोग व ज्ञान की जरूरत है वह परिवार से मिलना कठिन है. दीदी को ही उसे समझाना होगा, लेकिन तभी न जब वह स्वयं पूछे.

आज वर्ष का सबसे लम्बा दिन है. वे रोज की तरह चिड़ियों की चहकार सुनकर उठे. मंझला भाई दो दिनों के लिए आया था, कल शाम उसे ट्रेन में बिठाकर वापस लौटे और योग निद्रा का अभ्यास किया. ध्यान अब जीवन का स्वाभाविक अंग बन गया है और मुस्कान अपनी सहज आदत..जून भी अब बेबात मुस्कुराना सीख गये हैं ! आज उसकी छात्रा के आने का दिन था, पर शायद वह पैतृक घर गयी होगी. सुबह घर की सफाई की और साप्ताहिक स्नान भी, स्वच्छता पवित्रता से भर देती है. इस वक्त धूप निकली है और हल्की बूंदा-बांदी भी हो रही है ! उसके सम्मुख तीन न्यूज़वीक पड़ी हैं.

आज बचपन की एक स्मृति पर आधारित कविता लिखी और पिताजी, दीदी व बड़े भाई को भेजी, पता नहीं क्या प्रतिक्रिया हो उनकी..आज सत्संग का दिन है, अब जून भी पूरे उत्साह से तैयारी करते हैं. परमात्मा को केंद्र में रखे कोई तो जीवन कैसा रसपूर्ण हो जाता है, फिर किसी बात की कोई फ़िक्र रहती ही नहीं. अभी सवा पांच हुए हैं, वह इस कक्ष में आ गयी है, जहाँ अगरबत्ती की भीनी-भीनी सी खुशबू है, शीतल हवा है, श्वेत चादर है और दीवार पर गुरूजी की मुस्कुराती सी तस्वीर है. इस क्षण भीतर एक पूर्णता का अनुभव हो रहा है, जैसे कुछ भी पाना शेष नहीं है, पाना अर्थात सांसारिक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से तो अनंत संभावनाओं के द्वार खुले हैं !


Monday, May 30, 2016

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !


Monday, February 29, 2016

संधि बेला का सौन्दर्य


आज उसका जन्मदिन है, इतने वर्षों में कितने कड़वे बोल बोले, कितने टेढ़े बोल बोले, कितनों का दिल दुखाया होगा, जीवन कितना अर्थहीन लगता है कभी-कभी, आत्मा के स्तर पर जाते ही जो शांति भीतर महसूस होती है वह मन से देह के स्तर पर आते-आते जैसे वे स्वयं ही लुटाते जाते हैं, संस्कारों के वशीभूत होकर वे न चाहते हुए भी ऐसा कुछ कर जाते हैं, इच्छा शक्ति की कमी या प्रारब्ध. कृष्ण कहते हैं वह कामना ही मनुष्य को बलात पाप की ओर ले जाती है, जिससे उसका ज्ञान ढका है. उसे इस क्षण जगत से कुछ भी नहीं चाहिए, दाता बनना भाता है उसे याचक नहीं, फिर भी जब तक देह है जगत का दिया हुआ ही ग्रहण करना है और समाज में रहते हुए लेन-देन की रीत भी निभानी है. उसे एकांत भाता है. आज सुबह क्रिया के बाद भीतर सविकल्प तथा निर्विकल्प समाधि का भेद जैसे कोई स्पष्ट कर गया. हर रोज क्रिया के बाद एक नवीन भाव या विचार भीतर जगता है पर आज उसके जन्मदिन का उपहार मिला है, वह अनंत सत्ता, वह अव्यक्त जैसे उसके साथ हर वक्त है, वह भीतर ही है, पर दीखता नहीं, वह सदा सजग है, प्रेरित करता है, एक पल में मुस्कान ला देता है, कितना भी उदास हो मन, एक क्षण की स्मृति उसे प्रसन्न कर देती है और यह उदासी भी तो एक पल की विस्मृति से ही आई होती है. अब तो उसके बिना एक क्षण भी नहीं बीतता, शास्त्रों के सारे वाक्य जैसे सत्य प्रतीत होते लगते हैं !

