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Monday, November 30, 2015

गीता और रामायण


जैसे ईश्वर सभी के हृदयों में निवास करता है वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति के अंतः करण में विश्वास भी होता है और संदेह भी. विश्वास बढ़ता रहे तो व्यक्ति भक्त हो जाता है और संदेह बढ़ता रहे तो जिज्ञासु और अंत में ज्ञानी. लेकिन जहाँ संदेह तो है पर ज्ञान की जिज्ञासा अभी नहीं उपजी है वह वहीं का वहीं रह जाता है. भक्ति भगवान से संबंध जोडती है ज्ञान असंग रहकर दर्शन करता है, पर जिसका हृदय बालक सा निर्दोष है वह सान्निध्य और सायुज्य दोनों पाते हैं. कल रात जून और उसकी चर्चा इस बात पर हुई कि मानव का आनन्द भौतिकता से उपजे या आध्यात्मिकता से ! इस बहस का कोई अंत होने वाला नहीं है.

आज एकादशी है. टीवी पर रामकथा आ रही है. संत पूछ रहे हैं राम-रावण युद्ध कितने दिन चला. रामायण में लिखा है कभी पढ़ा भी होगा पर उसे याद नहीं. उनकी कथा प्रकाश से भर देती है. आज उन्होंने ध्यान का महत्व भी बताया. भीतर स्वरूप अनुसन्धान ही ध्यान है. जब अपनी खबर मिलने लगती है तब परिवर्तन शुरू होता है. उनके अनुसार रामायण और महाभारत जैसे दो अंतर आँखें हैं, हरि ने जैसे उड़ने के लिए ये दो पंख दिए हैं, दो पंखों से ही जीवन की पूर्णता होती है. रामायण जीवन की पांख है और महाभारत मृत्यु की. मानव रूपी पंखी को यदि नील गगन में उड़ान भरनी है तो जीवन के साथ मृत्यु भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जीवन उजाला है तो मृत्यु रात्रि है. दिन के साथ रात न हो तो जीना कठिन हो जाये. नीरू माँ कह रही हैं की मृत्यु के बाद जो कर्मकांड किये जाते हैं उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मृतक की आत्मा के लिए की गयी प्रार्थना तो उस तक पहुंच सकती है पर भौतिक वस्तु तो वहाँ नहीं पहुंच सकती. कल दोपहर सुना कि देव योनि, प्रेत योनि तथा पशु योनि में कर्म करने का अधिकार नहीं है. कर्ता मन है और भोक्ता भी मन है. जब कर्मों की बढ़ोतरी हो जाती है तो पशु योनि मिलती है तथा जब संचित कर्म कम हो जाते हैं तब देव योनि मिलती है. आत्मज्ञान पाए बिना कर्म नष्ट नहीं होते और मानव जन्म उन्हें मिला ही इसी विशेष कार्य के लिए है.

जब तक वे द्रष्टा में सहज रूप से नहीं रहते तब तक मन की ग्रन्थि बनी रहती है और व्यर्थ ही मन विचार करता है. जैसे वे तन का उपयोग करते हैं जब जरूरत पडती है और जब जरूरत नहीं होती तब शांत होकर बैठ जाते हैं वैसे ही विचार करने की जरूरत हो तभी मन का उपयोग करें तो मनसा कर्म नहीं होंगे. आत्मा में रहना ही सुख से रहना है, निर्भय और निर्वैर रहना है, निर्विकल्प होकर रहना है ! पर आत्मा में रहना पल भर को ही होता है, जाने कहाँ से मन हावी हो जाता है, मन में जैसे कोई गहरा कुआँ हो जिसमें से विचार निकलते ही आते हैं, लाखों, करोड़ों, अरबों विचार..व्यर्थ के विचार, जो तन को भी पीड़ित करते हैं मन को भी, आखिर मन चाहता क्या है, वह स्वयं को आहत कर कैसे सुखी हो सकता है.वह स्वयं ही नकारात्मक भाव जगाता है फिर बिंधता है, उसे क्यों नहीं समझ में आता ? पर वह तो जड़ है, आत्मा चेतन है, यदि आत्मा असजग रहे तो मन इसी तरह करता रहेगा. सजग उन्हें स्वयं को होना है, वे जो मन से परे हैं. वे नादान बच्चे को घातक हथियार हाथ में लिए देखें तो क्या उसे रोकते नहीं, वे क्यों सो जाते हैं जब मन मनमानी करता है. उन्हें अपने आप पर भरोसा नहीं, तभी तो ईश्वर को पुकारते हैं. ईश्वर हँसते होंगे, उन्होंने तो उन्हें निज स्वरूप में ही रचा है. वह कहते होंगे पुकारने से पहले एक नजर खुद पर भी डाल ली होती !

