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Thursday, May 14, 2020

एकता की मूर्ति

एकता की मूर्ति 


आज पूरे सात दिन बाद यह डायरी खोली है. सिक्किम में नोटपैड ले गयी थी, जिसमें यात्रा विवरण लिखा था. कल से टाइप करना आरंभ हो  सकता है. आज दोपहर छोटा सा एक आलेख लिखा,भाईदूज पर एक कविता भी, और सभी भाइयों को भेजने के लिए लिफाफे तैयार किए. कल रजिस्ट्री करवानी है. शाम को भजन संध्या थी, नैनी ने फूलों से मंदिर सजा दिया था. आज एक नयी साधिका आयी, उसने अपनी मधुर आवाज़ में तीन भजन गाये. सिक्किम से लाये उपहार उसने उन्हें दिए. नैनी को एक माला, वह बहुत खुश थी. शाम को बगीचे से तोड़ी पालक का सूप बनाया और सरसों का साग, इस मौसम की पहली फसल ! फूलों का बगीचा भी काफी साफ-सुथरा मिला जब आज सुबह राजधानी से वे घर लौटे. 

जून का फोन आया अभी, घर में काम करवाने के लिए सिविल डिपार्टमेंट को उन्होंने कहा है, शायद वे लोग देखने आएंगे. दीवाली से पूर्व कुछ टूट-फूट ठीक हो जाये तो घर और अच्छा लगेगा. उसे बंगाली सखी की बिटिया से मिलने जाना था पर अब घर पर ही रहना होगा, वे कभी भी आ सकते हैं. दोपहर को मृणाल ज्योति जाना है. सिर में हल्का दर्द है और गले में खराश... मगर आत्मा उसी तरह प्रसन्न है, अदरक व तुलसी का काढ़ा पीने से अवश्य ही कुछ राहत मिलेगी. 

आज इतवार है, टीवी पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम आरम्भ हो गया है. इस महीने के अंतिम दिन देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के सम्मान में देश भर में राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जा रहा है, साथ ही इस अवसर पर एकता दौड़ का भी आयोजन होगा, उसी दिन स्टेचू ऑफ़ यूनिटी को देश को समर्पित किया जाएगा. गुजरात के केवाडिया में सरदार सरोवर बांध के पास स्थापित की गई लौहपुरुष की 182 मीटर की आदम कद प्रतिमा स्टेच्यू ऑफ यूनिटी को ! कल इन्फैंट्री दिवस भी मनाया गया, जिस दिन सन सैंतालीस में कश्मीर को बचाने के लिए सेना को भेजा गया था. खिलाडियों का जिक्र भी प्रधानमंत्री ने किया, सिक्किम व उत्तरपूर्व का भी. इंदिरा गांधी को उन्होंने याद किया. उसे ‘मन की बात’ सुनना अच्छा लगता है, प्रधानमंत्री जैसे इसके जरिये देशवासियों को देश के बारे में आवश्यक जानकरी देते हैं, ऐसी जानकारी जिसे जानकर देश के प्रति सम्मान और गर्व की भावना सभी भारतवासियों में जगे. 

अभी-अभी योग सत्र समाप्त हुआ, कल महिला क्लब की मीटिंग है, सो सत्र नहीं होगा और परसों क्लब में फिल्म दिखाई जाएगी, कम ही साधिकाएं आएँगी. जून आज हैदराबाद गए हैं, दो दिन बाद लौटेंगे. कल सुबह बाजार जाना है, शाम की मीटिंग के लिए कुछ सामान खरीदने. प्रेसीडेंट का फोन आया था, परसों वह आ रही हैं, तब वह उन्हें क्लब का चार्ज सौंप देगी. सप्ताहांत में नन्हा और सोनू आ रहे हैं. कल से घर पर सिविल का काम भी आरंभ होने वाला है. लकड़ी व् सीमेंट का काम. बाहर के बरामदे में एक दीवार पर माली ने आयल पेंट लगा दिया है, जो बच्चों द्वारा लगाए लाल दागों को छिपाने के लिए लगाया था, पर अब वही भद्दा लग रहा है. जून ने इस कार्य के लिए फोन किया था, शायद कल यह भी हो जाये. कल पिताजी ने पहली बार फेसबुक पर कमेंट किया तथा एक संदेश भी भेजा, उन्हें अब नए-नए कार्य सीखने में रूचि हो रही है. ईश्वर उन्हें सौ वर्ष की आयु दे. अभी तक वे अपना कार्य स्वयं करने में सक्षम हैं. यहाँ तक कि भोजन भी बना लेते हैं. 

