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Sunday, January 24, 2016

कविता का अहसास


आज सद्गुरु ने कहा, इन्द्रियगत ज्ञान सीमित है, वह विस्मय से नहीं भरता, स्वरूपगत ज्ञान अनंत है, जो आनन्द की झलक दिखाता है. अपने अज्ञान को स्वीकारने से ऐसा ज्ञान मिलता है. ज्ञेय सदा ज्ञान से छोटा है, दृश्य से हटकर द्रष्टा में आना योग का प्रथम चरण है. विस्मय से परे वह तत्व है जहाँ स्तब्धता है, मौन है, आनन्द है तथा प्रेम है. अपने आप में मस्त रहने की कला वहीं सीखी जाती है. जिस क्षण कोई साधक द्रष्टा के भाव से नीचे गिरता है, राग-द्वेष से वशीभूत हो जाता है. जून चार-पांच दिनों के लिए एक कांफ्रेंस में भाग लेने आज मुम्बई गये हैं. अगले चार दिन भगवद् ध्यान में बीतेंगे, जैसे आजकल बीत रहे हैं. परमात्मा से कोई प्रेम करे तो वह स्वयं ही उसका ख्याल रखने लगता है. वह खुद को भूलने नहीं देता. उसे तो अब सोचते हुए भी अजीब लगता है कि कभी ऐसा भी था जब उसका मन उससे दूर था. तब कितना खाली रहा होगा जीवन. अब तो हर पल एक नया संदेश लेकर आता है. आज भी ठंड काफी है, इनर व दो स्वेटर पहने हैं उसने. अभी कुछ देर पहले ही वह सांध्य भ्रमण से लौटी है. अब कुछ देर कम्प्यूटर पर काम करना है. कल ‘मृणाल ज्योति’ विशेष बच्चों के स्कूल  जाना है. उन्हें फोटो भी दिखाने हैं तथा नये वर्ष का उपहार देना है. एक सखी ने कल कहा, उसकी छोटी बहन को ‘अहसास’ शीर्षक पर एक कहानी या कविता चाहिए, उसने एक कविता लिखने का प्रयास किया है, इसी नाम से एक कहानी वर्षों पूर्व लिखी थी.

कल रात ठंड के कारण नींद खुल गयी. सुबह उठने में देरी हुई. कल शाम ही वह सखी बिना फोन किये आ गयी, अब कविता ऐसे थोड़ी ही लिखी जाती है. मृणाल ज्योति स्कूल के विशेष बच्चे उसे देखकर खुश हुए, वे उसे पहचानने लगे हैं. फोटो देखकर भी वे आनन्दित हुए. एक अध्यापिका ने उसे आते रहने को कहा, वह होली पर फिर जाएगी. इस समय दोपहर के सवा दो बजने वाले हैं, एक छात्रा पढ़ने आयेगी. नेहरु मैदान में फुटबाल प्रतियोगिता का उद्घाटन समारोह है, एक सखी ने उसमें आने को कहा था, पर सम्भव नहीं है. उसकी नन्ही बिटिया का वीडियो देखा, सहज ही उसके लिए एक कविता लिखी, वह उनके जीवन में सुखद परिवर्तन लेकर आयी है. फिर भी यदि वे संतुष्ट नहीं है तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकता. खुश रहना या न रहना मन पर ही निर्भर है और मन बुद्धि पर और बुद्धि विवेक पर, विवेक सत्संग पर और सत्संग गुरु पर, गुरू भगवान की कृपा से मिलते हैं तो अंततः भगवान ही कारण हुए पर भगवान ने तो उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता दी है. वे यदि ठान लें तो खुश रहने से कौन रोक सकता है ? यह ठानना ही तो विवेक है न ? आज बापू की पुण्यतिथि है. शहीद दिवस, कुष्ठ निवारण दिवस तथा अन्य भी कई तरह के दिवस इस दिन मनाये जाते हैं. गांधीजी सत्य के मार्ग के राही थे, तभी तो राजनीति के शुष्क वातावरण में मुस्का सकते थे.


