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Sunday, July 13, 2025

नारंगी बादल


नूना का जन्मदिन था, सबसे पहले पापाजी का फ़ोन आया। वे लोग तैयार होकर प्रातः भ्रमण के लिए निकले ही थे कि बच्चे आ गये।सोनू ब्लूबेरी केक बनाकर लायी थी। नन्हे ने उसे एप्पल का डेस्क टॉप दिया, जिसका कीबोर्ड बहुत स्लीक है और स्क्रीन साढ़े तेइस इंच है।जून ने मैंगो शेक बनाया, ब्रोकोली राइस और बूँदी का रायता। दस बजे वे लोग चले गये। दोपहर व शाम को भी सभी भाई-बहनों व सखियों के फ़ोन आते रहे। फ़ेसबुक पर भी सौ से अधिक लोगों ने शुभकामना दी। नूना के प्रकृति प्रेम और साहित्य से लगाव का ही यह परिणाम है। इन लोगों में से कितनों से तो वह मिली भी नहीं, अधिकतर असम के हैं। आज सुबह आकाश पर नारंगी रंग के बादल थे, छत पर सूर्य नमस्कार करते हुए बाल सूर्य की किरणों को अंतर में भरना कितना सुखद है। टहलने जाने से पूर्व वह कुछ न कुछ लिखती है, बाद में वैसा एकांत नहीं मिलता न बाहरी न आंतरिक। भोर का समय जब पिछले दिन के सब उहापोह साफ़ हो चुके होते हैं, मन बिलकुल ख़ाली होता है, तब ही कुछ नया कहा जा सकता है, सोचा जा सकता है। जून आजकल अपने मोबाइल में ज़्यादा व्यस्त रहते हैं, उन्हें नये-नये व्यंजन बनाने का भी शौक़ है, आज ज्वार के आटे में सहजन के पत्ते डालकर रखे हैं। छोटी बहन का फ़ोन आया, उसकी छोटी बिटिया पालतू पूसी के जाने का दुख भुला नहीं पायी है, वह घर में अकेले नहीं रह पाती, किसी मॉल या रेस्तराँ में जाकर काम करती है या पढ़ती है। पापा जी ने व्हाट्सएप पर पढ़कर घर, मकान, होम, बंगला, हवेली, फ्लैट आदि की परिभाषाएँ बतायीं, सभी अच्छी थीं। घर या होम जहाँ हवन होता है, मकान में दीवारों के कान होते हैं, बंगला यानी पड़ोसी से दूरी, हवेली यानी हवादार, फ्लैट जो लोन लेकर ख़रीदा गया हो। 


आज नूना ने अपनी लिखी एक पुरानी कविता पढ़ी तो लगा उसकी काव्य क्षमता पहले से कम हो गई है।आज दीदी का जन्मदिन है, उन्हें कविता भेजी। नये कंप्यूटर पर लिखना आरंभ किया। छोटा भाई हफ़्तों हैदराबाद के एक होटल में रहकर आज घर पहुँच गया।सुबह टहलने गये तो रास्ते में रेत दिखी थी, गुलदाउदी की पौध लगाने के लिए अच्छी है, जब नूना ने जून से कहा तो वह कार ले आये। रेत लेने के बाद उन्होंने कहा, कुछ दूर तक होकर आते हैं। वैक्सीन की दूसरी डोज़ लगाने के बाद से नूना कहीं भी नहीं गई थी।सोसाइटी के मुख्य द्वार से थोड़ा ही आगे गये होगें तो सूर्योदय के दर्शन हुए, उसके साथ ही लाल फूलों से लदे  हुए गुलमोहर के पेड़ आकर्षित कर रहे थे।नाइस रोड तक जाकर वे वापस लौट आये।   


अभी कुछ देर पहले वे रात्रि भ्रमण से लौट कर आये हैं। आजकल सबसे पहले देखना होता है, कौन सी सड़क ख़ाली है, दायें, बायें या सामने वाली, कोरोना काल में लोगों से बचकर निकलना ही ठीक है। मास्क पहनने के बावजूद भी दूर से कोई दिख जाये तो सड़क बदल लेते हैं, ऐसा कई लोगों को करते भी देखा है। यह कैसा वक्त आया है कि आदमी, आदमी से डरने लगा है। आज अख़बार में एक चित्र देखा जिसमें सामूहिक अस्थि विसर्जन किया जा रहा है। लोग अपने मृत रिश्तेदारों की अस्थियाँ लेने आये ही नहीं तो सरकार को यह करना ही पड़ा। मन्त्रोच्चरण के साथ फूलों से उन्हे सजाकर यह रस्म की गई। 


नन्हे से बात हुई, इस बार वे लोग शनिवार को आयेंगे। सोनू ने बताया, उसे अपनी कंपनी में अब से ग्लोबल टीम में काम करना होगा।आज दोपहर तीन बजे से वर्षा शुरू हुई तो लगातार तीन घंटे होती रही। छह बजे वे टहलने गये, एक घर के सामने एंबुलेंस खड़ी देखी, शायद कोई मरीज़ घर लौटा हो या जाने वाला हो इलाज के लिए, उन्होंने रास्ता बदल लिया और कुछ पता नहीं किया। यदि सामान्य समय होता तो अवश्य ही वहाँ जाकर पूछ लेते। कर्नाटक में लॉक डाउन की अवधि और बढ़ा दी गई है। नन्हे ने लिखा, उसने सरेंडर का अभ्यास शुरू कर दिया है, ईश्वर उसे इस मार्ग पर आगे बढ़ने का साहस दे। नूना ने आज योग वशिष्ठ का कुछ अंश पढ़ा, उसमें चेतना का अद्भुत वर्णन है, पढ़ते-पढ़ते ही जैसे ध्यान लगने लगता है। 


विश्व पर्यावरण दिवस पर बच्चे आज गुड़हल के दो पौधे लाये, एक नारंगी व दूसरा गुलाबी रंग के फूलों का है। आज ही लॉन लगाने के लिए घास भी आ गई है। आज पड़ोसन ने निकट ही बनी एक नयी सोसाइटी बोटेनिका के बारे में बताया। वे देखने गये, हरियाली का एक सागर हो जैसे, साफ़-सुथरी सड़कें और फूलों के वृक्षों से सजी थी। उसी में से होकर एक सड़क निकट के एक गाँव में जाती है। वे दूर तक चलते गये, पहले कच्ची सड़क थी, फिर पक्की सड़क आ गई। शाम को पापा जी से बात हुई, उन्हें वृद्धावस्था में होने वाली परेशानियाँ हो रही हैं। वे बहुत नियम से रहते हैं पर तन-मन पर किसी का वश तो नहीं है। 


  


Wednesday, March 3, 2021

एस्टोनिया के फूल

 इस समय वे पहली मंजिल पर बैठक में बैठे हैं। राजस्थान पत्रिका में पढ़ा, दिल्ली में प्रदूषण के कारण स्कूल पाँच तारीख तक बंद कर दिए गए हैं। एक सप्ताह बाद उन्हें भी यात्रा पर निकलना है, तीसरे सप्ताह में दिल्ली पहुंचेंगे। तब तक संभवत: हालात सुधर जाएं। शाम को जून साइकिल से गैस सिलिन्डर की बुकिंग के लिए गए और उसने यहाँ आने का बाद पहली बार ध्यान किया, मन कितना शांत लग रहा है। सुबह सूर्योदय की तस्वीरें उतारीं, मोबाइल से प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें उतारना कितना सहज है और अब तो यह  उसके जीवन का एक भाग ही बन गया है। आजकल सुबह-शाम दोनों समय टहलते समय फूलों की गंध आती है, एस्टोनिया के फूलों की गंध ! कल शाम नन्हा व सोनू आ गए थे, सुबह उनके साथ पहले डेन्टिस्ट के पास गए फिर कपड़े सिलने देने के लिए दर्जी के पास। मार्च तक उन्हें तीन शादियों में सम्मिलित होना है। 


तुलसी का पौधा लगाने के लिए पत्थर का एक विशेष गमला कल खरीदा था, कल उसमें पौधा लगाना है।  आज सुबह बुरादा, खाद मिलकर मिट्टी तैयार की। तुलसी व अजवाइन के पौधे लगाए, शेष गमलों में खाद डाली। ग्लेडियोली के बल्ब से पौधे निकलने लगे हैं। जून को बालकनी में पिटूनिया लगाने का मन है।  वे निकट स्थित एक नर्सरी में गए, पर वहाँ पौधे नहीं मिले, आश्रम की नर्सरी से दो फूल के पौधे लिए। आज मौसम अपेक्षाकृत गरम है, यहाँ ठंड का मौसम आता ही नहीं शायद। पिताजी को फोन किया तो उन्हें यहाँ आने का निमंत्रण दिया।आज टाटा स्काई लगाने के लिए लोग आए थे, शायद कल से वे कुछ देर टीवी भी देख सकें।


मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है। आत्मा सभी के भीतर बीज रूप में विद्यमान है। उसमें फूल खिलाना जिसने सीख लिया, सुगंध उसे ही मिलती है, उसे वृक्ष बनाना जिसने सीख लिया, छाया उसे ही मिलती है। उसे जाने बिना जो रह गया, उसके लिए आत्मा का होना या न होना क्या अर्थ रखता होगा ? 


दिन खरामा-खरामा बीत रहे हैं, किसी नदी की शांत धारा की तरह। मौसम आज भी गरम है। सुबह ठंडी थी, उन्हें जैकेट पहनकर निकलना पड़ा। फूलों से लदे वृक्षों की तस्वीरें उतारीं। कुछ देर प्राणायाम किया पर आसन नहीं किए, जून के अनुसार ‘समय नहीं था’ उन्हें हर काम को जल्दी करने की आदत है। कल शाम उन्होंने पिताजी की पुरानी तस्वीरें खोजीं, जिन्हें स्कैन करके एक वीडियो बनाना है। उनके जन्मदिन पर यह उपहार होगा उस कविता के साथ जो उनके लिए उसने लिखी है।  बर्तन डिशवाशर में लगाकर वे ऊपर शयन कक्ष में आ गए हैं। आज इतने दिनों बाद टीवी पर तेनालीरामा देखा, कहानी जैसे आगे बढ़ी ही नहीं है। दोपहर को वे फोर्टिस अस्पताल गए, उसके हाथ के नाखूनों में सफेदी आ रही थी और जून को भी त्वचा विशेषज्ञ को दिखाना था। डाक्टर ने खाने व लगाने  की दवा दी है। दोपहर को सीढ़ी चढ़ने में दाहिने घुटने में कुछ दिक्कत महसूस हुई, बर्फ का सेक करने का सुझाव दिया है नेट पर, जून ने तिल के तेल से मालिश करने को कहा। दिन में कई बार सीढ़ियाँ चढ़नी व उतरनी पड़ती हैं, नया-नया अभ्यास है अभी। अभी छोटे भाई से बात हुई, वह नन्हे की ससुराल गया था, वहाँ बहुत खातिरदारी हुई उसकी। नन्हे ने  शाम को बिग बास्केट से कुछ नए प्रकार के फल भेजे, उनमें एक ड्रैगन फ्रूट भी है। 


आज उन्हें असम छोड़े हुए तीन सप्ताह हो गए हैं। यहाँ घर  की दिनचर्या लगभग निश्चित हो गई है।  सुबह वे साढ़े चार बजे उठते हैं, टहलने जाते हैं जब हल्का अंधेरा होता है। वापस आकर योग साधना। हॉर्लिक्स पीने के बाद बगीचे में कुछ देर काम और हरसिंगार के फूल चुनना। उसके बाद स्नान और नाश्ता बनाना। जिसमें सब्जी काटने से आरंभ करना होता है। उसके बाद अखबार पढ़ना, व्हाट्सएप व फ़ेसबुक पर पोस्ट डालना।  जून ने दीवाली की लाइट उतारने के लिए इलेक्ट्रिशियन को बुलाया है। कल की सेवा के बाद दायाँ घुटना ठीक है, अब बाएं में कुछ दर्द हो रहा है, उसकी भी सेवा-सुश्रुषा हो जाएगी। एक सब्जी वाली घर बैठे पालक व पुदीना दे गई है, निकट ही एक गाँव है, वहीं से आयी होगी। शाम को वे टहलने गए तो काफी रौनक दिखी, एक पार्क में महिलाओं की थ्रो बॉल प्रैक्टिस चल रही थी। एक जगह बच्चे स्केटिंग कर रहे थे।  


वर्षों पुरानी उस पुरानी डायरी में पढ़ा - 


सत्य यही है कि संसार में दो नियम हैं जन्म और मृत्यु ! 

