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Thursday, March 26, 2015

गुरू पूर्णिमा का चाँद


गुरू पूर्णिमा’ में कुछ ही दिन शेष हैं. उस दिन वह उपवास व मौन व्रत भी रखने का विचार रखती है. गुरू से उसका मानसिक सम्पर्क बना हुआ है इसका आभास कल दोपहर को हुआ जब हृदय में से उसके नाम का उच्चारण स्पष्ट सुनाई पड़ा. वह दर्द में थी उस पीड़ा में गुरू की आवाज जैसे मरहम लगाती हुई आयी. बहुत अच्छा लगा. वासनाएं मिटती जा रही हैं, क्रोध आने से पूर्व ही शांत होने लगा है. जाने कौन आकर समझा जाता है, जो कहने वाली थी वह न कहकर कुछ ऐसा कहती है जो प्रेम को दर्शाता है, अर्थात प्रेम की पकड़ क्रोध से ज्यादा हो गयी है. सभी के प्रति बस एक ही भाव उसे अपने हृदय में दिखायी पड़ता है, प्रेम और स्नेह का भाव. सभी उस परमात्मा के ही तो हैं जिसे वह इतना चाहती है. कभी-कभी दोनों आँखें भर जाती हैं. आँसू बहते हैं पर इनमें भी कैसी प्रसन्नता है. वह कृष्ण भी जैसे उसका साथ पसंद करने लगा है. वह उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता. उस कृष्ण के नाम के साथ भाव की हिलोरें उठती हैं. समझ नहीं आता कौन ज्यादा प्रिय है सद्गुरु या कान्हा. कभी लगता है दोनों एक ही हैं और वह अपना मन उन्हें अर्पित कर देती है. her ordinary mind merges with their wisdom mind.

आज जागरण में ‘श्रद्धा’  के बारे में सुना. श्रद्धा जितनी दृढ होगी सात्विक भाव भी उतना ही दृढ़ होगा. आज सुबह वे उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी धूप न होते हुए भी उमस युक्त गर्मी है, पर उनकी सुबह ‘योग’ से होती है, ऐसे में मौसम की प्रतिकूलता या अनुकूलता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता. ईश्वर ने, उसके कान्हा ने भी तो कहा है कि शीत-उष्ण, सुख-दुःख सभी में समान भाव से रहते हुए अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहना होगा. सुख बाहरी परिस्थितयों पर नहीं बल्कि उनके सच्चे स्वरूप पर निर्भर करता है जो सदा एक सा है, आकाश के समान मुक्त, विक्षेप रहित !

आज गुरू पूर्णिमा है. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. स्नान-ध्यान किया फिर नन्हे और उसके मित्र के लिए नाश्ता बनाया. आजकल वह लाइब्रेरी से लायी The Gospel of Buddha पढ़ रही है. शाम को aol के फॉलो अप में जाना है. कल शाम को मन उद्ग्विन था, ध्यान किया सोने से पूर्व. काफी समय बाद लगा कि अब सो जाना चाहिए. मन एक छोटे बालक की तरह व्यवहार करता है उसे उसी तरह मनाना, पुचकारना और कभी-कभी फटकारना भी पड़ता है. गुरुमाँ कहती हैं जिसके विचारों की श्रंखला टूट गयी है वही मुक्त है, सो वह हर क्षण मन पर नजर रखती है कि कहीं कोई बिन बुलाये मेहमान सा अनचाहा विचार तो प्रवेश नहीं कर रहा. उसे क्षण भर देखें तो जैसे समुन्दर में लहर स्वयं शांत हो जाती है वह विचार स्वयं समाप्त हो जाता है. पर देखना पड़ेगा अन्यथा पता ही नहीं चलता और एक से दूसरा शुरू होते होते श्रंखला सी बन जाती है. आज सुबह पिताजी व छोटी बहन से बात की, जो आजकल मुम्बई में है. पिता ने कहा राखियाँ अच्छी बनी होंगी. उसके लिए तो वह अध्याय समाप्त हो गया है. सिर्फ यह क्षण यानि वर्तमान का क्षण जीवित है. जो छूट गया वह चला गया और अब मृत प्रायः है. उन्हें हर क्षण को अंतिम क्षण मानकर जीना आ जाये तो मन क्यों अतीत व भविष्य के चक्कर लगाए. यही बुद्ध कहते हैं, यही योग वसिष्ठ में कहा गया है यही श्री श्री कहते हैं.




