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Tuesday, April 24, 2018

सिया के राम



कल रात्रि संदेह के संस्कार को भीतर स्पष्ट देखा, सद्गुरू कहते हैं, विकार को देखना ही उससे मुक्त होने की क्रिया है. व्यर्थ ही मन संदेह से ग्रस्त रहता है, व्यर्थ ही वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति के प्रति मन में आशंका होती है, किसी से मिलने जाना हो तो मन कहेगा, शायद वह घर पर न हो, अथवा हो तो व्यस्त हो, शायद ऐसा हो शायद वैसा हो..! कितना हल्का लग रहा है भीतर, मन अब अस्तित्त्व के प्रति अर्थात सभी के प्रति विश्वास से भर गया है. सुबह घने कोहरे के मध्य टहलने गये वे. स्नान के बाद सभी के फोन व संदेश आने लगे, आज उनके विवाह की सालगिरह है. दोपहर को क्लब की मीटिंग है, शाम को मेहमान आयेंगे. वह गाजर-ब्रोकोली और पनीर भी बना रही है शेष व्यंजनों के साथ. नन्हे का भी मुबारकबाद का फोन आया, उसे एक अच्छा रसोइया मिल गया है पर दिन में एक ही बार आता है. बड़ी बुआ ने भी शुभकामना दी, अब उनका स्वास्थ्य पहले से काफी ठीक है. पिताजी का फोन आया, ‘सिया के राम’ उन्हें भी अच्छा लग रहा है. वह कह रहे थे, सीता का अभिनय कर रही कलाकार में उन्हें उसकी झलक मिलती है, पिता का हृदय सन्तान के प्रति कितना स्नेह से भरा होता है. पिछले दो-तीन दिनों में ड्राइव-वे पर किसी ने खाली बोतल फेंकी, कांच बिखर गया. जून ने आज शिकायत की है. समाचारों में सुना, पठानकोट में हुए आतंकी हमले में कितने जवान मारे गये, सभी आतंकवादी भी मारे गये. जब से दुनिया बनी है शायद तभी से यह संघर्ष चल रहा है, जैसा संघर्ष मानव के भीतर चलता रहता है !

नकारात्मकता का कीट एक क्षण के लिए सिर उठाता है और ज्ञान का प्रकाश उसे पुनः भाग जाने के लिए विवश करता है. माया का जादू अब और नहीं चल सकता. माया ने बहुत नचा लिया अब भीतर जो स्थिरता डिग-डिग जाती थी, अचल होने लगी है. यूनिवर्स से कितना सुंदर संदेश मिला आज, कुछ बातें तर्क से परे होती हैं. इन संदेशों के लेखक एक आधुनिक संत हैं जो लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं, कल का संदेश बिलकुल वही है जो आजकल वह स्वयं भी अनुभव कर रही है. उनकी दुनिया उनके मन का ही खेल है. मन में ड़ू’बे रहकर वे वस्तविकता से दूर ही रह जाते हैं और व्यर्थ ही ऊर्जा गंवाते हैं. जिस क्षण भी वे सत्य से हटते हैं, माया के घेरे में आ जाते हैं. इसीलिए संत कहते आये हैं, ज्ञान का पथ तलवार की धार पर चलने जैसा है. कल शाम का उत्सव अच्छा रहा, उन्होंने शकरकंद भूना और विशेष भोज ग्रहण किया. सुबह मृणाल ज्योति गयी, क्लब के लिए खरीदा गया बड़ा सा कार्पेट लेकर, जिसपर बैठकर बच्चों ने योगासन किये.

चीजें अब स्पस्ट होती जा रही हैं, उनके व्यर्थ के संकल्प ही सबसे बड़ी बाधा हैं. उनकी वाणी की अस्पष्टता ही उनके विकास में बाधा है. मन जितना-जितना शांत होगा, सहजता में रहेगा, वाणी भी सहज होती जाएगी. उसे अपने जीवन में क्या चाहिए, एक सहज मन और स्पष्ट, सुमधुर वाणी, इसके होने पर शेष तो आ ही जायेगा. परमात्मा के प्रति जितना गहन समर्पण भाव होगा, जितना प्रेम होगा उसी अनुपात में मन शांत होगा, उसी अनुपात में व्यर्थ के शब्द मुख से नहीं निकलेंगे. सुबह समय पर उठे, रात देर तक क्लब से गाने की आवाजें आती रहीं, पर नींद कब आ गयी पता ही नहीं चला. भीतर एक होश बना रहा फिर भी कुछ याद नहीं है, टहलने गये तो वापसी में वर्षा आरम्भ हो गयी, लौट कर घर आये ही थे कि वर्षा तेज होने लगी, जैसे उसे पता चल गया हो कि वे सुरक्षित घर लौट आये हैं.     

Tuesday, October 3, 2017

एस्पर्गस का पौधा


नये वर्ष के चौथे माह का आरम्भ हो गया है. परसों क्लब की कमेटी मीटिंग है, उसके अगले दिन स्कूल का वार्षिकोत्सव है और उसके भी अगले दिन उन्हें चार दिन की छोटी सी यात्रा पर निकलना है. वापस लौटने पर मृणाल ज्योति भी जाएगी. आज तेज वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. सुबह स्कल में ही थी बड़ी ननद का फोन आया, उन्होंने बिटिया का रिश्ता पूरी तरह से तोड़ देने के लिए हामी भर दी है, वह बेहद दुखी थी. मंझली भाभी से बात हुई, बड़ी भाभी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, शायद आज पुनः अस्पताल चली गयी होंगी. ‘भारत एक खोज’ के एपिसोड में आज महाभारत दिखाया जा रहा है. फेसबुक पर एक कवयित्री ने उसे एक काव्य श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए नामित किया है, पर किसी कारण उससे नहीं पाया, उन्हें कल लिखना होगा. जून के दफ्तर में एक अधिकारी ने अपने नाती होने की ख़ुशी में मिठाई बांटी. उसने सोचा वह भी फोन पर उन्हें बधाई देगी. माली की पत्नी अपने पुत्र के जन्म प्रमाण पत्र के लिए फार्म भरवाने आई थी, कितना सुंदर नाम रखा है पुत्र का, ओम ज्योति. जो पौधे वे शिलांग से लाये थे, उनके साथ एक अस्पर्गस का पौधा अपने आप ही आ गया था, चीड़ के पौधे नहीं बचे पर यह बच गया, लम्बा होता जा रहा है. माली से कहकर उसमें एक लकड़ी लगवा दी है. क्लब की उपसचिव ने व्हाट्स एप ग्रुप बना दिया है कमेटी सदस्याओं का, पहले ही दिन ढेर सारे संदेश आये.

