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Friday, April 24, 2015

नाद और ज्योति


आज फिर एक अन्तराल के बाद डायरी खोली है. सुबह वर्षा हो रही थी, पर अब थमी हुई है. कल दोपहर की तेज गर्मी की तुलना में, जब वे कार में बैठे थे, आज मौसम सुहावना है. उसका सुबह का कार्य लगभग हो चुका है. पिताजी बाहर बैठकर किताब पढ़ रहे हैं, माँ शाम के सत्संग के लिए साड़ी तय कर रही हैं. आज उनकी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं लग रही है. कल तिनसुकिया यात्रा में उन्हें काफी थकान हो गयी थी. कल शाम हल्का सिरदर्द उसे भी था पर थोड़ी देर के ध्यान से ठीक हो गया. शाम को एक मित्र दम्पत्ति मिलने आए, गुरूजी के बारे में विश्वास पूर्वक बातें बता रहे थे. मन श्रद्धा से परिपूर्ण हो तभी विश्वास टिकता है. उसी विश्वास ने सम्भवतः उसे पलों में ठीक कर दिया ! सद्गुरु की महिमा का जितना बखान करो, उतना कम है. जीवनमुक्त स्वयं को उस स्थिति तक पहुंचा लेते हैं कि उनका दर्शन अथवा उनका स्मरण भी हृदय को कैसी शीतलता पहुँचाता है. सुबह-सवेरे की क्रिया में आज मन एक-दो बार इधर-उधर गया और ध्यान में समझ नहीं पायी मन कहाँ चला गया, कुछ पलों की जानकारी ही नहीं है, वह निद्रा था अथवा..ध्यान में पूरी तरह सचेत रहना होगा. कल गांधीजी का जन्मदिन था. वह भी जीवन मुक्त थे और ऐसे व्यक्ति निर्भीक हो जाते हैं. उन्हें न कोई कामना होती है न किसी वस्तु के खो जाने का डर. वे साक्षी भाव से जगत को देखते हैं, उसमें लिप्त नहीं होते. वह सदा आत्मभाव में स्थित हुए जगत को शांत देखने में सफल होते हैं.

सत्य एक है, सत्य ही धर्म है, सत्य ही वह पथ है जिसपर चलकर परमात्मा को पाया जा सकता है. आज ध्यान में उसे अनुभव हुआ कि कृष्ण ने असत्य बोलने पर उसे टोका, फटकारा, समझाया. असत्य बोलने में उसे कोई हिचक नहीं होती, उसका असत्य निर्दोष होते हुए भी असत्य तो है ही. जितना-जितना असत्य छूटेगा उतना-उतना चित्त शुद्ध होगा. मजाक में अथवा सहज भाव से कहा गया असत्य भी आत्मा पर अज्ञान की लेप चढ़ा देता है. बाबाजी कह रहे हैं, ऊंचे हित के लिए लघु हित को त्यागना पड़ता है. परम के निकट जाने की यात्रा जिसे करनी है, उसे अंतर्मुख होकर स्वयं को जानना होगा. क्योंकि वह जितना दूर है उतना ही निकट भी है. वह उन्हें उतना ही प्रेम करता है जितना वे उससे करते हैं बल्कि उनके प्रेम से भी कई गुणा अधिक. उन्होंने कहा गहन ध्यान में नाद सुनाई पड़ता है और ज्योति के दर्शन होते हैं.

कल जिस नाद की बात उसने सुनी थी, आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद सद्गुरु की कृपा से वह संगीत सुनाई दिया, घंटों सुनते बैठे रहें ऐसा अद्भुत वादन था, पर मन सचेत था. जून इंतजार कर रहे थे सो ध्यान से बाहर आई, कृष्ण की अनुभूति अंतर को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है और कृष्ण तक ले जाने वाले तो उसके सद्गुरु ही हैं. वह देह नहीं है, जीव है और जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण वही हैं जो परमात्मा के हैं. वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनंद स्वरूप है, जिसका भान होने पर सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है.  



Wednesday, February 25, 2015

हरमंदिर का कीर्तन


मैं कौन हूँ ? इसका ज्ञान हो जाये तो सारे संशय मिट जायेंगे. वे जो नहीं हैं, स्वयं को मानते हैं अपने वास्तविक स्वरूप को भूले हुए हैं, इसलिए ही सुख-दुःख के झूले में झूलना पड़ता है. मन को मनमानी करने के लिए छोड़ दें तो भीतर से आनंद की धारा सूखने में देर नहीं लगेगी. माया बहुत दुस्तर है, कृष्ण की शरण में गये बिना इससे छुटकारा नहीं. आज बाबाजी ने गुरू नानक की कथा सुनाई, कैसे उन्हें ज्ञान हुआ और कैसे उन्होंने अपने अनुभव  को ‘जपुजी’ में प्रकट किया.

दोपहर के पौने तीन बजे हैं, चारों ओर एक सन्नाटा पसरा हुआ है. सभी अपने घरों में बंद गर्मी की दोपहर का लुत्फ़ ले रहे होंगे. मौसम इतना गर्म तो नहीं कि सड़क पर निकला भी न जा सके. आज से बीहू का अवकाश आरम्भ हो गया है. अब चार दिन बाद स्कुल व दफ्तर खुलेंगे. स्थानीय स्कूलों में तो शायद और भी लम्बी छुट्टी होगी. आज बैसाखी भी है, सुबह ‘हरमंदिर साहब’ से शब्द कीर्तन सुना. उस दिन गुरुमाँ ने हरमंदिर साहब की नींव किसी मुस्लिम पीर से रखवाये जाने की बात कही थी, संत-महात्मा जानते हैं कि असल में सभी धर्म एक ही हैं सिर्फ ऊपरी सजावट अलग-अलग है. नन्हा गणित पढ़ रहा है जून अख़बार पढ़ रहे हैं. उसे अपने लिए कोई सार्थक कार्य तय करना है, जून के लेख water water everywhere... का हिंदी में अनुवाद या कादम्बिनी के नये अंक को पढ़ना, पत्रों के जवाब या सिलाई का पेंडिग काम. आज सुबह एक परिचिता का फोन आया, अगले मंगलवार को उनके स्कूल ला सिल्वर जुबली कार्यक्रम है, जिसमें हिंदी कविता पाठ के लिए एक निर्णायक की भूमिका उसे नभानी है.

