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Tuesday, March 11, 2014

कागजी अखरोट


टीवी पर काश्मीर से सम्बन्धित एक धारावाहिक ने बाँध लिया है, काश्मीर में जब यूरोपियन और अमेरिकी पर्यटकों को बंधक बनाया गया था, उसी घटना का कथात्मक चित्रण किया गया है, लोगों की परेशानी, आर्मी व पुलिस की कार्यवाही, पत्रकारों और टीवी चैनल की नई कहानी पाने की इच्छा, सभी का वर्णन अच्छा है. अपह्रत व्यापारी की पत्नी का दुःख, ड्यूटी पर जाते हुए पुलिस अधिकारी की पत्नी का उससे कागजी अखरोट और केसर लाने की फरमाइश करना. असमिया समाचारों ने बचा लिया वरना उसका सारा कार्य वहीं का वहीं रह जाता और टीवी के सामने से हटने का मन नहीं करता. कल शाम वे टहल कर लौटे तो दो मित्र परिवार मिलने आये, तब महसूस हुआ, आजकल घर की साज-सज्जा पर उसका ध्यान थोड़ा कम है, अब जून के बाहर जाने के बाद पूरी सफाई करेगी. सुबह-सुबह बड़े भाई से बात हुई, माँ-पापा अभी तक डॉक्टर के पास नहीं गये हैं, ईश्वर की मर्जी मानकर वे अपनी अपनी समस्या को ख़ुशी ख़ुशी सह रहे हैं. इन्सान का मन कितने भुलावों की रचना कर लेता है. स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए आसपास कितनी ही दीवारों की रचना कर लेता है. शायद वृद्धावस्था में वह भी ऐसी ही हठी हो जाये. आज सुबह Frankenstein दुबारा पढ़नी शुरू की, बहुत रोचक पुस्तक है.
कल शाम नन्हा थका हुआ लग रहा था, आज सुबह उठा तो उसे उसका बदन गर्म लगा पर शायद यह उसका वहम हो क्योंकि वह ठीक महसूस कर रहा था. आज से उसे एक घंटा खेलने के लिए जाने को कहा है, पिछले चार-पांच दिनों से मित्रों से बिलकुल दूर हो गया है. आज  मौसम गर्म है, पंखा सुहावना लग रहा है. उसने भरवां आलू-बैगन बनाये हैं, जो माँ ने बचपन की एक गर्मी की शुरुआती शाम को बनाये थे. जब गर्मियां शुरू होती थीं तो उनकी रसोई बाहर आ जाती थी. वे भी क्या दिन थे ! कल शाम जून और वह दूर तक घूमने गये, अगले आठ दिन उसे अकेले ही टहलना होगा शाम को अपने ही घर में.  सुबह उसने सोचा जून के तैयार होने तक घर पर फोन कर लेगी, पर पता नहीं ध्यान कहाँ था, शायद अपने को गर्व के पर्दे के पीछे छिपा लिया था, लोकल फोन पर एसटीडी नम्बर मिला रही थी. सारा घमंड पानी-पानी हो गया जब जून ने उसे ऐसा करने से रोका. हर पल स्वयं पर नजर रखनी बेहद जरूरी है नहीं तो उसे भटकने में देर नहीं लगती. कल रात उनके बेडरूम के रोशनदान में एक साथ सैकड़ों काले चींटे आ गये, जून ने पहले एक चींटे को मारा  तो नूना ने उसे मना किया पर कुछ ही देर में उन्हें उन सभी को मारना या बेहोश करना पड़ा. अभी भी इक्का-दुक्का कमरे में घूम रहे हैं, उनके लिये तो कयामत का दिन कल ही था.
अभी आठ ही बजे हैं पर सूरज आकाश में ऊंचा चढ़ आया है. आज सुबह जून ने उसे कालिमा में उगता हुआ लाल सूरज दिखाया, अनुपम था वह दृश्य ! उसे लगा जैसे नेहरू की काली अचकन पर  लाल गुलाब सा उषा का सूर्य और गाँधी के मौनव्रत सी शांत सुबह ! वे दोनों चले गये, उसने घर संभाला और भगवद् गीता का एक अध्याय पढ़ा, कुछ देर ध्यान किया और अब लिखने बैठी है. ध्यान करने बैठी थी तो मन में उपन्यास के पात्र घूमने लगे, कभी भोजन में क्या बनाना है आदि पर इस समय मन एकदम खाली है. जून शाम को दिल्ली पहुंचकर फोन करेंगे. नन्हा खेलने गया है, उसे गणित पढ़ाते समय बहुत अच्छा लगा, जल्दी समझ जाता है, उसने मन ही मन अपने अध्यापकों को धन्यवाद किया जिन्होंने उसे पढ़ाया था. अरुंधती राय की वह किताब आज समाप्त हो गयी, उसकी भाषा कितनी अलग है, आज वह उसे लाइब्रेरी में जाकर वापस कर देगी ताकि कोई और पढ़ सके. जून जाते-जाते भी उनके लिए सब्जियां और काजू देकर गये, कितना ध्यान है उन्हें परिवार का और कितना स्नेह !  