आज सुबह चार बजे से कुछ पहले ही उठी. उठने से पूर्व ही कोई कह रहा था, उसका सारा जीवन एक झूठ है, फिर एक चाय का कप भी दिखा. सुबह से ही मन पूछ रहा है, जीवन में क्या-क्या है जो असत्य है. वह जून से कहती है कि वह जब बाहर जाते हैं, प्रसाधन सामग्री, चाय आदि सामान न लायें, पर स्वयं उनका इस्तेमाल करती है. यही असत्य सबसे पहले नजर आया. अब से उनका इस्तेमाल नहीं करेगी, ऐसा तय किया है. उसके संकल्पों में बल नहीं है, कहीं यह इशारा उसकी तरफ तो नहीं था. उसके अनुभव क्या संतों की वाणी का प्रभाव मात्र हैं ? मात्र कल्पना हैं ? भीतर कई सवाल हैं. हो सकता है स्वप्न यह कह रहा हो, आत्मा के सिवाय सभी कुछ असत्य है. एक गीत है न, झूठी दुनिया झूठी माया..झूठा सब संसार..

नहीं देखा जा सकता आकाश को जमीन पर रेंगते हुए
बंद कमरों में बैठकर ताजी हवा से वंचित ही रहेंगी श्वासें
परमात्मा हुए बिना परमात्मा से नहीं होती मुलाकात
जज्बातों को समझे बिना खुद के, नहीं समझेगा कोई दूसरों के जज्बात
जीवन चलता रहे यह आस कितनी व्यर्थ है
जीवन को गहराई से नापे तभी कोई अर्थ है
आसमानी रंग क्यों भाता है सभी को
याद दिलाता है अपनी विशालता की
क्षीरसागर के समान श्वेत मेघों की आकृतियाँ
कथाएं कह जाती हैं निजता की !

कल कुछ नहीं लिखा. आज स्कूल गयी, लौटने में बारह बज गये, शायद सवा बारह. ड्राइवर पूरे धैर्य के साथ साढ़े नौ बजे से वहीं खड़ा रहा. बच्चों ने सूर्य नमस्कार ठीक से सीख लिया है. ध्वनि मिश्रण के लिए किसी को बुलाया था, उसी कार्य में देर हुई.          


Friday, December 30, 2016

जीव और ब्रह्म -आदि शन्कराचार्य


कल शाम और आज पुनः बाबा को सुना. वे नई ऊर्जा से भर गये हैं. अपने अभियान को चलाये रखने का उन्होंने व्रत दोहराया और जोशीले भाषण से अपने विरोधियों के सवालों का जवाब दिया. आज वर्षा की झड़ी लगी है, वे प्रातःभ्रमण के लिए भी नहीं जा सके. कल नन्हे ने कहा उसे कविता अच्छी लगी, एकाध बात समझ में नहीं आयी. आज से नैनी काम पर आ गयी है, अभी पिताजी ने उसके बारे में कुछ कहा, उन्हें घर-गृहस्थी के मामलों में अपनी राय देने में बहुत आनंद आता है, तो नूना ने उन्हें तुरंत जिस तरह तेजी से जवाब दिया, उसे खुद पर आश्चर्य हुआ, उसने सोचा भी नहीं था, उसके अचेतन से ही यह कृत्य हुआ, उसने किया भी नहीं. इसी तरह हर कोई जो भी व्यवहार कर रहा है, वह संस्कारों के वशीभूत होकर ही कर रहा है. एक अर्थ में कर्ता वह है ही नहीं, यह केवल मानने की बात नहीं है, ऐसा ही है. यदि वह सचेत होकर, कुछ बनाकर उन्हें जवाब देती तो कर्ता होने का दावा कर सकती थी, न ही वे पुण्यकर्मों के कर्ता हैं न पाप कर्मों के, स्वभाव के अनुसार कृत्य होते हैं. स्वभाव वश यदि कोई असत्य भाषण कर देता है तो भी उसका फल उसे मिलेगा ही, उस दंड को भोगते समय भी उसे साक्षी बना रहना होगा.

आज सुबह बाबा के गुरूजी द्वारा शन्कराचार्य के वेदांत सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया. उनके अनुसार ब्रह्म अनादि व अनंत है. अविद्या व अज्ञान अनादि तो हैं पर सांत हैं. ब्रह्म जब अविद्या अर्थात माया में बंधता है तो ईश्वर कहाता है जिसकी शक्ति व ज्ञान अनंत है पर वही ब्रह्म जब अज्ञान से बंधता है तब जीव कहाता है. ईश्वर सृष्टि रचना, पालना व प्रलय का कारण है. जीव कर्मों को करता है व उनके फलों को भोगता है. जीव अपने शुद्ध स्वरूप में ब्रह्म के समान ही है. आज का ध्यान भी अच्छा था. वास्तव में देखा जाये तो इस जगत में न कुछ अच्छा है न बुरा, दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है. गुरूजी भी कहते हैं विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. एक ही चेतन तत्व से यह जगत बना है. जब तक द्वंद्व रहेगा, समाधान हो ही नहीं हो सकता. भीतर एकत्व तभी होगा जब कोई बाहर बांटना छोड़ देगा. वे जो बाहर वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों पर ठप्पा लगते हैं, बांटते हैं तो भीतर दरार पड़ने ही वाली है.


आज का ध्यान अनोखा था. विचारों को महसूस करना था, वे कहाँ से आते हैं ? क्या वे उनके हैं ? आत्मा के अनंत सागर से विचार आते हैं और जिन्हें वे अपना मानते हैं दरअसल वे सब उधार के होते हैं. उनके विचार जैसा कुछ भी नहीं है इस जगत में. केवल मौन ही उनका है. उनके संकल्प वातावरण की, शिक्षा की, उन पुस्तकों की देन होते हैं और जो कुछ उनके बावजूद भीतर से आता है वह संस्कारों के कारण हो सकता है. ‘वे’ हैं ही नहीं तो उनका कुछ भी हो कैसे सकता है. ‘वे हैं’ यह भी एक विचार ही है. ध्यान के बाद कैसी मुक्ति का अहसास हो रहा है. विचारों से ही तो वे राग-द्वेष में बंधते हैं, अहंकार के शिकार होते हैं. दुःख उन्हें पकड़ता है. विचार न हों तो एक गहरा मौन और सन्नाटा भीतर छाया रहता है !        