Tuesday, June 25, 2019

नया कैलेंडर



आज जून ने यह डायरी भेजी है. इस बार की कम्पनी की डायरी पहले मिल गयी थी, सलेटी रंग की, सुंदर है, पर लिखने का स्थान कम था, एक ही पेज में दो तिथियाँ. अब एक वर्ष बाद अंतिम डायरी मिलेगी कम्पनी की. अगले वर्ष अगस्त में उन्हें विदाई दे दी जाएगी. असम में अब दो वर्ष से भी कम समय रह गया है. इस समय का सदुपयोग करना है, सेवा, सत्संग और साधना के द्वारा. रात्रि के पौने आठ बजे हैं. जनवरी का महीना वैसे ही इतना ठंडा होता है, ऊपर से झीनी-झीनी वर्षा भी हो रही है. सुबह से ही बादल बने थे. दोपहर को बूंदा बांदी हुई, जब सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखा रही थी. एक ने कहा, उनकी माँ ने भी कभी इस तरह नहीं समझाया जैसे वह उन्हें लड़ाई-झगड़े से दूर रहने के लिए कहती है. उसने सोचा, माँ को भी किसी ने नहीं समझाया होगा शायद. सुबह सेक्रेटरी ने उसका नाम क्लब के प्रोजेक्ट स्कूल की कमेटी में सम्मिलित कर दिया. प्रेसिडेंट ने दस बजे मीटिंग के लिए बुलाया, पर स्वयं सवा दस बजे आयीं. भारतीय समय में इतनी देरी को सामान्य मान लिया जाता है, पर उस कारण वापसी में देर हुई. दोपहर को एक वरिष्ठ सदस्या के यहाँ जाना था, उनकी बहन का दामाद अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री है, जो परिवार सहित असम आया हुआ है. डेढ़ घंटा वहाँ बिताया. वर्षों पूर्व जब वे नासा गये थे, उनके घर भी गये थे, उसने ही उन्हें घुमाया था. शाम को गायत्री समूह की महिलाओं के साथ नियमित योग की साधना, यानि सारा दिन कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. झींगुर की आवाज आ रही है और कमरे में इतना सन्नाटा है कि घड़ी की टिक-टिक भी स्पष्ट सुनाई दे रही है. पिताजी ने आज स्मार्ट फोन छोटी भाभी को वापस कर दिया है. कुछ दिनों तक व्हाट्स एप पर संदेशों का आदान-प्रदान करने के बाद अब वह उससे विरक्त हो गये हैं, उनका स्वास्थ्य अब ठीक है. टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है, जो रोचक और मनोरंजक भी है.

रात्रि के नौ बजने वाले हैं, यानि सोने से पूर्व आज के दिन की अंतिम घड़ी. जून ने शाम को गाजर का हलवा बनाया है. कल उनके एक मित्र आ रहे हैं गोहाटी से, उन्हें खाने पर बुलाया है. वैसे भी उनके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. दोपहर बाद को ओपरेटिव स्टोर गयी, बीहू के लिए पीठा आदि लिया, सर्दियों के मौसम में तिल खाने की सलाह दी ही जाती है. मन्दिर की साज-सज्जा बदली, ध्यान कक्ष में भी नया कैलेंडर लगाया व नई मूर्तियाँ भी, नये वर्ष का फेर-बदल अभी चल रहा है. आज वर्षा नहीं हुई. आज योग कक्षा में एक साधिका की भांजी भी आई थी, जो बिहार योग स्कूल से योग सीख चुकी है. उसने शिथलीकरण सिखाया और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी.

इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. वह रात के भोजन की तैयारी कर चुकी है. उनके पूर्व सहकर्मी आयेंगे ऐसा जून ने कहा था पर अब ज्ञात हुआ वह किसी अन्य जगह निमंत्रित हैं. कल दोपहर भी जून का लंच बाहर है, उनके दफ्तर के चार अधिकारी परीक्षा के बाद स्थायी हुए हैं, वे मिलकर पार्टी का आयोजन कर रहे हैं. अब यह भोजन कल रात्रि को खाया जायेगा. कुछ बना हुआ कुछ बनने के लिए तैयार. फ्रिज में रखा हुआ भोजन तो लोग तीन-चार दिन तक भी खाते ही हैं. आज सुबह क्लब गयी, एक स्थानीय क्लब ने उनके क्लब द्वारा चलाई जा रही सिलाई कक्षा के लिए सात सिलाई मशीनें दी हैं, जो उनके यहाँ वर्षों से रखी हुई थीं. कल मृणाल ज्योति में भी मीटिंग है. सुबह एक सखी को पहली बार अपने पति के साथ टहलते देखकर अच्छा लगा, वह वर्षों तक अकेले ही टहलने जाती रही है. उसके लिए उसने मन ही मन शुभकामनायें भेजीं. परमात्मा ही हर आत्मा के द्वारा प्रकट हो रहा है. उन्हें उसके प्रकट होने में बाधक नहीं बनना है. किसी भी तरह की आसक्ति, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर मन को पारदर्शी बनाना है, तभी परमात्मा की ज्योति मन में झलकेगी. वे अकेले ही इस जगत में आते हैं और अकेले ही यहाँ से जाने वाले हैं. मित्रता का भ्रम यदि टूटता है तो वह इसी सत्य की ओर इशारा करता है.

Friday, April 20, 2018

साबूदाने की खिचड़ी



काले रंग के कवर पर चमकदार लाल रंग से लिखा है तथा पन्नों के सिरों पर सुनहरी रेखा है जो डायरी बंद करने पर स्पष्ट दिखाई देती है. इस वर्ष की उसकी डायरी उनकी कम्पनी से मिली हुई नहीं है, बल्कि जून को एक प्राइवेट तेल कम्पनी द्वारा मिली है. सुबह क्लब की एक सदस्या का फोन आया, उसे एक प्रोजेक्ट की तस्वीरें चाहिए थीं, भेज दीं, ड्राप बॉक्स में सुरक्षित थीं. जून अगले हफ्ते तमिलनाडु जा रहे हैं और तीसरे सप्ताह में उन्हें कोलकाता जाना है, असमिया सखी के पुत्र की शादी में. अभी-अभी उससे फोन पर बात की, विवाह को लेकर कुछ चिंतित थी. जून कल दिन भर कुछ परेशान से थे, आज स्वस्थ हैं. उनमें से हरेक भिन्न है, हरेक एक अपने संस्कार हैं, दो आत्माएं जो साथ चलती हैं उन्हें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए. हर एक की अपनी यात्रा है. परमात्मा उन्हें ज्ञान, प्रेम और शक्ति देता है ताकि वे सुखपूर्वक जीवन की राह पर चल सकें. उन्हें कर्मयोगी बनना है, यानि धर्म में स्थित रहकर कर्म करना है ! जब वे किसी की आलोचना करते हैं, तब स्वयं भी दोषी हो जाते हैं, क्योंकि वह नकारात्मक ऊर्जा जो वे दूसरों को भेज रहे हैं, उनसे ही होकर जानी है, और सबसे पहले उनपर ही असर करेगी ! बाहर से बच्चों के रोने की आवाज आ रही है, सुबह वे आये थे, भजन के साथ नृत्य करने, जब वह रसोईघर में भोजन पका रही थी और देवी के भजन कैसेट द्वारा चल रहे थे. बच्चे भगवान के ज्यादा निकट होते हैं ! जून के एक सहकर्मी ने एक बड़ा सा बूमरैंग भिजवाया है, जो वे आस्ट्रलिया से लाये हैं. उसने सोचा उनकी श्रीमती जी को फोन करके धन्यवाद कहेगी. इस महीने उनके क्लब का ‘सेल’ भी लगने वाला है, मृणाल ज्योति का भी स्टाल लगेगा. वहाँ की एक अध्यापिका ने फोन करके कहा. क्लब की एक सदस्या के पुत्र का जन्मदिन है अगले ह्फ्ते, वह वहाँ मनाना चाहती है, एक अन्य सखी ने कहा, वह भी कुछ भिजवाना चाहती है. उनका जीवन कितने लोगों से जुड़ा होता है ! छोटी भाभी का जन्मदिन है आज, छोटी बहन ने व्हाट्स एप पर गाकर बधाई दी, तो भाभी ने भी गाकर जवाब दिया ! दोपहर को झपकी लगी तो स्वप्न में उसने खुद को बड़े आराम से गाते हुए देखा, सुना !   

