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Friday, April 10, 2026

टैको और बुरीटो

टैको और बुरीटो


आज दोपहर बाद जून उसे रिलाइंस ट्रेंड्स ले गये। पहली बार पाँच कुर्ते एक साथ ख़रीदे। पापाजी के लिए एक स्वेटर भी लिया। दिन भर वर्षा होती रही। सोलर पैनल में बिजली का न्यूनतम उत्पादन हुआ, मात्र पाँच यूनिट, धूप वाले दिन बीस यूनिट तक हो जाता है। तीन दिन बाद उन्हें यात्रा पर निकलना है। पापाजी उनके आने की राह देख रहे हैं। जून ने छोटी बहन के नये फ़ैमिली ट्री के लिए फ़ोटो प्रिंट कर लिए हैं।


आज शाम जून कगली पूरा थाने में सर्कल इंस्पेक्टर से मिले, साथ ही बेसकॉम के एक अधिकारी से भी। वे लोग कल सोसाइटी में आयेंगे। असोसिएशन के काम के सिलसिले में उन्हें नये-नये लोगों से जान-पहचान के साथ, नये अनुभव भी हो रहे हैं। 


आज वे दोनों एक नये परिचित परिवार से मिलने गये। संयोग वश उनका जन्मदिन था, केक, बोंडा व मिठाई से स्वागत किया। वापसी में एक रिटर्न गिफ्ट भी। सुबह घर पर मीटिंग थी, परसों जून को सोसाइटी के बिल्डर के दफ़्तर भी जाना है। विशेष सभा की सूचना दे दी गई है। 


आज बहुत दिनों बाद नूना ने डायरी उठाई है। यात्रा से आने के बाद से सर्दी लगी हुई थी, गला चुभ रहा था। आज कोरोना टेस्ट कराया है, रिपोर्ट दो-तीन दिनों में आएगी। सुबह टहलने गई तो कुछ तस्वीरें खींचीं, एक फ़ोटो ‘प्रतिबिंब’ कई लोगों को अच्छा लगा।जून अपने काम में फिर पूरी तरह जुट गये हैं। 


सुबह पाँच बजे नींद खुली। घर से आने के बाद ‘साधना’ पूरी तरह से आरम्भ नहीं हुई है। रिपोर्ट आनी बाक़ी है, नेगेटिव ही होगी। उसे याद है, वहाँ खुले में प्राणायाम, ध्यान आदि करती थी, तभी सर्दी लगी होगी।पापाजी ने उससे लेखन के बारे में पूछा।कविता लिखना जैसे छूट ही गया है, फिर किसी दिन अपने आप ही रस बरसेगा काव्य का। छोटे भाई की नातिन के लिए उसके पहले जन्मदिन पर एक कविता लिखी है। भतीजी व भांजी के छोटे पुत्र के लिए भी।


आज भी रिपोर्ट नहीं आयी। सोनू की रिपोर्ट निगेटिव आयी है। पापा जी से बात हुई, कह रहे थे, बहुत सी बातें भूल जाते हैं, अब अकेले रहने में थोड़ी दिक़्क़त होने लगी है। परमात्मा उनकी सहायता करेंगे। नन्हा व सोनू आये थे, चायनीज सब्ज़ी व चावल बनाये दोनों ने, शाम को कॉफ़ी। दोपहर को सबने जुरासिक वर्ल्ड देखी, बहुत रोमांचक फ़िल्म है। 


आज सुबह पक्षी विहार से शुरू हुई और शाम विलेज ड्राइव पर समाप्त हुई। दोपहर को पहली बार दम बिरयानी बनायी। शाम को सूर्यास्त के चित्र उतारे। बाइबिल में आये विरोधाभासों पर एक चर्चा सुनी।चर्चाकार ने अलग-अलग पुस्तकों में सुसमाचारों के विवरण और वंशावलियों में आये अंतर का ज़िक्र किया। बाइबिल में उत्पत्ति के दो वृत्तांत हैं और ईसामसीह की मृत्यु के विवरण भी अलग-अलग हैं। शायद इसलिए कि इसे कई लोगों ने लिखा था और बाद में संकलित कर दिया गया। लेकिन इसके मूल संदेश में इन विरोधी बातों के कारण कोई अंतर नहीं आता। 


शाम को पापाजी का फ़ोन आया, उन्होंने नूना की कविताएँ पढ़ीं, लेख भी। कह रहे थे, संभवत: उसके पिछले जन्म के संस्कार जागृत हुए हैं। उसने उन्हें बचपन में घर पर मिले संस्कारों की बात कही। उन्हीं से उसे प्रेरणा मिली है कि अपना समय व ऊर्जा परमात्मा को समर्पित रचनाओं को लिखने में लगानी हैं। 


आज वे सोसाइटी में रहने वाली एक परिचिता की बिटिया के विवाह समारोह में होटल ललित अशोक गये।वापसी में यहाँ की प्रसिद्ध कृत्रिम झील सैंकी टैंक देखने के लिए रुके, जो वहाँ से नज़दीक थी, किंतु उसका प्रवेश द्वार बंद था। यह टैंक बहुत पुराना है और सैंतीस एकड़ भूमि में फैला है, इसकी अधिकतम चौड़ाई आठ सौ मीटर है। जून किसी काम के सिलसिले में आज नापा के एक अन्य निवासी के यहाँ गये, उनकी पत्नी हिन्दी धारावाहिक “घर घर की कहानी” को कन्नड़ में डब करने का काम कर रही हैं।


आज घर पर असोसिएशन की विशेष सभा हुई। कमेटी ने दो प्रस्ताव रखे थे, पर पास नहीं हो पाये। अगली मीटिंग मार्च में होगी। दोपहर को नन्हे ने मेक्सिकन खाना बनाया था, “टैको और बुरीटो” बहुत स्वादिष्ट लगा। लगभग एक महीने बाद शाम को वे आश्रम गये। वहाँ जाते ही एक अनोखी ऊर्जा का अहसास होता है। गुरुजी शाम को एक बार नित्य दर्शन देते हैं, पर तब तक वह जा चुके थे, ऐसा चौकीदार ने बताया। वे सूचना केंद्र भी गये, मुख्य द्वार पर जो होर्डिंग लगी है, उसका प्रिंट पुराना हो गया है। उसे बदलवाने के लिए जून ने बात की। अगले महीने दो दिन तक सुबह एक घंटे के लिए गुरुजी का भगवद् गीता का कार्यक्रम है, जून ने कहा है, वह उसे छोड़ आयेंगे।बहुत दिनों के बाद आश्रम में गुरुजी को सुनने का अवसर मिलेगा।  


आज दिन भर सुबह देर से उठने का असर बना रहा। रात्रि की नींद से जो शक्ति शरीर व मन एकत्र करता है, यदि सुबह, समय से न उठकर तंद्रा में व्यतीत हो, तो सारी ऊर्जा व्यर्थ ही चली जाती है।भगवद् गीता के लिए रजिस्ट्रेशन हो गया, परसों पहचान पत्र लेना है।


आज कुन्नूर में भारतीय वायुसेना के Mi-17 V5 हेलीकॉप्टर दुर्घटना में जनरल विपिन रावत तथा उनकी पत्नी का देहांत हो गया। उनके साथ बारह जवान और थे। वे कोयंबटूर के सुलूर एयरबेस से वेलिंगटन स्थित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज जा रहे थे।घने बादलों और धुंध के कारण शायद पायलट सामने ठीक से देख नहीं पाया, जिससे हेलीकॉप्टर पहाड़ों या पेड़ों से टकरा गया।


आज सुबह वे दोनों आश्रम गये, फिर शेखर नेत्रालय। लगभग दो वर्ष बाद आँखों की जाँच करवायी।एक नया चश्मा बनने दिया है।वहाँ से नन्हे के घर चले गये। सोनू ने बहुत अच्छी तरह से स्वागत किया। उसने अपने ऑफिस के मज़ेदार किस्से भी सुनाये। नूना ने छोटे भांजे के जन्मदिन पर कविता लिखी।


आज दो वर्षों के बाद पहली बार आश्रम में किसी कोर्स में गुरुजी को सुना।कल भी जाना है।भगवद् गीता के आठवें अध्याय की व्याख्या अति सरल लग रही थी। इसमें अर्जुन श्रीकृष्ण से ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के बारे में प्रश्न पूछते हैं।श्रीकृष्ण ने कहा, परम अविनाशी तत्व ही 'ब्रह्म' है और प्रत्येक शरीर में जीवात्मा का रूप 'अध्यात्म' है।जीवों के उन भावों का मिट जाना कर्म कहलाता है, जो उनके भीतर अच्छे या बुरे संकल्प पैदा करते हैं।पाँच भूत अधिभूत हैं और परमात्मा का विराट स्वरूप अधिदैव है, जिसमें सूर्य, चन्द्र, वरुण आदि सभी देवता स्थित हैं। कृष्ण स्वयं सभी देहधारियों में अंतर्यामी रूप से रहते हैं। आज नन्हा व सोनू कर्नाटक के हसन जिले में पश्चिमी घाट पर स्थित एक पहाड़ी स्थान सकलेशपुर गये हैं। यहाँ अति प्राचीन सकलेश्वर शिव मंदिर है। टीपू सुल्तान का एक क़िला भी है।  

Wednesday, August 13, 2025

संयम की साधना

संयम की साधना



आज ‘संयम’ का दूसरा दिन है। कल की तुलना में ध्यान सरलता से लगा और देर तक भी। भीतर जैसे कोई सिखा रहा था, योग की साधना आरंभ करने से पूर्व यम-नियम का ज्ञान आवश्यक  है। यम अर्थात वे मूल्य, जो समाज में जीने का तरीक़ा सिखाते हैं। जब तक मन में हिंसा की प्रवृत्ति किसी भी रूप में है, नकारात्मकता बनी रहेगी। हिंसा के प्रति आकर्षण ही है जो मनुष्य को हृदयहीन बनाता है. योग में स्थित होने के लिए अहिंसा पहला मूल्य है. दूसरों के दुख को देखकर उदासीन बने रहना भी हिंसा है. अन्यों के दुख को देखकर बुद्ध के मन में करुणा का जन्म होता है, वह करुणा तभी उपजती है जब अहंकार शून्य होकर कोई अपने को परिवर्तित कर लेता है. ऊर्जा एक ही है चाहे कोई उसे अहंकार के रूप में उपयोग करे अथवा अस्तित्त्व के प्रति स्वयं के समर्पण के रूप में. जब तक साधक को अपने लक्ष्य का ज्ञान नहीं हो पाता, वह आगे कैसे बढ़ सकता है?