Tuesday, August 12, 2014

ग्लेडिएटर - अमेरिकन एपिक ड्रामा


आज सुबह जून ने कहा, “हैप्पी सेवेंथ” और तब उसे लगा कि आजकल वह उनका ज्यादा ख्याल नहीं रख रही है, ज्यादातर वक्त उसके मस्तिष्क में नन्हे की अस्वस्थता का ख्याल रहता है या फिर किताबें. कल रात से वर्षा लगातार हो रही है. इस साल पूरे देश में ही वर्षा काफी हुई है, फिर भी इतने बड़े देश का कोई न कोई भाग सूखे की चपेट में आया होगा. बंगाली सखी ने फोन पर नन्हे का हाल पूछा, बाकी सभी से कई दिनों से कोई बात नहीं हुई है. नन्हे के ठीक होने पर ही वे कहीं जायेंगे. घर से पत्र भी नहीं आया है, कल स्वप्न में मंझले भाई को देखा, वे इस बार उनका दिया उपहार नहीं लाये शायद वह.... वरना कभी-कभी उसका पत्र तो आ जाया करता था. सुबह ‘जागरण’ में सुना इस संसार में सभी रिश्ते स्वार्थ पर आधारित हैं, स्नेह की धारा लोगों के दिलों में सूख जाती है वक्त के साथ-साथ... एक उसका मन ही है जो सभी को याद किया करता है, शायद वे लोग भी ऐसा ही सोचते हों.  खैर, उसकी आध्यात्मिक यात्रा में कुछ शिथिलता आ गयी है. इच्छा मुक्त मन की कल्पना कर आज ध्यान में बैठी तो अच्छा लगा था, कोई प्रार्थना नहीं, कोई आशा, अपेक्षा नहीं निर्विकार, शांत मन !

प्रधानमन्त्री विदेश यात्रा पर गये हैं, देश का हित होगा उनके प्रयासों से. अस्वस्थता के बावजूद वे अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं. पिछले दिनों UNO में विश्व शांति सम्मेलन हुआ और आजकल सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष मिलकर चर्चा कर रहे हैं, शांति की स्थापना ही उसका उद्देश्य है. उनके काश्मीर में भी शांति की स्थापना हो !   

आज अभी सुबह के आठ बजे हैं, मौसम सुहाना है, वर्षा होकर थमी है, अभी भी बदली है, हवा में शीतलता है. नन्हे को अब हाथ में दर्द नहीं है, कल उसने Gladiator देखी, नई फिल्म है, आज वह भी देखने का विचार रखती है. कल शाम जून उन्हें अपने दफ्तर ले गये, internet surfing करने पर लाइन नहीं मिली. वे वापसी में इस फिल्म का CD लाये. रात को स्वप्न में उसने net surfing की तथा पिता को जून से बात करते हुए भी सुना, स्वप्न में इन्सान की सारी इच्छाएं अपने आप पूर्ण हो जाती हैं.

जैसे-जैसे बुद्धि विवेकशील होती जाएगी, मन कामना से मुक्त होता जायेगा. कर्म के फल की आसक्ति नहीं रहेगी, कोई अपेक्षा नहीं रहेगी. ध्यानस्थ होना सरल होता जायेगा. आज उपरोक्त वचन सुने, मन कैसा आश्वस्त हो गया. जो सत्य बाहर दीखता है वही सत्य भीतर भी घट रहा है, प्रतिपल, प्रतिक्षण ! जो भीतर के सत्य को देखना सीख जाये वही मुक्त है. धर्म परम मुक्त होना सिखाता है. बात बहुत सीधी है और सरल है पर वे जानकर भी अनजान बने रहते हैं.

Nanha their son is eating his lunch. Today he went to hospital, doctor said that plaster would be opened after two more weeks so they have to wait and watch. Yesterday didi rang her, she could not tell her about Nanha’s health, neither they have told her parents. That day she came to know, her cousin sistermarriage has been fixed on 26 Nov, she has to write at least one congratulation letter.


जून ने आज सुबह तिनसुकिया जाने की बात कही, उनके अनुसार नन्हे को यदि कल से स्कूल जाना है तो आज का अभ्यास ठीक रहेगा, इससे पता भी चल जायेगा कि सफर में उसे दर्द या असुविधा तो नहीं होगी. उसे स्कूल गये पन्द्रह दिन हो गये हैं, आज अंतिम परीक्षा है. सुबह घर से father-in-law का फोन आया वे चिंतित थे, जो स्वभाविक है. इस समय साढ़े आठ ही हुए हैं पर धूप कल की तरह इतनी तीव्र है कि लगता है दोपहर हो गयी है. उसके सुबह के कार्य हो चुके हैं. नन्हा अभी तैयार नहीं हुआ है, उसकी बातें सुनना, उससे फिजिक्स के प्रश्न पूछना और साथ-साथ टीवी पर कोई कार्यक्रम देखना बहुत अच्छा लगता है. बच्चों का दृष्टिकोण अलग होता है, वे पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होते. 

Wednesday, February 26, 2014

शिवरात्रि का अवकाश


कल ही वह दिन था, जिसके लिए इतने दिन से तैयारी चल रही थी, वह लगभग सारा दिन व्यस्त रही, सुबह का थोड़ा वक्त, दोपहर के दो घंटे और पूरी शाम वहीं बीती, बल्कि रात्रि को लौटने में उन्हें आधी रात हो गयी थी. नन्हा गहरी नींद में सो रहा था. उसने असम सिल्क की साड़ी पहनी और एक कमरे की चाबी भी उसे दी गयी थी, जिसकी देखभाल उसे करनी थी. बहुत सी समर्पित सदस्याएं थीं जो बड़ी लगन से सब काम कर रही थीं. आज फिर वह क्लब गयी और एक सखी से मंगाई लकड़ी की बड़ी मेज उनके यहाँ वापस भिजवाने का प्रबंध किया. शाम को वहाँ बधाई देने जाना भी है, उन्होंने एक पुरस्कार जीता है, तीन दिनों के लिए दो बड़ों और दो बच्चों के लिए मुफ्त गोवा यात्रा का पुरस्कार.

