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Tuesday, April 28, 2020

एक कप चाय



आज कम्पनी के शेयर होल्डर्स की वार्षिक सभा है, ड्राइवर सुबह ही वह गिफ्ट बॉक्स दे गया जी सभी शेयर धारकों को मिलता है, जिसमें मिठाई, नमकीन, भुजिया, जूस, चॉकलेट सभी कुछ है. सुबह नींद खुलते ही जैसे भीतर किसी ने कहा, चाय में नशा होता है, उस नशे से ही मुक्त होना है. कल या परसों नींद से जगते समय  दूध से आधा भर एक कप दिखाई दिया था. रात को किसी वक्त स्वप्न देखा, वह बाजार गयी है, कैमिस्ट की दुकान पर है, कोई दवा खरीद रही है, कम से कम डोज मांगी है, फिर दुकानदार से पूछा, यह नुकसानदायक है न, वह हामी भरता है. चाय में नशा होता है यह बात इस स्वप्न से जुड़ी है और जुड़े हैं वे चाय के कप, जो नींद में दिखे थे. परमात्मा कितने-कितने उपाय करके उसे इस आदत से, आसक्ति से छुड़ाना चाहता है. उसकी कृपाओं का अंत नहीं. आज पूरे दो हफ्तों बाद कार चलाई, अभ्यास छूट गया है और भीतर एक भय भी समा गया है इसलिये धीरे-धीरे ही चला ही पायी. ब्लॉग पर लिखा, कुछ पढ़ा भी और टिप्पणी की. जून अभी एक घण्टे बाद आने वाले हैं, सर में दर्द हो रहा है शायद निकोटिन के लिए, नौ बजे आधा कप बोर्नविटा लिया था. कल शाम क्लब में वरिष्ठ महिलाओं की मीटिंग थी, लौटते हुए सवा आठ बज गए थे, जून को भी डिनर पर  जाना था, पर वह सबसे मिलकर  जल्दी ही लौट आये. उन्हें भी आधी रात तक जगना पसन्द नहीं है. जीवन जब एक लक्ष्य को सम्मुख रखकर आगे बढ़ता है तो मार्ग में आने वाली बाधा स्वयं ही दूर होने लगती है. वे सत्य के पथ के राही हैं. नन्हे से बात हुई, वह नए घर में था, काम शुरू हो गया है, तीन महीने में उम्मीद है पूरा हो जायेगा. सोनू अपनी सखी से मिलने गयी है, हल ही में जिसके पिता की मृत्यु हो गयी है. सर्वेंट लाइन में झगड़ा हो गया था आज सुबह, कारण पूछा तो पता चला, किसी पियक्कड़ ने नशे में अपनी तीन-चार वर्ष की बेटी को भी दो-चार घूंट पिलाने का प्रयत्न किया. विरोध होने पर झगड़ा बढ़ गया. नरक क्या इससे कुछ अलग होगा. 

टीवी पर इण्डिया-पकिस्ताम मैच हो रहा है. एशिया कप के दावेदार दो देशों के मध्य, हजारों लोग इस मैच को देख रहे हैं. कल से आश्विन माह का आरंभ हो रहा है. पहली बार पितृ पक्ष पर कुछ विशेष जानकारी ली और इसके बारे में लिखा. आज शाम फोन पर ज्ञात हुआ कि पीछे कुछ दिनों से बड़े भाई का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, इस समय वह अस्पताल में हैं, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य प्रदान करें. छोटा भाई भाभी टूर पर हैं, पिताजी अकेले हैं घर पर पर इस उम्र में भी वह अपना सारा काम स्वयं कर लेते हैं. सुबह बंगाली सखी के यहाँ गयी, उसकी माँ को अब वार्ड में शिफ्ट कर दिया  हैं, पर उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा है. 

