Showing posts with label पिकनिक. Show all posts
Showing posts with label पिकनिक. Show all posts

Monday, February 26, 2024

पिरामिड वैली


पिरामिड वैली


नव वर्ष का प्रथम दिन ! सुबह नींद देर से खुली क्योंकि रात को बारह बजे से पटाखों की तेज आवाज़ें आनी आरम्भ हुईं और एक घंटा चलती रहीं। बच्चों व बड़ों के चिल्लाने का शोर भी स्पष्ट आ रहा था। नये वर्ष को तो आना ही है, इतना शोर मचाने का क्या अर्थ है, समझ में नहीं आता। प्रातः भ्रमण के समय आकाश में गोल चंद्रमा के दर्शन हुए, तस्वीर उतारी, वापस आकर छत पर सूरज की। उगते हुए सूरज को देखकर त्राटक करना कितना भला लग रहा था। स्नान करके नाश्ता बनाया और दोपहर के भोजन की तैयारी की, जो वे ‘पिरामिड वैली’ अपने साथ ले जाने वाले थे।जून ने बनारसी चिवड़ा-मटर; और खोये वाला गाजर का हलवा  उन्होंने कल ही बनाया था।  उसने हींग वाले आलू-पूरी और बटर में परवल बनाये। सभी को नाश्ता पसंद आया। बच्चों के साथ उनका एक मित्र भी आया था और सोनू के माँ-पापा भी। वे एक बजे पिरामिड वैली पहुँच गये थे। उनके घर से ज़्यादा दूर नहीं है यह शांत स्थान, जो २८ एकड़ में फैला हुआ है। सुंदर बाग-बगीचों और एक कमल सरोवर से घिरा दुनिया के सबसे बड़े आकार के पिरामिड के लिए प्रसिद्ध है। जो ध्यान के लिए एक संत ब्रह्मर्षि पात्री जी द्वारा बनवाया गया है। वे लोग पहले भी एक बार यहाँ आये थे, और तभी आज के दिन का कार्यक्रम बना था। यहाँ आकर ज्ञात हुआ कि बाहर से लाया भोजन इस परिसर में नहीं खा सकते।एक घंटा हरियाली के सान्निध्य में घूमते हुए बिताया, कुछ देर पिरामिड में जाकर ध्यान किया। किताबों की दुकान से दो किताबें ख़रीदीं, अवेकनिंग कुंडलिनी और द लॉस्ट ईयर्स ऑफ़ जीसस ! रेस्तराँ में चाय पैकर वे घर लौट आये। बाद में छत पर चटाई बिछाकर पिकनिक की तरह पेपर प्लेट्स में दोपहर का भोजन किया। शाम को वे वापस चले गये। जिन मित्रों व संबंधियों से सुबह बात नहीं हुई, उन्हें फ़ोन पर नये साल की शुभकामनाएँ दीं।   


आज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही आँख खुल गई। छोटी ननद के लिए जन्मदिन की कविता लिखी, मंझले भाई का जन्मदिन भी आज है, उसे भी शुभकामना भरी कविता भेजी। जीसस वाली किताब में पढ़ा, लेह की हिमिस मोनेस्ट्री में कुछ दस्तावेज मिले हैं , जिनके आधार पर कहा गया कि ईसा भारत आये थे।शाम को पापा जी से बात हुई, उत्तर भारत में ठंड बहुत बढ़ गई है, उन्होंने कहा तापमान शून्य हो गया था। दिल्ली में वर्षा हो रही है। यहाँ बैंगलुरु का मौसम सुहावना है, पर कब बदल जाएगा, कहा नहीं जा सकता। 


आज यहाँ भी थोड़ी सी ठंड बढ़ गई है। रात को बारिश होती रही शायद इसी कारण। जून के दांत में दर्द है, कल डेंटिस्ट को दिखाकर नन्हे-सोनू के यहाँ चले जाएँगे। वे दोनों घर से ही काम कर रहे हैं।सुबह एलिजाबेथ क्लेयर की ईसा के भारत में बिताये समय के बारे में किताब आगे पढ़ी, बहुत रोचक है। ​​जीसस की भारत, तिब्बत  व नेपाल की सत्रह वर्षों की यात्रा के पक्के सबूत मिले हैं। उसमें लिखा है कि 13 साल की उम्र से 29 साल की उम्र तक वह पहले पढ़ते रहे फिर उन्होंने पढ़ाया भी ।येरूशलम से भारत तक की उनकी यात्रा का विवरण बौद्ध इतिहासकारों ने दिया है। किसान आंदोलन ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कल भी सरकार ने वार्ता के लिए बुलाया है। देश में कोरोना की वैक्सीन लगाने का काम आरम्भ हो रहा है । 


आज दिन भर बदली बनी रही। सुबह साढ़े नौ बजे वे डेंटिस्ट के यहाँ जाने के लिए निकले थे। जून को फ़िलिंग करवानी थी। उसने भी दिखाया, तो क्लीनिंग कर दी, दस मिनट की सफ़ाई के लिए एक हज़ार रुपये लिए। जब वे पहुँचे, ठीक उसी समय नन्हा भी आ गया, उसका मित्र उसे लेकर आया था। उसने अपनी मीटिंग आगे खिसका दी और इसलिए आया कि पापा को कहीं एनेस्थीसिया दे दिया गया तो ड्राइविंग में दिक़्क़त होगी।बच्चे बहुत समझदार और केयरिंग हैं। सुबह सामान्य थी, एक विशेष बात हुई कि छोटी भाभी का जन्मदिन है, सुबह ही याद आया, उसके लिए कविता लिखी उसी समय, जबकि उन्हें निकलना था। यह भी तो सेवा का एक कार्य हुआ न ! परसों बड़ी ननद का जन्मदिन है, कल ही उसके लिए लिखनी है। शाम को रमन महर्षि की बातचीत का एक अंश सुना, प्रेरणादायक था फिर गुरु जी का कराया ध्यान किया। मन शांति का अनुभव कर रहा था। सात तारीख़ को सूट-साड़ी पहनकर वे आश्रम जायें, ऐसा मन में विचार आया है ! उस दिन छत्तीस वर्ष हो जाएँगे उनके विवाह को। नन्हे-सोनू के यहाँ भोजन अच्छा था, दाल-चावल व करेले की सब्ज़ी !   


Tuesday, May 26, 2020

नागालैंड फेस्टिवल



आज सुबह वे उठे तो बाहर गहन कोहरा था. इस वर्ष ठंड जल्दी शुरू हो गयी है और ज्यादा भी है. दो वर्ष पहले वे इस समय पंखा चलाते थे, आज ही पुरानी डायरी में कुछ देख रही तो पढ़ा. जून टीवी पर नागालैंड के बारे में यू ट्यूब का एक वीडियो देख रहे हैं, जिसमें ग्रीन विलेज खोनोमा पर एक डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही है. ‘खोनोमा’ एक गाँव है, जहाँ पहले जंगल काटे जा रहे थे तथा शिकार के द्वारा जंगली जानवरों को खत्म किया जा रहा था पर वहां की जनता सजग हो गयी और अब वह स्थान पुनः हरा-भरा हो गया है. इस माह के अंत में वे वहाँ जाने वाले हैं. नागालैंड की यात्रा में उन्हें अपने साथ कुछ रेडी टू ईट वाला भोजन भी ले जाना होगा. वहां शाकाहारी भोजन मिलने में कुछ परेशानी हो सकती है. आज से क्लब के वार्षिक कार्यक्रम के लिए रिहर्सल भी आरंभ हो गयी है. आज बंगाली सखी का जन्मदिन है, दो वर्ष पहले तक वे उनके घर जाकर बधाई देते थे पर आज व्हाट्सएप पर ही शुभकामनाएँ दे दीं. वक्त बदलता है तो लोग भी बदलते हैं और रिश्ते भी बदलते हैं. छोटी बहन के यहाँ दो दिन बाद सत्संग है, गुरूजी के यूएई आने की ख़ुशी में. 

फिर कुछ दिन का अंतराल ! दिन जैसे पंख लगाकर उड़ रहे हैं. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं. जून आज देश की राजधानी गए हैं, नन्हा भी जाने वाला था पर अभी तक उसे उस अस्पताल के मैनजमेंट ने डेट नहीं दी जो उनके क्लाइंट हैं. जून ने उसे देने के लिए सामान भी खरीद लिया था, जो अब घर ले आएंगे. गुरूजी ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन लिखे उसके कमेंट पर कमेंट किया है यू ट्यूब पर, यह अवश्य ही उनकी टीम ने किया होगा, उनके पास इतना समय नहीं होता होगा, पर वह चाहें तो सब कर सकते हैं. उनकी कृपा का ही फल है कि आज विश्व में लाखों व्यक्ति अध्यात्म से जुड़ रहे हैं. वह कहते हैं, जीवन में जो भी दुःख आता है वह अज्ञान का फल है, उन्होंने कभी न कभी इस दुःख का बीज डाला था. वे जितना-जितना बाहर सुख खोजते हैं भीतर का सुख ढक जाता है. भीतर का सुख भुलाकर जब बाहर से लेने जाते हैं तो इसे ही मोह कहते हैं. सुख के लिए बाहर किसी को दुःख नहीं देना है, संसार की कोई वस्तु इतनी कीमती नहीं है जिसके लिए संसार को दुःख दिया जाये. भीतर का सुख खो न जाये इसके लिए भी सजग रहकर किसी को दुःख न हो जाये, इसका ध्यान रखना है.