Monday, February 18, 2013

पिकनिक का भोज



जून का फोन आया है, वह नाहरकटिया जा रहे हैं, लंच पर देर से आएंगे. उसने बहुत दिनों बाद वह नीली साड़ी पहनी है, जो छोटी चाची ने खरीदी थी, सुंदर है, लेकिन चाचीजी अब पहले जैसी नहीं रहीं, परेशानियों ने उन्हें तोडकर रख दिया है, वक्त से पहले बूढी हो चली हैं. कल लगभग एक वर्ष बाद वे अपनी पुराने घर के पड़ोस में गए, उड़िया पडोसिन के यहाँ, वहाँ एक और परिचिता मिलीं, दुबली-पतली सी, पूरी तरह से अपने छोटे छोटे दो बच्चों में व्यस्त..कल पिता का पत्र आया है, जमीन की रजिस्ट्री जून के नाम हो गयी है. और शायद इसी वर्ष के अंत तक उनका मकान बन भी जाये. थर्मोकोल पर पेंटिंग करने में उसे बहुत आनंद आ रहा है, इसके बाद कागज पर करेगी. लेकिन वह एक घंटे से ज्यादा नहीं कर पाती क्रोशिये का मेजपोश भी बनने वाला है फिर टैटिंग करेगी. कल रात स्वप्न में देखा, गणित पढ़ा रही है, वह भी उसका एक प्रिय काम है.

वह लॉन में झूले पर बैठ कर धूप में बाल सुखाते हुए लिख रही है, पीठ पर धूप का तेज ताप भीतर तक छू रहा है. डहेलिया का दूसरा फूल भी आधा खिल गया है. परसों इतवार को उन्हें पिकनिक पर जाना है, डेरॉक है जगह का नाम, पूरे ग्रुप के लिए “मटर-पनीर” उसे शाम को बना कर रखना है, क्योकि सुबह जल्दी निकलना है, शाम को उन्हें एक शादी में भी जाना है, पड़ोस के खाली घर में, लगता है वह विवाह घर बनता जा रहा है. The day of the feast पढ़ ली है, अब एक और अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना शुरू किया है, सारे काम करते हुए बीच-बीच में थोड़ी देर के लिए कोई किताब पढ़ने का समय निकाल लेना, चाहे तीन-चार पेज ही क्यों न हों, अच्छा लगता है, जैसे धूप में चलते-चलते कुछ पल के लिए कोई छांह में रुक जाये. कल रात नन्हा नींद में नीचे गिर गया और उसे पता भी नहीं चला, नीचे भी आराम से सो रह था, उसकी नींद बहुत पक्की है. उसके स्कूल में आजकल ज्यादा पढ़ाई नहीं हो रही, नहीं जायेगा कहकर फिर चला गया है, उसे अनुपस्थित होना पसंद नहीं है.

कल इतवार था और पिकनिक के कारण एक यादगार इतवार बन गया, वे सुबह साढ़े छ बजे निकले और शाम साढ़े पांच बजे लौटे. मौसम अच्छा है, अब चिप्स बनाने का समय आ गया है, अगले महीने आज ही के दिन होली है. कल रात स्वप्न में छोटी बहन को देखा, बहुत कमजोर और अस्वस्थ लग रही थी, उसकी फ्रेंड्स भी थीं, वह माँ को बुला रही रही थी. आज जून को दिल्ली फोन करके पता करने को कहा है, इसी महीने उसकी डिलीवरी डेट है, ईश्वर सब कुशल करेगा.

