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Monday, October 15, 2018

लहर और बादल



आठ बजने को हैं. आज भी मौसम ठंडा ही रहा. बदली बनी रही. वे अभी-अभी बाहर टहल कर आये हैं. आकश पर सफेद बादलों के मध्य पूर्णिमा से एक दिन पूर्व का सुंदर चाँद चमक रहा था. कल यहाँ लक्ष्मी पूजा का उत्सव है, उत्तर भारत में दीपावली के दिन यह उत्सव होता है. यहाँ उस दिन काली की पूजा होती है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. बच्चों द्वारा रंगे कुछ सुंदर दीए खरीदे. कम्प्यूटर ठीक हो गया है, ब्लॉग पर नई पोस्ट प्रकाशित की. कल सुबह डिब्रूगढ़ डाक्टर के पास जाना है, जून के घुटने में दर्द है.
शनिवार व इतवार कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इस समय शाम के चार बजे हैं. जून एक दिन के लिए आज देहली गये हैं, देर शाम तक पहुंचेंगे, परसों लौटेंगे. परसों शाम उन्होंने यूरोप के सभी चित्र टीवी की बड़ी स्क्रीन पर दिखाए, भव्य इमारतें और सुंदर बगीचे. कल शाम को वह थोड़ा परेशान हो गये थे जब उसने कहा कि काजीरंगा जाने का समय वह केवल अपने लिए तय कर सकते हैं, अन्यों के लिए नहीं. बाद में उसे समझ में आ गया कि अपने-अपने संस्कारों के वशीभूत होकर वे क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं. उसके बाद उनके मध्य पुनः सकारात्मक ऊर्जा बहने लगी. ऊर्जा का आदान-प्रदान सहज होता रहे, यही तो साधना है. सुबह वे घर में ही कुछ देर टहले, डाक्टर ने उन्हें दो दिन आराम करने को कहा है, आज वह अपना घुटना आराम से मोड़ पा रहे थे. उनकी कम्पनी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कितना सहायक सिद्ध हुआ है, उसका मन कृतज्ञता से भर गया. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से ईमेल आया, टीचर्स की जानकारी थी. अब वे उनके लिए भली-प्रकार योजना बना सकते हैं. वे इस समय जहाँ खड़े हैं, वहाँ से उन्हें आगे लेकर जाना है. उसने क्लब की एक परिचित सदस्या को, जो असमिया लेखिका भी है, प्रेरणात्मक वक्तृता के लिए कहा है.
आज सुबह वह उठी तो आँखें खुलना ही नहीं चाहती थीं, कुछ देर के लिए ऐसे ही बैठ गयी, बाद में सुदर्शन क्रिया करते समय भी अनोखा अनुभव हुआ. शांति की अनुभूति इतनी स्पष्ट पहले कभी नहीं हुई थी. वह इस देह के भीतर प्रकाश रूप से रहने वाली एक ऊर्जा है जिसके पास तीन शक्तियाँ हैं, मन रूप से इच्छा शक्ति, बुद्धि रूप से ज्ञान शक्ति तथा संस्कार रूप से कर्म करने की शक्ति. यदि ज्ञान शुद्ध होगा, तो इच्छा भी शुद्ध जगेगी, और उसके अनुरूप कर्म भी पवित्र होंगे. उनके पूर्व के संस्कार जब जगते हैं और बुद्धि को ढक लेते हैं तब मन उनके अनुसार ही इच्छा करने लगता है. हर संस्कार भीतर एक संवेदना को जगाता है, उस संवेदना के आधार पर उनका मन विचार करता है. यदि संवेदना सुखद है तो वह उस वस्तु की मांग करने लगता है, यदि दुखद है तो द्वेष भाव जगाकर विपरीत विचार करता है. अपने संस्कारों के प्रति सजग होना होगा तथा नये संस्कार बनाते समय भी जागरूक होना होगा. वे स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं. वह ऊर्जा ही इस देह पुरी का शासन करने वाली देवी है, उसे स्वयं में संतुष्ट रहकर इस जगत में परमात्मा की दिव्य शक्ति को लुटाना है.
आज स्कूल जाने के लिए तैयार हुई पर ‘बंद’ के कारण नहीं जा सकी, बच्चे शायद उसकी प्रतीक्षा करते होंगे, सोचकर एक पल के लिए मन कैसा तो हो गया पर ज्ञान की एक पंक्ति पढ़ते ही स्मृति आ गयी और शांति का अनुभव हुआ. वे स्वयं को ही भूल जाते हैं और व्यर्थ के जंजाल में पड़ जाते हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है और वे उसे शब्दों में ढूँढ़ते हैं. करने को कितना कुछ है, दीपावली का उत्सव आने वाला है, एक सुंदर सी कविता लिखनी है.

सागर की गहराई में शांति है,
अचल स्थिरता है, हलचल नहीं..
लहरें जो निरंतर टकराती हैं तटों से,
उपजी हैं उसी शांति से..
भीतर उतरना होगा मन सागर के
आकाश की नीलिमा में भी बादल गरजते है,
टकराते हैं, उमड़ते-घुमड़ते आते हैं और खो जाते हैं !
आकाश बना रहता है अलिप्त.
पहचानना है लहर और बादल की तरह मन के द्वन्द्वों को
जो जीवन का पाठ पढ़ाते हैं.
लहर और बादल को मिटने का दर्द भी सहना होगा
अवसर में बदलना होगा चुनौतियों को
और पाना होगा लक्ष्य-शाश्वत सत्य !   

Monday, March 19, 2018

लहरों बिन सागर


दो दिनों का अन्तराल ! शाम के चार बजने वाले हैं. जून अभी नहीं आये हैं. दोपहर को उनसे किसी विषय पर मतभेद हो गया, यह आवश्यक तो नहीं कि जो भाव किसी भी विषय को लेकर उसके मन में हों, वे उनके मन में भी हों. वैसे भी दोपहर को वे भोजन के लिए आते हैं, कुछ ही समय उसके बाद आराम के लिए मिलता है, जिसे शांति से व्यतीत करना चाहिए. आज सुबह समय पर उठे, तारों की छाँव में प्रातः भ्रमण को गये, लौटकर प्राणायाम किया. बंगलूरू से आई मोटी पीली सूजी का मीठा नाश्ता बनाया. व्हाट्सएप पर संदेशों का आदान-प्रदान किया. विश्व विकलांग दिवस के कार्यक्रम के लिए मृणाल ज्योति के बच्चे क्लब में रिहर्सल कर रहे हैं, जिसे देखने गयी. कल भी रिहर्सल होगी, परसों तो कार्यक्रम ही है, दिन भर व्यस्तता बनी रहेगी. बड़े भाई का जन्मदिन है आज, उन्हें शुभकामनायें दीं. कल उनके लिए एक कविता लिखी थी, शायद पढ़ ली होगी अब तक. मंझले भाई की बिटिया को दिल्ली में जॉब मिल गयी है, वह खुश है, इसलिए फेसबुक पर उसकी एक पोस्ट को सराहा भी. वे सुख बाँटना चाहते हैं और दुःख में सिकुड़ जाते हैं. छोटी बुआ के साथ भी उसके संबंध पहले से मधुर हो ही जाने वाले हैं, प्रेम कभी मरता नहीं ! आज नूना के फोन का कवर भी आ गया है, अब सुरक्षित हो गया है फोन.

