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Thursday, February 15, 2018

तेल का रिसाव



शनिवार और इतवार फिर गुजर गये. वर्षा लगातार होती रही है पिछले दिनों. आज थमी है. सुबह वह स्कूल गयी, लौटते समय किसी गाँव के एक खेत में, जिसमें वर्षा का पानी भरा हुआ था, तेल का रिसाव हो रहा था. वहाँ सम्भवतः नाला भी रहा होगा. गाँव के लोग कम्पनी के वाहनों को रोक रहे थे. उनकी कार भी रोकी तो भीरु ड्राइवर झट बिना किसी प्रतिवाद के रुक गया और उसे भी बाहर निकलने से मना करने लगा, पर कुछ क्षणों के बाद उसने उनमें से एक व्यक्ति से इतना कहा, वह स्कूल से आ रही है, उसे जाने दें, तो उसने कहा, ठीक है जाइये. भला व्यक्ति था वह. उन्हें अधिकारियों तक अपनी बात पहुँचानी थी, ताकि जो नुकसान हो रहा है, उसे रोका जाये. तेल के नुकसान के साथ-साथ खेत का नुकसान भी हो रहा था. अब शायद अगले कुछ समय तक वहाँ कुछ भी नहीं उगेगा. पौने ग्यारह बजे हैं, जून आने वाले होंगे. आज सुबह उठते ही मोबाइल के प्रयोग पर उसने उन्हें टोका, शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा होगा, पर हर चीज का एक वक्त होता है, यह वह खुद ही कहते हैं. जन्माष्टमी का उत्सव आने वाला है. उसे कृष्ण के लिए एक सुंदर कविता या गीत लिखना है.

कल वे हो जायेंगे विदा
और परसों भूल जायेंगे उन्हें लोग
इस तरह जैसे कि कभी था ही नहीं
उनका अस्तित्त्व इस दुनिया में
आज ही उनके हाथ में है
चाहे तो गीत गुनगुना लें
या अहंकार को सजा लें
जो है ही नहीं..
उसके कारण अपने पावों में
काँटों को चुभा लें
या दी है जिसने जिन्दगी की नेमत
उस रब को रिझा लें

आज सितम्बर की पहली तारीख है. दूधवाले का हिसाब कर लिया था, पर उसे पैसे देना भूल गयी, इसी तरह वे अनावश्यक कार्यों में स्वयं को उलझाकर सदा ही आवश्यक को भूल जाते हैं. कल दिन में एक-दो बार लगा जैसे मौसम में बदलाव आ रहा है. पर आज भी वर्षा की अनवरत झड़ी सुबह से लगी है. बरामदे में प्रातः भ्रमण किया, घर बड़ा होने का यह फायदा तो है ही. कल दोपहर को भागवद् व कल्याण का एक अंक पढ़ा. कृष्ण जन्माष्टमी के लिए कविता लिखनी आरम्भ की, कृष्ण की महिमा अनंत है और भक्तों से बढ़कर कौन उसका बखान कर सकता है. आज सुबह सद्गुरू ने विस्मय पर कितना अद्भुत प्रवचन दिया. इस जहाँ की हर शै उन्हें विस्मय से भर देती है. उस दिन, अरे, कल ही तो फिर वह बड़ी चमकीली मक्खी उसकी अंगुली पर आकर बैठी थी, उसने उसे उड़ा दिया. अस्तित्त्व उससे प्रेम करता है, वह यानि वही..फिर घनघोर वर्षा के बावजूद एक पीली तितली उडती नजर आई !

