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Friday, August 29, 2014

गेंदे की क्यारी


कल शाम वह नैनी पर झुंझलाई और आज सुबह स्वीपर पर, दोनों अपने काम को टालने का प्रयत्न कर रहे थे. कभी-कभी ऊपर से क्रोध करना जरूरी हो जाता है, पर क्या वास्तव में सिर्फ ऊपर से ही क्रोध कर रही थी? इसका एक प्रमाण तो यह है कि अगले ही पल मन शांत था जबकि पहले देर तक असर रहता था. पूसी ने अपने बच्चों को बाहर खुले में ही रख छोड़ा है, जून का विचार है कि उन्हें प्राकृतिक रूप से पलने-बढ़ने दिया जाये, उसका भी यही विचार है, उस दिन उनके लिए दफ्ती के डिब्बे का घर बनाते-बनाते स्वयं को रोक लिया. आज भी धूप निकली है पर हवा बह रही है वह बाहर लॉन में ही बैठी है. दूर से किसी वाहन की आवाज आ रही है. कभी संगीत की और पंछियों की आवाजें भी ध्यान से सुनने पर आती हैं. कल शाम की पार्टी में पता चला कि ग्रेटर नोएडा में अपना घर बनाने के लिए जो सोसायटी बनाई गयी है उसमें ज्यादातर लोग रहने के लिए नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट के लिए पैसा लगा रहे हैं. जून भी कल की मीटिंग से ज्यादा खुश नहीं थे. पहली किश्त भरने के लिए उन्होंने पहले मकान के किराये के जमा हुए पैसे मंगाए हैं. सबकी बातें सुनकर तो उसे लगा कि एक बार और उन्हें भी सोच लेना चाहिए. रोज के कामों के आलावा आज उसे नन्हे का स्वेटर बनाना है, सुभाष चन्द्र बोस व शंकरदेव पर किताबें भी पढनी हैं. पत्रिकाएँ और अख़बार तो हैं ही. कविताओं वाली डायरी खोलनी है. बगीचे में भी कुछ समय देना है. कुल मिलाकर आज का दिन व्यस्त रहने वाला है.  

आज उसने जो सुना, उसका सार था, “साधना करने के लिए सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, श्रद्धा, भावना और विश्वास चाहिये, पुलक चाहिए, मन को पूरी तरह अहंकार से मुक्त करना होगा. भीतर डूबना आना चाहिए. ध्यानस्थ होना पड़ता है. अपने चित्त की सौम्यता को नष्ट नहीं होने देना चाहिए. मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भाव रखते हुए अपने चित्त को प्रसन्न रखना होगा. समय की धारा के साथ पुराने कर्मों का लेन-देन चलता रहता है. नये कर्मों का बंधन न बने यही प्रयास करना चाहिए.

कल वह गाने की प्रैक्टिस में नहीं जा सकी, आज साढ़े पांच बजे जाना है. परसों मीटिंग है. वह बाहर है गेंदे की क्यारी के पास, अभी एकाध फूल ही खिले हैं इसमें. आज सुबह माँ से फोन पर बात की. कल चचेरी बहन की शादी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. उसके मामा के परिवार ने काफी कुछ दिया. इधर उनकी तरफ से सभी का सहयोग रहा. यहाँ बाहर बैठकर चेहरे पर जो शीतल हवा छूकर जाती है, भली लगती है, उसका अहसास अंदर घर में नहीं हो सकता, पर तरह-तरह की आवाजें आती रहती हैं सो गम्भीर कार्य नहीं हो पाते. आज सुबह वह जल्दी उठी थी सो सभी कार्य समय से सम्पन्न हो चुके हैं. आजकल जून के प्रति उसका व्यवहार थोड़ा कम स्नेहपूर्ण रहता है. छोटी-छोटी बातों से चिढ़कर वह जवाब दे देती है. सहनशीलता खोती जा रही है या फिर अपनापन बढ़ता जा  रहा है. अब संगीत का समय है सो अंदर जाना चाहिए.

जीवन में ज्ञान और ध्यान हो तभी मुक्ति सम्भव है ! कल सुबह उसके दायें हाथ की अंगूठे के पास वाली अंगुली में जोड़ पर एक कांटा लग गया, बात छोटी सी है पर उसके मन ने उस हल्के दर्द को भी बड़ा मानकर देखा. नन्हे के हाथ का दर्द इससे कहीं ज्यादा रहा होगा लेकिन उसने संयम से सहा. इस वक्त सुबह के साढ़े सात बजे हैं वह टीवी पर  बाबाजी के आने की प्रतीक्षा में है.