आज सुबह नींद खुली तो एक स्वप्न देख रही थी, पता चला कि खुद ही बना रही थी. स्वप्न यदि वे स्वयं गढ़ें तो वे उनके लिए सुखद ही होंगे, दुःस्वप्न तो नहीं होंगे, वैसे दुःस्वप्न भी वे ही बनाते हैं पर जब असजग होते हैं तब ! प्रातः भ्रमण के समय जून ने कहा, कल रात देहली से आये एक फोन ने उनकी नींद ही बिगाड़ दी, इस बात पर तो उसने उन्हें स्वयं को जानने के लिए एक पूरा वक्तव्य ही दे डाला. ध्यान के लिए उन्हें उकसाया, पता नहीं इसका उन पर कितना असर हुआ, पर उसके सामने बहुत कुछ स्पष्ट होता गया. स्नान के बाद जैसे भीतर से कोई पढ़ाने लगा. प्रकृति, पुरुष, परमात्मा, आत्मा, मन, बुद्धि, संस्कार के आपसी संबंध ! वे जो वास्तव में हैं, उसको जानने के बाद जीवन एक खेल बन जाता है, एक आनंदपूर्ण अवस्था..कल रात को सोने से पूर्व अष्टावक्र गीता का एक श्लोक सुना, अद्भुत है यह ज्ञान..वास्तव में उन्होंने न कभी कुछ किया है न करेंगे, वे साक्षी मात्र हैं. सागर की सतह पर उठती-गिरती लहरें ही तो सागर नहीं हैं, अम्बर पर उड़ते मेघ जैसे आकाश नहीं है, वह विशाल है, अनंत है, अचल है, सदा है, फिर चिंता व दुःख किस बात का ? अभी कुछ देर में ड्राइवर आने वाला होगा, आज भी क्लब जाना है, कल की तैयारी आज भी वहाँ चल रही होगी.  

उस दिन सुबह, दोपहर, शाम सभी मृणाल ज्योति के नाम थी. अगले दिन एक शादी में जाना था. तीसरे दिन दोपहर को आल्मारी सहेजी और शाम को महिला क्लब की मीटिंग थी. कल तो इतवार था ही, शाम को सामाजिक शिष्टाचार निभाने वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, दोपहर को बच्चों की संडे क्लास. चार दिन पलक झपकते गुजर गये. आज जून को तीन दिनों के लिए देहली जाना है. उसे साधना के लिए अधिक समय मिलेगा. आजकल प्रतिपल आत्म स्मरण बना रहता है. आज सुबह स्वप्न था या ध्यान या तंद्रा, किसी ने कहा, तुम परमात्मा से प्रेम करती हो, यह सही नहीं है. तुम विशेष स्वाद से प्रेम करती हो. विशेष भोजन के प्रति उसकी यह आसक्ति शायद ठीक नहीं है. आसक्ति किसी भी वस्तु के प्रति ठीक नहीं है, पर यह निषेध की भावना, यह द्वंद्व उसका स्वयं का ही बनाया हुआ है. भोजन तो भोजन है, शायद यह उसका अज्ञान है जो भोजन के प्रति इतनी सावधानी रखना वह नहीं चाहती. साधक को तो सभी प्रकार की कामनाओं से ऊपर उठना ही होगा, यदि वह आगे बढ़ना चाहता है. अभी तक की उसकी साधना जहाँ तक ले आई है, वही तो लक्ष्य नहीं है. अभी तो मंजिलें और भी हैं ! दूर है वह परमात्मा का शांति धाम..हल्के होकर वहाँ जाना है, अभी भी आवाज ऊंची हो जाती है. अभी भी ‘न’ सुनने पर भीतर कुछ कम्पन होता है एक क्षण के लिए ही सही, अभी अखंड आनंद का वरदान फलित नहीं हुआ है. अनंत है आकाश और अनंत है उनकी सम्भावनाएं !  

Friday, April 28, 2017

चीजलिंग का नाश्ता


आज सुबह एक स्वप्न देखा, पिछले दिनों भी कई अद्भुत स्वप्न देखे पर सुबह उठकर याद नहीं रहे, लिखा नहीं कुछ. कल देखा, एक विशाल नदी है, सागर जैसी. किनारे पर एक संकरी गली है, उसमें वह जाती है, एक गेंद जैसा हाथ में कुछ है, जो गिरकर दूर तक निकल जाता है. एक बच्चा उसे वहाँ से फेंक देता है जो नदी के किनारे के दलदल में गिर जाती है, वह उसे पकड़ने नदी में उतरती है गेंद को पकड़ते समय लहरों में आगे खींच ली जाती है. किनारे के लोग कहते हैं, डूब रही है, पर वह बड़े आराम से लहरों को पार करते-करते दूसरे किनारे पर पहुंच जाती है. आज पिताजी को डिब्रूगढ़ जाना था, वह लम्बी यात्रा से थक जाते हैं. आज दो सदस्याओं  के लिए लिखी विदाई कविताएँ टाइप कर लीं थीं. जून ने उनके लिए बहुत सुंदर कार्ड बनाये हैं.

पिछले दो दिन नहीं खोली डायरी. परसों से पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. दो दिन देशव्यापी बंद भी रहा. जून घर पर ही थे. सुबह वे टहलने नहीं गये, शाम को जाना है. फूलों का दर्शन भी करना है. गेस्ट हॉउस व क्लब में फूलों का मेला लगा है. सुबह उठे तो पिताजी बिस्तर पर नहीं थे, वे दोनों पानी पी रहे थे कि जोर की आवाज आई. जून दौडकर गए, बाथरूम का दरवाजा बंद था अंदर से उनकी आवाज आयी, गिर गये हैं, पर ठीक हैं, अभी दरवाजा खोलते हैं, पर दो-तीन मिनट बीत गये, फिर दुबारा पूछा तो बोले, खोलते हैं, रुको. दो-तीन मिनट और बीते तब दरवाजा खोला. उनके सिर पर बाएं ओर चोट लगी थी, हल्का गुलाबी रंग हो गया था, पर खून नहीं निकला था. उन्हें बिस्तर पर लिटाया. वे सो गये. कुछ देर बाद उन्हें उठने के लिए कहा तो मना करने लगे. फिर दर्द के कारण जब सिर को दबाया तो खून निकल आया. उन्हें अस्पताल ले गये, पट्टी बांध दी है और दवा भी दी है. अब नाश्ता करके बाहर बैठे हैं, धूप उन्हें अच्छी लग रही है. आजकल वह अपने को बहुत दुर्बल मानने लगे हैं, बात-बात पर उनकी आँखें नम हो जाती हैं. वृद्धावस्था व्यक्ति को विवश कर देती है. अभी फरवरी चल रहा है पर धूप में तेजी आ गयी है.

