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Friday, August 8, 2014

कान्हा का जन्मदिन


“एहिक विद्या, योगविद्या और आत्मिक विद्या ये तीन प्रकार की विद्याएँ होती हैं. जिनमें से पहली विद्या आजीविका के लिए है, दूसरी मानसिक उन्नति के लिए, तीसरी पर ध्यान कम ही दिया जाता है. इसी का परिणाम है की छात्र जीवन समाप्त होते ही अधिक से अधिक आमदनी वाली नौकरी की तलाश शुरू हो जाती है”. आज बाबा जी बच्चों को सम्बोधित कर रहे थे. आज अपेक्षाकृत उसका सात्विक भाव जागृत है, कल की उहापोह से मुक्ति मिल गयी है, जैसे पौधा जल के बिना मुरझा जाता है वैसे ही इन्सान प्रेम के बिना सूख जाता है, धन-दौलत से भी ज्यादा जरूरी है प्रेम, अहैतुक एकान्तिक प्रेम ! ऐसा प्रेम जो दुराव नहीं करता, क्षमा करना जानता है और जो जीवन को जीवन बनाता है. जून आजकल व्यस्त हैं, कल शाम देर से घर आये बाद में वे एक मित्र के यहाँ गये, उनका घर भी एक अजीब सा मंजर लिए होता है, पर वे वहाँ बिना किसी लागलपेट के, बिना किसी संकोच के बातें करते हैं, हंसते हैं, पुरानी मित्रता है ऐसे ही असमिया सखी के यहाँ जाने पर होता है. आज सुबह छोटे भाई को जन्मदिन की शुभकामनायें दीं, माँ ने दवा लेना अपने आप बंद कर दिया था सो अस्वस्थ हो गयीं थीं, अब ठीक रही हैं पर उनसे बहुत कम देर बात हो पाई, पिता भी घूमने गये थे. उसने सोचा कल सुबह फिर फोन करेगी. कल जन्माष्टमी है उसने व्रत रखने का निश्चय किया है, कल का दिन कृष्ण को अर्पण, कृष्ण जो कितने नामों और रूपों में जग में आते रहे हैं. जिनकी वंशी की मोहक धुन ने सारे ब्रज को ही नहीं सारे विश्व को मोह लिया था, मोह लिया है और मोहती रहेगी. जो अर्जुन के सारथी भी हैं और गुरु भी, वही उसके जीवन के सारथी बन गये हैं.

आज जन्माष्टमी है. जून को आज अवकाश के दिन भी दफ्तर जाना पड़ा है. नन्हा घर पर ही है उसे उसका छोटा सा मन्दिर जिसे आज फूलों से सजाया है अच्छा लगा, वैसे तो कृष्ण उसके मन में हैं उसने उन्हें मानसिक पुष्पों को अर्पण किया है. गीता में सत्व, रज और तम से भी ऊपर उठने का पाठ पढ़ा, स्थितप्रज्ञ होने के वचन को दोहराया. सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ, ग्रीष्म-शीत आदि में सम भाव बनाये रखना है यह भी पुनः पढ़ा.

ईश्वरीय प्रसाद के रूप में वर्षा आज भी बरस रही है, बाहर शीतलता है और भीतर भी. कल दिन भर मन पर सद्विचारों का प्रभाव रहा पर रात को सोते समय कुछ ही पलों में मन कहाँ पहुंच गया. मन की शक्ति अपार है, आवश्यकता है इसका सदुपयोग करने की. काश जितनी तेजी से विचार पनपते हैं उतनी ही शीघ्रता से वे कहीं अंकित भी होते जाते, हजारों मन कागज खप जाता एक मन के विचारों को अंकित करने के लिए. कल रात छोटी ननद का फोन आया, वह नया मकान खरीद रही है, दशहरे में सम्भवतः गृहप्रवेश करेंगे. वे लोग इसी वर्ष उनके पास जायेंगे. उसके घर में माँ पिछले दिनों फिर अस्वस्थ हो गयी थीं. आजकल माँ-पिता दोनों मृत्यु के विषय में अवश्य सोचते होंगे, Tibetan book..पढकर वह भी सोचने लगी है. मरना जीने की शर्त है, उन सभी को एक न एक दिन तो मरना ही है, फिर क्यों न पहले से ही इसके लिए स्वयं को तैयार करें. यह बात जितनी अटपटी लगती है उतनी है नहीं, इन्सान हमेशा तो जिए चला नहीं जा सकता, कहीं न कहीं तो फुल स्टॉप लगाना ही होगा, किसी के जीवन में यह प्रक्रिया सहज भाव से होती है तथा किसी को बहुत दर्द व पीड़ा सहनी होती है. उसकी तो ईश्वर से प्रार्थना है कि मृत्यु लम्बी अस्वस्थता के बाद न हो, उतनी ही प्रिय हो जितना जीवन है. मृत्यु वैसे जीवन का अंत नहीं है पर यदि हो भी तब भी इसमें दुखी होने की क्या बात है, वे हों या न हों यह दुनिया तो वैसी ही रहेगी !
 



