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Friday, August 11, 2017

नीमराना का किला


रात्रि के नौ बजने को हैं. आज का इतवार अच्छा रहा. सुबह ध्यान में मन टिका. सुबह-शाम दोनों वक्त टहलने गयी, हवा में हल्की सुवास थी और शीतलता, एक कान पर हेडफोन लगा था, पर दूसरा इर्द-गिर्द की आवाजें भी सुन रहा था. इन्सान चाहे तो एक साथ सभी इन्द्रियों से काम ले सकता है, भीतर सभी को जोड़ने वाला एक तत्व जो मौजूद है. जैसे कम्प्यूटर पर एक साथ कई विंडो खोल लेती है वह. एक असावधानी अवश्य हुई, नाश्ता बनाने का काम उसने नैनी पर छोड़ दिया, जिसने सब्जी का मसाला जला दिया था, भोजन स्वयं ही बनाना चाहिए, भोजन बनाने वाले की तरंगें भी उसमें चली जाती हैं. आज शिवानी को सुना, पता चला, प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाना चाहिए. दोपहर को संडे क्लास में चालीस से ऊपर बच्चे आये थे. जिन्हें वह और एक सखी सहज ही सिखा पाए. उसने देखा है जिस दिन वह गहन विश्रांति का अनुभव करती है बच्चे शांत रहते हैं. जून ने फोन पर बताया, उनकी कांफ्रेस एक पहाड़ी पर स्थित किले में हो रही है. बहुत सुंदर जगह है पर इधर-उधर जाने के लिए काफी चलना पड़ता है और चढ़ाई भी करनी पड़ती है. सब्जी बाड़ी थोड़े से श्रम से साफ-सुथरी हो गयी है. गुलमोहर के पेड़ के नीचे छोटी सी पहाड़ीनुमा क्यारी बनाई है, माली ने उसमें धनिया लगाया है गोलाई में ! बगीचे में शंख ओढ़े कुछ जीव छोटी-छोटी पौध खा लेते हैं, उन्हें उठवाकर बाहर फिंकवाना है. फूलों की क्यारियों में कितने ही पौधे पिछले वर्ष गिर गये बीजों से अपने आप निकल रहे हैं, साल भर वे चुपचाप पड़े रहे, हर मौसम को सहते हुए और अब समय आने पर तैयार हैं खिलने के लिए, जैसे उनके कर्म के बीज समय आने पर फल देने लगते हैं. इस बार फरवरी में बगीचा फूलों से भर जायेगा !

वर्ष के अंतिम माह का प्रथम दिवस ! आज सुबह बड़े भाई को फोन किया, जन्मदिन की शुभकामनायें दीं. वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे. सेवानिवृत्ति के बाद दूसरा काम ले लिया है उन्होंने, पहले की तरह ही व्यस्त रहने लगे हैं. अभी-अभी भाभीजी को फोन किया पर उन्होंने उठाया नहीं, शायद सोयी हों. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं. आज जून का प्रेजेंटेशन है, शाम को साढ़े पाँच बजे. अवश्य अच्छा होगा, दो दिन बाद वे आ जायेंगे और दिनचर्या पहले की सी हो जाएगी. आज तो नाश्ता साढ़े नौ बजे व दोपहर का भोजन दो बजे हुआ. शाम को वैसे ही देर होने वाली है, अन्नप्राशन भोज में जो जाना है. आज ब्लॉग पर दो पोस्ट डालीं. अब भी भीतर कुछ शब्द घुमड़ रहे हैं, कल से कितने-कितने अनुभव हो रहे हैं, उन्हें शब्दों में कह पाना कितना कठिन है, फिर भी प्रयास तो किया जा सकता है !  