फिर तीन दिनों का अन्तराल. आज पिताजी का सी टी स्कैन हुआ. सोमवार को रिपोर्ट मिलेगी. जून कल दिल्ली जा रहे हैं, बुध को डाक्टर को मिलते हुए लौटेंगे. उनकी किडनी में शायद कुछ समस्या हुई है. उम्र ज्यादा होने पर शरीर के अंग अपनी कार्य क्षमता खो बैठते हैं. कल शाम बंगाली सखी की दीदी आयी थीं, उनके लिए एक कविता लिख भेजी है, उन्हें अच्छी लगी. जून सुबह से पिताजी के साथ ही थे अस्पताल में, अब दफ्तर गये हैं. बड़ी ननद की बड़ी बेटी ने पुत्र को जन्म दिया है. दुनिया इसी तरह चलती जा रही है. उसका अंतर परमात्मा के प्रेम से लबालब भरा हुआ है ! उसका साथ कितना मधुर है. जगत भी सुंदर है तो उसी के कारण, क्योंकि जो चेतना उसमें है वही सबमें है, सब उसी के कारण जीवंत हैं.


शाम के पौने पांच बजे हैं, अभी आकाश में सूरज का उजाला है, विदा लेते हुए सूरज का अंतिम उजाला. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, उन्हें मूड़ी व चीजलिंग गर्म करके दिए उसमें काला नमक व काली मिर्च डालकर, पसंद आये, पिछले दो दिनों से ब्लॉग पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया. लिखने की कोई वजह नजर नहीं आती, मन ध्यान में डूबा रहना चाहता है.

Friday, October 14, 2016

बगीचे में झूला


आज बसंत पंचमी है. सुबह मृणाल ज्योति में पूजा में सम्मिलित हुई और दोपहर बाद एक सखी के यहाँ हवन में, पहले सत्य नारायण की कथा भी थी. बच्चों की कहानी सी लगती है. भगवान भी बात-बात पर रूठ जाते हैं, फिर प्रसन्न हो जाते हैं, भोले-भाले लोगों के भगवान भी तो वैसे ही होंगे, लेकिन पूजा करने से बाहरी वातावरण सात्विक बन जाता है. मन के भीतर भी तरंगें पहुंचती हैं और वातावरण सात्विक होने में मदद मिलती है. हर कोई अपनी-अपनी समझ से काम करता है, जो जैसा करता है वैसा ही भरता है. यदि कोई घबरा कर कोई शब्द बोल रहा है तो वह घबराहट का संस्कार ही बना रहा है और यदि कोई दूसरों के व्यवहार पर कोई निर्णय दे रहा है तो वह भी एक संस्कार बना रहा है. आज सुबह उसे बिजली के उदाहरण से आत्मा, मन व बुद्धि का भेद स्पष्ट हुआ. आत्मा जिसके साथ जुड़ जाती है उसी का रूप धर लेती है. जैसे विद्युत हीटर के साथ जुड़कर गर्मी का, एसी में ठंड का, टीवी में आवाज व चित्र का तथा विभिन्न उपकरणों में विभिन्न रूप, वैसे ही उनके भीतर की ऊर्जा भिन्न-भिन्न भावों, विचारों तथा धारणाओं के रूप में व्यक्त होती है. जब यह परमात्मा के साथ जुड़ जाती है तब उसी के रूप में स्वयं को जानती है. शेष सब बाहर की यात्रा में काम आते हैं और अंतिम भीतर की यात्रा में !

आज ध्यान में सुंदर अनुभव हुआ. जब, वे जब चाहें तब अपने-आप में स्थित हो पाते हैं तभी मानना चाहिए कि साधना में गति हो रही है. मन में यदा-कदा इधर-उधर के व्यर्थ संकल्प उठते हैं पर वे सागर में उठी लहर, बूंद या बुदबुदों से ज्यादा कुछ नहीं. सागर का उससे क्या बिगड़ता है, उसी की सत्ता से वे उपजे हैं और उसी में लीन हो जाने वाले हैं. इस ज्ञान में स्थिति बनी रहे तो मन व बुद्धि से मैल की परत छूटने लगती है, झूठ बोलने का जो संस्कार है, जड़ता का जो संस्कार है, अहंकार का जो संस्कार है और ईर्ष्या का जो सबसे गहरा संस्कार है, इन सबसे मुक्त होना है. इन्हें मानकर यदि स्वयं की सत्ता दी तो मुक्त होना असम्भव है. सद्गुरु कहते हैं कि माने सत्य ही उसका संस्कार है. उत्साह व जोश ही उसके भीतर कूट-कूटकर भरे हैं. इर्ष्या तो उसे छू भी नहीं गयी, क्योंकि उसे ज्ञात हो गया है कि नदी-नाव संजोग की तरह लोग आपस में मिलते हैं, मोह के कारण संबंध बना लेते हैं, फिर बिछड़ जाते हैं. उनके साथ मृत्यु के बाद कोई जाने वाला नहीं है, केवल परमात्मा ही उनके साथ रहेगा और रहेंगे उनके कर्म. आज वर्षा के कारण पुनः ठंड हो गयी है. जून को देहली जाना है. चार दिन बाद पिताजी को साथ लेकर आयेंगे. एक सखी ने बगीचे में लगाने के लिए झूला माँगा है, प्रतियोगिता में भाग ले रही है. उनके बगीचे में फूल अब कम हो गये हैं. माँ उठकर बाहर जा रही हैं, फिर लौट आई हैं, शायद देखने गयीं थी, पिताजी बैठे हैं या नहीं.

बादल आज भी बने हैं, ठंड बढ़ गयी है. शाम को जो कविता लिखी थी, ज्यादा लोगों ने नहीं पढ़ी, आत्मा को चाहने वाले ज्यादा नहीं हैं. सुबह एक स्वप्न देखकर नींद खुली. एक सखी का भाई घर से भागकर यहाँ आया है. रातभर उनके बरामदे में लिनन बॉक्स में बैठा रहा. सुबह जैसे ही वह दरवाजा खोलकर बाहर आयी तो उसने बताया. स्वप्न कितना सत्य प्रतीत हो रहा था. रात भी मन ने एक स्वप्न बुना और तभी समझ में आ गया यह स्वप्न है. इसी तरह उनका जीवन भी एक स्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है, उनका अतीत तो स्वप्न बन ही चुका है, भविष्य एक स्वप्न है ही पर वर्तमान का यह दौर भी स्वप्न ही है. अब कोई पढ़े या नहीं क्या फर्क पड़ता है क्योंकि सोये हुए लोगों की बात का क्या आदर और क्या अनादर, सत्य इस सबके पीछे छिपा है. झलकें मिलने लगी हैं पर पूरा सूर्य अभी नजर नहीं आया है, यह कामना भी छोडनी होगी, साधो सहज समाधि भली !       