नागालैंड की यात्रा से वे लौट आये हैं, यात्रा सुखद थी और यादगार भी. वर्ष का अंतिम महीना आ गया है. देखते ही देखते यह वर्ष भी विदा हो जायेगा. इस महीने कई कार्यक्रम हैं, पहले सप्ताह में घर में डिनर पार्टी है, जो चार परिवार एक साथ मिलकर नागालैंड गए थे, वे सभी एक साथ मिलकर उन तस्वीरों को देखेंगे और एक नागा परिवार को बुलाएँगे जिसने इस यात्रा में उन्हें सहयोग दिया. दूसरे सप्ताह में महिला क्लब का वार्षिक उत्सव है. जिसकी तैयारी में उसे भी काफी समय देना पड़ेगा. उसके अगले दिन ही जून के पूरे विभाग की पिकनिक पार्टी है. उसके तीन दिन बाद उन्हें दुबई की यात्रा पर निकलना है. जहाँ से नए वर्ष के आरंभ  होने के बाद ही लौटना होगा. आज छोटे भाई के विवाह की सालगिरह है. 

कल का पूरा दिन विभागीय पिकनिक के नाम था. वे लोग सुबह जल्दी ही निकल गए थे, नदी किनारे टैंट लगाया, एक मेज भी ले गए थे जिसपर सुबह का नाश्ता लगा दिया गया था. फुटबाल, बैडमिंटन, रस्साकशी आदि खेलने का भी प्रबंध था. नदी में उतरे वे लोग फिर धूप में रेत पर लेटे रहे, कुछ लोगों ने गाने गाये, कुछ ने अभिनय किया. कुछ यूँही टहलते रहे. दोपहर का भोजन एक रेस्तरां वाला लेकर आया, वह अपने साथ ही सब कुछ लाया था बड़ी सी वैन में. दो मेजें जोड़कर उसने लन्च सजा दिया. उसे वह पुराने दिन याद आये जब पूरा भोजन खुद बनाया जाता था, लकड़ी का चूल्हा जलाकर, दो-तीन पत्थर जोड़कर वे चूल्हा बनाते थे. घण्टों खाना बनाने में ही लग जाते थे, पर उस भोजन का स्वाद ही अलग होता था. अब कोई भी यह ज़िम्मेदारी उठाना नहीं चाहता सो बना-बनाया भोजन ही मंगवाना पड़ता है. 

Friday, June 28, 2019

मेजी की आग



रात्रि के पौने आठ बजे हैं. रात्रि भोजन हो चुका है. कल गायत्री समूह की सदस्याएं 'सत्संग पिकनिक' का आयोजन कर रही हैं. उनके लॉन में ही सब मिलेंगे. सभी अपने घर से कोई पकवान बना कर लायेंगी. भजन, नृत्य, 'सूर्य ध्यान' के बाद भोजन, फिर वे मिलकर नन्हे के विवाह की व अन्य तस्वीरें देखेंगे. हाँ, पहले फूलों को निहारने रोज गार्डन भी जायेंगे. आज सुबह वे टहलने गये तो देखा, बच्चों के पुराने स्कूल का कुछ भाग गिरा दिया गया है. नये स्कूल का मुख्य द्वार अब स्पष्ट दिखाई देता है. शाम को स्कूल की मीटिंग में गयी. क्लब की प्रेसिडेंट काफ़ी बदलाव ला रही हैं. कुछ पुराने लोग जा रहे हैं, नये आ रहे हैं. स्कूल का भविष्य अच्छा नजर आ रहा है. सुबह उसकी एक पुरानी हिंदी की छात्रा अपनी माँ के साथ मिलने आई. कोहिमा स्थित अपने गाँव के चावल लायी थी  और स्थानीय कला का एक लकड़ी का कटोरा. उसने भी उसे एक उपहार दिया. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अनुभव आज शाम को योग साधना के दौरान हुआ और सुबह ध्यान में भी. परमात्मा उनके कितने करीब है, उन्हें उसकी प्रतीति करनी है प्राप्ति नहीं, वह तो सदा ही सब जगह है !  

आज का दिन स्मृति पटल पर एक सुखद अनुभव बनकर अंकित हो गया है. उन्होंने ढेर सारी तस्वीरें उतारीं. भजन गाए, ध्यान किया, कई खेल खेले. सभी लोग आये और स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ लाये. उसने विवाह की तस्वीरें दिखाईं तथा वह कविता भी सुनाई जो नन्हे के विवाह के अवसर पर पढ़ी थी. पिताजी से बात की, धूप में बैठे थे. अब उनका स्वास्थ्य ठीक है पहले की अपेक्षा. आज गुरूजी को सुना, 'भक्ति सूत्रों' पर उनकी व्याख्या पहले भी सुनी है. वह बहुत सरल भाषा में बोलते हैं, अध्यात्म को बिलकुल सहज बना दिया है उन्होंने. जून की फरमाइश पर मूड़ी के लड्डू बनाये आज. कल लोहरी है.

आज पूरे उत्तर भारत में लोहरी का उत्सव मनाया जा रहा है. नये वर्ष का प्रथम उत्सव ! उन्होंने भी अग्नि जलाई, एक मित्र परिवार आया था. मूंगफली, फुल्ले, लड्डू, गजक खाने खिलाने का दिन. कल मकर संक्रांति है, यानि पतंग उड़ाने का दिन. कल इतवार है और परसों जून का अवकाश है, वे डिब्रूगढ़ का जगन्ननाथ मंदिर देखने जायेंगे तथा मन्दिर के निकट स्थित पार्क में भी. आज दोपहर को तिनसुकिया गये थे. सुबह नींद खुली पर दस मिनट तक उठने का मन नहीं हुआ, उस समय मन कितना शांत होता है. जब देह बिलकुल निस्पंद होती है, मन भी रुक जाता है. दोपहर को योग दर्शन पुनः पढ़ना आरम्भ किया. चित्त की अवस्थाओं का वर्णन पढ़ा आज.   

आज सुबह टहलने गये तो हर तरफ धुआं था, कोहरा और धुआं मिलकर धुंधलका फैला रहे थे. क्लब में सुबह मेजी जलाई गयी थी, आवाजें आ रही थीं. इस समय शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वे भ्रमण पथ पर टहल कर आये हैं. उससे पूर्व गमले से तोड़े एलोवेरा का जूस बनाया लौकी और आंवले के साथ. आधा घंटा बैडमिंटन खेला. नन्हा आज नये घर गया है. दो वर्ष बाद जनवरी तक तो वे वहाँ रह रहे होंगे, यानि बस एक और लोहरी उन्हें असम में मनानी है.  

Friday, August 25, 2017

नामफाके की पिकनिक


आज सुबह पौने सात बजे ही वे पिकनिक के लिए निकल पड़े थे, ‘नामफाके’ नामक स्थान पर जो यहाँ से बीस किमी दूर है, लगभग पचास लोग इक्कठे हुए. बहुत आनंद मनाया, पानी में उतरे, खेल खेले, अच्छा नाश्ता व भोजन किया, फिर कुछ लोगों द्वारा किया गया बीहू नृत्य देखा. कुल मिलाकर पिकनिक अच्छी रही. शाम को साढ़े तीन बजे घर लौटे, यानि कुल साढ़े छह घंटे वहाँ बिताये और शेष यात्रा में, तैयारी में जो समय गया वह अलग है. जून ने कल दोपहर को खीर बना दी थी, और शाम को तैयारी करके उसने सुबह सबके लिए उपमा बनायी, सभी को पसंद आयी. पिकनिक के मुक्त वातावरण में तन व मन दोनों ही हल्के हो जाते हैं.  

इस वर्ष की कम्पनी की डायरी का रंग अच्छा है. आज ही मिली है हरी-भरी यह डायरी. कल की पिकनिक की तारीफ आज भी हुई, फोटो भी अच्छे आये हैं. बड़ी भांजी के विवाह की वर्षगांठ है, दस वर्ष हो गये उसके विवाह को. नन्हा आज वापस बंगलुरू जा रहा है, इस समय शायद फ्लाईट में होगा. जून कल दिल्ली जा रहे हैं. सुबह सद्गुरू को सुना, अब उनकी बात उसे सीधे वहाँ तक ले जाती है, जहाँ वे उन्हें ले जाना चाहते हैं. जीवन एक यात्रा ही तो है सभी कहीं न कहीं जा रहे हैं,

रात्रि के सवा नौ बजे हैं. दूर कहीं से गाने की आवाजें आ रही हैं, उसकी आँखों में नींद का नाम भी नहीं है. आज सुबह गुरू पूजा और रूद्र पूजा में सम्मिलित होने का अवसर मिला. मौसम अब ज्यादा ठंडा नहीं रह गया है, परसों वसंत पंचमी है अर्थात वसंत भी आरम्भ हो चुका है. आज दोपहर वह बुजुर्ग आंटी से मिलने गयी, उसे देखकर वह सदा की तरह प्रसन्न हुईं, उसे भी उनसे मिलकर अच्छा लगता है. इस उम्र में भी उन्हें अपने वस्त्रों का बहुत ध्यान रहता है, साफ-सुथरे मैचिंग वस्त्र पहनती हैं, बंगाली उपन्यास पढ़ती हैं. शाम को बगीचे में टहलते हुए ओशो की किताब पढ़ी, सारे सदगुरुओं का स्वाद एक सा होता है. अभी कुछ देर पहले उसने कितने ही पन्ने कविताओं से भर डाले हैं..कृपा हुई है ऐसी कि इसकी कोई मिसाल नहीं दी जा सकती. जो कलम दो शब्द नहीं लिख रही थी पिछले कई दिनों से, आज मुखर हो गयी है. बसंत का मौसम जैसे भीतर उतर आया है. परमात्मा की कृपा अनंत है, वह नजर नहीं आता पर अपनी मौजूदगी जाहिर कर देता है. वह यहीं है आसपास ही ! 