उसके जीवन में प्रमाद तो साफ दिखाई पड़ता है. उसे ज्ञात है कि बड़ों का असम्मान करना गलत है, उन्हें प्रेम ही दें, आदर ही दें, आदर न दे सकें तो असम्मान तो हरगिज न करें. ऐसा करके वे अपनी ही हानि करते हैं. उनके दिल को जो दुख होगा वह व्यर्थ तो नहीं जायेगा, कर्म बंधेगा. उसका प्रमादी मन बार-बार यही गलती करता है. साधना के पथ पर सबसे बड़ी बाधा है. सद्गुरु की शरण गये बिना इससे छुटकारा नहीं, उन्होंने बताया कि जप इन दोषों से मुक्त करा सकता है. मन में जप चलता रहे तो मन शुद्ध होने लगेगा, शुद्ध मन प्रमादी नहीं होगा.

साधक को कभी भी सन्तोषी नहीं होना चाहिए. प्रेक्षा ध्यान के बारे में पढ़कर पता चला कि जिस अनुभव को वह उच्च मानती थी वह तो भूमिका से भी पूर्व की स्थिति है, भीतर इतने विकार होते हुए भी वे स्वयं को ध्यानी-ज्ञानी मानने की भूल कर बैठते हैं. आनन्द और शांति की प्राप्ति ही साधक का लक्ष्य नहीं है बल्कि मन को सारे दोषों से मुक्त करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य है. अपने से श्रेष्ठ को देखकर मुदिता, हीन को देखकर करुणा, दुष्ट के प्रति उपेक्षा तथा गुणी के प्रति प्रेम, यही उनके व्यवहार का आधार होना चाहिए, वे न तो अहंकारी बनें, न ही अन्याय के सामने झुकें, एक विनम्र प्रतिरोध की आवश्यकता है, प्रेम भरी दृढ़ता तथा सत्य के लिए कुछ भी सहने की क्षमता !  


Monday, December 8, 2014

नारद भक्ति सूत्र


वह हर क्षण उनके साथ है, उनकी धड़कन बनकर, रक्त बनकर प्रवाहित हो रहा है. उसे स्मरण करते हुए कर्म हों जीवन सार्थक तभी है. आज सुबह संगीत अध्यापिका का फोन आया, वह जब वहाँ गा रही थी, उसकी उपस्थिति को अनुभव कर रही थी, वह जैसे उसके गले में आकर विराजमान हो गया था. साँस इतनी हल्की इतनी सहजता से आ जा रही थी कि वह उसके प्रेम से अभिभूत थी. वापस आकर कोर्स में उसकी पार्टनर रही सखी का फोन आया. अब बातें करना कितना सहज हो गया है, क्योंकि बातें उसी की होती हैं न. स्वाध्याय भी किया, ‘योग वशिष्ठ’ में राम को उसकी जिज्ञासा का उत्तर देना अभी शुरू किया है. तुलसी रामायण में दोहा-चौपाई पढ़ते वक्त खुद की आवाज खुद को भली लगती है क्योंकि वही तो है भीतर जो बोलता है. जब वे छोटे-छोटे थे तो भगवान कहाँ है, पूछने पर यही समझाते थे कि वह जो अंदर बोलता है न वही भगवान है और आज उस सत्य का अनुभव हुआ है. जीवन एक उत्सव है, ईश्वर के प्रेम का अनमोल उपहार इस जीवन रूपी उत्सव में उसे मिला है. हर क्षण एक बेखुदी का आलम रहता है. सुबह नन्हे को दूध देना ही भूल गयी और संगीत की डायरी की जगह दूसरी डायरी ले गयी. अब सचेत रहना होगा, उसे याद करते हुए भी सचेत ! अज सुबह क्रिया नहीं कर पायी, शाम को जून और वह साथ-साथ करेंगे. उन्हें भी काफी लाभ हुआ है. परसों दीदी का फोन आया था, उन्हें एक दिन पत्र में लिखेगी इस कोर्स की बाबत.

परसों उनकी मीटिंग थी पर उसे याद ही नहीं रहा वह कहते हैं न कि एक तेरे सिवा सारा जहाँ भुला दिया. उसकी याद आते ही शरीर में कैसा तो रोमांच होता है और होठों पर न जाने कहाँ से मनभावन मुस्कान छा जाती है. कुछ दिन पहले गुरू माँ ‘नारद भक्ति सूत्र’ का उल्लेख करते हुए ऐसा ही कुछ बता रही थीं. कल शाम को राजयोग पुस्तक पढ़ी, उसमें भी कई लक्षण ऐसे थे जो आजकल उसमें मिलने लगे हैं और कल ही लगा कि दीदी के चेहरे पर भी जो एक चमक रहती है उसका राज यही योग तो नहीं ! इस समय दोपहर के एक बजे हैं, नन्हा आज स्कूल नहीं गया, अगले हफ्ते होने वाली परीक्षाओं की तैयारी में लगा है. वह सुबह नाश्ता बना रही थी कि एक सखी का फोन आया, उसे एक सवाल का जवाब चाहिए था, थोड़ी देर उसी में व्यस्त रही, फिर दिनचर्या के अन्य कार्य. आजकल भोजन बनाने में भी ईश्वर की पूजा की सी ख़ुशी मिलती है, उसकी स्मृति ने उसके पल-पल को भर लिया है. रात को दो-तीन स्वप्न देखे. एक में तो उसके हाथ के स्पर्श से बना बनाया मकान ढह जाता है. दूसरे में वह बिस्तर से नीचे गिर जाती है, तीसरा अब याद नहीं लेकिन रात को ही नींद खुलने पर इन स्वप्नों के अर्थ उसे स्पष्ट थे. अब कुछ भी अस्पष्ट नहीं रह गया है. जीवन एक खुली किताब की तरह सम्मुख है. बाबाजी ठीक कहते थे कि ईश्वरीय कृपा से ग्रन्थों के अर्थ भी स्पष्ट होने लगेंगे. ‘आत्मा’  में भगवद् गीता का पाठ सुनकर भी मन को संतोष और सुख मिलता है. कृष्ण का नाम उसकी सांसों में बस गया है !