आज शाम को उन्हें एक सहभोज में जाना है, साथ-साथ खाने से अवश्य ही आत्मीयता बढ़ती होगी. आज भी रूटीन लगभग रोज का रहा, छुट्टी के बावजूद जून कुछ देर के लिए दफ्तर गये हैं, कर्मयोगी बन रहे हैं, प्रमादी नहीं, यह अच्छा लक्षण है. इतनी सुविधाजनक जिन्दगी उन्हें मिली है कि इसमें विशेष अवकाश की आवश्यकता नहीं है. नन्हा नाश्ता कर रहा है टीवी के सामने बैठकर. कल शाम असमिया सखी परिवार सहित आयी, उसकी सास भी आयीं थीं, जो काफी शांत और सौम्य लगीं, सडसठ वर्ष की उमर में भी चेहरे पर ओज व चमक थी.

आज सुबह दीदी का फोन आया, पिताजी उनके पास गये हैं, आँखों के डाक्टर को दिखाया है, उसने इलाज भी शुरू कर दिया है. आज बीहू की छुट्टियों के बाद दफ्तर खुला है. नन्हे की लम्बी छुट्टियाँ हैं, कोचिंग क्लास हफ्ते में मात्र तीन दिन है, उसे कुछ सिखाना बहुत मुश्किल है, अपनी जिद पर अड़ा रहता है शायद इस उमर में सभी बच्चे ऐसे होते हैं.

लगता है तमस के दिन जा रहे हैं और नवप्रकाश का उदय हो रहा है. सद्गुरु ने मीठी फटकर लगते हुए समझाया कि साधक स्वयं पीठ किये रहता है प्रभु से और उम्मीद करता है कि उससे मिलन होगा और जब कभी उसकी ओर नजर कर भी ली तो इतना अहम भीतर भर लेता है कि फिर दूर हो जाता है. मन की चाह उसे खोखला कर देती है यदि समता भाव में रहे तो ईश्वर से सम्बन्ध स्वतः स्फूर्त है. जब मन कृतज्ञता से भरना भूल जाये और शिकायतों का अम्बार लेकर बैठा रहे तो प्रेम कैसे टिकेगा. अपने भीतर ओढ़ी हुई कल्पनाओं और विचारों का इतना कूड़ा-करकट एकत्र कर लेता है कि आनंद का जो स्रोत भीतर था वह ढक जाता है. एक एक करके इन सारी परतों को हटाते जाना है, बिलकुल खाली हो जाना है. इसी का नाम भक्ति है !

नैया पड़ी मझदार, गुरू बिन कैसे लागे पार, हरि बिन कैसे लागे पार ! कबीर ने उनकी तरफ से ही तो कहा था उस क्षण जब उनके गुरू उनसे रुष्ट हो गये थे. ‘चिन्तन ही मानव को पशु से भिन्न करता है’, अभी-अभी गुरुमाँ ने यह वाक्य कहा. यूँ तो इन्सान भी सामाजिक प्राणी कहा जाता है, पर वह अपनी भूलों को सुधार सकता है, स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ते हुए वह पूर्णता को प्राप्त कर सकता है.  आज सतोगुण का उदय हुआ है. सुबह ध्यान में मन टिका. कल रात को महाभारत पढ़कर सोयी थी. अथाह ज्ञान का सागर है महाभारत. आज शाम को एक कार्यक्रम में उसे कविता पाठ करना है, ईश्वर उसके साथ हैं !


Thursday, January 15, 2015

बदली में सूरज


हृदय में आध्यात्मिक क्रांति का उदय हो इसके लिए जीवन में साधना, सेवा, सत्संग व स्वाध्याय, चारों का होना अति आवश्यक है. उसके जीवन में तीन बातें तो हैं पर चौथे अंग ‘सेवा’ का कोई स्थान नहीं है. उसे घर में रहकर ही सेवा का पालन करना चाहिए. ज्यादा सचेत रहकर अपने कर्त्तव्य का पालन करना होगा. गोविन्द तभी उसका अभिन्न मित्र होगा. कृष्ण उसे एक पल के लिए भी स्वयं को भूलने नहीं देंगे. कृष्ण अपना वरद  हस्त उसके ऊपर सदा ही रखे हुए हैं, उसे ही उनकी कृपा को ग्रहण करने का सामर्थ्य अपने भीतर जगाना है. वर्तमान में रहने की कला सीखनी हो तो ‘मन्त्र जाप’ से बढ़कर कोई उपाय नहीं. इस तरह श्वास भी नियमित रहती है. ऋषि-मुनियों ने कितने सुंदर उपाय बताये हैं, यदि वे उन पर चलें तो ईश्वर उसी क्षण उन्हें प्राप्त हो सकते हैं, बल्कि वे तो कहते हैं  ईश्वर पहले से ही प्राप्त हैं, उन्हें सचेत होना है उसकी उपस्थिति के प्रति, उसके सान्निध्य में कोई विषाद नहीं रहता. सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूर्ण होने लगती हैं. मन के भीतर सुमिरन चलता रहे तो अद्भुत शांति का प्रादुर्भाव होता है, अधर मुस्काते हैं, ऑंखें उसके रूप को देखती हैं. उसकी कविताओं में जो कामनाएं उसने व्यक्त की थीं, वे सारी की सारी सद्गुरु को भेजकर कृष्ण ने पूरी कर दी हैं. अब उसका कर्तव्य यही है कि इस मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़े, क्योंकि यही ऐसा मार्ग है जहाँ आकर सारे मार्ग मिलते हैं. जो परम सत्य तक उन्हें ले जायेगा, जहाँ जाना और जाने के लिए परिश्रम करना मानव मात्र का कर्त्तव्य है, जहाँ जाने के लिए पाथेय है हृदय में असीम प्रेम, इतना प्रेम जो पोर-पोर से छलकता हो, जो उच्चता के प्रतीक उस ईश्वर के लिए हो !