साधक का साध्य परमात्मा है और यदि वह स्वयं को अन्यों से श्रेष्ठ मानता है, तो वह हिंसा कर ही रहा है। अन्यों को हेय दृष्टि से देखने पर उन्हें दुख होगा। साधक मन में ईश्वर को धारण करता है, यह भाव अहंकार बढ़ाता है। मन को परमात्मा के प्रति समर्पित करना है, यह भाव विनम्र बनाता है। पूर्ण समर्पण ही उसके योग्य बनाता है। अन्य की संपत्ति देखकर उसे पाने की इच्छा मन में जगी तो लोभ मिटा नहीं, अस्तेय सधा नहीं।ज़रूरत से अधिक वस्तुओं का संग्रह भी व्यर्थ है और ब्रह्म में विचरण नहीं किया तो मन व्यर्थ की चेष्टाओं में ही लगेगा। इसी प्रकार भीतर संतोष बना रहे तो मन सहज ही प्रसन्न रहेगा। भीतर-बाहर की स्वच्छता रहे, तभी यह संभव है।


विपरीत परिस्थतियों में मन की समता बनी रहे, इसके लिए ईश्वर पर अटूट श्रद्धा और आत्म निरीक्षण की कला भी आनी चाहिए। इसके बाद आता है आसन का अभ्यास, जिसमें बैठकर प्राणायाम करना है। सभी इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर मन में धारण करना, मन को बुद्धि में और बुद्धि को आत्मा में स्थित करके आत्मा को परमात्मा में लीन कर देना ही ध्यान है। जब  दीर्घ काल तक यह सहज ही होने लगे, तो यही समाधि है।समाधि का अभ्यास जब दृढ़ हो जाता है तो जागृत अवस्था में हर समय भीतर एक स्थिरता का अनुभव होता है। मन को टिकने के लिए एक आधार, एक केंद्र मिल जाता है। मन एकाग्र रहता है, ऊर्जा व्यर्थ नहीं जाती और मन सहज ही प्रसन्न रहता है। जब सुने हुए और देखे हुए के प्रति कोई आकर्षण शेष नहीं रहता, तब वैराग्य घटता है।आज गर्मी ज़्यादा है, किंतु दिन भर आभास ही नहीं हुआ। रात्रि भ्रमण के लिए निकले तो हवा बंद थी। आज सुबह देखा, पैशन फ़्रूट की बेल नीचे गिर गयी है। पड़ोस में बनने वाले मज़दूरों ने जो हरे रंग की शीट लगाई थी वह भी गिर गई है। शायद कल वे उसे ठीक करेंगे। 


आज स्वसंचालित कोर्स का तीसरा दिन है। आज सुबह का ध्यान इतना गहरा नहीं था पर दोपहर बाद का बहुत रसपूर्ण।वर्षों बाद बालकृष्ण की छवि का ध्यान किया, सुबह जो वाक्य भीतर सुना  था वह सही सिद्ध हुआ। परमात्मा को सब कुछ पहले से ही ज्ञात होता है। शाम को भी कुछ देर भाव-जगत में विचरण किया। वेदान्त का ध्यान कितना सपाट होता है, शून्य का अनुभव, बस स्वयं के होने का: पर कोई साथ हो, जो राह दिखाने वाला हो अथवा तो जिस पर दिल न्योछावर किया जा सके तो साधना में प्राण आ जाते हैं। मन कैसा ठहरा हुआ है। आज गुरुजी के ज्ञान के अनमोल वचनों का आधार लेकर कुछ लिखा, यह भी तो उनके ज्ञान का प्रचार-प्रसार ही होगा। वही सिखाने वाला है और वही सीखने वाला भी ! वहाँ दो होकर भी दो नहीं हैं !  

   

आज सुबह समय पर साधना आरंभ की। दोपहर तक सब समयानुसार हुआ, पर तीन बजे के बाद गुरुजी को लिखे पत्रों की डायरी पढ़ने के लिए उठा ली, सारा समय उसी को पढ़ने में बीत गया। लगभग बारह वर्षों तक अपनी साधना संबंधी समस्याएँ नूना उन्हें पत्र में लिखती थी, समाधान भी मिल जाता था।२०१७ के बाद कोई पत्र नहीं लिखा। नन्हे के विवाह में पुन: पूर्व संस्कारों का उदय हुआ था, कुछ दिनों तक स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। उसके बाद बैंगलोर आने का स्वप्न था मन में। यहाँ आकर गुरुजी के दर्शन होने लगे, सेवा कार्य भी शुरू हुआ। कोरोना काल में आश्रम जाना ही बंद हो गया।कवि सम्मेलन में भी उनसे मुलाक़ात हुई, पर अब उनसे दूरी नहीं लगती सो पत्र लिखने का ख़्याल भी नहीं अता। अपना आप, गुरु और परमात्मा तीनों एक ही हैं, यह भाव दृढ़ होता जाता है।शाम छह बजे के बाद से मौन खुल गया है, पर सिर में जैसे भारीपन लग रहा ही, शायद शब्दों का असर हो रहा है। बोलने में काफ़ी ऊर्जा ख़र्च होती है।     

  




Friday, January 24, 2020

कर्म का बंधन


 कल दोपहर पहली बार अकेले कार चलायी। सुबह गैराज से गाड़ी निकाली और वापस डाली, पर अभी बहुत अभ्यास करना है. संकरी जगह से कैसे गाड़ी निकाली जाती है, और ट्रैफिक में से कैसे बाहर लायी जाती है, इसे सीखने में काफी समय लगेगा, लेकिन अभ्यास तो जारी रखना होगा. शाम को भजन सन्ध्या थी. उसके पूर्व अस्पताल गयी. एक सखी दो दिनों से एडमिट है. उसका पुत्र युवा हो गया है पर मानसिक रूप से बालक है. शारीरिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं है. चौबीस घण्टे उसका ध्यान रखना पड़ता है. घर में सास-ससुर भी आये हैं. काम का बोझ ज्यादा है. रात को नींद पूरी न होने के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया. आज गुरू माँ को सुना, पित्त की अधिकता से कितने रोग हो जाते हैं. कफ व वात बिगड़ने से भी षट क्रियाओं को करके शरीर को शुद्ध किया जा सकता है. आज सुबह सुंदर वचन सुने, ‘सुख और दुःख के ताने-बाने से बुना है जीवन, यह जानकर उन्हें दोनों से ऊपर उठना है. राम चाहते तो वन जाने से मन कर सकते थे, पर उन्हें वन जाने में दुःख प्रतीत नहीं होता था. वह राजमहल में रहकर सब सुख भोग चुके थे, वहाँ कोई सार नहीं है, यह जान चुके थे. कर्म का फल सदा के लिए नहीं रहता, कोई भी दुःख आता है जाने के लिए. इसलिए दुःख के कारण आये बुरे वक्त को साधना के द्वारा काट लेना चाहिए.’ जो घट चूका वह खुद के ही कर्मों का फल मिलना था, वर्तमान में भूख-प्यास व नींद के अलावा कोई दुःख है ही नहीं. प्रकृति उनकी परीक्षा लेती है पर श्रद्धा रूपी देन भी उन्हें परमात्मा से मिली है. श्रद्धा को मजबूत करने के लिए ही प्रकृति उनके सामने नयी-नयी परिस्थितियाँ लाती है. जब वे दृढ रहते हैं तो प्रकृति सहायक बन जाती है. शाम के साढ़े छह बजने को हैं. सदगुरू कितनी सरलता से कर्म बंधन से मुक्त होना सिखा रहे हैं. उन्होंने कार्य सिद्धि के तीन उपाय बताये, पहला है प्रयत्न, दूसरा है जो प्राप्त करना है, वह मिला ही हुआ है, यह विश्वास. तीसरा है धैर्य. जैसे बीज हमें मिला है, उसे पोषित करना है. कार्य को सिद्ध करने के लिए, कार्य को सिद्ध हुआ मानकर ही प्रयत्न करने से मन सन्तुष्ट रहता है. यह रहस्य है. परमात्मा को पाना है तो यह मानना है कि वह मेरे पास है, और उसके बाद सत्संग, साधना आदि करना है. सुखी है मानकर जो बढ़ता जाता है, वह सुखी ही रहता है. साधन व साध्य में भेद नहीं मानना है. योगी है मानकर योग करने से योग सिद्ध होता है. मानसिक शांति ज्ञान से ही मिलती है. इसी माह गुरू पूर्णिमा है, गुरूजी के लिए एक कविता लिखेगी. प्रेम, ज्ञान सभी कुछ परमात्मा की देन है, जब कोई यह जान लेता है तो खुद के साथ-साथ समाज के लिए भी उपयोगी बन जाता है. उनके जीवन से एक महक फैलेगी तो वे भी सुखी रहेंगे औरों को भी उनसे सुख मिलेगा ! पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, इस समय पौने ग्यारह बजे हैं, भोजन बन गया है. जून थोड़ी देर में आने वाले हैं. भागते हुए समय से कुछ मिनट निकाल कर खुद से बात करने का सुअवसर ! आज एक वरिष्ठ रिश्तेदार का जन्मदिन है, पर सुबह भूल ही गयी, उन्होंने स्वयं ही याद दिला दिया, उम्र ने उन्हें परिपक्व बना दिया है. कल क्लब की एक सदस्या से बात की, उनके लिए कुछ लिखा और संबन्धी के लिए भी, उन्होंने वाह ! वाह ! कहकर तारीफ़ की है, पर उसे उसका प्रतिदान लिखने में ही मिल गया. हिंदी लेखन प्रतियोगिता में उसे पुरस्कार मिला है, लिखने वाले कम हैं शायद इसलिए.. उत्सव मनाना अहंकार को पोषित करना ही हुआ न. तारीफ होने पर जो प्रसन्नता का अनुभव करता है वही अपमान होने पर दुःख का भी अनुभव करने वाला है. मन जब इससे ऊपर उठ जाता है, संकल्प रहित हो जाता है. तब संसार नहीं रहता, यानि पल भर में ही इस संसार से मुक्त हुआ जा सकता है. परमात्मा जो अचल, घन, चेतन स्वरूप है, उसमें टिका जा सकता है.