आज उसे लग रहा है, जीवन एक वफादार दोस्त की तरह हर पल साथ निभाता है. खुशियाँ देता है, उन्हें महसूसने की सलाहियत भी और कितने नये किस्से कहानियाँ गढ़कर मन बहलाता है उसका असीम-अतीव अनोखा स्नेह भाव, जो वह अंतर में भर देता है, कोमल भावनाएं, सिहरन और शांत हृदय की हिलोरें, ऊपर उठने का मौका देती हैं. वह सम्भालता है अपने दोनों हाथों से संवारता है आज और कल को, वह मौका देता है दानी बनने का और उसकी खुद की झोली में तो न जाने कितने कितने उपहार भरे हैं, नीले आकाश पर टंके सितारे, हरी धरती पर चमकते मोती, कोई अनोखा गीत और संगीत !

जीवन प्रतिपल बदलता रहता है, यह नदी की उस धारा के समान है जिसमें गति है, स्पंदन है, गहराइयों और अनंत की चाह है न कि उस तालाब के पानी की तरह जो अपनी सीमाओं में बंधा हुआ है.

आज नन्हे ने कहा परीक्षाएं आने वाली हैं, वह घर में ज्यादा पढ़ सकता है, सो स्कूल नहीं जायेगा, पर उस समय भूल ही गया कि आज स्कूल में निबंध प्रतियोगिता होनी थी. उसकी छात्रा का कोर्स भी पूरा हो गया है. आज संगीत कक्षा उनके घर में होगी. सुबह जून के जाने के बाद समाचार सुने, वही चुनाव सम्बन्धी और उत्तर प्रदेश के संवैधानिक संकट के समाचार, फिर zee पर सुधांशु जी महाराज का प्रवचन आ रहा था, बहुत अच्छी बातें कहीं उन्होंने, अच्छे भाव का मन में प्रस्फुरण होना कभी-कभी ही होता है सो ‘शुभस्य शीघ्रम’ का पालन करते हुए उस कार्य का सम्पादन कर ही लेना चाहिए. सात्विक लहरें मन में यदा-कदा ही उठती हैं जैसे वसंत ऋतु में वाटिका से उठने वाली सुवासित पवन ! पौधों को सहेज रही थी कि जून आ गये, आज उन्हें जल्दी जाना था. कल फोन से घर पर बात की, सासु माँ की आवाज ख़ुशी से भरी हुई थी, वहाँ इतनी परेशानियों को सहकर भी वे लोग खुश हैं, यह इन्सान की जिजीविषा का ही तो परिणाम है, मानव मन की विचित्रता पर ही तो आज प्रवचन में कहा गया - यह ऊंचा उठे तो आकाश की ऊँचाइयां भी कम हैं और गिरने को आये तो पाताल की गहराई भी कम पड़ेगी.

कल सुबह जब सारे कार्य हो गये तो जून की बात याद आयी कि वह घर पर पत्र लिख दे जिसमें सासु माँ को होली पर साड़ी खरीदने के लिए कहना था, क्योंकि जो पार्सल उन्होंने भेजा था, खुला हुआ मिला और साड़ी गायब थी. उसने एक के बजाय दोनों घरों पर पत्र लिखे. फिर कुछ देर टीवी पर ‘हम पांच’ देखा, पूरी टीम बाँध लेती है और एक बार देखना शुरू कर दें तो पूरा देखे बिना मन नहीं मानता. जून आज सुबह तीन दिनों के लिए ‘शिकोनी’ गये हैं, इस समय जोरहाट पहुंचने वाले होंगे, नन्हा आज घर पर है, आज शिवरात्रि का अवकाश है. मौसम ठंडा है, बादलों की वजह से पूरे घर में बल्ब जल रहे हैं. माँ होतीं तो पीछे आंगन में या बरामदे में चारपाई पर बैठतीं कि सुबह हो गयी है इसका पता तो चले.

जून के बिना यह शाम कितनी सूनी-सूनी लग रही है, दिल है कि बैठा जा रहा है, हाथ-पाँव ठंडे हो रहे हैं और आँखें पता नहीं क्या तलाश रही हैं, मालूम नहीं था कि जून के बिना वक्त काटना इस कदर भारी होगा, दिन भर तो ठीक ही रहा, नन्हे को पढ़ाने में कुछ टीवी देखने में गुजर गया पर शाम...लम्बी हो गयी है, फोन भी नहीं मिला, यूँ शाम को उन्होंने फोन किया था, नम्बर भी दिया था पर अभी करने पर नहीं मिला, कल सुबह बैक डोर पड़ोसिन के यहाँ जाना है, शाम को मीटिंग है, सो बीत जाएगी, वैसे, कमेटी की मीटिंग में जाने का उत्साह दिनोंदिन कम होता जा रहा है. अब उसे कोई ऐसा कार्य ढूँढना चाहिए जिसमें एक घंटा आराम से बीत जाये और याद न सताये.