जब वे धर्म के नियमों का पालन करते हैं तब प्रकृति उनका साथ देती है जब उसके प्रतिकूल चलते हैं तब प्रकृति विपरीत हो जाती है. धर्म क्या है इसका ज्ञान शास्त्र, सत्संग तथा अंतर में स्थित परमात्मा के चिन्तन से मिलता है. यह बिलकुल स्पष्ट है उतना ही जितना हथेली पर रखा आंवले का फल ! कृष्ण गीता में उसी धर्म की चर्चा करते हैं. परमेश्वर असीम हैं, उनका अनुग्रह अनंत है, दया अनंत है, उनकी स्मृति में जितना समय गुजरे वही सार्थक है. जब जीवन का हर क्षण उसके प्रति कृतज्ञता में बीते तो उसकी कृपा का अनुभव भी हर समय होगा, और धीरे-धीरे मन ख़ाली होता जायेगा, खाली मन में ही भक्ति का प्रकाश उदित हो सकता है. ईश्वर ही अपना ज्ञान दे सकते हैं तो पहले उसकी निकटता का अनुभव करना होगा, उसके शरणागत होना होगा. भजन, साधना से मन इतर से खाली होता है और उसकी ओर खिंचता है. एक वही है जो अनंत हृदय को भर सकता है, मन भी निस्सीम है. संसार की नश्वर वस्तुएं उसे तृप्त नहीं कर सकतीं, वह असीम से ही भरा जा सकता है ! आज सुबह उन्हें उठने में देर हुई, नन्हा आज स्कूल नहीं गया, सूर्य देवता बादलों के पीछे छिपे हैं, पूरे भारत में सर्दियां अपनी चरम सीमा पर हैं. यहाँ उत्तर भारत की अपेक्षा मौसम सुहावना है. अज जून उसका लेख व कविताएँ छपने के लिए दे देंगे. नया वर्ष आने में दो हफ्ते भी शेष नहीं, उन्हें एक बार पुनः घर की विशेष सफाई करनी है, नये वर्ष के स्वागत में इतना तो उनका कर्त्तव्य बनता ही है.






Sunday, November 16, 2014

रेगिस्तान का एकांत


उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है, जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है ! यह निद्रा अज्ञान की है जिससे जितनी शीघ्र जागे उतना ही अच्छा. हृदय में शुद्ध प्रेम जगे तभी यह अज्ञान मिटता है और अज्ञान मिटे तो प्रेम अपने आप उपजता है ! वस्तुओं या व्यक्तियों में यदि आसक्ति हो तो शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी आसक्ति का नाश नहीं होता, प्राप्ति होने पर बल का नाश होता है, न मिलने पर दुःख होता है. ऐसा कोई सुख भोग नहीं जिसके पीछे भय-रोग नहीं ! सुख और मान लेने की वस्तु है ही नहीं देने की वस्तु है. किन्तु यही आसक्ति यदि सत्पुरुषों और सद्विचारों के प्रति हो तो यह कटती है और धीरे-धीरे शुद्ध प्रेम में बदल जाती है. परमात्मा में विश्वास ही उसमें आसक्ति है और उसकी प्राप्ति ही अंतर में जगा शुद्ध प्रेम है. शुद्ध प्रेम मुक्त रखता है, मुक्त होता है. आज बाबाजी प्रवचन देते-देते मौन हो गये, ईश्वर की असीम करुणा का वर्णन करते हुए कहा जो भी विपत्तियाँ ईश्वर देता है वह नश्वर से शाश्वत की तरफ मोड़ने के लिए ही देता है, अपने भीतर की शक्ति को पहचानने के लिए ही देता है. कल दोपहर उसकी आँख लग गयी, एक भव्य मकान में घूम रही थी, पर वे उसमें किराये पर रहते हैं. आलीशान संगमरमर का मकान है जो कई भागों में बंटा है, पहले भी कई बार इसी तरह का स्वप्न देख चुकी है. सीढ़ियों से नीचे उतरने के कई रास्ते हैं, वह सदा भूल जाती है, कौन सा रास्ता उनके घर की तरफ ले जाता है. कल ‘सरसों’ वाले आलू बनाये, आज भी एक नई डिश बनानी है, ‘तोरई’ की जिसकी रेसिपी जून इंटरनेट से लाये हैं. कल शाम एक सखी ने ढेर सारे नींबू भिजवाये, दो सखियों से फोन पर बात की अच्छा लगा, एक के लिए आम तोड़े, अभी भिजवाने हैं.

आज बहुत दिनों के बाद सम्भवतः एक वर्ष के बाद वह संगीत अध्यापिका के घर गयी, सचमुच गुरू की बेहद-बेहद आवश्यकता है. सुबह-सुबह जागरण में भी बाबाजी गुरू की आवश्यकता पर बल देते हैं. आज अमृत कलश में एक पत्रकार, जो मुस्लिम थे पर जिनकी भाषा शुद्ध हिंदी थी, को सुना. बहुत सी नई बातों का इल्म हुआ. रेगिस्तान में पनपे धर्मों का रूप वहाँ की भौगोलोक स्थिति की देन है और नदियों के किनारे पनपे धर्मों का रूप जुदा है. यहाँ लकड़ी की बहुतायत थी सो लोग मृतक के शरीर को जलाने लगे और रेगिस्तान में मीलों तक फैली जमीन थी एक तिनके का भी पता नहीं मिलता था सो दफनाने लगे. धीरे-धीरे वह धर्म का रूप लेता गया और कट्टरवाद को जन्म मिला. भौगोलिक और ऐतिहासिक जरूरतों की वजह से पनपा धर्म बंधन बनकर इन्सान के पैरों में लिपट गया. कल्चर और संस्कृति का भेद भी उन्होंने स्पष्ट किया.