Monday, December 9, 2019

मन की शांति



“दुःख, उदासी, शरीर में अस्थिरता, श्वास में कंपन आदि समाधि में अंतराय होते हैं. आध्यात्मिक दुःख यदि न हों तो अन्य दो प्रभावित नहीं कर सकते”. आज सुबह टीवी पर उपरोक्त वाक्य सुना. वैदिक चैनल पर डॉ सुमन विद्यार्थियों को ‘पतंजलि योग सूत्र’ पढ़ाते समय कह रही थीं. समाधि शब्द सुनते ही उसके भीतर कोई कमल खिल जाता है. सम्भवतः योग के हर साधक का यही लक्ष्य होता है, वह भाव समाधि का अनुभव कर चुकी है, निर्विकल्प समाधि का अनुभव इसी जन्म में होगा, ऐसा स्वप्न भी कितनी बार देखती है. परमात्मा की कृपा से ही यह सम्भव होगा. कल सुबह की तैयारी हो चुकी है, सामान काफी हो गया है इस बार. ग्यारह दिनों के लिए वे बाहर जा रहे हैं. चार रात्रियाँ कोलकाता में, सात भूटान में. तीन थिम्पू, दो-दो पुनाखा और पारो में। आज योग कक्ष का रेगुलेटर बदल गया है. पुराने में अंक स्पष्ट नहीं दिखते थे, पर इतने वर्षों से काम चला रहे थे वे. कई बार समस्या का हल कितना आसान होता है पर उन्हें समस्या के साथ रहने की आदत पड़ जाती है. जैसे मानव देह के रोग, कमजोरी आदि से परेशान रहता है, पर आत्मा की खोज नहीं करता. परेशानी के साथ जीने की आदत डाल लेता है. आज सुबह अकेले ही प्राणायाम किया, जून तैयारी में लगे थे. उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने का अब मन नहीं होता, वह स्वयं के लिए निर्णय लेने में समर्थ हैं. वाणी का दोष स्पष्ट नजर आने लगा है, सो बोलने से पूर्व बोलने का तरीका भी स्पष्ट हो रहा है. परमात्मा कितना धैर्यपूर्वक उन्हें सिखाते हैं, वैसे वे खुद हैं ही कहाँ, वही तो है, वही खुद को संवार रहा है, उसी का एक अंश... जिसने स्वयं को उससे जुदा मान लिया था भ्रम वश ! 

अभी कुछ देर पहले ही यात्रा से वह घर लौटी है, जून घर नहीं आये, सीधा दफ्तर चले गए. उन्हें किसी मीटिंग में जाना था. नैनी ने सफाई का काम करवा  दिया है. सफाई कर्मचारी भी आ गया था और धोबी भी, घर कुछ ही घण्टों में व्यवस्थित हो गया है. सुबह की फ्लाइट से आने का कितना फायदा है. आज पूरे ग्यारह दिनों बाद यह डायरी खोली है. भूटान में हर दिन का यात्रा विवरण लिखा था, छोटी डायरी में. आज दोपहर से टाइप करने आरंभ करेगी. मृणाल ज्योति के लिए भी कुछ लिखना है. पिछले दिनों जे कृष्णामूर्ति की किताब पढ़ती रही. कोलकाता में कल काफी समय मिला. बहुत कुछ स्पष्ट होता जा रहा है. मन किस तरह स्वयं ही स्वयं का विरोध करता है, फिर स्वयं के जाल में फंस जाता है. मन यदि स्थिर हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति जैसे ही मन कोई राय बनाता है उससे दूर हो जाता है. अब वह राय ही उसकी आँख पर पर्दा बन जाती है. जैसे गोयनका जी  कहते हैं, प्रतिक्रिया करने के बाद उनका मन प्रतिक्रिया से उत्पन्न संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, मूल कारण तो पीछे छूट जाता है. मन जो भी विचार करता है वे  अतीत के अनुभवों पर आधारित होते हैं, यानि अतीत की लहरें वर्तमान के तट से टकराती हैं और भविष्य का जन्म होता है. शुद्ध वर्तमान को वे देख ही नहीं पाते. मन अपनी धारणाओं, मान्यताओं और विश्वासों के आधार पर एक मशीन की तरह काम करता है. ‘ऐसा होगा तो ऐसा करना है’, उसका अपना नियत एजेंडा है. 

आज चौथा दिन हैं उन्हें वापस लौटे, अभी भी मन भूटान की स्मृतियों से भरा है. जून ने जिस किताब का ऑर्डर वहाँ से किया था, वह आ गयी है. काफी मोटी पुस्तक है, भूटानी इतिहासकार की. उसे पढ़ना शुरू किया है, अभी यात्रा विवरण लिखना आरम्भ नहीं किया. आज सुबह स्वप्न में भगवान शिव की एक मूर्ति देखी। अंग स्पष्ट नहीं थे, पत्थर की आकृति से जान पड़ता था कि शिव हैं, फिर कुछ क्षण बाद श्वेत पत्थर की नन्दी की मूर्ति की झलक मिली. कल सुबह भी शिव-पार्वती दोनों की मूर्ति दिखी थी और बाद में भीतर शब्द प्रकट हुए थे दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती.... भीतर कोई पुरानी स्मृति जाग उठी थी शायद ! आजकल भिन्न-भिन्न गंधों को महसूस करती है, ज्यादातर समय कोई मधुर गन्ध, कभी-कभी धुंए की गन्ध, पता नहीं यह कोई अनुभव है या रोग.. कुछ भी तो नहीं ज्ञात ! कल गुरूजी को सुना, उन्होंने बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बतायीं. एक लेखक को क्या और कैसे लिखना चाहिए, यह भी बताया. आज शाम को मीटिंग है, क्लब की एक सदस्या की बेटी का स्वागत समारोह, वह आईएएस में उत्तीर्ण हुई है. कुछ देर पूर्व छोटी बहन से बात हुई, वह खुश थी, परसों से उसे अपने भीतर शांति का अनुभव हो रहा है, ईश्वर उसे सदा इसी तरह प्रसन्न रखे ! उसके भीतर भी शांति का साम्राज्य है, जो अब खण्डित नहीं होता, होता भी है तो कुछ क्षणों के लिये. मन अपने पुराने स्वभाव में लौटना चाहता है, पर मन वास्तविक नहीं है, एक मिराज है ! एक इंद्रधनुष जैसा... मन का कहना नहीं मानना चाहिए अर्थात मन का भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मन को कोई तवज्जो नहीं देनी चाहिए जब यह कुछ नासाज हो ! 