कल कुछ नहीं लिखा, ट्रेड यूनियन की हड़ताल के कारण जून का दफ्तर बंद था. तबियत भी उतनी ठीक नहीं थी, इस समय भी सिर की चोटी पर दर्द है, पर चाय से इसका कोई संबंध है, ऐसा तो नहीं होगा. मन भी आजकल कुछ का कुछ सोचता रहता है, ठीक ही कहा है स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है. वे वही होते हैं जो वे सोचते हैं, इन्सान चाहे तो आकाश की ऊंचाइयों को छू ले और न चाहे तो गहरी खाई भी कम होगी उसके लिए ! आश्चर्य होता है इतने वर्षों की साधना के बाद भी मन अपनी चाल से चलता है. आज सुबह स्कूल की उप प्रधानाचार्या ने कहा, कक्षा दस में गणित  पढ़ाना है कुछ दिनों के लिए, पिछले वर्ष भी पढ़ाया था शायद इन्हीं दिनों. इसका अर्थ है कुछ दिनों तक उसे रोज ही स्कूल जाना होगा. कल सांख्यकी का एक अध्याय पढ़ाना है. परसों मृणाल ज्योति भी जाना है, शिक्षक दिवस के उपलक्ष में.


Wednesday, December 10, 2014

आतंक की छाया


कल शाम को नन्हे को गणित पढ़ाते समय जब जून लाइब्रेरी गये तो नन्हे ने अपनी आदत के अनुसार टीवी चलाया. वह दो मिनट के लिए कमरे से बाहर गयी थी, लौटी तो नन्हा जोर से बुला रहा था. दो हवाई जहाज अमेरिका, न्यूयार्क में स्थित दो इमारतों से टकराए, उनमें आग लग गयी. दोनों इमारतों में जो एक सौ दस मंजिली थीं और जहाँ ट्रेड सेंटर था. अनेकों लोग उनमें फंस गये, आधे घंटे के अंदर-अंदर दोनों ढह गयीं. कुछ ही देर में समाचार मिला कि एक अन्य अपह्रत विमान पेंटागन पर गिरा. आत्मघाती दुर्घटना का चौथा विमान पिट्सबर्ग (पेंसिलवानिया) में गिरा. ये सारे समाचार वे देख ही रहे थे कि जून वापस आ गये. नन्हा और वह दोनों आश्चर्य से यह देख रहे थे लेकिन उसे इस दुर्घटना में मृत व्यक्तियों का ध्यान आ रहा था. उन लोगों का जो घायल थे, बल्कि पूरे अमेरिकावासियों का दुःख उसका दुःख बन गया था. भीतर जैसे घुटन हो रही थी, वह धुँए से भरे कमरों का अनुभव विचित्र था. दोपहर भर योगानन्द जी की पुस्तक पढ़ी थी, अमेरिकी लोगों ने कितने स्नेह से उन्हें अपनाया था. वैसे भी अमेरिका विश्व का अग्रणी है, यदि उसको इस तरह आतंकवाद का शिकार होना पड़े तो अन्य देशों की क्या स्थिति हो सकती है, इसकी कल्पना दुष्कर है. अमेरिका में लाखों भारतीय भी हैं, दोनों का घनिष्ठ संबंध है.

कल दिन भर टीवी पर अमेरिका के समाचार ही आ रहे थे. न्यूयार्क, वाशिंगटन और पिट्सबर्ग में हुए हवाई हमलों में मृत, घायल और पीड़ित व्यक्तियों का स्मरण होते ही मन संवेदना से भर जाता है. ( पहली बार हवाई जहाज हमले में इस्तेमाल किये गये) बाबाजी कहते हैं. ईश्वर दयालु है, समर्थ है, उदार है उसने उन्हें अपरिमित बल दिया है, आनंद का स्रोत दिया है, जिसे खोजने में वे समर्थ हैं. उसकी कृपा असीम है. मानव जीवन ही अपने आप में एक उपहार है. अमूल्य उपहार ! कल जून ने वह ‘पास’ लाकर दिया जिसे लेकर वे गोहाटी में श्री श्री रविशंकर जी (सद्गुरु) द्वारा करायी जाने वाली सुदर्शन क्रिया में भाग ले सकते हैं. अगले हफ्ते आज से छह दिन बाद ब्रह्म मुहूर्त में उनकी यात्रा का आरम्भ होगा और उसके तीसरे दिन शाम को वह सम्पन्न होगी. उसके जीवन की पहली पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा होगी यह. कल शाम वे एक परिचित के यहाँ गये, उनके माता-पिता से मिलने, पर दोनों से ही बातचीत नहीं कर सके. पिताजी की सुनने की शक्ति जाती रही है और माता जी भी अस्वस्थ थीं, सो सोने चली गयीं. अशक्त माता-पिता से मिलकर शीघ्र ही वे वापस लौट आये. कल शाम भी कुछ देर ही ध्यान, आसन कर सके. प्रकृति ईश्वर की इच्छा से चलती है, यदि कोई प्रकृति के नियमों का पालन करे तो शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य बना रहता है.