कल दिन भर जून उसके जन्मदिन की ख़ुशी मनाते रहे. बच्चों के लिए बिस्किट लाये, मृणाल ज्योति के लिए फोटो फ्रेम करके लाये, मिठाई लाये और गाड़ी का इंतजाम भी किया. शाम को ब्रेड रोल तले, टेबल लगाया और ख़ुशी-ख़ुशी जन्मदिन मनाया, पर रात को उसने उन्हें न जाने क्यों नाराज कर दिया. उसका मन उड़ने को बेचैन था, आत्मा की ऊंचाइयों में उड़ने को और वह उसे नीचे ला जाना चाहते थे. वह प्रेम की बात करना चाहती थी और वह बात करना ही नहीं चाहते थे. सुबह भी उनका मूड ठीक नहीं था, वह छोटी सी बात को( उनके लिए बात छोटी नहीं रही होगी, बहुत बड़ी रही होगी) दिल से लगा लेते हैं. उनके मध्य दूरी का एक ही कारण है वह प्रेम के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहती है और वह मात्र..लेकिन वे दोनों ही एकदूसरे से बेहद प्रेम करते हैं, प्रेम कैसा भी हो आत्मिक, मानसिक या..प्रेम ही होता है और प्रेम का अपमान स्वयं ईश्वर का अपमान है. प्रेम के हर रूप को स्वीकारना सीखना होगा, प्रेम हर रूप में पावन है, प्रेम भरे मन को ठेस पहुंचना पाप ही तो है. अब जून डिब्रूगढ़ से वापस आ रहे होंगे, थोड़ी ही देर में वह उसके सम्मुख होंगे और अब वह उन्हें नाराज नहीं करेगी, उनके प्रेम का प्रत्युतर प्रेम से ही देगी. उनके जीवन के कुछ ही बरस शेष हैं, वे दोनों ही युवावस्था को पार कर चुके हैं, एक-दूसरे की उन्हें आने वाले वर्षों में और भी आवश्यकता होगी. जिसने एक से प्रेम कर लिया उसने सब से प्रेम कर लिया. एक में सब और सब में वह एक ही तो समाया है.

आज सुबह संधि बेला में भगवान के सुंदर विग्रह का दर्शन हुआ, राम का रूप था या श्याम का, सुंदर मुखड़ा, आभूषण और सुंदर वस्त्र, एक चित्र की भांति क्षण भर के लिए सम्मुख आया और विलीन हो गया. इस बार बहुत दिनों, महीनों के बाद ऐसा दर्शन हुआ है, संधि बेला में तारे दीखते हैं, प्रकाश भी दिखता है और अद्भुत शांति का अनुभव भी होता है. परमात्मा हर पल उनके साथ है, वह यह बात कई तरह से उन्हें समझाना चाहता है, वह अकारण दयालु उनका सुहृद है, वह रस ही है, उसका नाम लेते ही कैसा खिल जाता है मन, वह उनकी आत्मा के रूप में भीतर भी है वही सारे जगत में अव्यक्त रूप से विद्यमान है. आज दीदी का जन्मदिन है, उसने उन्हें शुभकामनायें दीं. उस दिन जून को उसने मना लिया, वह पुनः सहज हो गये हैं. कल बुआजी का फोन आया, उन्होंने कहा, उसकी सभी कविताएँ पढ़ ली हैं, कई दिनों से उसने कोई नई कविता नहीं लिखी है. आधा जीवन बीत गया है, एक दिन मृत्यु सम्मुख होगी, उस क्षण कोई अफ़सोस न रहे इसका ध्यान तो रखना होगा, और अभी ही रखना होगा. आज शाम को एक सखी ने अपने घर बुलाया है, मौसम आज सुहावना है, शीतल पवन, आकाश में बादल तथा बगीचे से आती फूलों की सुगंध, पर इसी वक्त इस धरती पर न जाने कितने ही जन पीड़ा का अनुभव कर रहे होंगे. ईश्वर उन सबके भी साथ है. घर में आजकल चीटियाँ बहुत हो गयी हैं. कल एक अन्य सखी के यहाँ गयी, उसके पुत्र का रुझान धर्म की और है, दिल से वह भी तो कवि है.


Wednesday, February 10, 2016

या देवी सर्वभूतानां


नवरात्रि उत्सव आरम्भ हो गया है. देवी की आराधना का उत्सव अर्थात चेतना की शक्ति की आराधना. सद्गुरु ने कितनी सहजता से इसका अर्थ बताया. विष्णु के कान के मैल से उत्पन्न मधु-कैटभ को मारने में जब विष्णु असमर्थ हुए तो देवी को आना पड़ा. चंड-मुंड का नाश भी देवी करती है. चंड अर्थात ऐसी चेतना जो केवल शरीर के निचले हिस्से में स्थित है, हृदय को प्रमुखता देती है, भावुक है तथा मुंड जो दिमाग को प्रमुखता देती है. दोनों ही अकेले-अकेले खतरनाक हैं, दिल व दिमाग का सामंजस्य ही व्यक्ति को पूर्ण बनाता है. जब आत्मा की शक्ति जगती है तो दोनों में संतुलन होता है. रक्तबीज का नाश भी देवी ने किया, अर्थात रक्त में घुले विकार चाहे वे शारीरिक रोग हों या मानसिक रोग, उनका नाश भी आत्मा की शक्ति से सम्भव है. नवरात्रि के नौ दिन गर्भ में नौ महीनों के वास के समान है, जिसके बाद नई सृष्टि देखने को मिलती है.