Monday, August 26, 2019

मरणोपरांत स्तवन



आज कोर्स का तीसरा दिन था, सुबह छह बजे वे निर्धारित स्थान पर पहुँच गये थे. सुबह वह जल्दी तैयार होकर ड्राइवर की प्रतीक्षा कर रही थी तो कपोफूल के चित्र उतारे, फेसबुक पर पोस्ट भी किये. सुबह के सत्र में दो बार पद्म साधना करवाई गयी. नाश्ते में दलिया मिला, जो काफ़ी स्वादिष्ट था पर नमक थोड़ा कम था. एक प्रक्रिया करवाई गयी जिसमें अपनी पहचान बदल लेनी थी, एक महिला प्रतिभागी के साथ उसने अपनी पहचान बदली. वह पटना में रहने वाली अपनी जेठानी के व्यवहार से बहुत परेशान है. उत्तर भारत में विवाह किया जब वह दिल्ली युनिवर्सिटी में थी, एक पुत्री है पर अब डिस्टेंट मैरिज चला रही है, क्योंकि सरकारी नौकरी है उसकी स्कूल में. लेकिन वह आश्वस्त है कि शादी निभेगी. एक अन्य प्रक्रिया में एक नेता जैसे चलेगा समूह के सभी लोगों को वैसे ही चलना है. उससे दो बार भूल हुई इसमें, समूह के अन्य सदस्यों को सही करना है यदि कोई भूल करता है. दो बार योग निद्रा की, तीन बार भस्त्रिका प्राणायाम. देह में ऊर्जा का स्तर बढ़ गया है और बहुत सारी सीमाएं टूटी हैं. मन में जो बाधाएं थीं उनका भान हुआ है. गुरूजी का दूसरा सेशन था आज. उन्होंने कमिटमेंट के बारे में बहुत अच्छी तरह समझाया और प्रश्नों के उत्तर दिए. एक व्यक्ति कोर्स के दौरान परेशान हो गये और टीचर को उनकी कठोरता के लिए कुछ शब्द कहे. अहंकार को तोड़ने के लिए किये गये उपाय बताये गये हैं इस कोर्स में, सो अहंकार को चोट लगना स्वाभाविक है. प्रतिभागियों को उन तीन क्षेत्रों के बारे में लिखने को भी कहा जिनमें वे अटक गये हैं और आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. कल रात्रि जो गृहकार्य दिया गया था, वह अद्भुत था. उनकी मृत्यु हो चुकी है और उन्हें अपनी मृत्यु के बाद eulogy लिखी है, अर्थात मरणोपरांत लिखने वाला संदेश लिखना है. आज सुबह उनका नया जन्म हुआ है, जीवन को अब नये दृष्टिकोण से देखना होगा. वे देह नहीं हैं, एक आत्मा हैं, जिसे यह देह मिली है. जिसके द्वारा उन्हें अपने जीवन की शेष कहानी लिखनी है, कुछ ऐसा करना है जिससे उनके इर्दगिर्द कुछ परिवर्तन आये. डीएसएन का यह कोर्स उसके जीवन में अवश्य ही एक परिवर्तनकारी मोड़ साबित होगा. सत्रह वर्ष पहले उसने बेसिक कोर्स किया था, इतने समय के बाद यह अवसर मिला है. अवश्य ही परमात्मा उसके जीवन की बागडोर उसके विवेक के हाथ में देना चाहते हैं न कि उसके मन के हाथों में. कल से खुली आँखों से ही जो भी दृश्य सोचती है मन में, देख पा रही है. शिवानी कहती है, मन सोचता है, बुद्धि दिखाती है. आज यह स्पष्ट हो रहा है. उनके मन की क्षमता अपार है, जिसे उलीचना उन्हें आना चाहिए.

आज कोर्स का अंतिम दिन था. टीचर का उत्साह देखते ही बनता है. उन्होंने प्रतिभागियों को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. अब यह उन पर निर्भर करता है कि अपने लक्ष्य के प्रति वे कितने समर्पित हैं. इस समय रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. सुबह चार बजे उठी थी, पौने सात बजे से कोर्स आरंभ हुआ. पहले साधना, फिर टीचर ने शुभकामना कार्ड्स बनाने को कहा, बाद में पता चला निमन्त्रण पत्र बनाने हैं जो गुरूजी के जन्मदिन पर लोगों को बांटने हैं. एक प्रक्रिया में समूह के सभी लोग एक सदस्य को एक-एक कर उसकी एक भूल बताते हैं. उसे अन्तर्मुखी होने, खुद में ही व्यस्त रहने, अहंकारी होने तथा दूसरों की बात न सुनने का दोषी पाया गया. ये सारी बातें किसी हद तक सही हैं. अपने सामने उसे कोई कोई नजर नहीं आता क्योंकि दूसरा यहाँ कोई है ही नहीं. पर पारमार्थिक सत्य और व्यावहारिक सत्य में अंतर होता है. आज वे ज्ञान के मन्दिर भी गये. नाश्ता और भोजन आज दोनों ही विशेष थे और गरिष्ठ भी. टीचर ने अन्य सभी आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर्स को जिन्होंने यह कोर्स करवाने में मदद की, सामने बुलाकर सम्मानित किया और उनके अनुभव सुनवाये. इसी महीने पहला तथा अगले महीने दूसरा बेसिक कोर्स करवाना है, 'गतिमय उसे' भी इसमें सहयोग देना है. एक टीचर ने कहा, तीसरे महीने वह ध्यान का कोर्स भी करवाएगी. उन्हें गुरूजी के आध्यात्मिक सैनिक बनकर समाज में ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना है. कोर्स के दौरान तीन तरह के लोगों की बात भी गुरूजी ने बताई. पहले वे जो दूसरों को सुख देते हैं, दूसरे जो लोगों के साथ सहज व्यवहार करते हैं और तीसरे वे जो अन्यों को परेशान करते हैं. इसी तरह कुछ लोग चींटी की तरह होते हैं, कुछ मक्खी की तरह, कुछ तितली की तरह और कुछ मधुमक्खी की तरह होते हैं. उन्हें समाज के लिए उपयोगी बनना है. सेवा का छोटा सा कृत्य भी उन्हें तृप्त कर देता है.


Friday, August 23, 2019

मेक इन इंडिया



पौने ग्यारह बजे हैं, अभी-अभी वह बाजार से आई है. उस सखी से बात की, सो रही थी. कल यहाँ से जाते समय उसकी आँख में नमी नहीं थी, पता नहीं उसका खुद का क्या हाल होगा. आज सुबह ध्यान के बाद पूरी हनुमान चालीसा पढ़ी बहुत दिनों बाद. बचपन में हर मंगलवार को बारह बजे पढ़ती थी दादी जी को सुनाने के लिए, स्कूल जाने से पहले. उसका स्कूल साढ़े बारह बजे से आरम्भ होता था, घर के बिल्कुल निकट ही था. आज दोपहर की योग कक्षा में महिलाओं को ग्रामीण महिला का योग कराया, आर्ट ऑफ़ लिविंग का सीडी चलाकर. चक्की चलाना, पानी भरना, धान लगाना, काटना और कूटना फिर साफ़ करना, सभी काम गाँव में आज भी किये जाते होंगे. शहर में तो टीवी देखना, स्मार्ट फोन पर संदेश भेजना ही मुख्य कार्य रह गया है, जिसमें जरा भी दैहिक श्रम नहीं होता. आज ग्वारफली की सब्जी बनाई है उसने जो वे डिब्रूगढ़ से लाये थे.

कल शाम को जैसे ही योग कक्षा समाप्त हुई, जून के विभाग की एक महिला अधिकारी का फोन आया, वह अस्पताल में थी, उसे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी. वे गये और आठ बजे लौटे. उसे डिब्रूगढ़ ले जाया गया, अवश्य अब वह ठीक होगी. पिछले हफ्ते भी एक दिन उसे श्वास की समस्या हुई थी, पर कल वह मानसिक रूप से भी काफी परेशान लग रही थी. परमात्मा उसे शक्ति दे ताकि वह इस रोग से बाहर निकल सके. फुफेरे भाई से फोन पर बात हुई, बुआ जी अभी भी कोमा में हैं, पानी भी नहीं जा रहा है उनके मुख में, पर निकल रहा है, शायद देह का रक्त व अन्य पदार्थ अवशिष्ट के रूप में निकल रहे हैं. जून को कल गोहाटी जाना है. भारत सरकार के 'मेक इन इंडिया' के अंतर्गत गोहाटी आई आई टी भी उन्हें जाना है.

मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ है आज. आकाश काले मेघों से घिर आया है और गर्जन-तर्जन भी आरम्भ हो गया है. नन्हे से बात हुई, वह पिछले दस दिनों से बहुत व्यस्त है. दफ्तर में बजट का काम चल रहा था, फिर किसी सीनियर मार्केटिंग मैनेजर  ने एक ऐसा विज्ञापन दे दिया, जिससे कुछ लोग नाराज हो गये और कानूनी कार्यवाही की बात करने लगे. कम्पनी का नाम बदनाम हो या उन पर कोई इल्जाम आये, इसे बचाना बहुत जरूरी है. जून का फोन आया, उस महिला अधिकारी को थायराइड की समस्या है. हवाई अड्डे जाने से पहले वे उसे देखने अस्पताल गये थे.

रात्रि के सवा दस बजे हैं. शाम को साढ़े चार बजे वे कोर्स के लिए गये, एक सखी का पुत्र भी यह कोर्स कर रहा है. एओल टीचर का उत्साह देखने लायक है, ऊर्जा और ज्ञान से भरपूर हैं वह. उन्होंने बताया, अधिकतर लोग कुछ नया सुनना नहीं चाहते, वे अपने कम्फर्ट जोन में रहना चाहते हैं और चुनौती को स्वीकार नहीं करते. इसीलिए जीवन में जड़ता है, उन्हें इस सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा, लोगों तक पहुंचना होगा और अपनी क्षमताओं को पहचानना होगा. कल सुबह साढ़े पांच बजे तक तैयार हो जाना है. आज 'पद्म साधना' भी करवाई. गृहकार्य में पन्द्रह लोगों से फोन पर बात करने को कहा है. आठ से ही हो पाई, उसने सोचा, सात को संदेश भेज देगी.

रात्रि के साढ़े नौ बजे हैं. आज का दिन कितना अलग है. अभी कुछ देर पहले ही रोटरी क्लब के हॉल से लौटी है, जहाँ डीएसएन कोर्स चल रहा है. आकर दूध-रस्क का भोजन किया. शाम को गुरूजी का ऋषिकेश से विशेष प्रसारण था, उन्होंने बहुत अच्छी बातें बताईं. कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने पर उनका कम्फर्ट जोन बढ़ जाता है. उन्हें अपने मूड्स को चलाना है न कि मूड्स के द्वारा चलाया जाना है. जीवन में प्रतिबद्धता न हो तो जीवन को एक दिशा नहीं मिलती और जीवन एक अधखिले फूल की तरह रह जाता है. उन्होंने कहा कि जीवन में गति के लिए सबसे पहली आवश्यकता है सुख के दायरे से बाहर निकलने की और दूसरी आवश्यकता है उत्साह तथा मन की निर्मलता व स्पष्टता की और तीसरी बात उन्हें विचारनी है, उन्हें ऐसा क्या करना चाहिए कि जीवन गतिमान बना रहे. यदि जीवन में कोई आकस्मिकता आ जाये या कोई विघ्न आ जाये तो वे कम्फर्ट जोन से बाहर निकलते हैं.या मन में बहुत उत्साह हो तो वे कुछ करना चाहते हैं. प्रेम या लोभ से प्रेरित होकर भी वे कुछ करना चाहते हैं. गुरूजी की वार्ता से पहले सत्संग हुआ, उसके पूर्व आसन, प्राणायाम व ध्यान. दो बार सभी लोग बाहर भी गये, एक बार समूह क्रिया में उन्हें लोगों से बेसिक कोर्स के लिए फॉर्म भरवाने थे और दूसरी बार लोगों को ख़ुशी के कार्ड बांटने. कोर्स के दौरान एक प्रक्रिया में उन्हें अभिनय करना था और दूसरी में उन दो घटनाओं का जिक्र करना था जिसमें उन्होंने उत्तरदायित्व निभाया या नहीं निभाया. उनके समूह में आठ लोग हैं. कल सुबह भी छह बजे पहुँचना है. आज सुबह ही छोटे भाई का फोन आ गया था. बुआ जी का कल रात देहांत हो गया, आज अंत्येष्टि क्रिया भी हो गयी. तीन दिन बाद उठाला है. एक जीवन की कहानी समाप्त हो गयी.  