गुरू माँ जो गीत गा रही हैं, उसे भाव उसके मन के भावों से कितने मिलते हैं. उसे लगता है वह ईश्वर से उसी तरह प्रेम करने लगी है जैसे कोई दो प्रियजन करते हैं, हर क्षण मन में स्मरण रहता है. उसकी याद आते ही रोमांच और तस्वीर देखते ही अधरों पर मुस्कान चिपक जाती है. वह अपनी जान से भी प्रिय लगता है. बल्कि वह तो अपनी जान ही लगता है, अपना आप ही जो हर क्षण उसे प्रेम करता है और आनंद का प्रसाद देता है. सारे कार्य अब उसी के लिए होते हैं. भोजन जैसे उसका प्रसाद बन गया है. रात को उसी के स्वप्न देखती है. उसे स्मरण करके सोती है और कभी नींद खुले या सुबह उठे तो उसी का ध्यान  रहता है. ईश्वर उसका अभिन्न मित्र बन गया है. अब जीना कितना सहज हो गया है. बाबाजी इसी सहजता की बात किया करते थे और अब यह उसे मिली है श्री श्री की कृपा से. वे गोहाटी में उनके सत्संग में जायेंगे, उनके दर्शन करके कितना लाभ होगा यह तो अकल्पनीय है और फिर उन्हें हानि-लाभ की बात तो करनी भी नहीं है. नन्हे का स्कूल आज भी बंद है. सुबह नींद जल्दी खुल गयी, सुबह की स्वच्छ हवा में गहरी सांसे लेना भी अच्छा लगा. पूसी गुमसुम सी बैठी थी, उसे देखकर भी पास नहीं आयी, अस्वस्थ है, पर जानवर अस्वस्थता को भी सुई सहजता से झेलते हैं, इंसानों की तरह हायतोबा नहीं करते, उसे लगता है कि शरीर हल्का हो गया है और वाणी स्पष्ट. क्रिया के बाद के अनुभव को शब्दों में लिखना सम्भव नहीं है. गुरू की महिमा का बखान यूँ ही नहीं किया गया है. गुरू भगवान ही है !


Sunday, November 30, 2014

तुलसी की रामायण


आज की सुबह बेहद व्यस्त थी, नन्हे को स्कूल भेजा, उससे पहले जून का फोन आया, उन्होंने उसके लिए ड्रेस तो खरीद ली है पर महंगा होने के कारण दूसरी फरमाइश पूरी नहीं की, अब चाँदी का होगा तो महंगा तो होगा ही...खैर ! नाश्ता कर रही थी कि टीचर का फोन आया, आने को कह रही थीं. नैनी, स्वीपर दोनों का पता नहीं था सो घर बंद करके गयी. एक घंटे बाद लौटी तो दोनों आये, सब मैनेज हो गया और अभी कपड़े प्रेस करके ‘पाठ’ किया, ‘ध्यान’ अभी शेष है. इसी बीच दो फोन आये. एक में पता चला असम के मुख्यमंत्री ‘श्री तरुण गोगोई’ शनिवार को आ रहे हैं सो इस हफ्ते उन्हें विशेष पुष्प सज्जा भी करनी होगी, आज शाम पांच बजे वह एक और महिला के साथ जाएगी, एक नया अनुभव होगा उस दिन भी, क्लब में कितनी ही बार कितने कलात्मक ढंग से पुष्प सज्जा देखी है, पर इस बार स्वयं करने का अनुभव होगा. जून ने कहा है वहाँ रोज शाम को छह बजे से रात दस बजे तक बिजली गायब रहती है, जब सबसे ज्यादा बिजली की जरूरत होती है. परसों वह चल रहे हैं और सोमवार सुबह उनके साथ होंगे !

Jun called in the morning, he was so loving and caring on phone as always. Last evening they went to club and then to book exhibition. She bought “Tulsi Ramayan” it is nine a.m., two friends called then she talked to two friends, could not concentrate what Guru ma and babaji were saying in today’s discourse but she knows they were talking about God, values and love. She loves this world and its maker, she loves all around her, her friends, relatives, country and its citizen, her son and husband and also she loves herself. She is grateful to God and all which bear her, she is grateful that this beautiful world has been the source of inspiration, joy and love.