आज गुरूजी ने समाधि के विषय में कल से आगे बताया. कई तरह की समाधि होती है. समाधि में अपने होने का भान रहता है. ‘मैं हूँ’ से ‘यह है’ अर्थात आनन्द है इसका भान रहता है. असम्प्रत्याग समाधि में अपना ज्ञान नहीं रहता. वह अभ्यास के द्वारा मिलती है. भाव समाधि, लय समाधि तथा अन्य भी कुछ समाधियों का अनुभव साधक करते हैं. अंत में तो समाधि का लोभ भी छोड़ना पड़ता है, जैसे साबुन मैल छुड़ाने के लिए लगाया फिर साबुन को भी हटाना होता है. टीवी पर मुरारी बापू अपने चिर-परिचित अंदाज में कथा सुना रहे हैं, एक कविता को वह भजन की तरह गा रहे हैं. आज ध्यान में सुंदर दृश्य दिखे. चाँदी के चमकते आभूषण तथा ताम्बे या कांसे की मूर्तियाँ, भीतर कितनी बड़ी दुनिया है, ध्यान में जिसकी झलक मिलती है. अभी तो उसने पहला कदम रखा है इस मार्ग पर, अभी बहुत चलना है. जीवन तभी तो जीवन कहलाने योग्य है जब तक उसमें कुछ नया-नया मिलता रहे, नये फूल खिलते रहें, एक प्रतीक्षा बनी रहे भीतर. प्रतीक्षा में कितना आनन्द है, कुछ बेहतर घटने वाला है, कुछ ऐसा मिलने वाला है जो आज तक नहीं मिला, जो अमूल्य है. परमात्मा की राह पर चले कोई तो हर क्षण उपहार मिलते जाते हैं और हर अगला उपहार पहले से बेहतर होता है.     

Monday, November 2, 2015

महावीर के सूत्र


आज यूँ तो द्वादशी है पर कल वह भूल गयी सो आज उपवास है, उपवास यानि निकट बैठना, उसके निकट जो वे हैं, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है, यानि आत्मा, वही तो परमात्मा है. आज ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, विचार शून्य चेतनता का अनुभव काफी देर तक होता रहा, फिर मन ने कैसे-कैसे रूप गढ़े. गीलापन, तेल, स्वाद अभी कुछ ध्यान में कितना स्पष्ट अनुभव होता है, मोती, प्रकाश और भी न जाने क्या-क्या. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वे अपनी आत्मा को जानें यानि खुद को जानें. जिसके बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. वे सभी कुछ करते हैं पर भीतर से बिलकुल अछूते रहते हैं. सब नाटक सा लगता है कुछ भी असर नहीं करता. वे इन छोटी-छोटी बातों (संसार ही छोटा हो जाता है) से ऊपर उठ जाते हैं. जीना तब कितना सहज होता है, मन भी हल्का और तन भी हल्का, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना भी नहीं, कुछ जानना भी नहीं, कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं, खेल करना है बस, जगना, सोना, खाना-पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. वह परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था, अपने सबसे करीब हो जाता है, वही अब खुद की याद दिलाता है, वह जग जाता है जो जन्मों से सोया हुआ था. सद्गुरु की बातें अक्षरशः सही लगती हैं, शास्त्र सही घटित होते हुए लगते हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

आज ‘महावीर जयंती’ है, गुरूजी ने उस पर प्रकाश डालते हुए कहा, उन्हें आत्मलोचन करना है, उनके सिद्धांतों को व्यवहार में लाना है. अहिंसा को मनसा, वाचा, कर्मणा में अपनाना है. उन्हें संग्रह की भी एक सीमा बांधनी है, उनका मन यदि सजग हो प्रतिपल, तो चेतना की अनंत शक्तियों को पा सकता है. मन यदि पल भर के लिए भी विकार ग्रस्त होता है तो वह उस शक्ति से वंचित हो जाता है. चेतना का सूरज जगमगाता रहे इसके लिए प्रमाद के बादलों को बढ़ने से रोकना होगा, तंद्रा के धुंए से बचना होगा. जीवन थोड़ा सा ही शेष बचा है, हर व्यक्ति मृत्यु का परवाना साथ लेकर आता है, कुछ वर्षों का उसका जीवन यदि किसी अच्छे काम में लगता है तो ईश्वर के प्रति धन्यता प्रकट होती है. सद्गुरु कितनी सुंदर राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. साधक भटक न जाएँ इसलिए वह भीतर से कचोटते भी रहते हैं, वे मंजिल के करीब आ-आकर फिर भटक जाते हैं !

