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Friday, July 29, 2016

सहज समाधि


शाम के सात बजे हैं, आजकल बादल जब देखो तब बरसने लगते हैं. इस समय भी सुबह से शायद दसवीं बार मूसलाधार वर्षा हो रही है. जून क्लब गये हैं, वहाँ stress managment पर कोई योग का कार्यक्रम है. उसकी बाईं आँख के निचले कोने पर हल्का सा दर्द हो रहा है, शायद कोई छोटा सा दाना निकला है. माँ बहुत कहने पर अब लेट गयी हैं, पहले दिन भर उन्हें लेटना पसंद था, अब घंटों बैठी रहती हैं. उनका व्यक्त्तित्व बिलकुल बदल गया है, लेकिन कई बातें पहले की तरह हैं पर हैं वे सारी की सारी नकारात्मक. अभी कुछ देर पूर्व सुना मुरारी बापू कह रहे थे, अहंकार, स्वार्थ और कपट गुरु कृपा से दूर रखते हैं. नूना कभी-कभी तेज स्वर में बोलने लगती है, यह अहंकार का ही रूप है. स्वार्थ थोड़ा भी नहीं है, ऐसा तो नहीं कह सकते, निज की मुक्ति की कामना तो है ही, कपट भी अक्सर झलक जाता है, अब चाहे भले के लिए ही बातों को वे जैसी हैं वैसी प्रकट न करके उन्हें मधुर करके सहज करके प्रस्तुत करती है, लेकिन उस छिपाव में किसी का अहित करने का भाव नहीं है और सबसे बड़ी बात कृपा का अनुभव हर क्षण होता है.

पिताजी लौट आए हैं. आज सुबह आकर उन्होंने स्टोर के खाली डिब्बों को भर दिया है. वे लाये हैं- आंवले का मुरब्बा, पेठे की केसरिया मिठाई, मावे का लड्डू, मूँगफली, चने, मिस्सा आटा, किशमिश, काजू, बादाम, हरे चने, ककड़ी, खजूर, बिस्किट, राजधानी ट्रेन में मिला सामान और भी एक वस्तु- अंजीर ! वह आठ दिनों के लिए बेटी के घर गये और उनका कितना काम करके आये हैं. सामने और पीछे के स्थान की सफाई, दोनों कूलर साफ करके इस्तेमाल के योग्य करवाए. ट्यूब लाइट साफ करवाई, घड़ा लाकर दिया और भी न जाने क्या-क्या. घर में एक जिम्मेदार बुजुर्ग के रहने से घर ठीकठाक चलता है, जहाँ पति-पत्नी दोनों काम पर जाने वाले हों वहाँ घर के कुछ काम छूट ही जाते हैं. कम्प्यूटर पर बैठकर कुछ लिखा नहीं आज. नेट पर नन्हे का साईट देखा, फेसबुक पर बड़े भांजे ने उसके जवाब दिया है उसके प्रश्न का. सारी सुबह पिताजी के लाये सामानों को व्यवस्थित करने में निकल गयी. दोपहर माली से बगीचे में काम करवाने में. अभी कुछ ही देर में जून आने वाले होंगे शाम का कार्यक्रम आरम्भ हो जायेगा, इसी तरह एक और दिन बीत जायेगा, इस जीवन का एक और दिन कम हो जायेगा. हजारों लोग इस समय यही बात सोच रहे होंगे, हजारों हँस रहे होंगे और न जाने कितने आत्मबोध को पा रहे होंगे..एक तरह से देखे तो सभी कुछ व्यर्थ है और दूसरी तरह से देखे तो सभी कुछ सार्थक है. यहाँ होना ही काफी नहीं है क्या ? हर कोई स्वयं को कुछ साबित करना चाहता है, हर कोई अपना विज्ञापन की रहा है, लेकिन अंततः तो वह तड़प आत्मा ही की है या कहें परमात्मा की..चेतना की..जो न जाने कितने-कितने रूपों में प्रकट होना चाह रही है, न जाने कितने चेहरे लगाकर एक ही सत्ता.
.सद्गुरु कहते हैं, साधक उनका काम करें और वे तो उनका काम कर ही रहे हैं. आज उसे एक सुनहरा मौका मिला है सद्गुरु का काम करने का. सुबह ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की एडवांस कोर्स टीचर से मिलने गयी, जो इटानगर से आयी हैं. दो दिन पहले ही गुरूजी ने उन्हें कहा कि यहाँ एडवांस कोर्स कराना है. उनकी कृपा यहाँ के लोगों पर कुछ विशेष ही बरस रही है. उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं या सही होगा कि सद्गुरु चाहते हैं कि उनके ‘सत्संग कक्ष’ में सहज समाधि कोर्स रखा जाये. उसने तत्क्षण ‘हाँ’ कह दी और अब कुछ लोग चाहियें जो कोर्स करें, उसने कई लोगों को फोन किये लगता है कुछ तो अवश्य ही राजी हो जायेंगे ! सद्गुरु की कृपा से अवश्य ही ‘सहज समाधि’ उनके घर में सम्पन्न होगा. कुछ वर्ष पूर्व वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी पर आज वह सम्भव है तो इसके पीछे परमात्मा की शक्ति ही काम कर रही है. उसकी कृपा कहें, प्रेम कहें या आनंद कहें, वह सब एक के ही नाम हैं. उनका सद्गुरु दुनिया में कहीं भी हो वह हर क्षण उनके साथ रहता है, रहा करता है, वह अनोखा है, अन्तर्यामी है और उस अनन्त गुणों को धारण करने वाले की नजर उन पर है, उसका हाथ उनके सिर पर है, उसकी दृष्टि उन पर पड़ी है, वह जीता-जगता परमेश्वर उन्हें अपनी झलक दिखाने खुद चलकर आया, प्यासा कुएं के पास जाता है पर यहाँ तो खुद कुआँ ही सामने खड़ा है, गंगा उनके द्वार आई है, सद्गुरु रूपी हीरा उन्हें सहज ही मिल गया है.

Thursday, February 4, 2016

नदी का पाट


फिर एक अन्तराल, इस बीच बहुत कुछ घटा. जून के दफ्तर में दो-तीन दिन काम ज्यादा रहा. आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर ने क्रिया करवाई. ड्राइंग-डाइनिंग में पेंट हुआ और आत्मा का ज्ञान दृढ़तर हुआ, उस पर जून की नाराजगी का असर पहले से कम हुआ, उन पर भी कम होना ही था, वह भी आत्मा के बारे में सुनने लगे हैं. दीदी दुबई से लौट आई हैं. उसे सभी की चिंता करने का मोह भी घटा है. सप्रयास कोई कार्य नहीं करना है. नियमित कर्त्तव्य तथा सहज प्राप्त कार्य व सेवा के कार्य बांधने वाले नहीं होते. उसे हर हाल में इसी जन्म में मुक्त होना है. परमात्मा की व सद्गुरु की उसपर विशेष कृपा है. उसे बुद्धि योग मिलाया है. भीतर की सूक्ष्मतम सच्चाईयों को समझने की बुद्धि प्रदान की है. अनवरत अनहद नाद की धुन गूंजती है, आत्मा का आनन्द फूट-फूट पड़ता है सो और नये कर्म बंधने का प्रयास व्यर्थ ही होगा. उसे संतोष का धन प्राप्त हुआ है. कितने जन्मों में उसने वही गलती दोहराई होगी पर इस जन्म में नहीं, सद्गुरु को देख-सुन कर तो जरा भी नहीं. वह कितने सहज हैं, मुक्त, आनन्द से भरे. उनके भीतर भी वही आत्मा है. सत्, चित् आनन्द वही परमात्मा है. आज ध्यान में उसकी उपस्थिति का अहसास हुआ. मन है ही नहीं, एक मौन है जो भीतर पसरा है, शांत नदी के चौड़े पाट की तरह जिसमें आकाश अपना चेहरा देखता है !

परमात्मा से प्रेम हो जाये तो यह जगत होते हुए भी नहीं दिखता. वह प्रेम इतना प्रबल होता है कि सब कुछ अपने आप साथ बहा ले जाता है, शेष रह जाता है निपट मौन, एक शून्य, एक खालीपन, लेकिन उस मौन में भी एक नये तरह का संगीत गूँजता है, वह खालीपन भी भरा हुआ है कुछ खास ही तत्व से. अभी कुछ देर पहले फोन की घंटी बजी, वह उठा नहीं पायी, पता चल गया लेडीज क्लब की किस सदस्या का था, वह अवश्य उस लेख के बारे में बात करना चाह रही होगी जो उन्हें क्लब के लिए लिखना है. कल उसे डेंटिस्ट के पास जाना था. एक दांत में rct कराने. कोई भय नहीं था. मन शांत था. डाक्टर ने दांत में दवा भरकर छोड़ दिया है, लगातार दवा की गंध मुंह में आ रही है. किन्तु उसने स्वयं को देह मानना छोड़ दिया है सो वह गंध परेशान नहीं कर रही. वह अपना सभी कार्य सामान्य रूप से ही कर पा रही है. बैंगलोर में एक सखी का आपरेशन होना था, हो गया है, शायद इतवार को वह लौट आये. दीदी से पता चला, छोटी भांजी आई है, उससे बात करनी है. कल शिवरात्रि है, उनके यहाँ सत्संग है. आज भी वर्षा हो रही है, मार्च का महीना यहाँ ऐसा ही होता है.
जैसे-जैसे कोई परमात्मा के निकट होता जाता है, वह सरल और सहज होता जाता है, तब छोटी और बड़ी बातों में कोई भेद नहीं रहता, सारे भेद मिट जाते हैं. वह पहले छोटी-छोटी बातों में उलझा रहता था, उनसे दूर हुआ और स्वयं को ऊपर उठाया फिर उन ऊपर की बातों से भी दूर हुआ और एक चक्र जैसे पूर्ण हुआ, अब कोई भेद नही रहा.


कल सत्संग में कम लोग आये, हलुए का प्रसाद बच गया. आज गुरूजी ने बताया, देह, मन, बुद्धि, प्राण, चित्त, अहंकार तथा आत्मा इन सातों स्तरों के बारे में जानना चाहिए. आत्मा के कारण ही इनका अस्तित्त्व है. एक अर्थ में सभी को आत्मा कहा जा सकता है, धीरे-धीरे उनसे ऊपर उठते जाना है, फिर आत्मा से भी परे स्थित परमात्मा को जानना है. 