Friday, June 28, 2019

मेजी की आग



रात्रि के पौने आठ बजे हैं. रात्रि भोजन हो चुका है. कल गायत्री समूह की सदस्याएं 'सत्संग पिकनिक' का आयोजन कर रही हैं. उनके लॉन में ही सब मिलेंगे. सभी अपने घर से कोई पकवान बना कर लायेंगी. भजन, नृत्य, 'सूर्य ध्यान' के बाद भोजन, फिर वे मिलकर नन्हे के विवाह की व अन्य तस्वीरें देखेंगे. हाँ, पहले फूलों को निहारने रोज गार्डन भी जायेंगे. आज सुबह वे टहलने गये तो देखा, बच्चों के पुराने स्कूल का कुछ भाग गिरा दिया गया है. नये स्कूल का मुख्य द्वार अब स्पष्ट दिखाई देता है. शाम को स्कूल की मीटिंग में गयी. क्लब की प्रेसिडेंट काफ़ी बदलाव ला रही हैं. कुछ पुराने लोग जा रहे हैं, नये आ रहे हैं. स्कूल का भविष्य अच्छा नजर आ रहा है. सुबह उसकी एक पुरानी हिंदी की छात्रा अपनी माँ के साथ मिलने आई. कोहिमा स्थित अपने गाँव के चावल लायी थी  और स्थानीय कला का एक लकड़ी का कटोरा. उसने भी उसे एक उपहार दिया. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अनुभव आज शाम को योग साधना के दौरान हुआ और सुबह ध्यान में भी. परमात्मा उनके कितने करीब है, उन्हें उसकी प्रतीति करनी है प्राप्ति नहीं, वह तो सदा ही सब जगह है !  

आज का दिन स्मृति पटल पर एक सुखद अनुभव बनकर अंकित हो गया है. उन्होंने ढेर सारी तस्वीरें उतारीं. भजन गाए, ध्यान किया, कई खेल खेले. सभी लोग आये और स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ लाये. उसने विवाह की तस्वीरें दिखाईं तथा वह कविता भी सुनाई जो नन्हे के विवाह के अवसर पर पढ़ी थी. पिताजी से बात की, धूप में बैठे थे. अब उनका स्वास्थ्य ठीक है पहले की अपेक्षा. आज गुरूजी को सुना, 'भक्ति सूत्रों' पर उनकी व्याख्या पहले भी सुनी है. वह बहुत सरल भाषा में बोलते हैं, अध्यात्म को बिलकुल सहज बना दिया है उन्होंने. जून की फरमाइश पर मूड़ी के लड्डू बनाये आज. कल लोहरी है.

आज पूरे उत्तर भारत में लोहरी का उत्सव मनाया जा रहा है. नये वर्ष का प्रथम उत्सव ! उन्होंने भी अग्नि जलाई, एक मित्र परिवार आया था. मूंगफली, फुल्ले, लड्डू, गजक खाने खिलाने का दिन. कल मकर संक्रांति है, यानि पतंग उड़ाने का दिन. कल इतवार है और परसों जून का अवकाश है, वे डिब्रूगढ़ का जगन्ननाथ मंदिर देखने जायेंगे तथा मन्दिर के निकट स्थित पार्क में भी. आज दोपहर को तिनसुकिया गये थे. सुबह नींद खुली पर दस मिनट तक उठने का मन नहीं हुआ, उस समय मन कितना शांत होता है. जब देह बिलकुल निस्पंद होती है, मन भी रुक जाता है. दोपहर को योग दर्शन पुनः पढ़ना आरम्भ किया. चित्त की अवस्थाओं का वर्णन पढ़ा आज.   

आज सुबह टहलने गये तो हर तरफ धुआं था, कोहरा और धुआं मिलकर धुंधलका फैला रहे थे. क्लब में सुबह मेजी जलाई गयी थी, आवाजें आ रही थीं. इस समय शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वे भ्रमण पथ पर टहल कर आये हैं. उससे पूर्व गमले से तोड़े एलोवेरा का जूस बनाया लौकी और आंवले के साथ. आधा घंटा बैडमिंटन खेला. नन्हा आज नये घर गया है. दो वर्ष बाद जनवरी तक तो वे वहाँ रह रहे होंगे, यानि बस एक और लोहरी उन्हें असम में मनानी है.  

Tuesday, June 25, 2019

नया कैलेंडर



आज जून ने यह डायरी भेजी है. इस बार की कम्पनी की डायरी पहले मिल गयी थी, सलेटी रंग की, सुंदर है, पर लिखने का स्थान कम था, एक ही पेज में दो तिथियाँ. अब एक वर्ष बाद अंतिम डायरी मिलेगी कम्पनी की. अगले वर्ष अगस्त में उन्हें विदाई दे दी जाएगी. असम में अब दो वर्ष से भी कम समय रह गया है. इस समय का सदुपयोग करना है, सेवा, सत्संग और साधना के द्वारा. रात्रि के पौने आठ बजे हैं. जनवरी का महीना वैसे ही इतना ठंडा होता है, ऊपर से झीनी-झीनी वर्षा भी हो रही है. सुबह से ही बादल बने थे. दोपहर को बूंदा बांदी हुई, जब सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखा रही थी. एक ने कहा, उनकी माँ ने भी कभी इस तरह नहीं समझाया जैसे वह उन्हें लड़ाई-झगड़े से दूर रहने के लिए कहती है. उसने सोचा, माँ को भी किसी ने नहीं समझाया होगा शायद. सुबह सेक्रेटरी ने उसका नाम क्लब के प्रोजेक्ट स्कूल की कमेटी में सम्मिलित कर दिया. प्रेसिडेंट ने दस बजे मीटिंग के लिए बुलाया, पर स्वयं सवा दस बजे आयीं. भारतीय समय में इतनी देरी को सामान्य मान लिया जाता है, पर उस कारण वापसी में देर हुई. दोपहर को एक वरिष्ठ सदस्या के यहाँ जाना था, उनकी बहन का दामाद अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री है, जो परिवार सहित असम आया हुआ है. डेढ़ घंटा वहाँ बिताया. वर्षों पूर्व जब वे नासा गये थे, उनके घर भी गये थे, उसने ही उन्हें घुमाया था. शाम को गायत्री समूह की महिलाओं के साथ नियमित योग की साधना, यानि सारा दिन कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. झींगुर की आवाज आ रही है और कमरे में इतना सन्नाटा है कि घड़ी की टिक-टिक भी स्पष्ट सुनाई दे रही है. पिताजी ने आज स्मार्ट फोन छोटी भाभी को वापस कर दिया है. कुछ दिनों तक व्हाट्स एप पर संदेशों का आदान-प्रदान करने के बाद अब वह उससे विरक्त हो गये हैं, उनका स्वास्थ्य अब ठीक है. टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है, जो रोचक और मनोरंजक भी है.

रात्रि के नौ बजने वाले हैं, यानि सोने से पूर्व आज के दिन की अंतिम घड़ी. जून ने शाम को गाजर का हलवा बनाया है. कल उनके एक मित्र आ रहे हैं गोहाटी से, उन्हें खाने पर बुलाया है. वैसे भी उनके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. दोपहर बाद को ओपरेटिव स्टोर गयी, बीहू के लिए पीठा आदि लिया, सर्दियों के मौसम में तिल खाने की सलाह दी ही जाती है. मन्दिर की साज-सज्जा बदली, ध्यान कक्ष में भी नया कैलेंडर लगाया व नई मूर्तियाँ भी, नये वर्ष का फेर-बदल अभी चल रहा है. आज वर्षा नहीं हुई. आज योग कक्षा में एक साधिका की भांजी भी आई थी, जो बिहार योग स्कूल से योग सीख चुकी है. उसने शिथलीकरण सिखाया और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी.

इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. वह रात के भोजन की तैयारी कर चुकी है. उनके पूर्व सहकर्मी आयेंगे ऐसा जून ने कहा था पर अब ज्ञात हुआ वह किसी अन्य जगह निमंत्रित हैं. कल दोपहर भी जून का लंच बाहर है, उनके दफ्तर के चार अधिकारी परीक्षा के बाद स्थायी हुए हैं, वे मिलकर पार्टी का आयोजन कर रहे हैं. अब यह भोजन कल रात्रि को खाया जायेगा. कुछ बना हुआ कुछ बनने के लिए तैयार. फ्रिज में रखा हुआ भोजन तो लोग तीन-चार दिन तक भी खाते ही हैं. आज सुबह क्लब गयी, एक स्थानीय क्लब ने उनके क्लब द्वारा चलाई जा रही सिलाई कक्षा के लिए सात सिलाई मशीनें दी हैं, जो उनके यहाँ वर्षों से रखी हुई थीं. कल मृणाल ज्योति में भी मीटिंग है. सुबह एक सखी को पहली बार अपने पति के साथ टहलते देखकर अच्छा लगा, वह वर्षों तक अकेले ही टहलने जाती रही है. उसके लिए उसने मन ही मन शुभकामनायें भेजीं. परमात्मा ही हर आत्मा के द्वारा प्रकट हो रहा है. उन्हें उसके प्रकट होने में बाधक नहीं बनना है. किसी भी तरह की आसक्ति, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर मन को पारदर्शी बनाना है, तभी परमात्मा की ज्योति मन में झलकेगी. वे अकेले ही इस जगत में आते हैं और अकेले ही यहाँ से जाने वाले हैं. मित्रता का भ्रम यदि टूटता है तो वह इसी सत्य की ओर इशारा करता है.

Wednesday, June 19, 2019

कच्चे केले का चोखा



रात्रि के आठ बजे हैं. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी. नये वर्ष का कैलेंडर और डायरी लेकर गयी थी, और क्लब के कुछ सदस्यों का दिया सामान भी. रास्ते में व्हाट्स एप पर कितने ही सुंदर संदेश पढ़े, जीवन का हर पल शुभ हो, मन अहंकार से मुक्त रहे, न मोह का शिकार हो न दैन्यभाव का. कोई पाखंड जीवन में रहे. योग में स्थित रहे बुद्धि और आत्मभाव कभी भी विस्मृत न हो. योग की महिमा को स्वयं जानकर व अनुभव करके वे अन्यों को भी बताएं. परस्पर आदान-प्रदान से प्रीति भी बढ़ती है.

सुबह के सवा आठ बजे हैं. सुबह से सुवचनों को सुनकर मन-प्राण शांति का अनुभव कर रहे हैं. आत्मा सदा ही परमात्मा के सान्निध्य में है. मन जो आत्मा रूपी सागर की ही एक लहर है सदा अपना राग अलापता रहता है. यदि उसे यह ज्ञात हो जाये कि उसका मूल अनंत है तो वह अपनी क्षुद्रता को भूल जायेगा और अपने भीतर ही विश्राम का अनुभव कर लेगा. अनंत स्वरूप का विस्मरण ही उन्हें दुःख की ओर ले जाता है तथा मन में कामना का उदय होना ही उसे विस्मृत करा देता है. कामना पूर्व संस्कार से उत्पन्न होती है. भीतर जो संस्कार हैं उनसे मुक्त होने का उपाय ध्यान है और समाधि का अनुभव. मन जब तक भय, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष के संस्कारों  से मुक्त नहीं होगा, तब तक कोई न कोई संस्कार सिर उठाता रहेगा और आत्मा व्यर्थ ही दुखी होती रहेगी. जिसका खामियाजा देह को भी उठाना पड़ता है. विनाशकाले विपरीत बुद्धि होती है सो उस वक्त ज्ञान की बाते भी नहीं भातीं.

रात्रि के पौने आठ बजे हैं. सोनू से बात हुई. उसने पिता जी व मंझले भाई से बात की, वह रिश्ते निभाना जानती है. दीदी वहाँ पहुँच गयी हैं. दो दिन रुकेंगी, फिर बड़े भाई आ जायेंगे. सभी भाई-बहन मिलजुल कर पिताजी की देखभाल कर रहे हैं. आज काव्यालय पर लिखा. जून कल गोहाटी जा रहे हैं. दोपहर को देर से आये. आयकर भरने के लिए सीए के साथ घंटों बैठे रहे, अभी भी काम पूरा नहीं हुआ है. अख़बार वाले ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की जगह आज टेलीग्राफ दे दिया है, बहुत दिनों बाद जम्बल पहेली हल की.

हर दिन पूर्व से अलग होता है. हर दिन की शुरुआत भी अलग होती है और समाप्ति भी. आज का दिन फोन पर सबसे बातें करते ही बीता है. सुबह पांच बजे से थोडा पहले उठी. टहलने गयी. गुरूजी को सुना, ज्ञान प्राप्ति के चार साधन-विवेक, वैराग्य, षट सम्पत्ति व मुमुक्षत्व ! मन प्रसन्न हो गया. पिताजी से बात हुई. कल रात उन्हें फिर तेज दर्द हुआ. लगता है दिल की ही समस्या है उन्हें. दीदी, बड़े भाई, दोनों भाभियों सभी से बात हुई. वृद्धावस्था में व्यक्ति कितना असहाय हो जाता है. आगे कोई मार्ग नहीं सूझता. देह साथ नहीं देती. ऐसे में घर वालों का साथ ही उसका सम्बल होता है. उसे भी एक बार वहाँ जाना है, पर उससे पूर्व स्वयं को पूर्ण स्वस्थ करना होगा. इस समय काफ़ी ठीक है.

सुबह ग्यारह बजे जून आ गये थे. लंच में उनकी पसंद की कढ़ी बनाई. उससे पूर्व साप्ताहिक सफाई. सुबह रोज की तरह थी पर एक खास बात हुई. कल रात पहले समाचार सुनते हुए, फिर सर्वेंट लाइन में होते झगड़े की आवाजों के कारण देर से सोयी. सुबह नींद खुली तो झट उठने का मन नहीं हुआ. स्वप्न और जागरण के मध्य की स्थिति थी कि अचानक सिर के पीछे किसी के श्वास लेने की आवाज आई और अगले ही क्षण ऐसा लगा जैसे जून रजाई ओढ़कर धीरे से आकर लेट गये. उसे आश्चर्य हुआ, दरवाजे पर ताला लगा है, वह अंदर कैसे आये, आंख खुल गयी और वहाँ कोई नहीं था, स्वप्न टूट गया. कितना सजीव था वह दृश्य, कितना वास्तविक लग रहा था. इसी तरह जो उन्हें  जगते हुए वास्तविक लगता है एक स्वप्न ही है ऐसा ही तो संत कहते हैं. रात्रि के पौने नौ बजे हैं, टीवी पर तारक मेहता..आ रहा है. डिनर में मकई की रोटी के साथ कच्चे केले का चोखा बनाया. नैनी ने मेथी काट दी है, कल सुबह उड़द दाल की बड़ी बनानी है.


Friday, March 29, 2019

रागी का पेय



कल दोपहर जून आ गये थे, बड़ी ननद ने आम व बर्फी भेजी है. सोनू ने सुंदर सी पोशाक तथा जून स्वयं ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ आश्रम से नीली योगा कुर्ती लाये हैं. आज बहुत दिनों के बाद चार पोस्ट्स लिखीं. काव्यालय पर उसकी एक कविता कल प्रकाशित होने जा रही है. वर्षों पूर्व उसने ऐसा चाहा था, वह स्वप्न अब पूर्ण होने को है. कल बातूनी सखी का फोन आया, वह एक नया ब्लॉग या या पेज शुरू करने जा रही है अपने विचार लिखने के लिए, जो अन्य महिलाओं को प्रेरित करें. उसने कोई नाम पूछा था अपने पेज के लिए. जून का गला खराब है, यात्रा में काफी थकान हुई, नींद भी पूरी नहीं हुई होगी, इस उम्र में अनियमितता होने पर सेहत तो बिगड़ेगी ही. आज उसने चाय के स्थान पर रागी का पेय बनाकर पीया. बहुत दिनों बाद गुरूजी को एक पत्र भी लिखा.

जानने की शक्ति ही ज्ञान है. परमात्मा ज्ञेय नहीं है, वह ज्ञान है. जब कोई कहे, उसने जान लिया, उसकी जानने की शक्ति समाप्त हो जाती है, इसलिए ब्रह्म अनंत है. उसे जान लिया है, ऐसा कहना ही मिथ्या है. ज्ञान ही व्यक्ति को जड़ सा बना देता है. आज नेट पर अचानक ही ‘शिव सूत्र’ पर गुरूजी के प्रवचन सुनने को मिल गये. एक ही चेतना विभिन्न योनियों में प्रकट हो रही है. हर योनि के प्रति आदर रखना भीतर चैतन्य की निशानी है. वे जब इस संसार के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं तो अपने चैतन्य को अनुभव करना सम्भव होता है. देह के साथ जब एकत्व का अनुभव करते हैं तो उसी क्षण पार्थक्य का अनुभव होने लगता है. एक कोशिका से यह देह बनी है, इससे अधिक कलात्मक क्या हो सकता है. कला का सभी आदर करते हैं, यह संसार ईश्वर की एक कला है. जीवंत व्यक्ति ही दूसरों का सम्मान कर सकता है. फिर ज्ञान का बंधन छूट जाता है !

आज सुबह देर तक परमात्मा से भीतर वार्तालाप हुआ. वर्षों पहले का एक वाक्य उभर कर आया और फिर उसे एक गहरे कुँए में धकेल दिया गया, जिसका कोई अंत नहीं था, जिसकी कोई तली नहीं थी, वह कुआं अँधेरा था पर उसकी दीवारें और गोलाई अभी भी स्पष्ट है. अहंकार के प्रतीक वे शब्द वर्षों पूर्व जून के लिए कहे गये थे. कल जब वे फिल्म देखकर आये और दीदी ने फोन पर कहा, आप लोग तो सदा समय का पालन करते हैं. जो शब्द उसने कहे, कि जून को फिल्म अच्छी लगी, वही कारण हैं इस देरी का, तो इसमें भी कहीं अहंकार छिपा हुआ था. स्वयं को विशेष मानकर अन्य को वे स्वयं से कम आंकते हैं, यही तो अहंकार है. फिर भीतर से आवाज उठी, काम समाप्त हो गया ? जिस कार्य की पूर्ति के लिए वह साधना के क्षेत्र में आई थी, वह पूर्ण हो गया. अब समझ में आ रहा है, परमात्मा की राह पर जब वे चलते हैं तो उनका एक हिडन एजेंडा भी होता है. वे स्वास्थ्य, सुन्दरता, यश की कामना से अध्यात्म के क्षेत्र में आते हैं. परमात्मा ही जिसका लक्ष्य हो ऐसे बिरले ही होते हैं. कल से ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का बेसिक कोर्स आरम्भ हो रहा है. कम से कम पन्द्रह और अधिक से अधिक बीस महिलाएं प्रतिभागिनी हो जायेंगी.