सत्ता एक की है, जैसे आकाश एक है, घड़े अनेक हैं ! यह ज्ञान नहीं है इसलिए भेद दिखता है. जैसे कमरे में समान पड़ा हो, अँधेरे में वहाँ जाने पर टकराने की सम्भावना रहती ही है, इसी तरह हृदय में अज्ञान का अंधकार हो तो कुछ स्पष्ट नहीं दीखता, ठोकरें ही मिलती हैं. ईर्ष्या, जलन, डाह, हीन भावना ये सभी ठोकरें ही तो हैं. ज्ञान हो तो इनमें से एक की भी सत्ता नहीं रहेगी. इस जगत में न जाने कितने जीव वास करते हैं. इसकी गति को सिवाय ईश्वर के और कोई नहीं जान सकता. सुबह उठी तो रात्रि में देखा कोई स्वप्न याद नहीं था पर देखे थे इतना याद था. जैसे स्वप्न में सब सत्य प्रतीत होता है लेकिन होता वहाँ कुछ भी नहीं है, उसी तरह यह संसार भी स्वप्नवत् है. कल जो था  वह आज नहीं है, आज जो होने वाला है कल नहीं रहेगा. जीवन का क्रम यूँही चलता चला जायेगा. दीदी व छोटे भाई का मेल आया है. सुबह बड़ी ननद से बात की, आज एक सखी आने वाली है पता चला है उनकी ट्रेन लेट है. आज गोयनका जी भी आये थे, बड़ी सरल भाषा में विपासना की विधि समझाते चलते हैं, देह एक पाँचों तत्वों को किस तरह अनुभूति के स्तर पर जाना जा सकता है, आज बताया. उनकी बातें वैज्ञानिक होती हैं और बाबाजी की भक्तिभाव से परिपूर्ण !   

Tuesday, October 21, 2014

अमराई की छाँव



आज असम बंद है, आसू की मांग है कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर सीमा सुरक्षा बल की जगह सेना की नियुक्ति की जाये. जून साइकिल से ऑफिस गये पर थोड़ी ही देर में वापस लौट आये. इस वक्त टीवी पर एक पुरानी फिल्म देख रहे हैं. सुबह-सुबह समाचारों में सुना कि डिब्रूगढ़ से बीजेपी के प्रत्याशी तथा कुछ अन्य राजनितिक कार्यकर्ताओं की उल्फा ने गोली मारकर हत्या कर दी है. वे लोग राज्य में शांति के पक्षधर नहीं लगते, चुनाव का बहिष्कार करने का कितना भयंकर मार्ग उन्होंने अपनाया है. नन्हा आज पहली बार एक आंटी से विज्ञान विषय पढने गया है, वह काफी उत्साहित है. आज लंच में वह दक्षिण भारतीय भोजन बना रही है. शाम के टिफिन के लिए जून तरबूज लाये हैं. इस समय नौ बजे हैं, धूप बहुत तेज है जैसे हजारों वाट के बल्ब लगा दिए गये हों. ऐसा ही ज्ञान का प्रकाश उनके दिलों में उदित हो ऐसी ईश्वर से उसकी प्रार्थना है.

धर्म को जीवन में उतारना होगा तभी क्रोध, मोह, अहंकार और लोभ से स्वयं को मुक्त किया जा सकता है. अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए सदा अपने आप में स्थित रहना होगा. जीवन की कहानी का पटाक्षेप हो जब वे एक मुट्ठी राख में बदल जायें इसके पूर्व ही स्वयं को जानना होगा. यदि पुकार भीतर से फूटी हो तो कभी खाली नहीं जाती. आज भी बंद के कारण नन्हे का स्कूल बंद है. मौसम कल की तरह है. जून भी एक बार वापस आकर दुबारा दफ्तर चले गये हैं. कल शाम दो मित्र परिवार आये, दिन भर बंद के कारण शाम को बाहर निकलना चाहते थे. उसने बाद में अनुभव किया वह भी दिन भर चुपचाप अपना काम करते रहने के कारण शाम को कुछ ज्यादा मुखर हो गयी थी. आज आकाश में बादल हैं. संगीताभ्यास की जगह नन्हे को आज नरोत्तमदास की एक कविता पढ़ाई. कुछ नया लिखा भी नहीं, उसके लिए भी एक खास मूड की जरूरत होती है जो नितांत एकांत चाहता है. कहीं से कोई व्यवधान न हो मन कल्पना तथा विचारों के धरातल पर विचरने के लिए मुक्त हो, तभी कुछ सृजन सम्भव है. कल रात छोटी बहन का फोन फिर आया, अब वह ठीक है. इतना तो स्पष्ट है कि वे उसकी समस्या को हल करने के विषय में कुछ भी नहीं कर सकते. हर कोई अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र है और इस बात के लिए भी कि कोई अन्य उस उस पर कितना और किस तरह का प्रभाव डाल रहा है.

‘बड़ा होने की दौड़ में ही लोग अपने जीवन में द्वंद्व पैदा करते हैं. भौतिक उपलब्धियों को अपनी उपलब्धि मानकर उसके सहारे बड़ा होने का प्रयास कितना बचकाना है. मनों के बीच दीवारें तब खिंचती चली जाती हैं जब सभी स्वयं को एक दूसरे से आगे दिखाना चाहते हैं.’ आज जागरण में उपरोक्त विचार सुने. नन्हा अंततः आज स्कूल जा सका. मौसम कल की अपेक्षा ठंडा है. कल शाम माली ने नींबू का एक पेड़ बगीचे में लगाया. जीनिया की पौध भी लगा दी है. कल पेड़ से गिरी अम्बियाँ भी लायी, छोटी-छोटी अम्बियाँ देखकर बचपन के दिनों की याद हो आयी. अल्फ़ा की हिंसा का शिकार कुछ और लोग भी हुए हैं, उन लोगों के घरों में भी शोक का माहौल होगा. मृत्यु किस रूप में और कब मिलेगी कोई नहीं जानता पर असम के राजनीतिज्ञों को चुनाव से पहले बंदूक की गोली से मिलेगी इतना तो कोई भी कह सकता है.