नाश का ज्ञान रखने वाला क्या कभी पाप करेगा ? वह तो जितने दिन रहेगा, स्नेह और समता से ही इस संसार में रहेगा। आदमी जब तृष्णा, अहंकार और ईर्ष्या से शीघ्र ही कुछ प्राप्त कर लेने के लिए काम करता है, तब वह अपने भीतर ही असहिष्णु हो जाता है। अहंकार उसकी नींवों को ठोस भूमि पर खड़ा नहीं रहने देता। 


सबकी आत्मा की शक्ति समान है कुछ की शक्ति प्रकट हो गई, कुछ की प्रकट होनी बाकी है, बस इतना ही अंतर है ! 


बापू की एक सूक्ति भी उसने लिखी थी - क्षण भर भी काम के बिना रहना ईश्वर की चोरी समझो। काम के सिवा भीतरी और बाहरी आनंद का और कोई रास्ता मैं नहीं जानता। 


Thursday, February 4, 2021

पके धान के खेत

दोपहर का समय है. कुछ देर पहले टीवी पर ‘वंदे भारत’ ट्रेन के बारे में सुना, जो दिल्ली से कटरा जाएगी, सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त है यह भारत में ही बनी रेल. आज रसोईघर व पैंट्री के सामान को अलग किया, जो बाँट देने हैं और जो ले जाने हैं. परसों नन्हा व सोनू आ रहे हैं, पांच-छह दिन रहेंगे. तब पुस्तकों को पैक करने का कार्य आरम्भ करेंगे. आज एक मित्र परिवार के यहाँ भोजन पर जाना है. उसके लिए एक कविता लिखेगी, विदाई का उपहार ! सुबह टहलने गए तो वापसी में बात  की कि कब वे घर कम्पनी को हैंडओवर करेंगे. एक दिन पहले उन लोगों को बुलाएँगे जिन्हें सामान देना है ताकि अगले दिन घर की चाबी जमा करके गेस्टहाउस में शिफ्ट हो जाएँ. वहाँ रहने के लिए सूटकेस भी पैक कर दिया. केवल एक सप्ताह ही शेष है इस घर में. आज नाश्ते में जौ का दलिया बनाया. मुक्तिबोध की कविता के बारे में एक आलेख पढ़ा. 


कल नवरात्रि के दौरान सप्तमी का व्रत रखना है, देवी के कालरात्रि के रूप की पूजा होती है इस दिन. परसों बच्चों को अंतिम बार प्रसाद खिलाना है. उसके बाद वे सब एक रात के लिए दिगबोई जायेंगे. आज शाम को एक दक्षिण भारतीय सखी के यहाँ गयी, उसने सुंदर मूर्तियों व वस्तुओं से अद्भुत मंदिर सजाया है, प्रसाद खिलाया, दिया और तस्वीरें भी उतारीं। उसके लिए लिखी कविता पढ़कर सुनाई. आज अंतिम बार घर पर घी बनाया, पता नहीं बंगलूरू में इतना अच्छा दूध मिलेगा या नहीं. 


पिछले पांच दिन व्यस्तता में बीते. नन्हा और सोनू शिलांग में एक रात बिताकर वापस अपने घर पहुँच गए हैं. आज वे गेस्टहाउस आ गए हैं. साढ़े दस बजे तिनसुकिया जाना है. कुछ सामान खरीदना है. यूट्यूब पर पुष्पेंद्र जी कश्मीर के इतिहास पर बात कर रहे हैं. कश्मीर को इस्लामिक राज्य बनाने के एजेंडे पर वह आजादी के बाद के दौर के नेताओं की अदूरदर्शिता की बात कर रहे हैं. आज सुबह गोल्फ फील्ड में टहलने गए, सूर्योदय हो चुका था, कुछ तस्वीरें उतारीं। आज शाम को दो जगह लक्ष्मी पूजा में जाना है. कल एक शादी में जाना है और परसों कम्पनी की तरफ से विदाई पार्टी है. गेस्टहाउस में सभी सुविधाएँ  हैं.  34 वर्ष पहले जब विवाह के बाद वह पहली बार वह असम आयी थी तो घर मिलने तक इसी गेस्टहाउस में दो-तीन दिन रुकी थी. 


आज दोपहर को मृणालज्योति से कुछ लोग मिलने आये. सुबह नाश्ते के बाद वे हाथियाली स्थित विल्टन चाय बागान देखने गए. मीलों तक फैले हरे-भरे बागान और बीच-बीच में धान के खेत, जिनमें से कुछ में धान पकने लगा है. सुनहरे रंग के खेत दूसरे हरे-धानी खेतों में विशेष रूप से चमक रहे थे. कमल के पोखर भी दिखे, पर उनमें कमल कम दिखे, कल लक्ष्मी पूजा के कारण सभी कमल सम्भवतः तोड़ लिए गए थे. कल सुबह उन्हें मागोरीबील जाना है, जहाँ प्रकृति का एक अन्य रूप उन्हें देखने को मिलेगा. प्रकृति से जुड़ना हृदय से होता है, तभी प्रकृति सभी को मोह लेती है. दोपहर को खाने में करेले और छोले थे. खाना यहाँ घर की तरह होता है, तेल-मसालों की अधिकता नहीं होती. शाम को टहलते हुए वे पब्लिक लाइब्रेरी जायेंगे और रात को एक अधिकारी के बेटी के विवाह में. परसों इस समय वे बंगलूरू पहुँचने वाले होंगे. असम एक खूबसूरत याद की तरह मन में बसा रहेगा. उसके सिर में कई दिनों से हल्का दर्द बना रहता है. यह उस दुःख की वजह से है जो यहां से जाने के कारण कई बार महसूस हुआ है. कितनी बार गला भर आया और आँखें भीगीं, अथवा तो दिनचर्या में व भोजन में आये बदलाव के कारण हुआ है. जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है. कल शाम पार्लर में मसाज से नसों को आराम मिला. टी गार्डन से लौटते समय एक सन्त के वचन सुने, सहज स्वीकार भाव मन में नहीं होता तभी तनाव का जन्म होता है. जो कुछ भी होता है वह उस महान अस्तित्त्व का ही भाग है, वह गलत हो ही नहीं सकता. नीरू माँ भी कहती हैं, इस जगत में सब जगह इंसाफ ही होता है. 


बरसों पुरानी उस डायरी के पन्ने पर उस दिन की सूक्ति थी, जो इंसान इच्छाओं से मुक्त है, वह सदा स्वतंत्र रहता है, उसने नीचे लिखा,  मगर स्वतंत्रता भी कभी-कभी अप्रिय लगती है, बंधने को जी चाहता है, मनचाहा बंधन हो तो ! उस वक्त कहाँ ज्ञात था हर बंधन बस बंधन ही होता है. 

अगले पन्ने पर था- सम्पूर्ण संसार की सार्थकता या निरर्थकता का दारोमदार सिर्फ उसके स्वयं के सार्थक या निरर्थक होने में है. उसके पास शक्ति है, आज है, जोश है, युवा जन उत्साह से भरे होते हैं और मुस्कुराहट से भी... वे बांटते हैं स्नेह, विश्वास और भरते हैं दूसरों में साहस ! नहीं डिगते.. उसने खुद से वायदा किया कि वह नहीं करेगी वंचित प्रकृति को अपने स्नेह से ! 


 

Sunday, October 4, 2020

जीन का इतिहास

 

आज ईद का अवकाश है. वे नाश्ते की मेज पर बैठे थे कि एक सखी का फोन आया, भूटान के बारे में जानकारी लेने के लिए, संयोग की बात है कि पिछले वर्ष आज ही के दिन वे भूटान गए थे. कितनी ही स्मृतियाँ लौट आयीं. जीवन की तरह यात्रा में भी हर तरह की बातें होती हैं, कुछ सुखद और कुछ दुखद भी.  एक ऐसी बात भी याद आयी जिसे अपने संस्कारों के कारण उसने शिकायत की थी. मन की प्रतिक्रिया से एक रचना का जन्म हुआ. इस जगत में सभी अपने-अपने संस्कार से बंधे हैं. जब तक वे मन से ऊपर उठकर जीना नहीं सीख जाते दुःख से छुटकारा नहीं है, अथवा तो उन्हें जीवन के वास्तविक दुखों का सामना नहीं करना पड़ा है सो काल्पनिक दुखों का निर्माण कर लेते हैं. जून भी वृक्षारोपण के कार्यक्रम में गए थे, पेड़ लगाने के बाद एक सुंदर रेशमी गमछा पहनाया गया उन्हें. हजारों बल्कि लाखों की संख्या में वृक्ष लगाए गए होंगे इस अवसर पर पूरे देश और विश्व में.शाम को योग कक्षा में एक साधिका ने वृक्षों को समर्पित एक व्यक्ति के अद्भुत कार्यों की बात बताई. उन्होंने भजन गाये और प्रसाद वितरण किया, सभी कुछ न कुछ लेकर आयी थीं.  समाचारों में सुना इस वर्ष के अंत तक जम्मू-कश्मीर व लेह में चुनाव कराये जायेंगे.   


सुबह के ध्यान में भगवान राम, सीता व लक्ष्मण के सुंदर विग्रहों का दर्शन हुआ, अद्भुत था वह दर्शन, मणि-माणिक से सजे सुंदर रंगीन चित्र के समान पल भर के लिए आये और विलीन हो गए . मन की गहराई में कितने खजाने छुपे हैं, जिनका उन्हें खुद ही भान नहीं है. इस समय टीवी पर तेनाली रामा आ रहा है, मानव के छह रिपु काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद व मत्सर राजा कृष्णदेवराय को पराजित करने के लिए तत्पर हैं. अब देखना है कि इस युद्ध में रामा कैसे राजा को बचाता है. जेनेटिक्स पर सिद्धार्थ मुखर्जी की लिखी किताब आगे पढ़ी, द जीन- एन इंटिमेट हिस्ट्री. बहुत रोचक ढंग से लिखी गयी है, जीन का विज्ञान भी बहुत पुराना है और इसमें नित नए अविष्कार हो रहे हैं. सौ वर्षों पूर्व कितना अन्धविश्वास था समाज में, इसकी जानकारी भी मिल रही है. विज्ञान ने या कहें समय ने मानव को ज्यादा संवेदनशील बनाया है. बहुत दिनों बाद फेसबुक पर नजर दौड़ाई, बड़ी भांजी का स्टेटस देखा तो उदासी की खबर दे रहा था, उससे व्हाट्सएप पर बात की. हमारे कर्मठ प्रधानमंत्री मालदीव और श्रीलंका की यात्रा पर गए हैं. वायुसेना का एक विमान ए एन 32 पिछले तीन दिनों से लापता है, उसमें 13 यात्री थे, उसने मन ही मन उनके सकुशल रहने की प्रार्थना की. 