“अपने मन. बुद्धि, विचार को देखने वाला इनसे अलग है, यदि इनसे जुडकर रहेंगे तो सही निर्णय नहीं कर पाएंगे. देह, मन बुद्धि के साथ जुड़कर कोई ‘स्वयं’ को खो देता है. इसका कारण तमो व रजो गुण है. यदि सात्विक गुण की प्रधानता हो तो धीरे-धीरे इन से मुक्त होना आयेगा. तमो गुण की प्रधानता का अर्थ है आलस्य व स्वार्थ और रजो गुण की प्रधानता का अर्थ है अपने मान-सम्मान की वृद्धि का सदा प्रयास करते रहना. देह की आवश्यकता सांसारिक वस्तुएं हैं, पर ‘स्वयं’ की आवश्यकता परमात्मा का स्वभाव है. ‘स्वयं’ को खोजना ही वास्तविक विज्ञान है. अंत में उन्होंने कहा एहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन भर प्रयास चलता रहता है पर स्वयं की आवश्यकता को नजर अंदाज कर दिया जाता है.

  



Wednesday, April 24, 2013

बृहस्पति ग्रह का धूमकेतु


  

 एक माह का अंतराल, कारण एकाध नहीं कई गिनाये जा सकते हैं, लेकिन आज इसकी सुध ली है तो एक सखी के फोन के कारण. सुबह-सुबह उसने पूछा, दादा साहब फाल्के अवार्ड इस वर्ष किसे मिला है, वह नहीं बता सकी. पिछले कई दिनों, घर से आने से पहले व बाद में भी लिखना-पढ़ना छूट ही गया था. डायरी लिखने से कुछ विशेष समाचार भी नोट हो जाते हैं,   अब जैसे कि विश्वकप फुटबाल में ब्राजील, इटली, बुल्गारिया और स्वीडन की टीमें सेमी फाइनल में पहुंची हैं. पिछले दिनों कई अच्छी बातें हुईं. नन्हे का जन्मदिन उन्होंने अच्छी तरह से मनाया, पिताजी की चिट्ठी आई थी, उनके मकान में किरायेदार रहने आ गए हैं., यानि वह मकान अब घर बन गया है. आज दोनों घरों पर पत्र भी लिखने हैं. मौसम आजकल बेहद गर्म है, काफी दिनों से वर्षा नहीं हुई है.

 आज सुबह जून को विदा करने जब बाहर गयी तो प्रकृति की सुंदरता को देखकर मन विभोर हो उठा. ग़ालिब के शेर को गुनगुनाते हुए, बेला के फूलों की खुशबु समोते हुए...

पानी में भीगा ऐसे मन
अंतर में एक नदी उग आई
हरी दूब के कोनों को छूकर पोरों में
हरियाली, नदी किनारे छायी

 बृहस्पति ग्रह के शूमेकर धूमकेतु के टुकड़ों के टकराने की घटना सदियों बाद हुई है, अगर धरती से भी कोई धूमकेतु टकराए तो प्रलय ही आयेगी न.

 कल लिखना शुरू ही किया था कि जून आ गए और वे हास्पिटल गए. उसकी दायीं आँख में कभी-कभी पानी आता है, सुबह से गले में चुभन है. यह सब उसकी गलत सोचों का नतीजा  है, आलस्य और मद का परिणाम. हर समय श्रम करने की अपनी आदत को छोडकर विश्राम करने की आदत का परिणाम. नन्हे को छोड़ने गयी तो तो एक अस्थमा का बूढा मरीज कुछ सहायता मांगने आया, उसने मना कर दिया, अगर कुछ दे ही देती तो क्या फर्क पड़ जाता, बल्कि मन को बेचैनी न होती. पर जून को शायद अच्छा नहीं लगता, लेकिन उसके समझाने पर वह भी सहमत हो जाते संभवतः. डेक पर यह गजल आ रही है-