जून आज वापस आ गये हैं, ढेर सारा सामान लाये हैं, अमरूद, रसभरी और बेर भी.. और शायद भारी सामान उठाने के कारण ही उनकी कमर का दर्द भी. कल रविवार है, विश्राम उन्हें स्वस्थ कर देगा. आज उनकी लायी विशेष सब्जी बनानी है, शलजम तथा भिस. बगीचे से भी ढेर सारी सब्जियां तोड़ीं. टीवी पर शशि पांडे की बातचीत सुनी, उनकी कोई किताब उसने पढ़ी तो नहीं है, मौका मिलने पर पढ़ेगी.

आज बच्चों को उसने ‘सरस्वती पूजा’ और ‘गणतन्त्र दिवस’ पर प्रश्नोत्तरी करवाई. आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है और छोटी भांजी की बिटिया का जन्मदिन..और बराक ओबामा भारत आये हैं. सुबह से टीवी पर उन्हीं से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं. मोदीजी और ओबामा की मित्रता काफी गहरी होती जा रही है. भारत विकास की बुलंदियों को छुएगा. सजग नागरिक होने के नाते उन्हें भी इसके लिए कुछ करना होगा. फ़िलहाल तो कल सुबह ‘गणतन्त्र दिवस’ की परेड देखने जाना है. वापस आकर टीवी पर भी परेड देखनी है. ओबामा के आने से इस बार परेड कुछ विशेष लग रही है. शाम को एक मित्र परिवार को बुलाया है, वह दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाएगी.



Wednesday, July 29, 2015

नदी किनारे पिकनिक



सत्संग में ही मुक्ति है, सत्संग अर्थात परमात्मा का संग..वही मुक्त करता है. सारा दुःख दो के कारण है, परमात्मा एक है..उसमें टिकने से ही तृप्ति मिल सकती है. जगत के सारे कार्य तब होते हैं, उन्हें करना नहीं होता. जीवन को ठीक से जीने के लिए, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भी उन्हें अपने भीतर की शक्ति को जगाना आवश्यक है, यह शक्ति बिना भीतर गये मिलती नहीं. उसने नये वर्ष के लिए कुछ निर्णय अपने आप के लिए लिए हैं. नये वर्ष में कोई भी व्यक्तिगत कविता नहीं लिखेगी, उसके गीत अब परमपिता परमात्मा तथा सद्गुरु के लिए ही होंगे. नये वर्ष में  वह अपनी  तीसरी पुस्तक को भी छपने के लिए भेजेगी. इस बार वाराणसी में छपवानी है, जिसे पिताजी को समर्पित करना है. अमावस तथा पूर्णिमा की जगह अबसे एकादशी का व्रत रखना है. नया वर्ष उसके लिए परमात्मा की निकटता का वर्ष तो होगा ही पर सेवा का वर्ष भी होगा. हरि कि सेवा तभी होगी जब उसके जगत कि सेवा कोई करता है. आत्मा के लिए कुछ भी नहीं करना है, वह स्वयं में पूर्ण है, कर्म तो संसार के लिए ही हैं, स्वार्थ पूर्ण कर्म ही तो बांधते हैं.


कल वे पिकनिक पर गये. धूप और पानी का यानि अनल और नीर का संग बहुत भला था. पानी में ठंडक थी, नीचे बालू थी, नदी गहरी नहीं थी. वे काफी दूर तक आगे बढ़ते ही गये. नदी किनारे आग  जलाकर भोजन भी बनाया. कोई फ़िक्र नहीं, कोई चिंता नहीं, वे बस थे..प्रकृति का अंग बनकर उसके साथ जीते हुए. कल फिर उन्हें पिकनिक पर जाना है, दो दिनों के लिए पुनः प्रकृति के साथ जीना है. जून का मन नहीं है, पर वे क्यों घबरा रहे है इसका कारण उन्हें स्वयं भी अस्पष्ट है. नन्हा पूर्णतया निश्चिंत है, वह अपने मित्र को भी साथ ले जाना चाहता है. आज नैनी को काम करने का विशेष उत्साह जगा है, वह लॉन की सफाई पूरे मन से कर रही है. वे सभी अपना-अपना निर्धारित काम दिल से करें तो काम अच्छा होगा ही. अभी-अभी उसने एक केक बनाया पर निकालते समय शीघ्रता कर दी जिससे वह टूट गया, यदि थोड़ी समझदारी से काम लिया होता तो पहले की तरह साबुत बनता. कल की थोड़ी सी थकान का अनुभव हो रहा था, सो वह सो गयी लेकिन उतनी ही देर में स्वप्नों की दुनिया शुरू हो गयी. गोहाटी में अकेले सफर कर रही है. कुछ थोड़े से पैसे पास में हैं. रास्तों का भी ज्ञान नहीं है. एक व्यक्ति कुछ पैसे मांगता है..न जाने कैसा है मन..कहाँ-कहाँ की सोचता रहता है, उधेड़बुन में लगा रहता है. जागृति ही उचित है. 

Monday, May 18, 2015

लॉन में पिकनिक


नववर्ष की सुबह भी सुहानी थी, दोपहर भी पर शाम होते-होते बादल छा गये और वर्षा शुरू हो गयी. उनकी पिकनिक समाप्त हो गयी थी, सब अपने-अपने घर चले गये थे. ऐसे ही एक दिन इस जगत से उन सभी को चले जाना है. दीदी का फोन आया, कल यानि वर्ष के अंतिम दिन चाचाजी का उठाला भी इस संसार से हो गया. नये वर्ष की शुभकामना का फोन और कहीं से नहीं आया. ससुराल से अवश्य सुबह जब वे सो रहे थे पिताजी ने फोन किया था. नन्हे का स्कूल कल खुल रहा है, आज उसने पहली बार शेव की, जून ने उसकी सहायता की. आजकल नूना ने भी उसे गणित पढ़ाने में सहायता करना शुरू किया है. अच्छा लगता है अपना विषय पढ़ना. सुबह वे लगभग साढ़े पांच बजे उठे, ‘क्रिया’ आदि करके सात बजे सुबह की चाय ली. ग्यारह बजे से पिकनिक की तैयारी शुरू की जो उनके लॉन में ही होने वाली थी. शाम होने से पहले साढ़े तीन बजे सभी वापस गये और उन्होंने थोड़ा आराम किया. सुबह गुरूजी ने कहा था कि राम विश्राम में ही है, काम में नहीं. सो नींद की जगह उसने शवासन किया. देह में उठने वाली छोटी से छोटी संवेदना को भी महसूस करना एक सुखद अनुभव है. प्राण को विचरते हुए भी देखा जा सकता है और सुबह-सुबह स्टील के गिलास में पानी पीते समय उसके किनारों को कई परतों में बंटे देखा और उस पर प्रकाश के सातों रंगों की चमक भी एक अच्छा अनुभव है. त्राटक में फर्श की अथवा दीवार की सतह का आकर्षक रूप धरना, प्रकाश के एक बिंदु का विस्तृत होते जाना और कानों में एक मधुर ध्वनि का निरंतर गुंजन...ये सरे अनुभव उसे इस जगत में होते हुए भी इस जगत से परे रखते हैं. स्नानघर में वस्त्रों से भरे टब का हिलना तथा आँखें बंद करके भी टीवी स्क्रीन का दिखाई देना भी सुखद अनुभव हैं. यह जगत उन्हें जैसा दिखाई देता है वैसा ही नहीं भी हो सकता. यह उनकी नजर पर ही निर्भर करता है, उनका मन ही इस जगत की उत्पत्ति का कारण है !
आज उसने नैनी के बेटे पर ट्रांजिस्टर तेज बजाने के लिए क्रोध किया, क्रोध करते समय या पहले इसका भान ही नहीं था, बाद में इसकी व्यर्थता का अनुभव हुआ, उसे यही बात धीरे से भी कही जा सकती थी. स्वीपर समय पर नहीं आया तो सेनिटेशन दफ्तर में फोन किया, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने के बजाय आधा घंटा बाद पुनः फोन कर दिया, अर्थात उस पूरे समय मन में वही बात घूम रही थी. साधक के लिए जरूरी है कि मन को खाली रखे. धर्म को धारण करना होगा, इस जगत के सागर को पार करने के लिए तैरना सीखना पड़ेगा. स्वयं में परिवर्तन लाना है और स्वयं में आया सुधार ही आस-पास के वातावरण को शुद्ध करेगा. सद्गुरु कहते हैं जीवन को उत्सव बनाना है. समर्पण जब जीवन की रीत बनती है तभी ऐसा सम्भव है.
अज सुबह ‘क्रिया’ के बाद अनोखा अनुभव हुआ, सम्भवतः योग वशिष्ठ में पढ़े हुए वचनों का असर हो पर ऐसा लगा जैसे समस्त ब्रह्मांड उसके सम्मुख है, घूम रहा है और वह उससे पृथक है परमपद को प्राप्त ! मन तब से फूल सा खिला है. वास्तविक जीवन भी यही है जब कोई भीतर के आनंद को पाले, बाहरी किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति का मोहताज न रहे. आज उनके विवाह की वर्षगाँठ है, जून ने कहा, नूना का कार्ड तो वही है और उसने कहा जब स्वयं को ही दे दिया तो उपहार में और क्या दे ? जून और वह गुरुकृपा से से ही इस प्रेम को पा सके हैं जो वस्तुओं का अथवा सामीप्य का भी मोहताज नहीं है. जून दोपहर को दिल्ली जा रहे हैं. वे प्रेम में हैं उसी तरह जैसे विवाह से पहले थे. ईश्वर को पा लेने के बाद हृदय से यूँ ही प्रेम छलकता है, और जून भी अब प्रभु की ओर कदम बढ़ा चुके हैं. आज सुबह पिताजी का फोन आया, फिर फूफाजी, बुआ जी का भी. सभी सखियों के भी फोन आ चुके हैं. कल रात छोटी बहन का फोन आया, वह थोड़ी सी उदास थी, ईश्वर से उसके लिए भी प्रार्थना है ! मौसम आज भी खुशनुमा है. सुबह नन्हे ने भी शुभकामना दी और उससे भी पूर्व कान्हा ने भी...वह प्रेममय ईश्वर सदा उनके साथ है, हर क्षण वह उनके निकटतम है...सब कुछ वही तो है !  