Monday, September 8, 2014

सीता का वनवास


फरवरी महीने का प्रथम दिन, मन की तरह आकाश पर भी बादल छाये हैं. जून आज मोरान गये हैं, शाम तक आयेंगे. सुबह वे जल्दी उठे. जून के जाने के बाद उसने फोन पर बात की, पिता अभी सोकर नहीं उठे थे, सो बात नहीं हो पायी. दीदी से बात की, उन्होंने एक अच्छी बात बतायी कि सभी लोग जो जीवित हैं अभी इस संसार में स्वप्न देख रहे हैं, माँ का स्वप्न पूरा हो गया, उनकी नींद खुल गयी है और वह इस सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पा गयी हैं. कल शाम वे टहलने गये तो मन में भरा विषाद फूट पड़ा. जून ने उसे सहारा दिया, कहा कि सुबह सभी से बात करे. नन्हे की परीक्षाओं के बाद फरवरी में घर जाने के लिए राजी किया. उन्हें उसकी मनः स्थिति का पूरा भान है. माँ कभी भी कोरी भावुकता की पक्षधर नहीं थीं. मोह, माया और ऊपरी दिखावा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. जो उचित हो और जिससे किसी का अहित नहीं होता हो सोच-विचार कर ऐसा काम ही करना चाहिए.

उसके भीतर कभी ख़ुशी का एक झरना हुआ करता था, जिसमें से ख़ुशी रिस-रिस कर अधरों पर, कभी आँखों से झलका करती थी. दुनिया हसीन लगती थी पर आज वह सोता कहीं सूख गया सा लगता है. भीतर एक खालीपन उतर आया है और साथ ही एक नया  स्रोत उभर आया है, खरे पानी का स्रोत. आँसूं बेबात ही छलका करते हैं. दिल कमजोर हो गया है. दुनिया पर से विश्वास हटने लगा है. भूचाल की त्रासदी से पीड़ित लोगों को देखकर सिहरन होती है, उनका दुःख अपना सा लगता है. यह इतना सारा दुःख कहाँ से आ गया है. माँ जो इन सब दुखों से परे चले गयी हैं, उनके जाने से भी जिन्दगी में एक खालीपन आ गया है. कल एक परिचिता मिलने आयी, रोने लगी और फिर उसे चुप कराना पड़ा. संभल-संभल कर फिर कुछ ऐसा हो जाता है. जून उसके मन की हालत  समझते हैं और हर क्षण वह साथ देते हैं. लेकिन यह खालीपन बाहर से नहीं भरेगा, भीतर से ही इसे भरना होगा. बाहरी संबंध तो माने हुए हैं, स्थायी नहीं हैं. समय के साथ बदलते रहने वाले हैं. जीवन को पुनः परिभाषित करना होगा. स्वयं के सहारे जीना होगा. जीवन की क्षणभंगुरता को कौन समझ सकता है, जानते तो सब हैं. अन्यों से किसी बात की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. कुछ भी स्थायी नहीं है. इतने दिनों से जो उसके मन में साध पल रही थी कि कोई तो कह दे, माँ नहीं है तो दुःख मत करो, हम तो हैं. पर कोई नहीं कहेगा. सभी बेबस हैं, जैसे वह खुद !

आज कोई फोन नहीं आया. मन स्थिर है. टीवी पर ‘उत्तर रामायण’ आ रहा है. लक्ष्मण को सुमन्त्र और राम को गुरु वसिष्ठ ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं. सीता को वनवास होगा, राम को पत्नी वियोग सहना होगा यह सब बातें सुमन्त्र को पहले से ही ज्ञात थीं, फिर भी ऐसा होने पर वह दुखी थे, विह्वल थे. ऐसे ही सबको पता था कि हरेक की मृत्यु निश्चित होती है, कि माँ की हालत ठीक नहीं थी, कि उन्हें अंततः जाना ही था फिर भी इससे उनके जाने का दुःख कम तो नहीं हो जाता. वे सभी संवेदना की डोर से बंधे हैं. उनके मन सुख-दुःख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के वाहक हैं. दुःख के वक्त कोई किस तरह अपना कर्त्तव्य धर्म निभाता है वही उसके चरित्र को दर्शाता है. वह इस वक्त अपने आप को दुखी नहीं मान रही. रामायण के पात्रों ने जैसे उसकी चोट पर मरहम रख दिया है. एकाएक भूचाल आने पर जैसे सारे रास्ते और पथ गायब हो जाते हैं वैसे ही दुःख आने पर प्राणी हतप्रभ हो जाता है. ऐसे में उसे ज्ञान व दर्शन की बातें ही सहारा देती हैं. भूचाल से पीड़ित लोगों में नये जीवन की आशा का संचार करना होता है. उन्हें पुनः नये पथों का निर्माण करना होगा.