साढ़े दस बजे हैं, यानि आधा घंटा है उसके पास खुद से बातें करने के लिए ! सुबह उठी उसके पूर्व ही कोई अलार्म की आवाज सुना गया, कैसे-कैसे अनोखे अनुभव होते हैं तंद्रा में, तारों भरा आकाश, कभी अग्नि की ज्वाला, कोई चित्र दिखेगा किसी व्यक्ति का और किसी जन्म की कोई स्मृति कौंध जाएगी. परमात्मा न जाने कितने तरीकों से अपनी उपस्थिति जताता है. उसकी करुणा अनंत है. उठकर टहलने निकले तो कोहरा था पर जनवरी के हिसाब से ठंड ज्यादा नहीं थी. नाश्ते में सांवक चावल की खीर बनाई. दोपहर के भोजन में साबूदाने की खिचड़ी, उबला कच्चा पपीता, सलाद व बथुए का रायता बना रही है. सभी कुछ पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक ! कुछ देर पहले बाजार गयी, क्लब के कार्यक्रम के निमन्त्रण पत्रों में लगाने के लिए रिबन खरीदना था. बंगाली सखी को निमन्त्रण देने के लिए फोन किया. दो दिन बाद विवाह की वर्षगांठ है, उसमें वे अग्नि भी जलाएंगे, जैसे रोइंग में सीखी थी. अग्नि के दोनों तरफ नीचे ही बैठने का इंतजाम भी होगा.

शाम होने को है. आज सुबह पुनः एक स्वप्न देखा, किसी पुराने जन्म का स्वप्न था जैसे. वह एक समूह का अंग है, सभी बंगाली में प्रार्थना कर रहे हैं. स्वयं को स्पष्ट मंत्र बोलते हुए सुना, शायद रामकृष्ण परम हंस के आश्रम में थी वह, शायद उनके शिष्यों या भक्तों में से एक, तभी उनके प्रति उसके हृदय में एक गहरा आकर्षण है. टहलने गये वे तो जून को यूनिवर्स से आये नियमित संदेशों के बारे में बताया. इस वर्ष उन्हें जो लक्ष्य निर्धारित करने हैं, कदम दर कदम उन पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले संदेश. एक अन्य डायरी में लक्ष्यों के बारे में लिख रही है, पहली बार कोई एक भीतर स्पष्ट जगा है, पहले जहाँ भीड़ थी वहाँ एक प्रकाश का केंद्र बन गया है, जो सदा ही प्रेमस्वरूप है. कल शाम एक सखी को ध्यान के बारे में बताया, ध्यान ही वह ऊर्जा है जिसके लिए गुरूजी कहते हैं, ‘अग्नि की मशाल’ बन जाओ ! प्रतिपल ध्यान ऊर्जा से वे जुड़े रह सकते हैं और उसका उपयोग श्रेष्ठ कार्यों में कर सकते हैं ! आज जून ने कहा, उनकी इस वर्ष की थीम है, ब्लिस, अच्छा लगा, उन्हें एक कार्ड भेजा है विवाह की वर्षगांठ का कार्ड, उनके लिए कविता भी लिखनी है. शाम को क्लब में ‘दिलवाले’ है, उसे प्रेस जाना है.