Friday, November 6, 2015

रस्ता और मुसाफ़िर


वाणी का दोष पुनः हुआ, उसने नये माली की तारीफ़ की और पुराने माली की निंदा, अब निंदा का दोष जो लगा वह तो है ही, नया माली प्रशंसा सुनकर दो घंटे से पहले ही चला गया. इन्सान अपनी जिह्वा के कारण कितनी बार फंस जाता है. वाणी पर संयम रखना कितना कठिन है, एक बार वे बोलना शुरू करते हैं तो खत्म कहाँ करना है, यह भूल जाते हैं. आज शाम को सत्संग में जाना है, नॉलेज पॉइंट्स लेकर जाने हैं. सुबह सुना जिस तरह मिट्टी आग में तपकर प्याला बन जाती है और उपयोग में आती है वैसे ही उनका यह मिट्टी का तन जब ईश्वर की लगन रूपी लौ में तप जाता है तब यह उसके हाथों का उपकरण बन जाता है और काम में आता है. ईश्वर की लगन भी क्रमशः तीव्रतर होती जाती है, पहले राख में छिपे अंगारे की तरह जो ऊपर से दिखती भी नहीं, फिर तपते हुए लाल अंगारे की तरह, जो प्रकाश भी देता व ताप भी, फिर गैस के चूल्हे की नीली लपट की तरह और फिर माइक्रोवेव की तरह जो नजर भी नहीं आती, बस चुपचाप अपना काम कर देती है. सद्गुरु ने कहा कि ज्ञान पा लिया है यह अहंकार भी छोड़ना होगा पर नहीं मिला है सदा यह संदेह भी नहीं रखना है. मध्यम मार्ग पर चलना श्रेष्ठ है. आत्मा का परमात्मा से नित्य का संबंध है. उन्हें बनाना नहीं है, वे स्वयं आत्मा हैं यह बात जितनी दृढ़  हो जाएगी तो उतना ही वे परमात्मा से अभिन्नता अनुभव कर सकेंगे, और तब शेष ही क्या रहा ?

आज गुरूजी ने कहा शब्दों से वे लाख चाहें, अपनी बात समझा नहीं सकते जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. वे अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से अपने विरोधी को प्रभावित कर सकते हैं किसी हद तक. आज भगवद्गीता पर उनके प्रवचन का प्रथम भाग सुना, कल दूसरा सुनेगी, भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़े, सुने तृप्ति नहीं मिलती, वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता फिर उसे सामने बिठाकर पूजता है पर दो के मध्य की दूरी भी उससे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है, केवल एक ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है. और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

मैं हूँ मंजिल, सफर भी मैं हूँ, मैं ही मुसाफिर हूँ...

आज सद्गुरु ने कितना सुंदर गीत गाया. मन व् बुद्धि भी उसी आत्मा से निकले हैं, यानि वही हैं जिन्हें आत्मा तक पहुंचना है ..मन रूपी यात्री विचार रूपी रस्ते को पार करके घर पहुँचता है. कितना सरल और सहज है अध्यात्म का रास्ता..न जाने कितना पेचीदा बना दिया है इसे लोगों ने. सीधी- सच्ची बात है जब मन स्वार्थ साधना चाहता है तो आत्मा से दूर निकल जाता है जब यह अपनी नहीं सबकी ख़ुशी चाहता है तो यह आत्मा में टिक जाता है. यह जान जाता है कि जगत एक दर्पण है जो यहाँ किया जाता है वही प्रतिबिम्बित होकर वापस आता है, तो यह खुशियाँ देना आरम्भ करता है. अहंकार को पोषने से सिवाय दुःख के कुछ हाथ नहीं आता, क्योंकि अहंकार उसे सृष्टि से पृथक करता है, जबकि वे सभी सृष्टि के अंग हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं. स्वतंत्र सत्ता का भ्रम पलने के कारण ही वे सुखी-दुखी होते हैं. वे ससीम मन नहीं असीम आत्मा हैं !



Thursday, November 5, 2015

कमल कुण्ड की शोभा



जितनी कोई उठा सके उतनी जिम्मेदारी उसे उठानी ही चाहिए, आज सद्गुरु ने कहा, जैसे-जैसे कोई किसी काम को करने का बीड़ा उठाता है वैसे-वैसे उसे करने की शक्ति भरती जाती है ! उसे लगा, वे स्वयं ही अपनी शक्ति पर संदेह करते हैं और फिर आत्मग्लानि से भर जाते हैं. उन्होंने यह भी कहा, सारे गुण भीतर हैं, यह मानकर चलना है. अवगुण तो एक आवरण की तरह ऊपर-ऊपर ही हैं. यदि वे शरण में जाते हैं तो ईश्वर की पवित्रता उनके दोषों को दूर करने में सहायक होती है, वह पावन है और उसकी निकटता में वे भी पावन हो जाते हैं. उनकी वह शक्ति तथा सामर्थ्य जो ईश्वर की कृपा से मिलती है, उनमें अभिमान नहीं जगने देती बल्कि नम्रता ही सिखाती है. वे विनम्र होकर अपनी शक्ति को उसी की सृष्टि में लगाना चाहते हैं क्योंकि वे स्वयं तो तृप्त हो जाते हैं. जो एक बार सच्चे हृदय से शरण में गया, वह तृप्त ही है ! आज वह जून के विभाग के मुख्य अधिकारी के घर गयी उनकी पत्नी से मिलने, बहू व पोते से भी मिलन हो गया जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आए हैं, उसने उनकी कुछ तस्वीरें उतारीं. वापसी में पड़ोसिन के यहाँ गयी उनके छोटे से सुंदर तालाब में पांच कमल खिले हैं. कल बंगाली सखी के बेटे को संस्कृत पढ़ाई बहुत दिनों बाद, खुद भी पढ़ना होगा पहले, उसे हिंदी पढ़ने का भी कुछ कारगर तरीका सोचना होगा. आज दोपहर कार्ड्स बनाने का कार्य समाप्त कर  देना है, यदि कोई सहायक न भी मिले तो अकेले ही. मौसम आज अच्छा है, रात भर वर्षा हुई, ठंडी हवा बह रही है. सासुमाँ सो रही हैं, आज लंच में सब्जी उन्होंने बना दी है.

मन खाली है इस क्षण, कोई वस्तु नहीं मांगता, कुछ नहीं चाहता, यह जैसे है ही नहीं. सुबह मसालदान गिर गया पर भीतर एक कतरा भी नहीं हिला, कुछ हो तभी न हिले. कुछ भी नहीं है मन की गहराइयों में. सब कुछ ठोस है वहाँ, कोई हलचल नहीं. वहाँ से केवल एक पुकार आती है कि कैसे इस जगत को कुछ दे दें, देने की बात ही अब प्रमुख है. प्रभु भी तो हर पल दे ही रहा है, अपना प्रेम, करुणा और कृपा..सद्गुरु भी यही कर रहे हैं..वे उनके जैसे बनने का प्रयत्न तो कर ही सकते हैं ! वे दें और बस ! एक क्षण भी वहाँ रुके नहीं उस लेने वाले का आभार देखने के लिए, बल्कि वे उसके आभारी हों कि वह वहाँ है ताकि उनके भीतर प्रेम जगे.. न जाने कितने जन्मों से वे लेते आये हैं..अब और नहीं !

पिछले चार दिन फिर डायरी नहीं खोली, शनि, इतवार को तो सुबह काफी व्यस्तता होती है, पर कल व परसों अपने कामों में इस माया ने उलझा कर रखा. आज गुरूजी ने कहा, जो कुछ भी वे व्यवहार जगत में देखते हैं वह सब अविद्या है, इसी को नीरूमा कहती हैं कि सभी रिलेटिव में है, रियल नहीं है. विद्या तो आत्मा में ही है. गोयनका जी ने कहा, श्वास का सहारा लेने से वे भीतर शरीर व मन दोनों को जान पाते हैं, तथा दोनों को बदल सकते हैं. श्वास दोनों के बीच की कड़ी है. वह अपने भीतर देखती है तो सर्वप्रथम वाणी का दोष दीखता है. चाहकर भी इसे दूर नहीं कर पाती, शायद यह चाह्ना पूर्ण नहीं है और यह एक साधक की भाषा नहीं है, साधक को अपने पर संदेह नहीं होता, न गुरू पर न आत्मा पर. आज से दृढ़ निश्चय करना है आज से, नहीं इसी क्षण से ही यह निश्चय करना है कि जो भी शब्द मुख से निकलेगा वह सारगर्भित होगा, मधुर होगा तथा स्पष्ट होगा. आज दोपहर को हिंदी कक्षा भी है, उसके लिए भी पूर्ण तैयार रहना होगा, भाषा शुद्ध व स्पष्ट हो. उसका हर कार्य ऐसा हो जिसमें आत्मा की झलक मिले. वह आत्मा है, पूर्ण शांति, पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण ज्ञान की अनंत राशि ! उसे इस जगत से कुछ भी प्राप्य नहीं है, बस देना है स्वयं को. लुटाना है, भीतर से खाली होना है !  


Friday, October 23, 2015

जादू की छड़ी


सद्गुरु कहते हैं, शरीर नौका है, जीव नाविक है, संसार एक सागर है. शरीर को ज्यादा सुख-सुविधा देना उसमें छेद करना है. जीवन यदि छेद युक्त हुआ तो दुःख आने ही वाले हैं, साधना छोटे-मोटे छिद्रों को दूर करती है. स्वाध्याय, सेवा, साधना, सत्संग – ये चारों अगर साधक के जीवन में हों तो सहनशीलता बढती है, समता आती है, सहजता, सरलता आने लगती है. इस जगत में सभी कर्मों के अधीन हैं, उन्हें जो भी मिलता है वह कर्मों के कारण है. कर्मों से छूटना ही साधक का लक्ष्य है. आत्मा में स्थित होकर किया गया कर्म बांधता नहीं. आत्मा पूर्ण है उसे कुछ करने को शेष नहीं है, वह जिस देह में है उसे रखने के लिए जो कुछ आवश्यक है वह तब अपने आप होने लगता है, जब आत्मा स्वयं को जान लेती है. जब तक देह है उससे कर्म भी होंगे, वे कर्म लोकहित में हों, सहज हों, मन, बुद्धि में कोई दोष नहीं आये, इतना ध्यान रखना है. अपने अगले जन्म की तैयारी भी साधक को इस जन्म में करनी है. प्रारब्ध कर्मों का फल अवश्य मिलता है पर क्योंकि साधक कर्त्ता भाव में नहीं रहता वह भोक्ता भी नहीं होता, कर्म उस पर बिना असर डाले समाप्त हो जाते हैं, बाहर चाहे जैसी परिस्थिति हो, भीतर आनन्द ही रहता है.