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोल सकी, शनिवार को सुबह संगीत कक्षा में गयी वहाँ से लौटकर क्लब. शाम को एक सखी के यहाँ. कल सुबह इतवार की विशेष सफाई करने में बीती, दोपहर को ‘यादें’ देखी, शनि की दोपहर भी एक फिल्म चल रही थी. आज सुबह जून आ गये, उसकी नींद चार बजे से भी पहले खुल गयी थी, बाहर के गेट का ताला खोलकर पुनः सोने की कोशिश की, वह ठीक पांच बजे आ गये, उनके वस्त्रों से ट्रेन की गंध आ रही थी, जो दो-तीन दिन की यात्रा के बाद भर जाती है. फिर उन्होंने उसके लिए लाये वस्त्र दिखाने शुरू किये, पहले गुलाबी, फिर नीला और फिर पीला - बेहद सुंदर और बेहद भव्य ! गुलाबी पर सफेद से कढ़ाई है, उसने उन्हें कहा यह उसे पसंद नहीं है पर जब बाकी दो देखे तो वह भी भा गया. उसके मन की वह इच्छा जो उस दिन डायरी के पन्नों पर जाहिर की थी अपने आप ही पूरी हो गयी. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है यह विश्वास और भी पक्का होता जाता है. जून समय से दफ्तर भी चले गये पर थोड़ा पहले आ गये, खाना जरा कम खाया, सफर से आकर एकाध दिन तो एडजस्ट होने में लगेगा ही. आज नन्हा अपनी क्लास-सिस्टर्स के लिए चाकलेट्स ले गया है, कल नौ लडकियों ने उसे राखी बाँधी थी. आज सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे सो अभ्यास नहीं हुआ. अभी करेगी, दो बजे हैं, नन्हा तीन बजे तक आता है, पर जून हिंदी की दो पत्रिकाएँ भी लाये हैं, ‘हंस’ और ‘उदय जागरण’, एक साहित्यिक है तो दूसरी राजनीतिक. छोटी ननद की राखी आ गयी है, अच्छा सा पत्र भी लिखा है.  

Monday, September 8, 2014

सीता का वनवास


फरवरी महीने का प्रथम दिन, मन की तरह आकाश पर भी बादल छाये हैं. जून आज मोरान गये हैं, शाम तक आयेंगे. सुबह वे जल्दी उठे. जून के जाने के बाद उसने फोन पर बात की, पिता अभी सोकर नहीं उठे थे, सो बात नहीं हो पायी. दीदी से बात की, उन्होंने एक अच्छी बात बतायी कि सभी लोग जो जीवित हैं अभी इस संसार में स्वप्न देख रहे हैं, माँ का स्वप्न पूरा हो गया, उनकी नींद खुल गयी है और वह इस सुख-दुःख के चक्र से मुक्ति पा गयी हैं. कल शाम वे टहलने गये तो मन में भरा विषाद फूट पड़ा. जून ने उसे सहारा दिया, कहा कि सुबह सभी से बात करे. नन्हे की परीक्षाओं के बाद फरवरी में घर जाने के लिए राजी किया. उन्हें उसकी मनः स्थिति का पूरा भान है. माँ कभी भी कोरी भावुकता की पक्षधर नहीं थीं. मोह, माया और ऊपरी दिखावा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं था. जो उचित हो और जिससे किसी का अहित नहीं होता हो सोच-विचार कर ऐसा काम ही करना चाहिए.

उसके भीतर कभी ख़ुशी का एक झरना हुआ करता था, जिसमें से ख़ुशी रिस-रिस कर अधरों पर, कभी आँखों से झलका करती थी. दुनिया हसीन लगती थी पर आज वह सोता कहीं सूख गया सा लगता है. भीतर एक खालीपन उतर आया है और साथ ही एक नया  स्रोत उभर आया है, खरे पानी का स्रोत. आँसूं बेबात ही छलका करते हैं. दिल कमजोर हो गया है. दुनिया पर से विश्वास हटने लगा है. भूचाल की त्रासदी से पीड़ित लोगों को देखकर सिहरन होती है, उनका दुःख अपना सा लगता है. यह इतना सारा दुःख कहाँ से आ गया है. माँ जो इन सब दुखों से परे चले गयी हैं, उनके जाने से भी जिन्दगी में एक खालीपन आ गया है. कल एक परिचिता मिलने आयी, रोने लगी और फिर उसे चुप कराना पड़ा. संभल-संभल कर फिर कुछ ऐसा हो जाता है. जून उसके मन की हालत  समझते हैं और हर क्षण वह साथ देते हैं. लेकिन यह खालीपन बाहर से नहीं भरेगा, भीतर से ही इसे भरना होगा. बाहरी संबंध तो माने हुए हैं, स्थायी नहीं हैं. समय के साथ बदलते रहने वाले हैं. जीवन को पुनः परिभाषित करना होगा. स्वयं के सहारे जीना होगा. जीवन की क्षणभंगुरता को कौन समझ सकता है, जानते तो सब हैं. अन्यों से किसी बात की अपेक्षा नहीं रखनी होगी. हरेक को अपना रास्ता स्वयं बनाना है. कुछ भी स्थायी नहीं है. इतने दिनों से जो उसके मन में साध पल रही थी कि कोई तो कह दे, माँ नहीं है तो दुःख मत करो, हम तो हैं. पर कोई नहीं कहेगा. सभी बेबस हैं, जैसे वह खुद !