Wednesday, October 12, 2016

लाल चौक पर तिरंगा

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कल गणतन्त्र दिवस है. बीजेपी काश्मीर में लाल चौक पर तिरंगा फहराना चाहती है. उत्तरपूर्व के कई उग्रवादी संगठनों ने इसे न मनाने का फैसला किया है. उनकी अपनी समझ है. अलगाववादी गुट हजारों वर्षों के इतिहास को झुठला कैसे सकते हैं, वे ही जानें. जून ने सुबह उसका नाम डेंटिस्ट के पास लिखवा दिया था और गाड़ी भी भेज दी थी. वह बहुत ध्यान रखते हैं उसका. कल वे पहले नेहरु मैदान में फिर टीवी पर परेड देखेंगे, घर पर भी तिरंगा फहराएंगे. सुबह रामदेवजी का जोशीला भाषण सुना. देश जाग रहा है, परिवर्तन की लहर सब ओर दिखाई दे रही है, देश के लिए एक भावना लोगों के मनों में घर कर रही है. 

लॉन में हरी घास पर धरा का कोमल स्पर्श पाकर ( मकर आसन में ) लिखना एक नितांत सुंदर अनुभव है, जब कुनकुनी धूप बरस रही हो. स्वर्गिक, अलौकिक अनुभव कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. फूलों की कतारें हैं, हरियाली है और है सन्नाटा जिसे चीरता है पंछियों का कलरव! आज सुबह भी सुंदर वचन सुने, ब्रह्म मुहूर्त में आत्मा के विषय में सुनना भी प्रभु की अनंत कृपा का फल है. उन्हें कल एक फिल्म देखने जाना है, नन्हे के एक मित्र की कंपनी ने मॉल तथा उसमें स्थित पिक्चर हॉल का रिव्यू करने का काम उन्हें सौंपा है, टिकट के पैसे वे देंगे. कल उसने स्वर्गीय फुफेरे भाई की भेजी कविता ब्लॉग पर डाली. कल वह बहुत याद आ रहा था. बचपन में वह बहुत गोरा था, पारदर्शी त्वचा और नाजुक भी बहुत था. खांसता रहता था, सब उसे बुड्ढा कहते था. बड़ा हुआ तो किशोरावस्था भी देर से आयी, इलाज करने के बाद, लम्बा बहुत हो गया और दुबला भी..उसने मन ही मन प्रार्थना की जहाँ भी वह होगा उसे शुभकामनायें पहुंच ही जाएँगी.

आज सुबह ध्यान में सागर और लहर का संबंध स्पष्ट हुआ. वे एक अनायास उठी हुई लहर से ज्यादा कुछ भी नहीं, इस अनंत ब्रहमांड के सामने एक धूल के कण से भी छोटे हैं, पर जब वे उस सागर के साथ अपनी एकता का अनुभव कर लेते हैं, तब अहंकार उन्हें दुःख नहीं देता, जैसे बंधन उनका ही बनाया हुआ है, मुक्ति भी उन्हें ही खोजनी है. जानने के बाद ही पता चलता है कि वे कुछ भी नहीं जानते. मिलने के बाद ही पता चलता है कि अभी कितने दूर हैं. वर्तमान में रहें तो कोई बात ही नहीं करने के लिए, ज्ञान में रहें तो कुछ कहने के लिए बचता ही नहीं, ध्यान में रहें तो जगत के लिए कहने लायक क्या शेष रह जाता है. सेवा के सिवा करने को भी क्या है ! 

फरवरी का पहला दिन ! इसी महीने पिताजी यहाँ आ रहे हैं, जून देहली जा रहे हैं, उन्हीं के साथ आयेंगे. आज ब्लॉग पर हास्य कविताएँ पोस्ट कीं. कुछ लोगों की कविताएँ उसे समझ नहीं आतीं, जटिल मन की जटिल कविताएँ ! ध्यान में मन सरल हो जाता है, सहज जैसे प्रकृति के शांत रूप, लेकिन प्रकृति कभी विकराल रूप भी धर लेती है. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसने कविता लिखी, बड़ी भांजी, छोटा भांजा, भाभी-भैया व एक सखी के लिए भी, इसी महीने सभी का खास दिन है. जून आफिस से प्रिंट करके लायेंगे. उसके सिर में हल्का सा भारीपन है, दोपहर से लिखने में लगी है, शायद इसीलिए..अभी फूलों का गुलदस्ता बनाना है, जून भी आने वाले होंगे. 




Tuesday, September 13, 2016

दर्पण में प्रतिबिम्ब


पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली. आजकल कितनी ही पंक्तियाँ सहज ही मन में आती हैं पर उस वक्त लिखने की सुविधा नहीं होती, बाद में भूल जाती हैं..पर उस क्षण तो वह स्वान्तः सुखाय कुछ रच ही लेती है ! परसों कुछ पंक्तियाँ मन में आ रही थीं-

जीवन एक मौका है
बीज से वृक्ष बनने का
बूंद से सागर और कली से पुष्प
होने का..
मिटना होगा बीज को इस प्रयास में
खोना ही होगा अपना आप बूंद और कली को भी
चूक जाते हैं हम इसी मोड़ पर
‘हमीं’ बनकर पाना चाहते हैं
आकाश की ऊँचाइया
बने रहकर पूर्ववत्
पा सकेंगे क्योंकर
वृक्ष सी विशालता, गहराई सागर सी
सौन्दर्य फूल का..स्वयं बने रहकर
छोड़ दें ‘हम’ होने का लोभ
हो जाएँ रिक्त अपने आप से
तो भीतर जो अनछुआ बीज है
वह पनपेगा..
बूंद बह चलेगी सरिता बनकर 
सागर की तलाश में
और सुप्त कलिका स्वप्न देखेगी प्रस्फुटन का..