इस जगत में लोग कितने दुखी हैं. उस दिन छोटी बहन से फोन पर बात हुई, वह कुछ परेशान थी. इधर एक परिचित आंटी अपनी बहू से खुश नहीं हैं. कल जिनसे मिली वे अंकल-आंटी अपने रोगों से व बुढ़ापे से परेशान हैं. इस संसार में हर कोई किसी न किसी बात को लेकर चिंतित है. काश उसके पास कोई जादू की छड़ी होती तो सबके दुःख दूर कर देती, सबके लिए भीतर प्रेम उमड़ता है और ढेर सारी शुभकामनायें ! सभी के भीतर तो वही आत्मा है, सभी प्रभु के हैं, यह सारा जगत उसका रचा खेल है, इसमें कोई भी दोषी नहीं है, उसने जैसा रचा वैसा ही तो खेल चल रहा है. सद्गुरु के भीतर भी ऐसा ही हुआ होगा, इससे कई गुना ज्यादा प्रेम जो बचपन से ही उन्होंने ज्ञान, प्रेम व आनन्द बांटने का प्रण कर लिया था. वह छोटी बहन को पत्र लिख सकती है शेष सभी को अपनी बातों से कुछ दे सकती है. आज सुबह ध्यान नहीं कर पायी, कारण था मनोराज..न जाने कहा-कहाँ के विचार आ रहे थे. तमस बढ़ गया है. सद्गुरु कहते हैं ज्ञान से, ध्यान से या प्राणायाम से तमस दूर होता है. तमस शरीर में होता है, रजस मन में तथा सत आत्मा का गुण है. परमात्मा की कृपा उस पर है तभी तो साधना के लिए उत्तम संयोग अपने आप प्राप्त हो गये हैं. अब यही तो एकमात्र इच्छा रह गयी है कि ईश्वर के लिए ही उसकी हर श्वास हो, हर कार्य उसकी पूजा हो, हर कदम उसकी प्रदक्षिणा हो, वह उसके लिए ही गाए, उसके लिए ही सब कुछ करे. उसे कुछ भी नहीं चाहिए, वह तो पूर्ण है..पर उसे प्रेम तो अवश्य ही चाहिए और उसके सारे कृत्यों के पीछे तो वही है !

जब कोई अपनी भावनाओं को कोमल और मृदु बना लेता है तो वह सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द ले सकता है. हरेक के पास आत्मबल का अकूत खजाना है, आत्मा से सम्पन्न हुई बुद्धि है, और मन है जिसमें प्रभु का वास है. धैर्य रूपी रत्न और शौर्य रूपी गहने से सुसज्जित हृदय है तो यह जगत उनके व्यवहार से और सुंदर बन सकता है. जब अपने भीतर ‘उसका’ दर्शन किसी को होता है तो सबके भीतर भी वही दिखाई देता है, सारी सृष्टि उसी का रूप नजर आती है. उसकी दृष्टि में कोई भेद नहीं रहता, हानि-लाभ की बात तब रहती ही नहीं, सर्वोच्च लाभ तब वह पहले ही पा चुका होता है.  



Tuesday, October 6, 2015

नारद भक्ति सूत्र


नये वर्ष की दिनचर्या – सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, हल्का व्यायाम, क्रिया, नाश्ता बनाना, स्नान(नेति, धौती), योगासन, प्राणायाम, पाठ, नाश्ता, ध्यान, भोजन बनाना व खाना, संगीत, डायरी लेखन, पढ़ाना, पत्र लेखन, रात्रि भोजन बनाना, टिफिन, टहलना, अख़बार आदि पढ़ना, बागवानी, संध्या, रात्रि भोजन, स्वाध्याय, शयन. पूरे दिन भर में छब्बीस कार्य हैं जो उसे करने हैं. इसी में समय निकाल कर कविता लिखना तथा पहले की कविताओं को टाइप करना भी होगा तथा लोगों से मिलना-जुलना भी होगा, इसमें से कई कार्य जून के साथ ही होंगे और कुछ एकांत में, जीवन को अब एक दिशा मिल गयी है. सद्गुरु हर कदम पर उसके साथ हैं. आज सुबह टीवी पर उनके मुख से ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर प्रवचन सुना, नेत्रों में जल भर आया. वह हृदय को छू लेने वाले वचन कहते हैं. वह जो कहते हैं उसे अपने भीतर घटता हुआ दीखता है. जैसा-जैसा वह कहते हैं वैसा ही अनुभव में आता है, पर उनके इस भीतरी अनुभव का लाभ जगत को मिले इसके लिए कार्य भी करना होगा. केवल भक्ति में डूबे रहकर बैठे रहने से तो काम नहीं होगा, अपना कर्त्तव्य निभाते हुए जितना सहजता से हो सके, अपने को जगत को देते जाना होगा..वैसे भी ऊपर जितने कार्य उसने लिखे हैं वह सभी उस भीतर वाले परमात्मा को ही समर्पित हैं. जब स्वयं वह है ही नहीं तो उसके कृत्य कैसे ? ये तो स्वयं को व्यस्त कहने का एक साधन है. वही तो है, उसी के लिए सब कुछ है. उसकी हर श्वास उसी के लिए ही है, उसी की है.

जीवन में यदि योग हो, ईश्वर की लगन हो सदगुरू का अनुग्रह हो और मन में समता हो तो परमात्मा को प्रकट होने में देर नहीं लगती, वह तत्क्षण प्रकट हो जाता है. प्रभु का स्मरण यदि अपने आप होता हो, मन उसके बिना स्वयं को असहाय महसूस करता हो जब वैराग्य सहज हो जाये और जगत में कोई भी आकर्षण न रहे तो पात्रता के अनुसार परमात्मा भीतर प्रकट हो जाता है. जो विराट है, इतने बड़े ब्रह्मांड का मालिक है, वह एक व्यक्ति के छोटे से उर में प्रकट हो जाता है. भक्ति विराट को लघु, असीम को ससीम बनाने में सक्षम है. ऐसी भक्ति ही मानव जीवन का ध्येय है, साध्य है. शरीर, मन, बुद्धि की सार्थकता इसी में है कि इस तन में चैतन्य प्रकटे, मन प्रभु में लीन  हो तथा बुद्धि उसके सम्मुख नतमस्तक हो. उसके सामने बुद्धि की कुछ नहीं चलती.


आज मौसम ठंडा है, धूप नहीं निकली है लेकिन उसके भीतर का मौसम सम है. नया वर्ष आने में मात्र चार दिन रह गये हैं. इस एक वर्ष में उसके भीतर आत्मा का ज्ञान परिपक्व हुआ है. द्रष्टा भाव में रहना सीखा है. क्रोध, मन, माया, लोभ, राग व द्वेष भीतर स्पष्ट दिखने लगे हैं. ईर्ष्या भी खूब दिखी. मन में कटुता का अनुभव होने पर लगता है कोई पापकर्म उदय हुआ है जो मन कि यह हालत हुई है. उन्हें देखते जाओ तो वे नष्ट होते जाते हैं. भीतर विचार प्रकट होते हैं और तत्क्षण लुप्त हो जाते हैं, वे जैसे कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं, किन्तु यदि कोई सजग न रहे तो वे बढ़ते ही चले जाते हैं. सजगता अध्यात्म की पहली और अंतिम सीढ़ी है, बिना सजग रहे कोई कहीं नहीं पहुंच सकता. सद्गुरु से पूछ तो कहेंगे कि कोई प्रेम को अपने मन में धारण करे तो सारे विकार अपने आप दूर हो जायेंगे. विकारों को दूर करने जायेंगे तो उन्हें सत्ता मिलेगी. जो वास्तव में हैं नहीं, होने का भ्रम पैदा करते हैं, वे विकार सत्य और शाश्वत प्रेम के सम्मुख कहाँ तक टिक पाएंगे. प्रेम जो उनका सहज स्वभाव है तभी तो थोडा सा विकार भी सहन नहीं होता. भीतर पल भर के लिए भी उद्वेग हो तो कैसा लगता है..प्रेम यदि सदा बना रहे तो कोई भी उलझन नहीं होती क्योंकि वह मूल है, स्वाभाविक है. दो दिनों बाद नया वर्ष आ रहा है. इस साल ने जाते-जाते एक मोह से मुक्ति दिलाई है. मोह जहाँ भी हो दुःख का कारण होता है. भविष्य में इस मोह के कारण न जाने कितनी बार दुःख उठाना पड़ता, सो अब मन मुक्त है. नये वर्ष का स्वागत मुक्त मन से ही करना चाहिए. सद्गुरु से प्रार्थना है कि उसके अंतर का सारा छोटापन सारी संकीर्णता वह ले लें. 

Tuesday, August 25, 2015

केलों का गुच्छा


आज गुरू माँ ने पुनर्जन्म की एक घटना कही, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि किसी की यात्रा एक जन्म में अधूरी रह जाये तो वह अगले जन्म में पूरी हो सकती है. इसमें सद्गुरु मदद करते हैं. अगले जन्म में गुरू उसे प्रेरित करते हैं. सुनते ही उसे लगा कि सद्गुरु ने ही प्रेरित किया है और वह उसके मार्ग का निर्देशन कर रहे हैं, तभी पहली बार जब गौहाटी में उनके दर्शन किये तो चित्रलिखित सी खड़ी रह गयी और आज तक वह असर कम नहीं हुआ है. कितने अभागे होते हैं वे लोग जो गुरू कृपा से अछूते रह जाते हैं, कुछ तो वहाँ पहुंच कर भी और कुछ पहुंच भी नहीं पाते. आज सुबह मौसम अच्छा था जो दिन चढ़ते-चढ़ते गर्म होता गया है. दोनों भांजे जो परसों सुबह यहाँ आये थे, पूरी तरह रच-बस गये हैं. उनका साथ अच्छा लग रहा है. माँ-पिता के बिना बच्चे कितने मुक्त हो जाते हैं. माँ-पिता चौबीस घंटे उनके पहरेदार बन कर रहते हैं तो वे ठीक से स्वयं को व्यक्त नहीं कर पाते. सासु माँ टीवी देख रही हैं, दोपहर के तीन बजे हैं. आज एक और केले के पेड़ पर लगे फल तोड़ कर पकने के लिए घर में रखे, विशाल गुच्छा है सौ से अधिक होंगे शायद डेढ़ सौ. छोटा भांजा कितना छोटा सा है पर कितना साहसी, पौधों को पार करता केले के झुरमुट तक गया और उसे उत्साहित करने लगा. वह इतना मासूम है. तभी सद्गुरु कहते हैं बच्चों जैसे बनो. उसकी बातें दिल को छू लेती हैं. उसमें नन्हा कान्हा दिखाई देता है. सद्गुरु का ही यह प्रयास रहा होगा, तभी तो वह नन्हा बच्चा उसे प्रेम का पाठ सिखाने के लिए आया है.