‘विश्व विकलांग दिवस का आयोजन भी हो गया. कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. आज विश्राम है. कई हफ्तों बाद बाल्मीकि रामायण की पोस्ट भी प्रकाशित की. इस बार अभी तक क्लब की पत्रिका के लिए कुछ नहीं भेजा है, कल ही भेजेगी, कम से कम दो कविताएँ तो अवश्य. आज जून आ गये हैं, पर अभी तक घर नहीं आये, आते ही पहले हिंदी भाषा के पुरस्कार समारोह में चले गये, उनके विभाग को प्रथम पुरस्कार मिला है, उसके बाद दफ्तर. शाम ढलने को है, हवा में हल्की ठंडक है भाती हुई सी, झूले पर बैठकर लिखने की अपनी ही मस्ती है. झूला अपने आप ही झूल रहा है, कोई अदृश्य हाथ उसे झुला रहे हैं, जिसने उन्हें थामा हुआ है. वह परम अब भीतर-बाहर मूर्तिमान हो गया है, उसको पल भर के लिए भुलाना भी भारी पड़ता है, उसे भुलाने का अर्थ है स्वयं को भुलाना, यानि मूर्छा या प्रमाद, और प्रमाद ही तो मृत्यु है. जीवन अनमोल है, अनमोल हैं ये चंद श्वासें..और अनमोल है इनसे आती उस अनाम की सुवास !   



Wednesday, February 8, 2017

पहाड़ी पर घर


कल रात को एक और स्वप्न..मन न जाने कितने गड्ढे, कितने गहरे तल छिपाए है और अवचेतन मन न जाने कितना व्यर्थ भी अपने में समाये है. वासना और कामना, लोभ और अहंकार सभी के बीज भीतर हैं ही..यहाँ हर व्यक्ति अपने भीतर एक गहरा कुआँ समोए है और एक अनंत आकाश भी. वे जो अन्यों की तरफ ऊँगली उठाते हैं पहले अपने भीतर झाँक कर देखना चाहिए. एक मन जिसने जान लिया, सारे मन उसने जान लिए. यहाँ सभी एक ही कीचड़ से उपजे हैं और कमल बनने की सभी को छूट है. लोगों का आपस में मिलना अकारण नहीं है, न जाने कितने जन्मों में वे एक दूसरे के मान-अपमान का सुख-दुःख का कारण बने हैं. कितनी बार उन्होंने फूल भी उगाये हैं और कांटे भी. माँ की हालत बिगड़ती जा रही है, उनका मस्तिष्क अब साथ नहीं दे रहा है, पिताजी बहुत परेशान रहने लगे हैं.

पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. परसों सुबह एक सखी के यहाँ आयोजित धार्मिक उत्सव में भाग लेने वह मोरान गयी थी, शाम को लौटी, उसी दिन माँ बिस्तर से उठकर बाथरूम जाते समय चक्कर आने से गिर गयीं. उनके दाहिने कूल्हे में चोट लगी है. इस समय वह अस्पताल में हैं, जून और पापा भी उनके साथ हैं. बहुत दिनों बाद पूरे घर में वह अकेले ही है.

आज माँ का अस्पताल में दूसरा दिन है, न जाने कितने दिन, कितने हफ्ते या कितने महीने उन्हें अस्पताल में रहना होगा. जीवन की संध्या में यह दारुण दुःख उन्हें झेलना पड़ रहा है, कर्मों की ऐसी ही गति है. कल दिन भर उसका मन भी कुछ अस्त-व्यस्त सा रहा, कोई भी कार्य पूरे मन से नहीं कर पायी. आज सुबह से दिनचर्या नियमित हुई है. जून आज फील्ड गये हैं.

आज तीसरा दिन है. जून अभी कुछ देर में आने वाले हैं. अस्पताल में खाना ले जाना है. एक परिचिता  का फोन आया है, विश्व विकलांग दिवस पर उसे बच्चों के कार्यक्रम में भाग लेना है. दो दिन बाद बाल दिवस है, शायद वह न जा पाए. सभी को फोन पर माँ के बारे में बताया. जीवन क्या मात्र मृत्यु की प्रतीक्षा है ? प्रतीक्षा जो केवल एक व्यक्ति ही नहीं करता, करते हैं उसके अपने भी (?) जून के एक मित्र की माँ पिछले पांच-छह महीनों से बिस्तर पर हैं. अब माँ ने भी बिस्तर पकड़ लिया है अगले दो-तीन महीनों के लिए, डाक्टर ने कहा है इतना समय तो हड्डी को जुड़ने में लगेगा. नूना खुद भी धीरे-धीरे बढती हुई उम्र का अनुभव देह के तौर पर करने लगी है. मन के तौर पर तो कोई स्वयं को बूढ़ा कभी महसूस नहीं करता. कहना कठिन है उम्र घटती है या बढ़ती है.