बचपन से अभी तक उससे कितनी ही भूलें हुई हैं, असत्य बोलना, चोरी और वाणी के अनगिनत अपराध, बुरे संकल्पों के, ईर्ष्या, द्वेष, परनिन्दा व और भी कितने-कितने अपराध होते ही रहे हैं, जो अनजाने में हुए उन्हें तो परमात्मा भी सम्भवतः क्षमा कर देता हो, लेकिन जो लोभ वश, स्वार्थ वश, अज्ञान वश, मोह वश हुए या किये उनसे छुटकारा तो वक्त ही देगा, कभी दुःख के रूप में, कभी ग्लानि के रूप में. लेकिन कल दोपहर मन को एक ग्रन्थि से छुटकारा मिल गया, भीतर जैसे कोई घड़ों जल डालकर धो गया हो ऐसी स्वच्छता का अनुभव हुआ ! गुरूजी भी कहते हैं सभी विकार प्रेम का ही विकृत रूप हैं, तो वह प्रेम ही था जो अभी अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं आया था, जो उन दिनों उसे भरमा रहा था. विकृत प्रेम ही ईर्ष्या है, अब जब स्वयं को आत्मा जान लिया है, भीतर सन्नाटा है. शास्त्र कहते हैं ज्ञान की अग्नि में सारे संचित कर्म जल जाते हैं, अब केवल प्रारब्ध कर्म ही शेष हैं. जिनका भुगतान समता से करना है. ससुरल से माँ-पिताजी आये हैं, उन्हें कोई बात दुःख देने वाली न लगे, वाणी पर नियन्त्रण रहे, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है. जून अपने दफ्तर में व्यस्त हैं, आईएसओ सर्टिफिकेट लेने के लिए उन्हें काफी काम करना पड़ रहा है.  

आज सुना, उन्हें स्मृति के साथ-साथ धृति का विकास करना है. धृति का अर्थ है धारणा, धैर्य ! धारणा यदि दृढ हो, मन यदि एक वस्तु पर टिककर उसी का चिन्तन करे तो समाधान हो जाता है. धैर्य की कमी से ही आज संबंध बिगड़ रहे हैं. सहन शक्ति की कमी से ही दूसरों के दोष दिखाई देते हैं, वाणी का अपराध होता है. इस जीवन में सभी को अपनी यात्रा अपने ढंग से करनी है. साधक को आग्रह त्यागकर प्रेम से मध्य मार्ग निकलना है. जीवन की परिस्थितियाँ तो बदल रही हैं, उनके हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह उन्हें बहा ले जा सकता है. समता से ही आंतरिक प्रसन्नता बनी रह सकती है. परमात्मा सभी के भीतर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है, सभी को उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है उसके भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. वे इस जगत में प्रेम अनुभव करने व बांटने ही तो आये हैं, अथवा तो सहयोग करने, शरीर द्वारा सहयोग करना तथा मन द्वारा प्रेम देना ही तो साधक का लक्ष्य है !

  

Wednesday, September 9, 2015

भीनी-भीनी गंध



उस दिन स्वप्न में ( एक-दो दिन पूर्व ) देखा कि एक मृत देह के साथ वे एक ही बिस्तर पर सो रहे हैं. वे जानते हैं कि यह मृत देह है शायद उसकी बहन का, पर वे नींद में इतने मग्न हैं कि उठकर उससे अलग होना ही नहीं चाहते, कैसा स्वप्न था वह ? उसे बचपन से ही एक मृत्यु की याद बेचैन करती रही है, उसकी आठ वर्षीय बहन की मृत्यु जो रात में हुई और घर में सभी सो रहे थे. माँ अकेली उस मरती हुई बच्ची के पास थी, रात को एकाएक वह चिल्लाई...गयी! सारे घर में रोना-धोना मच गया. वह छोटी थी शायद पांच या छह वर्ष की. मृत्यु को नहीं जानती थी पर इतने वर्षों तक वह दुखद स्मृति उसे बेचैन कर देती थी. उस स्वप्न के बाद से जैसे मन से उस घटना का विलोप हो गया है, ऐसे ही एक बार बहुत बचपन में घटी घटना पुनः स्वप्न में देखी और उसका असर जाता रहा. उसकी आत्मा उसके मन पर मरहम लगा रही है, वह चेतना उसके मन का इलाज कर रही है. वह सद्गुरु से जुड़ी है, सद्गुरु परमात्मा से जुड़े हैं तो परमात्मा ही है जो उसके भीतर से सारे कांटे चुन-चुन कर निकाल रहे हैं. वह किसी महान उद्देश्य के लिए तैयार की जा रही है. उसकी निजी कोई चाह शेष नहीं रही, चाह तो मन में होती है जो मन से पार चला गया हो, जो अमृत का स्वाद चख चुका हो उसे इस नश्वर जगत से क्या मिल सकता है ! शाश्वत जीवन के द्वार पर खड़ी वह स्वयं को नवीन अनुभव कर रही है. उसे बहुत कार्य करना है. प्रेम तथा सेवा के कार्य. जिन्हें करने वाली वह नहीं, अर्थात उन सीमित अर्थों में नहीं जिसमें जगत उसे देखता है. जगत अपनी राह चलेगा, वह उससे दूर निकल गयी है.