आज उसने पुनः कठोर शब्दों का प्रयोग किया. सुबह नींद खुली उसके पहले एक स्वप्न देख रही थी. गुरू माँ को पुनः देखा, वह कितने अपनेपन से बात कर रही थीं. वह नाम लेकर बुलाती हैं, लोगों का जिक्र करती हैं. वह स्वप्न में किसी ग्रुप को निकट से निर्देशित कर रही थीं. आज सद्गुरु को भी सुना. वह थोड़े दूर से लगते हैं अपने होकर भी, वह खुदा की तरह हैं, वह तो स्वयं को भगवान कहते हैं, वह मिलकर भी नहीं मिलते और दूर होकर भी दूर नहीं होते. वह तो उसकी आत्मा हैं पर गुरू माँ उनकी सहायिका हैं, पथ प्रदर्शिका..उसके डायरी में उनका जिक्र ज्यादा हो रहा है, पता नहीं इसके पीछे क्या राज है. आज एक सखी की बेटी का रिजल्ट आया है, ९५% अंक हैं, दो विषयों में १००% हैं. उसने अपने माता-पिता को गौरव दिलाया है, वे भी उसको पूरा सहयोग देते आये हैं पढ़ाई में. आज शाम को वे उनके यहाँ जायेंगे. धूप बहुत तेज है, लॉन में पुनः झूला लगाने के लिए खंभे आज गाड़े गये हैं. नये कमरे का काम यूँ ही ठप पड़ा हुआ है. आजकल सुबह किचन में गुजर जाती है, दोपहर बच्चों के साथ तथा शाम को पुनः घूमना, नाश्ता और डिनर..पढ़ने का समय नहीं निकाल पाती. आज से प्रयास करेगी कि कुछ देर पढ़ सके. इस समय दोनों पेंटिंग कर रहे हैं. बच्चों के साथ ऊर्जा काफी व्यय होती है, वे तो ऊर्जा से भरपूर होते हैं, बड़ों को प्रयास करना पड़ता है. मन होता है कि..यह सोचते ही वह सजग हो गयी, जहाँ मन में कामना उठी कि शांति का हनन हुआ. जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारना होगा, हर क्षण अपने आप में अमूल्य है, हर क्षण पूर्ण है, जो इस क्षण में तृप्त नहीं हुआ, वह कभी नहीं होगा !


दोपहर के डेढ़ बजे हैं, आज भी धूप तेज है. उन्हें उठने में आज थोड़ी देर हो गयी. रात को स्वप्न तो नहीं देखे, देखे भी होंगे तो याद नहीं, नन्हे ने कहा कि उसने एक स्वप्न में स्वयं को जलते हुए देखा, आत्महत्या करते हुए स्वयं को देखना.. कितना अजीब सा स्वप्न था, इस समय वह फुफेरे भाई को कम्प्यूटर पर बेसिक पढ़ा रहा है. छोटा रंग भर रहा है. सासु माँ के साथ वह अभी भी घुलमिल नहीं पा रही है. अज सद्गुरु ने कहा सभी के साथ घुलमिल कर रहना चाहिए, तो उन्होंने सुना और कहा, ठीक हो तो कह रहे हैं. लगा जैसे उसे लक्ष्य करके कह रही हैं. उसे लगता है जो हर वक्त कुछ चाहता है, उससे लोग दूर भागते हैं. किसी से कुछ भी पाने की इच्छा न हो तो सब कुछ अपने आप झोली में आने लगता है. आज उन्होंने ‘ध्यान’ भी किया, धीरे-धीरे वह अपने आप पर निर्भर रहना सीख लेंगी. वे सभी उन्हें प्यार करते हैं, उनका भला ही चाहते हैं, शायद पिछले जन्म का कुछ प्रभाव हो जो..पर उसे प्रतिक्रमण करना होगा और सारे हिसाब समाप्त करने होंगे, नये हिसाब तो शुरू ही नहीं करने हैं. कल शाम वे उस छात्रा से मिलने गये मिठाई खाने. इस हफ्ते उसने बच्चों को पुनः बुलाया है, वे महीने में दो बार उन्हें सिखायेंगे. उस दिन भोजन माँ बना लेंगी. उसने स्थान के लिए बात की तो सम्बन्धित महिला फौरन तैयार हो गयीं. आर्ट ऑफ़ लिविंग का यह प्रोजेक्ट अब यहाँ चलता रहेगा. गुरूजी का आशीर्वाद उन्हें मिल रहा है, मिलता रहेगा. वह इसे नारायण सेवा कहते हैं. बच्चों के रूप में भी स्वयं ईश्वर ही तो है !  

Saturday, August 1, 2015

सत्तू की कढ़ी



आज वसंत पंचमी है. भीतर गीत गूँज रहा है. सद्गुरू के आने पर कैसे जीवन में बसंत छा जाता है, सुख-दुःख की शीतलता व गर्मी नहीं सताती, सद्विचारों के पुष्प खिल उठते हैं और प्रेम की मंद बयार बहने लगती है. साधक के भीतर सारा वर्ष बसंत ही बसंत छाया रहता है, कैसा अनोखा चमत्कार छिपा रहता है गुरू कृपा में..  पंछियों का कलरव जो बाहर गूँज रहा है वह भीतर भी गूँजने लगता है. मन ठहर जाता है, जैसे वसंत में दिन-रात बराबर होते हैं वैसे ही भीतर हानि-लाभ समान ही हो जाते हैं. आज ध्यान करने बैठी तो जब विधि को याद कर रही थी तो कोई भीतर से बोला, जब मैं तेरे सम्मुख हूँ तो तू विधि के माध्यम से मुझे खोजना क्यों चाहती है”, साध्य यदि सम्मुख हो और कोई साधन के पीछे पड़ा रहे तो मूर्खता ही कही जाएगी, तो ध्यान में जिस परमात्मा तक पहुंचना है, वह यदि आँख मूंदते ही सामने आये तो उसे परे हटाकर कोई विधि का पालन करने बैठ जाये फिर उसका पालन करते-करते तत्व तक पहुंचे तो उसे क्या कहा जायेगा ? परमात्म तत्व तो सहज प्राप्य है, वह तो हर जगह है, वह सर्वसमर्थ है, सर्वज्ञ है, तो उसे कोई जिस भाव से भजता है वह क्या इसे जानता नहीं, वह तो सब जानता है. भीतर जो चेतना है वह उसी का अंश है. सागर क्या जानता नहीं कि बूंद भी जल से ही बनी है. वह तो परम चेतन है, उसे महसूस करना ही काफी है. वह हमें अपने भीतर मिलता है, प्रकाश के रूप में और फिर मात्र बोध के रूप में, उसे पुकारें तो वह झट आता है क्योंकि वह उस पुकार उठने से पूर्व से ही जानता है. वह मन के भावों को जानता है, वह जन्मों का मीत है, वही तो है जो एक से अनेक होकर खेल रहा है !

आज उसे लग रहा है, भीतर एक विरोधाभास है. भावनाओं और कर्मों का मेल नहीं है. भावनाएं पवित्र हैं पर क्रियाएं अशुद्ध हैं. भीतर शांति है पर मन में हलचल है. जो कुछ भी ऊपर हो रहा है, वह उसे छू भी नही सकता. पर जो उसे नहीं छू सकता जरूरी तो नहीं कि वह किसी अन्य को भी न छुए. किसी को दुःख देकर तो उद्धार नहीं हो सकता. आज सुबह सद्गुरु को सुना, सीधे, सरल शब्दों में तथा सहज आनन्द के साथ वह सारे शब्दों के जवाब दे रहे थे. बच्चों जैसा सरल विश्वास और अपनापन, भोलापन और साथ ही अभूतपूर्व ज्ञान.. इन दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण है उनमें ! पिछले दो दिनों की तेज धूप के बाद आज धूप बादलों के पीछे छिप गयी है. नन्हे से कल बात हुई, वह बैंगलोर नहीं जा रहा है, पढ़ाई का बोझ ज्यादा है. इसी महीने परीक्षाएं भी हैं. आज उसने पहली बार बेसन की जगह सत्तू डालकर कढ़ी बनाई है, जून को अवश्य पसंद आएगी. कल सासूजी पड़ोस में ‘सरस्वती पूजा’ देखने गयीं, उनकी जान-पहचान यहाँ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है. उन्हें भी मौन का अभ्यास होता जा रहा है. वह अति आवश्यक होने पर ही शब्दों का प्रयोग करती है. उसके भीतर क्या चल रहा है ध्यान इसी तरफ रहता है. बाहर की तरफ ध्यान ज्यादा जाता नहीं. इसी को अन्तर्मुखता कहते हैं.


उसकी भाषा मधुर नहीं है, कितनी ही बार उसे इस बात का अनुभव हुआ है पर वह स्वयं को सुधारने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है. जैसे कोई गंदगी को देखे और बस देखता रहे, झाड़ू लाकर उसे साफ न करे. तब कैसे कमियां उसके भीतर से दूर होंगी और कैसे वह परमात्मा के ज्ञान की अधिकारिणी बनेगी, कैसे वह उस परम आनंद को प्राप्त करेगी जो संतों की धरोहर है. सद्गुरु पुकार- पुकार कर कहते हैं, ‘विनम्र बनो’ पर वह तो अपनी हेकड़ी में ही रहती है. सारी दुनिया का मालिक उसका अपना है इसका घमंड कम तो नहीं होगा, वह एक अख्खड़ मस्ती का अनुभव करती है, अपनी ही मस्ती व खुमारी में खोयी वह अपना ही अनिष्ट कर डालती है ! जीवन के इस नाटक में वह इतनी खो जाती है कि असलियत को ही भूल जाती है. आज जून को दिल्ली जाना है, दो दिनों के लिए.     