बल, बुद्धि, विद्या उन्हें श्री हनुमान से प्राप्त होते हैं तथा अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष राम से, इन सभी के साथ जब तक विवेक न हो तो यही सभी वरदान उनके लिए शाप भी बन सकते हैं. उसकी बुद्धि  में धैर्य नहीं है, उसके बल में विवेक की कमी है और उसकी विद्या में नम्रता नहीं है. नीरू माँ कहती हैं जो कोई रिकार्ड करके लाया है वही तो बोलेगा. नूना भाव शुद्ध करती है भीतर प्रण भी लेती है पर वे भीतर ही रह जाते हैं, बाहर निकलती है केवल एक उदासीनता, एक कटुता, एक खीझ और एक अतृप्ति. जो मन नाचता था, गाता था और खिला रहता था हर पल, वह किसी बाहरी प्रभाव के कारण ऐसा पीड़ित हो जायेगा, यह कहाँ पता था. पर इसके लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो वह स्वयं  है, यात्रा के दौरान तो साधना में खलल पड़ा ही, यहाँ लौटकर भी पहले की सी तीव्रता नहीं है, बल्कि मन को इधर-उधर के कामों में ही उलझाये रखा, मन तो छोटा बच्चा है और बुद्धि उसकी बड़ी बहन, पर दोनों का आधार तो आत्मा है, आत्मा यदि स्वस्थ हो, सबल हो, सजग हो तो इनमें से किसी के साथ तादात्म्य नहीं करेगी, अपनी गरीमा में रहेगी, उस गुंजन को सुनेगी जो रात-दिन भीतर हो रही है, उस ज्योति को देखेगी जो भीतर जल रही है.

तमोगुण की प्रधानता होने पर जीवन में रजोगुण व सतोगुण दब जाते हैं. हो सकता है यह उसके किसी पूर्व कर्म का फल हो अथवा पुरुषार्थ में कमी का अथवा तो सजगता की कमी हो, पर दुःख देने वाला यह तम रूपी विष उसकी इन्द्रियों को ताप दे रहा था. आज नीरू माँ ने कहा यदि जीवन में अभी भी दुःख है तो कोई आत्मा को जानता है, ऐसी बस उसकी मान्यता भर ही है. उसका स्वभाव यानि प्रकृति वैसी की वैसी ही बनी हुई है, सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है, अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर वह खोना नहीं  चाहती, उसका ‘स्व’ अत्यंत संकीर्ण है, आत्मा को जानने वाला तो उदार होता है, उल्लास उसका साथ कभी नहीं छोड़ता, वह कामनाओं से उपर उठा होता है. अपने भीतर झांक कर देखे तो कोई विशेष कामना नजर नहीं आती, सिवाय इसके कि..परमात्मा से उसकी भेंट हो जाये, पर उसके लिए तो हृदय को पवित्र करना होगा, राग-द्वेष से मुक्त होकर, छल-छिद्र और कपट से रहित होना होगा, वाणी को मधुर बनाना होगा, वाचा, मनसा, कर्मणा एक होना होगा, हृदय व बुद्धि का मिलन करना होगा. आज इस वक्त दोपहर के साढ़े बजे वह सद्गुरु और कान्हा की उपस्थिति में स्वयं से वादा करती है कि सजगता के साथ हर कार्य करेगी. तमोगुण का अर्थ ही है बेहोशी, प्रमाद. उसे सत्वगुण के भी पार जाना है, उसकी डायरी में नीचे लिखी सूक्ति में गाँधी जी भी यही कह रहे हैं जब किसी के मन, वाणी तथा कर्म में साम्य होगा, तभी वह प्रसन्न होगा !
 