Monday, February 3, 2014

शेफाली का दरख्त


कल-परसों वह कुछ लिख नहीं पायी, आज जून देर से आने वाले हैं, सो समय का सदुपयोग करते हुए डायरी उठा ली है. पर मन में कार्यों की एक सूची बनने लगी है, घर जाने से पहले गाउन ठीक करना है, भाई दूज पर टीका भेजना है. वह तो अपना कर्तव्य पूरा करेगी ही, मन में कई विचार आये और ऊपरी तौर पर हलचल मचाकर चले गये, क्या स्नेह की कोई परीक्षा हो सकती है, या कीमत या बदला, नहीं स्नेह तो बस स्नेह ही है. उसके गले में खराश अभी तक शेष है, पाचन भी पूरी तरह ठीक नहीं है, नन्हे को भी सर्दी लग गयी है, फिर ईश्वर के सिवाय कोई सहाय नजर नहीं आता, वही मदद करेगा जैसे अब तक करता आया है. सुबह दो-तीन फोन करने थे सो व्यायाम भी नहीं कर पायी.

कल दोपहर जून से वह कुछ बात करना चाहती थी, पर वह इसके लिए तैयार नहीं थे. उसने कहीं पढ़ा था, कुछ लोग किसी कीमत पर भी बहस में पड़ना नहीं चाहते सो ऐसी बात कह देते हैं जिन्हें सुनकर सामने वाला घबरा ही जाये. उनका स्वभाव ही ऐसा होता है, खुलकर बात करने से झिझकते हैं, पता नहीं क्यों, सब ठीक-ठाक रहे, दबा छिपा सा, ऊपर से सब सही लगे बस ऐसा ही वे चाहते हैं. सम्बन्धों में खुलापन सहन नहीं कर पाते. किसी विषय पर बात को गहराई तक ले जाना उन्हें नहीं भाता. उथला-उथला ही रहता है सब, ताकि कुछ बिगड़े भी तो ऊपर से संवार दें. यह उनकी परवरिश का हिस्सा है और इसमें यदि वे कुछ चाहें तभी कुछ हो सकता है अन्यथा नहीं, वह उनके अनुरूप स्वयं को ढाल सके कोशिश तो यही रहती है पर जब कभी अपनी विवशता का अहसास होता है तो..उसके ख्याल से हर स्त्री को अपनी मर्जी से आर्थिक निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए जहां उसकी रूचि-अरुचि की परवाह वह स्वयं करे, अपने लिए अपने परिवार के लिए और..यह स्वप्न कभी पूरा होगा...या ?

पिछले दिनों मन कुछ खिंचा-खिंचा सा था, वह कहते हैं न sound body has sound mind सो गले की खराश का असर मन पर हुआ और मन का दायीं कोहनी के ऊपर तथा कान पर. पर अब हालात सुधर रहे हैं और साथ ही मन भी. नन्हा भी कल से बेहतर है.

नन्हे के यूनिट टेस्ट खत्म हो गये, परसों उन्हें जाना है. जून उन दोनों को लेकर होमियोपैथी डॉ के पास गये थे, यात्रा के लिए कुछ दवाएं दी हैं. कल दोपहर उसने तीनों आल्मरियाँ साफ कीं, सलीके से लगे हुए कपड़े अच्छे लग रहे हैं. शाम को वे टहलने भी गये, शेफाली का पेड़ श्वेत फूलों से भर गया है और सुगंध बरबस अपनी ओर खींच लेती है. उसने सोचा उसकी उस बातूनी सखी को यह सुगंध और पेड़ अच्छा लगेगा. माँ का पत्र आया है, उन लोगों ने अभी तक नये घर में शिफ्ट नहीं किया है, वह घर जो उनके घर के सामने है, भविष्य में कई वर्षों के वाद जब वे उस घर में रहने जायेंगे तो पड़ोसी अपने ही लोग होंगे. आज सुबह साढ़े चार बजे उठी, अलार्म सुनने के बाद और सायरन बजने के बीच मन सपनों की दुनिया में उठा, गेट खोला, बाहर फूल थे और धुंधली सी सुबह !

उसकी संगीत अध्यापिका के ससुर की मृत्यु हो गयी कल रात आठ बजे यहीं अस्पताल में. अभी अभी पता चला, पिछले कई दिनों से वह अस्वस्थ थे. पिछले कई दिनों से वह उनके घर जा रही थी पर एक दिन भी बात नहीं की. उन्हें उसके जाने से असुविधा भी होती होगी पर अब वह यह कभी जान नहीं पायेगी. मानव जीवन नश्वर है और जितना समय हमें मिला है शांति और सद्भाव के साथ गुजर सकें तो ही उचित है. पर ऐसा हो हो नहीं पाता है. कभी किसी और कभी किसी कारण लोग संतुष्ट नहीं रह पाते. ईश्वर भी तब अपरिचित लगता है. शायद यह असंतोष उसी का नतीजा है. पूर्णतया स्वयं पर निर्भर रहना इतना आसान नहीं है, अपने हर एक क्षण की, हर मूड की जिम्मेदारी स्वयं लेनी पडती है, तो कभी अपराध भाव, कभी उदासी, कभी असंतोष, कभी आत्मविश्वास की कमी यानि सभी के सभी नकारात्मक भावों का सामना करना पड़ता है. जीवन एक कड़वी दवा लगने लगता है और आसपास की शांति भी असहनीय लगने लगती है.