फ्लोटिंग कैंडल्स




आज सुबह वह उठी तो रात देखे दो स्वप्नों की स्मृति मन पर छायी थी, एक में माँ को मृत्यु शैया पर देखा, उनका बदन गुलाबी हो चुका है, तलवे तथा हथेलियाँ तो लाल ही हैं. डाक्टर ने जवाब दे दिया है और उनके देखते-देखते वह उन्हें चेताते हुए दम तोड़ देती हैं. वह कुछ देर स्वप्न  में रोई पर शीघ्र ही नींद खुल गयी और भान हो गया. दूसरे स्वप्न में वे एक यात्रा में हैं ट्रेन की खिड़की से एक विषैला सर्प अंदर आ जाता है वह उसका फन पकड़ कर उसे मारने में सफल होती है, सभी डर रहे थे, यह स्वप्न सम्भवतः उस द्वंद्व के कारण था जिसे लेकर वह रात को सोयी थी. दिन में उन्होंने ‘कांटे’ फिल्म देखी, बहुत अच्छी तो नहीं लगी पर कुछ का अभिनय अच्छा था. नन्हा दिगबोई में है. कल क्लब में मीटिंग थी, उसने नये वर्ष की शुभकामनाओं वाली कविता पढ़ी, एक सदस्या ने ‘फ्लोटिंग कैंडल्स’ बनाना सिखाया. वापस आई तो एक मित्र परिवार मिलने आया हुआ था, उसने चिवड़ा-मटर बनाया, नमक कुछ अधिक हो गया. आज सभी संबंधियों को उन्होंने नये वर्ष के कार्ड भी भेज दिए.

कल रात्रि वे सोये ही थे कि बड़े भैया का फोन आया, दोपहर तीन बजे चाचाजी का देहांत हो गया. आत्मा ने अशक्त देह को त्याग दिया. मंगलवार को चौथा है, इतनी दूर से वह ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना ही कर सकती है. जून नन्हे को लाने दिगबोई गये हैं. उसके स्कूल की प्रदर्शनी तीन दिनों तक चलने वाली है, यह बात उन्हें पहले पता ही नहीं थी. मित्र के घर रहना उसे अच्छा लग रहा है, यह बात उसने फोन पर दो-तीन बार बतायी. कल मौसम बेहद ठंडा था, वर्षा हो रही थी, आज धूप खिली है. कल वे बहुत दिनों बाद लाइब्रेरी भी गये, Don Moraes की पुस्तक Indian Journeys लायी है, अवश्य ही यह पुस्तक रोचक होगी. कल सुबह पिताजी से बात हुई, वह चाचाजी के यहाँ जाने वाले थे. छोटे चचेरे भाई के बारे में बड़ी भाभी ने जो बताया काश वह सच न हो. उसे नशे की आदत पड़ गयी है ऐसा उन्होंने कहा, जो बेहद दुखद समाचार है.

वर्ष का अंतिम दिन, धूप खिली है, फूल मुस्का रहे हैं जैसे वे सदा ही करते हैं. वह इन सर्दियों में पहली बार बाहर लॉन में बैठकर लिख रही है, इसकी प्रेरणा एक सखी से मिली जिसने कहा कि कल नये वर्ष के पहले दिन की पिकनिक उनके लॉन में मनाते हैं प्रकृति के सान्निध्य में. नन्हे की छुट्टियाँ चल रही हैं. इस पूरे वर्ष का लेखा-जोखा करें तो उन्हें यह ज्ञान के पथ पर ले जाने वाला वर्ष रहा है. ईश्वर की निकटता का अनुभव हुआ है और कई अच्छी पुस्तकें भी पढ़ीं. नन्हे का हाई स्कल का रिजल्ट आया, जून का प्रोजेक्ट शुरू हुआ, उसने संगीत की पहली परीक्षा दी. आने वाला वर्ष भी उन्हें ज्ञान के मार्ग पर दृढ़ करे. ईश्वर को वे अपना बनाये रखें. परहित की भावना प्रबल हो, विकारों से मुक्त हों, स्वार्थी न बनें, अपने कर्त्तव्यों को निबाहें और ध्यान से वर्तमान  में रहें. तभी नूतनवर्ष उन सभी के लिए मंगलमय होगा. गुलाब के सुंदर फूलों की तरह उनकी सुवास ही सबको मिले, वाणी शुभ हो. मनसा, वाचा, कर्मणा वे कभी भी डिगे नहीं, चूके नहीं, कृष्ण को अपना मीत बनाया है यह एक पल को भी न भूलें तभी होगा जून , नन्हा और उसके लिए नया वर्ष मंगलमय...विदा जाते हुए वर्ष और स्वागत नये वर्ष.

Monday, May 11, 2015

गुलदाउदी के फूल


कल जून का प्रजेंटेशन था, सभी डायरेक्टर आये थे और सीएमडी भी. वह काफी दिनों से इस पर कार्य कर रहे थे. अच्छा रहा, पूरा दिन वहीं लग गया पर शाम को जब वह घर आये तो चेहरा सफलता की चमक से दमक रहा था. पिछले कई महीनों से वह अपनी टीम के साथ इस कार्य में व्यस्त थे. आज वह फील्ड गये हैं. उन्हें अपने कार्य में इस तरह लगे देखकर बहुत अच्छा लगता है. जबसे उन्होंने कोर्स किया है, जीवन नियमित हो गया है. तन-मन स्फूर्ति से भरा रहता है और अब वह सुबह-सुबह सत्संग भी सुनते हैं. कहीं गहरे छिपी भक्ति की भावना भी उभर रही है. वह पहले से शांत हो गये हैं. योग करने से मन को एकाग्र कर पाते हैं. सद्गुरु की उन सभी पर असीम कृपा है. उसे ध्यान में अब अधिक रूचि हो गयी है, ध्यान उसके लिए स्नान जैसा आवश्यक कार्य हो गया है. जिसमें आत्मा को स्नान कराते हैं ताकि जो भी धूल-धब्बे उस पर लग गये हैं वह धुलें और कबीर की तरह वह भी कह सके “ ...जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया” जीवन में जो कुछ भी मिलता जाये या छूटता जाये सहज भाव से उसे स्वीकार करते हुए अपने एकमात्र लक्ष्य की ओर बढना है. कृष्ण का हाथ थामा है, अब वही रास्ता दिखायेगा, वह अपना वचन भूल नहीं सकता ! आज इस समय ग्यारह बजे हैं, उसे अकेले ही भोजन करना है. जून के आने में अभी देर है. आज शाम को उन्होंने एक मित्र परिवार को भोजन के लिए बुलाया है.  

ठंड अब शुरू हुई है, दिसम्बर का मध्य आने वाला है. सुबह सवेरे एक परिचिता ने फोन करके कुछ फूल मांगे, थोड़ी देर के लिए मन संशय में पड़ गया, उसे फूल तोड़ना अच्छा नहीं लगता पर बाद में लगा यह भी तो मोह है, तत्क्षण कहा, वह ले सकती है, सम्भवतः वह आएगी अथवा उसके रवैये से यह समझेगी कि वह उसे देना नहीं चाहती, खैर अब जो होगा उसे देखना है, भूत को तो बदल नहीं सकते. शायद वह सजग नहीं थी, तभी मन मोहित हो गया, और चित्त में कुछ देर को विक्षोभ हुआ. फूल भी तो परमात्मा के हैं, सहज ही देने की प्रेरणा मन में जगे इसके लिए उसे स्वयं को भरपूर मानना होगा. ताकि भविष्य में दोनों हाथों से देने की कला विकसित हो. मनुष्य अपनी इच्छा से ही धनी या निर्धन बनता है.


आज क्रिया के उपरांत अद्भुत अनुभव हुआ, जैसे वह अनंत है, निस्सीम, भीतर के खजाने जैसे खुल रहे हैं. क्रिया करने से पूर्व सद्गुरु और कृष्ण से प्रार्थना की थी. सच्चे दिल से की प्रार्थना कभी व्यर्थ जा ही नहीं सकती, उसे तो पल-पल अपनी प्रार्थना का जवाब मिलता है. वह कृष्ण उसकी बात सुनता है बल्कि वह स्वयं को उसे जनाता है. घर में पिछले दो दिनों से सफाई, रंग-रोगन का कार्य चल रहा है. जून ने छुट्टी ली है दो दिनों की. नन्हा स्कूल गया है, कल उसकी पिकनिक अच्छी रही. पानी में सभी बच्चे बहुत देर तक रहे. कल रात काफी वर्षा हुई, गुलदाउदी के पौधे जो फूलों से भरे थे, पानी की बौछार से झुक गये थे, सुबह उन्हें ठीक किया तो ऐसा लग रहा था जैसे वे उसके स्पर्श को महसूस कर रहे हों. जीवन कितना अद्भुत है न, हर वस्तु में चेतना है, एक ही चेतना, सभी में स्पंदन है, वे वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखें तो सभी कुछ कितना सुंदर है. एक नंग-धडंग काला-कलूटा बच्चा भी अपने भीतर वही चेतना छिपाए है, असीम सम्भावनाओं का भंडार.. उनके शरीर, मन, बुद्धि भले ही सीमा में बंधे हों, पर उनकी आत्मा यानि वे जो वास्तव में हैं, वह असीमित है, उसके सान्निध्य में वे भी असीम हैं, जीवन मुक्त, चिन्मय और शाश्वत !  