Thursday, August 24, 2017

परशुराम कुंड की यात्रा


अभी तक जून को नये वर्ष की डायरी नहीं मिली है, वह पुराने साल की डायरी के पीछे के नोट्स के पन्नों पर लिख रही है. मौसम ठंडा है, जनवरी के महीने में बादल छाये हैं नभ पर. कल क्लब का वार्षिकोत्सव था, वे गये थे दोपहर के लंच में. हर साल की तरह शाकाहारी टेबल पर उसकी ड्यूटी भी थी. भोज आरम्भ हुआ ही था कि वर्षा आरम्भ हो गयी, फिर सुरक्षित स्थान पर सब कुछ ले जाना पड़ा. चार बजे घर लौटे. शाम को प्रेस गयी, उसके लेख के साथ पुराना फोटो दिया गया था, उसने बदलवा दिया, यानि अब भी निज लाभ ही दृष्टि में है. यह कितना स्वाभाविक है न, ‘सहज रहो’ यही तो साधना का लक्ष्य है. कल जून ने दो-तीन समूह बना दिए हैं व्हाट्सएप पर, सामाजिक आदान-प्रदान का कितना अच्छा साधन है यह “व्हाट्सएप”.

पिछला सप्ताह व्यस्तताओं से घिरा था. आज ‘मकर संक्रांति’ है, अगले दो दिन जून का दफ्तर बंद है. लेडीज क्लब का कार्यक्रम अच्छी तरह सम्पन्न हो गया. उस दिन दोपहर को जैसे किसी ने उसे कहा, क्लब जाना चाहिए, जहाँ कई सदस्याएं काम में व्यस्त थीं, लगा जैसे वे उसका इंतजार ही कर रही थीं. वे रात्रि को एक बजे वापस आये. अगले दिन विवाह की वर्षगांठ थी, शाम को बाहर खुले में अग्नि जलाकर दो मित्र परिवारों के साथ यह दिन मनाया. उसके अगले दिन तबियत नासाज थी, शायद ठंड लग गयी थी. दो दिन विश्राम किया, अगले दिन वे अरुणाचल प्रदेश स्थित ‘परशुराम कुंड’ नामक एक तीर्थस्थल देखने गये, यह यात्रा एक सुखद स्मृति बनकर उनके अंतर में अंकित हो गयी है. वापसी में एक रात सर्किट हाउस में रुककर घर लौटे, जिसके अगले दिन क्लब में उन सभी सदस्याओं के लिए आभार प्रदर्शन के लिए भोज का आयोजन किया गया था, जिन्होंने कार्यक्रम में किसी न किसी तरह का काम किया था. उसके बाद मृणाल ज्योति में ‘बीहू’ मनाया गया और आज फिर जून ने बाहर लोहड़ी की आग जलाने का प्रबंध किया है.

आज बीहू का प्रथम अवकाश बीत गया. सुबह दही+गुड़+चिवड़ा का नाश्ता किया, जून ने ब्रोकोली की विशेष सब्जी भी बनाई थी. दोपहर को लॉन में धूप में बैठकर देर तक किताबें पढ़ीं, तथा मोबाईल से कई तस्वीरें व वीडियोज हटा दिए, ज्यादा कुछ संग्रह करके रखना अब नहीं भाता, मन भी खाली रहे और फोन भी. शाम होने  से कुछ पहले बैडमिंटन खेला फिर एक मित्र परिवार से मिलने गये. आज डिनर में मटर की भरवा तंदूरी रोटी बनानी है. सप्ताहांत में पहले दिन राजगढ़ जाना है और इतवार को पिकनिक. निकट स्थित एक इलाके ‘राजगढ़’ में मृणाल ज्योति की एक शाखा खुल रही है. इस इलाके में दिव्यांगों के लिए कोई स्कूल नहीं है, सर्वे करने पर पता चला, लगभग पचास बच्चे आस-पास के गांवों में हैं जिन्हें कोई शिक्षा या इलाज नहीं मिला है. कल वे लोग जायेंगे, राजगढ़ के पुलिस अधिकारी व आर्मी के मेजर को भी बुलाया है. अगले महीने कोलकाता जाना है, जून की ट्रेनिंग है पूरे दस दिन की, सो ‘विपासना कोर्स’ करने का उसका बहुत दिनों का स्वप्न पूरा हो जायेगा.