  

Tuesday, August 12, 2014

ग्लेडिएटर - अमेरिकन एपिक ड्रामा


आज सुबह जून ने कहा, “हैप्पी सेवेंथ” और तब उसे लगा कि आजकल वह उनका ज्यादा ख्याल नहीं रख रही है, ज्यादातर वक्त उसके मस्तिष्क में नन्हे की अस्वस्थता का ख्याल रहता है या फिर किताबें. कल रात से वर्षा लगातार हो रही है. इस साल पूरे देश में ही वर्षा काफी हुई है, फिर भी इतने बड़े देश का कोई न कोई भाग सूखे की चपेट में आया होगा. बंगाली सखी ने फोन पर नन्हे का हाल पूछा, बाकी सभी से कई दिनों से कोई बात नहीं हुई है. नन्हे के ठीक होने पर ही वे कहीं जायेंगे. घर से पत्र भी नहीं आया है, कल स्वप्न में मंझले भाई को देखा, वे इस बार उनका दिया उपहार नहीं लाये शायद वह.... वरना कभी-कभी उसका पत्र तो आ जाया करता था. सुबह ‘जागरण’ में सुना इस संसार में सभी रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हैं, स्नेह की धारा लोगों के दिलों में सूख जाती है वक्त के साथ-साथ... एक उसका मन ही है जो सभी को याद किया करता है, शायद वे लोग भी ऐसा ही सोचते हों.  खैर, उसकी आध्यात्मिक यात्रा में कुछ शिथिलता आ गयी है. इच्छा मुक्त मन की कल्पना कर आज ध्यान में बैठी तो अच्छा लगा था, कोई प्रार्थना नहीं, कोई आशा, अपेक्षा नहीं निर्विकार, शांत मन !

प्रधानमन्त्री विदेश यात्रा पर गये हैं, देश का हित होगा उनके प्रयासों से. अस्वस्थता के बावजूद वे अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं. पिछले दिनों UNO में विश्व शांति सम्मेलन हुआ और आजकल सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष मिलकर चर्चा कर रहे हैं, शांति की स्थापना ही उसका उद्देश्य है. उनके काश्मीर में भी शांति की स्थापना हो !   

आज अभी सुबह के आठ बजे हैं, मौसम सुहाना है, वर्षा होकर थमी है, अभी भी बदली है, हवा में शीतलता है. नन्हे को अब हाथ में दर्द नहीं है, कल उसने Gladiator देखी, नई फिल्म है, आज वह भी देखने का विचार रखती है. कल शाम जून उन्हें अपने दफ्तर ले गये, internet surfing करने पर लाइन नहीं मिली. वे वापसी में इस फिल्म का CD लाये. रात को स्वप्न में उसने net surfing की तथा पिता को जून से बात करते हुए भी सुना, स्वप्न में इन्सान की सारी इच्छाएं अपने आप पूर्ण हो जाती हैं.

जैसे-जैसे बुद्धि विवेकशील होती जाएगी, मन कामना से मुक्त होता जायेगा. कर्म के फल की आसक्ति नहीं रहेगी, कोई अपेक्षा नहीं रहेगी. ध्यानस्थ होना सरल होता जायेगा. आज उपरोक्त वचन सुने, मन कैसा आश्वस्त हो गया. जो सत्य बाहर दीखता है वही सत्य भीतर भी घट रहा है, प्रतिपल, प्रतिक्षण ! जो भीतर के सत्य को देखना सीख जाये वही मुक्त है. धर्म परम मुक्त होना सिखाता है. बात बहुत सीधी है और सरल है पर वे जानकर भी अनजान बने रहते हैं.

Nanha their son is eating his lunch. Today he went to hospital, doctor said that plaster would be opened after two more weeks so they have to wait and watch. Yesterday didi rang her, she could not tell her about Nanha’s health, neither they have told her parents. That day she came to know, her cousin sistermarriage has been fixed on 26 Nov, she has to write at least one congratulation letter.


जून ने आज सुबह तिनसुकिया जाने की बात कही, उनके अनुसार नन्हे को यदि कल से स्कूल जाना है तो आज का अभ्यास ठीक रहेगा, इससे पता भी चल जायेगा कि सफर में उसे दर्द या असुविधा तो नहीं होगी. उसे स्कूल गये पन्द्रह दिन हो गये हैं, आज अंतिम परीक्षा है. सुबह घर से father-in-law का फोन आया वे चिंतित थे, जो स्वभाविक है. इस समय साढ़े आठ ही हुए हैं पर धूप कल की तरह इतनी तीव्र है कि लगता है दोपहर हो गयी है. उसके सुबह के कार्य हो चुके हैं. नन्हा अभी तैयार नहीं हुआ है, उसकी बातें सुनना, उससे फिजिक्स के प्रश्न पूछना और साथ-साथ टीवी पर कोई कार्यक्रम देखना बहुत अच्छा लगता है. बच्चों का दृष्टिकोण अलग होता है, वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते. 

Monday, July 7, 2014

टैगोर की सहजता



At this moment she is feeling as light as wind. It seems that she has found the way to know herself. Since morning most of the time she was conscious of the thoughts of her mind ie she was aware of every feeling and reaction. This is first step towards her goal.

उसने जागरण में सुना, “मन को विकारों से मुक्त रखना ही धर्म है. जैसे ही कोई विकार जगता है, कुदरत की ओर से फल मिलता है. अहंकार होते ही व्याकुलता छा जाती है, द्वेष की भावना जगते ही दुःख मन को घेर लेता है. जब मन सद्भावना व मैत्री से भर जाये तो उसका फल शांति और आनन्द के रूप में तत्काल मिल जाता है”.
उसने सोचा जो धर्म को जानता, मानता और उसका पालन करता होगा वह मन को शुद्ध करने का प्रयास ही नहीं करेगा सदा इसी चेष्टा में लगा रहेगा कि मन की चादर पर कोई दाग न लगे वह कोरी की कोरी रहे जैसे उन्हें कुदरत से सौंपी गयी थी. धर्म कोई बौद्धिक विलासिता नहीं है, यह तो अनुभव की चीज है. कदम-कदम चलना होता है इस पथ पर ! धर्म की बातें कहते बहुत हैं, सुनते बहुत हैं पर करता कोई-कोई है, उसे तो अन्तर्मुखी होकर विकारों को जड़ से निकलना होगा, कोरी बात नही रहे उसके लिए धर्म. इसके लिए जीवन में एक अनुशासन भी लाना होगा.