Tuesday, April 16, 2013

क्रोशिये की लेस



आज जून का दूसरा पत्र मिला, उसके पत्र कितने संयत हैं मगर कितने नेह भरे. उसकी इसी गंभीरता पर तो वह फ़िदा है. वह अपनी बात अच्छे शब्दों में कितनी आसानी से कह जाते हैं. नन्हा अब ठीक है पर कमजोरी का थोड़ा असर अभी बाकी है, ईश्वर ने चाहा तो कल वह बिलकुल स्वस्थ होगा. वह उसके लिए कैल्शियम टैबलेट्स लायी है और कल से दिन में तीन बार बायोकेमिक दवा भी देनी है. आज उसने भी पापा को एक पत्र लिखा है. आज मकान में मीटर भी लग गया व बिजली भी आ गयी है. दो बल्ब वहाँ लगवा दिए हैं, अब काम शुरू हो गया है तो मई के मध्य तक खत्म भी हो जायेगा फिर बाकी की तैयारी रह जायेगी. माँ ने उसे व नन्हे को उपहार में वस्त्र दिए हैं. 

  आज जून का फोन भाई के यहाँ आया पर उससे बात नहीं हो सकी, उसका समाचार मिल गया, मन को राहत हुई. यहाँ का फोन सुबह से डेड है, पता नहीं कल तक ठीक भी होगा या नहीं. अगर जल्दी ही ठीक हो जाये और तब वे उससे बात कर  सकेंगे. उसको आने में पूरा एक महीना रह गया है. उसने सोचा ..पूरा एक महीना...कैसे बीतेगा गर्मी का यह एक महीना. पिताजी ममेरे भाई की पत्नी की क्रिया में शामिल होने एक-दो दिन के लिए दूसरे शहर गए हैं, एक दिन उनके न रहने से कितनी मुश्किलों का सामना उन्हें करना पड़ा. दो बार माँ को नूना और नन्हे को छोड़कर जाना पड़ा, इतने बड़े घर में अकेले रहना अच्छा नहीं लग रहा था. माँ कड़कती धूप में बिजली वाले को बुलाकर लायीं, यह काम ठेकेदार का था पर वह हमेशा की तरह गायब था. शाम को भाई-भाभी आए, उसने क्रोशिये का गोल रुमाल भाभी को दिया, उन्हें पसंद आया, उसे अच्छा लगा. यू पिन तथा क्रोशिये से रेशमी धागे द्वारा लेस बनाना, ये दोनों काम उसे माँ से सीखने हैं. घिसाई करने से थोड़ा सा साफ फर्श निकल आया है, अच्छा लग रहा है.

   फोन अभी तक ठीक नहीं हुआ, उसने सोचा, शायद आज भी जून ने उससे बात करने प्रयत्न किया हो, जरूर ही किया होगा. आज बिजली ने बहुत परेशान किया, पूरी शाम अँधेरे में बीती, नन्हा शाम को दौड़ते समय गिर गया उसके बाएं घुटने में मामूली खरोंच आ गयी है. शाम को भाई के मकान मालिक उनका निर्माणाधीन मकान देखने आये, बढाई के काम की आलोचना कर रहे थे. शाम को उसे जून की बहुत कमी महसूस हो रही थी, उसे उनके साथ ही आना चाहिए थे, वह उससे कहे तो क्या आ पायेंगे, या जब दिल्ली आएं तो कुछ दिन के लिए ही यहाँ आ जायें. काम करवाने का भी एक ढंग होता है, वैसे तो देर-सवेर सभी काम हो ही जायेगा, पर वक्त पर पूरा हो जाये यह तो जून भी चाहेंगे. हजार तरह की मुश्किलें पेश आती हैं मकान बनवाने में, जो वे वहाँ बैठे-बैठे महसूस ही नहीं कर सकते थे. सबसे बड़ी समस्या अब जो आ रही है वह है बिजली, मीटर शायद ठीक से नहीं लगा है, और सिर्फ एक फेज में होने के कारण सुबह दिक्कत पेश आई. अब देखें कल का सूरज अपने साथ क्या लेकर आता है.  