आज ध्यान करते हुए एक भीनी-भीनी मधुर( चम्पा के फूलों की सी ) गंध का आभास हुआ, कैसा विचित्र अनुभव. परमात्मा की तरफ कोई कदम तो रखे, कैसे-कैसे अनुभव होने लगते हैं. वे जितना-  जितना भीतर से खाली होते जाते हैं, चैतन्य उतना-उतना उसमें भरता जाता है. जब कोई इच्छा नहीं रहेगी तो पुनः जन्म नहीं होगा, अभी तो न जाने कितनी इच्छाएं अवचेतन में दबी पड़ी हैं. चेतन मन में इच्छाएं अब कम ही उठती हैं सिवाय उस परमात्मा की इच्छा के. इस जगत में इच्छा करने योग्य एक वही तो है ! पर वह भी तभी मिलता है जब उसकी भी इच्छा न रहे... कल उसने स्वप्न में एक संत महात्मा को देखा, जिन्हें देखते ही किसी पूर्वजन्म की स्मृति हो आयी और भाव विह्वल होकर उनके चरणों पर गिर पड़ी. सम्भवतः सद्गुरु उसे जगाने आए थे पर वह उसके बाद भी सोती रही. साधना के पथ पर जब उसने कदम रखा है तो सबसे पहले यह लक्ष्य दृढ़ होना चाहिए कि उसे भाव शुद्धि, वाक् शुद्धि तथा कर्म शुद्धि प्राप्त करनी है. आज सुबह सद्गुरु ने बताया कि जिसकी वाणी, भाव तथा कृत्य तीनों शुद्ध होते हैं वही परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है. उसका लक्ष्य यही है, ध्यान में गहराई आने से यह सहज ही होने लगता है. उसका एक कृत्य आज शुद्ध नहीं रहा. अभी तक भी वह स्वयं को सहज रखना नहीं सीख पायी, सहयोग की भावना जरा भी नहीं है अर्थात भाव भी शुद्ध नहीं हुए. नीरू माँ कहती हैं जिसके प्रति अपराध बनता है वह शुद्धात्मा है यह ज्ञान न रहे तो प्रतिक्रमण ही एक मात्र उपाय है.  

Tuesday, July 21, 2015

नीरू माँ की शिक्षा


आज ध्यान में कैसी खुमारी छा रही थी. नाश्ते में दलिया, पोहा और एक ‘बनाना’, लिया था, अन्न का भी एक नशा होता है. यह ध्यान था या नींद थी, कैसे कह सकते हैं. सद्गुरु कहते हैं ध्यान के बाद तो चेतनता का स्तर बढ़ जाना चाहिए. नींद के बाद भी एक ताजगी आती है पर मन उतना सचेत नहीं रहता. उसका मन पूर्ववत है, एक सा, एक शांत सरोवर की तरह. सर के ऊपरी भाग में एक अजीब सी सनसनाहट का अनुभव हो रहा है. कई बार होता है एक सिहरन या कहें स्पंदन महसूस होता है. कभी-कभी पूरे शरीर में ही अद्भुत रोमांच और कम्पन होता है ध्यान में. पता नहीं कितने रहस्य छुपे हैं चेतना में, जगत भी दीखता है. स्वप्न में भी तो चेतना कितने अद्भुत दृश्य गढ़ लेती है. कल स्वप्न में देखा फिर वह एक मुस्लिम मोहल्ले में फंस गयी है. वहाँ एक के बाद एक घर ही नजर आते हैं, न कोई सड़क न गली, घरों के दरवाजों से गुजरकर ही जाना पड़ता है यदि कहीं बाहर जाना हो. यह स्वप्न उसे अनेकों बार आ चुका है शायद किसी पूर्वजन्म की स्मृति है. गुरुमाँ कहती हैं जिस तरह जगने के बाद स्वप्न महत्वहीन हो जाता है वैसे ही संतजन इस जगत को स्वप्न मानकर कोई महत्व नहीं देते !