Thursday, October 6, 2016

नये वर्ष के कार्ड्स


आज सुबह-सुबह टीवी पर एक आचार्य जी से (नाम याद नहीं है ) पतंजलि योग सूत्रों की अद्भुत व्याख्या सुनकर मन स्थिर हो गया. द्रष्टा जब अपने आप में स्थित हो, मन समाहित हो, बुद्धि स्थिर हो तो क्षणांश के लिए उस स्थिति का अनुभव होता है. वहाँ से आने के बाद अपूर्व शांति और आनंद सहज ही भीतर उत्ताल तरंगों की भांति व्यक्त होता है. दोपहर को एक कविता की पंक्तियाँ बार-बार मन में आ रही थीं पर अब वह स्मृति खो गयी है, संकल्प जाने कहाँ से उठते हैं फिर विलीन हो जाते हैं, जो संकल्प वे अपने बोध में उठाते हैं वे उनके भाग्य का निर्माण करते हैं. नये वर्ष में एक लक्ष्य तो है वजन घटाना जो पिछले वर्ष बढ़ गया है. घर की साज-सज्जा पर विशेष ध्यान देना है और सेवा के कार्यों को तरजीह देनी है. जून कुछ कार्ड्स लाये हैं, उसने सोचा उन्हें यहीं उन लोगों को देगी जिनसे उनका वास्ता पड़ता है. लाइब्रेरियन, को-ओपरेटिव मैनेजर, बैंक मैनेजर, मृणाल ज्योति आदि आदि..नैनी अभी अस्पताल में है, उसका आपरेशन कल होगा. दो सखियों के बच्चे छुट्टियों में अपने-अपने घर आये हुए हैं, न मिलने आये, न फोन ही किया. बच्चों की अपनी एक दुनिया होती है जिसमें उनके माता-पिता भी नहीं जा सकते फिर अंकल-आंटी तो दूर की बात है. आत्मा रूप से देखे तो वे भी वह स्वयं ही है, जो निकट ही है, उससे कैसी दूरी और कैसी निकटता. उसके अंतर का स्नेह सदा उन्हें मिलता रहे. आमीन !

आज छोटी भाभी का जन्मदिन है, उसके लिए एक कविता भेजेगी. उसने अंग्रेजी में एमए किया है, गाने तथा चित्रकला का शौक है या था. सुंदर है, लम्बी है, गोरी है, रंग ऐसा जैसे दूध में चन्दन व हल्दी मिलायी हो. पढ़ने का शौक है, घर का काम दक्षता से करती है. तीन बहनों में सबसे बड़ी है. आज फिर सासुमाँ ने उसके कमरे में आकर टीवी बंद कर दिया, उन्हें शायद आवाज से भी डर लगने लगा है. जब उसने पूछा, आपने क्यों बंद किया तो कहने लगीं, कमरे में कोई नहीं था. एक सखी से बात की फोन पर, उसकी मौसेरी बहन की कल मृत्यु हो गयी जो बीमार थी. दीदी को भी ज्वर हो गया है. बड़ी ननद की बेटी दुखी है, उसकी बात पक्की होते-होते टूट गयी है. घर से खबर आई, जून की मासी का देहांत हो गया है, एक-एक कर सभी को जाना है, कोई पहले, कोई बाद में जाने ही वाला है. चारों और से मृत्यु, अस्वस्थता और दुःख के समाचार ही आते हैं, उनके भीतर ही जन्नत हो सकती है यदि हो तो, बाहर तो उसके ख्वाब ही देखे जा सकते हैं. जीवन सम्भवतः इतना जटिल पहले कभी नहीं था, अथवा तो हर युग के अपने कुछ दुःख होते हैं. इस वक्त वह बाहर लॉन में झूले पर बैठी है, इस कोने में धूप देर तक रहती है. गुलदाउदी के कुछ फूल वर्षा में खराब हो गये हैं, उन्हें अलग करना है. कल चार डीवीडी लिए आर्ट ऑफ़ लिविंग के, उनके पड़ोसी टीचर हैं एओल के. कुछ वर्ष पूर्व ऐसा होने पर वे स्वयं को भाग्यशाली मानते, पर अब जून को ज्यादा रूचि नहीं रह गयी है, वह भी अब सत्संग व क्रिया घर पर ही करती है. गुरुजी से कोई दूरी अब लगती नहीं. जून कल तीन दिनों के लिए अहमदाबाद जा रहे हैं. परसों उनके विवाह की सालगिरह है. उन्हें अब इस रिश्ते में दूसरे कई पहलू नजर आने लगे हैं, प्रेम, विश्वास, भरोसा, मित्रता और एक साहचर्य की भावना, देह से ऊपर मन व आत्मा के स्तर पर वे जुड़ गये हैं. अब इस रिश्ते की नींव बहुत गहरी हो गयी है. कुछ वर्ष पूर्व, कई वर्ष पूर्व उसे इसकी चूलें हिलती नजर आई थीं. वैसे मन का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, मन के साथ रहना तो ऐसा ही है जैसे कोई अपने शत्रु के साथ एक ही घर में रह रहा हो !



Tuesday, June 21, 2016

मार्क ट्वेन का अनुभव


आज सुबह क्रिया के दौरान कई शुभ संकल्प उठे. पता नहीं कहाँ से विचार आते हैं और कहाँ खो जाते हैं. ‘मृणाल ज्योति’ के भविष्य के बारे में एक लेख लिखने का संकल्प, वहाँ के लिए सिंगापुर से कुछ विशेष खरीद कर लाने का संकल्प. पड़ोसियों के लिए क्रिसमस का सुंदर उपहार भी लाना है. ईसामसीह पर एक कविता लिखे तो कितना अच्छा हो... इस समय और कुछ याद नहीं आ रहा है, लेकिन उस समय तो जैसे बाढ़ ही आ गयी थी. कहीं यह मन की चाल तो नहीं. वह बचे रहना चाहता है. इसलिए अच्छी-अच्छी बातें खोज निकालता है ठीक ध्यान से पूर्व ! चाचाजी को श्रद्धांजलि स्वरूप एक लेख लिखना आरम्भ किया है. चचेरे भाई से बात की वह बाहर था, पंडित जी से कल के उठाले के बारे में बात करने आया था. मन्दिर में एक कमरा है वहीं पर कार्यक्रम होगा, समाज ऐसे वक्त पर ही नजर आता है. उसने भाई के लिए सोचा, पिता के जाने के बाद शायद वह समर्थ हो सके, अपने भीतर की शक्तियों को जगा सके. परसों छोटा भाई चचेरे भाई के साथ हरिद्वार जायेगा उनकी अस्थियाँ लेकर.  