जागृत अवस्था में मन, बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियां सभी अपने-अपने कार्य में सलग्न होते हैं. स्वप्नावस्था में कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय नहीं रहतीं पर मन व अहंकार सजग होते हैं. सुषुप्ति अवस्था में मात्र अहंकार बचता है, स्वप्न में देखे विषय मन की ही रचना होते हैं, वे उतने ही असत्य हैं जितना यह जगत, जो दीखता तो है पर वास्तव में है नहीं. वास्तविक सत्य का बोध क्योंकि अभी तक हुआ नहीं, यह सब सत्य प्रतीत होता है. वास्तविक सत्य वही परमब्रह्म है जिस तक जाना ही मानव का ध्येय है. आज दीदी से बात की, उनके परिवार में लगभग सभी से बात हुई, बड़ी भांजी आज बाहर जा रही है. दीदी को भी कहा है, वह भी art of living कोर्स अवश्य करें. बाबाजी कहते हैं कि यह उसी की दयालुता है उसी का सामर्थ्य है कि वह हमें सत्संग के लिए प्रेरित करता है. ईश्वर के कहे हुए वचनों को ही सद्गुरु बताते हैं, जिससे साधक कुछ क्षण उससे जुड़ जाते हैं. ये क्षण उन्हें दिन भर भय, कठिनाई से मुक्त कर सकते हैं.  

Wednesday, July 24, 2013

इम्तहान इम्तहान

पिछले चार दिन व्यस्तता में बीते. पहला दिन रविवार था, सोमवार को एक सखी के यहाँ गयी थी, शाम को नन्हे को पढ़ाने में व्यस्त थी, मंगल, बुध को शाम को खेलने भी नहीं जा पाई. आज नन्हे का पहला इम्तहान है, गणित का तैयारी ठीक हुई है, अब उसके अपने ऊपर है. जितनी चिंता उसे है उससे ज्यादा नहीं तो उतनी उन्हें भी है, जून से थोड़ी ज्यादा उसे है, अभी सोशल साइंस का पेपर बनाना है. इस तरह छोटे-छोटे इम्तहान देते वह एक दिन जिन्दगी के बड़े इम्तहान देने के योग्य भी बन जायेगा. सुबह के दस बजे हैं, अभी-अभी ‘सोना चाँदी’ पीटीवी का एक हास्य धारावाहिक देखा. आज बगीचा बहुत साफ-सुथरा लग रहा है, कल ही घास काटी गयी है. गुलाबी फूल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं. कल जून ने क्लब की पत्रिका के लिए लिखी उसकी दूसरी रचना भी टाइप कर दी है कम्प्यूटर पर. उन्होंने यह भी कहा, वह लिख सकती है और उसे कुछ कविताएँ हिंदी पत्रिकाओं को भी भेजनी चाहिएं. उसने सोचा कि उन्हें कहेगी वह सिर्फ लिख सकती है उन्हें टाइप करने, भेजने का काम उसके बस के बाहर है. वह  जानती है उसके कहने पर वे ये काम भी कर देंगे. उन्हें अगले महीने शायद मद्रास जाना पड़े, उनकी विवाह की सालगिरह पर उसे अकेले रहना होगा.
कल नन्हे ने परीक्षा में एक प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा, आते हुए भी भूल से छूट गया, बहुत देर तक परेशान था, लेकिन बाद में भूल गया, अपनी गलतियों पर देर तक दुःख मनाते रहना भी कहाँ की बुद्धिमानी है? हाँ, इतना जरुर है कि वही  गलती भविष्य में न करे. आज ठंड ज्यादा नहीं है, धूप निकली है चाहे धुंधली सी ही है. नन्हे और उसके मित्र को बस में बैठकर जब वह और पड़ोसिन लौट रहे थे तो उसने अपनी परेशानी के बारे में बताया, वह अपनी लम्बी बीमारी से घबरा गयी है. नूना को लगता है, किसी भी तरह से उसकी सहायता करे, उसने सोचा जब भी समय मिलेगा वह कुछ देर के लिए उसके पास जाएगी. उसे मेडिकल गाइड में दिल के बारे में पढ़ना भी चाहिए.
पिछले कई दिनों से कुछ नहीं लिखा. इस पल अचानक महसूस होने लगा, कहीं कुछ छूट रहा है, जो पकड़ में नहीं आ रहा. दिल में एक हौल सा उठ रहा हो जैसे, अकेलेपन का एक अहसास कचोटने लगा है. यह साल विदा लेने को है, सिर्फ तीन दिनों के बाद एक नया साल आ जायेगा कुछ नई उम्मीदें और नये सपने लिए. इस बार आने वाले साल के लिए कोई कविता नहीं लिखी, कोशिश ही नहीं की. नये वर्ष के कार्ड आने शुरू हो गये हैं जैसे उन्होंने भी सभी को भेजे हैं, उन सभी को जिन्हें इस विशाल संसार में अपना कहते हैं, जिनसे उनका  परिचय है अगर वे लोग भी न होते तो वे कितने अकेले होते....
वर्ष का अंतिम दिन, समय, शाम के सात बजे हैं. वे लोग डिश एंटीना पर ‘जी टीवी’ पर नये वर्ष के उपलक्ष में कार्यक्रम देख रहे हैं. वे बहुत खुश हैं. कल एक मित्र परिवार के साथ तिनसुकिया गये थे, खाना भी बाहर खाया, जून ने उसे एक पुलोवर उपहार में दिया, विवाह की वर्षगाँठ के लिए. आज साल के अंतिम दिन बीते साल की की बातें याद आ रही हैं, कुल मिलाकर यह वर्ष अच्छा बीता लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी हुईं जो दुखद थीं जैसे हरियाणा में हुआ अग्निकांड.