पिछले तीन दिन फिर यूँ ही निकल गये और डायरी नहीं खोली. अभी दीदी का ब्लॉग देखा, उनका ब्लॉग पहली बार इतने लोगों ने पढ़ा, जीजाजी भी प्रसन्न होंगे, दीदी इतना अच्छा लिख रही हैं. पंजाबी दीदी का भी जवाब आया है, वह सदा ही तारीफ करती हैं उसकी कविता की. जून आज फिर पिताजी को अस्पताल ले गये, कुछ दिनों से उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उन्हें कुछ दिन दवा लेनी होगी. माँ का हाल वही है, उन्हें आजकल दिन में लेटना जरा नहीं भाता, बैठे-बैठे थक जाती होंगी पर कहने पर भी लेटना नहीं चाहतीं. आज उनके पड़ोसी जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर भी हैं, मृणाल ज्योति गये हैं, वह अध्यापिकाओं को ध्यान, प्राणायाम आदि के बारे में कुछ बतायेंगे. सद्गुरु भी यही चाहते हैं. आज सुबह ध्यान में उनकी आवाज सुनी, जो उसकी स्मृति में सुरक्षित है, अर्थात यह मन का ही खेल है. लेकिन प्रकाश के वे स्तम्भ तो मन का खेल नहीं हो सकते, उनकी उपस्थिति को वह बिलकुल स्पष्ट अनुभव करती रही है. परमात्मा और गुरू में कोई भेद नहीं है, वह सर्वव्यापी चेतना एक ही है, वह सदा उनके साथ है. इस अनुभव के बाद अब लौटना नहीं होगा. कल शाम को कुछ पलों के लिए मन विचलित हुआ पर वह ऊर्जा का अपव्यय ही था जैसे दर्पण में कोई प्रतिबिम्ब ठहरता नहीं है वैसे ही आत्मा में कोई भाव टिकता नहीं है. वह जैसे पहले थी वैसे ही हो जाती है, केवल मन स्वयं को उसमें देख लेता है. मन ने देखा कि उसे निंदा नहीं भाती, स्तुति भाती है. उन्हें दोनों के पार जाना होगा, एक चाहिए तो दूसरा मिलेगा ही. उनका फोन खराब हो गया है, एक तरह से तो शांति है पर साथ ही अशांति भी है क्योंकि वे भी फोन नहीं कर पा रहे हैं, यहाँ सब कुछ जोड़े में मिलता है, मन का नाम ही द्वंद्व है. शुद्ध, निर्विकार, अचिन्त्य आत्मा सदा एकरस, आनंद से पूर्ण है, शक्तिसंपन्नदृष्टि आता है  दीदी को अवश्य उसकी बात समझ में आई होगी. कल नन्हे से बात नहीं हुई, वह व्यस्त है आजकल.



Friday, September 9, 2016

सागर में नदियाँ


आज उसे अनुभव हुआ भीतर एक ज्वाला है जिसमें निरंतर हवन चल रहा है, कामनाओं की समिधा पड़ रही है, विचारों का धूना जल रहा है और हृदय ही वह हवन कुंड है जिसमें से प्रेम की सुगंधि चारों ओर फ़ैल रही है. भगवद गीता में कृष्ण कहते हैं ज्ञानी का हृदय सागर की तरह होता है, जिसमें चारों और से नदियाँ आकर गिरती हैं. वह अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता. सत्व, रज और तम तीनों गुण उसके उर में समा जाते हैं. प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह तीनों का आगमन उसे मोहित नहीं करता. उसका हृदय उस भूमि की तरह होता है जहाँ सारा कूड़ा-करकट आकर खाद बन जाता है और फूल उगाता है..सुगन्धि फैलाता है, उस आकाश की तरह होता है जहाँ बादल, कुहरा, गर्जन-तर्जन, बिजली, वर्षा, ओले, सूरज सब होते हैं पर वह ज्यों का त्यों रहता है..तपता नहीं, गलता नहीं..अग्नि की तरह होता है जिसमें सारे विकार आकर जल जाते हैं और..उस जल की तरह जो सब कुछ पावन कर देता है..आज जून आने वाले हैं परसों छुट्टी है कृष्ण जन्माष्टमी की..पंजाबी दीदी को कविता भेजेगी !

कल शाम और फिर रात्रि से ही कुछ छूट गया सा लगता है, जो खो जाये वह था ही नहीं, पर जो एक बार मिले और कभी न खोये ऐसा भी कहीं होता है यह तो अनंत यात्रा है और अनंत अनुभवों से भरी. प्रकाश, प्रवृत्ति और और मोह तीनों के अनुभव होते ही रहेंगे. कल शाम वे मार्केट गये, छोटी ननद ने जो सूट भेजा, उसे सिलने दिया. अब उसकी कलम आगे बढने से इंकार कर रही है. संस्कार कितने गहरे होते हैं और मन कितना बलशाली..बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की वहाँ एक नहीं चलती. इस संस्कार को मिटना ही होगा, वह यदि इस क्षण निर्णय कर ले तो कौन है जो रोकेगा. उसका ही अंतर्मन, अवचेतन मन, अचेतन मन, पूर्व जन्म की स्मृतियाँ..लेकिन आत्मा ही एकमात्र सत्य है, ये सब अनित्य हैं, आत्मा के सातों गुणों को भीतर धारण करे तो सारा नकार क्षण भर में बह जायेगा. सद्गुरू की वाणी को याद करे तो जो वह हैं वही वह है, वही यह सारा जगत है, एक ही तत्व से यह सारा संसार बना है, प्रेम का जितना विस्तार हो उतना अच्छा है..सारा जगत उनका अपना हो जाये, प्रेम ही आत्मा में ले जाता है, प्रेम ही बहता हुआ दरिया है..प्रेम को रोका तो वह सड़ेगा...दुर्गन्ध देगा. सहज होकर सभी को स्वीकारना है तभी मुक्ति है. स्वयं को मुक्त करके वे औरों को भी मुक्त कर देते हैं. स्वयं को बाँध कर रोककर वे दूसरों के लिए भी बाधा खड़ी कर देते हैं. दूसरे को अपना सा जानकर कभी उनके मार्ग में बाधा न बनें, यह भी सेवा है..जियो और जीने दो’ का सिद्धांत यही तो कहता है. उनके कारण किसी का विकास न रुके, सहज ही ईश्वर का प्रेम उनके भीतर से बहता रहे..बहता रहे..  

आज दो दिनों बाद डायरी खोली है, परमात्मा अपनी उपस्थिति हर क्षण ही प्रकट करता है, पर वे सोये रहते हैं तो उसे देख नहीं पाते, वे यानि उनका विवेक...विवेक जगता है तो आत्मा का अनुभव करता है..जिसका अर्थ है जीवन के हर क्षेत्र में सजगता...हर श्वास में सजगता, हर पल जागरूक होकर जीना..वर्ष का नौंवा महीना शुरू हो चुका है. इस वर्ष के शेष रह गये कार्यों को करने का अभी भी वक्त है. परिवार में सभी के साथ संबंध मधुर हों..समाज में जो प्रतिबद्धताएं हैं वे निभती रहें और मन सदा समता में रहे. गुरूजी को आज यू ट्यूब पर सुना, उनेक कितने रूप हैं. ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’...एक व्यक्ति कितना विकास कर सकता है हजारों, लाखों ही नहीं यहाँ तो करोड़ों व्यक्ति उनसे सीख रहे हैं...परमात्मा उनके द्वारा स्वयं को व्यक्त कर रहा है. उन्हें स्वयं को हटाकर परमात्मा के लिए मार्ग छोड़ देना है...वह अनंत है..ज्ञान स्वरूप है..वह जीवन को सुगंध से भर देना चाहता है..प्रेम, शांति, ज्ञान और आनंद की सुगंध से..