Wednesday, July 29, 2015

सत्यम..शिवम..सुन्दरम..


सद्गुरू से जुड़े रहना साधना में आगे बढ़ने के लिए प्रथम और अंतिम शर्त है. सद्गुरु दूर नहीं हैं, वह हृदय के बिल्कुल निकट हैं. हमारे स्वयं से भी निकट. उनसे मिलकर भी यदि जीवन में कुछ परिवर्तन नहीं हुआ तो व्यर्थ है वह जीवन. आज सुबह नींद देर से खुली, स्वप्न देखती रही कि आम खरीदे हैं पर उसमें रस नहीं है, एक छेद के जरिये सारा रस उसमें से पहले ही निचोड़ लिया गया है. अनार खरीदा है पर उसमें दाने नहीं हैं, ऊपर से छिलका सही-सलामत है. ऐसे ही तो वे ऐसे कार्य करते हैं जो ऊपर से भले दीखते हैं पर उनमें कोई सार नहीं होता. गुरू के साथ जुड़े रहो तो वह स्वप्नों में भटकने नहीं देता. उन्होंने कहा था कि स्वप्न से जैसे ही जगो तो उठकर बैठ जाओ, स्वस्थ हो जाओ, अपने आप में स्थित. आत्मा में स्थित. वहीं बोध मिलेगा, वहीं मुक्ति है, वही वास्तविकता है !

जैसा-जैसा शास्त्रों में लिखा है उसे वैसा-वैसा अनुभूत होता है. सत्य एक ही है वह जिसके भीतर प्रकट होगा, समान रूप से होगा. उसका मन आजकल कितना जीवंत रहता है. सदा तृप्ति और उछाह से भरा, पता नहीं भीतर क्या रिसता है और कौन उसका पान करता है, लेकिन एक निर्द्वंद्वता, निडरता तथा स्वतन्त्रता का अनुभव होता है, जैसे अब इस जहाँ में कुछ भी पाना नहीं है. आत्मा को क्या पाना है जो स्वयं ही सबका स्रोत है, जो नित्य है, अनंत है. आज दोपहर एक अंग्रेजी फिल्म देखी, जिसमें रोबोट मानवों पर हुकूमत करने लगते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि मानव अपना विनाश कर बैठेंगे, मानव ने जिन्हें बनाया वही मशीनें उस पर अधिकार करने लगी पर अंत में जीत मानव की हुई. मानव के भीतर दैवीय शक्ति है, प्रभु ने उसे बनाया है, वह भी अपने जैसा, ईश्वर का मित्र है वह.. यदि उसकी आज्ञा में रहे, पर अंततः जीत तो परमात्मा की ही होती है.

आज सुबह वह तीन घरों में गयी, एक के यहाँ किताब भेजी. दो ने मना कर दिया, एक ने लेकर कहा पैसे बाद में भिजवा देगी. एक और प्रति किसी परिचिता ने खरीदी, सेवा का यह यह काम करते हुए उसे बहुत ख़ुशी हो रही है, लोगों से बात करने का एक नया अनुभव. वह जो पहले लोगों से बात नहीं करती थी, मतलब की बात ही करती थी. अब अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर बात कर रही है. लोग तो सारे उसके अपने ही हैं. वे जो भी जवाब दें, उसे एक नया पाठ सीखने को मिल रहा है. इसी बहाने लोगों से उसकी जान-पहचान भी बढ़ रही है. मिलते-जुलते रहने से वक्त पर लोग काम आते हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के लिए काम करते समय मन में ऐसा भाव भी है कि कुछ भी नहीं कर रही. जो कुछ भी हो रहा है वह अपने आप ही हो रहा है, किसी बड़े कार्य का छोटा सा हिस्सा ! एक परिचिता के पास गयी तो उसने अपना पूरा जीवन दर्शन सुना दिया. वे सभी ही तो ज्ञानी हैं, सदा एक-दूसरे को ज्ञान देते हुए. जून परसों आयेंगे, उनसे फोन पर बात हुई. वे ये जानते हुए भी कि वस्तुओं की वस्तविकता क्या है, उन्हें महत्वपूर्ण बनाते रहते हैं, क्योंकि वस्तुएं उनके जीवन में बाह्य ही सही रंग भरती हैं. जून उसके लिए और वस्तुएं ला रहे हैं. वे सभी सौन्दर्य के पुजारी हैं. उनका इष्ट देवता उनका प्रिय कान्हा भी तो सौन्दर्य का देवता है. सत्यं, शिवं, सुन्दरं की परिकल्पना कितनी अद्वितीय है, जो सत्य है, वही शिव है, जो शिव है  वही सुंदर है..पर जो सुंदर है वह शिव भी होगा इसमें संदेह हो सकता है...क्योंकि हर चमकती हुई चीज सोना नहीं होती.. .भारतीय संस्कृति पर निर्मल वर्मा का एक विस्तृत निबन्ध पढ़ा पर पूरा डूब कर नहीं, क्योंकि साथ-साथ माली के काम का निरिक्षण भी कर रही थी.  सुबह उठने से पूर्व फिर स्वप्न देखे, जो उस समय वास्तविक ही लग रहे थे. एक छोटी लड़की जो स्वप्न में मृत हो जाती है फिर जीवित और फिर एक जलती हुई देह का स्वप्न देखती है ..कितना अजीब था यह स्वप्न पर तब बिलकुल स्वाभाविक लग रहा था, उनका जीवन भी तो एक स्वप्न की तरह ही है, पल में बीत जाने वाला !


जून आज आ रहे हैं, फ्लाइट एक घंटा लेट है. अभी एक सखी से बात की, उसकी सासूजी परसों बाथरूम में गिर पड़ीं. बुढ़ापे की कमजोरी तथा भारी शरीर, कहीं जाने की जल्दी के कारण..तथा स्नानघर में में लोहे की बाल्टी थी, उन्हें थोड़ी चोट भी लग गयी है. उसने सोचा शाम को वे उन्हें देखने जायेंगे, यदि आज नहीं तो कल अवश्य ही. 

Friday, July 24, 2015

विश्व विकलांग दिवस


आज एक परिचिता का फोन आया. तीन दिसम्बर को ‘विश्व विकलांग दिवस’ है, उसे कुछ स्लोगन लिखकर तख्तियां बनानी हैं. उस दिन नेहरू मैदान में कार्यक्रम है. उससे पूर्व एक बार ‘मृणाल ज्योति’ भी जाना है. आज सत्संग थोड़ी देर ही सुन पायी. सब बातों का सार तो यही है कि “वे किसी को पीड़ा न पहुंचाएं, दूसरों के काम आयें और अहंकार न करें. आत्मा का क्या मान-अपमान और शरीर तो जड़  है उसका क्या मान-अपमान ! ईश्वर से संयोग ही वास्तविक सुख है उससे वियोग ही वास्तविक दुःख है !”

आज सुबह ध्यान के बाद उसे लगा जैसे भीतर से कोई कह रहा है कि उसे कुछ वक्त पूरी तरह माँ के साथ बिताना चाहिए. वह ऊँचा सुनने लगी हैं, सो बातचीत चाहेन हो पर साथ तो रहे. यूँ तो सुबह की चाय, नाश्ता, दोनों वक्त भोजन था पाठ सुनाते वक्त साथ रहता है पर तब मुख्य कार्य को ही प्रमुखता दी जाती है, ऐसा समय जब दुनिया का कोई भी कार्य प्रमुख न हो, बस वे ही प्रमुख हों. लगता है उनका हृदय ऐसी तरंगें भेज रहा है तभी उसे ईश्वर ने ऐसी प्रेरणा दी है. भीतर की आवाज इतनी स्पष्ट रूप से कम ही सुनाई देती है. सुबह सद्गुरु को टीवी पर देखा व सुना. वह कह रहे थे, सेवा करो तो तुम मेरे निकट आ सकते हो. वह तो सेवा किये बिना भी स्वयं को उनके निकट ही मानती है. वह ईश्वर की नाईं सर्व व्यापक हैं. उनकी चेतना इतनी विशाल हो गयी है कि उसमें सब समा गया है. वह उस हवा की तरह हैं जो परमात्मा रूपी फूल की खुशबू उन तक लाती है. वह उन्हें परिष्कृत करते हैं. वह पत्थर को तराश कर हीरा बनाते हैं. वह पुकार सुनते हैं. आज तक जितने भी सद्गुरु संत हुए हैं, वे सभी परमात्म स्वरूप होकर सदा विद्यमान हैं. कल उसने सच्चे हृदय से नानक को याद किया तो ध्यान में फूलों और प्रकाश बिन्दुओं की अनुपम छवि उन्होंने दिखाई. उन्हें शरण भर लेनी है ! जैसे शक्कर को मिठास खोजनी नहीं पड़ती, वैसे ही शरण में गये हुए को सुख की खोज नहीं करनी है.  


पिछले दिनों दिनचर्या में कुछ ढील आ गयी थी, आज से पुनः व्यवस्थित करने का प्रयास है. योगासन भी रोज नहीं कर पा रही थी जो अति आवश्यक है. तन स्वस्थ होगा तो मन स्थिर होगा, ध्यान होगा तथा सेवा होगी. ‘साहित्य सेवा’ भी तो एक सेवा है. बच्चों को पढ़ाना भी सेवा है. कल शाम को पुस्तकालय से दो पुस्तकें लायी है. क्लब की पत्रिका के लिए एक लेख लिखना है, अध्यात्म उसके हृदय के निकट का विषय है, उसी पर लिखे तो अच्छा रहेगा. आजकल क्लब में गाने का अभ्यास चल रहा है. अगले हफ्ते मीटिंग है. उसे कविता पाठ भी करना है. उसके लिए कविताओं का चुनाव भी करना है. मौसम वर्षा के कारण ठंडा हो गया है, बगीचे में सब्जियों और फूलों की पौध लग गयी है. अब वर्षा होने से भी कोई परेशानी नहीं होगी. वैसे तो उसकी सारी परेशानयों को प्रभु ने एक साथ ही दूर कर दिया है. जब उसका कुछ रहा ही नहीं तो दुःख क्या ? अब उसके सिवाय अंतर में कोई दूसरा नहीं रहता ! आज जून ने लंच में गोभी पुलाव बनाने को कहा है.     