“घर में वृद्ध माता-पिता हों तो घर में ही तीर्थ होता है, उनकी सेवा करने से ही सारे तीर्थों का सेवन करने का पुण्य मिल जाता है.” स्वामी रामसुखदास जी का प्रवचन सुनकर हृदय पर कैसा मीठा आघात होता है, शहद की तरह मीठी उनकी वाणी और उससे भी मधुर ईश्वर के प्रेम में रची-बसी जैसे चाशनी में डूबी हो, ऐसी हँसी उसके अंतर को छू जाती है. उसने सद्गुरु को भी सुना. नन्हे बच्चों को कैसे संस्कार दें, इस पर चर्चा कर रहे थे. पहले लिंग, मूर्तिपूजा, मन्त्र जप, मन्दिर आदि के महत्व पर प्रकाश डाला. अद्भुत ज्ञान का भंडार है उनके पास और कैसी सहज, बालवत् निश्छलता. संतों के अलावा जगत में किसको जीने की कला आती है, उधर स्वामी रामदेव जी हैं जो उन्हें कितने भिन्न-भिन्न तरीकों से देह से ऊपर ले जाना चाहते हैं, वे अद्भुत क्रान्तिकारी संत हैं, उनकी वाणी भीतर जोश भरती है. गुरूमाँ तो साक्षात् सरस्वती हैं, कितना प्रेम है उनकी वाणी में, उनके हृदय में. नीरूमाँ की ज्ञान की विधि कैसी अनोखी होगी कि लोग अपनी फाइलें सुधारने लगते हैं. ये सारे संतजन उसे बहुत प्यारे हैं. सभी को उसने अनंत-अनंत नमन किये. सद्गुरु तो और भी निराले हैं, वह कहते हैं कुछ मान के चलो, कुछ जान के चलो. वे भावना पर बल देते हैं. वे भीतर के विश्वास को दृढ करना चाहते हैं वे ज्ञान को बोझिल नहीं बनाते. हर संत अपने आप में अनूठा होता है. सबके रास्ते भिन्न-भिन्न हैं मंजिल एक ही है, उसे भी एक ही मार्ग पर चलना है, सद्गुरु के मार्ग पर !  फिर उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, वही तो हैं जो भिन्न-भिन्न रूप धर कर ज्ञान फैला रहे हैं. एक ही सत्ता है जो चारों ओर फैली है, वही भीतर है वही बाहर है. वही उसे सत्य के मार्ग की ओर ले जाएगी ! उसने प्रार्थना की कि उसका हृदय किसी के प्रति राग-द्वेष से लिप्त न रहे.  


कल उसे हल्का जुकाम था, आज अपेक्षाकृत शरीर स्वस्थ है. सारे रोग प्रज्ञापराध के कारण ही होते हैं. पर इससे उसे कितना कुछ सीखने को मिला है. एक तो देह से अलग जानकर स्वयं को स्वस्थ जानने का अभ्यास. दूसरा नम्रता का पाठ, जो रोग पढ़ाता है. पिछले दिनों उसने अन्यों की बीमारी को देखकर उन्हें दोषदृष्टि से देखा. उससे मुक्त करने के लिए शायद यह रोग आया, ताकि वह स्वयं को सजग तथा अन्यों को असजग न समझे. प्रकृति उसे दोष रहित देखना चाहती है.

Tuesday, January 13, 2015

भागवद पुराण की कथाएं



आजकल धूप आँख-मिचौली खेलती रहती है, मौसम ठंडा-ठंडा सा ही रहता है. उन्होंने मोज़े, स्वेटर पहनना शुरू कर दिया है. आज दोपहर को जब जून ऑफिस चले गये वह प्रमाद वश नहीं उठी तो अजीब सा स्वप्न आया. सड़क पर चलते हुए कुछ खिलौने उससे मिलने आ रहे हैं. स्वप्न चेताने आते हैं और स्वप्न भी तो वही भेजता है. आज सुबह कृष्ण कथा सुनी, उसकी कथाएं अनुपम हैं, अगली बार घर जाने पर वह अवश्य ही ‘भागवद् पुराण’ खरीदेगी. कल रात दीदी का फोन आया. सुबह उसने छोटे भाई को किया था. उसने गर्मी की छुट्टियों में वहाँ आने के लिए कहा है. जून भी घर जाने को कह रहे हैं. हिमाचल जाने का भी उनका मन है. परीक्षाओं के बाद यात्रा का योग काफी प्रबल है. ईश्वर उनके साथ है, वही सही मार्ग सुझाएगा. आज पिता का पत्र भी आया है. कल ‘श्री शंकर देव’ के लिए लिखा लेख हिंदी पत्रिका के लिए भिजवाया. नन्हे की पूर्व परीक्षाएं  चल रही हैं. मात्र दो महीने उसके फाइनल्स में रह गये हैं. आजकल वह स्वयं ही पढ़ता है.

ध्यान में यदि उतरना हो तो एक भी व्यर्थ का ख्याल नहीं आना चाहिए नहीं तो वही एक ख्याल रस्सी बन जाता है जो ऊपर ले आती है. मन पूरा का पूरा खाली हो जाये तो ध्यान गहरा होता जाता है. आज जून ने छुट्टी ली है, साल का आखिरी महिना है छुट्टियाँ व्यर्थ हो जाएँगी, इसलिए आज वह घर पर हैं. उन्हें दोपहर को कोपरेटिव स्टोर जाना है और शाम को नन्हे के साथ कनज्यूमर फोरम भी जाना है. यानि आज का दिन खरीदारी को समर्पित होगा. नये वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स भी उन्हें खरीदने हैं. मौसम आज खिला हुआ है. कल रात स्वप्न में एक घायल महिला को जो खून से लथपथ थी वह अस्पताल ले जाती है. शायद रात को देखी ‘Matilda’ फिल्म के कारण यह स्वप्न आया था. यह किताब उसने काफी पहले पढ़ी थी.