परीक्षा के बाद की छुट्टियों के समाप्त होने पर आज नन्हे का स्कूल खुला है, नई कक्षा में उसका पहला दिन है. वर्षा का मौसम पूरे जोर-शोर से आरम्भ हो गया है. जून आजकल खुश हैं, स्वस्थ भी दीखते हैं, उनकी सारी परेशानी दोपहर को दफ्तर से अकेले आकर ताला खोलने, स्वयं लेने व अकेले भोजन करने और इसी तरह की बातों के कारण रही होगी. उसके घर पर न रहने के कारण सफाई भी ठीक से नहीं हो पाती थी, उन्हें चमकता हुआ सलीके से सजा घर भाता है. घर-परिवार का उनके लिए बहुत महत्व है. उसे भी यह आजादी भा रही है, अभी स्कूल का काम शेष है, कुछ दिनों में जब पूर्ण हो जायेगा तब पूर्ण स्वतन्त्रता होगी.

उसने पढ़ा तो बहुत है पर केवल पठन ही नहीं मनन भी आवश्यक है, मनन के बाद जीवन में उसको व्यवहारिक कसौटी पर कसना होगा, और फिर उसके द्वारा जो अनुभूति प्राप्त होगी वास्तव में ज्ञान तो वही होगा. किताबों की बातें जब जीवन में उतरने लगें तभी पूर्ण ज्ञान मिलता है. विपरीत वातावरण में रहकर भी मानसिक संतुलन बनाये रहना ही तप है जो उसे करना है. इस तरह संतुष्ट रहने से आत्मिक बल बढ़ता है. यदि बाधाओं को पार करना तपस्या मान लें तो बाधाएँ भी सुखकर प्रतीत होंगी, क्योंकि जो भी सुख-दुःख किसी को प्राप्त होता है उसके ही पूर्व कर्मों का परिणाम है. मन यदि शांत नहीं रहा तो देखना होगा कहीं अभिमान तो नहीं जला रहा, जब हृदय में कुछ चुभता हो, मन कसमसाता हो तो पहले अपने भीतर झंकना होगा बाद में बाहर ! क्योंकि मन की भावनाओं को ही मन प्रतिबिम्बित करता है, मन की विशालता जहाँ सहजता लाती है, क्षुद्रता अशांति का कारण बनती है. उसने कहीं पढ़ा था, टैगोर ने कहा है, उनके भीतर की सहजता, सरलता और सहनशीलता ही उन्हें इस ऊँचाई तक लायी है. जून और नन्हा अपने आफिस और स्कूल गये हैं और वह यहाँ है जिसे घर को संवारने व जीवन को संवारने का मौका मिला है. ईश्वर ने उसे यह मार्ग दिया है.







Saturday, April 5, 2014

गोद्ज़िला का सीडी


आज वर्षा नहीं हो रही है, वातावरण में उमस सी है. सुबह साढ़े चार बजे वे उठे, उसने पढ़ाया, जून बाहर से अमरूद तोड़ कर लाये, पता नहीं किसने लगाया होगा यह वृक्ष जिसके मीठे फल वे खा रहे हैं. वर्षों बाद उनका लगाये नींबू, संतरे व आड़ू के पेड़ भी किसी और को फल देंगे. ध्यान के लिए आजकल सुबह समय निकालना मुश्किल होता है, सो मन किसी न किसी बात पर पल भर के लिए ही सही झुंझला जाता है, स्वयं को समझाना कितना मुश्किल है !

कल सुबह एक मित्र परिवार आया था, उन्हें घर जाना था, जाने से पूर्व नाश्ता यहीं करवाया तथा साथ ले जाने के लिए कुछ बनाकर भी उसने दिया. दोपहर को KSKT देखी, अंत बहुत दर्दनाक है, लेकिन दोनों के परिवार वालों को यही सजा मिलनी चाहिए थी. उसके एक दांत में अमरूद का बीज फंस जाने से दर्द हो रहा था, आज एक्सरे कराने जाना है. पर उसे लगता है, एक दांत निकलवाने के बाद भी यह दर्द पूरी तरह से चला जायेगा ऐसा नहीं है, इसलिए उसे सही देखभाल और सफाई के द्वारा ही दांतों को ठीक रखना चाहिए. कल शाम वे क्लब गये, रेफरेंस बुक्स की प्रदर्शनी लगी थी, इतनी मोटी-मोटी किताबें और दाम सैकड़ों, हजारों में..वे सिर्फ देखकर आ गये. वैसे भी कम्प्यूटर आ जाने के बाद वैसी किताबों की आवश्यकता नहीं रह जाती. नन्हा कल शाम बेहद चुप-चुप था, बाद में गोद्ज़िला का CD देखते देखते ही सामान्य हो गया, उसका उदास चेहरा नूना से देखा नहीं जाता. शायद ऐसा ही जून को उन दिनों लगता होगा जब विवाह के बाद शुरू-शुरू में घर की याद आने से वह  चुप हो जाती थी और उन्हें उसकी चुप्पी नागवार गुजरती थी. जो प्रेम करते हैं वे प्रियपात्र की उदासी को सहन नहीं कर सकते. जून को इस माह के अंत तक एक पेपर लिखकर भेजना है. व्यस्तता उन्हें प्रसन्न रखती है.

उसे आश्चर्य हुआ कि तिथियों के मामले में इतनी लापरवाह कैसे हो गयी, उसने जून से कहा परसों पन्द्रह अगस्त है सो आज ही उन्हें मित्रों को उस दिन लंच के लिए निमंत्रित कर देना चाहिए. डायरी खोली तो पता चला अभी चार दिन हैं पन्द्रह अगस्त आने में. नन्हा अपना प्रिय कार्यक्रम ‘डिजनी आवर’ देख रहा है. उसने कुछ देर पूर्व लाला हरदयाल की पुस्तक में पढ़ा, धर्म के नाम पर हजारों लोग मारे गये, धर्म ने लाभ के बजाय हानि ही पहुंचाई है. मानव रहस्य दर्शी है, और भगवान से बड़ा रहस्य कौन है, इसलिए तो इतने सारे धर्मों का उदय हुआ. वह खुद भी तो प्रकृति की इस अनुपम सुन्दरता को देखकर इस विशाल ब्रह्मांड को बनाने वाले के प्रति श्रद्धा से भर जाती है. उसका भगवान इस संसार का नहीं है, वह तो ऊर्जा का अंतिम स्रोत है जिससे यह सब हुआ है.