आज फिर वर्षा का मौसम बना हुआ है, ठंड बढ़ गयी है. जून अप्रैल में लेह जाने की बात भी कह रहे हैं, समय बतायेगा, क्या होता है ? दोपहर के डेढ़ बजे हैं. ओशो ने मार्क ट्वेन के जीवन की एक घटना का जिक्र किया. जब वह फ़्रांस गये तो उनका नाती उनके साथ था. मार्क ट्वेन को फ्रांसीसी भाषा नहीं आती थी. वह भाषण के दौरान अपने नाती को देखकर ताली बजाते व हँसते जिससे किसी को पता न चले कि उन्हें भाषा का ज्ञान नहीं है. बाद में उनके नाती ने कहा कि उन्होंने तो उसकी फजीहत करवा दी. जब उनकी तारीफ होती तो वह ताली बजाता तभी मार्क ट्वेन भी ताली बजाते. वे भी बहुत सारे काम देखा-देखी करते हैं और उस परमात्मा की फजीहत करवाते हैं. यह बात और है कि परमात्मा की कोई फजीहत हो ही नहीं सकती !

आज नेट गायब है. उसने सोचा इस समय घर पर सभी व्यस्त होंगे, आज चाचाजी का उठाला है. जीवन अवश्य था उनके भीतर पर पिछले कुछ समय से वे सही अर्थों में जीवित नहीं कहे जा सकते थे. समाज से कटे हुए, अस्वच्छ वातावरण में, वही वस्त्र पहने दिनों गुजारने वाले, लेकिन दूसरी ओर जो रोज नहाते हैं, सबसे मिलते-जुलते हैं लेकिन भीतर क्रोध से भरे हैं, विषाद से ग्रस्त हैं, उन्हें भी तो जीवन से वंचित कहा जा सकता है. जीवित तो वही है जो भीतर जागा हुआ है, आनन्द में है और जो सभी के भीतर एक ही चेतना का दर्शन करता है. वह सबको वे जैसे हैं देख सकता है !


फिर एक अन्तराल, ठंड वैसी ही है जैसी कि दिसम्बर के इस महीने में होनी चाहिए ! अभी-अभी एक सखी से बात की अब से वह उसके साथ मृणाल ज्योति का काम करेगी. इस हफ्ते वे बच्चों को ध्यान करायेंगे. बच्चे ध्यान में जल्दी उतर सकते हैं, ऐसा संत कहते हैं. आज उसने पढ़ा, यह ब्रह्मांड गोलीय है, उसका न आदि है न अंत. आकाश से परे है चेतना.. ध्यान के बिना उस तत्व को जाना नहीं जा सकता. आज लेडीज क्लब की एक सदस्या के लिए उसने एक विदाई कविता लिखी. कल पिताजी को चाचाजी पर लिखा आलेख भेजा. उसे लगता है अब गद्य लिखने में उसे कम प्रयास लगता है. पद्य लिखना अब छूटता ही जा रहा है. कितना काम पड़ा है करने को पर बहुत सा समय इधर-उधर के कामों में चला जाता है. बहुत सारे संकल्प भीतर उठते हैं, कोई जगा हुआ उन्हें निरंतर देखा करता है, वही आत्मा है ! 

Wednesday, May 25, 2016

नयी कोंपलें


कल रात भर माँ अस्पताल में नहीं सोयीं, नन्हा भी उनके सामने कुर्सी पर बैठा रहा. इतनी कम उम्र में इतनी समझ और सेवा का भाव है उसमें. घर आकर भी सो नहीं पा रहा था, जब फोन करके पता किया दादीजी सो गयी हैं, तो ही सोया है. कल जून का गला खराब लग रहा था. पिछले एक महीने से वे दिन में कई बार अस्पताल में आना-जाना कर रहे हैं. उसके बाएं गाल में थोडा दर्द है आखिरी दांत के पास. सभी के मनों में एक प्रश्न है क्या माँ एक बार पुनः स्वस्थ हो पाएंगी. उत्तर अज्ञात है. शुरू-शरू में उन्हें देखने कई लोग आये धीरे-धीरे संख्या कम होती जा रही है. उसकी दो सखियाँ यहाँ हैं नहीं. कल उनमें से एक का जन्मदिन है, वह खुश रहे, स्वस्थ रहे उसके सभी स्वप्न साकार हों यही शुभकामना उसके दिल से हर वक्त निकलती रहे. आत्मस्मृति में रहकर तो प्रेम ही बरसाया जा सकता है. अनंत, अपार प्रेम..वे आत्मा ही तो हैं जिसने अपने पूर्व कर्मों का हिसाब चुकाने के लिए शरीर धारण किया है. इस जन्म में कोई कर्म बंधन का कारण न बने ऐसा प्रयास उन्हें करना है !

 माँ घर आ गई हैं, पहले से बेहतर हैं. कल उनके कमरे के लिए नया टीवी आया है. एयर टेल का नया कनेक्शन भी, जिसमें ‘संस्कार’ शामिल है. आज महीनों बाद पुनः संस्कार पर सद्गुरु को देखा, सुना. मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों पर ध्यान देना होगा ऐसा गुरूजी ने कहा. उसे अपनी भाषा पर ध्यान देना होगा, बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है. नींद पर भी ध्यान देना होगा, स्वप्नावस्था पर भी, जो जगते समय भी जारी रहती है, दिन में भीतर जो विचार चलते हैं वही तो रात्रि को स्वप्न बन जाते हैं, नींद टूटी भी नहीं कि मन स्वप्न में डूब जाता है, बल्कि डूबा ही रहता है. क्रोध, हिंसा, अभिमान तथा लोभ के विचार तथा व्यर्थ के संकल्प भी. जीवन भर जिस सत्य को पाने की आकांक्षा भीतर रही है, वह जैसे भूलती जा रही है. जो वे इकट्ठा कर रहे हैं, वह जीवन के विकास के लिए जरा भी आवश्यक नहीं है. समय और परिस्थितियों के गुलाम बनकर उन्हें जीना है या सत्य को जानने के लिए बने एक अमिट व्यक्तित्त्व बनकर ? भीतर का द्वंद्व जो समाप्त हो गया सा लगता रहा है, आज पुनः इकट्ठा हो गया है. जीवन में कोई सचेतन लक्ष्य न हो तो जीवन एक सूखे पत्ते की तरह हवा के झोंके से इधर-उधर डोलता रहता है, सो पुनः स्वयं को चिन्तन के द्वारा सचेत करना है, सजग होना है.