अभी तक गला ठीक नहीं हुआ है न उसका और न ही नन्हे का. शायद आने वाले सफर और आने वाले दिनों के बारे में सोचकर ही मन परेशान है, या फिर शरीर की अस्वस्थता के कारण सदा उत्साहित रहने वाला मन मुरझा सा गया है, हो सकता है इसका कोई और कारण भी हो, जिसके बारे में वह सोचना नहीं चाहती, जिसने जिन्दगी की गाड़ी में पिछली सीट ले ली है. सुबह उसकी असमिया सखी का फोन आया था, उसने एक ऐसी बात बताई जो उसके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, उसके परिवार में एक नया मेहमान आने वाला है और उसने यह बात किसी और को बताने से मना किया है.




Friday, May 17, 2013

बथुए का रायता


  



पिछले हफ्ते बुध को दोपहर में पुरानी पड़ोसिन के यहाँ गयी, बृहस्पतिवार को मौसम बेहद ठंडा था, सुबह साढ़े दस बजे तक कोहरा छाया था, शुक्र को तबियत कुछ नासाज थी, शनी-इतवार वैसे ही व्यस्तता बढ़ जाती है, और अब आज सोमवार हो गया है, सुबह से अभी तक सभी कुछ सामान्य है, आज खतों के जवाब का दिन भी है, दीदी का पत्र भी पिछले हफ्ते आया है. देवांग पर जो कविता वह लिखने वाली है, एक पंक्ति  और मिली है, उसी ईश्वर ने  दी है, जिसे एकमात्र उपहार जो वह दे सकती है, वह है ‘प्रेम’, ईश्वर ने हर बार उसे मार्ग से विचलित होने से बचाया है. कल दोपहर एक पल के लिए जून झुंझला गये थे, पर बाद में अपने ढेर सारे स्नेह से भिगो ही तो दिया. वह सचमुच उसे और नन्हे को बेहद-बेहद प्रेम करते हैं. उन तीनों का ही वजूद एक-दसरे से है, एक के बिना दूसरा कुछ भी नहीं.

 आज फिर तीन दिनों के बाद डायरी खोली है. कल वे इन सर्दियों की आखिरी पिकनिक पर गये, आनन्द उतना तो नहीं आया पर अच्छा ही था. आज उसके मुंह का जायका जीभ में हो गये छाले की वजह से कुछ अजीब सा हो गया है, शायद गार्गल करने से कुछ ठीक होगा.  सुबह नन्हे से वह किसी बात पर नाराज हो गयी, उसे सॉरी बोलना चाहिए था, पर सारा काम चुपचाप खुद करता रहा, बिना एक भी शब्द बोले, जाते समय भी यही कहा, माँ, हो गया. उसे थोड़ा कठोर होना पड़ा पर उसे यह सिखाना जरूरी था कि सॉरी बोलने में कोई हर्ज नहीं. आज मौसम अच्छा है, उसके सारे सुबह के काम भी हो चुके हैं, फिर भी एक नामालूम सी बेचैनी है, शायद छाले की वजह से या स्कूल जाते समय नन्हे की आँखों में छलक आये दो आंसुओं की वजह से. वैसे भी ग्यारह बजने में सिर्फ बीस मिनट हैं, उसे अभी दाल में तड़का लगाना है, बथुए को मसलकर दही में डालना है, सलाद काटना है और फुल्के सेंकने हैं. सो लिखना यहीं बंद. आज जून को मिले नये साल के सारे ओफ़िशिअल कार्ड्स को भेजने वालों की लिस्ट बना दी है, देखें अब वे इसका इस्तेमाल भी करते हैं या नहीं ?

जनवरी का महीना देखते-देखते ही बीत गया, यानि नया साल एक महीना पुराना हो गया. आज स्वस्थ अनुभव कर रही है, सामान्य ढंग से बात भी कर पा रही है, शायद यह बाहर खाना खाने की वजह से हुआ हो, खैर अब सब ठीक है तो इन पलों को कायदे से जीना चाहिए. सुबह कुछ पलों के लिए कुछ अच्छा सा फिर नहीं लग रहा था फिर एक गिलास पानी पिया और ईश्वर को याद किया, जिसे आजकल ज्यादा ही याद करने लगी है, कबीर दास ने सही कहा है, दुःख में सुमिरन सब करे...नन्हे का स्वेटर बन गया है, बांह की सिलाई शेष है, अभी करे तो वह स्कूल से आकर पहन सकता है. कल दोपहर टीवी पर एक फिल्म देखी, “संध्या छाया” बहुत मार्मिक थी, बुढ़ापे में आदमी इतना अकेला हो जाता है ?



Saturday, October 20, 2012

बच्चे मन के सच्चे



पिछली बार उसने शिकायत की थी सो इस बार जून पहले से उसके लिए नए वर्ष की कत्थई डायरी रखकर गए हैं, पहले पन्ने पर शुभकामना भी लिख दी है. उसकी यह पंक्ति पढकर मन कुछ स्थिर हुआ है वरना नए वर्ष का पहले दिन इतना उलझन भरा है कि बस.. सब कुछ गड्डमड्ड हो रहा है सुबह से. ऊपर से लाइट भी गायब है. बिजली है मगर उनके यहाँ तार हिल जाने से नहीं आ रही. एक तो इतनी देर से आँख खुली, सारी परेशानी तभी से शुरू हुई, सर में हल्का दर्द भी है, शायद घर से बाहर निकलने पर खुली हवा में ठीक हो जाये. चुपचाप आंख बंद करके बैठी रहे ऐसा ही मन हो रहा है इस समय, पर नन्हे ने ठीक से नाश्ता नहीं किया है, उसने सोचा उसके न रहने पर भी तो ऐसे ही करता होगा. उठो लेट तो सभी काम लेट हो जाते हैं, ग्यारह बजे हैं, बारह बजे वह स्कूल जायेगी, तैयार होने में उसे विशेष देर नहीं लगती. कल रात जून को स्वप्न में देखा, क्लब में है, वह नन्हे को लेकर पैदल ही क्लब जा रही है. वहाँ नए साल का कार्यक्रम है. कल रात नव वर्ष की पूर्व संध्या पर टीवी पर उन्होंने दो अच्छे कार्यक्रम देखे, शायद इसी का परिणाम था यह स्वप्न.