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

उस अकेले व्यक्ति के लिए कितनी सही हैं ये लाइनें. कई दिनों से पुरानी पड़ोसिन से नहीं मिली, शायद आज ही वे लोग आयें. दीदी का पत्र भी कई दिनों से नहीं आया है, यूँ तो किसी का भी नहीं आया है, सारे रिश्ते मुंह देखे के ही होते हैं, लेकिन यह कोई अफ़सोस करने की बात नहीं है, रिश्ते हैं, रिश्ते होते हैं, यह भी क्या कम है? नन्हा बड़ा होगा तो उसके बच्चों को बुआ, चाचा इन रिश्तों का अर्थ भी नहीं मालूम हो पायेगा शायद...दुनिया सिमटती जा रही है और फैलती भी जा रही है एक साथ ही.

 अभी-अभी जून के लाए एक उपन्यास पर नजर पड़ी, कुछ पल पूर्व पढ़ी ‘स्वामी योगानंद’ की आत्मकथा के अंश का असर हवा हो गया. मन इतना अस्थिर क्यों है, सांसारिक विषयों में कितनी आसानी से रमता है, भगवद विषयों में उतनी ही कठिनाई से. उसने स्वयं ही उसे छूट दी हुई है, कई बहाने हैं इसके लिए कि वे सब बातें भी जीवन में आवश्यक हैं जिन्हें हम सांसारिक कहते हैं. कल धर्मयुग में ‘साधु वासवानी’ के शिष्य ‘जे पी वासवानी’ का प्रवचन दुबारा पढ़ा था, उन्होंने भी कहा, ईश्वर सिर्फ कल्पना जगत की वस्तु नहीं है, उसे हर क्षण अपने कार्य कलाप में शामिल करना होगा. उन सभी बातों से दूर रहना होगा जो हमें ईश्वर से दूर ले जाती हैं. कल शाम उसकी असमिया सखी आई, वे काफी देर तक बातें करते रहे, समय का भान ही नहीं रहा. सुबह एक सखी ने फोन करके पूछा, रक्षा बंधन कब है, मंझले भाई ने खत का जवाब नहीं दिया, न ही बड़े व छोटे भाई का ही खत आया है, जवाब आने पर ही राखी भेजेगी ऐसा दिमाग कहता है, पर दिमाग दिल के आगे हार ही जायेगा... डायरी लिखते समय सभी की यादें घेर लेती हैं, अपने करीब न जा पाए क्या इसलिए ? छोटी बहन का पत्र अच्छा सा पत्र आया है, एक महीने पूर्व का लिखा, शायद लिखकर पोस्ट करना भूल गयी होगी.
जगजीत सिंह की यह गजल कितनी अच्छी है-
धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो
जिंदगी क्या है किताबों को हटकर देखो




Monday, April 22, 2013

आंधी और तूफान



आज वे बाजार गए थे, उसने सोफा बैक के लिए प्रिंटेड कपड़ा खरीदा, जून को अवश्य पसंद आयेगा, सीनरी बनाने के लिए आधा मीटर दसूती कपड़ा भी. उसने चप्पल भी खरीदी, पर जून के बिना शॉपिंग करने में आनंद नहीं आता, यह उसका वहम ही था कि आयेगा. कल रात की बात याद आते ही सिहरन होती है, वे सोये ही थे कि आंधी-पानी शुरू हो गया, बेर के बराबर आकार के ओले और पानी की बौछारें खिड़की से उनके बिस्तर पर आ गयीं, बड़ी मुश्किल से खिड़कियाँ बंद कीं, फिर बिजली भी चली गयी जो आज दोपहर को आयी. देर तक वे सो नहीं पाए, सुबह के वक्त ही नींद गहरी आई.

  वही रात का समय है, नन्हा भी आज जग रहा है, उसके जन्मदिन के लिए कार्ड बना रहा है, वही  चिड़ियों वाला. कल से उसे बहुत आइसक्रीम खाने को मिल रही है. माँ दूध व ब्रेड की आइसक्रीम बहुत अच्छी बनाती हैं. उसने सोचा जून के आने पर उसे भी खिलाएगी. यूँ लगता है जैसे लिखते समय वह जैसे उससे बातें कर रही हो. अब उसके आने में ज्यादा दिन नहीं हैं. आज उसने मेहमानों की लिस्ट बनाई और उन वस्तुओं की भी जो उसे जून के लिए खरीद कर रखनी हैं.