होली पर वे क्या-क्या बनाएंगे, इस बात पर उसने जून के साथ बात की, मतभेद स्वाभाविक ही था, कभी कभी इस तरह नोक-झोंक होनी ही चाहिए, एक-दूसरे के विचार पता चल जाते हैं. आज उसने आलू चिप्स बनाये हैं. छोटे भाई का पत्र आया है फोटोग्राफ्स भी, बहुत अच्छे आए हैं फोटोग्राफ. आजकल उसने अपने दिन को कई टुकड़ों में बाँट लिया है और हर एक टुकड़े का एक खास काम है, व्यस्तता के कारण कुछ और सोचने का समय ही नहीं मिलता, समय मिलते ही कोई किताब सामने आ जाती है. कविताओं से इतनी दूर चली गयी है कि..लगता है कविता खाली समय की उपज होती है. बहुत दिनों से टीवी पर कोई कवि सम्मेलन भी नहीं आया जिससे प्रेरणा मिले.  





Friday, November 23, 2012

अमृता प्रीतम का संसार



चार दिन बाद सोनू स्कूल गया, घर आकर कहने लगा ममा की याद आने पर रोने लगा था. जून चले गए हैं चप्पल देना भूल गयी वह, ड्राइवर से कहा तो है कि कोई गाड़ी जा रही हो तो चप्पल ले जाये. आज सुबह वह अपनी लेन के अंतिम घर में गयी, गृहणी नहा रही थीं, फिर दोपहर को वह आयीं, उनसे बात करके अच्छा लगा, उन्हें फूलों का भी शौक है. कल से उनकी बिटिया भी नन्हे के स्कूल जायेगी, शायद उसी रिक्शा से.

आज उसके सिर में उसी कारण से पीड़ा है, दवा ले या नहीं तय नहीं कर पा रही है. जून होते तो अब तक दे चुके होते. बाहर कभी कार का दरवाजा बंद होने की आवाज आती है तो लगता है कि वह हैं. सुबह उनका फोन आया था और शाम को एक गाड़ी आयी. जून ने एक कागज पर लिख कर भेजा था चप्पल के लिए...सोचा वह भी कुछ लिख दे पर जैसा कि उसके साथ होता है ठीक से लिख नहीं पायी, पर वह समझ गए होंगे. दोपहर को स्वप्न में दीदी-जीजा जी को देखा, उनका पत्र भी आया है.

आज उसने अमृता प्रीतम का एक उपन्यास पढा, ‘उनचास दिन’ करीम और संजय की मित्रता अनूठी है..इतनी कि जग में ऐसी मित्रता मुमकिन नहीं. और संजय से ज्यादा जीवंत करीम लगा. बुल्लेशाह की काफियाँ उसको जबानी याद हैं और कितना करीब है वह जिन्दगी के, उनकी सोच के. अमृता प्रीतम ने ऐसा पात्र गढ़ा तो वास्तव में तो वही कबीले तारीफ हैं. कितनी सुंदर बातें कह जाती हैं. वह एक महान लेखिका हैं और एक महान नारी. उनकी कहानियाँ उसने पहले भी पढ़ी हैं और आज भी पढ़ी, ‘करमांवाली’  दिल को छूती है. पर सिर्फ पढ़ना ही पढ़ना हुआ कोई काम नहीं हुआ घर का. नन्हे के कुछ कपड़े प्रेस करने हैं.

जून कल शाम को आए और आज दोपहर चले गए. पहले तो लगा जिनके साथ उन्हें जाना था, वह नहीं आएंगे, पर सवा घंटा इंतजार करने के बाद वे आए, गाजर का हलवा जो कि जून ने बनाया है, उन्हें खिलाया, तारीफ उसकी कर गए. वह बता नहीं पाई कि यह उसने नहीं बल्कि उसके ‘उन्होंने’ बनाया है..पता नहीं क्यों? उनके जाने के बाद कुछ देर नन्हे और उसने टीवी देखा फिर सो गए. शाम को नन्हा खेलने गया कुछ देर को. टीवी पर ‘गर्म हवा’ आ रही थी, जो बांधे रखती है शुरू से आखिर तक, नन्हा अपने खिलौनों में मग्न था, बीच बीच में देखता था. यह फिल्म भीतर तक छू जाती है, जैसे एक कविता हो पर्दे पर लिखी, अभिनय भी कमाल का है, वह दृश्य जहां नायिका विवाह से से पूर्व चूनरी माथे पर ओढ़ती है, और वह  दृश्य जहां आत्महत्या करती है. शायद जून ने भी देखी हो वहाँ, वैसे तो उन दोनों ने एक बार पहले साथ-साथ देखी है यह फिल्म किसी मित्र के यहाँ श्याम-श्वेत टीवी पर.