कल दिन की शुरुआत जितनी उलझन भरी थी अंत उतना खराब नहीं था. जून को पत्र लिखते लिखते ही मन हल्का हो गया. उसके प्यार ने हर बार उसे डूबने से बचा लिया है. उसके स्नेह की कोई सीमा नहीं, भले ही उसने वादे न किये हों पर...आज उसका भी पत्र आयेगा. कल गोपिराधा में आठवीं में बहुत दिनों बाद गणित पढ़ाया, ठीक था मगर आज कल से भी अच्छी तरह पढ़ाना होगा, ज्यादा बड़ी प्रमेय है आज. ननद का जन्मदिन है आज, वह शाम को उसे उपहार दिलाने ले जायेगी. कल बड़ी बुआजी का पत्र आया बहुत दिनों के बाद. फुफेरी बहन को चौथा बच्चा हुआ, बेटी, लेकिन उसकी मृत्यु हो गयी, यह पढ़कर उसे दुख नहीं हुआ, बहन भी अजीब स्थितियों का शिकार हो गयी है. कितनी बार दर्द सहेगी, बुआजी भी उसे समझाती नहीं हैं.  
कल जून के चार पत्र आए और विवाह की वर्षगाँठ के लिए एक कार्ड भी. वह तिनसुकिया गए उस कार्ड को लेने. आज गुरु गोविन्द सिंह की जयंती के उपलक्ष में अवकाश है. सुबह से ठंड काफी है, दोपहर को धूप निकली. कल शाम से सोनू की तबियत कुछ ठीक नहीं है, इस समय सोया है, माथा गर्म है, पर उसके पास क्रोसिन भी तो नहीं है.

आज पढ़ने या लिखने के नाम पर शून्य है, यहाँ तक कि न पत्र लिखा न पढा. आज एक कार्ड आया छोटे भाई के फादर इन ला का, इसका हिंदी अनुवाद ठीक सा नहीं लगता. सुबह नाश्ता बना रही थी कि पता चला सात तारीख तक स्कूल-कालेज सब बंद है. उसे अपनी पढ़ाई सलीके से शुरू कर देनी चाहिए, टीचर्स के सहारे रहकर तो कोर्स पूरा हो नहीं सकेगा. आए दिन स्कूल-कालेज बंद रहते है आजकल, या फिर इसी वर्ष ऐसा हो रहा है. शुरू से ही छुट्टियाँ ही छुट्टियाँ, एक तरह से अच्छा ही है नन्हे के लिए और उसके लिए भी, ज्यादा दिन उसे छोड़कर नहीं जाना पड़ा है. पर यह भी लगता है कि इस कारण परीक्षाएं देर से न हों. दोपहर को सोनू को सुलाया, लाइट नहीं थी सो ऊपर छत पर चली गयी किताब लेकर, आधा घंटा भी नहीं हुआ होगा की लाइट आने पर नीचे आयी, नन्हा जगकर रो रहा था, वह उसे ढूँढ रहा था, उसकी तबियत ठीक न होने के कारण ही शायद देर तक सो नहीं पाता. इस समय रात्रि के नौ बजने वाले है, नन्हा खेल रहा है, बच्चे थोड़ी सी उर्जा भी बचा कर रखना नहीं चाहते.





Friday, October 19, 2012

बड़ा दिन ठंडा सा



आज उसने तीन फाइलों का काम खत्म किया, अभी फाइनल का लेसन प्लान बनाना है. बैठे-बैठे उसकी कमर अकड़ गयी है, काफी देर से कुर्सी पर बैठी है और कपड़े सिलने में भी सीधा बैठना पड़ा, कितने ही सलवार-कमीज की सिलाई खुल गयी थी वही ठीक करती रही. लिखने का काम अभी भी बहुत है. शेष पढ़ाई तो बिलकुल नहीं हो रही है. लाइब्रेरी से कुछ किताबें ली थीं, उनसे भी नोट्स बनाने हैं.