आज शाम को अचानक तेज हवा चलने लगी, आकाश काला हो गया और देखते ही देखते मूसलाधार वर्षा होने लगी, पर एक घंटे बाद सब थम गया. प्रकृति की लीला को कौन समझ सकता है. आज ‘श्रद्धा सुम’न ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद लिखा. काव्यालय पर भवानी प्रसाद मिश्र की एक और कविता आयी है, उन्होंने मृत्यु का स्वागत सहजता से किया. आज सुबह ध्यान में एक दुबला -पतला बच्चा दिखा, मन भी विचित्रता से भरा है. कल रात स्वप्न में नन्हे को देखा, वह चाइना से असम आ गया है. 


और अब अतीत के पन्नों से - उस दिन की सूक्ति में लिखा था, गरीब लोग प्रेम और सहानुभूति के भूखे होते हैं. यह  पढ़कर ही सम्भवतः उसने लिखा था, यदि कोई जानता होगा तो उस दिन फिर एक दिव्य संदेश उसे प्राप्त होगा. जिस प्रकाश से आवृत होने की बात कुछ दिन पूर्व  लिखी थी, प्रकाश का वह पुंज छितरा गया था जब अगले दिन का पेपर अच्छा नहीं हुआ, किन्तु उसकी आवश्यकता तो सदा ही रहती है. आज इस क्षण से वह पुंज उसका मार्गदर्शक हो ऐसी प्रार्थना ईश्वर से करती है, उस ईश्वर से जिसके अस्तित्त्व पर उसे संदेह है. फिर क्यों कर वह उसकी बात सुनेगा, पर ईश्वर उसे अपनी प्रतीति स्वयं कराएगा. वह अज्ञानियों पर भी उतनी ही दया रखता है ऐसा सब कहते हैं. अज्ञानता में सार न हो पर उसमें पाप है ऐसा वह नहीं समझती. पाप और पुण्य की समझ उसे नहीं है, वह हर वक्त किसी का आश्रय चाहती है क्योंकि वह इतनी दुर्बल और क्षीण है कि अकेले चलना उसके बस का नहीं फिर वह एक कोई अपना हो या ईश्वर !  व्यक्ति है उसके सम्मुख जीता-जागता, उसकी बातों का जवाब देने वाला ! पर व्यक्ति कभी -कभी आपस में नहीं बोलते ऐसे पलों में उसे लगता है ईश्वर की मित्रता कभी अस्थायी नहीं होती. वह कभी उससे नाराज़ नहीं होगा, होगा भी तो मान जायेगा फिर ... किन्तु अपनों के साथ जुड़े होते हैं कितने अनोखे क्षण, स्मृतियाँ ! क्या स्मृतियाँ मृत होती हैं ? क्या उनमें कोई वस्तु स्पंदन नहीं कर रही होती. यदि वे मृत प्रायः हैं तो किसी के होने का मूल्य सिर्फ वर्तमान में है क्योंकि भविष्य में क्या छुपा है उन्हें नहीं ज्ञात. लेकिन ऐसा नहीं है वे जो ‘कुछ’ हैं, ‘वह’ कभी वे थे ! 


Tuesday, August 18, 2020

साहित्य का उद्देश्य

 

पिछले आधे घण्टे से नूना ‘प्लैनेट अर्थ’ देख रही थी. वालरस की विचित्र दुनिया और रंगीन पक्षियों के अद्भुत नृत्य ! प्रकृति की विविधता और सौंदर्य अनूठा है पर माया की इस नगरी का कोई अंत नहीं है. कोई कितना भी देखे और कितना भी सराहे, इसमें न कोई सार है न कोई अंत. नेत्र थक जायेंगे और मन भी पर न तो जीवन में कोई ऐसा आनंद झलकेगा जिसका कोई अंत न हो और जो पूर्णता का अनुभव कराने वाला हो, वह तो मायापति से मिलकर ही पाया जा सकता है. आज भी सुबह कल की तरह थी, वापस लौटे तो रक्तजांच के लिए रक्त का नमूना लेने एक व्यक्ति आकर बैठा था. कैल्शियम की जाँच होगी और कुछ दूसरे टेस्ट भी. रिपोर्ट ईमेल में आ जाएगी. जून ने भी कल डॉक्टर को दिखाया, आज घर बैठे टेस्ट हो गए. बड़े शहर में रहने का यह बड़ा फायदा है. दोपहर को वे नए घर जायेंगे, पेंटिंग का कार्य सम्भवतः पूरा हो चूका होगा. नन्हा दफ्तर जा चुका है, उसका कालेज का  मित्र जो पास ही रहता है और जिसका भोजन यहीं बनता है, अभी तक आया नहीं है. उसकी चाय दो घण्टे से बनी हुई है, आकर गर्म करेगा और नाश्ता भी. 


सत्व, रज और तम की साम्यावस्था होने पर ही वे गुणातीत होते हैं. पहले तमस को रजस में बदलना होगा, फिर रजस को सत्व में. बढ़ा  हुआ  तमस मन को  क्रोधित और ईर्ष्यालु बनाता है. रजस  व्यर्थ के कामों लगाता है. जब यह ऊर्जा सत्व में परिवर्तित हो जाती है तो भीतर समता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है. साम्यावस्था में दीर्घ काल तक टिके रहने के बाद ही साधक गुणातीत अवस्था का अनुभव करता है. आज सदगुरू को सुना, तमस की अवस्था में भी भीतर एक शांति का अनुभव होता है पर वह जड़ता का प्रतीक है. बाहर का जीवन गतिमय हो और भीतर शांति हो वही गुणातीत की निशानी है. आज दिन भर व्यस्तता बनी रही. 


रात्रि के आठ बजे हैं, आज भी कल की तरह वे दिन भर व्यस्त रहे. घर में काम काफी आगे बढ़ गया है. आज योग कक्ष में वॉल पेपर भी लग गया. ऊपर की बैठक  तथा मुख्य शयन कक्ष में भी. कमरे अच्छे लगने लगे हैं, अभी पर्दे नहीं लगे हैं  और न ही फर्नीचर आया है. कल सम्भवतः गहन सफाई होगी. आज यहाँ आये छठा दिन है, समय जैसे भाग रहा है. आजकल योग वशिष्ठ पढ़ रही है और सुन भी रही है. अनुभवानन्द जी कहते हैं, परमात्मा सद है इसका अर्थ है वह सत व असत दोनों से परे है, वह चिद है यानि चितिशक्ति उसके पास है जिसका विस्तार आनंद के रूप में होता  है. आनंद -  इच्छा, क्रिया व ज्ञान इन तीन शक्तियों के रूप में प्रकट होता है. ज्ञान यदि शुद्ध है तो इच्छा भी शुद्ध होगी और उसकी पूर्ति हेतु क्रिया भी श्रेष्ठ होगी. जैसा ज्ञान, वैसी इच्छा, वैसा कर्म ! यदि कोई सांख्य मार्ग का साधक है तो वह स्वयं को शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा के रूप में अनुभव करता है. कर्म के मार्ग का साधक धीरे-धीरे अंतःकरण को शुद्ध करता है, इसी तरह उपासना मार्ग का साधक भी अपने भीतर परम का अनुभव करता है. ज्ञान प्राप्त करने का साधन अंत:चतुष्टय तथा ज्ञानेन्द्रियाँ हैं. इच्छा आत्मा का सहज स्वभाव है, सुख-दुःख, इच्छा-द्वेष, प्रयत्न-ज्ञान आत्मा के गुण हैं.  


‘’वह विज्ञान की छात्रा रही है किन्तु उसका रुझान साहित्य की ओर है यदि वह साहित्य की छात्रा रही होती तो सम्भवतः इसका विपरीत हुआ होता अथवा नहीं भी. शब्दों से उसे प्यार है, शब्दों का जादू उस पर चलता है. कभी रुलाते कभी हँसाते शब्द ! मानव ने जब प्रथम बार शब्दों का प्रयोग किया होगा तो वह क्षण कितना महान होगा ! फ़िराक गोरखपुरी साहित्य को उद्देश्यपूर्ण होना आवश्यक नहीं समझते. वह समझती है चाहे साहित्य हो या अन्य कोई कला विकास तो वह करती ही है, चाहे मानसिक विकास ही, लेकिन लक्ष्य तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व वह नहीं ले सकती. चरैवेति-चरैवेति का संदेश वह अवश्य देती है. परन्तु साहित्य बिना किसी उद्देश्य के लिखा जाता है यह बात कभी भी मान्य नहीं हो सकती.  रचनाकार यदि स्वयं का उत्थान चाहता है तो यह भी एक उद्देश्य हुआ, या सन्तुष्टि अथवा प्रसन्नता ही. उसकी इच्छा है कि वह भी कुछ लिखे. लिखना और पढ़ना ये दो कार्य ही उसे पसन्द हैं और वह आसानी से इन्हें कर सकती है पर वह कितनी-कितनी देर यूँही बैठी रह जाती है. कितना समय नष्ट करती है, कल से नियमित रहेगी हर कार्य वक्त पर’’. कालेज के अंतिम वर्ष में उसने यह सब लिखा था, उसे स्वयं ही पढ़कर आश्चर्य हुआ ! 



Friday, April 17, 2020

कैटरी-बिल्लियों का घर


सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. आज वर्षा नहीं हो रही है, न ही अभी तक धूप तेज हुई है. बाहर का मौसम अच्छा है वैसे ही मन का मौसम भी ! सुबह उठी तो भीतर ध्यान का प्रयास चल रहा था, अर्थात नींद में भी कोई धारा लगातार चलती रही थी. रात को ध्यान करते-करते ही सोयी थी, शिव सूत्र पर प्रवचन चल रहा था, शायद रात भर मोबाइल ऑन ही रह गया, बैटरी खत्म हो गयी. मन में वृत्ति का प्रवाह अब भी चलता है लेकिन उसे देखते ही विलीन हो जाता है और रह जाती है एक अखण्ड शांति ! उन्हें सदा उसी अपने निराकार स्वरूप में रहना सीखना है, व्यर्थ के संकल्प उनकी ऊर्जा को व्यर्थ करते हैं. एकाग्र मन ही शुद्ध मन है. स्थिर बुद्धि ही विवेक है. परमात्मा की शक्ति है चिति शक्ति और उसका विस्तार है आनंद !  जो प्रकृति के रूप में प्रकट हो रहा है. शिव सूत्र में सोलह कला का एक नया सरल अर्थ सुना, तीनों अवस्थाओं के पन्द्रह भेद और सोलहवां मन. उनके भीतर ही सारे प्रश्नों का अर्थ छिपा है, यदि वे अंतर्मुख होकर स्वयं के सारे आयामों से परिचित होना आरंभ कर देते हैं तो परमात्मा की शक्ति सारे रहस्यों को खोलने लगती है. उनका जीवन एक सहज बहती नदी की धारा की तरह है जिसमें समय के अनुसार परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन इस जीवन का आधार सदा एक रस है, जैसे वह आकाश जिसमें सब कुछ स्थित है. 