आज कोई फोन नहीं आया. मन स्थिर है. टीवी पर ‘उत्तर रामायण’ आ रहा है. लक्ष्मण को सुमन्त्र और राम को गुरु वसिष्ठ ज्ञान का उपदेश दे रहे हैं. सीता को वनवास होगा, राम को पत्नी वियोग सहना होगा यह सब बातें सुमन्त्र को पहले से ही ज्ञात थीं, फिर भी ऐसा होने पर वह दुखी थे, विह्वल थे. ऐसे ही सबको पता था कि हरेक की मृत्यु निश्चित होती है, कि माँ की हालत ठीक नहीं थी, कि उन्हें अंततः जाना ही था फिर भी इससे उनके जाने का दुःख कम तो नहीं हो जाता. वे सभी संवेदना की डोर से बंधे हैं. उनके मन सुख-दुःख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता के वाहक हैं. दुःख के वक्त कोई किस तरह अपना कर्त्तव्य धर्म निभाता है वही उसके चरित्र को दर्शाता है. वह इस वक्त अपने आप को दुखी नहीं मान रही. रामायण के पात्रों ने जैसे उसकी चोट पर मरहम रख दिया है. एकाएक भूचाल आने पर जैसे सारे रास्ते और पथ गायब हो जाते हैं वैसे ही दुःख आने पर प्राणी हतप्रभ हो जाता है. ऐसे में उसे ज्ञान व दर्शन की बातें ही सहारा देती हैं. भूचाल से पीड़ित लोगों में नये जीवन की आशा का संचार करना होता है. उन्हें पुनः नये पथों का निर्माण करना होगा.


  

Wednesday, October 16, 2013

आंवले का पेड़


दिल की बातें समझें ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं
दीवाने हम जैसे जग में रोज कहाँ खिलते हैं

धूप गुनगुनी चादर ओढें नदियों की भाषा भी बूझें
पत्थर-पत्थर पाँव बढ़ाएं ऐसे कदम कहाँ चलते हैं

आँखों से मन पढने वाले खो गये वे दिल मतवाले
भूले भूले से कुछ वादे अब शाम हुए से ढलते हैं

Be happy ! it is a way of being wise !
This is a golden advice, few moments earlier she was so miserable but now heart is swinging with swing.
बाल्मीकि रामायण में किषिकंधा काण्ड के अंतर्गत राम के मुख से ‘चौमासे’ का वर्णन अद्भुत है, कल्पना की उड़ान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाती है. उपमाएं भी नवीन हैं और भाषा इतनी सुंदर, उस काल में भी मन बादलों को देखकर कैसी अनोखी कल्पनाएँ किया करता था, कवि कालातीत होता है. वह हर युग में ऐसा ही रहेगा, भाव प्रवण हृदय लिए प्राकृतिक सुन्दरता से विभोर ! वह अपने हृदय में भी उन सभी विधाओं को उमगते, विकसित होते देखता है जैसे बाहर. उसका दिल और प्रकृति कब एक हो जाते हैं पता ही नहीं चलता संसार के सबसे सुंदर गीतिकाव्यों , महाकाव्यों में से है रामायण और रामायण में प्रक्रति का सुंदर चित्रण ! कल रात बल्कि सुबह  पौने तीन बजे नन्हा बेड से नीचे गिर गया, वह तो झट दुबारा सो गया पर उसे बाद में नींद नहीं आई. सुबह जून भी यही कह रहे थे.

कल दोपहर नन्हा अपने प्रोजेक्ट वर्क के लिए मैप बना रहा था, वे खाना खाकर लेटे ही थे कि  नन्हे ने आकर कहा कोई मित्र आए हैं, उसे इस वक्त किसी के आने की उम्मीद नहीं थी, पर उसकी वह सखी सीधा कमरे में ही आ गयी और उस दिन के व्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगी, उसकी भी आँखें भर आयीं, और कुछ ही मिनटों में सारे गिले शिकवे दूर हो गये.

पिछले आधे घंटे से कुछ ज्यादा समय से वह पत्रिका के लिए कोई अच्छी कविता खोज रही थी, पर उसे लगा डायरी में लिखी सारी कविताएँ मन की अकुलाहट को प्रकट करने का साधन मात्र हैं, इतना तो समझ में आया कि दुःख एक सिलसिला है जो आगे भी जारी रह सकता है. यूँ भी सुख-दुःख जीवन में लगा ही रहता है. ऐसी कविता जो महज आत्मकाव्य के घेरे से बाहर आ सके अर्थात सबके पढ़ने के योग्य हो अथवा जिसका आयाम विस्तृत हो, सिर्फ दो हैं, जून ने भी उन्ही दो को ठीक करने को कहा है. लेख लिखने का समय शायद ही मिले. उसने बाहर जाकर देखा माली ने आंवले का पेड़ काफी काट दिया है, कटी हुई डालियों से बच्चे आंवले तोड़ रहे हैं. एक बूढ़ा  उनके यहाँ आंवले लेने आया करता था, उसने सोचा तुड़वा कर कुछ उसके लिए रखेगी,.