  आज उसका फोन आया, सब जरूरी बातों के बाद उसने कहा..., पता नहीं क्यों वह नहीं कह पाई, शायद इतने लोग वहाँ थे, पर उस दिन तो केवल माँ, व नन्हा थे, पिता दूसरे कमरे में थे, तब भी नहीं कह पायी थी, उसने मन में यही सोचा कि वह स्वयं ही समझ लें....समझ ही गए होंगे. आज उसका जन्मदिन अच्छा रहा, जून की कमी तो थी ही, पर इतने वर्षों बाद परिवार वालों के साथ एक यादगार अनुभव बन गया. सुबह नींद जल्दी खुल गयी थी, सवा पांच ही बजे थे, मकान पर गयी, बाहर आंगन में वहीं पोर्च में रखा बुरादा इकट्ठा किया, फिर दोपहर से पहले ही नन्हा और पिताजी के साथ दुबारा गयी, लोहे के दोनों गेट साफ किये, बुरादा फेंका, धुलाई की. आज दरवाजों पर पीली मिट्टी का पेंट हो गया, सुंदर लग रहे हैं दरवाजे.

 मंझला भाई अपने परिवार के साथ आ गया है. घर में चहल-पहल हो गयी है, सुबह व्यस्तता में बीती, दोपहर वीडियो पर अंजाम देखी और रात होते-होते उसकी आँखें दुखनी शुरू हो गयी थीं, चुभन शाम से होने लगी थी पर उसने सोचा, शायद लगातार फिल्म देखने के कारण ऐसा हुआ है, पर लगता है कल सुबह ही डॉ के पास जाना होगा. मकान पर पेंटिंग का काम पूरा हो गया है. सैनिटरी का सामान आ गया है, फिटर ने चेक भी कर लिया है.

  आज दीदी का जन्मदिन है, उन सबने उन्हें बहुत याद किया. उसकी आँखें अभी तक ठीक नहीं हुई हैं, सो लिखने का क्रम भी टूटने लगा है, यूँ भी आजकल मस्तिष्क हजार बातों से भरा रहता है कि...यह उथल-पुथल जून के आने पर ही खत्म होगी.

  आज पूरे आठवें दिन सुबह उठने पर उसकी आँखें बिना धोए खुल गयीं. कल रात जून का फोन आया था, उनकी ट्रेन बारह घंटे लेट थी, उसने प्रार्थना की कि अपने माँ –पिता को लेकर बनारस से यहाँ का उनका सफर आराम से बीते, बिना किसी परेशानी के. नन्हा कितने  आराम से सो रहा है, उसे गर्मी, मच्छर कोई भी नहीं जगा सका. अभी सुबह के सवा छह ही हुए हैं, यहाँ बरामदे में कितनी ठंडी हवा आर ही है. परसों से वे अपने घर के बरामदे में बैठेगें, कितनी हवा और कितनी धूप आती है यह तो वहाँ रहने से ही पता चलेगा. फोन की घंटी बज रही है, शायद जून हों, जब भी फ़ोन आता है उसे ऐसा ही लगता है.

किसी पत्रिका में उसने ये पंक्तियाँ पढीं, शायर का नाम नहीं पता, अच्छी लगीं-

पैदा न हो जमीं से नया आसमां कोई
दिल काँपता  है आप की रफ्तार देखकर

भरे बाजार में चलने से पहले सोच लो आकर
न कोई हाथ थामेगा न कोई रास्ता देगा

ऐसा नहीं कि खुश्क मिले हर जगह जमीं
प्यासे जो चल पड़े हैं तो दरिया भी आयेगा

....और ये पंक्तियाँ छोटी बहन के खत से जो उसने छोटे भाई को लिखा था-

तुम्हें सपनों की प्रतीक्षा है
मुझे नींद की
अब तो
मैं जानती हूँ सपनों की असलियत
आँखों से घुसकर वे
आने वाले कल को
अतीत में रख आते हैं
बासी बनाते हैं आज का दिन
बीतने के पहले ही...