‘संडे स्कूल’ व ‘मृणाल ज्योति’ के बच्चों के साथ बालदिवस मनाया, जून कापी और पेंसिलें ले आए थे. मिठाई और केक भी. एक ही स्थिति में लेटे-लेटे माँ की परेशानी थोड़ा बढ़ गयी है. पिताजी का उत्साह पूर्ववत है, वह ज्यादातर समय अस्पताल में ही रहने लगे हैं. उसे अभी ‘विवेक चूड़ामणि’ का काव्यानुवाद आगे लिखना है. नवम्बर आधा बीत गया है, अभी तक सभी क्यारियों में फूल नहीं लगा पायी है. आज शाम को सत्संग है. उस सखी का फोन आया जो यहाँ से चली गयी है. काफी देर तक बात करती रही. वहाँ का जीवन यहाँ से बिलकुल अलग है. उनका घर एक पहाड़ी पर है, चढाई करके घर तक आना पड़ता है. पांचवीं मंजिल पर घर है और अभी तक लिफ्ट चलनी शुरू नहीं हुई है सो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते साँस फूल जाती है. बालकनी से सुंदर सूर्योदय दीखता है, ऊपर ठंड भी रहती है. नैनी दोपहर को एक ही बार आती है. कुछ काम खुद भी करने होते हैं. माँ को अस्पताल गये आज पूरा एक सप्ताह हो गया. ऐसे ही देखते-देखते समय बीत जायेगा और वह घर आ जाएँगी.

जून देहली गये हैं, नन्हा भी वहाँ किसी काम से आया था उससे भी मिले. एक सखी का फोन आया, उसने कहा माँ को ठीक से खाना चाहिए, उसे पता नहीं है किस स्थिति में वह हैं. उस दिन उसने अस्तित्त्व से उन्हें दुःख से मुक्त करने के लिए प्रार्थना की थी, उसे अभी तक पूरा होना बाकी है लेकिन यह दिखाकर ईश्वर उसके मन में वैराग्य दृढ़ कर रहे हैं, ओशो कहते हैं, जीवन के अनुभव ही काफी हैं किसी को वैरागी बनाने के लिए. सुबह से कई संतों के वचन सुने, अच्छा लगता है सुनना पर मनन् भी करना चाहिए मात्र सुनना ही पर्याप्त नहीं है.

    

Tuesday, May 13, 2014

नंदन कानन के शेर


कल वे पिकनिक पर गये थे, यहाँ से थोड़ी ही दूर पहाड़ियों के उस पार नदी के किनारे, पहाड़ियों पर चाय बागान थे, उन्होंने उनके मध्य से होते हुए चढाई भी की और कुछ लोग नदी पार करके दूसरे किनारे पर भी गये. दिन भर वे बहुत खुश थे, शाम को एक मित्र परिवार कई दिनों बाद मिलने आया और रात्रि को उसने एक बहुत दीर्घ स्वप्न देखा, स्वप्न में ही उसका अर्थ जानने का प्रयत्न भी किया. वह शायद यही जता रहा था कि वह सबकी नजरों में बने रहना चाहती थी ! परसों उन्हें जाना है सो आज दो सखियों को फोन करके विदा ली. आज सुबह ससुराल से फोन आया, बड़ी ननद आ गयी है, छोटी की डेट आने वाली है. उस दिन वे ट्रेन में होंगे. असमिया सखी नये घर में जा रही है, उसने सोचा नये वर्ष में उसका नया घर देखने वे जरूर जायेंगे. शाम को लाइब्रेरी जाकर किताबें वापस करनी हैं, और यात्रा में साथ ले जाने के लिए कुछ पत्रिकाएँ भी लानी हैं.