वही कल का समय है. टीवी चल रहा है पर आवाज बंद है. जून फोन पर बात कर रहे हैं. उसने भी पिताजी से बात की. मंझला भाई वापस आ गया है, बड़े भाई को नर्सिंग होम में दाखिल करवा दिया है. उनको डेंगू बुखार है यह बात पक्की हो गयी है. उनके कान में भी कुछ दिन से समस्या थी पर अब वह ठीक है. भतीजी आज सुबह घर आ गयी है, वह घर से ही काम करेगी, पापा की सेवा भी जितना हो सकेगा, करेगी. जीवन में कभी-कभी बड़े कष्ट का अनुभव करना पड़ता है, ऐसे में भी जो मन की समता बनाये रख सके, वह साधक है. दोपहर को उसने भाई से बात की तो हीलिंग मेडिटेशन करने को कहा, बुखार जब बढ़ जाता है तब तो वह कुछ नहीं कर पाते होंगे. एक योग साधिका को भी बुखार है, उसे भी उसने श्वासों पर ध्यान देने को कहा. शारीरिक रोग उनकी परीक्षा लेने के लिए आते हैं या उनकी ही लापरवाही के कारण, कोई नहीं जानता. कर्मों के फल के रूप में भी रोग आते हैं और बाहरी वातावरण के कारण भी. उनकी मानसिक स्थिति कितनी मजबूत है इस पर भी निर्भर करते हैं. आज शाम को भी फॉलोअप हुआ, दीर्घ सुदर्शन क्रिया के बाद मन कितना शांत हो जाता है. गुरूजी की कृपा का कोई अंत नहीं, घर बैठे ही उन्हें फॉलोअप का वरदान प्राप्त हुआ है. दोपहर को बच्चे व महिलाएं भी आये योग करने, प्रसाद में उन्हें बगीचे का नारियल खिलाया. विज्ञान भैरव पर एक-दो प्रवचन सुने, अद्भुत ग्रन्थ है यह. ध्यान की एक सौ बारह विधियाँ शिव पार्वती को सिखाते हैं. सूत्रों के रूप में नहीं हैं, प्रश्रोत्तरी के रूप में हैं. सुबह क्लब की प्रेसीडेंट से फोन पर काफी देर तक बात हुई स्कूल के बारे में, वह बोलने से थकती नहीं हैं. दोपहर को सिर में हल्का दर्द था, नशा है जानते हुए भी चाय पी. संस्कार को मिटाना परमात्मा के भी हाथ में नहीं है. 

Friday, February 2, 2018

नन्ही योगिनी


वर्षा सुबह से लगातार हो रही है. ग्यारह बजने में चंद मिनट शेष हैं, भोजन बन गया है, सो उसने डायरी उठा ली है. नैनी को बुखार हो गया है, पिछले दो दिनों से उसके पति को था सो माली की पत्नी को बुलाकर काम करवाया. दूधवाले की घंटी गेट से सुनाई दे रही है. पियक्कड़ है यह भी नैनी के ससुर की तरह. कह गया है, गोबर है उसके पास, गाड़ी भेज कर मंगवा लें. सुबह माली को बुलाकर समझाया कि पत्नियों पर हाथ न उठाए. कैसा नाटक का सा जीवन जीते हैं ये, पर समझते नहीं. माली की माँ एन.आर.सी के लिए गाँव गयी थी, कुछ कागज-पत्र लाने, कहने लगा, अब उसे भी जाना होगा एक दिन, नहीं तो सरकार उसके बच्चों को कोई सुविधा नहीं देगी. 

आज सुबह नींद खुली तो कोई भीतर कह रहा था, भोजन के प्रति आसक्ति को त्यागना होगा. रात भर सोने के बाद भी देह हल्की नहीं हुई थी. कल शाम जून आये तो ढेर से फल खाए जो वे लाये थे. वैसे भी आहार के प्रति कुछ ज्यादा ही सजग रहती है. परमात्मा हर चीज की खबर रखता है. वर्षों पहले की बातें भी याद आने लगीं. शुरू-शरू में ससुराल में एक बार जब समय से भोजन नहीं मिला तो रोने का मन हो गया था. आर्ट ऑफ़ लिविंग के कोर्स के दौरान सेवा करने से पूर्व स्वयं खा लेने की प्रवृत्ति भी याद आई. चेतना जब देह में ही अटकी रहेगी तो साधना आगे कैसे बढ़ेगी. चेतना को देह से मुक्त करना है. धरती का आकर्षण त्यागना है तभी आकाश में मुक्त्त उड़ान सम्भव है. पड़ोसिन से बात हुई, वे लोग रिटायर्मेंट के बाद जा रहे हैं. क्लब की तरफ से विदाई देने उसके घर कुछ महिलाएं गयी थीं. ऐसा लगता है, काम के दबाव में आकर सभी लोग काम को निपटा लेना चाहते हैं, काम कैसे हुआ इसकी चिंता कम ही रहती है. उसने भी हजारों बार ऐसा ही किया होगा, पर अब लगता है, चाहे कम काम करें वे पर काम सही ढंग से होना चाहिए. समारोह क्लब में होने पर पड़ोसिन के लिए लिखी कविता वह सबके सम्मुख पढ़ सकती थी, अब उसके घर जाकर देनी होगी. कल शाम वह नवजात कन्या को पुनः देखने गये. नन्ही-नन्ही उसकी अंगुलियाँ कितनी मुद्राएँ बना रही थीं. पैरों को मोड़कर भी जैसे आसन कर रही थी.  