Friday, April 26, 2013

रामायण की कहानी-अशोक बैंकर



अचानक घर के सारे के सारे बॉल पेन्स की स्याही जैसे एक साथ ही खत्म हो गयी है, उसे हरी स्याही वाले इस जैल पेन से लिखना पड़ रहा है, जो इतना अच्छा नहीं लिख रहा. मौसम आज भी सुहावना है, शायद यही कारण तो नहीं कि आजकल वह वे सभी कार्य सुबह कर  पाती है, जो ज्यादा गर्मी होने के कारण पहले टाल दिया करती थी, लिखना भी उनमें से एक है. सुबह जल्दी उठने से नन्हे को भी कुछ वक्त दे पाती है, आज से उसके टेस्ट शुरू हैं. कल से नई नैनी सीमा ने काम सम्भाला है, उसने सोचा, देखें, यह कितने दिन टिकती है, पिछले आठ महीनों में यह पांचवीं नैनी है. जून के आने का वक्त हो रहा है, हो सकता है वह आज भी थोड़ा लेट आयें, शनिवार को पूरा एक घंटा देर से आये, उसके पूछने पर नाराज होने लगे.. जल्दी ही मान भी गए, वाकई वह भाग्यशाली है जो इतना अच्छा साथ मिला है उनका...माँ-पिता से मिलने यदि किसी वर्ष न भी जा सके वे लोग तो उसे कोई दुःख नहीं होगा, उसने सोचा अचानक ये बातें उसके मन में क्यों आने लगीं. रक्षाबंधन की स्मृति अभी ताजी है, शायद इसीलिए..