सुबह उठी तो पेट में हल्का दर्द था जो दोपहर तक बना रहा, हाजमोला ने आराम दिया, ईनो भी था पर उसे वह अच्छा नहीं लगा. नन्हे को भी सर्दी लग गयी है. कुछ देर पहले कहने लगा उसे भी पेट में दर्द है. सुरभि का पत्र आया है, उसे बधाई पत्र भेजेगी, उसकी शादी जो होने जा रही है. शाम तक सब ठीक हो गया वे घूमने गए, उसकी पंजाबी सखी ने दो कैसेट दिए, एक जगजीत सिंह और चित्र सिंह की गजलें तथा दूसरा पाकिस्तानी बेंजामिन सिस्टर्स का पंजाबी गानों का. दूसरा ज्यादा अच्छा लगेगा, गीतों के मुखड़े पढ़कर तो ऐसा ही लगता है.

जून शाम को आए थे और सुबह चले गए, फोन आया है कि पाइप स्टक हो गया है, पता नहीं कब तक चलेगी तलप में ड्रिलिंग. शाम को वे अपने दो मित्र परिवारों से मिलने गए, बहुत दिनों से जाना ड्यू था. अच्छा लगा पर एक जगह वह अपनी बात को जल्दी कहने के कारण ठीक से नहीं समझा पायी, वह ज्यादा उत्तेजित हो जाती है किसी अच्छी बात को कहने के लिए. पर बाद में सामान्य हो गयी. लेकिन घर आते समय फिर वह बात उसे याद आयी और खुद पर गुस्सा आया, और शायद अगले दो-तीन दिनों तक आता रहेगा...खैर इसी तरह ठीक हो जायेगी उसकी यह बुरी आदत.







Monday, September 10, 2012

रेल यात्रा



कल जून ने उसे ‘शांतला पट्ट महादेवी’ उपन्यास के चारों भाग लाकर दिए. कुछ वर्ष पूर्व इसका एक भाग उसने पढ़ा था, आगे पढ़ने की बहुत इच्छा मन में थी. कहीं मिला ही नहीं, और अब पढ़ने बैठती है तो किताब छोड़ने का मन ही नहीं होता. कल शाम वे काली बाड़ी गए. सोनू को बहुत अच्छा लगा बाद में बाजार गए फिर एक परिचित के यहाँ बहुत दिनों के बाद. उनके यहाँ जाकर अच्छा लगा, स्वच्छता नहीं थी न बैठक में न शयन कक्ष में पर किचन साफ था. आश्चर्य है किसी के यहाँ की सफाई पर टिप्पणी करने का उसका कभी इरादा नहीं हुआ, शायद वह दूसरे धर्म का है इसलिए..
आज फिर एक लम्बे अंतराल के बाद डायरी लेकर बैठी है, जून ने जो किताबें लाकर दी थीं, पढ़ती रही लगातार, चारों भाग समाप्त कर दिए. उन दिनों तो समय का भान ही नहीं था. बहुत अच्छा लगा ‘सी. नागराजन’ का यह उपन्यास. शांतला का चरित्र कितना महान था, कितना अद्भुत, सबसे अच्छी बात उसे यह लगी कि अपने मन की शांति खोना न खोना हमारे अपने वश में है. कल उन्हें जाना है, तिनसुकिया से ट्रेन पकडनी है, तैयारी अभी आधी ही हुई है. एक परिचित माँ-बेटी भी उनके साथ जाएँगी, उन्हे दिल्ली जाना है. पहली बार गर्मी के मौसम में वे घर जा रहे हैं. सुबह से ही वह व्यस्त है, अभी दोपहर के भोजन में एक घंटा शेष है, काम करते-करते उसे थोड़ी भूख महसूस हुई, सोचा बिस्किट ही खा ले तब तक. कुछ देर पूर्व बंगाली सखी से मिलकर आयी.

आज फिर एक सप्ताह बाद डायरी लिखने का सुयोग मिला है. जून उसे और नन्हे को छोडकर वापस चले गए हैं. उनके जाने के एक दिन पहले उसका व्यवहार उनके प्रति अच्छा नहीं कहा जा सकता पर वह मन से विवश थी. ऐसे वातावरण में उस स्थिति की कल्पना भी दुष्कर थी. पर यह तो स्पष्ट है कि जाते समय वह नाराज नहीं थे. आज वह गोहाटी में होंगे, पत्र लिखेंगे, वह भी लिख रही है. सोनू यहां खुश है. उसका मन भी स्थिर है. अच्छा लग रहा है यहाँ रहना.