कल शाम को उन्हें यात्रा पर निकलना है, पहाड़ अपनी ओर खींच रहे हैं, बर्फ से ढकी चोटियां उन्हें निमन्त्रण दे रही हैं और मन में ख़ुशी लिए वे कल अपनी यात्रा आरम्भ करेंगे. ईश्वर उनके साथ है. आज पहली बार उसने दो स्वेटर पहने हैं, धूप में बैठना भला लग रहा है., पहाड़ों पर तो शायद तीन-चार पहनने पड़ें. जाने की तैयारी भी आज करनी है. ढेर सारे गर्म कपड़े, शालें, स्कार्फ, टोपियाँ, जुराबें और दस्ताने. कल सारे कार्ड्स पर जून ने पते लिख दिए, नये वर्ष से पहले ही सबको मिल जायेंगे. नन्हे के स्कूल में स्पोर्ट्स मीट चल रही है, कल उसने तीन events में भाग लिया, खेलकूद में उसकी उतनी रूचि नहीं है जितनी पढ़ाई में, जैसे वे भाई-बहन थे बचपन में. आज उसे जून का स्वेटर पूरा करने की पूरी कोशिश करनी है, सो वह उसी क्षण से जुट गयी.

शनिवार, ३ बजे हैं दोपहर बाद के. दो घंटे बाद उन्हें निकलना है, अगले दो घंटों में उन्हें तैयार होना है, नाश्ता खाना है और साथ के लिए पैक करना है. उसने सोचा एक बार अपने साथ बैठकर सभी चीजों का जायजा ले ले, यानि सभी कुछ व्यवस्थित करने के साथ अपने विचारों को भी व्यवस्थित कर ले. सुबह उसकी पड़ोसिन का फोन आया, उसे गुजराती स्टिच सीखना था, उसने बताया तो है पर वापस आकर पुनः बताएगी. एक हफ्ते के लिए घर से दूर जाते वक्त मन थोड़ा सा आशंकित तो है, ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि देगा और खास तौर से उसे कि सही निर्णय ले सके. छोटे-छोटे निर्णय, क्योंकि बड़े-बड़े तो जून के सुपुर्द हैं, उनके सुपुर्द कर दिया है स्वयं को और वह  सक्षम हैं उन्हें हर हाल में सुरक्षित रखने में. सो अब इस डायरी से विदा लेती है, वापस आकर फिर मिलेगी.

Monday, February 4, 2013

चित्रकूट की शोभा



आज कृष्ण जन्माष्टमी है, टीवी पर सुबह भी और दोपहर को भी इसी उपलक्ष में अच्छे कार्यक्रम दिखाए गए. अभी-अभी सोनू देखकर सोया है, जो खुद भी एक नन्हा कन्हैया है, उनका प्यारा सा पुत्र, कितने आराम से सो रहा है, शायद कोई स्वप्न देख रहा है. आज उसका स्कूल बंद है, तभी सुबह से उसका मन लगा है उसके छोटे-छोटे कामों में हाथ बंटाते..कैसे रहेगी वह जब वह हॉस्टल में रहेगा..वह रह तो पायेगा न. यहाँ की तरह कभी घुटनों पर तो कभी हाथों पर चोट लगाकर तो नहीं आयेगा स्कूल से.

पिछले तीन-चार दिनों से..हाँ पिछले गुरुवार से ही घर में कार्य चल रहा है. दिन भर यानि सुबह सात बजे जून के दफ्तर जाने के बाद ही काम करने वाले आ जाते हैं, साढ़े तीन तक रहते हैं, अभी काफी दिन लगेंगे. उसे समझ नहीं आता कहाँ बैठे, वैसे इसमें कोई परेशानी की बात नहीं है, क्योंकि यह काम उन्होंने अपनी इच्छा से ही शुरू करवाया है. जब पूरा घर साफ हो जायेगा, नए पेंट की खुशबू से महकेगा तो यह सारी गड़बड़ी भूल जायेगी, गड़बड़ी यानि अव्यवस्था, इस कमरे का सामान उधर और उधर का इधर..अभी तो ऐसे ही चल रहा है. कल चार पत्र लिखे उसने, पिछले हफ्ते घर से पत्र नहीं आया है इस बार तो आना ही चाहिए, बहुत दिन हो गए हैं.