Tuesday, April 2, 2013

फूलों का कोना




 १४ फरवरी यानि ‘वेलेंटाइन डे’ और जून आज उससे दूर हैं, शाम को पांच-छह बजे तक आएंगे, आज सुबह ही वह मोरानहाट गए हैं, दोपहर को उसकी एक सखी के आने की सम्भावना है, सो ज्यादा भूख न होने पर भी उसने सर्वोत्तम पढ़ते-पढ़ते भोजन कर लिया और अब डायरी खोली है. कल रात फिर देर तक सो नहीं पायी, जबकि दोपहर को एक अच्छी सी कन्नड़ फिल्म देखी थी. रात को देर तक जगना कोई अच्छी बात तो नहीं, ईश्वर को भुला दिया है, मन एकाग्र होता ही नहीं तो नींद कैसे आएगी. स्थिरता, एकाग्रता, निर्लिप्तता, भीड़ में रहकर भी उससे अलग..कीचड़ में कमल की तरह..तभी तो बाहरी प्रभाव मन पर हावी नहीं हो सकेंगे. अब मन में अपना निज का कोई भाव तो है नहीं, जो है सो बाहर से थोपा हुआ, नहीं तो छोटी-छोटी बातों का इतना असर लेना क्या ठीक है. इंसान को ऐसा होना चाहिए जैसे कछुआ होता है, बाहरी प्रभावों से अभेध्य, अपना सबसे अच्छा मित्र. अचानक उसे लगा, कितना सन्नाटा है चारों ओर..लेकिन इस सन्नाटे की भी एक आवाज है जो कानों को सुनाई देती है...ऊं....सभी इस समय अपने-अपने घरों में लंच करके आराम कर रहे होंगे.

  सवा नौ बजे हैं सुबह के, आज तो सभी कुछ उसके अनुकूल हो रहा है, सुबह सवेरे ही सफाई हो जयी, और शीशे की गोल मेज पर, जिसके नीचे टी बुश का आधार है, गेंदे और  कॉर्न फ्लावर के फूलों से बैठक का वह कोना जैसे खिल उठा है. आज दोपहर को टमाटर की चटनी बनानी है, जून कल डिब्रूगढ़ से ढेर से लाए हैं.

  किसी ने सच ही कहा है, सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है और इंसान गलतियों से ही सुधरता है. कल से उसका मस्तिष्क अपनी उलझन का हल ढूँढने में व्यस्त था जो धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है..बेवजह ही लोग अपनी जिंदगी को जटिल बना लेते हैं, फिर गायब होती है रातों की नींद और सुबह देर से उठना, फिर सभी काम जल्दी-जल्दी निपटने में आयी झुंझलाहट.. नन्हे की बस आज छूट भी सकती थी. इस डायरी में हर पेज के नीचे एक सूक्ति है अंग्रेजी में, आज की नसीहत मनोनुकूल है-

If you are in right, you can afford to keep your temper and when you are in the wrong you can’t afford to lose it.

  कल शाम बहुत दिनों के बाद तेलुगु मित्र परिवार आया, अच्छा लगा और फिर रात को फोन पर हिंदी शब्दों का अर्थ बताना....जून एक क्षण के लिए परेशान हो गए थे, शायद जेलस, वह उसे बहुत चाहते जो हैं. कल उसने माँ-पिता को पत्र लिखा, उनका मकान बनने में अभी दो-तीन माह और लगेंगे. उसे लगा पौने ग्यारह हो चुके होंगे, अभी उसने स्नान भी नहीं किया है, थोड़ी खांसी थी, अदरक वाली चाय पी है अभी कुछ मिनट पहले ही. आज जून ने दो बार फोन करके पूछा, लेकिन स्वीपर जिस तरह अपनी बात का विश्वास दिला रहा है उसकी शिकायत करना ठीक नहीं लगता, हो सकता है वह उसे धोखा भी दे रहा हो, वह बहुत जल्दी लोगों की बातों पर विश्वास कर लेती है, इस बात का फायदा कई बार कई लोग उठा चुके हैं यह वह अब जानने लगी है लेकिन विश्वास करने की इस प्रवृत्ति को छोड़ना इतना आसान तो नहीं. माली की पत्नी भाग गयी है आज चम्पा ने यह बात बताई..बेचारा साधुराम...कितना दुखी होगा.