Tuesday, July 21, 2015

नीरू माँ की शिक्षा


आज ध्यान में कैसी खुमारी छा रही थी. नाश्ते में दलिया, पोहा और एक ‘बनाना’, लिया था, अन्न का भी एक नशा होता है. यह ध्यान था या नींद थी, कैसे कह सकते हैं. सद्गुरु कहते हैं ध्यान के बाद तो चेतनता का स्तर बढ़ जाना चाहिए. नींद के बाद भी एक ताजगी आती है पर मन उतना सचेत नहीं रहता. उसका मन पूर्ववत है, एक सा, एक शांत सरोवर की तरह. सर के ऊपरी भाग में एक अजीब सी सनसनाहट का अनुभव हो रहा है. कई बार होता है एक सिहरन या कहें स्पंदन महसूस होता है. कभी-कभी पूरे शरीर में ही अद्भुत रोमांच और कम्पन होता है ध्यान में. पता नहीं कितने रहस्य छुपे हैं चेतना में, जगत भी दीखता है. स्वप्न में भी तो चेतना कितने अद्भुत दृश्य गढ़ लेती है. कल स्वप्न में देखा फिर वह एक मुस्लिम मोहल्ले में फंस गयी है. वहाँ एक के बाद एक घर ही नजर आते हैं, न कोई सड़क न गली, घरों के दरवाजों से गुजरकर ही जाना पड़ता है यदि कहीं बाहर जाना हो. यह स्वप्न उसे अनेकों बार आ चुका है शायद किसी पूर्वजन्म की स्मृति है. गुरुमाँ कहती हैं जिस तरह जगने के बाद स्वप्न महत्वहीन हो जाता है वैसे ही संतजन इस जगत को स्वप्न मानकर कोई महत्व नहीं देते !

“घर में वृद्ध माता-पिता हों तो घर में ही तीर्थ होता है, उनकी सेवा करने से ही सारे तीर्थों का सेवन करने का पुण्य मिल जाता है.” स्वामी रामसुखदास जी का प्रवचन सुनकर हृदय पर कैसा मीठा आघात होता है, शहद की तरह मीठी उनकी वाणी और उससे भी मधुर ईश्वर के प्रेम में रची-बसी जैसे चाशनी में डूबी हो, ऐसी हँसी उसके अंतर को छू जाती है. उसने सद्गुरु को भी सुना. नन्हे बच्चों को कैसे संस्कार दें, इस पर चर्चा कर रहे थे. पहले लिंग, मूर्तिपूजा, मन्त्र जप, मन्दिर आदि के महत्व पर प्रकाश डाला. अद्भुत ज्ञान का भंडार है उनके पास और कैसी सहज, बालवत् निश्छलता. संतों के अलावा जगत में किसको जीने की कला आती है, उधर स्वामी रामदेव जी हैं जो उन्हें कितने भिन्न-भिन्न तरीकों से देह से ऊपर ले जाना चाहते हैं, वे अद्भुत क्रान्तिकारी संत हैं, उनकी वाणी भीतर जोश भरती है. गुरूमाँ तो साक्षात् सरस्वती हैं, कितना प्रेम है उनकी वाणी में, उनके हृदय में. नीरूमाँ की ज्ञान की विधि कैसी अनोखी होगी कि लोग अपनी फाइलें सुधारने लगते हैं. ये सारे संतजन उसे बहुत प्यारे हैं. सभी को उसने अनंत-अनंत नमन किये. सद्गुरु तो और भी निराले हैं, वह कहते हैं कुछ मान के चलो, कुछ जान के चलो. वे भावना पर बल देते हैं. वे भीतर के विश्वास को दृढ करना चाहते हैं वे ज्ञान को बोझिल नहीं बनाते. हर संत अपने आप में अनूठा होता है. सबके रास्ते भिन्न-भिन्न हैं मंजिल एक ही है, उसे भी एक ही मार्ग पर चलना है, सद्गुरु के मार्ग पर !  फिर उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, वही तो हैं जो भिन्न-भिन्न रूप धर कर ज्ञान फैला रहे हैं. एक ही सत्ता है जो चारों ओर फैली है, वही भीतर है वही बाहर है. वही उसे सत्य के मार्ग की ओर ले जाएगी ! उसने प्रार्थना की कि उसका हृदय किसी के प्रति राग-द्वेष से लिप्त न रहे.  


कल उसे हल्का जुकाम था, आज अपेक्षाकृत शरीर स्वस्थ है. सारे रोग प्रज्ञापराध के कारण ही होते हैं. पर इससे उसे कितना कुछ सीखने को मिला है. एक तो देह से अलग जानकर स्वयं को स्वस्थ जानने का अभ्यास. दूसरा नम्रता का पाठ, जो रोग पढ़ाता है. पिछले दिनों उसने अन्यों की बीमारी को देखकर उन्हें दोषदृष्टि से देखा. उससे मुक्त करने के लिए शायद यह रोग आया, ताकि वह स्वयं को सजग तथा अन्यों को असजग न समझे. प्रकृति उसे दोष रहित देखना चाहती है.

Monday, July 20, 2015

जीवन की पहेली


आज जन्माष्टमी है, परमात्मा तो अजन्मा है फिर भी वह जन्म लेता है, मानवों को ज्ञान देने के लिए. कृष्ण अर्जुन के बहाने सभी को अपनी शरण में जाने का उपदेश देते हैं, जहाँ प्रेम है, शांति है आनन्द है. तब वे उसके बनाये इस सुंदर संसार को और अच्छा बनाने में सहयोग कर सकेंगे, कम से कम उसे विकृत तो नहीं करेंगे. यह जीवन एक रहस्य है और वह उसे खोलना चाहती है. कृष्ण उसे आकर्षित करते हैं ताकि वह इस खेल में शामिल हो सके. भीतर ही इसकी चाबी मिलने वाली है, भीतर जाकर जब कुछ भी नहीं मिलता तो विरह सताता है जिससे भीतर का पाप-ताप तो जल ही जाता है. मन समता में रहना सीखता है.

‘सद्गुरु’ को प्रेम करने का अर्थ है जो उन्हें प्रिय है वह भी वही करे. उन्हें ‘सेवा’ प्रिय है सो उसे भी सेवा की भावना को प्रश्रय देना होगा. अभी भी भीतर क्रोध बाकी है, किसी की कही अनावश्यक या मूर्खतापूर्ण बात उसे झुंझला जाती है. उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी भाषा, उसे मीठा बोलना नहीं आता. सत्य को सत्य कहने से कोई झिझक नहीं है पर सभी तो उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं कि  बात को उसी रूप में लें जिस रूप में कही गयी है. सच्ची बात उन्हें चुभ भी सकती है फिर कर्म बंधन में तो उसे ही बंधना पड़ेगा. सभी को आत्मा जानकर ही दोष दृष्टि से मुक्त हुआ जा सकता है. जिसे अपनी वाणी का दोष नजर नहीं आता वह विचारों का दोष कैसे देख पायेगा ?

मुहब्बत की दुनिया में होशमंदों का क्या काम
जब भी आया है पैगाम आया है दीवानों के नाम  

अक्ल के भटकों को राह दिखाते हुए
जिन्दगी काटी हमने दीवाना कहलाते हुए


जीवन एक पहेली है जो कभी तो लगता है कि अब बस सुलझने ही वाली है फिर अचानक इतनी उलझ जाती है कि...और यह दीवाना मन ही इस का कारण है. मन की क्रिया विधि को समझे बिना साधना पूरी नहीं हो सकती. उस दिन उस पंडित ने कहा था आपका मंगल ठीक नहीं है. सोचा हुआ कार्य पूरा नहीं होता तो उसने जोरदार शब्दों में इस पर आपत्ति की थी. पर अब लगता है उसकी बात में सत्य था. कितनी ही बार उस सच का अनुभव कर चुकी है उसके बाद से, उसके पूर्व भी होता होगा पर सजगता नहीं थी सो इसकी तरफ कभी ध्यान ही नहीं गया. कल बाजार में दो नंग-धडंग बच्चों को देखकर सोचा कि इन्हें एक-एक जोड़ी कपड़े दिलाये पर कहाँ पूरी हुई यह इच्छा. सत्संग में जाने से पूर्व सोचा था कि आज सभी को इसका सही अर्थ बताना है, एक औपचारिकता ही बनता जा रहा है साप्ताहिक सत्संग, पर वहाँ जाकर कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं होती या कहे कि मन ही नहीं होता. मन स्वप्न बहुत देखता है पर पूरा करने की क्षमता नहीं है. एक सखी जो अस्वस्थ रहती है उसे बहुत कुछ कहने का मन है पर वह अपने ही विचारों के प्रति इतनी श्रद्धा रखती है कि उसके विपरीत जा कुछ कहने का साहस नहीं कर पाती. लगता है ऐसा होना सम्भवतः इसलिए भी जरूरी है कि उसके अहंकार का नाश हो, जो कर्त्ता है उसे तो जाना ही होगा. उसने स्वयं को सद्गुरु के आश्रय में रख दिया है अब जो कुछ भी होता है अथवा नहीं होता सब उन्ही का प्रसाद है.   