सुबह उठी तो सवा पांच हो गए थे. प्रातः कालीन  भ्रमण  पर जाते समय और लौटते समय भी भगवद्गीता का पाठ सुना. अद्भुत वचन हैं कृष्ण के, गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जितनी बार भी पढ़ें या सुनें, नया ही लगता है. मन कृष्णमय हो गया है. जून का वीडियो कॉल आया, वह भुवनेश्वर के उस होटल में ठहरे हैं जहाँ लैगून है, जहाँ वे दोनों कुछ समय पहले ही गए थे. कल वह आ रहे हैं. आज एक पुराने मित्र परिवार से मिलने आएंगे. शनिवार की साप्ताहिक सफाई का कार्य चल रहा है. नैनी को बुखार है, उसकी देवरानी आयी है. कल रात आयी थी तो उसकी आवाज बदली हुई थी, कल दोपहर वह बच्चों को लेकर पैदल ही गणेश पूजा देखने गयी थी वह, खिचड़ी खाने का मन था, पर भीड़ बहुत ज्यादा थी, शरारती भतीजे के कारण भी बहुत परेशानी हुई. अभी उसे देखने गयी तो उसके पति ने कहा, नाश्ता बना रही है, यानि बुखार में भी आराम नहीं है. कल मृणाल ज्योति गयी, मूक-बधिर बच्चों को हिंदी भाषा का ज्ञान देना है, उन्हें चित्रों और इशारों के माध्यम से ही पढ़ाया जा सकता है. वहाँ एक अध्यापिका ने बताया, ट्यूबवेल लगाने के लिए स्थान देखने कम्पनी से कुछ लोग आये थे. स्कूल से लौटकर एक कप कॉफी पीने एक सखी के यहाँ गयी, उसका पुत्र लंदन लेस्टर युनिवर्सिटी पढ़ने जा रहा है, तीन साल का कोर्स है. उससे भी मुलाकात हुई, वह खुस था और समझदार भी बहुत है. इंजीनियरिंग कर चुका है, किन्तु पुनः डिग्री कोर्स करने ही जा रहा है. ज्ञान का कोई अंत नहीं है. अभी-अभी नन्हे और सोनू से बात हुई, उन्होंने अपनी बिल्लियों को दो दिन के लिए कैटरी में रखा है, वहां अन्य दस-बारह बिल्लियां रहती हैं और चिड़िया व तोता भी. सोनू एक पजल बना रही थी जो उसके भाई ने जापान से भेजा था. कल वे दोनों नापा वैली जायेंगे, जहाँ उनके भावी नये घर में आंतरिक सज्जा का काम चल रहा है. 

दोपहर के साढ़े बारह बजने को हैं. इतवार के सारे कार्य हो चुके हैं. पिताजी व बड़ी ननद से फोन पर बात भी हो गयी, छोटी का फोन नहीं लगा. वापसी की यात्रा के लिए जून अब हवाई जहाज में बैठ चुके होंगे. 

Monday, June 24, 2019

क्रिसमस ट्री



आज क्रिसमस है. हर जगह उत्सव का माहौल है. सुबह बड़े दिन का संदेश सुना था. हर आत्मा को स्वयं पर लगे दाग-धब्बे साफ करने हैं ! न दीन बनना है, न अधीन बनना है, पूर्ण स्वाधीन बनना है. न बेबस, न मजबूर, न असहाय बनना है, जीवन के अंतिम क्षण तक. उम्र चाहे कितनी भी हो, मन को सदा युवा बनाना है. मृणाल ज्योति गयी वह, केक और क्रिसमस ट्री सजाने का कुछ सामान लेकर. पहुँची तो कुछ बच्चे काम में लगे थे, उनके हाथ मिट्टी से सने थे. हाथ धोकर आये, उन्हें संगीत  सुनाया, केक खिलाया, बहुत खुश हुए. जून भी आये बाद में उसे लेने. उन्होंने देखा किस तरह वहाँ  निर्माण कार्य चल रहा है, स्कूल आगे बढ़ रहा है. वहीं से वे नाहरकटिया पुल के नीचे नदी तट पर गये. पानी कम था, लगभग स्थिर ही लग रहा था. किनारे पर काई भी जमी थी. एक-दो पिकनिक पार्टियाँ भी चल रही थीं. इस समय शाम के पांच बजे हैं. कुछ देर पहले वे भ्रमण पथ पर टहलने गये, उससे सटा हुआ  बगीचा गुलाब के फूलों से भरा था. हर रंग के गुलाब थे वहाँ, लाल, गुलाबी, पीले, सुनहरे, नारंगी, हल्के जामुनी, पीच और मैरून !

आज इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद के बारे में एक कार्यक्रम देखा. सत्तर वर्ष की उम्र में वह विदेश गये और सत्तर देशों में गीता का ज्ञान फैलाया. ग्यारह बजने को हैं, आज मौसम खुशनुमा है. खिली-खिली धूप और वातावरण में शांति..ध्यान के बाद मन भी शांत है. पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. परसों सुबह रात्रि भोज की तैयारी में निकल गयी, दोपहर भोजन बनाने-बनवाने में व शाम खाने-खिलाने में. जून के एक सहकर्मी आये थे परिवार के साथ, तीन बच्चे, तीन बुजुर्ग तथा दो व्यस्क. बहुत अच्छा समय बीता. उसके पूर्व की संध्या को वे संगीत सुनने गये थे, शास्त्रीय गायन व वादन ! उससे पूर्व एक सखी ने विदाई पार्टी में बुलाया था. इस वर्ष के दो दिन शेष हैं. आज वे अरुणाचल प्रदेश जा रहे हैं. नये वर्ष का स्वागत तेजू में करेंगे, जहाँ सूर्य की किरणें सर्वप्रथम उदित होती हैं. जून कुछ देर में आने वाले होंगे. वह बगीचे की धूप में हाथ में डायरी थामे खड़े होकर ही लिख रही है. घास अभी भी भीगी हो शायद, सो वस्त्र खराब होने के भय से नीचे नहीं बैठ रही है, पर धूप इतनी तेज हैं कि नन्ही-नन्ही ओस की बूँदें कब की सूख चुकी होंगी, उसका भय हजार भयों की तरह व्यर्थ ही सिद्ध होगा यदि वह बैठ जाये.

सुबह वे टहलने गये, फूलों की सुगंध जो पहले दूर से ही आ जाती थी, आज निकट से गुजरने पर भी नहीं आयी. उसकी सूंघने की शक्ति पूरी तरह वापस नहीं लौटी है. गले में कभी-कभार खराश भी हो जाती है. खैर, भोजन के प्रति उसकी आसक्ति को छुड़ाने के लिए ही शायद प्रकृति के द्वारा रचा गया यह प्रपंच है. उसे अपना उद्धार करना है. परमात्मा इसमें सहायक है. कोई भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थति उसे अनंत से जुड़ने से रोक न पाए, अपनी ही नजरों में वह पराजित न बने. मन संकुचित न रहे, निज स्वार्थ से ऊपर उठे. नये वर्ष में यही प्रार्थना लेकर प्रवेश करना है. कुछ भी ऐसा न रहे जो उसे भारी कर दे, रोग का कारण बने. साधना के प्रति श्रद्धा सदा बनी रहे इसका ध्यान रखना है. साधक को ज्ञान प्राप्ति के लिए सदा विद्यार्थी बनकर रहना है. कैवल्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करना है, जब तक कैवल्य की प्राप्ति न हो तब तक विश्राम नहीं, आराम नहीं. जीवन का एक भी पल विवाद में न बीते. शोक और मोह से आत्मा एक क्षण के लिए भी ग्रस्त न हो. परमात्मा उसी हृदय में विराजमान होंगे जो हृदय खाली होगा. संबंधों का बोझ जब तक आत्मा पर है तब तक वह उड़ान नहीं भर सकती. परमात्मा सदा ही उसका रक्षक है. वह भीतर से शिक्षा देता है और बाहर से कृपा रूप में ऐसी परिस्थतियाँ खड़ी करता है कि आत्मा स्वयं की परख कर सके. कितने दाग लगे उसे यह स्पष्ट दिखाई दे. उनकी यात्रा आत्मशुद्धि की यात्रा है. जगत इसमें सहायक होता है, जगत दर्पण है, जिसमें वे अपने ही अक्स को देखते हैं.

Monday, August 20, 2018

हरी घास पर नंगे पांव



रात्रि के नौ बजने वाले हैं, जून गोहाटी में हैं, कल वापस आ रहे हैं. ‘वेस्ट फ्यूल मैनेजमेंट’ पर आज उन्हें एक प्रजेंटेशन देना है. कल रात ही सवा ग्यारह बजे डायरेक्टर का फोन आया, जिसमें आज गोहाटी जाने को कहा था. आज ही पूना में प्रधानमंत्री ‘स्मार्ट सिटी योजना’ का शुभारम्भ कर रहे हैं. गोहाटी को भी स्मार्ट सिटी समूह में रखा गया है. आज एक समाचार पढ़ा, नागालैंड का अलग ध्वज होगा तथा वहाँ जाने के लिए पासपोर्ट लेना होगा, यकीन नहीं होता कि ऐसा हो सकता है, जरूर किसी सिरफिरे ने अफवाह फैलाई है. दोपहर को उसने भांजी व उसकी सखी को कविताएँ मेल कर दीं. दोपहर बाद बाजार गयी, गाजर, टमाटर, कुंदरू, परवल, बैंगन, खीर, डांगबूटी, भिन्डी, अदरक व मिर्च सभी कुछ लिया. पूसी अब बिलकुल ठीक है, दोपहर को उसे मस्ती में सोते देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बच्चा सो रहा हो. प्रकृति कितनी विचित्र है, कितनी रहस्यमयी. छत पर दो भिन्न पक्षी भी दिखे शाम को, शायद बुलबुल. जैसे ही वह उनकी तस्वीर लेने निकट गयी, फुर्र से उड़ गये. छोटे से छोटा जीव भी दुःख नहीं चाहता, आनन्द चाहता है, प्रेम चाहता है. अपने अस्तित्त्व की रक्षा करना चाहता है अर्थात शक्ति चाहता है. प्रकृति ने मनुष्य के अलावा सभी प्राणियों को ये सब प्रदान किये हैं. मनुष्य का मन जितना-जितना शुद्ध होता जायेगा, भीतर ये सभी स्वतः प्रकट होने लगेंगे. ज्ञान वही है जो हर काल में सत्य है, विज्ञान की मान्यताएं बदल जाती हैं पर जीवन के मूलभूत मूल्य अनंत काल से वही हैं.

जून को डिनर का आमन्त्रण था पर वह घर पर ही भोजन कर चुके हैं और जाना नहीं चाहते हैं. जीवन कितना विरोधाभासी है, पहले युवाकाल में पार्टी में निमंत्रण के लिए चाहत थी, तब मिलते नहीं थे. अब देर रात तक जगना व्यर्थ लगता है. टीवी पर ‘सिया के राम’ आ रहा है. हजार बार सुनी देखी यह कथा आज भी कितने हृदयों को लुभाती है, संत इसे लीला कहते हैं. राम और रावण जिसकी दृष्टि में एक लीला के दो पात्र से अधिक कुछ नहीं, उसने शाश्वत को जान लिया है. कल क्लब की मीटिंग है, बंद के कारण आज प्रतियोगता में आने वाले निर्णायकों के लिए गुलदस्ते नहीं मिले. एक महिला का विदाई समारोह भी है, उसके लिए गुलदस्ता वह स्वयं बनाकर ले जाएगी. माली ने गुलदाउदी की कटिंग्स लगाने के लिए रेत तैयार कर दी है.