आज की सुबह की शुरुआत बड़े अजीब ढंग से हुई, जून ने उसे रोज की तरह उठाया और उसने स्वभावतः कहा कि कल उन्हें जाना है तो सुबह और भी जल्दी उठना पड़ेगा और फिर यह भी कि नन्हे और जून को तो कल स्कूल व दफ्तर  नहीं जाना होगा सो सम्भवतः उतनी जल्दी भी नहीं होगी, पर जून के अनुसार उनकी छुट्टी कल से शुरू नहीं हो रही है, जिस दिन जाना हो दफ्तर जाकर यदि sign कर दिए और वापस आकर भी यदि sign कर दिये या फोन से इन्फॉर्म भी कर दिया तो ड्यूटी ज्वाइन कर ली ऐसा माना जाता है. सब ऐसा ही करते हैं. कैसा अजीब सिस्टम है यह, उसकी समझ से बाहर. वैसे ही ऑफिस के दिनों में लोग सीट से गायब रहते हैं और.. इसी बात पर उसने जून को कुछ कहना चाहा पर उनको यह बात इस कदर नागवार गुजरी कि नाराज हो गये, खैर थोड़ी देर बाद( उनके क्रोध से उसके सिर से नैतिकता का भूत उतर गया) सब शांत हो गया, इन्सान सिस्टम का शिकार होकर इतना तटस्थ हो जाता है कि उसे इस बात का अहसास तक नहीं होता कि जो वह कर रहा है गलत है. वह जो इतनी किताबें पढ़ती है, सच्चाई, ईमानदारी, नैतिकता, और मूल्यों की बात करती है, क्या वह केवल किताबों तक ही सीमित नहीं है, कदम-कदम पर लोग समझौते करते हैं, वे सुविधा उठाना चाहते हैं जिन पर उनका अधिकार नहीं है. यह मानसिक उथल-पुथल कहीं उसे अस्वस्थ न कर दे.

कोलकाता गेस्ट हाउस
It is their first morning away from. Yesterday at 10.45 they started from home to air port. Air Bus took one and half hour to reach Calcutta. Flight was good except one thing, their’s was last seat and two times they suffered foul smell but it was nothing compared to the smell they felt while coming from Calcutta airport to guest house in park street. They passed it in few minutes but people who live their day and night continuous breath in it, in that sense Calcutta is a stinking city. Here in park street their guest house is on sixth floor but traffic noise is as much as on first floor in any other city. She could not sleep due to noise and due to excitement of journey and their meeting with Punjabi didi’s family. She got three dress materials from a shop near by. Cloth is very good and of a different texture.

पुरी गेस्ट हाउस
आज सुबह उसकी नींद साढ़े तीन बजे ही खुल गयी, एक स्वप्न उसे सूर्योदय देखने जाने के लिए जगा रहा था, जून ने समय देखा और वे कुछ देर और सो गये. पांच बजे उठकर समुद्र तट पर गये, रास्ते में अँधेरा था, तट सुनसान था, पर सोडियम लाइट के कारण काफी उजाला था, जो दूर तक लगी हुई हैं. आकाश और पानी का रंग पहले श्याम था, फिर नीला हो गया और बाद में सुरमई, लाल होने की प्रतीक्षा करते रहे पर धुंध की वजह से सूर्य दिखाई नहीं दिया, सुबह की शुद्ध हवा में समुद्र की लहरों का उतर-चढ़ाव और दूर पानी में तिरती पाल वाली नावें बहुत अच्छी लग रही थीं. सवा छह बजे वे वापस आ गये, नहा-धो व नाश्ता करके भ्रमण के लिए निकले. कोणार्क मन्दिर, धौली, उदयगिरी की गुफाएं, नन्दन कानन और लिंग राज मन्दिर देखे. चन्द्रभागा तट पर नारियल पानी पिया. ‘पिपली’ से कुछ खरीदारी की, भुवनेश्वर से बुद्ध की एक मूर्ति खरीदी. पूरा दिन उड़ीसा की नई-पुरानी जगहों को देखने में निकल गया. नंदन कानन में सफेद बाघ व शेरों को देखना नन्हे के साथ उनके लिए भी एक सुखद अनुभव था, शेर खुले में घूमते-घूमते सड़क तक आ पहुंचे थे, और आराम फरमा रहे थे. जून ने कई तस्वीरें उतारीं. कल पुरी में उनका अंतिम दिन है. सुबह समुद्र तट पर नहाने का कार्यक्रम है, नन्हा इसके लिए तैयारी करके आया है.