   

Thursday, May 14, 2015

रेत के महल


“नित्य-अनित्य, पुण्य-पाप का भेद जानना ही विवेक है, आसक्ति मिटाना वैराग्य है. तृष्णा ही दरिद्रता है, जब तृष्णा न हो, मन में समृद्धि हो, वही वैराग्य है. जब विवेक और वैराग्य सध जाये और साधना का सहयोग भी मिले तभी भक्ति का उदय होता है.” सद्गुरु के वचन उसके हृदय को शीतलता से भर देते हैं. कैसी अद्भुत शांति का अनुभव होता है, उनके वचन सुनने से जैसे तृप्ति नहीं होती, पर मन में कहीं गहरे संतुष्टि भरती जाती है. मन उसी तृप्ति को चाहने लगता है. तब इस जगत की बातें बहुत छोटी महत्वहीन लगने लगती हैं. यह माया जाल अपने पुर्जे खोल कर रख देता है. तब कहीं भी मन टिकता नहीं, सिवाय उसके. यह पल-पल बदलता संसार और रेत के महलों से इन्सान के स्वप्न ढहते नजर आते हैं. सब छलावा ही लगता है, सच्चा सिर्फ वही एक लगता है. सारे संबंधों के पीछे टिके स्वार्थ स्पष्ट दीखते हैं. इस जगत की सीमाएं भी दिखती हैं, देह की सीमाएं, रिश्तों की सीमाएं और मनों की सीमाएं. मन जो पल-पल रूप बदलते हैं, जो निश्छल नहीं रह पाते, जो कभी असत्य का सहारा भी ले लेते हैं और कभी सत्य से न डिगने का प्रण लेते हैं, बुद्धि भी रूप बदल लेती है तो फिर कोई किसका भरोसा करे. एक उसी का जो इन सबसे परे है, सभी प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर कार्य कर रहे हैं. मन परवश है, मुक्त वही  है जिसने मुक्त की बाँह थामी है, अपने स्व को जाना है. निज का आनंद जिसने पा लिया वह क्यों जायेगा जगत से आनंद का प्रसाद पाने, वह तो अपने आनंद को लुटाने का ही कार्य करेगा न. सद्गुरु ने उसके भीतर आनंद के जिस स्रोत का पता बताया है, वह अनंत है !

पिछले दो-दिनों से उसका मन संशय ग्रस्त है. संसार उसे अपनी ओर खींच रहा है और ईश्वर की भक्ति अपनी ओर. ऐसा विरोधाभास पहले तो प्रतीत नहीं हो रहा था. हृदय में जैसे कोई कुहरा छा गया है और यह कुहरा दम्भ का हो सकता है. कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा, दम्भ का कुहरा उतना घना होगा. मन पर कोई घटना कितनी देर तक प्रभाव डालती रहती है, इससे भी उसके घने होने का सबूत मिलता है. ऐसे में कोई उसकी सहायता कर सकता है तो वह है कृष्ण का प्रेम. उसे अपने स्वभाव में स्थित रहना होगा पूरी निष्ठा के साथ और दिखावे की आडम्बर की कोई आवश्यकता ही नहीं हैं. अंतर का प्रेम अन्तर्यामी उठने से पूर्व ही स्वीकार लेते हैं. जीवन का लक्ष्य एक हो, रास्ता एक हो और मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर के प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे बूंद-बूंद ही सही ताकि संवेदना भीगी-भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आए, न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समान रूप से बरसे ! साधक के लिए करने योग्य एक ही कर्त्तव्य रह जाता है, वह है इस संसार को असत्य मानना अथवा स्वप्न  मानना. उसके शरणागत होकर उसके संसार में काम आने का प्रयत्न करना, जीवन का लक्ष्य हो ईश्वर, रास्ता हो समर्पण और कर्म हो सेवा तभी वह  मुक्त है !