फूलों के कितने गाँव राह में मिले
आते रहेंगे याद सावन के वे झूले

  कल शाम एक परिचित परिवार आया था, यूँ ही उलझ गयी उनसे बातों में, खत्री और क्षत्रिय की बहस को लेकर, उसका कहना था कि खत्री क्षत्रिय का ही अपभ्रंश है, पर वे मानने को तैयार नहीं थे. उनके अनुसार खत्री वे जो लड़ने से घबराते थे, क्षत्रिय वे जो वीर थे. रात भर स्वप्नों के बीच गुजरी, कल ही जून उससे कह रहे थे कि वह व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों पर चिंता करती है. इस तरह के मन को लेकर जीने से तो अच्छा है कि अपने को बहस की स्थिति में डाला ही न जाये. मन भी शांत रहेगा और रिश्ते भी मधुर बने रहेंगे, चाहे ऊपर-ऊपर से ही क्यों न सही. सर्वेंट रूम की बिजली ठीक करने आए इलेक्ट्रीशियन ने घंटी बजाई. लौट कर आई तो उसकी कलम रुक गयी, खाली रहे या कोई काम भी करती रहे तो मन में ढेरों विचार आते ही चले जाते हैं मगर जब कलम उठाओ तो सबके सब गायब. यूँ पिछले आधे घंटे में दो-तीन बार उठना पड़ा है लिखने के दौरान, यूँ लेखन भला क्या होगा, लिखने के लिए एकाग्रता चाहिए और चाहिए विचारों का ठहराव, जो जून की प्रतीक्षा करते समय सम्भव होगा. कल बड़ी ननद का पत्र बिहार से आया, लिखा है वे लोग अब पटना छोड़ देंगे, और पश्चिम में रहेंगे या सुदूर दक्षिण में. दीदी का पत्र कई दिनों से नहीं आया, कल जून ने भी याद दिलाया, कितने साल हो गए उन्हें देखे. उसने सोचा उस सखी के लिए एक अच्छी सी गज़ल या नज्म लिख दे, वह भी कहीं रात भर सोचती न रही हो, उसकी हम राशि है न आखिर.

  आज फिर लिखना रह ही जाता, भला हो पौराणिक कथाओं के लेखक "अशोक बैंकर" का जिनके कारण कुछ न कुछ लिखते रहने की कोशिश जारी रखने का संदेश मिला. आज सुबह समय बिलकुल नहीं था, जून लंच के बाद गए तो कुछ देर सोयी, अखबार पढ़ा और सोसाईटी पत्रिका के पन्ने पलटे जो जून बुक क्लब से लाए थे. सुबह उसने उस सखी को एक क्षणिक उत्साह में फोन किया, इतवार को अपने वहाँ जाने कई बात कही, कुछ विशेष होना चाहिए, सामान्य सामाजिक मुलाकात से हटकर, विशेष स्नैक्स पार्टी, कैरम या कोई फिल्म देखें, फिर सोचा देखें, ईश्वर कितना साथ देता है उसकी योजना सफल होने में.  आज सुबह ‘योगानंद जी’ कि पुस्तक में क्रिया योग नाम का अध्याय पढ़ा, लेकिन पूरी तरह समझ में नहीं आया, यूँ भी पढते समय मन एकाग्र नहीं रह पाता आजकल. पहले जितनी सहजता से ईश्वर आराधना कर पाती थी अब प्रयास करना पड़ता है, शायद लोग जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं..ज्यादा जटिल होते जाते हैं. कभी-कभी कोई पुरानी बात याद आने पर जो उसे आज भी झेंप दिला जाती है या हाल ही की कोई बात जिसे याद करके उसे अच्छा नहीं लगता, वह मस्तिष्क को भुलावा देने के लिए वही पुराना तरीका अपनाती है, नाम-स्मरण, जो उसकी सारी उलझनों को दूर करने का साधन बन सकता था. शायद सभी के साथ या बहुतों के साथ ऐसा होता हो. आज नन्हे का गणित का टेस्ट है, बस दो दिन और फिर छुट्टियाँ यानि मस्ती, मेले में घूमना, शुक्र व शनि को वीडियो गेम खेलने अपने मित्र के यहाँ जायेगा, इतवार को तो उसके मनपसंद टीवी कार्यक्रम हैं ही. उसने मन ही मन उसे स्नेह भेजा और उसके पिता को भी. 