कल आखिर वह खत आ ही गया, जिसका उसे इंतजार था. पिता ने लिखा है, शब्दों का प्रवाह निर्झर की तरह था, और माँ को भी भाव सुंदर लगे. छोटे भाई ने अभी तक जवाब नहीं दिया है शायद वह ज्यादा ही उदास है. आज ही पिलानी से चिट्ठी भी आ गयी है, रजिस्ट्रेशन हो गया है, जून आज परीक्षा शुल्क भेज रहे हैं. नन्हा आज सुबह बिस्तर छोड़ना ही नहीं चाह रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया..एक बार तो बोला ‘रोज-रोज स्कूल जाते जाते मेरा मन स्कूल से उठ गया है’, वह जानती थी की वह जायेगा अवश्य...सिर्फ कह रहा है, उसका टेस्ट भी हो सकता है आज. घर के अंदर डिस्टेम्पर का कार्य हो चुका है आज बाहर हो रहा है, परसों से अंदर खिड़कियों की पेंटिंग का काम शुरु हो जायेगा. पिता ने लिखा है, चिंतन, अध्ययन और लेखन यूँ ही चलता रहे तो..उसे जरूर गम्भीरतापूर्वक कुछ करना चाहिए इस दिशा में. जून ने खत पढ़ा मगर कुछ नहीं कहा..कविता उनके लिए..इतनी महत्वपूर्ण नहीं है..अपना-अपना स्वभाव है, लेकिन उनका मन जब प्यार करता है तो एक कवि का सा ही लगता है..एक साथ ही वह इतने  भावुक और इतने कठोर हैं. कठोर इस माने में कि वह लोगों पर शीघ्रता से विश्वास नहीं करते..खैर.. उसने यहीं लिखना बंद किया और पत्र लिखना शुरू किया.

आज मौसम ने फिर दरियादिली दिखाई है, सुबह से टप-टप सुनाई दे रही है, नन्हा स्कूल गया है, जरूर उसके स्कूल के मैदान में पानी भर गया होगा, कल रात से जो जल अनवरत बरस रहा है. ग्यारह बजने में कुछ ही मिनट हैं, मन बार-बार रामायण में पढ़ी उन सुंदर पंक्तियों की और जा रहा है जो राम चित्रकूट की शोभा का बखान करते हुए सीता से कहते हैं. सुंदर नीलधर मेघ उच्च शिखरों पर वृष्टि करते हैं फिर मन्दाकिनी की शोभा का वर्णन भी अद्भुत  है, एक सुंदर प्राकृतिक दृश्य आँखों के सामने आ जाता है.






Thursday, January 31, 2013

सपने में ही मैन



आज शनिवार है, यानि जून लंच के बाद घर पर रहेंगे, पर नन्हे का स्कूल खुला है. कल वे तिनसुकिया गए शाम चार बजे, सात बजे लौट तक आये. वहाँ इतना कीचड़ था. मुख्य सड़क पर ही पानी भरा था, गंदा बदबूदार पानी, कितनी बीमारियों के कीटाणु रहे होंगे, फैलते होंगे वहाँ. कोई कुछ करता क्यों नहीं, जैसे वे कुछ नहीं करते. अखबार में एक बूढ़े पिता की अपील पढ़ी, जिसका अंतिम बेटा अस्पताल में है, किडनी का आपरेशन होना है, दो लाख रूपये इक्कट्ठे करने हैं. पढकर सहानुभूति होती है, लेकिन मात्र सहानुभूति तो काफी नहीं. पैसे वैसे ही बहुत खर्च हो गए हैं इस बार, किताबों पर ही सात-आठ सौ रूपये. पैसे के बारे में उसे कभी कोई चिंता नहीं करनी पड़ी. जून ने कभी होने ही नहीं दी. इस मामले में वह बेहद भाग्यशाली है. यूँ तो और भी कई मामलों में है. आजकल रात को उसे स्वप्न बहुत आते हैं, खासतौर पर सुबह के वक्त, जो याद भी रह जाते हैं, नींद शायद ठीक से नहीं आती. दिन में सोना बिलकुल बंद करना होगा. जून भी आजकल सुबह जल्दी नहीं उठ पाते क्या उन्हें भी गहरी नींद नहीं आती, उनके बारे में कुछ न लिखे तो लगता है कुछ छूट गया है क्या यह कर्त्तव्य बोध के कारण है या...बाल्मीकि रामायण का अयोध्या कांड पढ़ रही है आजकल, राम का चरित्र कितना महान दर्शाया गया है, तभी तो आज हजारों साल बाद भी राम नाम इतना पवित्र है, सीता-राम संवाद बेहद सुंदर है.

कल शाम को एक परिचित परिवार आया, काफी देर तक रहे वे लोग, अच्छा लगा. आज बहुत दिनों बाद फिर से समय मिला है स्वयं के पास आने का पर माध्यम बाहरी है. कैसेट बज रहा है, ‘बच्चन की मधुशाला’ और किताब भी वही खुली है कविता की. उसे अपना आप कविता में ही मिलता है शायद. कल मोहन राकेश की कहानी पर बना धारावाहिक देखा, लगता है यह कहानी पढ़ी है उसने. आज मौसम कल से ठंडा है. अभी हवा में शीतलता है दोपहर तक जो गर्मी में बदल जायेगी. लक्ष्मी का स्वास्थ्य अभी भी ठीक नहीं हुआ है, आज अस्पताल गयी है, बहुत कमजोर लग रही थी आज सुबह. लम्बी बीमारी है, अब साल भर ऐसा ही चलेगा शायद.