आज उसकी छात्रा ने कहा, अब वह नहीं आयेगी, पिछले दो वर्षों से हिंदी पढ़ाने का क्रम अब टूट जायेगा. उसे वाकई अच्छा लगा, हिंदी व्याकरण का ज्ञान इसी कारण उसे भी हुआ. उसके मन में एक स्वप्न है हफ्ते में दो दिन ही सही छोटी-छोटी लडकियों को पढ़ाये, यह कार्य उसके मन का होगा और इससे समय के सदुपयोग के साथ आत्म संतोष भी मिलेगा. अगले हफ्ते से नन्हे का स्कूल भी खुल रहा है. उसे कम्प्यूटर कोर्स करने का भी मन है. काम करना और अर्थपूर्ण काम करना उसकी जरूरत है सही मायनों में जीवन कार्य का ही दूसरा नाम है.

Friday, March 15, 2013

लाल लाल सा गाल



परसों यानि शनिवार को बापू के ‘एक सौ चौबीसवें’ जन्मदिन के कारण जून का ऑफिस और नन्हे का स्कूल दोनों बंद थे, वह सुबह व्यस्त थी, दोपहर को ‘गाँधी’ फिल्म देखी और शाम को एक मित्र परिवार के लिए भोजन बनाना था, फ्लाईट कैंसिल हो जाने के कारण वे एयरपोर्ट से लौट आये थे, कल गए.
 माली ने टमाटर के पौधे लगा दिए एक क्यारी में, बागवानी की किताब के अनुसार पचास-पचपन दिन में फल लगने लगेंगे. अभी गुलाब की प्रूनिंग करनी है, उसने इस बारे में भी जानकारी बढ़ाने के लिये पढ़ा. घर जाने के पूर्व रोजमिक्स भी डालना है. यकीनन इस वर्ष गुलाब अच्छे खिलेंगे, शेष फूलों के बारे में अभी कहना मुश्किल है, डहेलिया माली पर निर्भर है और गेंदा वह जाने से पहले लगा सकती है.
  आज सुबह सारे काम जल्दी हो गए हैं, उसने शॉपिंग लिस्ट बनायी, जून तो इतनी लम्बी-चौड़ी लिस्ट देखकर घबरा ही जायेंगे. उसका ध्यान लिखने से हटकर किसी आवाज से बाहर चला गया तो बाहर जाकर देखा, आज पड़ोस वाले घर में डिश एंटीना लग रहा है. आज समय बहुत है फिर भी मन से नहीं लिख पा रही है, खुशवंत सिंह की उस बात का असर ज्यादा ही ले लिया है, जिसमें वह कहते हैं, यह तो स्वार्थ हुआ कि आप योग या ध्यान के द्वारा अपने मन को शांत कर लें. अस्थिर मन उनके विचार से स्वार्थी नहीं होता, जबकि उसका मन इसके बिलकुल विपरीत है.

आखिर आज छोटी बहन का पत्र आ गया, जिसके उसे प्रतीक्षा थी, वह सोच रही थी, शायद सलाह देना उसे अच्छा न लगा हो. अभी कुछ देर पहले विवेकानंद के सुंदर विचार पढे-

Religion belongs to supersenses and not to the sense plane. It is a vision, an inspiration, a plunge into the unknown and unknowable, makine the unknowable more than known, for it can never be known.”  

 उसने सोचा तब तो मानव जीवन का उद्देश्य धर्म ही होना चाहिए न कि केवल खाना, पीना और मौज मस्ती. कल माली ने पत्ता गोभी के पौधे भी लगा दिए, पर वायदे के अनुसार कैप्सिकम नहीं लाया, उसे ध्यान आया, कहीं धूप में पौधे कुम्हला न रहे हों, उन पर कागज की टोपियां लगानी होंगी. नन्हा आज बहुत खुश था, वह पहली बार अपने मित्रों के साथ कुछ ही दूर पर स्थित डी प्लस के पार्क में खेलने गया. आजकल जून उसे कैरम में आसानी से हरा देते हैं, ‘चायनीज चेकर’ में भी अक्सर, पहले वह उन्हें हरा देती थी, पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह अच्छा खेलती थी, बल्कि वह अब पहले से बेहतर खेलने लगे हैं, वह वैसी ही है सदा से..

….Whenever anything miserable will come, the mind will be able to say, “I know you as hallucination”, when a man has reached that state he is called Jivanmukta, living fee, “free even living”.

  अभी-अभी विवेकानंद का एक भाषण पढ़ा उसके पास शब्द नहीं हैं यह बताने के लिए कि कितना अद्भुत था उनका मानसिक संसार, कितनी गहन पिपासा होगी उनकी, ज्ञान के इस भंडार को समझकर करोड़ों तक पहुँचाने का काम सिर्फ वही कर सकते थे. शब्दों से तेज टपकता है, धारा प्रवाह वाणी जैसे मन को झिंझोड़ती चली जाती है और रह जाती है पीछे शांति. अब उसे कोई बात पहले की तरह विचलित नहीं कर पाती, क्योंकि आरम्भ में जो लिखा है, यह सब खेल है, नाटक, हमें इसे बस देखते भर जाना है, इसमें खो नहीं जाना है, दर्शक की तरह, कीचड़ में कमल की तरह इस दुनिया से गुजरते चले जाना है. आज नन्हे का पहला यूनिट टेस्ट है, सुबह उसने उसके गाल पर क्रीम लगायी, क्योकि मधुमक्खी या किसी कीट के हल्के दंश से हल्का लाल हो गया था, पर वह बहुत बहादुर है.