आज भी बादल बरस रहे हैं, सुबह से, प्रातः भ्रमण भी नहीं हुआ. नैनी काम पर आ गयी है, घर पुनः व्यवस्थित लग रहा है. आज पुरुषार्थ के बारे में सुना. पुरुषार्थ का अर्थ है पुरुष के लिए अर्थात आत्मा के लिए. उन्हें स्वयं की मुक्ति के लिए ही कर्म करने हैं. परमात्मा तो सदा है ही, उसकी उपस्थिति को भीतर महसूस करते हुए स्वयं की शक्ति बढ़ानी है. उसके आनंद व शांति को स्वयं में जगाकर जगत में बांटना है. परमात्मा उन्हें मुक्त रखता है, कभी कोई मांग नहीं रखता, उन्हें भी स्वयं को छोटी-छोटी बातों से मुक्त रखकर उसे अपने द्वारा व्यक्त होने देना है. आज शाम को वे रामदेव जी का बताया दलिया बनाकर रखेंगे, चावल, मूंग दाल, गेहूँ का दलिया, ज्वार की जगह ओट्स, अजवायन और तिल.. इन सभी को भूनकर मिलाकर रखना है. अगले पांच-छह महीनों के लिए पर्याप्त होगा.      

Tuesday, December 8, 2015

झील की तलहटी


जब तक कोई अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो ही हजार गुना होकर वापस आता है. सद्गुरू को जब कोई समर्पित हो जाता है तो उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ! जीवन की सारी भयानकता सद्गुरू के मिलने तक ही होती है, उसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! हर घटना तब उसके लिए शुभ ही होती है. नया दृष्टिकोण, नयी विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसको भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है !
ज्ञान तो मिल जाता है पर उसमें टिकने के लिए आसक्ति का त्याग करना पड़ता है. सुख के प्रति आसक्ति और कर्म के प्रति आसक्ति इसमें टिकने नहीं देती. टिकने के बाद तो कण-कण में व्याप्त चेतना का सहज ही अनुभव होने लगेगा.

देह प्रत्यक्ष है, आत्मा परोक्ष है. परोक्ष को पाकर ही एक तृप्ति का, शांति का अनुभव होता है. इस शांति को पाकर यदि राग हो जाये तो यह शांति भी अशांति का कारण बन जाती है. उसके भीतर भी मौन उतर आया है, गहरा मौन, विचार आते हैं पर विचार जैसे ऊपर-ऊपर तैरते हैं, नीचे की झील साफ दिखाई देती है. बस चुपचाप इस झील की तलहटी में बिछी ठंडी गीली रेत पर पड़ी सीपियों में से किसी एक पर उसका ध्यान रहता है. वहाँ से ऊपर जगत के कोलाहल में आने का भी मन नहीं होता. ऐसा ही अनुभव आज ध्यान में हुआ जब डेढ़ घंटे से भी ज्यादा कुछ मिनटों तक वह प्रकाश के समुन्दर में डूबती-उतराती रही. वह प्रकाश अब भी गंध रूप में उसके साथ है !