Friday, March 15, 2019

नींद और जागरण



आज से नन्हे और सोनू ने योग सीखना आरम्भ किया है, ईश्वर से प्रार्थना है कि वे इसे जारी रखें और अपने जीवन को शुद्धतम बनाएं. आज स्कूल गयी थी, रास्ते में एक सहकर्मी अध्यापिका ने बताया, अभी तक उसके माँ-पिता जी उसका ध्यान रखते हैं और अकेले यात्रा करने पर चिंता व्यक्त करते हैं. उसकी खुद की बिटिया इतनी बड़ी हो गयी है कि जॉब कर रही है पर माता-पिता के लिए बच्चे कभी बड़े नहीं होते. कल कई कविताओं की मात्राएँ ठीक कीं, अतुकांत कविताओं के विषय में पढना होगा.
उसने एक बार पुनः सुना, विवेक का अर्थ है देह से स्वयं को पृथक जान लेना. देह में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथ कारण शरीर तीनों ही आ जाते हैं. ज्ञानी विदेह अवस्था में रहता है. जगत में रहते हुए भी मुक्त अवस्था में ! साधना के बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है. विवेक की प्राप्ति में यह संसार सहायक है पर एक बार विवेक हो जाने के बाद संसार होते हुए भी विलीन हो जाता है. भक्ति, ज्ञान अथवा कर्म के मार्ग पर चलकर मन को शुद्ध करना प्रथम साधना है, जो साधक को करनी है. मन जितना-जितना शुद्ध होता जाता है, पुराने संस्कार नष्ट होते जाते हैं, अथवा तो ध्यान का संस्कार दृढ़ हटा जाता है और अंत में समाधि का अनुभव होता है. समाधि के समय क्या बोध होता है, इसको सुनना ही कितनी शांति से भर जाता है. चित्त समाधि का अनुभव करता है तो उस पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. समाधि के लिए ज्ञान और वैराग्य जीवन में साधना है. मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा यदि जीवन में होगी तभी साधना दृढ़ होगी.

ग्यारह बजने को हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के ‘अभ्यास’ व ‘सत्व’ एप ने उसकी सुबहें ज्यादा प्राणवान बना दी हैं. सुबह क्रिया की फिर सूर्य नमस्कार व पद्म साधना भी. बाद में दो ध्यान किये, रुचिकर थे. कल बड़े भाई व छोटी बहन को भी इस एप के बारे में बताया. मौसम आज बेहद सुहावना है, कल रात वर्षा हुई. कल रात स्वप्न भी थे, जागरण भी था, नींद गहरी नहीं थी, पर वर्षा का पता भी नहीं चला, अर्थात भीतर का होश था बाहर का नहीं. कल दो हफ्ते के लिए नैनी की सास गाँव गयी है, उसके बिना सारे बच्चे व दोनों बहुएँ असहाय महसूस कर रहे हैं, एक-दो दिन में अभ्यास हो जायेगा उन्हें. जून आज जल्दी आने वाले हैं. सुबह अस्पताल गये थे रक्त की जाँच कराने, भोजन के बाद भी एक टेस्ट होगा. महीनों बाद आज कढ़ी बनाई है. काव्यालय से उपहार की सूचना आई है, एक पुस्तक ‘कनुप्रिया’ तथा एक चित्र अथवा तो गीति काव्य का एक सॉफ्टवेयर !

कल शाम नैनी को चावल चोरी करने के लिए मना किया. उसने स्वीकारा तो नहीं पर वह जानती है कि उसके सिवा कोई स्टोर में जाता ही नहीं. आज सुबह आई तो रोज की तरह ही व्यवहार कर रही थी, अर्थात उसका संस्कार गहरा है. परमात्मा ने उसे इस घटना का साक्षी बनाया है तो इसके पीछे कोई गहरा कारण है. उसके भीतर भी संदेह था. रोज सुनती पढ़ती है, ‘विचार ही वास्तविकता बन जाते हैं, अच्छे विचार चुनें’, तो जो विचार भीतर था वही सम्मुख आकर प्रकट हो गया है. न जाने कितनी बार भीतर संदेह का विचार पनपा होगा. यह सही है कि भरोसा किया था पर भीतर गहराई में संदेह भी था. जैसे वह संस्कार बदल नहीं पाती, नैनी भी अपने इस संस्कार को बदलने में अशक्य है. जीवन में उन्हें जो भी अनुभव होते हैं वह उनके ही पूर्व कर्मों के कारण होते हैं. बाहर माली द्वारा भेजा गया एक बूढ़ा व्यक्ति घास काट रहा है, उसे भी थोड़ा सा भोजन आज देना होगा.


Thursday, December 28, 2017

पृथ्वी की गंध


रात्रि के सवा आठ बजे हैं. अभी-अभी वे बाहर से टहल कर आये हैं, रात की रानी की ख़ुशबू से बगीचा महक रहा है, सड़क पर आने-जाने वाले भी पल भर के लिए थम जाते होंगे, एक छोटी सी टहनी कमरे में लाकर रख दी है. पता नहीं धरती के गर्भ में कितनी गंध छुपी है, अनगिनत प्रकार की गंध लिए है पृथ्वी, जिन्हें युगों से वह लुटा रही है. शाम को मूसलाधार पानी बरसा, उन्होंने बरामदे में कुछ देर चहलकदमी की, टहलते हुए वह जून से दिनभर का हाल-चाल ले लेती है, कमरे में आकर बैठकर बातें करने में एक औपचारिकता सी लगती है. अकबर की मृत्यु हो गयी आज के अंक में. उसका पुत्र सलीम ही जहांगीर के नाम से मशहूर हुआ. कल दोपहर को नींद खोलने के लिए अस्तित्त्व ने कितना अच्छा उपाय किया, सचमुच ‘गॉड लव्स फन’ वह एक कार में है, दो सखियाँ भी हैं, ड्राइवर उतर गया है पर कार अपने आप ही चलती जा रही है. आगे जाकर टकराती नहीं है, पीछे लौटती है और तभी नींद खुल जाती है. ईश्वर हर क्षण उसके साथ है, उसका साथ इतना हसीन होगा, कभी नहीं सोचा था. आज से दो हफ्तों के बाद उन्हें लेह जाना है, कल से उसके बारे में कुछ पढ़ेगी. मंझला भाई अस्वस्थ है, अभी देहली में है, उनके जाने तक वह अवश्य ठीक हो जायेगा. बड़े भाई अपनी बिटिया के साथ छोटी बहन के पास विदेश गये हैं.

दोपहर को संडे क्लास में जाने के लिए जैसे ही तैयार होकर बाहर निकली, अचानक तेज वर्षा आरम्भ हो गयी, पूरे चालीस मिनट होती रही, रुकने पर वहाँ पहुँची तो कोई बच्चा नहीं था, या तो वे आकर चले गये अथवा आये ही नहीं. नन्हे से बात की, उसका एक मित्र मोटरसाईकिल से ‘भारत यात्रा’ पर निकला है, शायद उन्हें भी लेह में मिले, वह उन्हीं तिथियों में वहाँ जाने वाला है. कल उसके सहकर्मियों ने उस घर में एक भोज समारोह किया जहाँ से छह वर्ष पूर्व कम्पनी की शुरुआत हुई थी. सुबह अजीब सा स्वप्न देखा, उसका अर्थ था, साधना करके यदि कुछ पाने की, कुछ बनने की चाह है तो साधना व्यर्थ है. परमात्मा को पाकर यदि अपना कद ही ऊंचा करना है तो उससे कभी मिलन होगा ही नहीं. स्वयं को पवित्र करना ही साधना का उद्देश्य है. भीतर यदि कोई भी चाह शेष है तो चित्त शुद्ध हुआ ही नहीं. परमात्मा कितनी अच्छी तरह से उसे पढ़ा रहा है. वह कभी स्वप्नों के माध्यम से, कभी सीधे शब्दों के माध्यम से उसे मार्ग पर ले जा रहा है. वह कितना कृपालु है. उसकी महिमा को कौन जान सकता है. आज से औरंगजेब की कहानी शुरू हुई है. देश में मोदी जी नये-नये कदम उठा रहे हैं ताकि भारत की समृद्धि बढ़े, विश्व में उसका नाम हो !  


आज वर्षा रुकी हुई थी सो स्कूल में बच्चों को बाहर मैदान में योग कराया. उन्हें योग दिवस के बार में भी बताया. दोपहर को लद्दाख की तस्वीरें देखीं, जानकारी हासिल की जो वहाँ जाने वाले यात्रियों के लिए आवश्यक है. वहाँ ठंड भी होगी और वर्षा भी. जलरोधी वस्त्र और जूते ले जाने होंगे. आज पुनः मन में एक खालीपन है, आश्चर्य भी होता है ऐसी अनुभूति पर, लेकिन ईश्वर के मार्ग पर तृप्ति का अर्थ है पूर्ण विश्राम. यानि रुक जाना, पर यहाँ तो चलते ही जाना है, इसका कोई अंत नहीं ! कल जून को गोहाटी जाना है दो दिनों के लिए. उसे अधिक समय मिलेगा साधना के लिए, पर साधना का लक्ष्य तो सभी के साथ एक्य की भावना का अनुभव करना ही है, जो वे इसी क्षण कर सकते हैं. वे विशिष्ट हैं, यही भाव तो उन्हें अलग करता है. इस सृष्टि में सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं, सभी की अपनी-अपनी भूमिका है, सभी महत्वपूर्ण हैं समान रूप से. यही भावना तो उन्हें परमात्मा के साथ भी जोड़ती है. परमात्मा साक्षी है, सभी पर समान कृपा करता है पर जो उससे प्रेम करता है अर्थात स्वयं को विशिष्ट नहीं मानता, उससे वह प्रेम से मिलता है. अस्तित्त्व उसका हो जाता है उतना ही, जितना वह अस्तित्त्व का !