उसे अपने अवगुणों पर नजर रखनी होगी, वे पनपें नहीं बल्कि जड़ को उखाड़ फेंकना है. सबसे अधिक तो वाणी का दोष है. ज्यादा बोलना हानिप्रद है. बल्कि ज्यादा सोचना भी क्योंकि बोलने और सोचने में ज्यादा अंतर नहीं है. मन के भीतर भी बोलना नहीं होना चाहिए. लोगों से मिलते वक्त भी स्मरण बना रहे, तभी याद रहेगा कितना बोलना है. ईश्वर तो दूर वह स्वयं को भी भुला देती है और परिस्थिति की गुलाम बनकर कुछ भी बोल देती है जिसका परिणाम कभी भी सुखद नहीं होता. दूसरा अवगुण है, समय का दुरूपयोग. जीवन सीमित है, इसका एक-एक क्षण कीमती है. जीवन मिला है जीवन के लक्ष्य को पाने के लिए, सुख-सुविधाएँ जुटाकर देह को आराम देने के लिए नहीं बल्कि नियमों का पालन कर तन, मन, व आत्मा को निर्मल बनाने के लिए. चित्त की शुद्धि ही उसके पाने का मार्ग खोलती है. वही साध्य है और वही साधना !


Thursday, March 12, 2015

वृक्ष, नदी, आकाश, हवा


आज सुबह वह उठी तो तन-मन दोनों क्लांत थे, पर क्रिया के बाद तेज प्रकाश का अनुभव हुआ आज्ञा चक्र में और उसे लगा कृष्ण ने आश्वासन दिया है. वह सदा उसके साथ हैं, प्रतिक्षण भीतर से आश्वस्त करते हुए, जग की कोई पीड़ा, कोई दुःख उस आनंद को कम नहीं कर सकता जो कान्हा का साथ उसे देता है. वह उसे अपने बहुत निकट महसूस करती है, वही है जो उसकी आँखों से झाँकता है जब वह दर्पण के सामने खड़ी होती है. वही है जो मुस्कान बनकर छा जाता है जब वह ‘ध्यान’ से उठती है. आज ‘जागरण’ में सुना, विवेक को जाग्रत करना है, विवेक का उपयोग करने की स्वतन्त्रता प्रभु ने उन्हें दी है, जितना विवेक जीवन में होगा उतना जीवन उन्नत होगा. माया रूपी रात्रि में संयम रूपी ब्रेक और विवेक रूपी लाइट लगी जीवन की गाड़ी यदि वे चलायें तो दुर्घटना से बचेंगे और ईश्वर के प्रति श्रद्धा अविचल रहेगी. कल शाम को कुछ देर जून को उसने हृदय के भीतर उमड़ते प्रकृति के प्रति प्रेम को बताया, पता नहीं वे कितना समझ पाए. पेड़-पौधे, नदी, आकाश, हवा, पानी, कीट, पंछी और सभी लोग...सभी एक ही डोर में बंध हैं. वह है साँस की डोर. वे किस तरह जुड़े हैं एक-दूसरे से, ईश्वर ही सबका कारण है, उसी एक का विस्तार है यह सृष्टि. वे इसके प्रति कृतज्ञता से भर जाते हैं, समपर्ण करते हैं, उसे प्रेम करते हैं क्योंकि एक वही है जिसे चाहा जाये और उस एक को चाहने से सभी को चाहना हो जाता है. अहैतुकी भक्ति का उदय हृदय में होता है. ईश्वर जानते हैं कि उनके लिए क्या उचित है, वह उनकी सभी उचित कामनाओं की पूर्ति करते हैं, वही उनके जीवन का आधार है. आज बाबाजी ने अपने चुटीले हाव-भावों से बहुत हँसाया.