जून आज सुबह दफ्तर गए होंगे वापस जाकर. पता नहीं उसने गोहाटी से भेजे पत्र में क्या लिखा है, उसे लिखा है या नहीं, पर वह उसकी तरह हृदयहीन नहीं है न ही उसकी तरह स्वार्थी है. स्वार्थवश ही तो उसने ऐसा व्यवहार किया था या प्रेमवश. शायद प्रेमवश ही. उससे अलग रहना कहीं गहरे चुभ रहा होगा न..तभी तो. प्यार कभी मरता नहीं, कभी कम नहीं होता, कुछ भी नहीं बदलता. नन्हे को अपने पापा की याद नहीं सताती, वह अपने दोस्तों में खुश है. काफी देर से बिजली नदारद है.



   


Wednesday, September 5, 2012

चन्द्रकान्ता -देवकीनंदन खत्री


कल वे चले गए, अभी तो ट्रेन में होंगे, कल शाम को जाकर पहुंचेंगे. कल से समय अच्छा ही बीत रहा है, शाम को उसकी सखी आ गयी थी, उसके पति भी दिल्ली गए हैं. सुबह वह उसके घर गयी और अभी वह फिर आयेगी. सुबह से लगातार होती वर्षा के कारण मौसम बहुत ठंडा हो गया है. जून कह कर गए हैं कि वह दोनों घरों पर पत्र लिख दे. नन्हा अभी सो रहा है, कितना शरारती है, मगर कितना प्यारा है, डांट खाकर भी उसके निकट आ कर सो जाता है. अभी कुछ देर पहले एक मराठी फिल्म देखी, अच्छी थी. आज इतवार है, टीवी देखने में ही समय गुजर जाता है, पढ़ाई कुछ विशेष नहीं हो पा रही है. जून कल दो किताबें लाए थे, हिंदी उपन्यास- चन्द्रकान्ता और गोरा. पढ़ना शुरू करेगी तो समाप्त किये बिना मन नहीं मानेगा. कितने दिन हो गए हिंदी की कोई पुस्तक पढ़े हुए. उसने सोचा यदि जून इंटरव्यू में सफल हो जाते हैं तो...भविष्य सुंदर दिखाई देता है, अपना घर अपना सब कुछ पांच-छह वर्षों में ही...नहीं तो जाने कितने बरस कम्पनी के मकान में कटेंगे बीस-तीस बरस, सोनू को भी तब अच्छे स्कूल में पढ़ा सकेंगे, स्वप्न कितने सुंदर होते हैं न, देखे सब्जी कहीं जल न जाये, उसे ध्यान आया..यह यथार्थ है.

कल दिन भर व्यस्त रही, शाम को उसकी दो सखियाँ आयीं थीं सबने एक साथ खाना खाया, उसे अच्छा लगा पता नहीं उन्हें कैसा लगा हो, दस बजे हैं, जून का इंटरव्यू होने ही वाला होगा. अभी चार-पांच दिन और लगेंगे उसको आने में, आज चौथा दिन है उसे गए. ‘गोरा’ उसने पूरी पढ़ ली, और किसी काम के लिये वक्त ही नहीं मिला. कल दिन भर वर्षा हुई, ओले भी गिरे, ऐसा लगा. आज आकाश बिल्कुल स्वच्छ है.

आज सुबह से उसमें सात्विक प्रवृत्ति का उदय हुआ है तभी तो सब कुछ भला-भला लग रहा है. दीदी को उस दिन पत्र में निराशा भरी बातें लिख दीं थीं, उसने सोचा एक पत्र और लिख दे. मौसम भी आज मन की तरह है साफ, स्वच्छ और शीतल. जून आज बनारस में होंगे. कल शाम उस भी खाना खाने के लिये बुलाया था, मगर सबके पहुँच जाने के बाद उसकी सखी ने बनाना आरम्भ किया, उसे बहुत भूख लग आयी थी, सफेद चने, पूरी और रोटी खाकर बहुत अच्छा लगा. कल रात उसने ‘चन्द्रकान्ता’ भी समाप्त कर दी, अब आज से अपनी पढ़ाई शुरू करेगी.