Wednesday, June 3, 2015

पैर की मोच



इन्सान जो चाहता है, वह एक न एक दिन उसे मिलकर ही रहता है. चाहे परिस्थितियां वैसी न हों, जिसमें उसने वह कामना की थी. सेवा का अवसर मिले ऐसा उसने चाहा था पर इस तरह नहीं. खैर इसी का नाम जीवन है, यहाँ उतार-चढ़ाव उसी तरह आते हैं जैसे सागर में ज्वर-भाटा, यह प्रकृति का नियम है. समय सदा एक सा नहीं रहता. आज सुबह वे पौने पांच बजे उठे. कल रात को सोने में थोड़ी देर हो गयी थी. क्रिया आदि की, व्यायाम नहीं कर पायी, जो सांध्य-भ्रमण से हो जायेगा यदि जून समय पर आ गये. वह बिलकुल नहीं घबराए हैं सासु माँ के पैर की मोच देखकर. जो उनकी अनुपस्थिति में अपनी एक परिचिता के साथ उनकी किसी परिचिता के घर जाने पर उन्हें लग गयी है. ईश्वर उन सभी को ऐसी दृढ़ता दे. उनके मनों को इतनी शुद्धता भी कि किसी के प्रति कोई नकारात्मक विचार भी न पनपे. सभी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार करते, कहते हैं.

कल से उसे गुरूजी बहुत याद आ रहे हैं, उनकी कृपा दृष्टि उस पर अवश्य हुई है ! आज क्रिया के बाद भी अद्भुत अनुभव हुआ, पहले वंशी की आवाज सुनाई दी फिर कहीं से विचार आया कि ससुराल में पिताजी बच्चों को डिब्बा खोल कर दिखा रहे हैं और रंग-बिरंगे हिलते-डुलते से कुछ आकार डिब्बे में दिखे, उस क्षण कुछ और सोचा होता तो वह भी दिखा होता. बाद में गुरूजी की भी एक झलक दिखी. ईश्वर की कृपा ही धूल के एक कण को हिमालय की विशालता प्रदान करती है. सीमित को असीमित कर देती है. उनका ज्ञान अद्भुत है और सबसे अद्भुत है उनका प्रेम...उसका मन एक ऐसी शांति से भर गया है, असीम स्नेह से, अनंत प्रेम से और अनोखे आनंद से कि इस क्षण यदि मृत्यु उसके सम्मुख आये तो बाहें फैलाकर उसका भी स्वागत करे. उसके 
हाथ इतने बड़े हो गये हैं कि सारा ब्रह्मांड उनमें समा सकता है !


शाम हो चुकी है, वे अभी टहल कर आये हैं. दिन भर कोई गंभीर अध्ययन नहीं किया, बल्कि आजकल पढ़ने का समय कम ही निकाल पाती है. पर मन में चिंतन चलता है. पढ़े हुए को मथकर उसे पचाने के लिए अलग से कोई समय नहीं निकलना पड़ता, कार्य करते हुए ही मनन चलता रहता है. कोई नकारात्मक विचार मन में टिकता नहीं, फौरन कृष्ण का नाम अंतर में प्रतिध्वनित होने लगता है. कभी कोई मन्त्र या भजन की पंक्ति चलती रहती है, फ्लैश बैक म्यूजिक की तरह. कृष्ण बिलकुल सच्चा वादा करते हैं कि उनके भक्तों के कुशल क्षेम का भार वह अपने सिर पर ले लेते हैं. इसलिए जीवन जितना सहज और हल्का आज लगता है वैसा पहले नहीं था, कुछ वर्षों पहले. अब ऐसा लगता है जैसे हर वक्त ही वह ध्यान में है. एक अनोखी ख़ुशी पोर-पोर से फूटती रहती है, फूल से जैसे सुवास फूटती है. कहीं कोई चाह शेष ही नहीं रह गयी है, जीवन जब उस जीवन दाता ने दिया है तो उसे ही यह अधिकार है कि उसे चलाये. वह जो उसके दिल में रहता है, जो उसे उससे ज्यादा जानता है., जो उसके विचारों को सतह पर आने से पूर्व ही पढ़ सकता है, जो जीवन का स्रोत है. 

Friday, January 2, 2015

मुक्त उड़ान

 

आज उस सखी के यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा का आयोजन किया गया है. उन्हें वहाँ नौ बजे के बाद पहुंचना है. कल शाम उस समस्याग्रस्त सखी का फोन आया, उसके घर में सुलह होने की शुरुआत तो हुई है. गुरूजी की वह कृतज्ञ है, उन्हीं की कृपा से यह चमत्कार ( उसी के शब्दों में ) हुआ है. उसकी भी सारी उलझनों को गुरू की स्मृति एक चुटकी में दूर कर देती है. भक्त के लिए भगवान सदैव तत्पर है, वह आने में एक क्षण भी नहीं लगाता. भगवान के लिए प्रेम ही परमधर्म है. अपने अंतर में छिपे प्रेम को प्रकट करना है. इस प्रेम को प्रकट करने में गुरू सहायक है. उसका अर्थ ही है जो अज्ञान को दूर करे, क्योंकि वह स्वयं मुक्त है, वही मुक्त कर सकता है. जो स्वयं बंधा हो वह क्या मुक्त करेगा. सद्गुरु को सुबह-शाम वह एक ज्योति के रूप में अपने साथ पाती है. शास्त्र माँ है और गुरू पिता है, उनकी शरण में आकर ही कोई द्विज होता है. दूसरा जन्म पाता है. ज्ञान का अभ्यास करने से और सेवा करने से ही कोई ज्ञान का अधिकारी बनता है. सतोगुण से ऊपर शुद्ध सतोगुण में स्थित होना है.