Monday, November 19, 2012

काजीरंगा का गैंडा



माँ-पिता का पत्र आया है, कुछ दिन पूर्व दादीजी का स्वर्गवास हो गया. उसके मन में यादों का एक चलचित्र चलने लगा, उनके साथ बिताए कितने ही दिन याद आए, कितनी अच्छी थीं वह, लिखा है, चोट लगने से एकाएक मृत्यु हो गयी. उसने सोचा, वह जैसी मृत्यु चाहती थीं वैसी ही उन्हें मिली, जीवन चाहे वैसा न मिला हो. कल सोनू का पहला पेपर हो गया इंग्लिश का, आज गणित और कविताओं का है. जून को सम्भवतः एक डेढ़ महीने और इसी तरह तलप आना-जाना पड़ेगा. इतवार दोपहर को आए थे, सोमवार सुबह चले गए. उसने उनसे वह बात भी कह दी, सोचेंगे, कहा है उन्होंने. उसके मन में भी कितनी ही बातें घुमड़ती रहीं इस सिलसिले में.

नन्हे का आज हिंदी का इम्तहान है, कल अंतिम परीक्षा है. कल शाम को उसकी एक उड़िया मित्र आयी थी, पिछले कुछ दिनों में अपने बेटे को तीसरी बार स्टीम-बाथ देने, उसका बेटा कुछ मोटा हो गया है, किसी ने कहा कि भाप में नहलाने से स्लिम हो जायेगा. उसे लगता है वह कुछ ज्यादा ही परेशान हो रही है.

पिछले कई दिनों से डायरी नहीं लिखी, उन्हें राष्ट्रीय उद्यान काजीरंगा जाना था, पहले कुछ दिन यात्रा की तैयारी में लगे, फिर यात्रा में और फिर क्रिसमस की छुट्टियों में क्लब, पिकनिक आदि. आज वर्ष का अंतिम दिन है. काजीरंगा में उन्हें बहुत अच्छा लगा, सुबह सवेरे घने कोहरे में पगडण्डी पर कार चलाकर उस स्थान पर जाना जहां से हाथी की सवारी शुरू होती है, एक अविस्मरणीय क्षण था. वहां एक सींग वाले गैंडे मिलते हैं, वहाँ का विस्तृत वृतांत लिखे उसका मन तो है, पर कब लिखेगी कुछ कह नहीं सकती. जून अभी तक बाहर ही हैं बीच-बीच में आते हैं एकाध दिन के लिए. नन्हे का स्कूल भी परसों खुल रहा है. इस वक्त वह चित्र बना रहा है.

पिछले दिनों अकेले होने के कारण कई बार वे लोग कई बार उस पंजाबी परिवार से मिले. पिछली बार जब वह घर गयी थी तो माँ-पिता से उनके बारे में पूछा था कि किस तरह से वे हमारे रिश्तेदार हैं. उन्होंने विस्तार से बताया एक अच्छी खासी कहानी बन गयी.

पाकिस्तान में एक लालचंद कटारिया थे, जिनकी शादी बागां से हुई, नूना की दादी की दादी के भाई की लड़की इस बागां की माँ थी. लालचंद व बांगा की पुत्री की शादी नूना की माँ के ममेरे भाई के साथ हुई. उनका पुत्र था अमर, जो नूना के पिता जी का सहपाठी था. उसकी शादी राज से हुई जो उसकी माँ की सहपाठिनी थी. इनके पुत्र ही असम में रहने आए..जिनकी पत्नी के माता-पिता भी नूना के माँ-पिता के परिचित थे. उनकी माँ नूना की माँ के साथ भारत आने के बाद पढ़ती थीं.
एक दिन उसने ये बातें जब उनको बतायीं तो वे भी चकित हुए.