दूसरा अवकाश भी बीत गया. सुबह की साधना अब सहज ही होती है, परमात्मा ही करा रहा हो जैसे. आज एकादशी है, कुट्टू की रोटी व सागू की खिचड़ी खाने का दिन. नन्हा आज पिलानी में है, कल रांची में था, उसे अपनी कम्पनी के लिए नये लोग चाहिए. कैम्पस इंटरव्यू के लिए गया है. 

Thursday, September 1, 2016

काफिलों का दौर


बहन की डायरी के कुछ पन्ने पढ़े. हर व्यक्ति अपने भीतर कितना बड़ा संसार छिपाए रखता है. हर व्यक्ति एक अपार सम्भावना लिए इस दुनिया में आता है. उसे वह बचपन से जानती है, पर लगता है कितना कम जानती है. बचपन में माँ उसकी गोद में बहन को लिटा देती थीं और स्वयं घर के काम करती थीं. उसका स्कूल दोपहर बारह बजे का था, फिर याद आता है दीदी उसके लिए सुंदर वस्त्र बनाती थीं, जिन्हें पहनकर वह परी सी लगती थी. स्कूल जाने से बहुत डरती थी. याद है पलंग के नीचे छिप जाती थी, जबरदस्ती उसे स्कूल भेजना पड़ता था. फिर नये शहर में वे दोनों एक स्कूल में गयीं. टीचर उसे चाहती थीं और नूना की कक्षा की छात्राएँ भी उसे मिलकर खुश होती थीं. जब भाभी आ गयीं तब वही उसे तैयार करती थीं. इंटर कालेज में उसने सौन्दर्य प्रतियोगिता जीती थी, फिर मेडिकल की तैयारी और पांच वर्षों के लिए हॉस्टल चली गयी. नूना की शादी हो गयी थी जब वह कालेज में गयी. उसके बाद तो मिलना साल में कभी दो साल में एक बार ही होने लगा. कितना वक्त गुजर गया है. वह चाहती है उसकी डायरी पढ़कर नूना कोई कहानी लिखे, मानव मन की कहानी, उसकी इच्छाओं, कामनाओं की कहानी, पूर्णता को पाने की उसकी तड़प की कहानी, वह भी तलाश रही है लेकिन उसका मार्ग बौद्धिक है. वह चाहती है कि खुद भी बनी रहे और परमात्मा भी मिल जाये, लेकिन परमात्मा को पाने की शर्त यही है कि खुद को तो मिटना होगा, जो मिट गया स्वयं फिर उसकी कोई कहानी नहीं रहती. वह बचता ही नहीं. जून के लिए एक कविता लिखी तो है पर उसमें दर्द समा गया है, उत्साह भरी एक कविता और लिखनी होगी !