क्रोध कब आकर उन्हें परास्त कर देता है पता ही नहीं चलता. लेकिन यह आध्यात्मिक प्रगति के लिए बहुत बड़ी बाधा है. कल शाम जून ने उसकी बात नहीं सुनी तो चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही उसे क्रोध आया तो था. मन, वाणी और क्रोध के वेगों को रोकना ही होगा, अन्यथा वे जहाँ है वहीं रह जायेंगे बल्कि पीछे जाने का डर अधिक है. इन सारे वेगों को नियंत्रित करने का एकमात्र उपाय है कृष्ण का नाम. उसकी स्मृति बनी रहे तो कोई ताप नहीं सताता भौतिक जगत में कोई न कोई दुःख तो रहेगा ही, जब तक ईश्वर की स्मृति बनी रहेगी तभी तक वे इन दुखों से अलिप्त रह सकते हैं ! उसे दिल से चाहो तो वह विश्रांति के रूप में तत्क्षण अपना अनुभव करा देता है. आत्मा जो उसी का अंश है उसी की भाषा बोलती है परदेश में कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाये तो कैसी ख़ुशी होती है. मन जब शांत होकर आत्मा का आश्रय लेता है तो वह भी उसी की भाषा बोलता है.


Friday, January 2, 2015

मुक्त उड़ान

 

आज उस सखी के यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन किया गया है. उन्हें वहाँ नौ बजे के बाद पहुंचना है. कल शाम उस समस्याग्रस्त सखी का फोन आया, उसके घर में सुलह होने की शुरुआत तो हुई है. गुरूजी की वह कृतज्ञ है, उन्हीं की कृपा से यह चमत्कार ( उसी के शब्दों में ) हुआ है. उसकी भी सारी उलझनों को गुरू की स्मृति एक चुटकी में दूर कर देती है. भक्त के लिए भगवान सदैव तत्पर है, वह आने में एक क्षण भी नहीं लगाता. भगवान के लिए प्रेम ही परमधर्म है. अपने अंतर में छिपे प्रेम को प्रकट करना है. इस प्रेम को प्रकट करने में गुरू सहायक है. उसका अर्थ ही है जो अज्ञान को दूर करे, क्योंकि वह स्वयं मुक्त है, वही मुक्त कर सकता है. जो स्वयं बंधा हो वह क्या मुक्त करेगा. सद्गुरु को सुबह-शाम वह एक ज्योति के रूप में अपने साथ पाती है. शास्त्र माँ है और गुरू पिता है, उनकी शरण में आकर ही कोई द्विज होता है. दूसरा जन्म पाता है. ज्ञान का अभ्यास करने से और सेवा करने से ही कोई ज्ञान का अधिकारी बनता है. सतोगुण से ऊपर शुद्ध सतोगुण में स्थित होना है.

उसे लगता है सुख-दुःख मान्यता और कल्पना के आधार पर होता है. सुख-दुख को सच्चा मानना ईश्वर को सच्चा न मानना है. मन एक वृत्ति है, सागर की तरंग की तरह, वही सुख-दुःख का अनुभव करता है. है कुछ भी नहीं पर अनादि कल से वे इससे बंधे जा रहे हैं. अज्ञान का आधार तो मन ही है, मन की दीवारें गिर जाएँ तो यह अज्ञान उसी तरह लुप्त हो जायेगा जैसे अँधेरे कमरे की दीवारें गिर जाने पर वहाँ अंधेरा नहीं टिकता. या फिर मन एक चलते-फिरते रस्ते की तरह है जिस पर तरह-तरह के लोग हर समय चलते रहते हैं, यदि वह इनसे नाता न रखे और किसी भी वृत्ति का आग्रह न करे तो ही अविचलित रहेगी. आत्मा सभी को स्पर्श करते हुए भी किसी को स्पर्श नहीं करता, जैसे सूर्य की किरणें छूती हुई भी किसी को भी नहीं छूतीं. मन को भी आत्मा सा मुक्त होना सीखना होगा. निस्सीम गगन सा मुक्त, अनंत ब्रह्मांड सा मुक्त और पवन सा मुक्त..इसी मुक्ति को तो मोक्ष कहा गया है और यह मुक्ति पल भर को भी मिले तो भी अमूल्य है. जैसे बादल की सत्ता सूर्य से है पर बादल सूर्य को ढक लेते हैं वैसे ही आत्मा की सत्ता से से ही अज्ञान की सत्ता है. मृग-मरीचिका ही अज्ञान है, जो है ही नहीं उसके पीछे दौड़ते रहना ही तो अज्ञान है.