उसे लगता है सुख-दुःख मान्यता और कल्पना के आधार पर होता है. सुख-दुख को सच्चा मानना ईश्वर को सच्चा न मानना है. मन एक वृत्ति है, सागर की तरंग की तरह, वही सुख-दुःख का अनुभव करता है. है कुछ भी नहीं पर अनादि कल से वे इससे बंधे जा रहे हैं. अज्ञान का आधार तो मन ही है, मन की दीवारें गिर जाएँ तो यह अज्ञान उसी तरह लुप्त हो जायेगा जैसे अँधेरे कमरे की दीवारें गिर जाने पर वहाँ अंधेरा नहीं टिकता. या फिर मन एक चलते-फिरते रस्ते की तरह है जिस पर तरह-तरह के लोग हर समय चलते रहते हैं, यदि वह इनसे नाता न रखे और किसी भी वृत्ति का आग्रह न करे तो ही अविचलित रहेगी. आत्मा सभी को स्पर्श करते हुए भी किसी को स्पर्श नहीं करता, जैसे सूर्य की किरणें छूती हुई भी किसी को भी नहीं छूतीं. मन को भी आत्मा सा मुक्त होना सीखना होगा. निस्सीम गगन सा मुक्त, अनंत ब्रह्मांड सा मुक्त और पवन सा मुक्त..इसी मुक्ति को तो मोक्ष कहा गया है और यह मुक्ति पल भर को भी मिले तो भी अमूल्य है. जैसे बादल की सत्ता सूर्य से है पर बादल सूर्य को ढक लेते हैं वैसे ही आत्मा की सत्ता से से ही अज्ञान की सत्ता है. मृग-मरीचिका ही अज्ञान है, जो है ही नहीं उसके पीछे दौड़ते रहना ही तो अज्ञान है.

कल शाम उसे कुछ आवाजें जैसे दूर से बजते ढोल की आवाज सुनाई दे रही थी, कभी किसी वाद्य की आवाज, पर बाद में नींद आ गयी. कल शाम से ही जून कुछ चुप-चुप थे पर आज सुबह उन्होंने साथ-साथ क्रिया की और दफ्तर जाते वक्त वह सामान्य थे. दीदी को फोन किया वे लोग स्वयं भी नर्सिंग होम के मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं. उसे याद आया, छोटी बुआ को पत्र लिखना है. टीवी पर आत्मा में जीवन की गुत्थियों को सुलझाने वाली भगवद गीता का पाठ आ रहा है. ईश्वर हर वक्त उसके निकट हैं. तीनों गुणों से परे अत्रि और सूया से परे अनसूया के पास वे बिन बुलाये ही चले जाते हैं.


दस बजे हैं, अभी विचार आया कि एक परिचिता से किये वादे को निभाने के लिए उनके यहाँ जाये. उनका बगीचा देखा, जगह ज्यादा है पर सूझ-बुझ से उसका उपयोग हुआ हो ऐसा नहीं लगता, खैर, वापस आयी तो लंच का समय होने ही वाला था. जून के दफ्तर जाने के बाद संगीत का अभ्यास किया, नये शिक्षक के सिखाने का तरीका बिलकुल अलग है और शुल्क भी तिगुना. पर संगीत को पैसों से नहीं तोला जा सकता. परसों शाम को तेजपुर की साधिका का फोन आया. योग शिक्षक तेजपुर में आ चुके होंगे. आज सुबह  जागरण में सुना, आसक्ति ही मानव को बांधती है. वास्तव में वह मुक्त है. अनंत शक्ति का भंडार है, लेकिन असली रूप को भुला बैठा है. उस दिन उसे अंतरतम की झलक मिली थी, अतिशय आनंद की अनुभूति हुई थी. वही आनंद थोडा थोड़ा करके रोज रिसता है और उसके अंतर को हरा-भरा रखता है. 

Saturday, August 16, 2014

स्कूल में मेला


लहरें सागर में जन्मती, रहती और नष्ट होती हैं पर मानवों को इसका भान नहीं होता, ऐसे ही वे ईश्वर में ही जन्मते, रहते और नष्ट होते हैं. उन्हें अपने अस्तित्त्व का भान अपने जिंदा रहने का प्रमाण मृत्यु के समय मिलता है. जीवन भर वे मृतकों के समान जीते रहते हैं, एक बेहोशी की हालत में, तभी उन्हें अपने भीतर रहने वाले ईश्वर के दर्शन नहीं होते. वे हर पल बाहर की ओर भाग रहे हैं, अपने आप से दूर होते जा रहे हैं, और फिर एकाएक मौत का बुलावा आ जाता है  तब मुड़कर देखने का भी वक्त नहीं होता. उन्हें समय रहते जागना होगा. जीवन में सन्यास घटित हो जाये तो अनासक्त होकर, अलिप्त होकर जीना आ जाये. जो भीतर जायेगा वह भी-तर जायेगा. मौन रहते हुए, वाणी का सदुपयोग करते हुए परिवार जनों से, परिचितों से व्यवहार करना होगा. मन के दरवाजे खोलकर, झाड़-बुहार कर उस पाहुने की प्रतीक्षा करनी होगी जो आने के लिए स्वयं ही प्रतीक्षा कर रहा है. क्रन्तिकारी सन्त की बातें हृदय पर गहरा असर छोडती हैं, बाबाजी ने भी उसी बात को आगे बढ़ाया, और कहा कि ईश्वर ही सबसे बड़ा सुह्रद है, परम हितैषी है, सदा , सर्वदा सबके साथ है, उसे कोई देखना नहीं चाहता इसीलिए देख नहीं पाता. मन पर माया का पर्दा है, जब मन विकार रहित होगा, निर्मल होगा तभी उसके दर्शन होंगे. उसे प्रतिक्षण अपने पर नजर रखनी होगी, वाणी पर संयम रखना होगा. सांसारिक वस्तुओं का आकर्षण धीरे-धीरे खत्म हो रहा है ऐसा लग तो रहा है, हर पल मन खुश रहता तो है, विवेक को जगाये रखना होगा. अपने कर्त्तव्यों का भली-भांति पालन कर सके, अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करते हुए सात्विक जीवन बिताये, न सुख-सुविधाओं का आग्रह रहे न ही प्रतिकूलताओं से भय लगे. हे ईश्वर अब यही प्रार्थना तुझसे है !  

अभी-अभी नन्हा अस्पताल से वापस आ गया है, उसे लगा था कि डाक्टर आज ही उसका प्लास्टर खोल देंगे पर उन्होंने दो दिन और रखने को कहा है. वह इसी कारण आज स्कूल भी नहीं गया. अज से नवरात्रि भी शुरू हो गयी है. अब साढ़े आठ होने को हैं, पिछले एक घंटे में उसने सन्त वाणी सुनी, नन्हे से साइंटिस्ट्स के बारे में पूछा, नैनी को पैसे दिए और इस वक्त मन में कहीं हल्की सी चुभन है, लेकिन जब उसका परम हितैषी उसके साथ है तो संशय कैसा, किसी भी परिस्थिति में कैसे भी रहे, वह सुहृद तो सदा-सर्वदा साथ रहता है. फिर यह तनाव क्यों ? आज क्रन्तिकारी सन्त का भाषण नहीं सुन पायी, क्या इसीलिए ? उनकी बातें झकझोर कर रख देती हैं और बाबा जी की बातें मरहम का काम करती हैं. कल मंझले भाई को पत्र लिखने का विचार मन में आया था पर विचार कार्यान्वित नहीं कर पाई. आज लिखेगी.