Tuesday, May 13, 2014

नंदन कानन के शेर


कल वे पिकनिक पर गये थे, यहाँ से थोड़ी ही दूर पहाड़ियों के उस पार नदी के किनारे, पहाड़ियों पर चाय बागान थे, उन्होंने उनके मध्य से होते हुए चढाई भी की और कुछ लोग नदी पार करके दूसरे किनारे पर भी गये. दिन भर वे बहुत खुश थे, शाम को एक मित्र परिवार कई दिनों बाद मिलने आया और रात्रि को उसने एक बहुत दीर्घ स्वप्न देखा, स्वप्न में ही उसका अर्थ जानने का प्रयत्न भी किया. वह शायद यही जता रहा था कि वह सबकी नजरों में बने रहना चाहती थी ! परसों उन्हें जाना है सो आज दो सखियों को फोन करके विदा ली. आज सुबह ससुराल से फोन आया, बड़ी ननद आ गयी है, छोटी की डेट आने वाली है. उस दिन वे ट्रेन में होंगे. असमिया सखी नये घर में जा रही है, उसने सोचा नये वर्ष में उसका नया घर देखने वे जरूर जायेंगे. शाम को लाइब्रेरी जाकर किताबें वापस करनी हैं, और यात्रा में साथ ले जाने के लिए कुछ पत्रिकाएँ भी लानी हैं.

आज की सुबह की शुरुआत बड़े अजीब ढंग से हुई, जून ने उसे रोज की तरह उठाया और उसने स्वभावतः कहा कि कल उन्हें जाना है तो सुबह और भी जल्दी उठना पड़ेगा और फिर यह भी कि नन्हे और जून को तो कल स्कूल व दफ्तर  नहीं जाना होगा सो सम्भवतः उतनी जल्दी भी नहीं होगी, पर जून के अनुसार उनकी छुट्टी कल से शुरू नहीं हो रही है, जिस दिन जाना हो दफ्तर जाकर यदि sign कर दिए और वापस आकर भी यदि sign कर दिये या फोन से इन्फॉर्म भी कर दिया तो ड्यूटी ज्वाइन कर ली ऐसा माना जाता है. सब ऐसा ही करते हैं. कैसा अजीब सिस्टम है यह, उसकी समझ से बाहर. वैसे ही ऑफिस के दिनों में लोग सीट से गायब रहते हैं और.. इसी बात पर उसने जून को कुछ कहना चाहा पर उनको यह बात इस कदर नागवार गुजरी कि नाराज हो गये, खैर थोड़ी देर बाद( उनके क्रोध से उसके सिर से नैतिकता का भूत उतर गया) सब शांत हो गया, इन्सान सिस्टम का शिकार होकर इतना तटस्थ हो जाता है कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता कि जो वह कर रहा है गलत है. वह जो इतनी किताबें पढ़ती है, सच्चाई, ईमानदारी, नैतिकता, और मूल्यों की बात करती है, क्या वह केवल किताबों तक ही सीमित नहीं है, कदम-कदम पर लोग समझौते करते हैं, वे सुविधा उठाना चाहते हैं जिन पर उनका अधिकार नहीं है. यह मानसिक उथल-पुथल कहीं उसे अस्वस्थ न कर दे.

कोलकाता गेस्ट हाउस
It is their first morning away from. Yesterday at 10.45 they started from home to air port. Air Bus took one and half hour to reach Calcutta. Flight was good except one thing, their’s was last seat and two times they suffered foul smell but it was nothing compared to the smell they felt while coming from Calcutta airport to guest house in park street. They passed it in few minutes but people who live their day and night continuous breath in it, in that sense Calcutta is a stinking city. Here in park street their guest house is on sixth floor but traffic noise is as much as on first floor in any other city. She could not sleep due to noise and due to excitement of journey and their meeting with Punjabi didi’s family. She got three dress materials from a shop near by. Cloth is very good and of a different texture.

पुरी गेस्ट हाउस
आज सुबह उसकी नींद साढ़े तीन बजे ही खुल गयी, एक स्वप्न उसे सूर्योदय देखने जाने के लिए जगा रहा था, जून ने समय देखा और वे कुछ देर और सो गये. पांच बजे उठकर समुद्र तट पर गये, रास्ते में अँधेरा था, तट सुनसान था, पर सोडियम लाइट के कारण काफी उजाला था, जो दूर तक लगी हुई हैं. आकाश और पानी का रंग पहले श्याम था, फिर नीला हो गया और बाद में सुरमई, लाल होने की प्रतीक्षा करते रहे पर धुंध की वजह से सूर्य दिखाई नहीं दिया, सुबह की शुद्ध हवा में समुद्र की लहरों का उतर-चढ़ाव और दूर पानी में तिरती पाल वाली नावें बहुत अच्छी लग रही थीं. सवा छह बजे वे वापस आ गये, नहा-धो व नाश्ता करके भ्रमण के लिए निकले. कोणार्क मन्दिर, धौली, उदयगिरी की गुफाएं, नन्दन कानन और लिंग राज मन्दिर देखे. चन्द्रभागा तट पर नारियल पानी पिया. ‘पिपली’ से कुछ खरीदारी की, भुवनेश्वर से बुद्ध की एक मूर्ति खरीदी. पूरा दिन उड़ीसा की नई-पुरानी जगहों को देखने में निकल गया. नंदन कानन में सफेद बाघ व शेरों को देखना नन्हे के साथ उनके लिए भी एक सुखद अनुभव था, शेर खुले में घूमते-घूमते सड़क तक आ पहुंचे थे, और आराम फरमा रहे थे. जून ने कई तस्वीरें उतारीं. कल पुरी में उनका अंतिम दिन है. सुबह समुद्र तट पर नहाने का कार्यक्रम है, नन्हा इसके लिए तैयारी करके आया है.





Tuesday, March 11, 2014

नये स्कूल में पहला दिन


आज का इतवार कुछ अलग है, जून सुबह नौ बजे ही नाश्ता करके निकल गये, दो बजे लौटे. नन्हा यहीं पडोस में किसी के यहाँ पिकनिक पर गया है. मौसम आज गर्म है, कुछ देर पूर्व कुछ बूँदें पड़ीं फिर थम गयीं. कल दोपहर भर और सुबह भी नन्हा टेनिस खेलता रहा, धूप से चेहरा लाल हो गया पर जोश कम नहीं था. वह DPS जाने के लिए तैयार हो गया है, अब कुल मिलाकर बीस बच्चे हो गये हैं जो यह से जायेंगे.

कल फिर उड़ीसा और बंगाल के तटवर्ती इलाकों में तूफान आया सो यहाँ भी बदली फिर छाई है, उन्हें थोड़ी देर बाद दिगबोई के लिए निकलना है, नन्हे की फ़ीस जमा करनी है, ड्रेस व किताबें खरीदनी हैं. कल से वह स्कूल जाएगा. सुबह उसे उठाया तो अपने खराब मूड में था, शायद नींद से उठाने पर बच्चों का ऐसा ही मूड रहता हो, शायद उन्हें सपनों से जगाया जाना नागवार गुजरता हो. वह सुबह-सवेरे ही उस पर झुंझला गयी, कुछ देर वह उदास रहा फिर सामान्य हो गया. कल से उसे और भी जल्दी उठाना होगा, देखें क्या होता है, कहीं उनकी सुबहें करुण दृश्यों से न भर जाएँ ! कल शाम उसने नन्हे को संज्ञा के भेद, उदाहरण आदि पढाये, जाने से पूर्व सर्वनाम भी पढ़ाना है. उसने देखा है, अक्सर उसके जबड़े एक दूसरे पर दबाव डालते हैं. तनाव ग्रस्त होने पर ऐसा होना स्वाभाविक है, पर सामान्य अवस्था में भी ध्यान न देने पर ऐसा हो जाता है. शायद नींद में भी ऐसा होता होगा. नींद में तरह-तरह के विचार एक के बाद एक मन में आते हैं. जिनका आपस में कोई तारतम्य नहीं होता न ही कोई अर्थ निकलता है. ध्यान किये हफ्तों बीत गये हैं. नन्हे के DPS जाने पर सुबह वक्त मिल सकेगा.
आज नन्हा पहली बार अपने नये स्कूल में नई कक्षा में बैठा होगा, सुबह वह पांच बजे उठी, सवा  पांच बजे उसे उठाया और साढ़े छह बजे तक ही जून और वह दोनों तैयार थे. आज उसका रिजल्ट भी निकलने वाला है. पड़ोस का बच्चा ले आएगा. उसकी कुछ किताबें नहीं मिली हैं, स्वेटर भी बाजार बंद होने के कारण नहीं मिला. कल शाम वह पुराना गृह कार्य करता रहा. रात वे जल्दी सो गये ताकि सुबह तरोताजा होकर जल्दी उठ सकें. नन्हे का स्कूल का अनुभव ही बतायेगा कि उनका उसे दिगबोई भेजने का निर्णय सही है या गलत. आज जून को अपना पेपर प्रस्तुत करना है. इतवार को उन्हें बाहर जाना है. आज कृष्णामूर्ति की पुस्तक में पढ़ा कि जीवन में क्रम स्वयंमेव आना चाहिए प्राकृतिक रूप से, ऊपर से थोपी हुई कोई भी वस्तु स्वाभाविक नहीं होती और न ही उसका असर होता है. प्रत्येक मानव यदि अपने स्वाभाविक रूप में रहे तो द्वंद्व पैदा ही न हो.