जुलाई का प्रथम दिन ! मौसम आजकल सुहावना चल रहा है, लगभग रोज ही वर्षा होती है और शीतल पवन बहती है. कल शाम उड़िया सखी को विदाई भोज के लिए घर पर बुलाया था. आज मंझली भाभी का जन्मदिन है, सासु माँ जब थीं, उनका भी जन्मदिन इसी दिन मनाते थे वे, उनसे पूछा तो उन्हें अपने जन्म की तारीख का पता नहीं था, पसंद का महीना पूछा तो बरसात का महीना बताया, इसीलिए वे कई वर्षों तक पहली जुलाई को ही उनका जन्मदिन मनाते रहे. बाद में पिता जी भी साथ रहने लगे तो दोनों का. भाभी से पता चला, बड़े भाई का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. आज टेस्ट कराए हैं, वह कल पूछेगी, तब तक रिपोर्ट मिल जाएगी. जून के पैरों में भी गर्मी से जलन हो रही थी, और पीठ में दर्द भी था. उन्होंने ने भी रक्त जांच करवाई, सभी परिणाम सामान्य हैं. सुबह ओस की बूंदों पर नंगे पावों टहलना उनके लिए औषधि रूप है. कल से वे ऐसा ही करने वाले हैं. मोदीजी ने ओलम्पिक में जाने वाले खिलाडियों से बात की, उन्हें शुभकामनायें देकर विदा किया तथा मंत्रीमंडल में नये मंत्रियों को शपथ दिलाई. देश को विकास के पथ अपर ले जाने के लिए वह अपनी पूरी शक्ति लगा रहे हैं. देशवासी भी यदि उसी उत्साह से काम करें तो कितना अच्छा हो.

Thursday, March 29, 2018

रोइंग में पार्टी



मायोदिया में मंजिल पर पहुंच कर बर्फ दिखी जो सड़क के दोनों किनारों पर जमी थी, पहाड़ों की ढलान पर भी बर्फ थी और वातावरण में ठंड बढ़ गयी थी. उन्होंने स्वेटर, दस्ताने, टोपी सभी कुछ पहन लिए और फोटोग्राफी करते हुए बर्फ का आनन्द लिया. वापसी की यात्रा अपेक्षाकृत सरल थी. दोपहर डेढ़ बजे वे वापस लौट आये. दोपहर का भोजन कर वे पास के बाजार गये. छोटा सा ही बाजार है, जहाँ आवश्यकता का सब सामान मिलता है. बाहर नव वर्ष की पार्टी की तैयारी हो चुकी है. सुबह ही टेंट लगाने वाले आ गये थे, एक तरफ शामियाने में बुफे का इंतजाम है. दूसरी तरफ गोल श्वेत टेंट के नीचे कुर्सियां लगी थीं. दोपहर से ही भोजन बनाने का कार्य भी आरम्भ हो गया है.

संध्या के बाद श्री पुलू ने उन्हें बुलाया, उनका परिवार भी आ चुका था. दो कमरों के मध्य के हॉल में आग जलाने का प्रबंध है. एक टीन की शीट पर मिट्टी का लेप था उस पर एक लोहे का चूल्हा था जिसमें लकड़ियाँ जलाकर आग सुलगाई जाती है. चारों तरफ चटाइयाँ तथा कार्पेट बिछे थे. उन्होंने ग्रीन टी के साथ गाजर का हलवा पेश किया, बाहर भी कुछ मेहमान आ चुके थे. सुबह से आकाश पर छाये बादल अब छंट गये थे और तारे चमक रहे थे. जैसे प्रकृति भी मेहरबान हो गयी थी, क्योंकि वर्षा होने का अर्थ था सभी को भीतर जाना पड़ता. श्रीमती पुलू डिस्ट्रिक ऑफिस में एकाउंटेंट हैं. वह तेजू में रहती हैं. दोनों बच्चों को पिता ही सम्भालते हैं. श्री पुलू ने कहा, वे हाउस-हसबैंड हैं. उनके कैम्प में देश-विदेश से कई शोध विद्यार्थी आते हैं. अरुणाचल के जंगलों में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का अध्ययन करते हैं तथा यहाँ के जंगली प्राणियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र करते हैं. वे स्वयं उनके साथ जंगलों में मीलों पैदल चलकर कैमरे तथा अन्य उपकरण आदि लगाने में मदद करते हैं. पक्षी प्रेमी भी वहाँ आकर ठहरते हैं. प्रदेश के इतिहास के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि अरुणाचल वासी शताब्दियों पूर्व चीन से म्यांमार  होते हुए यहाँ आये थे. वे कबीले बनाकर रहते थे. उन्होंने यह भी बताया कि खुदाई करने पर इस इलाके से जो स्तम्भ प्राप्त हुए हैं उन पर लिखी भाषा को पढ़ा नहीं जा सका है यहाँ विवाह संबंध मध्यस्थों के द्वारा तय होते हैं. लड़के वाले लड़की का हाथ मांगने जाते हैं तथा दहेज भी उन्हें ही देना पड़ता है. देखा जाता है कि पिछली दस पुश्तों में दोनों परिवारों में कोई रक्त संबंध तो नहीं था. रोइंग में कोई कालेज नहीं है, पढ़ने के लिए तेजू जाना पड़ता है, पर वहाँ भी केवल कला विषय पढाये जाते हैं. रोचक चर्चा चल रही थी कि भोजन का समय हो गया. पहले उन्होंने वह केक काटा, जो एगलेस केक मांगने पर हलवाई ने उन्हें थमा दिया था पर वह केक के स्थान पर मिठाई निकली, खोये की मिठाई जिसे केक की तरह सजाया गया था.. हमने नये वर्ष का स्वागत करते हुए वह बर्फी केक खाया. भोजन में केले के फूल व आलू की स्वादिष्ट सब्जी थी, लाई का सूखा साग बना था. रोटी सफेद व कोमल थी. बाहर की पार्टी का शोर बढ़ता जा रहा था. अग्नि के पास बैठकर सबने रात्रि भोजन किया, जो मेजबान द्वारा अति प्रेम से परोसा गया था.

कुछ देर बाद वे नये वर्ष की पार्टी में शामिल होने गये. सभी आनन्दमग्न थे, पुराने हिंदी फ़िल्मी गीत बज रह थे, पता चला कि मिथि साहब मुहम्मद रफी के फैन हैं तथा स्वयं भी गाते हैं. महिलाएं डाइनिंग रूम में थीं, नूना वहाँ पहुंची तो आकर्षक परिधानों में सजी स्त्रियाँ समूह में बैठी थीं, श्रीमती मिथि से पहले मिल चुकी थी सो उन्होंने सबसे परिचय कराया, लगभग सभी के पति सरकारी नौकरियों में थे. एक सुंदर गौरवर्णी महिला कहने लगीं उनके समाज में अधेड़ उम्र की महिलाएं उत्सवों में चावल की बनी मदिरा का पान करती हैं. वे इसके फायदे भी गिनाने लगीं. जब उसने कहा बिना पिए ही ये सब प्राप्त हो सकता है तो उन्होंने स्वीकार किया और वहीँ बैठी दो महिलाओं को दिखाकर कहा, ये दोनों बिलकुल नहीं पीतीं. आधा घंटा वहाँ बिताकर वे कमरे में आ गये.     

आज नये वर्ष का पहला  दिन है, सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुली. रात को पार्टी सम्भवतः साढ़े दस-ग्यारह बजे तक चली होगी. ठंड काफी थी और और छोटे बच्चे वाले परिवार बहुत थे, सो लोग जल्दी चले गये होंगे. सुबह नहा-धोकर आठ बजे नाश्ता करके वे रोइंग से विदा लेकर रवाना हुए और मार्ग में चार नदियों को पार कर तिनसुकिया में खरीदारी करते हुए वापस एक बजे घर पहुंच गये. मौसम अच्छा है. धूप खिली है. नये वर्ष की पहली शाम का स्वागत करने के लिए वे तैयार हैं.

Tuesday, March 27, 2018

चोखम का बौद्ध मंदिर



यह वर्ष समाप्त होने में मात्र चार दिन रह गये हैं, जिनमें से दो वे अरुणाचल प्रदेश में बिताने वाले हैं. आज सुबह दो महिलाएं आई थीं योग कक्षा में. सोलह मिनट सूर्य नमस्कार किया, बीस मिनट का सूर्य ध्यान किया तथा शेष समय प्राणायाम तथा थोड़ा व्यायाम. सुबह का एक घंटे का अभ्यास दिन भर कैसा तरोताजा रखता है. दोपहर को बच्चे आये, कुछ नये भी थे. उन्होंने सुंदर चित्र बनाये. मंझले भाई-भाभी के विवाह की वर्षगांठ है आज. छोटी बहन ने व्हाट्सएप पर अच्छा सा गीत गाकर उन्हें शुभकामनायें दी हैं. अभी-अभी मोदी जी की ‘मन की बात’ सुनी, वह बहुत अच्छा बोलते हैं, उनका विरोध करने के लिए कांग्रेस को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

मात्र तीन दिन ही शेष हैं इस वर्ष को बीतने में. जीवन भी इसी तरह एक दिन चुक जायेगा. जब तक वे जीवित हैं, जीवित रहने का कुछ तो सबूत दें अपने कृत्यों द्वारा, अपने व्यवहार द्वारा किसी के जीवन में कोई परिवर्तन ला सकते हैं तो लायें, अपने शब्दों से किन्हीं हृदयों के सुप्त पड़े भावों को जगा सकें तो उनकी कलम सार्थक होगी. वे अपने विचारों को इतना शुद्ध बनाएं कि उनकी गरिमा उनके व्यक्तित्त्व से झलके. कल प्रधान मंत्री का भाषण सुनकर बहुत अच्छा लगा. आज रूस में दिया उनका एक भाषण सुना, एक पॉप सिंगर द्वारा गए वैदिक मन्त्रों को सुना. सचमुच विश्व पुनः दैवी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधर रहे हैं. जैविक खेती के प्रयोग बढ़ रहे हैं. गली-मोहल्ले सफाई की तरफ ध्यान दे रहे हैं. विकलांगों के प्रति सोच बदली है, विश्व शरणार्थियों को बाहें फैलाये स्वागत करने को तैयार है. भारत में संस्कृत भाषा का प्रचार हो रहा है. देश में आशा की लहर जगी है.