इतवार के कारण कल टीवी पर महाभारत आया, सभी के साथ नन्हा भी बहुत शौक से देख रहा था. उन्हें एक परिचित परिवार के यहाँ जाना था, दो घंटे तो लग ही गये. आज कालेज शायद बंद है, अब न भी हो तो क्या, वह तो नहीं गयी है, लिखने का काम आज तो पूरा कर ही लेना चाहिए. आज सुबह उसने जून को पत्र लिखा, पोस्टमैन भी एक घंटे में आ जायेगा. आज उन्होंने दोपहर का भोजन जल्दी बना लिया है, अब कोई चिंता नहीं. सिर्फ लिखना और आराम करना दिन भर..पढ़ना-लिखना बस...एक बजे नन्हे को सुलाएगी, अभी बारह बजे हैं.
आज जून के पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स मिले, हमेशा की तरह मधुर से पत्र..ऐसा लगता नहीं कि उससे दूर है...या उससे दूर रहने की आदत पड़ गयी है. धीरे धीरे सम्बन्धों में स्थिरता आती है, फिर यह भौतिक दूरी मायने नहीं रखती. इतनी दूर रहकर भी वे एक-दूसरे को उसी तरह समझ सकते हैं जैसे पास रहकर. छोटी बहन का पत्र आया है, वह खुश है. माँ-पिताजी का पत्र भी आया है, छोटा भाई भी गुड़िया का पापा बन गया है. उसने सोचा आज ही जवाब दे दे तो ठीक रहेगा, फिर बाद में उपहार भेजेगी, एक स्वेटर या फ्रॉक !

अब रात को ठंड बढ़ गयी है, आज से रजाई लेनी होगी. अभी तक कम्बल से ही काम चल रहा था. परसों कालेज खुल रहे है. मेजर का काफी कार्य हो गया है, अब चार्ट बनने का काम शेष है, कल बाजार जाकर चार्ट पेपर खरीदेगी. आज क्रिसमस है, बड़ा दिन, पर उनके लिए आज का दिन बड़ा किसी भी तरह से तो नहीं है. मन बेचैन है, एक घुटन सी महसूस कर रहा है, और माहौल भी वही है कल का सा बेचैनी भरा. कल उसने जून को अधूरा पत्र लिखा अब उसका पत्र आने पर ही पूरा करेगी.

साल का अंतिम दिन और साल का अंतिम रविवार भी. कल से नववर्ष का शुभारम्भ हो रहा है और उसका मन हर वर्ष की तरह कई मधुर कल्पनाओं से ओत-प्रोत है...जून की स्मृति भी है तो..स्नेह की मधुर यादों के साथ उन्हें एक अच्छा खत लिखेगी और पुराने वर्ष के सभी पत्रों के जवाब भी देने हैं न...नए वर्ष में नए खत नए जवाब..!

Wednesday, August 29, 2012

स्वप्नों सा संसार



दो सप्ताह बाद उसे कुछ लिखने का समय और सुविधा मिली है. यहाँ आये इतने दिन बीत गए, जून वापस असम चले गए. सभी रिश्तेदार भी एक-एक करके चले गए. अब घर खाली हो गया है. आज छोटी ननद भी कॉलेज गयी है. नन्हा ऊपर खेल रहा है अपने दादाजी के साथ. दादी-दादा दोनों का मन स्नेह का असीम सागर है, कितना गहरा दुःख मन में छिपाए ऊपर से खुश रहने का प्रयत्न करते हैं. सासूजी तो दिन में रोने के कई बहाने निकाल लेती हैं पर पिता शांत ही रहते हैं. एक दिन उसने देवर के खत पढ़े न जाने कितने मित्रों के खत आते थे उसके नाम. उसकी एक दीदी नीला को उसने पत्र लिखा था, मिल गया होगा. मन होता है उसकी उस मौसेरी बहन को पत्र लिखे जो अंतिम घड़ी में उसके साथ थी, पर माँ को पसंद नहीं है. आज जून का पत्र भी आना चाहिए, कल उसका फोन आया था पर उनके पहुंचने के पूर्व ही कट गया, कल शाम वे उसके एक मित्र के घर गए कि वहाँ उसका फोन आयेगा पर उनका फोन ही खराब था. उसका ध्यान अपने लम्बे नाखूनों पर गया, इतने दिन काटने का समय ही नहीं निकाल पायी.

कल रात वे सभी भोजन कर रहे थे कि जून का टेलीग्राम मिला. पहले तो टेलीग्राम का नाम सुनकर ही सब चौंक गए, फिर वह यह सुनते ही कि उसके नाम है, वह घबरा गयी, पर जून की कुशलता का तार था और उसने जानना चाहा था कि वे कैसे हैं, लगता है उसे उसका पत्र नहीं मिला है. परसों तक नहीं मिला होगा, उन्हें भी कल मिले उसके तीन पत्र एक साथ, अब तो जरूर मिल गए होंगे चार-पांच खत जो उसने इतने दिनों में पोस्ट किये. आज उसने कहा, वह छोटे भाई की शादी में जाना नहीं चाहती पर वे लोग जाने के लए बहुत जोर दे रहे हैं. सोनू के लिये एक जूता खरीदना है, कल अपनी  पैंट सिलवाने दादाजी के साथ गया, पहली बार उसकी नाप दिलवाई गयी. देवर के एक मित्र ने लद्दाख के तीन फोटो भेजे हैं. उसके अन्य मित्रों के भी चार-पांच पत्र आ चुके हैं, वह सोचने लगी कि सभी को जवाब दे या एक को लिख दे, वह अन्य सबको सूचित कर दे.