आज पुनः भीतर लिखने की प्रेरणा हुई है. सद्गुरु की कृपा का बादल भीतर बरसा है और मन की धरती को हरा-भरा कर अंकुआ गया है, भाव उठने लगे हैं, विचारों की कोंपलें लगने लगी हैं, ज्ञान जो सुप्त प्रायः हो गया था, जागृत होने लगा है. जड़ता जो घर करती जा रही थी, अब चेतना में बदल रही है. जीवन कितना सुंदर है, प्रकृति आजकल अपने सुन्दरतम रूप में नजर आ रही है. चारों ओर हरियाली, शीतलता तथा स्वच्छता. पौधे धुले-धुले से नजर आते हैं. मानव कृत गंदगी तो बरसात में बढ़ जाती है पर उस ओर उसकी नजर ही नहीं जाती, आकाश से दृष्टि हटे तब तो धरा पर जाये. ‘गुरू पूर्णिमा’ आने वाली है. आत्मा गुरू का सान्निध्य दिन भर तो कमोबेश रहता है पर रात्रि को निद्रा और स्वप्नावस्था प्रगाढ़ हो गये हैं. स्वप्न में भी यह भान रहे कि वह पृथक है और जो स्वप्न देख रहा है वह मन है, नींद में भी जगे-जगे से रहे, ऐसा अब नहीं होता. खजाना भीतर है ही यदि कोई उसका उपयोग न करे तो दोष किसका है ? 

Wednesday, March 30, 2016

हंस का विवेक


आज वर्षा रुकी है पर मौसम सुहाना है. कल शाम को हुए सत्संग में उसने गाइडेड मैडिटेशन कराया. जब तक सोच-सोच कर बोल रही थी, अंग्रेजी थोड़ी अटपटी थी पर बाद में जब सहज होकर बोलने लगी तो अपने आप ही जैसे शब्द निकलते गये. कल हयूस्टन में लिखी डायरी पढ़ी, अच्छी रचना हो सकती है कितना कुछ लिखा हुआ है जो टाइप करना है. ईश्वर ने उसे शब्दों से प्रेम सिखाया है पर वह उस कला की उतनी कद्र नहीं कर रही, इच्छा शक्ति की कमी, आत्मविश्वास की कमी, प्रमाद तथा ऐसे ही किसी दुर्गुण के कारण ही तो, संकल्प करती है पर पूरे नहीं कर पाती. अज टीवी पर सुना, स्वामी रामदेव जी कह रहे थे वह कुत्ते की तरह होता है जो अपने संकल्पों का पालन नहीं करता. हंस की तरह उन्हें बनना है. हंस जो नीर-क्षीर का विवेक कर सकता है. अगले महीने रक्षाबन्धन का त्यौहार है. जून के हाथ राखियाँ भिजवा सकती है, पत्र लिखने होंगे. कल शाम एक नयी फिल्म देखी, ‘जाने तू या जाने ना’.

आज एकादशी है. गुरु माँ गा रही हैं. ‘करां सजदा ते सिर न उठावां कि दिल विच रब दिसदा’ जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में असमय फूल आ गये, वे जो अपनी संवेदनशीलता खो चुके हैं, खिले हुए फूल भी नहीं देख पाते. उस पर राम कृपा हुई है तभी सत्संग में रूचि है. जून से इस विषय पर थोड़ी बातचीत भी हो गयी. वह इतने व्यस्त हैं अपने रोजमर्रा के जीवन में कि उससे निकालकर कुछ और सोचने की उनके पास फुर्सत ही नहीं है. आज वह छोटी बहन के लिए एक बहुत सुंदर कार्ड लाये. कल सभी को राखी के पत्र लिखे. इस समय दोपहर की कड़ी धूप है, पंखे की हवा पसीना सुखाने में असमर्थ है. सुबह सवा चार पर उठी, प्राणायाम आदि किया, ध्यान भी आज घटा. देह में पित्त का प्रकोप शायद बढ़ गया है. पीठ पर घमौरी निकल आयी है, वर्षों बाद ऐसा हुआ है शायद दशकों बाद, बचपन मे घमौरी से उसका चेहरा लाल हो जाता था. परमात्मा उसे किसी भी अनुभव से अछूता नहीं रखना चाहते. पहले दांत, फिर गला फिर पीठ और आगे जाने क्या-क्या, पर हर अनुभव कुछ न कुछ सिखा जाता है. संवेदनशील होना भी और नम्र होना भी. कल पुस्तकालय की मीटिंग हो गयी अब कला प्रतियोगिता अगले महीने होगी. दो बजने को हैं, उसे कई सारी कविताएँ टाइप करनी हैं.

वे सदा इस इंतजार में रहते हैं कि कब वे शाश्वत सुख पा सकते हैं, वे यदि विवेक का उपयोग करें तथा स्वयं को आत्मा जानें तो इसी क्षण उस परमात्मा को पा सकते हैं, क्यों कि वह उनका अपना आप है, वह कभी उनसे अलग ही नहीं हुआ, वह है तो वे हैं, वे ही नहीं सभी उसी से हैं. जड़-चेतन सब उसी की लीला है. अभी कुछ देर पूर्व एक औरत गोदी में छोटे बच्चे को लेकर आई. कहने लगी कि उस व्यक्ति ने उसे इन घरों से पैसे मांगने के लिए भेजा है. पति का परसों ब्रेन का आपरेशन होने वाला है, उसने जब कहा उनका नम्बर दो, फोन करके पता करेंगे तो उलटे पावों लौट गयी. लोभ की प्रवृत्ति उसके भीतर है, शायद इसी कारण मदद करने को तुरंत मन नहीं हुआ. गुरु माँ कहती हैं जो लोभी होगा उसे रोग होंगे ही. लेकिन यह लोभ नहीं है बल्कि सजगता है, खैर ! आज मौसम पुनः ठंडा है. कल शाम पांच बजे से रात दस बजे तक बिजली गायब थी, वे तारों की छाँव में बैठे थे, पहली बार उन्होंने रात का भोजन बाहर खाया. नैनी की नन्ही बेटी पढ़ने आई थी पर उसका मन पढ़ने में जरा भी नहीं लगता है, कुछ ही देर बाद उसकी बनी ड्राइंग लेकर घर चली गयी है. अगले महीने स्कूल खुलने पर ही शायद उसमें पढ़ाई के प्रति रूचि जगेगी.   