अरुणाचल प्रदेश के रोइंग जिले का ‘मिशिमी हिल कैम्प’ दो दिनों के लिए उनका घर बन गया है. जिसे श्री पुलू चलाते हैं. इस प्रदेश की यह उनकी पहली यात्रा नहीं है, पिछले कई वर्षों के दौरान खोंसा, मियाओ, बोमडिला, तवांग, देवांग, परशुराम कुंड, आदि स्थानों को देखने के बाद इस वर्ष के दो अंतिम दिन बिताने वे रोइंग आए हैं. उत्तर-पूर्व भारत का सबसे बड़ा राज्य अरुणाचल जिसकी सीमाएं देश में असम तथा नागालैंड से मिलती हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन, भूटान और बर्मा से, प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है. कल सुबह साढ़े सात बजे वे घर से रवाना हुए और असम की सीमा पार कर चोखम नामक स्थान में स्थित बौद्ध मन्दिर ‘पगोडा’ में कुछ देर रुक व नाश्ता करके पांच घंटों की रोमांचक यात्रा के बाद यहाँ पहुंच गये. आलूकबाड़ी में लोहित नदी को वाहन सहित फेरी से पार किया, एक साथ चार-पांच वाहन तथा बीस-पच्चीस व्यक्तियों को लेकर जब नाव नदी पार कर रही थी तो दृश्य देखने योग्य था. नदी पर पुल निर्माण का कार्य जोरों से चल रहा है, पर आगे भी दो-तीन जगह छोटी-उथली नदियों को उनमें से गुजर कर पार करना पड़ा, जिन पर पुल बनने में अभी काफी समय लगेगा. छोटे-बड़े श्वेत पत्थरों से ढके विशाल नदी तट देखकर प्रकृति की महिमा के आगे अवनत हो जाने अथवा विस्मय से भर जाने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता.


Monday, March 19, 2018

लहरों बिन सागर


दो दिनों का अन्तराल ! शाम के चार बजने वाले हैं. जून अभी नहीं आये हैं. दोपहर को उनसे किसी विषय पर मतभेद हो गया, यह आवश्यक तो नहीं कि जो भाव किसी भी विषय को लेकर उसके मन में हों, वे उनके मन में भी हों. वैसे भी दोपहर को वे भोजन के लिए आते हैं, कुछ ही समय उसके बाद आराम के लिए मिलता है, जिसे शांति से व्यतीत करना चाहिए. आज सुबह समय पर उठे, तारों की छाँव में प्रातः भ्रमण को गये, लौटकर प्राणायाम किया. बंगलूरू से आई मोटी पीली सूजी का मीठा नाश्ता बनाया. व्हाट्सएप पर संदेशों का आदान-प्रदान किया. विश्व विकलांग दिवस के कार्यक्रम के लिए मृणाल ज्योति के बच्चे क्लब में रिहर्सल कर रहे हैं, जिसे देखने गयी. कल भी रिहर्सल होगी, परसों तो कार्यक्रम ही है, दिन भर व्यस्तता बनी रहेगी. बड़े भाई का जन्मदिन है आज, उन्हें शुभकामनायें दीं. कल उनके लिए एक कविता लिखी थी, शायद पढ़ ली होगी अब तक. मंझले भाई की बिटिया को दिल्ली में जॉब मिल गयी है, वह खुश है, इसलिए फेसबुक पर उसकी एक पोस्ट को सराहा भी. वे सुख बाँटना चाहते हैं और दुःख में सिकुड़ जाते हैं. छोटी बुआ के साथ भी उसके संबंध पहले से मधुर हो ही जाने वाले हैं, प्रेम कभी मरता नहीं ! आज नूना के फोन का कवर भी आ गया है, अब सुरक्षित हो गया है फोन.

आज सुबह नींद खुली तो एक स्वप्न देख रही थी, पता चला कि खुद ही बना रही थी. स्वप्न यदि वे स्वयं गढ़ें तो वे उनके लिए सुखद ही होंगे, दुःस्वप्न तो नहीं होंगे, वैसे दुःस्वप्न भी वे ही बनाते हैं पर जब असजग होते हैं तब ! प्रातः भ्रमण के समय जून ने कहा, कल रात देहली से आये एक फोन ने उनकी नींद ही बिगाड़ दी, इस बात पर तो उसने उन्हें स्वयं को जानने के लिए एक पूरा वक्तव्य ही दे डाला. ध्यान के लिए उन्हें उकसाया, पता नहीं इसका उन पर कितना असर हुआ, पर उसके सामने बहुत कुछ स्पष्ट होता गया. स्नान के बाद जैसे भीतर से कोई पढ़ाने लगा. प्रकृति, पुरुष, परमात्मा, आत्मा, मन, बुद्धि, संस्कार के आपसी संबंध ! वे जो वास्तव में हैं, उसको जानने के बाद जीवन एक खेल बन जाता है, एक आनंदपूर्ण अवस्था..कल रात को सोने से पूर्व अष्टावक्र गीता का एक श्लोक सुना, अद्भुत है यह ज्ञान..वास्तव में उन्होंने न कभी कुछ किया है न करेंगे, वे साक्षी मात्र हैं. सागर की सतह पर उठती-गिरती लहरें ही तो सागर नहीं हैं, अम्बर पर उड़ते मेघ जैसे आकाश नहीं है, वह विशाल है, अनंत है, अचल है, सदा है, फिर चिंता व दुःख किस बात का ? अभी कुछ देर में ड्राइवर आने वाला होगा, आज भी क्लब जाना है, कल की तैयारी आज भी वहाँ चल रही होगी.  

उस दिन सुबह, दोपहर, शाम सभी मृणाल ज्योति के नाम थी. अगले दिन एक शादी में जाना था. तीसरे दिन दोपहर को आल्मारी सहेजी और शाम को महिला क्लब की मीटिंग थी. कल तो इतवार था ही, शाम को सामाजिक शिष्टाचार निभाने वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, दोपहर को बच्चों की संडे क्लास. चार दिन पलक झपकते गुजर गये. आज जून को तीन दिनों के लिए देहली जाना है. उसे साधना के लिए अधिक समय मिलेगा. आजकल प्रतिपल आत्म स्मरण बना रहता है. आज सुबह स्वप्न था या ध्यान या तंद्रा, किसी ने कहा, तुम परमात्मा से प्रेम करती हो, यह सही नहीं है. तुम विशेष स्वाद से प्रेम करती हो. विशेष भोजन के प्रति उसकी यह आसक्ति शायद ठीक नहीं है. आसक्ति किसी भी वस्तु के प्रति ठीक नहीं है, पर यह निषेध की भावना, यह द्वंद्व उसका स्वयं का ही बनाया हुआ है. भोजन तो भोजन है, शायद यह उसका अज्ञान है जो भोजन के प्रति इतनी सावधानी रखना वह नहीं चाहती. साधक को तो सभी प्रकार की कामनाओं से ऊपर उठना ही होगा, यदि वह आगे बढ़ना चाहता है. अभी तक की उसकी साधना जहाँ तक ले आई है, वही तो लक्ष्य नहीं है. अभी तो मंजिलें और भी हैं ! दूर है वह परमात्मा का शांति धाम..हल्के होकर वहाँ जाना है, अभी भी आवाज ऊंची हो जाती है. अभी भी ‘न’ सुनने पर भीतर कुछ कम्पन होता है एक क्षण के लिए ही सही, अभी अखंड आनंद का वरदान फलित नहीं हुआ है. अनंत है आकाश और अनंत है उनकी सम्भावनाएं !  

Sunday, September 3, 2017

देवदत्त पटनायक की 'सीता'


शाम का समय है. कुछ देर पहले ही वे सांध्य भ्रमण करके आये हैं, कुछ देर टेबल टेनिस भी खेला. जून अपना कुछ कार्य कर रहे हैं. एक ही दिन में वे आईआईएम कोलकाता से काफी परिचित हो गये हैं. प्रातः भ्रमण के समय फूलों से सजे उद्यान देखे. जून नौ बजे कक्षा में चले गये. साढ़े ग्यारह बजे चाय का अवकाश था, उसे भी फोन करके बुला लिया. इसी तरह दोपहर का भोजन और शाम की चाय भी सबके साथ ही ली. उससे पहले वह को ओपरेटिव स्टोर गयी थी, छोटे-मोटे कुछ सामान खरीदे. वापसी में पुस्तकालय के सामने के उद्यान की तस्वीरें लीं. पता चला एक पुरानी परिचित महिला भी यहाँ अपने पति के साथ आई हैं, उनसे मिली. उन्हें अपने कमरे में बुलाया और बातों-बातों में ध्यान के महत्व पर चर्चा की. नन्हे का फोन आया. व्हाट्सएप पर संदेशों का आदान-प्रदान किया. देवदत्त पटनायक की अद्भुत पुस्तक ‘सीता’ पढ़ी. परमात्मा कहते हैं जो जिस भाव से उन्हें याद करता है वह उसी भाव में उसे प्रत्युत्तर देते हैं, क्योंकि मन या चेतना उसी का अंश ही तो है. पटनायक जी कहते हैं, देह या जगत उसी की शक्ति है जिसका उपयोग परहित में करना है. प्रकृति पर न तो नियन्त्रण करना है न ही एकाधिकार जमाना है बल्कि जो अन्य आत्माओं के लिए सुखद हो सके इस तरह की संस्कृति का विकास करना है. प्रकृति से संस्कृति की ओर जाना है न की विकृति की ओर.

इस समय रात्रि के आठ बजे हैं. आज का दिन कल से काफी अलग था. सुबह देर से आरम्भ हुई. सीता आगे पढ़ी. दोपहर को उन परिचिता को कैम्पस घुमाया., बाद में उन्हीं के साथ साउथ सिटी मॉल जाना भी हुआ. अभी-अभी छोटे भाई का फोन आया, विपासना कोर्स के लिए उसने बधाई दी. कल दोपहर के भोजन के बाद गंगा धाम जाना है. वहाँ यह डायरी भी साथ नहीं जाएगी. बाद में सभी कुछ स्मृति के आधार पर ही लिखा जायेगा.

Tuesday, July 11, 2017

हरियाली का गीत


वर्षा आज भी लगतार हो रही है. पिछले तीन दिनों से वर्षा के कारण प्रातः या सांय भ्रमण नहीं हुआ, आज वर्षा थमने पर जाना ही होगा.  पेड़-पौधे और घास गहरी तृप्ति का अनुभव कर रहे हैं. हरियाली एकाएक बढ़ गयी है. आकाश बादलों से घिरा है. वायुदेव मंदगति से पेड़ों को झुला रहे हैं. बूंदों की टिपटिप और पंछियों के स्वर दोपहर को संगीतमय कर रहे हैं. अभी कुछ देर पूर्व ही उसने चाय पी और आकाश को निहारते हुए कुछ प्रकाश बिन्दुओं को हवा में तैरते देखा. सम्भवतः ये जीवात्माएं हैं जो उनके चारों ओर एक और आयाम में रहती हैं. कभी-कभी प्रकृति अपने रहस्य खोल देती है. एक धुआं सा कभी-कभी धरा से उठता दिखाई देता है, कभी गगन से बरसता हुआ..परमात्मा अपनी उपस्थिति से उन्हें भर देना चाहता है. उसका अंतर उसके लिए खाली है, वहाँ और कोई नहीं है, वही है, वैसे भी वहाँ क्या था, सिवाय अहंकार से उपजी पीड़ा के. वे व्यर्थ ही स्वयं को ढोए चले जाते हैं. शायद नहीं निश्चय हो गया है अब, मन जिसे वे कहते हैं केवल उनकी मूर्खता का दूसरा नाम है, अज्ञानवश वे देख ही नहीं पाते. सतोगुण को तमस व रजस ढक लेता है और उनकी दृष्टि ही दूषित हो जाती है. अपना भला-बुरा भी सोचने की क्षमता नहीं रहती. प्रारब्धवश जो भी सुख-दुःख मिलते हैं, उनमें उनका क्या योगदान है, अहंकार करने जैसा तो यहाँ कुछ भी नहीं है. 

