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Monday, August 3, 2015

खून की होली


उसे इस बात का पता तो चल गया है कि कर्मों की गठरी जितनी छोटी होगी मुक्ति उतनी ही जल्दी मिलेगी और जितनी बड़ी होगी, उतनी ही देर लगेगी. यह तो तय है कि साधक की गठरी बढ़ती नहीं है, धीरे-धीरे खाली हो जाती है, तब अहंकार जो पहले सजीव था, निर्जीव हो जाता है. उसके बाद ही वास्तविक पुरुषार्थ आरम्भ होता है. मुक्ति के बिना भक्ति भी नहीं होती, जब मन क्षुद्र बातों से मुक्त होगा तभी न अनंत की ओर जायेगा.

कल रात स्वप्न में अपने हाथों पर, बाँहों पर खून लगा देखा. बनारस में कुछ दरिंदों ने बम विस्फोट किये भीड़ भरी जगहों पर, उनसे तो समाचार भी देखे नहीं जा रहे थे, जो लोग शिकार हुए होंगे, उनकी हालत का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है. वर्तमान समाज को कितने हमले झेलने पड़ रहे हैं, पहले बाहर से आक्रमण होते थे तो लोग उसके लिए तैयार रहते थे लेकिन आज के युग में हिंसा कितनी घिनौनी हो गयी है, हिंसा सदा से ही घृणित है लेकिन उसका यह रूप वीभत्स है. निर्दोष लोग, बेखबर अपने कामों में लगे लोग इस बेरहमी से उड़ा दिए जाते हैं मानो कोई खिलौना हों. यह एक बड़ी साजिश है, या नियति का चक्र, यह प्रारब्ध है अथवा मानव की हैवानियत. मानव के भीतर का पशु जागता है तो वह खून का प्यासा हो उठता है. उसके भीतर उन आतताइयों के प्रति भी सहानुभूति जगती है, उन्हें किस कदर अंधकार ने अपनी गिरफ्त में ले रखा है. वे अनजान हैं इसके परिणाम से. कर्मों के खेल में क्या वे बचे रह पाएंगे ? एक साधक ऐसी स्थिति में क्या करे, क्या वह हाथ पर हाथ धर कर बैठा रहे अथवा तो सब कुछ परमात्मा पर छोड़ दे. आए दिन देश में कहीं न कहीं बम फटते रहते हैं, काश्मीर, असम था अब बनारस भी नहीं बचा. उसके भीतर भी एक विषैला कारखाना है जहाँ कटु शब्दों के बम बनते हैं. विपासना करते-करते उसका उसका पता चला है. उन कारखानों को ही उड़ाना है, ताकि उसकी भाषा संयत हो, मधुर हो, उसके लायक हो तथा प्रेम से भरी हो !


आज का दिन और दिनों से कुछ अलग है. सुबह नाश्ता भी नहीं किया था, अभी व्यायाम ही करके उठी थी कि मिस्त्री/ मजदूर आ गये, नये कमरे के लिए द्वार तो भीतर से ही बनेगा, कमरे को फटाफट खाली किया. शोर में ही पाठ किया और नाश्ता. तब तक हेयर ड्रेसर आ गयी. जून की पसंद के बाल काटे हैं हैं उसने, छोटे-छोटे कर दिए हैं, अब तीन-चार महीनों तक कटवाने की जरूरत नहीं, शायद साल भर तक ही. घर कैसा फैला-फैला लग रहा है, मौसम भी गर्म हो गया है, बाहर बगीचा भी बिखरा-बिखरा सा पड़ा है, माली कई दिनों से नहीं आया. बाहर जो तीसरा कमरा बन रहा है उसके कारण भी लॉन गंदा हो गया है. कल शाम जून ने कहा कि मई में वह मलेशिया जा सकते हैं, दो हफ्ते लगेंगे, चाहे तो वह घर जा सकती है, पर उसका बैरागी मन इसके लिए तत्पर नहीं है, बल्कि इन दिनों का उपयोग वह साधना के लिए कर सकती है. एडवांस कोर्स या विपश्यना का दस दिनों का कोर्स, यही उन दिनों का सबसे अच्छा होगा. इस समय दोपहर के तीन बजे हैं, वह अभी दायें तरफ की पड़ोसिन से बात करके आई है उसके माली के लिए जो फ़िलहाल तो बुखार में पड़ा है.