Friday, July 17, 2015

मुरारी बापू की कथा


ध्यान में अपने बारे में सच्चाई प्रकट होती है. चित्त ही काया बनता जाता है, जैसे ही चित्त पर कोई तरंग उठती है वैसे ही काया पर भी तरंगें उठती हैं. जब मन मन में समा जाता है, कोई विचार नहीं रहत, अनुभूति ही अनुभूति है तो विकारों कि शक्ति खत्म होती जाती है. ध्यान में ही यह सम्भव है. दोपहर के तीन बजने वाले हैं, उसके सिर में, नहीं इस शरीर के सिर में हल्का दर्द है. जून जब गये तो दवा ली थी, पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ. गुरूजी की बात याद आती है कृपा होने के बाद यदि तीर से सिर कटना हो वह मात्र टोपी ही उड़ा कर ले जाता है. वैसे ही उसे दो दिन से लग रहा था कि शरीर अस्वस्थ होगा पर सिर में हल्के दर्द के सिवा अभी तक तो सब ठीक है. दो सखियों को देखने गयी थी, उन्हें बुखार था, अब वे भी स्वस्थ हो रही हैं. कल पता चला छोटे भाई, छोटी भांजी तथा दीदी को भी बुखार हुआ है. शरीर कमजोर होता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है तभी रोग धर दबोचते हैं. जून के दाहिने वक्ष में जब से वह आये हैं दर्द रहता है जो यात्रा में शुरू हुआ था, सम्भवतः भारी सामान उठाने के कारण ही उन्हें यह दर्द हुआ है. ईश्वर की चर्चा तभी हो सकती है जब तन व मन दोनों पूरी तरह स्वस्थ हों. आज सद्गुरु को सुना, उन्होंने कहा, यदि ध्यान करने से पूर्व कोई चिंता मन में हो तो उसी विचार को तोड़ते-तोड़ते उसके मूल तक पहुँचना चाहिए. मन ध्यानस्थ होता जाता है. उसे आजकल ध्यानस्थ होने में जरा भी कठिनाई नहीं होती. कृपा उस पर बरस रही है.
उसकी लिखाई को देखकर लगता है कि मन भीतर ही भीतर अशांत था पिछले दिनों. कितने बड़े-बड़े व टेढ़े-मेढ़े अक्षर हैं एक कारण यह भी हो सकता है कि जल्दी में लिखा गया है. पहले की तरह सुबह आराम से बैठकर आजकल नहीं लिख पाती, कोई समय नियत नहीं रह गया है. जबकि होना यह चाहिए था कि समय के साथ-साथ लेख अच्छा होता जाये. आत्मा के स्तर पर जीने का अर्थ है पूर्ण मुक्त होना, सभी तरह के बन्धनों से मुक्त लेकिन मन मुक्त होने नहीं देता, बीच में आ जाता है. जिसकी सत्ता ही नहीं है वह इतना बलवान हो उठता है. ध्यान में भी मनोराज्य चलने लगता है यह कैसी मनोस्थिति है ? प्रारब्ध वश कोई पाप सिर उठा रहा है शायद. उसका यह क्षण एक न मालूम सी उदासी से भरा है. यह पीड़ा अनबूझ है जो कभी-कभी अपने आप ही आ जाती है फिर अपने आप ही चली भी जाती है. वह साक्षी की तरह इसे देखती है, साक्षी होकर जीना कितना कठिन है. साधना का पथ सरल है ऐसा तो सद्गुरु ने नहीं कहा था. सद्गुरु के लिए सभी कुछ कितना सहज है. उसे उन्हीं की शरण में जाना चाहिए. उनके निकट जाते ही परमात्मा की अनुभूति होती है. शांति और सुख के भंडार परमात्मा को याद करने से राहत मिलती है. जो है नहीं पर महसूस होती है वह माया है जो है पर नजर नहीं आता वह भगवान है !
अगस्त मास का प्रथम दिन ! सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठी. ‘क्रिया’ आदि की संगीत का अभ्यास और ध्यान भी. आज ध्यान में एक बार पूरा शरीर गर्म हो गया और अत्यंत तीव्रगति से कम्पन का अनुभव हुआ. देह ठोस नहीं है तरंगे ही तरंगे हैं इसका अनुभव इतना स्पष्ट रूप से कभी नहीं हुआ था. दो घंटे संत मुरारी बापू की कथा सुनी, जो वे नैरोबी में कह रहे हैं, अफ्रीका महाद्वीप में केन्या देश में गुजराती भारतीयों के लिए. कथा गुजराती में कह रहे थे पर समझ में आ रही थी. तुलसी की चौपाइयां तो वैसे भी अवधी में ही थीं. संतश्री कथा इतनी मधुरता से कहते हैं कि कितना भी सुनो मन नहीं भरता है. अद्भुत वक्ता हैं वे और अद्भुत कवि हैं तुलसी, पर सबसे अद्भुत है वह परमात्मा जो सबके भीतर छिपा है और प्रेम का ऐसा जाल बिछाता है कि कोमल हृदय उसमें बंध जाता है. ईश्वर का प्रेम अमूल्य है, अनुपम है, अद्भुत है, उसी के कारण तुलसी अमर काव्य की रचना करते हैं, संत कथावाचक बनते हैं तथा उस जैसे श्रोता जो सुनते-सुनते आसुंओं की गंगा बहाते जाते हैं. उसका हृदय ईश्वर और सद्गुरु के प्रति अगाध प्रेम से भरा है और गद्गद् हो रहा है. ईश्वर की कृपा से ही उसका प्रेम मिलता है, संत कृपा से ईश्वर मिलते हैं सद्गुरु के ज्ञान से संतों के प्रति आदर जगता है.   


Thursday, May 28, 2015

चैती चाँद


सुबह–सवेरे उठी और टीवी ऑन किया तो सद्गुरु की शीतल वाणी कानों में पड़ी, हृदय पवित्र करने वाली..उन्हें इस भौतिकता से दूर परम आनंद का भास कराने वाली गुरुवाणी की जितनी स्तुति की जाये कम है, गुरू का हर शब्द ज्ञान से परिपूर्ण है. उनके हित में है. परमात्मा की कृपा तो सब पर समान रूप से है, वह अब भी अपनी कृपा बरसा रहे हैं, उनकी ही झोली फटी है जो बार-बार पाकर भी वे खाली ही रह जाते हैं. “ दीवाना उन्होंने कर दिया इक बार देखकर, हम कुछ न कर सके बार-बार देखकर” वे उन्हें बार-बार सुनते हैं, देखते हैं, उन्हें प्रेम भी करते हैं पर फिर भी हर बार कुछ न कुछ मन में ऐसा रह जाता है जो कचोटता है. कुछ क्षण ऐसे अवश्य होते हैं जब लगता है यही पूर्णता है, एक ऐसी अनुभूति होती है जिसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिलते, पर उस स्थिति से फिर लौटना होता है और कोई घटना, कोई इतर घटना उसकी स्मृति को भुला देती है लेकिन उसका भूलना मन को सहन भी नहीं होता. “जैसे उड़ी जहाज को पंछी, पुनि-पुनि वापस आवे” वे अहम् के कारण पूर्ण समर्पण करने से डरते हैं, लेकिन उनके पास उनका है क्या ? यह तन भी उसी का दिया है और मन भी, आत्मा परमात्मा का अंश है, यह सब कुछ तो उसी जगद्गुरु का खेल है, फिर वे क्यों न निश्चिंत होकर उसके सखा बन जाएँ उसके खेल में !

आज जून दिल्ली से वापस आ रहे हैं, परसों वे एक पेपर प्रस्तुत करने गये थे. मौसम सुहावना है, संगीत की कक्षा हुई. अगले महीने लिखित परीक्षा है. दीदी ने कल रात उसके इमेल का जवाब दिया, वह उन्हें एडवांस कोर्स के बारे में लिखेगी जो अगले हफ्ते से शुरू हो रहा है. आजकल उसके जीवन में जो सर्वाधिक वांछनीय वस्तु है वह है गुरू कृपा, ध्यान करते समय कितनी बार उसे लगता है कोई बाधा है, कभी तनाव या घुटन सी भी महसूस होती है. ध्यान के बाद सब कुछ पूर्ववत सहज और सुंदर हो जाता है.  उसका दिल हल्का है और विचार सकारात्मक, वह देह में होने वाले हर स्पंदन पर ध्यान देती है और मन में उठने वाले हर भाव पर भी. दोनों उसकी नजर में हैं, वह आत्मा इस देह रथ की सारथी है. जिस वक्त जो कार्य सही हो, करने योग्य हो, जिस वक्त जो विचार सही हो, सोचने योग्य हो, जिस वक्त जो निर्णय उचित हो और सात्विकता को बढ़ावा दे, वही उस कान्हा की प्रसन्नता के लिए उसे करना है. उसी की ख़ुशी में नूना की ख़ुशी है. वह उससे जुड़ कर ही सहज है ! जून के जीवन में भी उजाला छा रहा है, वह आजकल अपने कार्य में बहुत रूचि लेने लगे हैं, शायद वह सदा से ही लेते आये हैं, आजकल वह ऐसा कार्य कर रहे हैं जो कम्पनी के ज्यादा हित में है. नन्हे का रिजल्ट भी अच्छा रहा है, और उनकी नई वाशिंग मशीन आने से पहले उसके लिए प्रबंध भी सुचारू रूप से हो गया है. कृपा उन पर बरस रही है. सद्गुरु के वे ऋणी हैं, कोटिशः नमन करते हैं, उनके इतने सारे उपकार हैं ! अंधकार में रास्ता टटोलते व्यक्ति को जैसे कोई हाथ पकड़ कर प्रकाश में ले आये, स्वर्णिम उजाला चहुँ ओर फैला है, ज्ञान का उजाला है यह. इस ज्ञान की ओर चलने की बात ऋषि कहते हैं. ज्ञान जीवन में हो वही जीवन, जीवन है, मुक्त करता है ज्ञान, फूल सा हल्का बना देता है, सारी जंजीरें काट कर प्रभु के समक्ष पहुंचा देता है !

आज चैत्र की पहली तिथि है, सिन्धी लोग इसे ‘चैती चाँद’ के रूप में मनाते हैं. कल से बल्कि पिछले तीन-चार दिनों से वर्षा की झड़ी लगी है. कल रात गर्जन-तर्जन भी हुआ, मौसम फिर ठंडा हो गया है. सुबह वे चार बजे उठे, नन्हे को अब सप्ताह में तीन दिन सुबह पढ़ने जाना है, सो उसे भी उठाया, वर्षा तब भी हो रही थी. क्रिया की, एडवांस कोर्स के बाद थोड़ा अधिक समय बैठना होता है. कुछ नई साधनाएं सीखीं, जो काफी लाभप्रद होंगी, इसका पता तो धीरे-धीरे ही चलेगा. फिर सत्संग सुना, आसन किये, एक घंटा ध्यान किया. ध्यान के बाद मन कितना शांत है, कोई विचार आता ही नहीं, सोचने से आता है. भीतर अद्भुत सन्नाटा भर गया हो जैसे. देह स्वस्थ हो, मन प्रसन्न रहे, बुद्धि का विकास हो, परमार्थ की भावना हो तो समझना चाहिए कि आचरण का परिमार्जन हो रहा है. कल विवेकानन्द का जीवन चरित पढ़ा, अद्भुत थे वे, योग के सभी अंगों में निष्णात, ज्ञानी... और संतों में भी शिरोमणि उनके गुरू थे, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, जिनकी छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा गूढ़ ज्ञान देने की शैली अद्भुत थी, जैसी जीसस की. बाइबिल की कई कहानियाँ भी बहूत गूढ़ अर्थ रखती हैं. ईश्वर जितने सरल हैं उतने ही गूढ़ भी, उन्हें पाना जितना सरल है उतना ही कठिन भी ! वह जितने निकट हैं उतने ही दूर भी ! प्रेम ही उन्हें पाने का मन्त्र है !