जुलाई का महीना खत्म होने को है, सुबह टीवी पर देखा, आज श्रावण मास की दूसरी तिथि है. मालपुए बनाने का महीना. किसी दिन बनाएगी जब खूब तेज वर्षा हो रही होगी. आज दस बजे तक ही सब काम हो गया है, देर तक रामायण भी पढ़ सकी. आज धूप अपने पूरे शबाब पर है.. चमकदार.. झनझनाती हुई. नन्हा आज बड़ी बोतल ले गया है पानी की, उसे बहुत प्यास लगती है स्कूल में. कक्षा में पंखे भी तो ठीक से नहीं चलते. उसने आज सुबह एक सपना बताया. बड़ा मजेदार था ‘हीमैन’ का सपना. उसने भी कल किराये के मकान का एक सपना देखा. जून और वह कुछ दिनों पहले बात कर रहे थे कि उन्हें आसाम छोड़कर चले जाना चाहिए और किराये के मकान में रहना चाहिए जब तक अपना मकान  न बन जाये. इसी की परिणति थी यह सपना. लेकिन इतनी सुख-सुविधाओं को छोडकर चले जाना बुद्धिमानी नहीं कही जायेगी. बात जून के विभाग की समस्याओं को लेकर शुरू हुई थी जो हर जगह होती होगी.




Friday, August 24, 2012

पानी में छप छप




कल गणेश पूजा के कारण जून का ऑफिस बंद था, वह घर पर ही थे. नन्हा कल दिन में पानी से खेलता रहा, उसे कितना मना करो पानी में जाना छोड़ता ही नहीं, कितना गर्म था कल मौसम, पर यहाँ के मौसम में ठंड बहुत जल्दी लग जाती है, रात को वह नाक से श्वास नहीं ले पा रहा था, मुँह से श्वास ले रहा था. अभी उसने वाल्मीकि रामायण का पहला सर्ग पढ़ा. आज बादल भी पुनः आ गए हैं, हवा भी बह रही है. पिछले कुछ दिनों से वे रात को भी चावल खाते हैं, यहाँ तो सभी लोग दोनों समय चावल ही खाते हैं, रोटी नाश्ते की वस्तु है. लेकिन रात को चावल खाने का असर तन पर व नींद पर साफ झलक रहा है. कल से ओलम्पिक खेलों की शुरुआत हो रही है. कल विश्वकर्मा पूजा भी है.
उस दिन वह कालोनी में ही एक परिचित महिला द्वारा घर पर चलाए गए ब्यूटीपार्लर में केश कटवाने के लिये गयी थी, उन्हें जुकाम था, एक-दो दिन में उसे भी गले में खराश सी होने लगी. शायद उन्हीं से संक्रमण हुआ हो, पहले हाकी मैच में भारत की हार हो गयी है, आगे क्या होगा आभास होने लगा है.
आज चार-पांच दिनों के बाद उसने डायरी खोली है. वर्षा तेज हो गयी है, पौधों के लिये बहुत अच्छा है, पंजाब, हरियाणा, काश्मीर व उत्तरप्रदेश में भी वर्षा बहुत हो रही है, बाढ़ भी आ गयी है. कैसा अजीब व्यवहार है प्रकृति का, प्रकृति का संतुलन तो मानव ने ही बिगाड़ा है न, भुगतना भी उसे ही होगा. कल दीदी का पत्र मिला और उसने फौरन जवाब भी दे दिया. पिता का पत्र भी आया छोटे भाई का विवाह तय हो गया है, लगता है उसे अकेले ही जाना होगा. मौसम आज भी ठंडा है, नन्हें ने बिस्तर गीला कर दिया है, कपड़े सूखते ही नहीं है, किचन में जो रस्सी लगायी थी वह टूट गयी है. कल शाम जून ने ग्वार की फली की सब्जी बनायी थी. आजकल सुबह टीवी पर साम्बू नामक धारावाहिक शुरू हुआ है, अच्छा है.

अक्तूबर का प्रथम दिन ! आज सुबह नींद बहुत जल्दी खुल गयी थी कौओं की आवाजों से. आज धूप में उसने कारपेट रखे हैं. कल शाम वे जून के दफ्तर गए, कम्प्यूटर पर एक गेम खेला, दूसरे में सोनू परेशान हो गया सो वापस लौट आये. जून सब्जियों के बीज ले आये हैं, माली पहले खाद डालकर क्यारियां बनाएगा. नन्हा अपने में मग्न होकर खेल रहा है बीच बीच में आकर उससे मिल जाता है.
उसे तिथि देखकर याद आया कि आज ही के दिन तीन वर्ष पूर्व जून मोरान गए थे, शाम को उसने फोन क्या उदासी भरा, रात को वह आये, कैसे अनोखे थे वे दिन. शायद पड़ोस के घर से बच्चे के रोने की आवाज आ रही है. उसने झांक कर कमरे में देखा सोनू सुखद नींद में सोया था.