कल शाम उसे कुछ आवाजें जैसे दूर से बजते ढोल की आवाज सुनाई दे रही थी, कभी किसी वाद्य की आवाज, पर बाद में नींद आ गयी. कल शाम से ही जून कुछ चुप-चुप थे पर आज सुबह उन्होंने साथ-साथ क्रिया की और दफ्तर जाते वक्त वह सामान्य थे. दीदी को फोन किया वे लोग स्वयं भी नर्सिंग होम के मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. उसे याद आया, छोटी बुआ को पत्र लिखना है. टीवी पर आत्मा में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली भगवद गीता का पाठ आ रहा है. ईश्वर हर वक्त उसके निकट हैं. तीनों गुणों से परे अत्रि और सूया से परे अनसूया के पास वे बिन बुलाये ही चले जाते हैं.


दस बजे हैं, अभी विचार आया कि एक परिचिता से किये वादे को निभाने के लिए उनके यहाँ जाये. उनका बगीचा देखा, जगह ज्यादा है पर सूझ-बुझ से उसका उपयोग हुआ हो ऐसा नहीं लगता, खैर, वापस आयी तो लंच का समय होने ही वाला था. जून के दफ्तर जाने के बाद संगीत का अभ्यास किया, नये शिक्षक के सिखाने का तरीका बिलकुल अलग है और शुल्क भी तिगुना. पर संगीत को पैसों से नहीं तोला जा सकता. परसों शाम को तेजपुर की साधिका का फोन आया. योग शिक्षक तेजपुर में आ चुके होंगे. आज सुबह  जागरण में सुना, आसक्ति ही मानव को बांधती है. वास्तव में वह मुक्त है. अनंत शक्ति का भंडार है, लेकिन असली रूप को भुला बैठा है. उस दिन उसे अंतरतम की झलक मिली थी, अतिशय आनंद की अनुभूति हुई थी. वही आनंद थोडा थोड़ा करके रोज रिसता है और उसके अंतर को हरा-भरा रखता है. 

Sunday, September 7, 2014

गुजरात का भूकंप


परसों सुबह छोटी बहन ने फोन पर खबर दी, बात करते वक्त वह सामान्य थी पर फोन रखते-रखते ही रुलाई फूट पड़ी. मन जानता था कि यह होने ही वाला है. गुजरात में आए भूचाल में लाखों प्रभावित हुए हैं, हजारों की मौत हो गयी. एक झटके में वे गहरी नींद में सो गये. जीवन कितना क्षण भंगुर है. इलाहबाद में महाकुम्भ में एक ओर लाखों स्नान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गुजरात के लोग दुःख और पीड़ा में डूबे हुए हैं. इन्सान प्रकृति के आगे कितना बेबस है.

कुछ देर पूर्व मंझली भाभी से बात की. आज वहाँ सभी फूल चुनने गये हैं. आज चौथा रस्म है, शनिवार को दसमी और छह को तेहरवीं. कल दिन भर जून बेहद उदास दिखे, उन्हें ऐसा देखकर उसने सामान्य रहने का प्रयास किया, पर सहज रूप से रहना अलग बात है कोशिश करना अलग. नन्हे का स्कूल आज बंद है, आज बसंत पंचमी है. सरस्वती पूजा का आयोजन जगह-जगह किया जा रहा है.

जीवन के सच बहुत कड़वे होते हैं, मानव आँखों पर रेशमी पर्दे डाले रहता है पर सच्चाई सारे पर्दे उठा सामने आ खड़ी होती है. मृत्यु भी एक ऐसी सच्चाई है. आज बापू की पुण्य तिथि भी है ‘शहीद दिवस’, सो आज मरण दिवस ही है. पर मृत्यु के बाद नया जन्म भी तो होता है. आत्मा को नव शिशु का कलेवर मिलता है एक बार फिर मृत्यु का ग्रास बनने के लिए. इसलिए ही संतों ने इस चक्र से मुक्ति को ही मानव का अंतिम लक्ष्य माना है. कितने जन्मों में कोई कितना कुछ पाए अथवा खोये, अंततः मृत्यु सब समेट लेगी. किन्तु इससे जीवन की महत्ता कम तो नहीं हो जाती. जीवन चाहे एक क्षण का हो या कुछ वर्षों का, अपने आप में एक उपहार है. जैसे और भौतिक वस्तुएं सदा साथ नहीं देतीं वैसे ही शरीर भी एक दिन नष्ट हो जायेगा. यही सनातन सत्य है. फूल खिलता है झरता है फिर खिलता है फिर झरता है, इससे फूल की महत्ता कम तो नहीं होती. जिसका जितना साथ मिला है उतना ही कृतज्ञ होते हुए उसे सम्मान देना चाहिए. गुजरात के उन हजारों लोगों को जो भूकम्प से आहत हुए हैं या मृत हो गये हैं, सच्ची श्रद्धांजलि वे सैनिक और समाज सेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता दे रहे हैं जो दिन-रात वहाँ काम में जुटे हैं.