Thursday, November 1, 2012

देखो मम्मा, चढ़ा बुखार



कल शाम से ही नन्हा कुछ अस्वस्थ लग रहा था, सुबह उठा तो और भी ज्यादा परेशान था, वह उसी के पास बैठी रही, साढ़े ग्यारह बजे निकली, कालेज बंद था सोचा लिफाफे ही खरीद लेगी, खत्म हो गए हैं, कल इतवार है सोच रही है सुबह जल्दी उठकर कपड़े धोएगी, कई दिन से सारा काम माँ पर आ गया है, ननद को बाहर जाना था, वह कल ही वापस आयी है.

पिछले चार दिनों से नन्हे को बुखार चढ़ता-उतरता रहता है, दवा ले रहा है पर उसका असर नहीं हो रहा है, उसका खुद का स्वास्थ्य भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है पर उसकी चिंता अवश्य है. घर का माहौल भी प्रफ्फुलित नहीं रह गया है, सभी के मन जैसे इस जिंदगी ने स्नेह से वंचित कर दिए हैं, नन्हा ठीक था तब वे उसके साथ हँसते-खेलते थे.
आज वह नन्हे की रिपोर्ट लेने गयी थी, डाक्टर ने रक्त की जाँच करने को कहा, दवा बदल दी है. कल से उसका ज्वर तेज नहीं हुआ है. कल कालेज गयी थी, लाइब्रेरी से किताबें बदलनी थीं. उनसे कुछ नोट्स बनाने हैं, पूर्णिमा मैडम बहुत सहयोगी स्वभाव की हैं, सुधा मैम उतनी ही अक्खड़.

सुबह स्वयं नहाकर फिर सोनू को उठाने आयी, थर्मामीटर लगा रही थी कि सुनील (इसी मकान में रहने वाला दस-बारह साल का बच्चा) ने आकर बताया, भैया आए हैं, वह जानती थी जून जरूर आएंगे, अगले ही पल सीढ़ियों पर चिर-परिचित आवाज जूतों की और वह  अपने हाथ में सूटकेस लिए कमरे में आ रहे थे, वह खुश थी उस क्षण और भय भी था...दुःख था ही,  नन्हे का थर्मामीटर निकालते-निकालते उसकी ऑंखें बरस पडीं, कितने दिनों से आँसू बहना चाहते थे और आज वह आए हैं इतनी दूर से, जिन्हें उन आंसुओं की कद्र थी. नन्हे को देखकर वह भी उदास हो गए, पर अब सब ठीक हो जायेगा, कल उन्हें राजस्थान जाना है दस दिनों के लिए, जब तक लौटेंगे सब सामान्य हो चुका होगा. दोपहर को वे उन्हें लेकर मार्केट गए, उसे दो बेहद सुंदर साड़ियां उपहार में दिलायीं और नन्हे के लिए भी एक ड्रेस खरीदी.

जून किसी काम से बाहर गए हैं, कह गए थे दो-ढाई बजे तक आएंगे, वह जानते नहीं कि हर पल कोई उनका इंतजार करता होगा. अभी-अभी उनका एक पत्र मिला तब उन्हें पता नहीं था कि वह यहाँ आ सकेंगे, आज डीलक्स से दिल्ली, फिर वहाँ से जोधपुर तथा आगे फील्ड, दस दिन बाद एक दिन के लिए पुनः यहाँ और फिर वापस असम. उसने कल्पना में देखा कि परीक्षाओं के बाद वह नन्हे को लेकर अपने माँ-पिता के यहाँ गयी है, वहीं उसे लेने जून आए हैं, फिर वे सब अपने घर गए हैं और जीवन पूर्ववत् हो गया है, खूब घूमना...कहानियाँ पढ़ना.. खूब सारे पानी से जी भर कर नहाना...सब तरह की दालें बनाना..और भी कई काम, जिंदगी में सभी कुछ एक साथ तो नहीं मिल जाता है, कभी धूप कभी छाँव, कभी प्यार तो कभी इंतजार...कभी मिलन तो कभी बिछड़ना..पर अब और नहीं बिछड़ना.

अभी-अभी वह चले गए, कल सुबह आए और आज शाम चले गए पर इस एक रात और दो दिनों में कितना-कितना स्नेह भर गए हैं, उसने वादा किया कि कभी उदास नहीं होगी, उन्हें भी मालूम है और उसे भी की उनकी याद कितनी आयेगी और कभी रुला भी जायेगी लेकिन उनका आना उसे बहुत अच्छा लगा, इतने दिनों से एकाकी मन जो एक ख़ामोशी से भर गया था, उसे तोड़ना कितना सुकून दे गया. कितनी खुशी से भर गया, जो इतनी दूर थे, जिन्हें वह रोज बुलाती थी, वह उसकी आवाज सुनकर एक सच्चे मित्र की तरह उनके पास आ गए. नन्हा भी बहुत खुश है वह जल्दी ठीक हो जायेगा अब. कुछ दिन बाद फिर आएंगे अब उसका समय उसी दिन के इंतजार में कटेगा.