Wednesday, May 27, 2015

गुलाबी हाथी


आज सद्गुरु शिवतत्व की महिमा बखान कर रहे थे. शिव राम को भजते हैं और राम शिव के उपासक हैं. वह तो कृष्ण की उपासक है, वह उसके मन को पहले ही हर चुके हैं. आज सुबह क्रिया के बाद कुछ भिन्न अनुभूति हुई, जैसे वह अपने किसी पिछले जन्म में पहुंच गयी है. कल बच्चन की आत्म कथा के तीनों भाग समाप्त हो गये, चौथा भाग लेने एक दिन पुस्तकालय जाना होगा, उन पर लेख लिखने के बाद. आज श्री श्री ने निज स्वरूप से भी परिचित कराया. स्वयं का ‘होना’, ‘इसका ज्ञान होना’ और आनंद होना यही तो सच्चिदानंद है, पर अभी तक वह उस स्थिति तक नहीं पहुंची है. कभी प्रमाद घेर लेता है, कभी क्रोध, कभी वाणी में रुक्षता आ जाती है और कभी अहंकार का शिकार हो जाती है. परनिंदा में सुख आता है, न जाने कितने अवगुण अभी भी हैं जो ईश्वर की कृपा से ही निकल सकते हैं. अभी तो ‘तू ही है’ भाव ही सिद्ध हुआ है. ईश्वर ही सब कुछ है, यह जगत ब्रह्म का ही स्वरूप है, और जगत में वह भी है, सो वह भी उसी का स्वरूप हुई, यह बात जब तक अनुभव में न आये तब तक मन से मानकर ही चलना होगा. वह मौन में ही अनुभव में आ सकती है, सत्य को बोलकर व्यक्त नहीं कर सकते क्योंकि उसी क्षण वे अलग हो जाते हैं.

सुबह दो फूल चढ़ाकर जब वह आँखें बंद करती है तो एक ज्योति निकल कर उसे छूती हुई प्रतीत होती है. बहुत दिनों पहले ‘शारदा माँ’ का जीवन चरित पढ़ा था, वह कहती हैं कि कृष्ण ज्योति के रूप में भक्त के दिए फूलों व प्रसाद को स्पर्श करते हैं. वह हर क्षण उनके साथ है, उनकी हर गतिविधि पर नजर रखे हुए, पर पूजाघर में व्यवहार कितना भी शालीन क्यों न हो यदि बाहर विकारों के अधीन हुए तो पूजा व्यर्थ ही हुई. आज सुबह समय पर उठे वे, सारे काम समयानुसार हो रहे हैं पर ध्यान नहीं कर पायी. फोन पर काफी वक्त गया, लगभग सभी सखियों से बात हुई. सुबह सद्गुरु के वचन सुने, हृदय को शुद्ध करना ही होगा, उसके बिना ईश्वर कैसे प्रकट होंगे. देहात्म बुद्धि से स्वयं को मुक्त करना होगा. तभी ध्यान सधेगा और पुराने कर्मों के बीज अपने आप नष्ट होने लगेंगे. उसे इस जन्म में इतना कुछ मिला है कि जन्मों की साध मिट गयी, अब कुछ पाना शेष नहीं है सिवाय उसके ! कल शाम जून ने कहा कि वह अपने आप से बातें करती है और हँसती है. उन्हें क्या पता हर वक्त उसका मन उस दिव्य लोक में रमण करता है जहाँ कृष्ण हैं. एक पवित्रता का भाव छा जाता है अनिवर्चनीय आनंद..कल्पनातीत शांति और सुख जो इस जगत की वस्तुओं में तो नहीं ही मिलता...

आज सुबह उसने थोड़ी देर के लिए उदास होने का अभिनय करना चाहा, पर नहीं हुआ. दिल तो भीतर छलक रहा था सो थोड़ी ही देर में अभिनय से मन भर गया. जून कुछ समझ पाए या नहीं पर वह भी बहुत धैर्यवान हैं अथवा तो मन की बात छिपाने में माहिर हैं, सो कुछ कहा नहीं कुछ भी जाहिर नहीं किया न क्रोध न आश्चर्य, पर उसने स्वयं को अपनी परीक्षा में सफल पाया. यह प्रभु की कृपा है, वह हर पल उसके साथ हैं. अगले महीने नामरूप में एडवांस कोर्स है, उसे जाना है. जून भी तैयार हैं उसे भेजने के लिए. टीवी पर बाबाजी ध्यान करा रहे हैं. हजारों की संख्या में लोग ॐ नमो शिवाय का जप कर रहे हैं. उन्हें ध्यान से पहले प्रेम से उस चैतन्य को पुकारना है. धीरे-धीरे भीतर उतरना है, परमात्म रस प्रकट करना है. हृदय प्रेम से इतना परिपूर्ण हो कि अन्य किसी भाव के लिए कोई स्थान न रहे. कल शिवरात्रि है, वह उपवास रखेगी, जो शरीर के दोषों को दूर करने के साथ-साथ मन के दोषों को भी दूर करेगा तो मिथ्या उदासी ग्रहण करने की प्रेरणा भी नहीं होगी. वाणी रुक्ष नहीं होगी, प्रियजनों की उपेक्षा नहीं होगी, सभी के लिए कल्याण की भावना होगी. परदोषों  पर  नजर नहीं जाएगी. वास्तविकता को जानने का विवेक जगेगा. कामनाएं नष्ट होंगी. परमात्मा का स्वरूप स्पष्ट होता जायेगा !

रात को अलार्म साढ़े बारह बजे ही बज गया, उनकी नींद टूट गयी, उठने को हुए, पर जून ने घड़ी देखी तो पता चला फिर सुबह पांच बजे के बाद ही उठ पाए. जून समय से ऑफिस चले गये, व्यायाम आदि किया बस सत्संग नहीं सुन पाए. जून के जाने के बाद गुरूमाँ के वचन सुने. जीवन में सतोगुण कैसे आये इसका वर्णन वह कर रही थीं. ईश्वर भक्त से उसकी भलाई की अपेक्षा के अतिरिक्त कुछ भी अपेक्षा नहीं रखता. वह कदम कदम पर चेताता है कि व्यर्थ के कार्यों से बचें. सद्गुरु को कल उसने स्वप्न में देखा, वे सभी सत्संग में बैठे हैं. एडवांस कोर्स कर रहे हैं. वह रंगों को ब्रश से कागज पर उतार रही है. हाथी रंगना है तो वह गुलाबी रंग लगाती है तभी एक परिचित साधक गुरूजी को पेंटिंग करने के लिए सब कुछ उठाकर दे देते हैं. वह ब्रश से कई सारे रंग एक-एक कर लगाने लगते हैं, ब्रश फ़ैल जाता है, वे उनके निकट हैं. पता नहीं यह स्वप्न क्या कहना चाहता है या मात्र स्वप्न ही है !



Friday, May 15, 2015

लोकल बस का सफर


आज फलाहार का दिन है, मन में शांति का अनुभव हो रहा है और तन भी हल्का है. सद्गुरु को कल भी सुना था, मन आनंद से छलक उठा और सारा दिन जैसे एक सुखद स्वप्न की तरह बीता. आज भी सुबह उनकी बातें सुनीं, सीधी सच्ची बातें जैसे वे लोग करते हैं आपस में और उनके शिष्य दिल खोलकर हँस रहे थे. मन को जैसे भीतर तक साफ करके लौटती हैं उनकी बातें. वे सहज हैं जैसे काश वे भी सदा वैसे ही सहज रह पायें. वे भूल जाते हैं और  और व्यर्थ के चिंतन में मानसिक ऊर्जा को व्यय कर बैठते हैं. सद्गुरु ऐसे में झकझोर कर जगाते हैं. उनमें अग्नि की भांति पवित्रता, धरती की भांति सहिष्णुता, गगन की तरह विशालता, वायु की भांति सूक्ष्मता, और जल की भांति शीतलता हो तो वे ईश्वर की निकटता का अनुभव कर सकते हैं. उसके प्रेम का अनुभव तो वे हर पल करते हैं. हर श्वास जो ग्रहण करते हैं उसी का प्रसाद है और श्वास जो वे छोड़ते हैं उसके प्रति उनकी कृतज्ञता है. प्रकाश जो उनकी आँख में है उसी की देन है. पंच तत्वों से देह बनी है, चेतना भी उसी का अंश है.

आज उसने सुना, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक वे अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीने की कला है. वे स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से वे सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. उन्हें कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को उनसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा अभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !

आज नन्हा दिगबोई गया था, लोकल बस से और वापस भी उसी से आया. साथ में आया उसका एक मित्र, वही जिसकी बहन की शादी का सीडी उसने कल देखा था. दोनों मित्र अच्छी तरह से रह रहे हैं, कल सुबह वापस जायेंगे, एक दिन नन्हे को भी वहाँ रहना होगा. सुबह दीदी को फोन किया, चाचीजी का नम्बर चाहिए था, चाचीजी व बुआजी दोनों से बात हुई. चाचाजी के पैर का घाव ठीक नहीं हो रहा है. ईश्वर की दुनिया में न्याय है. अपराधी यदि दुनिया के कानून से बच भी जाये तो भी उसके कानून से नहीं बच सकता. उन्हें हर क्षण सजग रहना होगा. कायिक, मानसिक, वाचिक किसी भी तरह का अपराध उनसे न हो, न किसी अन्य के प्रति न स्वयं के प्रति. सभी में उसी का वास है. जो पीड़ा में हैं उनके प्रति हृदयों में करुणा का भाव जगे, दूसरों को वे उसी प्रकार माफ़ करें जैसे ईश्वर उन्हें करता है. वह उनके हजार अपराध माफ़ करता है फिर भी वे चेतते नहीं हैं. ज्ञान ही मुक्ति का उपाय है, ज्ञान ही भक्ति का प्रेरक है.