कल नन्हे का रिजल्ट आया और जैसी कि उन्हें उम्मीद थी वह अपने सेक्शन में प्रथम आया है. वैसे वह इससे भी अच्छा कर सकता है, कल उसका पहला दिन अच्छा रहा, शाम को आया तो खुश था, कल से कई लोगों ने बधाई दी है, कुछ लोग पूछते हैं कि नन्हे को DPS में दाखिला कैसे मिला आदि. उनकी ख्वाहिश थी कि उसे अच्छे स्कूल में पढ़ायें सो ईश्वर ने पूरी कर दी है. आज बहुत दिनों बाद उसने पीटीवी पर एक ड्रामा देखा, दिल को छू जाते हैं भोले भाले किरदार, अपने बेहद अपने लगते हैं. आज सुबह उसने ‘रामकुमार भ्रमर’ की एक कविता रजनी बाला पढ़ाई, उस छात्रा को अपनी लिखी एक कविता भी दिखाई. पिछले पूरे हफ्ते वह DHC के लिए नहीं पढ़ सकी. अर्थात हिंदी लेखन के कोर्स के लिए.  




Friday, February 14, 2014

उड़िया फेस्टिवल



आज क्रिसमस ईव है और एक मित्र के विवाह की वर्षगाँठ भी. शाम को उनके यहाँ जाना है, नन्हे को क्लब जाना है, जहां बच्चों को सांता क्लाज उपहार व स्नैक्स देते हैं. आज ही उनका कम्प्यूटर भी आने वाला है. कल शाम जून ने दीदी का पत्र दिया, वह आध्यात्मिक रूप से कहीं आगे हैं. उनकी सहनशक्ति कहीं ज्यादा है, उसे लगा, इस तरह तुलना नहीं करनी चाहिए, उनका दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट है कहीं शंका की गुंजाइश नहीं जबकि वह इधर-उधर बिना पतवार की नौका की तरह डोलती रहती है. उसे उनके पत्र से कुछ जवाब तो मिले हैं पर कुछ नये सवाल भी खड़े हो गये हैं. कल जून ने शिकायत की कि उसके पास उनके लिए समय नहीं है. वह कर्त्तव्य मात्र समझकर किसी कार्य को करना नहीं चाहती पर उसे लगा जीवन में संतुलन के लिए ऐसा करना जरूरी है. कल उन्हें पिकनिक पर जाना है, दिसम्बर के महीने में गुनगुनी धूप में नदी के ठंडे पानी की छुअन, सोचकर अच्छा लगता है, माँ-पापा के आने पर उन्हें भी ले जायेंगे वे नदी के तट पर.

नये साल का आखिरी दिन...कभी तो यह साल भी नया ही था, हर वर्ष नया बनकर ही आता है और कल...यह इतिहास बन जायेगा. पिछले कई दिनों से वह कुछ नहीं लिख सकी, पिकनिक अच्छी रही, उसके अगले दिन जून तिनसुकिया गये उसके सिर में दर्द था. उनका एसी भी बनकर आ गया है. नन्हे के साथ सुबहें कैसे बीत जाती हैं पता ही नहीं चलता, आज उसके शीतावकाश का अंतिम दिन है. कल से यानि नये साल के पहले दिन से स्कूल खुल रहे हैं, जिसे आने में अब कुछ ही घंटों का वक्त रह गया है.

नये वर्ष की सुबह नशीली भी है और सुहानी भी ! सुबह अलसाये से सात बजे के थोड़ा बाद ही उठे, सभी को फोन पर नये वर्ष की शुभकामनायें दीं, सभी को उनके कार्ड्स भी मिल गये होंगे. एक उत्सव की तरह सेवइयों की खीर से नये वर्ष का स्वागत किया, उसे याद आया, धर्मयुग का विशेषांक निकलता था नये साल पर, अब तो उन्हें महीनों, वर्षों हो जाते हैं धर्मयुग पढ़े हुए. हिंदी की कोई पत्रिका वह इस वर्ष मंगाएगी, सृजनात्मक लेखन का कोर्स जो करना है. हसबैंड नाईट के लिए एक skit भी लिखनी है. पाठ और योगासन करने के बाद उसने मन ही मन संकल्प लिया है,  इन दोनों कार्यों के साथ साथ प्रतिदिन कुछ लिखेगी भी. अभी काफी काम पड़ा है लेकिन उन कामों के कारण अपने निजी कार्यों की बलि नहीं चढने देगी. जून अपनी कार को वैक्यूम क्लीन कर रहे हैं और नन्हा पास खड़े होकर खुद भी करने की जिद करके उन्हें झुंझला रहा है. कल रात जून ने प्रेस जाकर हिंदी की कम्पोजिंग का काम पूरा करा दिया. मेहमानों के आने में ग्यारह दिन का वक्त रह गया है, उसे सारे घर की सफाई करनी है और सिलाई का कार्य भी अभी शेष है. आज शाम को क्लब में ‘उड़िया टी’ का आयोजन किया गया है, उसकी उड़िया पड़ोसिन सुबह से तैयारी में व्यस्त है.




Sunday, November 17, 2013

नेता जी की जन्म शताब्दी


रात्रि के आठ बजने वाले हैं, आज सुबह से ही व्यस्तता ने घेरा हुआ है, इस वक्त थोड़ा सा रुक कर सुस्ताने का मन हो रहा है. सुबह से ग्यारह बजे तक रोजमर्रा के कामों में व्यस्त रही. आज जून की पसंद की भरवां टमाटर की सब्जी बनाई थी. दोपहर को कुछ देर ‘संडे’ पत्रिका पढ़ी, फिर गुलाबी कपड़े के तीन रुमाल काटे और नन्हे के आने के बाद कल की पिकनिक के लिए पनीर  मसाला बनाने की शुरुआत की. जिसमें डेढ़ घंटा लगा. शाम को टहलने गये और वह गैस से कुकर  उतर कर रखना भूल गयी आग बहुत धीमी थी फिर भी लौकी-वड़ी की सब्जी पानी सूखने से बुरी तरह जल गयी. जून ने अपना स्पेशल बूंदी का रायता बनाया है और चखने के लिए पनीर मसाला तो है ही.

पिकनिक से वापस आकर रात के खाने की तैयारी करके और नहा धोकर आराम से बैठने के बाद अच्छा लग रहा है, नन्हा अपना बचा हुआ होमवर्क पूरा कर रहा है. विशेष थकान भी नहीं है, सुबह ७.२० पर वे घर से चले थे, कुल मिलाकर पिकनिक अच्छी रही, कुछ फोटो भी खींचे. नदी का पानी ठंडा था और उसमें देर तक बैठे रहने से ठंडक का अहसास भीतर तक हो रहा था, किनारे पर बिछी थी स्वच्छ रेत.. सभी खुश थे.

Today something is somewhere wrong ! Jun is losing his temper on small things. She does’nt know why, but she is feeling it and… आज सुबह वे वक्त पर उठे थे पर उनके दफ्तर जाने से पूर्व उसने पत्रिकाओं के बारे में कुछ कहा था, शायद उसी बात का असर हो. शाम को खेल में भी उनका मन नहीं था, खैर, कभी-कभी ऐसा सबके साथ होता है. नन्हे के कल से टेस्ट हैं, वह पढ़ रहा है.

दो-तीन दिनों तक तेज धूप निकलने के बाद आज मौसम फिर सर्द है, बादल हैं, एक दो बार सूरज उनकी ओट से झाँका भी तो धूप में गर्माहट नहीं थी. अभी-अभी नैनी का छोटा बेटा अंग्रेजी पढकर गया है, उसे अल्फाबेट आ गया है और कुछ शब्द लिखने भी आ गये हैं, लेकिन उसके पास क्लास १ की कोई पुस्तक नहीं है जिससे सिलसिलेवार पढ़ाई की जा सके, आज उसे छोटे-छोटे   वाक्य लिखने को दिए हैं. दोपहर खाने पर आये तो जून का मन ठीक था, वह खुश थे, सम्भवतः कल उन्हें फील्ड भी जाना पड़े. नन्हे के आज दो टेस्ट हैं, उसकी टीचर के कहने पर तेल लगाना भी सीख गया है. आजकल रामायण में हनुमान जी द्वारा सीता का पता लगा कर आने की कथा चल रही है, कल से ‘युद्ध कांड’ आरम्भ होगा, और रामायण समाप्त होने पर वह फिर से ‘भगवद् गीता’ पढ़ेगी जो जीने की कला सिखाने में पूर्णतया सक्षम है.