सोनू आज सुबह से उठा है तभी से बहुत परेशान सा है, बात-बात पर रो देता है, दूध नहीं पीना...ब्रश नहीं करना..चाय भी नहीं..और बिस्किट भी नहीं...हर बात में नहीं और ज्यादा कहने पर सिसकियाँ लेकर रोना, उसे लगता है पापा की याद आ रही है. जब तक वह आएंगे तब तक तो बिल्कुल ठीक हो जायेगा, कितना कमजोर हो गया है, पर ठीक होकर पुनः दौडेगा पहले की तरह छत पर, फिर अपने घर में.. वह सोच रही थी आज कालेज जायेगी, पर अब मुश्किल लगता है. बहुत दिनों का गैप हो गया है उसका, अब तो लगता है सब खुद ही पढ़ना होगा. अगर अच्छे नम्बर नहीं भी आए तो कोई बात नहीं, नन्हे से बढकर कुछ नहीं उसके लिए. उसे छोड़कर तो नहीं जा सकती.



Wednesday, April 11, 2012

यह कैसी मजबूरी


आज फिर वह मोरान गया है, शाम को लौट आयेगा. कल ही जाना था पर नूना के कारण उसे मना कर देना पड़ा. उसने कहा कि जनवरी में एक महीने के लिये उसे फील्ड में रहना पड़ सकता है तो नूना को वाराणसी में छोड़कर आयेगा. कहने में यह बात जितनी सीधी और आसान लगती है उतनी है नहीं, नूना ने कह तो दिया कि ठीक है वह रह जायेगी, पर किस तरह रह पायेगी और वह भी तो उसे अपने से दूर नहीं रखना चाहता. देखें क्या होता है उसने सोचा. यदि वह हर हफ्ते आकर उससे मिल जाये तो वह यहाँ अकेले रह सकती है. वह उसे फोन तो करेगा ही, दिन में दो चार बार न सही एकबार ही सही. पर वाराणसी और असम के मध्य तो काफ़ी दूरी है.
दोपहर को उसकी एक बंगाली मित्र मिलने आयी थी, वे दो घंटे साथ रहे. कुछ ही दिनों में वह यहाँ से जाने वाली है. फिर वह अकेली रह जायेगी ऐसे दिनों में जब जून घर पर नहीं रहता है. रात आठ बजे तक वह आयेगा, उसकी तबीयत आज ठीक है दवा लेना भूल गयी थी याद आया तो उसने दवा ली और खाना बनाने में व्यस्त हो गयी.
 

Thursday, March 15, 2012

लाल मिर्च


उस दिन नूना के पैर की अंगुली में चोट क्या लग गयी, जून ने उसे कहा, पलंग पर बैठ जाओ. वह खुद किचन में गया है, भोजन लाने. आज वह मोरान भी नहीं गया. उसे अकेला छोड़कर जाना उसे जरा भी अच्छा नहीं लगता. दवा लगा कर पट्टी भी बांध दी है. उसका यह स्नेह देखकर कभी कभी उसे लगता है क्या वह इसके योग्य भी है. पर अगले ही पल वह सोचती है अगर वह न होती तो उसका प्रेम किस तरह प्रकट हो पाता. आज वे एक अच्छी सी श्वेत-श्याम फिल्म देखने गए, ‘दोस्ती’. गीत बहुत मधुर थे. मुहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज का तो कहना ही क्या. दोपहर को उनकी तेलुगु मित्र आयीं थीं, शाम को दक्षिण भारतीय भोजन का निमंत्रण देने. वे गए थे और दोसे के साथ लाल मिर्च के पाउडर की चटनी पहली बार देखी.
आज वह पिता से उपहार में मिले पार्कर पेन से लिख रही है, जब उन्होंने दिया तो उसने कहा इतना महंगा पेन, वे बोले, तुम भी तो महंगी हो, और वह उनका मुख देखती रह गयी कुछ न कह सकी. उसने सभी को पत्र भी लिखे. रेडियो पर गाना आ रहा है, 
जब शाम का आंचल लहराए
और सारा आलम सो जाये
तुम मुझसे मिलने शमा जलाये
ताजमहल में आ जाना

उन्होंने स्वेटर निकाल लिए हैं और स्नान भी गर्म पानी से शुरु कर  दिया है. कल वे डॉक्टर के पास भी गए थे. कुछ दिनों में पता चलेगा कि उनके जीवन में क्या कोई गुल खिलने वाला है. पिछले दिनों वे इस बात को लेकर भी कुछ परेशान थे पर अब नहीं हैं. वे दोनों तो इस दिन को लेकर कितने सपने भी देखते थे.