सद्गुरू वह है जिसके ‘भीतर’ को सारी सुप्त शक्तियाँ धारण करने का मौका मिलता है, वह निस्वार्थ भाव से उन शक्तियों का उपयोग जगत के लिए करता है. उसके भीतर अपार करुणा, अपार कृपा होती है, जो सभी को बिना किसी भेदभाव के मिलती है. उसने साधना इन शक्तियों को पाने के लिए नहीं की होती, वे तो सहज प्रेम के कारण ही चेतना का ध्यान करते हैं, आत्मा में रमन करते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध हो जाती है कि वे इस दृश्य जगत के पीछे अदृश्य सत्ता को देख लेते हैं. जगत की क्षण भंगुरता, परिवर्तन शीलता, स्वप्नावस्था तथा नश्वरता को पहचान उसे त्याग देते हैं. स्वरूप से तो नहीं त्याग सकते पर मन से त्याग देते हैं ! उनके पास सारी दृष्टियाँ होती हैं, वह सारे मार्ग बता देते हैं, अपनी अपनी योग्यता व रूचि के अनुसार साधक उनमें से किसी एक पर चलने के लिए समर्थ है !


जीवन का एक सत्य है कि संसार को किसी का मन नहीं चाहिए, उसकी सेवा चाहिए, बस उनका काम होता रहे, मन की किसी को जरूरत नहीं है और यह मन न ही परमात्मा के किसी काम का है, वह तो मन से परे है, तो ध्यान और प्रेम के मार्ग पर इसे मर ही जाना होगा. अहंकार को ही केवल मन चाहिए, यह इसी के बल पर जीता है. ‘मैं’ है तो इच्छा है, डर है, कामना है, सुख है, दुःख है, यदि ‘मैं’ ही नहीं तो इनमें से कोई भी नहीं और तब मन भी नहीं. बिना अहंकार के जीने वाले को हो सकता है यह दुनिया पागल कहे, पर उसकी भी कोई चिंता नहीं, पागल तो हर व्यक्ति यूँ भी हर दूसरे को समझता ही है. हर कोई स्वयं को बुद्धिमान ही जानता है और दूसरे को नासमझ, तो यदि कह भी दिया तो सुन लेना चाहिए. कोई ध्यान के द्वार से लौटा हो या भक्ति के, इसका पता तो चले, कोई रेखा तो हो जो उसे और एक संसारी को नास्तिक को अलग करती हो, पर सद्गुरू यह भी तो कहते हैं कि भेद नहीं है. दो हैं ही नहीं तो भेद हो कैसे, दूसरा कोई है ही नहीं, जो भी हैं वे भी तो उसी परमात्मा का ही रूप हैं. परमात्मा ही विभिन्न रूपों में अपने को व्यक्त कर रहा है. एक बार अपने भीतर प्रवेश मिल गया तो सारे भेद मिट जाते हैं !    

Tuesday, June 2, 2015

कान्हा की बांसुरी


आज सुबह गुरू माँ को कुछ देर सुना था, कह रही थीं कि अधिकतर महिलाओं को अपने पति की बचत आदि की कोई जानकारी ही नहीं रहती और अचानक जरूरत पड़ने पर बहुत परेशानी होती है. अभी कुछ देर पहले एक अनजान कॉल ने उसे कुछ देर के लिए व्यर्थ ही परेशान कर दिया, जो जून के बारे में पूछ रहा था, पर पता चल गया कि अभी भी डरने की शक्ति है ! जून को उसने फोन भी कर दिया, वह भी परेशान हुए होंगे शायद नहीं, उन्हें उसे अधिक अनुभव है. फोन उनके नये ड्राइवर का था, अभी दुबारा भी आया था, खैर ..जून ने आज ही अपना बीपी भी चेक कराया, थोड़ा अधिक है, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. किसी की सही कीमत का पता तभी चलता है जब उससे दूर जाने का भय हो. वह अपने मन की इस कमजोरी को नहीं जानती थी, आज का अनुभव कुछ नया सिखा गया है. वे संसार में रहते हैं तो प्रेमवश सभी से बंधे रहते ही हैं, पर इसी बंधन से मुक्ति ही तो मोक्ष है, आसक्ति से मुक्ति छोटे मन के लिए सम्भव नहीं पर जब कोई इस छोटे मन से पार चला जाये तो कोई भय नहीं, उस वक्त वह छोटे मन के साथ थी. आज पिताजी, बड़े भाई व छोटी ननद से बात की. पिताजी अब ठीक हैं पहले से. इसी महीने कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष सत्संग है उसे निमन्त्रण पत्र टाइप करने को दिया गया है, सेवा का छोटा सा कार्य...