मन के आकाश पर काले घने बादल छा गये कहीं कोई रोशनी की लकीर नहीं, फिर एकाएक बादल छंटने लगे और नीला आकाश धूप की चमक लिए स्पष्ट हो उठा, यह आकाश जिस तरह है नहीं पर दीखता है, उसी तरह मन का यह भ्रम उहापोह है नहीं, दीखता है. सब कुछ स्वप्नवत है आज जागरण में फिर शरीर की अनित्यता और परमात्मा की नित्यता के बारे में सुना, वर्षों से सुनती आ रही है कि देह मरण धर्मी है. लगता था कि समझ भी लिया है पर ऊपर-ऊपर से समझना और उसे वास्तव में जानना, इन दोनों में काफी फर्क है. पता नहीं कहाँ से यह दुःख मन में आकर बैठ गया है जो माँ के इस तरह चले जाने से ही उत्पन्न हुआ है. पहले-पहल लगा था कि मन सम्भला रहेगा पर पिछले दिनों की तरह उनकी स्मृति के अलावा कोई और बात मन में नहीं टिकती. शायद उसे स्वयं को ज्यादा समय देना चाहिए, धीरे-धीरे सब स्वयं ही सामान्य हो जायेगा. जून भी आजकल बहुत चुप रहते हैं. कल जब वह आये और यह बताया कि वे नहीं जा रहे हैं तो उसे बहुत दुःख हुआ. उन दोनों में से एक को वहाँ पहुंचना है ऐसा निर्णय वे कर चुके थे क्यों कि नन्हे को ले जाना ठीक नहीं होगा. कल उसके स्कूल में कवि सम्मेलन प्रतियोगिता थी. उसका हाउस अंतिम स्थान पर रहा, उसने भाग लिया और आज working model competition में भी भाग ले रहा है. सुबह दो सखियों के फोन आये उनके साथ भी वही बात हुई. गुजरात में मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है. प्रकृति निर्मम है. 

Friday, July 20, 2012

गोलगप्पों का कार्यक्रम


देखते-देखते पूरा एक माह बीत गया. नन्हे का जन्मदिन आया और उससे एक दिन पहले माँ-पापा व छोटा भाई आये थे. उनका आना उन्हें बहुत आनंदित कर गया व उन्हें भी उनका घर देखकर अच्छा लगा. जन्मदिन की पार्टी भी अच्छी रही और उसके बाद वे जगह-जगह घूमने गए, तिनसुकिया, ज्योति होटल, ड्रिलिंग साईट. पापा दिगबोई भी देख आये. एल.पी.जी. प्लांट, ओ.सी.एस. सभी दिखाए उन्होंने. पापा ने कितनी अच्छी बातें बतायीं और माँ ने भी सुनाई अपनी कहानी. छोटा भाई भी कहता रहा बीच-बीच में आपने बैंक के अनुभव, खट्टे-मीठे. और अब वे लोग चले गए हैं, पीछे रह गयी हैं स्मृतियाँ ! जो उनके मनों में सदा सजीव रहेंगी. कल सभी को पत्र भी लिखे. लगता है नन्हे का इरादा आज देर तक सोने का है, वर्षा दो दिन लगातार होकर अभी-अभी रुकी है. सो जून बाइक से ऑफिस चले गए हैं, अभी सात भी नहीं बजे हैं, उसे ढेरों काम करने हैं.

ग्यारह बज चुके हैं, आज जून बस से गए हैं सो आने में देर होगी. उसके सुबह के सभी आवश्यक कार्य हो चुके हैं, आज भी सुबह से बादल बने हैं पर लगता है दिन में मौसम स्वच्छ रहेगा. कल शाम भी तेज वर्षा के कारण वे न घूमने जा सके न ही बाजार. आज सुबह जून से वह बेबात ही गुस्सा हो बैठी, और पता नहीं क्यों दाल में अदरक भी डाल दी जबकि उसे अदरक नापसंद है.

आज भी सुबह-सुबह उसने डायरी खोली है. दिन भर तो किस तरह बीत जाता है पता ही नहीं चलता. कल उसने अपना वजन देखा कितनी तेजी से बढ़ रहा है, नियमित व्यायाम की आदत नहीं रही थी, फिर से डालनी होगी.

उस समय नन्हा उठ गया आजकल बहुत बातें करता है, हर वक्त चाहता है उसी को खिलाते रहें, देखते रहें, सुनते रहें, शाम के समय कुछ ज्यादा ध्यान चाहता है. अभी जून के आने में एक घंटा है. सुबह हुई वर्षा के कारण गोलगप्पों का कार्यक्रम तो स्थगित कर दिया था उन्होंने पर अब अच्छी खासी धूप निकल आयी है. पिछले कई दिनों से वे किसी परिचित के घर नहीं गए हैं सामाजिक शिष्टाचार के अंतर्गत. आजकल वह एक किताब पढ़ रही है- The President’s child अच्छी है, Fay Weldom की लिखी  हुई.