Thursday, February 25, 2016

शांति का पाठ


आज सुबह-सुबह ही उसके मुख से अपशब्द निकले, ऐसे शब्द जो नहीं निकलने चाहिए थे, व्यर्थ थे, जो जून को चुभे. उसके भीतर इतनी कठोरता, इतनी रुक्षता, इतनी हृदयहीनता छिपी हुई है इसका उसे भी भान नहीं था. नीरू माँ कहती हैं जो वे रिकार्ड करके लाये हैं वही तो निकलेगा, विडम्बना यह थी कि उसने क्रोध इसलिए किया कि उसे शांति का पाठ सीखने जाना था, सत्संग में जाने के लिए उसने क्रोध किया. उसका आज तक का सीखा हुआ ज्ञान जैसे उस पल तिरोहित हो गया था, इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि घर में सभी लोग थे, जिनमे काम करने वाले दो व्यक्ति भी थे. अगले ही क्षण उसे लगा कि कुछ गलत हो गया है, भीतर तो शांति हो गयी पर जून को जो पीड़ा उसने दी उसका क्या, वह चुपचाप सब सह गये, उनका कोई दोष नहीं था, उसका पूर्वाग्रह ही उसे भ्रमित कर रहा था, इसका प्रायश्चित यही होगा कि वह सत्संग में न जाये पर इससे आत्मा की उन्नति का एक अवसर वह गंवा देगी. उसे जाना तो है पर समय से लौट आना है. पिछले दिनों तथा आज भी, अन्य कई अवसरों पर भी उसने दूसरों के दोष देखे, यह आदत उसकी बहुत हानि क रही है. अहंकार भीतर कूट-कूट कर भरा है, वही क्रोध बनकर तो कभी परदोष देखने वाला बनकर सामने आता है. उसकी साधना में इससे बड़ी बाधा क्या हो सकती है ? कई दिनों से लिखने का अभ्यास भी नहीं किया, डायरी लिखने से अपने भीतर झाँकने का अवसर मिलता है. आज बहुत दिनों बाद दो सखियों से बात की, तीसरी को उस दिन फोन किया पर उसने उठाया नहीं, आज पुनः करेगी.

आज सुना, मन एक मिनट में पच्चीस से तीस संकल्प उठाता है, एक दिन में चालीस से पचास हजार विचार मन में उठते हैं. जैसे विचार मन उठाता है वैसी ही भावना भीतर जगती है. जैसी भावना होगी वैसा ही दृष्टिकोण उनका बनता है, फिर वही कर्म में बदलता है. बार-बार वह कर्म करने से वही आदत बन जाती है. विचार-भावना-दृष्टिकोण-कर्म-आदत-व्यक्तित्त्व, तो आज वे जो भी हैं वह अपने ही विचारों का ही प्रतिफल हैं, और वे जो भी काम करते हैं वही उनका भाग्य बनाते हैं.

नन्हा आज पंजाब में है, वह पहली बार किसी कम्पनी में काम करने गया है. शाम को वे उससे बात करेंगे. जून फिर से नाराज हैं, पता नहीं क्यों, आज सुबह पिताजी ने कहा कि स्त्रियों को जप-तप करने की जरूरत नहीं है, वह सेवा करके ही पुण्य लाभ कर सकती हैं. सास-ससुर की सेवा करने में ही स्त्री का मोक्ष है. समाज अभी भी उसी पुरानी सोच को लेकर बैठा हुआ है. कल शाम वह एक घंटे के लिए घर से बाहर गयी तो घर में किसी को पसंद नहीं आया, खैर इसमें उनका कोई दोष नहीं है, यहाँ किसी का कुछ भी दोष नहीं है, सब न्याय है. जो कुछ भी उसे मिल रहा है, वही उसका प्राप्य है बाहर. पर भीतर का क्षेत्र उसका अपना है जहाँ वह जो चाहे पा सकती है. वहाँ आत्मा का साम्राज्य है. वह कल्पतरु है, जो मांगो उससे मिलता है. वहाँ मौन है, शांति है, आनंद है, प्रेम है, सुख है, ज्ञान है, शक्ति है, भीतर की दुनिया अनोखी है, जहाँ विश्रांति है, जहाँ मन ठहर जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है, जहाँ चित्त डूब जाता है, जहाँ कोई उद्वेग नहीं है, कोई लहर नहीं है, जहाँ अनोखा संगीत गूँजता है, जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, जहाँ जाकर लौटने की इच्छा नहीं होती, वह उसका अंतर्जगत ही तो उसका आश्रयस्थल है. वही उसका घर है, बाहर तो जैसे कुछ देर के लिए वे घूमने जाएँ या बाजार जाएँ या किसी से मिलने जाएँ अथवा तो दूसरे देश या दूसरे शहर जाएँ !


Wednesday, December 9, 2015

संकल्प की छत


अपने अभ्यास के द्वारा जो वे प्राप्त करते हैं वही टिकता है, गुरू की शरण में जाने का अर्थ है गुरू बनने की प्रक्रिया की शरण में जाना. सत्य के समान कोई मंगल नहीं, जिसने अपने अभ्यास और वैराग्य से सत्य की झलक देख ली वही ऊँची उड़ान भर सकता है. आनन्द की चरम अवस्था का अनुभव वही कर सकता है, वह तृप्ति के सुख को जानता है वह पूर्णकाम होता है. वह अपने उदाहरण द्वारा कितनों को आनन्द व सुख का रास्ता बता सकता है. उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण हो तभी सत्य की झलक मिलती है. उन्हें डर भी किस बात का है, वे इस जगत में कुछ भी तो लेकर नहीं आये थे, न ही कुछ लेकर जाने वाले हैं, उन्हें जो भी मिला है यहीं मिला है, वे तो सदा लाभ में ही हैं. जगत का उन पर कितना बड़ा उपकार है, उसे लौटाने का तरीका यही हो सकता है कि वे किसी पर भी अपना अधिकार न मानें, यहीं की वस्तु यहीं लौटा दें. स्वयं सदा मुक्त रहें, खाली ! तब इससे भीतर वह भरेगा जो उनका अपना है, उसे वे लेकर जायेंगे और वही वे लेकर आये थे !  