It’s a lovely June morning. Rain has just stopped. Breeze is cool and wet. She has finished her morning jobs. Mali is cutting hedge. Nanha went  to his friend’s home in the morning. Music sir came and gave three sargam to learn and aaroh- avroh of rag yaman. So she is continuing in second year. Day before yesterday they went to see the Buri dihing river. It was nice to see the sun setting and water flowing calmly. One fisherman was spreading his net perhaps he was not looking at the beauty of the water but only at the fish in the river. When they for evening walks she always looks at the   trees, flowers and surroundings with an awe. Daily she sees some new tree or some change in them. Nature is very beautiful, human beings are not so, they pretend they act and they want to be beautiful, but it is not that natural. Last evening she attended a meeting in club for Mrinal Jyoti. She and one more lady was assign the job of arranging some special classes in the school once a week. She will definitely enjoy doing it. Today she heard babaji. He was in bliss as always and told many beautiful things about life.

आज पूर्णिमा है, सुबह-सवेरे से ईश्वर की भक्ति की चर्चा कानों में पड़ रही है, ईश्वर उस के प्रति  कृपालु हैं, वह उसे सद्प्रेरणा देते हैं था गुरुजनों को जिन्होंने उसे पा लिया है, उन्हें टीवी के माध्यम से उनके घर भेजते हैं. कर्त्तव्य निष्ठ होकर, प्रेमपूर्वक, भक्तिभाव से उन्हें यह जीवन जीना है. ईश्वर के वे निमित्त मात्र हैं. वही कर्ता है और वही भोक्ता है. वही उसे प्रेरित करता है कि उसे जाने और उसके अंश होने के कारण उसी के समान बनने का प्रयत्न करें अथवा तो स्वयं को पहचानें.   



  

Friday, January 9, 2015

ईश्वर का विधान


विवेक रूपी बाण और वैराग्य रूपी धनुष सदा अपने साथ रखना है, जैसे ही कामना रूपी राक्षसी प्रकट हो तो उसका विनाश किया जा सके. ईश्वर की भक्ति का अर्थ है माया से युद्ध, मन की शक्ति का विकास ईश्वर भक्ति में ही होता है. कल उसने चौथी बार सुदर्शन क्रिया की. हर बार की तरह कल भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ. सुख की अनुभूति तो हुई ही फिर स्लेटी फूलों के मध्य नील रंग का कमल दिखा जो बेहद चमक लिए था, फिर कई रंगों के प्रकाश दीखते रहे. कल की क्रिया के दौरान एक बार भी भय का अनुभव नहीं हुआ और समय भी बहुत कम लगा. कुछ देर और क्रिया चलती तो ठीक था पर बुद्धि में अनाग्रह रहे तो ही उचित है. कल योग शिक्षक से उसने कहा कि उसे लग रहा है आज परमात्मा से उसका appointment है. और वह कल उस क्षण से उसके साथ है, बल्कि उसके पहले से ही, हर पल हर क्षण उसके साथ है, वह ख़ुशी बनकर उसके पोर-पोर में समा गया है. सुदर्शन क्रिया में सचमुच सु-दर्शन होते हैं, अद्भुत अनुभव होते हैं. श्री श्री के प्रति मन कृतज्ञता से भर जाता है और उनके योग शिक्षक के प्रति भी. जीवन में एक उजाला बनकर, आनंद का स्रोत बनकर वह उनके जीवन में आए हैं. जून का कहना है कि वे उन्हें एक बार फिर खाने पर बुलाएँ. इस समय साढ़े दस बजे हैं, सब कुछ कितना शांत लग रहा है. आज एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है.

मन प्रशांत होगा तभी उत्तम सुख की प्राप्ति होगी. संशय, आलस्य, प्रमाद से विमुक्त मन ही शांत होगा. शांत मन ही प्रसन्न रहेगा और यही प्रसन्न मन ही ईश्वर को पा  सकता है. वह देह से स्वयं को पृथक जानता है. स्वयं को आत्मा के स्तर पर ले जाकर परमात्मा के सान्निध्य का सुख प्राप्त करता है. वह पूर्ण अमृत का स्वाद लेता है, उसके आनंद की निरंतर वृद्धि होती है. प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है. वह ईश्वर जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने की समझ देता है, पग-पग पर उनका हाथ थाम लेता है, वह नितांत अपने से भी अपना ईश्वर ही सच्चा मित्र है. उसका नाम ही अंतर्मन को वर्तमान की शांत जलधारा पर स्थिर रखता है. ऐसे प्रभु का सत्संग गुरू कृपा से आज शाम उन्हें प्राप्त होने वाला है.

अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक से बात हुई, उनका जन्मदिन पहली जुलाई को है. अभी वह ऋषिकेश जायेंगे फिर डिब्रूगढ़ और फिर तेजपुर ‘साधना’ के लिए, और कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है. मन को पवित्र रखने तो सब कुछ अपने आप होता जाता है. ईश्वर हर जगह है उसको देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सभी में ईश दर्शन करके सभी को अपने समान जानकर कोई ईश्वर की अनुभूति कर सकता है. कल शाम क्लब में योग शिक्षक को सुना, फिर एक सखी के यहाँ उनके भजन सुने. एक व्यक्ति इतना शांत, इतना पवित्र, इतना मधुर, समदर्शी और भक्तिभाव से पूर्ण हो सकता है, गुरू के सभी लक्षण उनमें हैं. मन श्रद्धा से भर जाता है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जीवन में भी प्रभु प्रेम की वर्षा हो रही है. लेकिन ईश्वर के प्रति वह तड़प, वह खिंचाव जो प्रथम क्रिया के बाद उसने अनुभव किया था वह शांत हो गया है. अब वह उससे एक पल को भी दूर नहीं है, उसके नाम का मानसिक जप वर्तमान में रहने की प्रेरणा देता है. वर्तमान में जीना व्याधियों से मुक्त रखता है. मन फूल की तरह नित नवीन बनकर खिला रहत है.

कल कोर्स का अंतिम दिन था, ध्यान किया फिर सामूहिक भोज व सत्संग, लौटते-लौटते उन्हें साढ़े दस हो गये. सुबह पांच बजे उठाने का वादा जून ने शिक्षक से किया था. उन्होंने उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व पूरी तरह निभाया है. चार बजे ही उसकी नींद भी खुली पर उठने की चेष्टा नहीं की. पांच बजे उसे एक स्वप्न आया, कोई कह रहा है, 'पांच बज गये', 'पांच गये'. वह ईश्वर थे या उसकी चेतना.
उसके अंतर में न जाने कहाँ से एक कसक या कचोट ने प्रवेश पा लिया है. यह महीनों बाद हुआ हुआ है, सो यह अपरिचित, अनजाना मेहमान अप्रिय लग रहा है. कल दोपहर से इसका आरम्भ हुआ होगा, एक क्षण को भी सजग न रहो तो कामनाएं मन पर अधिकार जमा लेती हैं. अपने आत्मभाव से वे च्युत हो जाते हैं. ईश्वर का विधान बहुत कठोर है, जिस क्षण उसका पथ छोड़ा अथवा छोड़ने का भाव भी मन में आया तो उसका फल मिले बिना नहीं रहता. मन यदि सद् मार्ग पर चले तो आत्मसुख में रहता है. पूरा प्रभु आराधिया, पूरा जाका नाम. वह ईश्वर जब तक पूरा नहीं मिलता, ज्ञान पूर्ण नहीं होता तभी तक यह विचलन, विक्षेप मन पर छाने का साहस कर सकते हैं. उसका लक्ष्य तो उस पूरे को पाना ही है. वही इसका रास्ता बता सकते हैं. मन और देह में जब तक आसक्ति रहेगी तब तक वह नहीं मिलेगा. अपने अहं को तुष्टि देने का भाव, सुख-सुविधाओं का आकर्षण जब तक रहेगा वह अनवरत सुख इसी तरह बीच-बीच में लुप्त होगा. यही दुःख लेकिन उसी मार्ग पर स्थित करेगा, जब प्रार्थना और हृदय एक हो जाते हैं तभी उसका अभ्युदय होता है. ध्यान ही उसे पावन करेगा. उसकी कृपा अपार है, वे अकृतज्ञ होकर उससे और-और मांगते हैं. उलटी चल चलते दीवाने, दीदारे यार करते आँख बंद करके !