Saturday, September 9, 2017

नदी और मौसम


सुबह आठ बजे से नौ बजे तक, दोपहर ढाई से साढ़े तीन बजे तक तथा शाम छह से सात बजे तक सामूहिक साधना होती थी. जिसमें सभी साधकों का पूरे वक्त उपस्थित रहना आवश्यक था. शेष समय में कभी–कभी पुराने साधकों को अपने निवास स्थान पर ध्यान करने के लिए कहा जाता था और कभी-कभी कुछ नये और पुराने साधकों को शून्यागारों में ध्यान करने के लिए कहा जाता था. गोल पगोड़ा में स्थित शून्यागार एक विशिष्ट आकार के छोटे-छोटे ध्यान कक्ष थे, जिनमें अकेले बैठकर ध्यान करना होता था. एक दिन शून्यागार में ध्यान करते हुए अनोखा अनुभव हुआ, जिसमें एक क्षण के लिए स्वयं को देह से अलग देखा, जैसे वह पृथक है और देह बैठकर ध्यान कर रही है. जैसे ही इस बात का बोध हुआ, अनुभव जा चुका था.

विपश्यना आरम्भ होने पर चौथे दिन के उत्तरार्ध से गुरूजी ने शरीर में होने वाली संवेदनाओं पर ध्यान देने को कहा. पहले दिन केवल नाक के छल्लों तथा ऊपर वाले होंठ के ऊपर वाले भाग पर ही, बाद में सिर से लेकर पैर तक एक-एक अंग पर कुछ क्षण रुकते हुए वहाँ होने वाली किसी भी तरह की संवेदना को देखना था. यह संवेदना किसी भी प्रकार की हो सकती थी, दर्द, कसाव, खिंचाव, सिहरन, खुजली, फड़कन या अन्य किसी भी प्रकार का शरीर पर होने वाला अनुभव. मुख्य बात यह थी कि संवेदना चाहे सुखद हो या दुखद, उसके प्रति किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं करनी थी. वे सभी संवेदनाएं स्वतः ही उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती हैं, साक्षी भाव से इस अनित्यता के नियम का दर्शन करना था. उनका अंतर्मन न जाने कितने संस्कार छिपाए है और हर पल वे नये संस्कार बनाते चल रहे हैं. उनसे जाने-अनजाने जो भी गलत-सही हुआ है, उसका हिसाब तो चुकाना ही होगा. औरों को देखकर जो द्वेष का भाव मन में जगता है वह भीतर गाँठ बनकर टिक जाता है. प्रकृति का नियम है विकार जगाया तो व्याकुल तो होना ही पड़ेगा. अतीत में जगाये विकार समय आने पर देह पर किसी न किसी रोग के रूप में आकर प्रकट हो सकते हैं. साक्षी का अनुभव होने के बाद राग, द्वेष व मोह के बंधन नहीं बंधते.

आठवां दिन आते आते तो मन भी जैसे दूर खो गया लगता था, देह पर होने वाले सुख-दुःख जैसे किसी और को हो रहे हैं. मन एक असीम मौन में डूबा हुआ है. लगा, सारा विश्व जैसे एक ही सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र उस से होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा, यह देह एक दिन गिर जायेगी फिर भी यह चेतना किसी न किसी रूप में तो रहेगी ही. एक दिन गोयनका जी ने कहा, मन और देह दोनों एक नदी की तरह हैं. मौसम बदलते हैं तो नदी भी बदलती है वैसे ही मन और देह के भी मौसम होते हैं. देह का आधार अन्न है और मन का आधार संस्कार हैं जो हर पल बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है वह इससे प्रभावित नहीं होता. 

Thursday, September 7, 2017

आना-पान की साधना


सात बजे उन्हें दफ्तर के बायीं तरफ दो तल्ले पर स्थित पुराने ध्यान कक्ष में ले जाया गया, जहाँ कुछ औपचारिक बातें समझाई गयीं. एक फिल्म भी दिखायी गयी जिसमें केंद्र में रहने के नियमों की जानकारी दी गयी थी. अगले दस दिनों तक उन्हें सदा ही मौन रहना था, धीरे-धीरे चलना था तथा किसी से नजर नहीं मिलानी थी. स्वयं को पूर्ण एकांत में ही समझना था. किसी भी तरह की अन्य साधना इन दस दिनों में भूलकर भी नहीं करनी थी. कोई मन्त्र जप या किसी भी तरह का ताबीज, अगूँठी आदि धारण नहीं करनी थी तथा किसी की शरण में नहीं जाकर केवल अपनी शरण में रहना था. समय का पालन करना था. पांच शीलों का पालन बहुत कठोरता से करना है. पांच शील हैं- चोरी न करना, असत्य भाषण न करना, किसी भी तरह का नशा न करना, किसी भी तरह की हिंसा न करना, व्यभिचार न करना. वहाँ से सभी को मुख्य धम्मा हॉल में ले जाया गया, जो काफी बड़ा था. महिला साधक दायीं तरफ तथा पुरुष साधक बायीं ओर बैठते थे. सभी को निश्चित स्थान व आसन दिया गया. पूरे साधना काल में उसी स्थान पर व उसी आसन पर बैठना था. मुख्य आसन के अलावा वहाँ कई आकार के छोटे-बड़े तकिये थे जिन्हें देखकर पहले आश्चर्य हुआ था पर बाद के दिनों में पैरों में दर्द होने पर सभी को उनका उपयोग करते देखा. आखिर दिन भर में दस-ग्यारह घंटे नीचे बैठना था.

रात्रि नौ बजे वहाँ से वे अपने-अपने कमरे में आ गये. मच्छर दानी लगाने तथा सोने के लिए तैयारी करने में पांच-सात मिनट लगे और कमरे की बत्ती बुझाकर सोने की चेष्टा की तो पहले नई जगह के कारण कुछ देर नींद नहीं आयी, फिर रूममेट के खर्राटों की आवाज के कारण, लेकिन बाद में पता नहीं कब नींद आ गयी. सुबह ठीक चार बजे घंटे की आवाज से नींद खुली तो उठकर बिस्तर ठीक किया, पानी पीया और नित्य क्रिया से निवृत्त होकर समय पर धम्मा हॉल में पहुंची. सवा चार बजे पुनः घंटा बजता था तथा उसके बाद भी धर्मसेविका सभी कमरों के सामने से हाथ में घंटी लिए बजाती हुई एक चक्कर लगाती थीं ताकि कोई सोता न रह जाये. उसके बाद भी यदि कोई नहीं उठा तो कमरे में झांककर देखती थीं. अब हर रोज सुबह का यही क्रम था.  

पहले साढ़े तीन दिन श्वास पर ध्यान देने की विधि समझायी गयी, जिसे आना-पान कहते हैं. अगले साढ़े छह दिन विपश्यना का अभ्यास कराया गया जिसमें शरीर पर होने वाले स्पंदनों को समता भाव से देखना होता है. प्रतिदिन सुबह छह बजे गोयनका जी की धीर-गम्भीर आवाज में बुद्ध वाणी का ‘मंगल पाठ’ होता था. जो पाली में था तथा जिसका अर्थ पूरी तरह समझ में नहीं आता था. शेष समय में भी गोयनका जी बुद्ध के धम्म पदों का उपयोग करते थे तथा बीच-बीच में स्वरचित दोहों के द्वारा उनका अर्थ स्पष्ट करते जाते थे. ठीक साढ़े छह बजे घंटा बजता था जिसका अर्थ था नाश्ते का समय हो गया है. होना तो यह चाहिए था कि नहाकर नाश्ता करें पर सभी पहले भोजनालय में पहुंच जाते जहाँ अक्सर सूजी का ढोकला, मीठी चटनी, काले चने की घुघनी, कोई एक फल, चाय, दूध मिला करता था. कभी-कभी पोहा व दलिया भी मिला जिसमें दूध नहीं था बल्कि हल्की मिठास थी. नाश्ते के बाद कुछ देर टहलने के बाद स्नान की तैयारी. आठ बजे पुनः सभी हॉल में पहुँचते, गोयनका जी की आवाज में श्वास पर ध्यान देने की विधि सिखाई गयी. शुद्ध श्वास पर ध्यान देना था जिससे मन अपने आप केन्द्रित होता जाता था. नौ बजे के बाद पांच मिनट का विश्राम लेने को कहा गया. विश्राम का अर्थ था हॉल के बाहर बने पक्के फुटपाथों पर टहलना जिससे पैरों की जकड़न खुल जाती थी. कुछ लोग कमरे की तरफ भागते ताकि पांच मिनट लेट कर कमर सीधी कर लें. पुनः साधना का क्रम चला तो समय लम्बा खिंचता चला गया. गोयनका जी अपनी स्पष्ट व प्रखर वाणी में निर्देश दे रहे थे. पुरुषार्थ और पराक्रम करने की प्रेरणा भी बारी-बारी से हिंदी व अंग्रेजी भाषों में दे रहे थे.