सद्गुरु कहते हैं, क्यों न दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें, जैसे दुःस्वप्न नींद को तोड़ देते हैं. दुःख में वे पूर्ण जागृत हो सकते हैं सुख में बेहोशी छा जाती है. भूख के समय वे जागृत रहते हैं, उपवास का तभी इतना महत्व है, उपवास में कोई अपने पास रह सकता है, जगा रहता है, शरीर के कष्ट के समय भी मन सोया नहीं रह सकता. भय की अवस्था में भी पूर्ण जागरूक होते हैं, तेज गति में भी मन निर्विचार हो जाता है, जीवन की हर परिस्थिति का साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. यह जीवन निरंतर जल रहा है, यहाँ हर घड़ी खुद की तरफ ले जाना चाहती है, पर वे इसका उपयोग और बेहोश होने के लिए करते रहते हैं. होश पूर्ण विश्रांति ही तो ध्यान है, परिधि पर कुछ न हो रहा हो, केंद्र पर सजगता बनी रहे तभी ध्यान घटता है.

जाने कब से वे माया के बंधन में हैं और जाने कब से परमात्मा की कृपा भी बरस रही है. मन जब व्यर्थ बातों से हटकर उसकी तरफ मुड़ता है तो वह बाहें खोले ही मिलता है. वह परम सत्ता सदा जागृत है, पर वे उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं. परमात्मा के चिह्न चारों और बिखरे हैं, वही भीतर भी है जो उनके होने का कारण है, कितना आश्चर्य है कि वे उसे नहीं जानते, वह जो जानकर भी नहीं जाना जाता, वह जब होता है तो वे नहीं रहते, वहाँ से लौटकर कोई आया ही नहीं, वास्तव में परमात्मा ने ही परमात्मा का अनुभव किया है !

आज भी उसने एक सुंदर संदेश सुना, सर्वोत्तम पद है आत्मपद, इसकी शपथ उन्हें ग्रहण करनी है, नकारात्मक भाव से मुक्त रहना, कटुवचन नहीं कहना और सभी को प्रेम देना..ये तीन बातें इस शपथ में शामिल करनी हैं. उन्हें इस शपथ रूपी संकल्प की छत बनानी है, जिससे मन खाली रहे, यह व्यर्थ की बातों से नहीं भरता. नया संकल्प, नयी कल्पना, नया चिंतन तभी मन में आ सकता है, जब पुराना वहाँ न हो, जगह खाली हो तो आत्मा मुखरित हो जाती है. मन बाह्य संसार से ही विचारों को ग्रहण करता है यदि शपथ रूपी छत हो तो उनकी वर्षा से वे बच सकते हैं. अनावश्यक बातों को त्यागकर वे केवल आवश्यक को ही ग्रहण करें तो कितनी ऊर्जा बचा सकते हैं. फिर वही ऊर्जा भीतर जाने में सहायक होती है और वे मनुष्यत्व के पद की प्रतिष्ठा तभी बनाये रख सकते हैं जब भीतर जाकर आत्मा के प्रदेश में प्रवेश हो ! तभी जीवन सुंदर बनता है. ज्ञानी कर्म बाँधते नहीं हैं, कर्म छोड़ते रहते हैं, उन्हें भी प्रतिपल सजग रहकर अपने कर्मों को छोड़ते जाना है.     



Wednesday, August 20, 2014

स्टोर में चूहा


कल वे सारे कार्य कर सके जो विचारे थे. धूप तेज थी और मन में उत्साह था. कल शाम को एल मित्र परिवार अपनी यात्रा से वापस आ गया. परसों एक सखी ने  गुड़हल पर चार पंक्तियाँ लिखने की बात कही थी, पर वह भूल ही गयी, शाम को उसने फोन करके याद दिलाया. आज करवाचौथ का व्रत है, पर उसने सिर्फ एक बार विवाह के बाद मायके में यह व्रत रखा था, तब जून भी वहाँ नहीं थे. एक बार मंगनी के बाद भी. न ही जून को, न उसे व्रत आदि में विश्वास है. उसे विश्वास है अच्छाई में, नैतिकता में, सत्य और अहिंसा में, प्रतिपल निर्लोभी होकर जीने में, सम्यक जीवन दृष्टि में और स्वच्छता में, सो आज से हर दिन एक घंटा विशेष सफाई के लिए, दीवाली आने तक उनका घर दीयों के लिए तैयार हो जायेगा. आज गोयनका जी ने शिवजी , श्री राम, भगवान कृष्ण और गणेश देवता की भक्ति का वास्तविक अर्थ बताया. शिवजी प्रतिक्षण काल से घिरे रहने के बाद भी शीतलता धारण किये हैं, कामनाओं को भस्म कर चुके हैं. गणेश जी की मेधा इतनी ज्यादा है कि उन्हें हाथी का सिर चाहिए. राम त्याग की मूर्ति हैं, भाई के प्रति स्नेह का आदर्श रखते हैं. कृष्ण को वे भक्त प्रिय हैं जो अपेक्षा रहित हैं, राग-द्वेष से मुक्त हैं, निर्मल चित्त वाले हैं न कि वे जो उनके रूप का बखान तो करते हैं पर उनकी बातों को नहीं  मानते. उसे और सहनशील होना होगा और कर्मठ भी. स्वास्थ्य ( पूरे परिवार का ) के प्रति भी और सजग रहना होगा और सबसे बड़ी बात अपनी वाणी पर संयम रखना होगा. वाणी को जीतना पहली सीढी है.

पर्व प्रेरणा देते हैं. शुभ संकल्प जगाते हैं, उत्साह भरते हैं. जीवन जो एकरस प्रतीत होता है उसमें नवरस भरते हैं. अगले हफ्ते दीपावली का त्योहार आ रहा है वे सभी उत्सुक हैं. जीवन है ही क्या? कुछ पल ख़ुशी के कुछ पल उदासी के ! जीवन बहती धारा है, जो गुजर जाता है, लौटकर नहीं आता. सुख-सुविधा भी नहीं रहेगी और तप भी नहीं रहेगा, पर तप का लाभ बाद में मिलेगा. लोभवश किये कार्य और उनका त्याग दोनों ही नहीं रहेंगे पर त्याग अनासक्ति सिखाता है, मन निर्भार हो जाता है. मधुर शब्द और कटु शब्द दोनों ही नहीं रहने वाले हैं पर प्रेम, प्रेम को जन्म देता है, उसके सौदे में घाटे का कोई काम नहीं, लाभ ही लाभ है. आज बाबाजी ने उपरोक्त ज्ञान दिया. सुबह के कार्य हो चुके हैं, अभी ध्यान करेगी फिर कर्म. कई दिनों से कविताओं वाली डायरी नहीं खोली है मन में भाव तो उपजते हैं पर टिकते नहीं क्यों कि प्रयास ही नहीं किया. नन्हे ने डिबेट में भाग लिया था पर सलेक्ट नहीं हो पाया, उसने कहा लडकियाँ बहुत अच्छा बोलीं, वे लड़के समझ गये, उनका चुनाव नहीं होगा. जून कल दीवाली के लिए काफी कुछ लाए और अगले हफ्ते डिब्रूगढ़ जाकर फिर लायेंगे. वह चीजें खत्म होने ही नहीं देते पहले से ही और लाकर रख देते हैं. उसे इस बारे में कुछ सोचना नहीं पड़ता. वाकई वह बहुत भाग्यशालिनी है.