Tuesday, November 6, 2012

खिलौनेवाला कमरा



कल शाम को उनकी ही लेन के एक बंगाली महोदय एक विद्यार्थी को लाए, बारहवीं का है, गणित पढ़ना चाहता है. आज से वह यहाँ घर पर पढ़ाने का कार्य आरम्भ कर रही है, अच्छा लग रहा है सोचकर कि वह भी कुछ ऐसा करने जा रही है जो किसी की सहायता के लिए है. उसने सोचा वह पूरे मन से पढ़ाएगी, आज मैट्रिक्स पढ़ाना है. नन्हा अपने मित्र के साथ गेस्ट रूम में खेल रहा है, वह कमरा उसके खिलौनों से भर गया है, चाहे जैसे खेले, रखे, सजाये उसे उस कमरे में पूरी छूट है. कल ननद का पत्र आया है, वे लोग नन्हे को बहुत याद करते हैं, यह तो ठीक है, लेकिन शाम को पांच बजे दोपहर का भोजन तो कुछ ठीक नहीं लगता न. आज लगतार चौथा दिन है गर्मी का, बादलों का नाम भी नहीं है. अभी सवा दस हुए हैं, उसने सोचा आधा घंटा वह पढ़ेगी फिर फुल्के बनाएगी.

कल व परसों उसने गणित पढाया, अनुभव ठीक ही रहा. आज शनिवार है, डिब्रूगढ़ से समाचार समीक्षा का कार्यक्रम आ रहा है. आज भी दिन गर्म है, परसों रात को भयानक गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई थी उसका कुछ असर बाकी है सो धूप तेज नहीं है. नन्हा लिख रहा है, एक से बीस तक लिखने में उसे आधा घंटा लगता है, कभी-कभी जानबूझ कर देर लगाता है. उसका मित्र खेलने आ गया है, अब वह जल्दी से लिख लेगा. आज पत्र भी लिखने हैं, दीदी का पत्र भी आया था, पता नहीं वह अभी यहीं हैं या आबूधाबी चली गयी हैं. आज वह अपनी अध्यापिका को भी पत्र लिखेगी. जून ने कहा था, घर में रंग-रोगन करवाने के लिए अर्जी देंगे.

साढ़े दस हो चुके हैं. आज फिर कुछ दिनों बाद डायरी खोली है, पर दायीं हथेली में बुरी तरह जलन हो रही है, आज एक हरी मिर्च काटी थोड़ा महीन, बस उसी का असर है, बाएं हाथ पर भी थोडा असर है मगर दायीं हथेली तो.. फिर ऐसे में क्या लिखा जायेगा. जून आकर कुछ तो उपाय करेंगे, पर अभी उनके आने में बहुत देर है. कल उन्हें गोहाटी जाना है उनकी पहली, नई, मारुति कार लाने,

आज शुक्रवार है, जून संभवतः कल आएंगे, कल रात या परसों सुबह. कल रात वह देर तक नहीं सो सकी फिर नींद भी आयी तो सपनों भरी. उसकी असमिया सखी ने खाने पर बुलाया है आज शाम को, कल तिनसुकिया जाने को भी कहा है. नन्हे के लिए सैंडिल लेना है, दलिया, चाय, फल, साड़ी पिन और एक कॉटन साड़ी. जून को कैसा लगेगा- शायद बहुत अच्छा या कुछ कम अच्छा. वैसे उसे साड़ी की जरूरत तो नहीं है फ़िलहाल- हाँ कॉटन सूट की है.

आज उन्हें जाना था था पर मौसम ऐसा बिगड़ा है कि... सुबह से मूसलाधार वर्षा हो रही है, घटाटोप बादल छाये हैं, ऐसे में उन्हें जून की याद ज्यादा आने लगी, नन्हा बार-बार पापा के बारे में पूछने लगा. घर में बंद रहो तो कितना खाली-खाली लगता है, वैसे चाहे दिन भर घर में रहें, पर जब मजबूरी हो तो खलता है. उसने सोचा, एक तरह से ठीक ही हुआ, जून के बिना तिनसुकिया में वे करते भी क्या..?

नन्हा आज एक वर्ष बाद फिर से स्कूल गया है. पता नहीं वह क्या कर रहा होगा, आज जब उसे छोड़कर आयी तो वह थोड़ा उदास था, जून उसे लेकर आएंगे. उनके आने से पहले वह  भोजन पूरी तरह तैयार रखेगी, उसे लगा कि अब उन्हें भोजन डाइनिंग टेबिल पर बैठकर खाना चाहिए. नन्हे को सीखना भी तो है अपने आप खाना. उसने बड़े जतन से टेबिल सजाई.