जून आज ‘हाफजान’ गये हैं, शाम को आएंगे, बहुत दिनों बाद उसे लंच अकेले ही खाना है, सो जब पेट में चूहे कूदने लगेंगे तभी खाएगी, जो भायेगा वही और जितना भायेगा उतना. कल शाम को वे एक मित्र परिवार के यहाँ गये, वहन एक और परिवार मिला, MR थोड़े शर्मीले स्वभाव के लगे बड़े भाई की तरह बच्चों से तुतलाकर बात करने वाले, MRS काफी एक्टिव थीं, डेढ़ साल की बच्ची की माँ को शायद ऐसा ही होना पड़ता है. नन्हे ने सब बच्चों को टाफी दीं, जो कई दिनों से इकट्ठी कर रहा था. शाम को बैडमिंटन भी खेला, अब उसकी रूचि इसमें बढ़ गयी है.


पिछले दो दिन जून और नन्हे दोनों की छुट्टी थी, परसों नेता जी के जन्मदिवस की, उनकी जन्म शताब्दी मनाई जा रही है इस बरस. उसने सोचा तो लगा नेता जी के विषय में वे कितना कम जानते हैं. उस दिन उन्होंने स्टोर की सफाई की और ‘माचिस’ देखी. उसे बहुत अच्छी नहीं लगी यह फिल्म. शाम को नन्हा एक मित्र के जन्मदिन में गया और वे अपने मित्र के यहाँ. कल दिन भर बूंदा-बांदी होती रही, मौसम बेहद ठंडा था, लंच में डोसा बनाया उसने. पड़ोसिन ने अपने बगीचे से ब्रोकोली भेजी, जो शाम को बनाई. जून ने अपनी पसंद की दो मिठाइयाँ बनायीं, गुलाब जामुन और बेसन के लड्डू. लेकिन उसे मिठाई खाना ज्यादा पसंद नहीं है पर जून चाहते हैं, उनकी तरह वह भी मिठाई बहुत शौक से खाए, कभी-कभी उसे लगता है वह भूल ही गये हैं इन्सान जीने के लिए खाता है न कि खाने के लिए जीता है. बरसों से चलती आ रही, शायद आगे भी चलती रहेगी, उनकी नोक-झोंक का विषय अक्सर भोजन ही होता है. आज भी मौसम बेहद ठंडा है, सुबह-सुबह छोटी बहन को फोन किया, उसकी विवाह की सालगिरह है आज. नन्हा बहुत सोचने के बाद आखिर स्कूल चला गया है, बहादुर लड़का है, इतने दिन मना करने के बाद आज आखिर टोपी और दस्ताने भी पहने. 

Friday, May 17, 2013

बथुए का रायता


  



पिछले हफ्ते बुध को दोपहर में पुरानी पड़ोसिन के यहाँ गयी, बृहस्पतिवार को मौसम बेहद ठंडा था, सुबह साढ़े दस बजे तक कोहरा छाया था, शुक्र को तबियत कुछ नासाज थी, शनी-इतवार वैसे ही व्यस्तता बढ़ जाती है, और अब आज सोमवार हो गया है, सुबह से अभी तक सभी कुछ सामान्य है, आज खतों के जवाब का दिन भी है, दीदी का पत्र भी पिछले हफ्ते आया है. देवांग पर जो कविता वह लिखने वाली है, एक पंक्ति  और मिली है, उसी ईश्वर ने  दी है, जिसे एकमात्र उपहार जो वह दे सकती है, वह है ‘प्रेम’, ईश्वर ने हर बार उसे मार्ग से विचलित होने से बचाया है. कल दोपहर एक पल के लिए जून झुंझला गये थे, पर बाद में अपने ढेर सारे स्नेह से भिगो ही तो दिया. वह सचमुच उसे और नन्हे को बेहद-बेहद प्रेम करते हैं. उन तीनों का ही वजूद एक-दसरे से है, एक के बिना दूसरा कुछ भी नहीं.

 आज फिर तीन दिनों के बाद डायरी खोली है. कल वे इन सर्दियों की आखिरी पिकनिक पर गये, आनन्द उतना तो नहीं आया पर अच्छा ही था. आज उसके मुंह का जायका जीभ में हो गये छाले की वजह से कुछ अजीब सा हो गया है, शायद गार्गल करने से कुछ ठीक होगा.  सुबह नन्हे से वह किसी बात पर नाराज हो गयी, उसे सॉरी बोलना चाहिए था, पर सारा काम चुपचाप खुद करता रहा, बिना एक भी शब्द बोले, जाते समय भी यही कहा, माँ, हो गया. उसे थोड़ा कठोर होना पड़ा पर उसे यह सिखाना जरूरी था कि सॉरी बोलने में कोई हर्ज नहीं. आज मौसम अच्छा है, उसके सारे सुबह के काम भी हो चुके हैं, फिर भी एक नामालूम सी बेचैनी है, शायद छाले की वजह से या स्कूल जाते समय नन्हे की आँखों में छलक आये दो आंसुओं की वजह से. वैसे भी ग्यारह बजने में सिर्फ बीस मिनट हैं, उसे अभी दाल में तड़का लगाना है, बथुए को मसलकर दही में डालना है, सलाद काटना है और फुल्के सेंकने हैं. सो लिखना यहीं बंद. आज जून को मिले नये साल के सारे ओफ़िशिअल कार्ड्स को भेजने वालों की लिस्ट बना दी है, देखें अब वे इसका इस्तेमाल भी करते हैं या नहीं ?

जनवरी का महीना देखते-देखते ही बीत गया, यानि नया साल एक महीना पुराना हो गया. आज स्वस्थ अनुभव कर रही है, सामान्य ढंग से बात भी कर पा रही है, शायद यह बाहर खाना खाने की वजह से हुआ हो, खैर अब सब ठीक है तो इन पलों को कायदे से जीना चाहिए. सुबह कुछ पलों के लिए कुछ अच्छा सा फिर नहीं लग रहा था फिर एक गिलास पानी पिया और ईश्वर को याद किया, जिसे आजकल ज्यादा ही याद करने लगी है, कबीर दास ने सही कहा है, दुःख में सुमिरन सब करे...नन्हे का स्वेटर बन गया है, बांह की सिलाई शेष है, अभी करे तो वह स्कूल से आकर पहन सकता है. कल दोपहर टीवी पर एक फिल्म देखी, “संध्या छाया” बहुत मार्मिक थी, बुढ़ापे में आदमी इतना अकेला हो जाता है ?



Monday, February 18, 2013

पिकनिक का भोज



जून का फोन आया है, वह नाहरकटिया जा रहे हैं, लंच पर देर से आएंगे. उसने बहुत दिनों बाद वह नीली साड़ी पहनी है, जो छोटी चाची ने खरीदी थी, सुंदर है, लेकिन चाचीजी अब पहले जैसी नहीं रहीं, परेशानियों ने उन्हें तोडकर रख दिया है, वक्त से पहले बूढी हो चली हैं. कल लगभग एक वर्ष बाद वे अपनी पुराने घर के पड़ोस में गए, उड़िया पडोसिन के यहाँ, वहाँ एक और परिचिता मिलीं, दुबली-पतली सी, पूरी तरह से अपने छोटे छोटे दो बच्चों में व्यस्त..कल पिता का पत्र आया है, जमीन की रजिस्ट्री जून के नाम हो गयी है. और शायद इसी वर्ष के अंत तक उनका मकान बन भी जाये. थर्मोकोल पर पेंटिंग करने में उसे बहुत आनंद आ रहा है, इसके बाद कागज पर करेगी. लेकिन वह एक घंटे से ज्यादा नहीं कर पाती क्रोशिये का मेजपोश भी बनने वाला है फिर टैटिंग करेगी. कल रात स्वप्न में देखा, गणित पढ़ा रही है, वह भी उसका एक प्रिय काम है.

वह लॉन में झूले पर बैठ कर धूप में बाल सुखाते हुए लिख रही है, पीठ पर धूप का तेज ताप भीतर तक छू रहा है. डहेलिया का दूसरा फूल भी आधा खिल गया है. परसों इतवार को उन्हें पिकनिक पर जाना है, डेरॉक है जगह का नाम, पूरे ग्रुप के लिए “मटर-पनीर” उसे शाम को बना कर रखना है, क्योकि सुबह जल्दी निकलना है, शाम को उन्हें एक शादी में भी जाना है, पड़ोस के खाली घर में, लगता है वह विवाह घर बनता जा रहा है. The day of the feast पढ़ ली है, अब एक और अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना शुरू किया है, सारे काम करते हुए बीच-बीच में थोड़ी देर के लिए कोई किताब पढ़ने का समय निकाल लेना, चाहे तीन-चार पेज ही क्यों न हों, अच्छा लगता है, जैसे धूप में चलते-चलते कुछ पल के लिए कोई छांह में रुक जाये. कल रात नन्हा नींद में नीचे गिर गया और उसे पता भी नहीं चला, नीचे भी आराम से सो रह था, उसकी नींद बहुत पक्की है. उसके स्कूल में आजकल ज्यादा पढ़ाई नहीं हो रही, नहीं जायेगा कहकर फिर चला गया है, उसे अनुपस्थित होना पसंद नहीं है.

कल इतवार था और पिकनिक के कारण एक यादगार इतवार बन गया, वे सुबह साढ़े छ बजे निकले और शाम साढ़े पांच बजे लौटे. मौसम अच्छा है, अब चिप्स बनाने का समय आ गया है, अगले महीने आज ही के दिन होली है. कल रात स्वप्न में छोटी बहन को देखा, बहुत कमजोर और अस्वस्थ लग रही थी, उसकी फ्रेंड्स भी थीं, वह माँ को बुला रही रही थी. आज जून को दिल्ली फोन करके पता करने को कहा है, इसी महीने उसकी डिलीवरी डेट है, ईश्वर सब कुशल करेगा.