Yesterday they went to Digboi, tinsukiya then again Digboi. It was good to meet Sardarji’s family in digboi and the shopping spree in TSK. They purchased new curtains fur drawing room, new cushions and covers for bed room, new dresses for her and Nanha, dry fruits and other grocery items for their kitchen from a new shop, kaamdhenu. In Nanha’s school they enjoyed very much. They took idli and dosa with samber and chutney, drank coffee and watched children doing different types of jobs, selling things, playing games, selling tea and coffee with teachers helping them and vice verse.  Today jun is doing his office work, Nanha is watching TV and she is thinking what to do first- she has so many jobs to do-sewing the curtains, sewing the cushion covers, altering her new white dress, sewing fall to her new sari, arranging her wardrobe, arranging drawing room for puja, cutting the Olympics news and pasting them in file, writing new poem.

Today’s quotation is,  Ability is of little account without opportunity - Napoleon
 …and they all have golden opportunity- to live a life which is pure, blissful and simple. Today is the birth anniversary  of one great soul, in fact two great souls. Father of nation Bapu and  great leader Lal Bahadur Shastriji. Jun and Nanha are also at home. She has done all her morning chores. Jun suggested that they should go tsk to change Nanha’s shirt, which they bought for him but which he did not like. Jun has gone to deptt  for some job. They can go after lunch. One friend called to say that they will not go with them but want something from TSK for their sun’s birthday.


Friday, July 18, 2014

तुलसी और सूर



आज कितने सुंदर वचन उसने सुने, “बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर से बिछड़ कर मन व इन्द्रियों के सीमित जल में आ जाती है तो छटपटाने लगती है” सागर की मछली को सागर के बिना चैन आ ही नहीं सकता. जीव का सम्बन्ध ईश्वर से वैसा ही है जैसा बूंद का सागर से, उसे याद आया बचपन में एक कविता पढ़ी थी, एक बूंद निकल पड़ती है यात्रा पर और मरुथल में गिर कर खो जाती है, कभी कोई बूंद नदी में गिर जाये तो पुनः सागर से मिल सकती है. आज भी धूप बहुत तेज है, सुबह के आठ बजे ही दोपहर का भास हो रहा है. कल जून ने उन दिनों को याद किया जब वे यहाँ नये-नये आये थे, वे कुछ देर के लिए पुराने वक्तों में लौट गये और अच्छा लगा सारी बातों को मन के पट पर फिर से घटित होते हुए देखना. कल एक सखी परिवार सहित यात्रा पर जा रही थी पर ‘भारत बंद’ के कारण ट्रेन  नहीं चली सो स्टेशन से वापस लौट आयी, शाम को उन्हें भोजन के लिए बुलाया, इस बंद से सबका नुकसान ही नुकसान होता है कोई लाभ तो नजर नहीं आता. अगले हफ्ते उन्हें भी जाना है, यात्रा से पहले जो आशंका पहले होती थी अब बिलकुल नहीं होती. कल उसके पैर में दर्द हुआ था, पर उसने स्वयं से कहा, दुःख-दर्द तो शरीर को है, वह तो इससे अलग है, और मुस्करा दी. थोड़ी ही देर में दर्द महसूस होना ही बंद हो गया. भगवद् कथा का असर लगता है, हो रहा है, ईश्वर हर क्षण उसके साथ है. जून को आज फील्ड जाना है, उसे लंच अकेले ही करना पड़ेगा.   

परसों सुबह ‘जागरण’ नहीं सुन पायी, ‘केबल’ नहीं आ रहा था, कल सुना पर इतवार की सुबह बेहद व्यस्त होती है, डायरी लिखने का समय नहीं मिलता. आज भी धूप तेज है, मौसम का ताप प्रकृति कैसे चुपचाप सह लेती है, मानव ही हैं जो शिकायत करते रहते हैं. गीता में सुख-दुःख, मान-अपमान के साथ-साथ ग्रीष्म-शीत का जिक्र भी किया गया है. मौसम भी आया है तो जायेगा ही. आज गोयनका जी ने धर्म की परिभाषा बताते हुए कहा, “जिसे धारण किया जा सके, जो कर्म से जाना जाये न कि कर्मकांडों से, वही धर्म है”. बाबाजी ने भागवद की कई कहानियाँ सुनायीं, सुनकर भागवद् का अध्ययन करने की प्रेरणा होती है. नन्हे का स्कूल गर्मी के अवकाश के लिए बंद हो चुका है. वह केक बनाने के लिए कह रहा है, बच्चों की फरमाइश भी बच्चों जैसी ही होती हैं.
“नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि नैतिकता के प्रति आस्था ही खत्म हो रही है. यदि चेतना का स्तर ऊंचा हो जाये तो मूल्यों की स्थापन अपने आप हो जाएगी.” आज किन्हीं जैन मुनि ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा. आज साढ़े सात बजे बिजली गुल हो गयी, सो बाबाजी से आज भेंट नहीं हुई. कल रात भी तीन बजे के लगभग बिजली गायब हुई थी कुछ देर के लिए. काफी देर तक नींद नहीं आयी, फिर आयी भी तो स्वप्नों भरी. गहरी शांत नींद उसे एसी में सोने से अक्सर नहीं आती, एक तो शोर दूसरे ताजी हवा नहीं आती, आज इस क्षण कैसी शीतल मंद बयार बह रही है.

आज भी कल सुबह की तरह मौसम शीतल है, पवन चेहरे को छूकर जाती है तो ठंडक का अहसास होता है. कल तक यदि ऐसा ही रहे तो उनकी यात्रा की सुखद शुरुआत होगी वरना तो...झुलसा देने वाली धूप में पसीना पोंछते वे रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे. अभी बाबाजी आने वाले हैं, अब संभवतः उनसे जून के दूसरे सप्ताह में ही मिलना हो, सो आज की पूरी बात वह ध्यान से सुनेगी. आज उन्होंने नारद की वह कथा सुनाई जिसमें उनका अहंकार तोड़ने के लिए भगवान विष्णु ने उन्हें वानर का चेहरा प्रदान किया था. साथ ही उन्होंने मन, बुद्धि आदि के विकारों को अपना न मानकर उन्हें दूर करने की बात कही, जब कोई उनसे एकाकार हो जाता है तो इलाज मुश्किल हो जाता है जैसे कोई डाक्टर या वकील अपना केस खुद नहीं देखते. ईश्वर से आग्रह करते हुए कि हृदय तो तुम्हारा घर है और तुम्हारे रहते हुए इसमें विकार रूपी चोर घुस जाएँ तो इसमें तुम्हारा भी अपयश होगा. तुलसी और सूर की भांति, “अब लौं नसानी अब न नसैहों”, अपने को शुद्ध करते जाना है. ईश्वर का नाम स्मरण आते ही मन कैसी करुणा से भर जाता है.