दोपहर को उस छात्र को फोन किया जो बैठे-बैठे सो जाता था, वे लोग तीन दिन बाद जा रहे हैं, उसके पिताजी रिटायर हो गये हैं. कल सामान चला जायेगा. उसके लिए कविता लिखी, जून प्रिंट करके लाये, वह कोओपरेटिव गयी, एक मग और एक चाकलेट ली, उसकी माँ बहुत खुश हुईं, वर्षों पहले उन्होंने उसे संगीत सिखाया था. आज भी लगातार वर्षा हो रही है. शाम को किशोरियों के लिए महिला क्लब का एक कार्यक्रम था, उनकी शारीरिक व अन्य समस्याओं के बारे में कुछ जानकारी दी गयी. लेडीज क्लब ने अच्छी पहल की है. यहाँ की लडकियों को एक मंच दिया है जहाँ वे अपनी समस्यायें कह सकती हैं. कल ही खबर सुनी थी कि एक लड़की ने आत्महत्या कर ली. महिलाओं के प्रति अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं. डिब्रूगढ़ में एक लेडी डाक्टर की हत्या वार्डबॉय ने कर दी. टीवी पर मोदी जी का इंटरव्यू आ रहा है. नन्हा कल अपने एक मित्र की शादी में जा रहा है. एक दिन उसकी शादी में भी सभी मित्र आयेंगे.

पांच दिनों का अन्तराल. आज चुनाव के परिमाण आ गये हैं. बीजेपी ने ऐतिहासिक विजय हासिल की है. टीवी पर सुबह से एक ही चर्चा है. मौसम अब अपेक्षाकृत गर्म है. पिछले दिनों छोटी ननद, बहन के पास गयी, फोन किया तो पता चला मंझली भांजी घर आ गयी है ससुराल छोड़कर. वे सभी बहुत परेशान हैं. उन्होंने छोटी व मंझली दोनों भांजियों को यहाँ आने को कहा है. एक महीना वे उनके साथ रहेंगी. परसों नन्हा भी आ रहा है. अगला एक महीना व्यस्त रहने वाला है. जीवन में कुछ परिवर्तन हो तो अच्छा लगता है.

आज दोनों बहनें आ गयी हैं, वह उन्हें लेने एयरपोर्ट गयी थी, दोनों खुश लग रही हैं. नन्हा भी आ गया है, उसने ‘श्रद्धा सुमन’ ब्लॉग में लेबल ठीक करने में उसकी सहायता की.  उसके एक मित्र के विवाह में उन्हें जोरहाट जाना था, वापस आकर भी दो-तीन दिन हो गये हैं.

इस समय वर्षा हो रही है, वह बाहर के बरामदे में बैठी है. दोनों लड़कियाँ अपने कमरे में हैं. बड़ी किताब पढ़ रही है, छोटी फोन पर व्यस्त है, मौसम की कारगुजारी देखने का उनके पास वक्त नहीं है. बड़ी की समस्या सुलझती नजर नहीं आ रही है. वह अपने आप को जरा भी बदलना नहीं चाहती पर वह नहीं जानती ऐसा करके वह अपना ही नुकसान कर रही है. वे सभी किस तरह माया के पाश में जकड़े हुए हैं. उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर से बात की शायद वह कुछ सुझाव दें, अगले हफ्ते वह आएँगी. गुरूजी के ज्ञान से बड़ी के जीवन में कुछ परिवर्तन तो आएगा ही. नन्हा वापस चला गया है.

आज उसका जन्मदिन है, सुबह से ही बधाई संदेश आ रहे हैं. सुबह वे मृणाल ज्योति गये, भाजिंयों ने बच्चों को नृत्य के कुछ स्टेप्स सिखाये, उन्हें अच्छा लगा. सभी को मिठाई व नमकीन वितरित किया. अभी कुछ देर में शाम के मेहमान आयेंगे, उसने जून का लाया फूलों वाला टॉप और लंबा स्कर्ट पहना है. मौसम आज अच्छा है.  

Wednesday, June 14, 2017

जूट का झूला


कल रात्रि विश्वकर्मा पूजा के लिए एक कविता लिखी थी. जून नहीं हैं वरना आज वे उनके विभाग में होने वाली पूजा में सम्मिलित होते. रात को शुरू हुई वर्षा सुबह तक हो रही थी. परसों बड़ी भांजी से स्काइप पर बात हुई, आज छोटी बहन से हुई. उस दिन जब भांजी से उसके यहाँ जाने की बात की, वह ऐसे बात कर रही थी जैसे उसे कुछ समझ ही न आ रहा हो, उस दिन कुछ अजीब तो लगा था पर सोचा था शायद वह उसकी बात समझ न पायी हो अथवा तो उसे सुनाई ही न दी हो, पर आज छोटी बहन ने कहा, किसी कारण वश वे बच्चे को किसी से मिला नहीं रहे हैं. घर जाकर बच्चे को देखने की उत्सुकता दिखाना ठीक नहीं होगा, फोन पर ही बधाई देना ठीक रहेगा. कल शाम यात्रा की कुछ तैयारी भी कर ली है.

पूरा अक्तूबर और आधा नवम्बर भी बीत गया, आज जाकर कलम उठायी है. इसी बीच दो यात्रायें  भी कीं, पर लिखा कुछ नहीं. कल लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे कार्य सम्मुख आ गये और अब जून का इंतजार करते हुए, मलेशिया से लाये जूट के झूले पर बैठकर, जिसे उन्होंने बगीचे में लगा दिया है; पंछियों की आवाज सुनते हुए और शीतल पवन का स्पर्श अनुभूत करते हुए, जब धूप भी छनकर आ रही है और सामने हरियाली की एक चादर बिछी है, वह लिख रही है. इससे बढ़कर स्वर्ग में कौन सा सुख होता होगा जब मन में ‘उसकी’ याद बसी हो और कण-कण में वह स्वयं प्रकट होने को उत्सुक हो. जब प्रकृति का नृत्य अनवरत चलता हो. धूप-छांव का यह जो खेल सृष्टि नटी न जाने कब से खेल  रही है, उसका द्रष्टा होना कितना अनोखा अनुभव है ! नीला आकाश बिलकुल स्वच्छ है, बादल का हल्का सा टुकड़ा भी नहीं है वहाँ, बगीचा भी स्वच्छ है, अभी फूल खिलने में देर है. गमलों पर गेरुआ लगाना है, जून को याद दिलाना होगा, मंगवा लें. दोपहर को उसे दो अन्य सदस्याओं के साथ प्रेस जाना है, क्लब की पत्रिका के कम के लिए. पीछे कुछ मजदूर काम कर रहे हैं, पर वे इतना चुपचाप  हैं, पहले उसे अहसास ही नहीं हुआ उनके होने का. नन्हे का फोन आया, सुबह वह जल्दी-जल्दी उठकर केवल एक सेव खाकर ही दफ्तर जा रहा था, उसका दिन व्यस्त रहने वाला है आज, ऐसा कहकर वह दो दिन से फोन न कर पाने की बात कह रहा था.   

  फिर एक हफ्ता गुजर गया और कुछ नहीं लिखा. कुछ लिखने का मन नहीं होता, मन एक कोरा कागज बन गया है. भीतर भाव उठते हैं, कभी तो इतने अछूते होते हैं, इतने सूक्ष्म कि उन्हें शब्दों में बाँधना ऐसा है जैसे इन्द्रधनुष को रस्सी से नीचे उतारना, कितना स्थूल है शब्दों का संसार और कितना सूक्ष्म है परम का अनुभव..इसलिए आज तक इतना कुछ कहे जाने के बाद भी परमात्मा उतना ही अनछुआ है जैसा वैदिक काल में था.


Wednesday, May 10, 2017

जीवन की शाम


आँगन में आम के पेड़ से पंछियों की आवाजें निरंतर आ रही हैं. हवा दरवाजे को धकेल कर बंद कर रही है. प्रकृति निरंतर क्रियाशील है. कल शाम से उसे देह में एक हल्कापन महसूस हो रहा है, जैसे भार ही न हो और चलते समय एक तिरछापन सा लगता है, शायद यह वहम् ही हो. मन हल्का हो तो तन भी हल्का हो जाता है. पिताजी आज अपेक्षाकृत ठीक हैं. आज होली पर पहली कविता ब्लॉग पर पोस्ट की. हर कोई अपनी अहमियत किसी न किसी तरह जताना चाहता है, हर कोई उसी परमात्मा का अंश जो है, हर कोई पूर्ण स्वतन्त्रता चाहता है, परमात्मा का भक्त भी पूर्ण स्वतंत्र है. परमात्मा उनके कितने करीब है, उनसे भी ज्यादा करीब..श्वासों की श्वास में वह है..सुक्षमातिसूक्ष्म.. जून आज देर से आयें शायद, उनके पूर्व अधिकारी आये हैं, शाम को उन्हें भोजन पर भी बुलाया है. पिताजी बाहर बरामदे में बैठे हैं, जून की प्रतीक्षा करते हुए, चटनी के लिए धनिया व पुदीना तोड़ लाये हैं बगीचे से.

कल शाम का आयोजन अच्छा रहा. अतिथि अकेले ही आये, भोजन बच गया. आज सुबह वास्तविक अलार्म बजने से पहले ही मन में अलार्म की घंटी की आवाज सुनाई दी, जगाने के लिए अस्तित्त्व कितने उपाय करता है, कभी ऐसे स्वप्न भेजता है कि उठे बिना कोई रह ही नहीं सकता. कल शाम जून और पिताजी को योग वशिष्ठ पढ़कर पढ़कर सुनाया तो वे प्रसन्न हुये आत्मा के बारे में जानकर. अभी-अभी दो सखियों को होली के लिए निमंत्रित किया. गुझिया के लिए तिनसुकिया से खोया भी लाना है. शनिवार को जून ने एक कुर्ती का ऑर्डर किया था नेट से, आज पहुंच गयी, बहुत सुंदर एप्लिक का काम है उस पर. मौसम बहुत अच्छा है आज, हल्के बादल हैं और ठंडी सी हवा भी बह रही है. शायद कुछ दूर वर्षा हुई है. परमात्मा नये-नये रूपों में प्रकट हो रहा है. डायरी के पन्नों पर चमकते हुए प्रकाश कणों के रूप में, फिर श्वेत धुएं सा कोई बादल तैरता हुआ सा दीखता है, हाथ के चारों ओर नीले रंग की आभा के रूप में, सब कुछ कितना सुंदर लग रहा है, हवा, धरा, गगन और परमात्मा.. कल रात स्वप्न में ठोस वस्तु को देखते-देखते आकर बदलते देखा, स्वप्न कितने विचित्र अनुभव कराते हैं.  