आज पूर्णिमा है. रक्षाबन्धन का दिन. ‘जागरण’ में इसके महत्व पर सुना. सद्गुरु और कान्हा उसके लिए एक हो गये हैं. दोनों ही से वह साहित्य के माध्यम से मिलती है, फिर ध्यान के माध्यम से, दोनों मनातीत हैं. कल पढ़ा कि शरीर में होने वाली संवेदनाएं किसी न किसी भावना की द्योतक हैं, यदि संवेदना को देखें और देखते-देखते वह खत्म हो जाये तो वह भावना भी नहीं रहती. ध्यान में तभी उनकी सभी नकारात्मक भावनाएं समाप्त होने लगती हैं और वे साफ-स्वच्छ होकर बाहर निकल आते हैं. ध्यान एक तरह से स्नान ही हुआ न... भीतरी स्नान, फिर जब नकारात्मकता नहीं रहती तब ज्ञान प्रकट होगा, प्रज्ञा जगेगी. अभी रास्ता लम्बा है, पर रास्ता भी कितना मोहक है, अद्भुत है. सद्गुरु का ज्ञान इसे और भी मोहक और आनंद प्रद बना देता है. यह तो जन्मों की साधना है.

आज सत्संग उनके यहाँ है, जून का जन्मदिन है. सुबह से सभी के फोन आ रहे हैं. दो बजने को हैं. शाम बहुत व्यस्त बीतने वाली है. आज भी झकझोरने वाला प्रवचन सुना, संत निर्भीक होता है, वह सिर्फ देता है और जिसे कुछ चाहिए नहीं वह डांट भी सकता है. उनके सम्मुख जाते ही झूठ उजागर हो जाता है. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत होती हैं पर उन्हें जीवन में उतारने से वे पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस कान्हा की बांसुरी की तरह है जो स्वयं पीड़ा सहकर मधुर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है तभी कृष्ण के अधरों से लगती है, वैसे ही संत, संत होने से पूर्व विरह की आग में जलते हैं फिर प्रभु से दीदार होता है. और प्रभु के मुख बन जाते हैं वह, उसकी तरफ से बोलते हैं, उसका कार्य करते हैं. जब किसी के जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, वह भी उस प्रभु का साधन बन जाता है.



Tuesday, August 12, 2014

अटल जी की चुटकियाँ


मन ही मुक्ति के आकाश में उड़ना सिखाता है, मन ही बंधन की खाई में पटक देता है. मन को सात्विक आहार, एकाग्रता और अनासक्ति मिले तभी वह ऊंचे केन्द्रों में रह सकेगा, ये सुंदर वचन आज ही उसने सुने थे. आजकल उसके मन ने एक नई आसक्ति पैदा कर ली है, टीवी के एक कार्यक्रम के प्रति, निश्चित समय होते ही अपने आप कदम टीवी की ओर बढ़ते हैं, इस आसक्ति की जड़ों को गहरा होने से पूर्व ही काटना होगा. अपने को आगे ले जाना है न कि पीछे, मुक्त होना है न कि नये-नये बंधनों में स्वयं को बांधना है. माँ-पिता का पत्र आये हफ्तों हो गये हैं, उसे पत्र लिखे हुए भी, नन्हे की बात लिखने का मन ही नहीं होता, क्यों, सही कारण शायद उसे खुद भी मालूम नहीं है. उन्हें बुरा लगेगा और माँ जो पहले ही अस्वस्थ हैं, उन्हें दुखद समाचार न ही दिए जाएँ तो बेहतर है. चचेरे भाई का पत्र आया है, जिसका जवाब देना ही पड़ेगा. वर्षों बाद बिन माँ के बच्चों के जीवन में खुशियाँ आने वाली हैं. बहन की शादी तय हो गयी हैं, भाई के लिए भी बात चल रही है. उन्हें एक बधाई कार्ड भेजना चाहिए. जून को कहेगी तो वे अवश्य ला देंगे. जून ने उसे कभी निराश नहीं किया, विवाह में वे क्या देंगे यह भी उन्होंने उस पर ही छोड़ दिया है. माँ से फोन करके इस बारे में बताना होगा. अगले हफ्ते भांजी का जन्मदिन है, उसे बधाई देते समय मंझले भाई से भी बात हो जाएगी.