   










   








Tuesday, May 15, 2012

श्र्द्दावान लभते ज्ञानं


जून उसके लिये हिंदी अनुभाग से दस किताबें लाया है, ज्यादातर उपन्यास हैं, कुछ कहानियों की किताबें हैं. इन्हें पढ़ लेने पर वह और भी लाएगा. नूना बहुत खुश है इन्हें पाकर. कल शरत चन्द्र की  एक कहानी पढ़ी, शाम को विमल मित्र की डेढ़ कहानी, दूसरी पूरी नहीं पढ़ पायी, रात को जून ने कहा, उसे नींद आ रही है, बत्ती बुझा दो. उसे पता नहीं क्यों पढ़ने के नाम पर जोरों से नींद आने लगती है, पर बत्ती बंद होने के बाद आधे से एक घंटा वह जगता रहा था. सुबह उठकर जून के जाने के बाद उसने वह कहानी पढ़नी शुरू की, काम वाली महरी तब तक आयी नहीं थी, पढ़ते-पढ़ते कब उसकी भी आँख लग गयी उसे भी नहीं पता, एक बार उठने का ख्याल आया तो मन ने कहा अभी काम वाली आकर घंटी बजाएगी, पर उसे आना ही नहीं था, फिर उठ कर भोजन बनाया जून के आने में आधा घंटा शेष था. फिर स्नान किया और रोज का गीता पाठ किया, पढ़ा, “ईश्वर को केवल श्रद्धा से जाना जा सकता है, उसके विषय में तर्क करने से कुछ हाथ नहीं आयेगा, वह है, यह मानना होगा पूरे मन से. संशय ग्रस्त मन कभी रास्ता नहीं पा सकता, संशय से ऊपर रहकर अपने आप में व ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखकर वे कहीं अधिक सबल हो सकते हैं.      

Wednesday, February 1, 2012

क्लब में टेलीविजन


आज उनके विवाह को पूरे सात महीने हो गए. कहाँ इंतजार के इतने वर्ष...और अब कैसे बीत गए यह सात महीने. कितनी खट्टी-मीठी यादें हैं इन सात माहों की, खट्टी कम मीठी ज्यादा. आज उसका मन शांत है, कहीं कोई उद्वेग नहीं, जैसे शांत पानी पर धीमे-धीमे नाव अपने लक्ष्य की ओर बहे जा रही हो. न तूफान का डर, न राह भटकने का. जून का साथ आश्वासन भरा है, सुरक्षा भरा. फिर उसमें भी इतना तो साहस है कि भविष्य का चाहे वह सुंदर हो या असुंदर, सामना कर सके. इन महीनों में एकाध बार उसका विश्वास डगमगाया है वैसा होने पर उसे दुःख भी हुआ, अब वैसा न हो इसकी चेष्टा भी करेगी उसने सोचा. दोपहर को एक किताब पढ़ती रही, रमेश बक्षी का उपन्यास ‘बैसाखियों पर टिकी इमारत’ नायक पर क्रोध आया उसे बेहद क्रोध. किताब पढ़ना शुरू करने के बाद बाकी सब भूल जाती है, कई आवश्यक कार्य रह गए अब उसने सोचा है कि सारे काम खत्म करने के बाद ही पढ़ना शुरू करेगी.
आज इतवार है, शाम को क्लब में टीवी पर एक पंजाबी फिल्म दिखाई जायेगी, ‘उडीकां’. सुबह ‘स्टार ट्रेक’ देखने भी वह गए थे. कितने दिनों के बाद नूना ने क्लब में टीवी देखा, पर उसे लगा उसके स्तर में कोई फर्क नहीं आया है, कार्यक्रमों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. इतने दिनों से घर से आये पत्रों से व पत्र-पत्रिकाओं में टीवी कार्यक्रमों के बारे में पढ़कर उसके प्रति जो आकर्षण पैदा हुआ था, वह केवल एक अच्छी फिल्म देखने तक ही रह गया है. कल यानि शनिवार को एक डिनर पार्टी थी, नूना ने पहली बार जून को अपने सहकर्मियों और उच्च अधिकारी के साथ देखा. वह काफ़ी उत्साहित लग रहा था, पार्टी के आयोजन में भी उसका योगदान था. नूना को बहुत अच्छा लगा और उसने मन ही मन दुआ की, कि वह इसी तरह सभी का प्रिय पात्र बना रहे.