कल शाम जून ने कहा शुक्रवार को वे कुछ सहकर्मियों को खाने पर बुलाना चाहते हैं, जबकि उसे होली पर या उसके बाद ही ऐसा करने का मन था, सो अपने मन की बात कही, कारण क्या था वह उसे स्वयं भी पता नहीं था, पर भीतर से यही आवाज आ रही थी कि शुक्रवार को ठीक नहीं रहेगा. आज सुबह जब जून को फोन आया कि उस दिन उन्हें बाहर जाना है तो बात स्पष्ट हो गयी, कोई अंतः प्रेरणा थी शायद. पिताजी की गर्दन में दर्द है, गर्म पानी की बोतल से सेंक करते-करते सो गये हैं, भोजन के लिए आवाज देने पर उठे नहीं. जून उनके लिए दर्द कम करने की दवा ले आये हैं. आजकल वे बैठे-बैठे भी सो जाते हैं, धीरे-धीरे चलते हैं और ज्यादा वक्त लेटे रहते हैं, शांत हो गये हैं. जीवन धीरे-धीरे सिमट रहा है, उन्हें देखकर ऐसा ही लगता है. टीवी देखना कम कर दिया है. दोपहर को जून के एक मित्र आये थे खाने पर, सदा की तरह देर से आये, जल्दी-जल्दी खाकर चले गये. इन्सान का स्वभाव बदलता कहाँ है, जैसे उसका मन..जो हल्की सी कसक, एक हल्का सा स्पंदन बना ही लेता है, लेकिन सद्गुरू कहते हैं पता तब ही चलता है जब कोई उसके पार हो जाता है. सूक्ष्म स्पंदन भी जब नहीं रहते, तब वह अचल, स्थिर सत्ता स्वयं को प्रकट करती है, वह स्वयं ही स्वयं को देख सकती है. आज ठंड काफी है, जून के आने के बाद वे भ्रमण के लिए जायेंगे. 

Thursday, April 6, 2017

नवम्बर की धूप


पिछली तीन रात्रियों को ठीक एक बजकर सैंतालीस मिनट पर कोई उसे उठा देता है. उसके बाद भीतर से कोई कहता है जीवन अब बदल जायेगा. पूर्ववत् नहीं रहेगा. एक ख़ुशबू की परत, चारों ओर लिपटी रहती है. उनके भीतर कितने खजाने हैं, रंगों, खुशबुओं और संगीत के खज़ाने ! उसका मन एक अनोखी शांति से भर गया है, मन उसका नहीं रहा इसलिए कोई अदृश्य सत्ता ही अब सूत्रधार है. परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, वह मृणाल ज्योति की डोनेशन बुक लेकर जाएगी.

कल रात एक स्वप्न देखा, एक कार में वह बैठी है और उसे कुछ ही दूर जाना है पर उस कार में न स्टीरियंग है न ब्रेक. वह निर्धारित स्थान से आगे चली जाती है, सड़क आ गयी है जिस पर सामने से तेज गति से आते वाहन हैं. उसे डर लगता है पर गाड़ी बिना टकराए मुड़ कर किनारे से निकल जाती है.

कल रात कोई स्वप्न नहीं देखा, देखा भी हो तो स्मरण नहीं है. सुबह ठीक चार बजे किसी ने उठा दिया. वह कोई जो उसके भीतर रहता है, वह उसे एक पल को भी नहीं भूलता, वही वह है अब, तो स्वयं को कोई कैसे भूल सकता है. हरसिंगार के वृक्ष के नीचे की छाया में उसकी ही अनुभूति है, उसकी ही ख़ुशबू है जो चारों ओर से घेरे हुए है. सूखे पत्तों की आवाज में भी वही है, हवा की सरसराहट में भी वही, सामने हरी घास पर बिखरी धूप में उसकी ही चमक है, फूलों के रंगों में, शीतल हवा के स्पर्श में वही तो है, अब शरद काल आ गया है, आकाश नीला है और वृक्ष कितने हरे, एक सन्नाटा बिखरा है चारों ओर जो उसकी ही खबर दे रहा है. आज स्वास्थ्य पहले से बेहतर है. वह आने वाला है इसलिए ही देह को तपाकर स्वच्छ किया प्रकृति ने, फिर भीतर के सारे विकारों को निकाल बाहर किया. तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. अब कुछ करना शेष नहीं है, घर का मालिक आ गया है, अब जो भी वह कराएगा, वही होगा !

हरसिंगार के पत्तों से छनकर धूप के नन्हे-नन्हे गोले उसकी डायरी पर बन रहे हैं. यानि परमात्मा के हाथों से बनी कला ! उसके फूल अभी तक गिर रहे हैं, जो एकाध डाली पर अटके रह गये थे. हवा आज भी शीतल है और सड़क पर स्थित खम्भे का बल्ब आज भी कर्मचारी लगा रहे हैं, एक बल्ब के लिए पूरी की पूरी टीम आई है. पिताजी का मनोरंजन हो रहा है. उसने बोगेनविलिया के गमले धूप में रखवा दिए हैं. इस वर्ष उनमें अवश्य अच्छे फूल आएंगे. कल सिर्फ एक टिकट शेष रही, वह भी बिक जायेगी. आज की दो पोस्ट उसने सुबह ही लिख दी हैं, जून ने कहा, नौ बजे से दो बजे तक बिजली नहीं रहेगी.


नवम्बर की गुनगुनी धूप तन को सहलाती है. बाल सूर्य की किरणों की आभा में जब तृण की नोकें चमचमाती हैं, वृक्षों की डालियाँ एक अनोखी आभा से भर जाती हैं. फूलों की सुगंध रह-रह कर नासापुटों में भर जाती है. बोगेनविलिया की डालों से टपकती टप-टप ओस की बूंदें अंतर भिगाती हैं, झरते हुए फूलों की कतार सी जमीन पर बिछ जाती हैं. जीवन को उसकी सुन्दरता का अहसास जो कराती है, अम्बर की वह नीलिमा स्वप्नलोक लिए जाती है. खगों की कूजन ज्यों लोरी सुनाती है ! पत्तों की सरसराहट.. ज्यों पवन पायल छनकाती है. गुलाबी रंगत कलिका की.. भीतर मिलन का अहसास जगाती है. हर शै कुदरत की उसकी याद दिलाती है. इतनी सुंदर थी यह दुनिया क्या पहले भी..उससे इश्क के बाद नजर जो आती है. दूब घास की हरी नोक भी यहाँ सुख सरिता बहाती है, सड़क पर जाते हुए हरकारे की आवाज भी भीतर कैसी हूक जगाती है. बगीचे में करते माली की खुरपी की ध्वनि जैसे सृष्टि का संदेश सुनाती है. रचा जा रहा है हर पल इस जहाँ में चुपचाप ओ मालिक, यह बात आज समझ में आती है. 

Thursday, January 26, 2017

सिक्किम का भूकम्प


कल पंखा भी था, टीवी भी था फिर भी गर्मी का जिक्र किया आज न बिजली है, न पंखा है, न टीवी पर बापू की कथा आ रही है, पर भीतर संतोष है. जून आधे घंटे में आ जायेंगे. आज सुबह काफी वर्षा हुई. सिक्किम में भूकम्प के कारण काफी नुकसान हुआ है, जापान में पुनः बाढ़ व तूफान आया है. पाकिस्तान में भी बाढ़ है. मानव ने अपनी मूर्खताओं से ऐसी स्थिति उत्पन्न कर ली है. प्रकृति का तो यह रोज का काम है. रोज ही कहीं न कहीं भूकम्प आते ही रहते हैं. पृथ्वी के होने का यही तरीका है. सागर है तो तूफान आयेंगे ही !

‘वह कौन है’ यह प्रश्न भीतर गूँज रहा था कि किसी ने पूछा, प्रश्न पूछने वाला कौन है..और गहन शांति हो गयी. कोई जवाब नहीं आया. लेकिन मौन में भी मन मुखर था. कुछ दृश्य, कुछ शब्द सुनायी दे रहे थे. आज से उसने यही ध्यान करने का निश्चय किया है. मन का शुद्धिकरण तो साधना से होता है पर विस्तार भी बहुत हो जाता है. जब सारा ब्रह्मांड ही खुद के भीतर भासने लगे तो अहंकार भी उतना ही विशाल होगा. अभी भी यही कामना भीतर बनी रहती है, देह स्वस्थ रहे, मन शांत हो, बुद्धि तीक्ष्ण हो, जगत में यश हो, सारी सुख-सुविधाएँ हों तो इन कामनाओं में और एक संसारी व्यक्ति की कामनाओं में जरा सा भी भेद नहीं है. हाँ, इतना जरूर हुआ है अब भीतर द्वेष नहीं रहा है, कोई विशेष पदार्थ ही मिले ऐसा आग्रह नहीं रहा, पर जब तक भीतर कोई भी कामना है, तब तक परमात्मा से दूरी बनी ही हुई है. भक्त को यह विश्वास होता है कि परमात्मा हर तरह से उसकी मदद करते हैं, जो भी उसकी उन्नति के लिए श्रेष्ठ है वही वह होने देते हैं !

आज सुबह जून को उसने शून्य के बारे में बताया, void के बारे में, कुछ नहीं है....केवल ब्रह्म सत्य है. जगत मिथ्या है, आज ध्यान में यह सूत्र समझ में आया. आज भी समाचारों में सिक्किम में आए भूकम्प की भयानक खबरें सुनीं, अब भी कई लोग लापता हैं, कुछ मलबे के नीचे दबे हैं. प्रकृति कितनी कठोर हो सकती है, यह वे सोचते हैं, लेकिन प्रकृति इतनी विशाल है, अनंत है, उसमें थोड़ा सा विक्षेप एक ग्रह पर आए तो उसके लिए कुछ भी नहीं है. जैसे कोई लखपति हो और उसके गाँव के अनेकों घरों में से एक ढह जाये तो उसे क्या अंतर पड़ेगा. मानव भी प्रकृति का ही अंश है, मानव इस सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर अनुभव कर सकता है, लेकिन प्रकृति के सम्मुख वह भी विवश है.

आज जून मुम्बई जा रहे हैं. दस बजने को हैं, थोड़ी देर में वह भोजन बनाने जाएगी. शाम को एक सखी की बिटिया से मिलने जाना है, उससे पहले घर में सत्संग है. कल सुबह केन्द्रीय विद्यालय जाना है एक प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाने. दोपहर को एक मीटिंग में दुलियाजान क्लब जाना है. शाम को भी मीटिंग है, पर उसमें वह नहीं जाएगी. आजकल माँ को किचन में जलती गैस से भय लगने लगा है, वह कब उठकर गैस बंद कर आती हैं पता ही नहीं चलता. वह कड़ाही में सब्जी रखकर आयी, और कुछ देर बाद जाकर देखा तो गैस बंद है. उसे पल भर के लिए क्रोध आया, पर फिर समझाया मन को, वह हर हाल में बड़ी हैं, उनके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करना चाहिये. पिताजी उन्हें प्रेम से धमका सकते हैं, उनकी बात और है. नैनी की बेटी को खसरा हुआ था, पर अब उसका चेहरा लाल दानों से भर गया है, अस्पताल जाकर इलाज कराने के नाम से ये लोग घबराते हैं. नन्हा गोवा से लौट आया है, उसने वहाँ water sports तथा paragliding की. जीवन कितना अमूल्य है, एक-एक श्वास यहाँ अनमोल है, यह विचार उसके मन में कौंध गया जैसे ही नन्हे ने वह बताया.

आज उसने दीवाली के लिए सफाई का श्रीगणेश किया है. आज महालय है, आश्विन कृष्ण पक्ष का अंतिम दिन. कल से नवरात्रि का आरम्भ हो रहा है. सिक्किम में लोग आपदा से जूझ रहे हैं, वहीँ गुजरात में लोग नृत्य में झूम रहे हैं. अजब है यह गोरखधन्धा, स्वप्न में जी रहे हैं जैसे सभी लोग. ऊपर से तुर्रा यह कि यह स्वप्न केवल रात को ही नहीं चलता, दिन को भी चलता है. यह स्वप्न चौबीसों घंटे चलता है. वे एक बड़ी साजिश के शिकार तो नहीं बनाये गये हैं ...?