  पिछले तीन-चार दिनों से ठंड बढ़ गयी है, आज मौसम ने अपना शीत रूप दिखाया है, बदल. धुंध और कंपा देने वाली ठंड, नन्हे का टेस्ट था जाना जरूरी था, उसके सभी यूनिट टेस्ट अच्छे हुए हैं. इस वक्त उसके मन में जो विचार चल रहे हैं उनमें से एक है, उसे कुछ सार्थक लिखना चाहिए, यूँ रोजमर्रा की बातों से पन्ने भरते चले जाना क्या उचित है ? उचित और अनुचित का फैसला करना इतना आसान नहीं है. क्या यह उचित होगा कि शब्दों को इधर-उधर करके कुछ भाव पिरोकर वह लिखेगी, हाँ यह कह सकते हैं, उससे ज्यादा संतुष्टि मिलेगी. अपनी संतुष्टि तक ही सीमित है क्या मानव मन का संसार, अपने से इतर कुछ भी देख नहीं पाता, सच तो यही है चाहे कितना ही कड़वा क्यों न हो. अपने आप से जब हटता है तो परिवार वालों पर लगता है, जून की और नन्हे की देखभाल वह तब कहाँ कर पाती है जब स्वयं संतुष्ट नहीं होती. आज का नीचे लिखा विचार भी उसकी कल्पना को ही प्राथमिकता दे रहा है.
Resigned acceptance of an apparent impasse can lead to failure or defeat, while an imaginative and venturesome task can lead to success.





Monday, February 18, 2013

पिकनिक का भोज



जून का फोन आया है, वह नाहरकटिया जा रहे हैं, लंच पर देर से आएंगे. उसने बहुत दिनों बाद वह नीली साड़ी पहनी है, जो छोटी चाची ने खरीदी थी, सुंदर है, लेकिन चाचीजी अब पहले जैसी नहीं रहीं, परेशानियों ने उन्हें तोडकर रख दिया है, वक्त से पहले बूढी हो चली हैं. कल लगभग एक वर्ष बाद वे अपनी पुराने घर के पड़ोस में गए, उड़िया पडोसिन के यहाँ, वहाँ एक और परिचिता मिलीं, दुबली-पतली सी, पूरी तरह से अपने छोटे छोटे दो बच्चों में व्यस्त..कल पिता का पत्र आया है, जमीन की रजिस्ट्री जून के नाम हो गयी है. और शायद इसी वर्ष के अंत तक उनका मकान बन भी जाये. थर्मोकोल पर पेंटिंग करने में उसे बहुत आनंद आ रहा है, इसके बाद कागज पर करेगी. लेकिन वह एक घंटे से ज्यादा नहीं कर पाती क्रोशिये का मेजपोश भी बनने वाला है फिर टैटिंग करेगी. कल रात स्वप्न में देखा, गणित पढ़ा रही है, वह भी उसका एक प्रिय काम है.

वह लॉन में झूले पर बैठ कर धूप में बाल सुखाते हुए लिख रही है, पीठ पर धूप का तेज ताप भीतर तक छू रहा है. डहेलिया का दूसरा फूल भी आधा खिल गया है. परसों इतवार को उन्हें पिकनिक पर जाना है, डेरॉक है जगह का नाम, पूरे ग्रुप के लिए “मटर-पनीर” उसे शाम को बना कर रखना है, क्योकि सुबह जल्दी निकलना है, शाम को उन्हें एक शादी में भी जाना है, पड़ोस के खाली घर में, लगता है वह विवाह घर बनता जा रहा है. The day of the feast पढ़ ली है, अब एक और अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना शुरू किया है, सारे काम करते हुए बीच-बीच में थोड़ी देर के लिए कोई किताब पढ़ने का समय निकाल लेना, चाहे तीन-चार पेज ही क्यों न हों, अच्छा लगता है, जैसे धूप में चलते-चलते कुछ पल के लिए कोई छांह में रुक जाये. कल रात नन्हा नींद में नीचे गिर गया और उसे पता भी नहीं चला, नीचे भी आराम से सो रह था, उसकी नींद बहुत पक्की है. उसके स्कूल में आजकल ज्यादा पढ़ाई नहीं हो रही, नहीं जायेगा कहकर फिर चला गया है, उसे अनुपस्थित होना पसंद नहीं है.