सामान्यत इस वक्त वह संगीत अभ्यास कर रही होती है, पर आज अभी तक न ही ‘ध्यान’ किया है न व्यायाम. सुबह फ्रिज की सफाई में कुछ वक्त चला गया, कुछ वक्त स्टोर से चूहा भगाने में. एक छोटा सा चूहा जाने कहाँ से घुस आया है जो छिप जाता है. फिर उन परिचित का फोन आया जो ससुराल के उनके घर गयीं थी. उनकी आवाज वह पहचान नहीं पाती, उन्हें परिचय देना पड़ता है. नैनी ने कुछ दिन उनके यहाँ काम किया पर उनके अनुसार ठीक से नहीं किया. पैसों के हिसाब को लेकर भी कुछ गलतफहमी थी, उसे वह समझाने लगीं. नैनी ने सुबह उससे हिसाब करवाया था, जो उसे ठीक से पता नहीं था, खैर वह न जाने क्या समझें और सोचें.. उसके मन में उनके लिए सहानुभति और पहले सा स्नेह ही है. वे उनके यहाँ जायेंगे दीवाली के दौरान. कल ‘वृदावन सारंग’ के दो गीत लिखाये टीचर ने. अब दोपहर को ही अभ्यास करेगी. आजकल न उसकी वाणी ही सौम्य, मधुर और अर्थपूर्ण रह गयी है न ही खान-पान में कोई परहेज, जैसा जब चाहा कह दिया, खा लिया और हृदयहीनता की तो हद ही नहीं है. जून को KBC का एडिक्शन हो गया है यह तक कह दिया. जून उसका इतना ख्याल रखते हैं और उसे उनकी छोटी सी ख़ुशी भी सहन नहीं होती. सिर्फ किताबें पढ़ लेने से या प्रवचन सुन लेने ही कोई ज्ञानी नहीं बन जाता. यह भी मन बहलाव ही है जब तक आचरण पूर्ववत् है तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या पढ़ती है या सोचती है, सोच, व्यवहार में तो झलकनी चाहिए न.







Friday, February 14, 2014

उड़िया फेस्टिवल



आज क्रिसमस ईव है और एक मित्र के विवाह की वर्षगाँठ भी. शाम को उनके यहाँ जाना है, नन्हे को क्लब जाना है, जहां बच्चों को सांता क्लाज उपहार व स्नैक्स देते हैं. आज ही उनका कम्प्यूटर भी आने वाला है. कल शाम जून ने दीदी का पत्र दिया, वह आध्यात्मिक रूप से कहीं आगे हैं. उनकी सहनशक्ति कहीं ज्यादा है, उसे लगा, इस तरह तुलना नहीं करनी चाहिए, उनका दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट है कहीं शंका की गुंजाइश नहीं जबकि वह इधर-उधर बिना पतवार की नौका की तरह डोलती रहती है. उसे उनके पत्र से कुछ जवाब तो मिले हैं पर कुछ नये सवाल भी खड़े हो गये हैं. कल जून ने शिकायत की कि उसके पास उनके लिए समय नहीं है. वह कर्त्तव्य मात्र समझकर किसी कार्य को करना नहीं चाहती पर उसे लगा जीवन में संतुलन के लिए ऐसा करना जरूरी है. कल उन्हें पिकनिक पर जाना है, दिसम्बर के महीने में गुनगुनी धूप में नदी के ठंडे पानी की छुअन, सोचकर अच्छा लगता है, माँ-पापा के आने पर उन्हें भी ले जायेंगे वे नदी के तट पर.

नये साल का आखिरी दिन...कभी तो यह साल भी नया ही था, हर वर्ष नया बनकर ही आता है और कल...यह इतिहास बन जायेगा. पिछले कई दिनों से वह कुछ नहीं लिख सकी, पिकनिक अच्छी रही, उसके अगले दिन जून तिनसुकिया गये उसके सिर में दर्द था. उनका एसी भी बनकर आ गया है. नन्हे के साथ सुबहें कैसे बीत जाती हैं पता ही नहीं चलता, आज उसके शीतावकाश का अंतिम दिन है. कल से यानि नये साल के पहले दिन से स्कूल खुल रहे हैं, जिसे आने में अब कुछ ही घंटों का वक्त रह गया है.

नये वर्ष की सुबह नशीली भी है और सुहानी भी ! सुबह अलसाये से सात बजे के थोड़ा बाद ही उठे, सभी को फोन पर नये वर्ष की शुभकामनायें दीं, सभी को उनके कार्ड्स भी मिल गये होंगे. एक उत्सव की तरह सेवइयों की खीर से नये वर्ष का स्वागत किया, उसे याद आया, धर्मयुग का विशेषांक निकलता था नये साल पर, अब तो उन्हें महीनों, वर्षों हो जाते हैं धर्मयुग पढ़े हुए. हिंदी की कोई पत्रिका वह इस वर्ष मंगाएगी, सृजनात्मक लेखन का कोर्स जो करना है. हसबैंड नाईट के लिए एक skit भी लिखनी है. पाठ और योगासन करने के बाद उसने मन ही मन संकल्प लिया है,  इन दोनों कार्यों के साथ साथ प्रतिदिन कुछ लिखेगी भी. अभी काफी काम पड़ा है लेकिन उन कामों के कारण अपने निजी कार्यों की बलि नहीं चढने देगी. जून अपनी कार को वैक्यूम क्लीन कर रहे हैं और नन्हा पास खड़े होकर खुद भी करने की जिद करके उन्हें झुंझला रहा है. कल रात जून ने प्रेस जाकर हिंदी की कम्पोजिंग का काम पूरा करा दिया. मेहमानों के आने में ग्यारह दिन का वक्त रह गया है, उसे सारे घर की सफाई करनी है और सिलाई का कार्य भी अभी शेष है. आज शाम को क्लब में ‘उड़िया टी’ का आयोजन किया गया है, उसकी उड़िया पड़ोसिन सुबह से तैयारी में व्यस्त है.