होली पर वे क्या-क्या बनाएंगे, इस बात पर उसने जून के साथ बात की, मतभेद स्वाभाविक ही था, कभी कभी इस तरह नोक-झोंक होनी ही चाहिए, एक-दूसरे के विचार पता चल जाते हैं. आज उसने आलू चिप्स बनाये हैं. छोटे भाई का पत्र आया है फोटोग्राफ्स भी, बहुत अच्छे आए हैं फोटोग्राफ. आजकल उसने अपने दिन को कई टुकड़ों में बाँट लिया है और हर एक टुकड़े का एक खास काम है, व्यस्तता के कारण कुछ और सोचने का समय ही नहीं मिलता, समय मिलते ही कोई किताब सामने आ जाती है. कविताओं से इतनी दूर चली गयी है कि..लगता है कविता खाली समय की उपज होती है. बहुत दिनों से टीवी पर कोई कवि सम्मेलन भी नहीं आया जिससे प्रेरणा मिले.  





Wednesday, January 9, 2013

हर कोई चाहता है...क्या?



आज फिर कई दिनों के बाद उसने डायरी खोली है, सोचती रोज थी, पर कुछ लिखे ऐसा मन नहीं होता था. आज खत लिखने बैठी तो इसे भी ले आई और अब यह उसके सामने है. सबसे पहले ध्यान आया कि कुछ देर पूर्व पंजाबी दीदी को फोन किया था मिली नहीं, शायद अस्पताल गयी हों, कल अगर फ्लाईट आई हो तो उसकी एक मित्र भी आ गयी होगी. पर वह  यह सब क्यों लिख रही है, वह तो अपने आप से बातें करने आई थी. क्या खुद का सामना करना इतना मुश्किल है, शायद आजकल हो गया है उसके लिए. कितना कुछ हुआ इन दिनों में, छोटी बहन का विवाह हो गया, वे घर गए, दिल्ली गए, कोलकाता गए वापस आये. उसका गला भी खराब हुआ, कल पिकनिक में गए और भी न जाने कितनी बातें. पर यह सब तो वह  लिखना नहीं चाहती थी, फिर वह क्या है जो लिखना चाहती है, जो उसके मन के अंदर कहीं दबा, छुपा सा रहता है, पर फूट कर नहीं आता...वह कोशिश ही नहीं करती, पर कुछ है जरूर..जो उसे औरों से पृथक करता है, जो सिर्फ उसका है, ऐसा कुछ जो आजतक बाहर आने के लिए ही वहाँ बसा है. धीरे-धीरे वह अपने आप ही बाहर आएगा, जब वह कागज-कलम लिए उसका स्वागत करने को तत्पर रहेगी, जो बाहर आकर भी उसके मन को खाली नहीं करेगा बल्कि भर डालेगा उसे, सम्पूर्णता देगा उसे, कविता में कितनी बड़ी ताकत है यह...कवि को रीता  नहीं करती, जब एक भाव कवि उड़ेंलता है तो कहीं अंतर में एक घट भर जाता है, और ऐसे ही कई भाव सुगबुगा रहे हैं उसके अंतर्मन में, कहीं तो कोई है जो इन्हें समझेगा...पर जब तक ये बाहर नहीं आते खुद ही कहाँ समझती है..और वह कोई कौन होगा शायद कोई भावी पाठक...कितने दिनों वंचित रखा है उसने उन्हें..कितने दिनों प्रतीक्षारत रखा है स्वयं को..पर कभी तो टूटेगा यह मौन?

आज मौसम फिर ठिठुर रहा है, धूप एक पल के लिए आती है फिर चली जाती है. कल नूना ने लिखना शुरू किया तो समय का आभास ही नहीं रहा, जून के आने पर ही पता चला, दिन कैसा अच्छा बीता..शाम को टीटी खेलने गए, हॉल खाली था, वे आराम से खेल सके. कल यात्रा से यहाँ आने के बाद का पहल पत्र बड़े भाई-भाभी का मिला. नन्हा आज सुबह उठना ही नहीं चाह रहा था, कल दोपहर सोया नहीं था शायद इसीलिए, उसे दस-ग्यारह घंटे तो सोना ही चाहिए. पंजाबी दीदी फिर नहीं मिलीं फोन पर, उसने सोचा कुछ देर में फिर करेगी, उन्हें यहाँ से चले ही जाना है इसीलिए शायद वह पहले सा जुडना नहीं चाहतीं, नहीं तो इतने दिन फोन न करें, ऐसा नहीं हुआ. होता है ऐसा, इंसान जब जहां से जाना चाहता है नाते तोड़ना चाहता है पर जब इस दुनिया से जाना होगा...कितनी भयावह लगती है मृत्यु, शायद उतनी है नहीं पर कभी-कभी जब वह सोचती है एक दिन यह सब कुछ छोडकर शून्य हो जाना होगा तो डर लगता है, जीवन से इतना मोह है तभी समझ में आता है. अचानक उसे अपनी असमिया मित्र का ध्यान हो आया, आज उसका मन इधर-उधर ही जा रहा है, वह एकाग्रता जो लेखन में चाहिए, आ ही नहीं रही है, कोई एक विषय हो या एक बिंदु हो जिस पर मन साधना है तो आसान होगा. पर वह आधार, वह बिंदु कहाँ से लाये ? लाना भी अपने अंदर से होगा..ढूँढना होगा मन में गहरे उतर कर, यह खोज भी तो एक विषय हो सकता है. हर इंसान को हर पल किसी न किसी कई तलाश रहती ही है, किसी को सुख की किसी को शांति की तो किसी को दोस्त की और किसी को दुश्मन की... तलाश करते-करते ही जीवन चूक जाता है, किसी को भगवान की तलाश है...भगवान जो कभी नहीं मिलते, कभी उसका मन भगवान को मानने से इंकार क्यों करता है...तब जब दिमाग मन पर हावी हो जाता है. यह मानना न मानना भी तो एक तरह की तलाश है.

Monday, November 19, 2012

काजीरंगा का गैंडा



माँ-पिता का पत्र आया है, कुछ दिन पूर्व दादीजी का स्वर्गवास हो गया. उसके मन में यादों का एक चलचित्र चलने लगा, उनके साथ बिताए कितने ही दिन याद आए, कितनी अच्छी थीं वह, लिखा है, चोट लगने से एकाएक मृत्यु हो गयी. उसने सोचा, वह जैसी मृत्यु चाहती थीं वैसी ही उन्हें मिली, जीवन चाहे वैसा न मिला हो. कल सोनू का पहला पेपर हो गया इंग्लिश का, आज गणित और कविताओं का है. जून को सम्भवतः एक डेढ़ महीने और इसी तरह तलप आना-जाना पड़ेगा. इतवार दोपहर को आए थे, सोमवार सुबह चले गए. उसने उनसे वह बात भी कह दी, सोचेंगे, कहा है उन्होंने. उसके मन में भी कितनी ही बातें घुमड़ती रहीं इस सिलसिले में.

नन्हे का आज हिंदी का इम्तहान है, कल अंतिम परीक्षा है. कल शाम को उसकी एक उड़िया मित्र आयी थी, पिछले कुछ दिनों में अपने बेटे को तीसरी बार स्टीम-बाथ देने, उसका बेटा कुछ मोटा हो गया है, किसी ने कहा कि भाप में नहलाने से स्लिम हो जायेगा. उसे लगता है वह कुछ ज्यादा ही परेशान हो रही है.

पिछले कई दिनों से डायरी नहीं लिखी, उन्हें राष्ट्रीय उद्यान काजीरंगा जाना था, पहले कुछ दिन यात्रा की तैयारी में लगे, फिर यात्रा में और फिर क्रिसमस की छुट्टियों में क्लब, पिकनिक आदि. आज वर्ष का अंतिम दिन है. काजीरंगा में उन्हें बहुत अच्छा लगा, सुबह सवेरे घने कोहरे में पगडण्डी पर कार चलाकर उस स्थान पर जाना जहां से हाथी की सवारी शुरू होती है, एक अविस्मरणीय क्षण था. वहां एक सींग वाले गैंडे मिलते हैं, वहाँ का विस्तृत वृतांत लिखे उसका मन तो है, पर कब लिखेगी कुछ कह नहीं सकती. जून अभी तक बाहर ही हैं बीच-बीच में आते हैं एकाध दिन के लिए. नन्हे का स्कूल भी परसों खुल रहा है. इस वक्त वह चित्र बना रहा है.

पिछले दिनों अकेले होने के कारण कई बार वे लोग कई बार उस पंजाबी परिवार से मिले. पिछली बार जब वह घर गयी थी तो माँ-पिता से उनके बारे में पूछा था कि किस तरह से वे हमारे रिश्तेदार हैं. उन्होंने विस्तार से बताया एक अच्छी खासी कहानी बन गयी.

पाकिस्तान में एक लालचंद कटारिया थे, जिनकी शादी बागां से हुई, नूना की दादी की दादी के भाई की लड़की इस बागां की माँ थी. लालचंद व बांगा की पुत्री की शादी नूना की माँ के ममेरे भाई के साथ हुई. उनका पुत्र था अमर, जो नूना के पिता जी का सहपाठी था. उसकी शादी राज से हुई जो उसकी माँ की सहपाठिनी थी. इनके पुत्र ही असम में रहने आए..जिनकी पत्नी के माता-पिता भी नूना के माँ-पिता के परिचित थे. उनकी माँ नूना की माँ के साथ भारत आने के बाद पढ़ती थीं.
एक दिन उसने ये बातें जब उनको बतायीं तो वे भी चकित हुए.