कल इतवार था और पिकनिक के कारण एक यादगार इतवार बन गया, वे सुबह साढ़े छ बजे निकले और शाम साढ़े पांच बजे लौटे. मौसम अच्छा है, अब चिप्स बनाने का समय आ गया है, अगले महीने आज ही के दिन होली है. कल रात स्वप्न में छोटी बहन को देखा, बहुत कमजोर और अस्वस्थ लग रही थी, उसकी फ्रेंड्स भी थीं, वह माँ को बुला रही रही थी. आज जून को दिल्ली फोन करके पता करने को कहा है, इसी महीने उसकी डिलीवरी डेट है, ईश्वर सब कुशल करेगा.

होली पर वे क्या-क्या बनाएंगे, इस बात पर उसने जून के साथ बात की, मतभेद स्वाभाविक ही था, कभी कभी इस तरह नोक-झोंक होनी ही चाहिए, एक-दूसरे के विचार पता चल जाते हैं. आज उसने आलू चिप्स बनाये हैं. छोटे भाई का पत्र आया है फोटोग्राफ्स भी, बहुत अच्छे आए हैं फोटोग्राफ. आजकल उसने अपने दिन को कई टुकड़ों में बाँट लिया है और हर एक टुकड़े का एक खास काम है, व्यस्तता के कारण कुछ और सोचने का समय ही नहीं मिलता, समय मिलते ही कोई किताब सामने आ जाती है. कविताओं से इतनी दूर चली गयी है कि..लगता है कविता खाली समय की उपज होती है. बहुत दिनों से टीवी पर कोई कवि सम्मेलन भी नहीं आया जिससे प्रेरणा मिले.  





Thursday, January 31, 2013

सपने में ही मैन



आज शनिवार है, यानि जून लंच के बाद घर पर रहेंगे, पर नन्हे का स्कूल खुला है. कल वे तिनसुकिया गए शाम चार बजे, सात बजे लौट तक आये. वहाँ इतना कीचड़ था. मुख्य सड़क पर ही पानी भरा था, गंदा बदबूदार पानी, कितनी बीमारियों के कीटाणु रहे होंगे, फैलते होंगे वहाँ. कोई कुछ करता क्यों नहीं, जैसे वे कुछ नहीं करते. अखबार में एक बूढ़े पिता की अपील पढ़ी, जिसका अंतिम बेटा अस्पताल में है, किडनी का आपरेशन होना है, दो लाख रूपये इक्कट्ठे करने हैं. पढकर सहानुभूति होती है, लेकिन मात्र सहानुभूति तो काफी नहीं. पैसे वैसे ही बहुत खर्च हो गए हैं इस बार, किताबों पर ही सात-आठ सौ रूपये. पैसे के बारे में उसे कभी कोई चिंता नहीं करनी पड़ी. जून ने कभी होने ही नहीं दी. इस मामले में वह बेहद भाग्यशाली है. यूँ तो और भी कई मामलों में है. आजकल रात को उसे स्वप्न बहुत आते हैं, खासतौर पर सुबह के वक्त, जो याद भी रह जाते हैं, नींद शायद ठीक से नहीं आती. दिन में सोना बिलकुल बंद करना होगा. जून भी आजकल सुबह जल्दी नहीं उठ पाते क्या उन्हें भी गहरी नींद नहीं आती, उनके बारे में कुछ न लिखे तो लगता है कुछ छूट गया है क्या यह कर्त्तव्य बोध के कारण है या...बाल्मीकि रामायण का अयोध्या कांड पढ़ रही है आजकल, राम का चरित्र कितना महान दर्शाया गया है, तभी तो आज हजारों साल बाद भी राम नाम इतना पवित्र है, सीता-राम संवाद बेहद सुंदर है.

कल शाम को एक परिचित परिवार आया, काफी देर तक रहे वे लोग, अच्छा लगा. आज बहुत दिनों बाद फिर से समय मिला है स्वयं के पास आने का पर माध्यम बाहरी है. कैसेट बज रहा है, ‘बच्चन की मधुशाला’ और किताब भी वही खुली है कविता की. उसे अपना आप कविता में ही मिलता है शायद. कल मोहन राकेश की कहानी पर बना धारावाहिक देखा, लगता है यह कहानी पढ़ी है उसने. आज मौसम कल से ठंडा है. अभी हवा में शीतलता है दोपहर तक जो गर्मी में बदल जायेगी. लक्ष्मी का स्वास्थ्य अभी भी ठीक नहीं हुआ है, आज अस्पताल गयी है, बहुत कमजोर लग रही थी आज सुबह. लम्बी बीमारी है, अब साल भर ऐसा ही चलेगा शायद.