पिता का दुःख माँ के दुःख से बड़ा लगता है. दोनों दुखी हैं. दोनों को दुखी होने का अधिकार है. दोनों का युवा पुत्र दुनिया छोड़कर चला गया है. कहाँ गया है क्यों गया है यह भी कोई नहीं जानता. दुर्घटना तो दुर्घटना होती है इसमें कौन, कब, क्यों, कहाँ जा रहा है इसका हिसाब नहीं रखती. पर उनका दुःख कौन बांटेगा, कौन समझायेगा उन्हें और समझाने से क्या वह समझ जायेंगे. जगे हुए को जगाना कितना मुश्किल होता है वैसे ही दुखी व्यक्ति को समझाना भी. पता नहीं क्यों, पर उसे ऐसा लगता है.
कल रात दो स्वप्न देखे एक शुभ और एक अशुभ. वह और जून किसी पर्वतीय स्थल पर शायद गोवा असम, दार्जलिंग तीनों में से किसी एक जगह पर घूम रहे हैं, सीधी सड़क है, दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे घने वृक्ष हैं, वे चलते ही जा रहे है, सड़क खत्म होती है, दायीं तरफ नीचे घाटी है और बाएं किनारे ऊँचा टीला, जिस पर बहुत सारे हाथी हैं. पहले तो वे प्रकृति की सुंदरता निहारते रहते हैं, फिर जैसे ही उसकी नजर जाती है, वह कहती है हाथी, और एक हाथी जून के पीछे लग जाता है. वह आगे दौड़ता है वह पीछे है. तभी हाथियों के बच्चे भी नीचे उतर आते हैं एक बच्चा उसके पीछे पड़ता है पर उसे चोट नहीं आती. तभी एक जीप आती है, दरवाजा खुलते ही वह बैठ जाती है. ड्राइवर कहता है, your husband is in hospital . उसके बाद जून की मेडिकल रिपोर्ट देखती है औए सपना टूट जाता है.
दूसरे स्वप्न में देखा कि ननद माँ से कह रही है, भाभी का स्वप्न पूरा हुआ, यानि वह माँ बनने वाली है. पता नहीं क्यों आजकल उसे भी ऐसा लगता है. मगर ऐसा होने का कोई कारण नहीं. कितु कभी-कभी चमत्कार भी तो होता है.  

Monday, May 28, 2012

अमलतास के फूल


आज मौसम कितने दिनों बाद अपने सुन्दरतम रूप में है. सुबह पांच बजे ही वे उठ गए थे. अमलतास के फूल जो वे लाए थे अपने साथ प्रातः भ्रमण से लौटते समय, उनसे बैठक कैसी खिल गयी है. कल इतवार था सुबह सबने मिलकर सफाई की, सबसे कम काम उसने किया. जून के अनुसार इन दिनों में ज्यादा थकान होना अच्छा नहीं उसके लिये..उसका स्नेह दिन-प्रतिदिन उसके लिये बढ़ता ही जा रहा है. कल रात वे अपने कॉलेज के दिनों की स्मृतियाँ बाँट रहे थे कि जून ने ऐसा कुछ कहा, वह खो गयी उसके सच्चे मोती के समान स्वच्छ निर्मल स्नेह में. स्वयं भी तो उसे एक क्षण के लिये नहीं भूलती, वह घर पर हो या बाहर उसका मन उसकी ही बात सोचता रहता है सब कार्य करते हुए, सबसे बातें करते हुए भी.

कल उसने सब पत्रों के जवाब लिख दिये, आज हो सकता है, माँ का पत्र आये. आज भी मौसम अच्छा है सुबह जून जब ऑफिस गए तो वर्षा तेज हो गयी थी अब थम गयी है. कल संध्या वे अस्पताल गए थे, कितना छोटा और प्यारा सा था उसकी सखी का बेटा, उसके सिर पर रेशमी, काले, घने बाल थे. घर आकर वह कितनी देर उसके बारे में सोचती रही, और सोचती रही कि उसके घर आने वाले नन्हे मेहमान के बारे में, जैसे-जैसे दिन नजदीक आ रहे है, मन में एक अजीब सी उत्सुकता व बेचैनी बढ़ती जा रही है. पर एक विश्वास है उनके मनों में, कि जो भी होगा, अच्छा होगा, सब ठीक होगा.

Sunday, April 22, 2012

गणित की परीक्षा


एक दिन और बीत गया. जून को पत्र उसने दोपहर को ही लिख दिया था, जानती थी रात को सोने के लिये जाते-जाते काफ़ी देर हो जायेगी. जनवरी होने के बावजूद ठंड ज्यादा नहीं है, धूप इतनी तेज होती है कि हवा का कोई असर ही नहीं होता. वह आज भी दूध लेने गयी थी. लौटी तो पिताजी भी काम से आ चुके थे कुछ देर बैठकर बहुत अच्छी-अच्छी बातें बताते रहे, वह तो आजकल कुछ विशेष लिखती-पढ़ती नहीं है, कभी कभी अस्वस्थ भी महसूस करती है, पाचन क्रिया ठीक नहीं है. कभी बेचैनी भी लगती है. पता नही कैसा हो गया है उसका मन इन दिनों. सिवाय एक के उसे किसी की सुध नहीं आती. वही रहता है हर पल उसके मन में. कितने स्नेह से देखभाल करता था उसकी. सुबह देर से उठी. स्वप्न देख रही थी कि गणित की परीक्षा में शून्य मिला है, नींद से जगाने के लिये ही तो आते हैं ऐसे स्वप्न, और जागकर कितनी राहत मिलती है.