Friday, January 24, 2014

इंदिरा गाँधी मुक्त विश्व विद्यालय


वर्षा की झड़ी जो कल दिन भर और शायद रात भर भी जारी थी, अभी भी जारी है, मौसम भीगा-भीगा सा ठंडा हो रहा है जैसे कोई पहाड़ी प्रदेश हो ऐसा उनका शहर लग रहा है. आज सुबह उसकी छात्रा संस्कृत टेस्ट के कारण नहीं आई, नन्हे का टेस्ट भी इस बार अस्वस्थता के कारण नहीं हो सका, अब वह ठीक है, कल रात देर तक पढ़ाई करता रहा, अपने आप पर निर्भर रहना उसने सीख लिया है. जून कल शाम नन्हे के लिए नाश्ता बनाते वक्त ऊँगली जला बैठे, परेशान हो गये थे, जब बाहर टहलते समय उन्होंने मन को भाएँ ऐसी बातें कीं तो उनका मूड बदल गया, हर इन्सान के भीतर एक बच्चा छिपा रहता है जो प्यार, दुलार और पुचकार तथा सुरक्षा चाहता है. आज सुबह तैयार होते वक्त उसे लगा कि जिन्दगी में कोई आकर्षण ही नहीं रह गया है, पर वह क्षणिक अनुभूति थी, जून और नन्हे के कारण जीना बहुत मोहक है.

‘We know and We know and We know but  world needs the clarity of our thoughts’. Each and every moment of life she needs some…noble thought, cute idea or virtue, a nice word or any good feeling or any new and special idea of any of the wonderful writers, poets and thinkers of this world. She lives in their ideas and drink the nectar of their words ! words always attract her and they do a wonderful job on her. She thinks no one else can do it for her. Sometimes others flatter her that makes  her happy bur at this moment she is ecstatic, means happy beyond the general sense of well being. She wants to help all those in need and want to sing with all the sweetness and depth of the heart.
….And then she forgot for sometime that freedom is not to misuse, one should follow some doe’s ant don'ts ! and she felt guilty about feeling guilty.

She read-
Surely the only thing that makes us healthy within is authenticity, living with truth. In the equanity of mind, the silent lake of consciousness reflects the majesty of our amazing intelligent universe.

आज भी मौसम खुशगवार है, पीटीवी पर टालस्टाय का लिखा एक ड्रामा देखा, किसी के जुर्म की सजा किसी को भुगतनी पडती है, एक परिवार की और खासतौर से उस व्यक्ति की दुःख भरी कहानी ! कल शाम उसने जून की मदद से हिंदी में सृजनात्मक लेखन के लिए इग्नू में एक कोर्स के लिए एक फार्म भरा. कल दोपहर से ही जून का मूड बहुत अच्छा था, शायद उस खबर का असर हो जो उन्होंने उसे नहीं बताई थी की उनके वे मित्र अब यहाँ से नहीं जा रहे हैं. वह वाकई बहुत खुश थे, उनके हाव-भाव और शब्दों से उसे लग रहा था. इस बार के बुलेटिन में उसका नाम फोन नम्बर के साथ आया है, दो फोन आ चुके हैं. कल लाइब्रेरी से एक नई किताब लायी, mind trap, जरूर अच्छी होगी. इस हफ्ते खतों के जवाब नहीं दे पायी है, एक खास तरह का आलस्य घेरता जा रहा है, जो कुछ कामों को टालता है और कुछ को करने की प्रेरणा देता है. और अब ग्यारह बजने वाले हैं, उसे फुल्के सेंकने हैं, दाल छौंकनी है, चावल बनाने हैं, सलाद काटना है, सब कुछ जून के आने से पहले पहले !