जुलाई का महीना खत्म होने को है, सुबह टीवी पर देखा, आज श्रावण मास की दूसरी तिथि है. मालपुए बनाने का महीना. किसी दिन बनाएगी जब खूब तेज वर्षा हो रही होगी. आज दस बजे तक ही सब काम हो गया है, देर तक रामायण भी पढ़ सकी. आज धूप अपने पूरे शबाब पर है.. चमकदार.. झनझनाती हुई. नन्हा आज बड़ी बोतल ले गया है पानी की, उसे बहुत प्यास लगती है स्कूल में. कक्षा में पंखे भी तो ठीक से नहीं चलते. उसने आज सुबह एक सपना बताया. बड़ा मजेदार था ‘हीमैन’ का सपना. उसने भी कल किराये के मकान का एक सपना देखा. जून और वह कुछ दिनों पहले बात कर रहे थे कि उन्हें आसाम छोड़कर चले जाना चाहिए और किराये के मकान में रहना चाहिए जब तक अपना मकान  न बन जाये. इसी की परिणति थी यह सपना. लेकिन इतनी सुख-सुविधाओं को छोडकर चले जाना बुद्धिमानी नहीं कही जायेगी. बात जून के विभाग की समस्याओं को लेकर शुरू हुई थी जो हर जगह होती होगी.




Tuesday, February 21, 2012

बंद खिड़कियों वाले मकान


आज सुबह बस का हॉर्न सुनाई दिया तो जून बाहर निकला, मोटरसाइकिल ठीक करानी थी सो उसे ही ले गया. नूना के लिये दस्ताने लाया है कपड़े धोने में उसके हाथ खराब न हो जाएँ इसलिए. उसका मन यहाँ नहीं लग रहा है कितना बंद-बंद लगता है खिड़की से बाहर देखने पर मकान ही मकान दिखाई देते हैं, बंद खिड़कियों वाले मकान. नूना ने ऐसा कहा तो जून भी उदास हो गया पल भर को, फिर वे शेष कामों में लग गए. शाम को सब कैलेंडर भी लगाये, अभी पर्दों के रिंग लगाने बाकी हैं. जोशीमठ से छोटे भाई का पत्र आया है. पड़ोस के किसी घर से ‘रजिया सुल्तान’ फिल्म के गाने बजने की आवाज आ रही है.
वह जानती है कि उसे यहाँ रहना अच्छा लगने लगेगा. सुबह के नौ बजे हैं वर्षा हो रही है जो टिन की छत पर गिरकर एक अद्भुत संगीत उत्पन्न कर रही है. कल रात जून ने प्रेमचन्द की पुस्तक 'अहंकार' पढ़नी शुरू की पर तीन-चार पेज पढ़ते ही सो गया. स्वप्न में वह लगभग रोज ही माँ, छोटी बहन व दीदी को देखती है. भाई की शादी की तिथि तय नहीं हुई है, वे उसमें जायेंगे.

Monday, January 30, 2012

प्रेमचन्द की किताबें


प्रेमचन्द की बीस पुस्तकें लाइब्रेरी में आई हैं. हिंदी की पुस्तकों का यहाँ की लाइब्रेरी में आना एक सुखद घटना है उनके लिए, और आज ही वे प्रेमाश्रम व मानसरोवर(१) लाए हैं. उसने सोचा वह कल से पढ़ना शुरू करेगी. कल से माली काम करने लगा है, आखिर वह शुभ दिन आ ही गया पर पता नहीं कब उन्हें दूसरे मकान में जाना पड़े, डीएक्स टाइप मकान में, इस घर का नम्बर है सी ७६, यह उन्हें सदा याद रहेगा. कल प्रभा, दायीं ओर की पडोसन आयी थी, दो कहानियों पर चर्चा की, उसने कहा कि उनमें से एक कहानी पर वे लोग कभी फिल्म बनाएंगे. जून चाहता है कि वह मोटी हो जाये, ढेर से फल लाकर रखे आज, पर उसे लगता है वह कभी मोटी नहीं होगी, हाँ एक बार उस तरह ‘मोटी’ होकर देखना है, दोपहर को स्वप्न में कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ था.