आज इस क्षण ऐसा लग रहा है कि दिनों बाद स्वयं से मिल रही है. पिछले दिनों जीवन क्रम चलता रहा, कुछ सहज, कुछ असहज क्षण आये, किन्हीं पलों में मन कृतज्ञ हुआ, आनन्दित भी हुई जब ओलम्पिक खेलों का उद्घाटन समारोह देखा, कुछ दृश्य अद्भुत थे. फिर कुछ लोगों से मिलना भी हुआ, उनके परिचित ही हैं पर कई बार वर्षों जानने के बाद भी कुछ अनजाना रह ही जाता है. नन्हा स्कूल से आया तो बहुत खुश था, उसके मित्रों ने बहुत सहायता की और उसे जरा भी परेशानी नहीं हुई बस में, ऐसा उसने कहा. कल विश्वकर्मा पूजा थी, जून ने ऑफिस में ही लंच लिया. उनका दूधवाला भी इस दिन अपनी साइकिल की पूजा करता है, अच्छी तरह धो-पोंछ कर माला चढ़ाता है. लोगों को आस्था के लिए कुछ तो चाहिए, गोयनकाजी कहते हैं कि नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई नाम नहीं, किसी परम्परा का सहारा नहीं, बस प्रतिक्षण अपनी श्वास को देखते जाना है. साँस का सीधा संबंध मन से है जहाँ मन में उद्ग्विनता जगी कि साँस तेज हो जाती है. मन शांत है तो साँस भी नीरव धारा की तरह समान गति से चलती है. अपने मन में किसी आत्मा या परमात्मा के दर्शन करने के उद्देश्य से नहीं बैठना है बल्कि मन को विकारों से मुक्त करते जाना है. पहले तो विकारों के दर्शन होंगे फिर धीरे-धीरे संस्कार मिटेंगे, गांठे खुलेंगी, पर्दे हटेंगे तो मुक्त आकाश सा मन सम्मुख होगा जिसे कोई भी नाम दे दें, आत्मा या परमात्मा. मन में ऊपर-ऊपर से तो लगता है कि स्वच्छता आ गयी है निर्मलता आ गयी है पर जरा प्रतिकूल परिस्थिति आते ही कैसा बेचैन हो उठता है, किसी को को कुछ देकर पछताने लगता है, किसी के कुछ मांगने पर व्याकुल हो उठता है. यह विकारों का ही तो सूचक है. जो हो रहा है चाहे वह शरीर के स्तर पर हो या बाहर, साक्षी भाव से देखना आ जाये तो मन शांत रहना सीख लेगा.

आज सुबह माँ से बात की, वे सोलन में हैं, बहन, बच्चे व पिता जी घूमने गये थे. सुबह ध्यान में बैठी तो एक फोन आया, एकाएक उठना सम्भव नहीं था, पता नहीं किसका था. बगीचे से एक पपीता तोड़ा है जरा सा पकते ही पक्षी खाना शुरू कर देते हैं, उनका यह पपीते का वृक्ष बहुत मीठे व रस भरे फल देता है निस्वार्थ भाव से, ऐसे ही मानव को चाहिए कि दूसरों के काम आए. अभी तक तो वे संचित पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त वैभव का आनंद ले रहे हैं, लेकिन कभी तो ये संचित पुण्य समाप्त हो जायेंगे. भविष्य के लिए नये पुण्यों का संचय इसीलिए करना चाहिए. सद्विचारों से, सद्कर्मों से तथा सद्भावों से. ईश्वर से प्रार्थना भी इसी बात की करनी चाहिए कि कोई असद्विचार न जन्मे, यदि एक बार बीज पड़ गया तो अनुकूलता पाते ही वह पनपेगा अवश्य. कभी-कभी क्रोध व् द्वेष के भाव जो न चाहने पर भी मन को घेर लेते हैं वे इसी का सूचक हैं कि कभी न कभी बीज बोये जरूर गये थे. सुबह जल विभाग के लोग आये थे जो कल दोपहर को भी आए थे, पानी आजकल बहुत कम आता है, ऊपर चढ़ता ही नहीं, अपनी आँखों से देखकर गये हैं शायद अगले कुछ दिनों में सुधार हो. ओलम्पिक में भारत ने अर्जेंटीना को तीन गोल से हरा दिया अपने पहले मैच में. अटलजी ने उस दिन अमेरिका में कहा, पाकिस्तान से क्या बात करें, मौसम की अथवा बीवी-बच्चों की, उनकी चुटकियाँ लाजवाब थीं.