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. कल दोपहर मृणाल ज्योति गयी थी, कविता पढ़ी, तारीफ हुई, अच्छा लगा अर्थात जब अपमान होगा तब दुःख भी होगा. ब्लॉग पर जब कोई प्रतिक्रिया करे तो भी अच्छा लगता है, यह खतरनाक है, लेकिन तब भी कोई इस मन को देख रहा होता है, साक्षी सजग रहता है तब कोई खतरा नहीं...कल छोटी भांजी से बात की, उसे पिताजी का इतिहास चाहिए, यानि अपने नाना जी का. उसने याद किया, उनके पिता व का दादा-दादी का नाम, नाना-नानी का नाम भी. पाकिस्तान का एक जिला जन्मस्थान, स्कूल का नाम, विभाजन के समय सोलह वर्ष के थे, पचास किमी पैदल चलकर आये. दो जगह रुका उनका चालीस-पचास हजार लोगों का काफिला. बीच में बच्चे व बूढ़े थे. गाँव के लोग शामिल, हमले भी हुए, फौजियों की जीप साथ थी. पहली रात भोजन मिला, दूसरी रात सामान नहीं था. पानी की दिक्कत भी थी. छोटी बहन चार वर्ष की थी और भाई ग्यारह वर्ष का. उन पर लिखी कविता उसे भेज देगी. जून का मन जो घायल हुआ था अब धीरे-धीरे सहज हो रहा है, आज दोपहर वह कुछ पिघले, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. वह बहुत भावुक हैं और उनके लिए परिवार ही सर्वोच्च मायने रखता है. वह परिवार के लिए ही जीते हैं, उनका दिल बहुत कोमल है, कामना युक्त है पर वे जन्मों के संस्कार हैं. धीरे-धीरे वह भी स्वयं को जान लेंगे, तब तक उन्हें बहुत स्नेह और सहारे की जरूरत है. उसके जीवन का लक्ष्य तो पूरा हो चुका है अब जो भी प्रारब्ध शेष है वह पाना है और शेष लुटाना है. अनंत प्रेम, अनंत करुणा, अनंत स्नेह और अनंत खुशियाँ..भीतर अनंत खजाना है. परमात्मा उसके माध्यम से प्रकट होने को उत्सुक है, उसने स्वयं को खाली कर दिया है. सद्गुरु उसके माध्यम से गीत बनकर फूटना चाहते हैं. वह उनकी ही वाणी बोल रही है..भीतर एक सन्नाटा है और है अंतहीन फैलाव..जिसमें से ख़ुशी रिसती रहती है...टप टप टप टप...सारी दुनिया उस ख़ुशी की हकदार है और सबसे पहले जून पर उसका हक है..वह उसके जीवन में सर्वोच्च स्थान रखते हैं..उसके अन्तरंग के सहचर हैं..उनसे ही समाज में उसका नाम है. वह स्वस्थ रहें, सानंद रहें..आज तक उससे जो भी पीड़ा उन्होंने पायी है, शायद वह प्रारब्ध का खेल था..जब जागो तभी सवेरा..वह उसके लिए अब आराध्य हैं !


Friday, August 19, 2016

फूल-पत्तियों वाले कार्ड


आज अभी कुछ ही देर बाद मेहमान आने वाले हैं. पिताजी को भी उनके आने का इंतजार है, माँ को अब किसी के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मौसम अच्छा है आज भीगा-भीगा सा. उसने सोचा  उनके लिए कुछ लिखे -  
बरस के बादलों ने भी स्वागत किया है
इंतजार क्यों न करे, अति उत्सुक हिया है

दूर देश से उड़ के आये, अधरों पर ओढ़े मुस्कान
दिल्ली में रहे मौज मनाये, अब आये हैं वे आसाम

जून ने अगले कुछ दिनों के लिए अवकाश ले लिया है. आज वे उन्हें लेकर दिगबोई गये. मौसम पहले-पहल अच्छा था, फिर धूप निकल आई. धूप में भी भांजियों ने खूब मस्ती की, विभिन्न पोज देकर तस्वीरें उतारीं. वापसी में मौसम पुनः अच्छा हो गया. वे म्यूजियम भी गये, पार्क में बोटिंग की.

आज दोपहर वे उसके साथ बच्चों की सन्डे योग कक्षा में गये. डाक्टर बहन ने उन्हें स्वच्छता के विषय में जानकारी दी. नाड़ी तथा हृदय के बारे में बताया. चार्ट पेपर पर एक क्रॉसवर्ड बनाकर शरीर के अंगों के नाम सिखाये. लडकियों ने उन्हें प्लास्टिक की बोतल से पेन होल्डर बनाना सिखाया. फूलों और पत्तियों को कागज पर चिपका कर कार्ड बनाना सिखाया. बच्चों को बहुत आनंद आया. रेन क्लैपिंग में तो वाकई उन्हें बहुत खुशी हुई. उनके दिन अच्छे बीत रहे हैं.

कल सुबह छोटी भांजी क्लब में तैरने गयी. वह अच्छी तैराक है. शाम को जून आयल फील्ड दिखाने ले गये, उन्होंने समझाया किस तरह तेल को पानी व गैस से अलग किया जाता है. वापस आकर सभी मिलजुल कर घर का काम करते हैं. छोटी भांजी सलाद सजाती है तो बड़ी टेबल लगा देती है. बीच-बीच में ज्ञान चर्चा भी होती है. माँ-पिताजी को भी उनका साथ भाने लगा है.

कल वे आर्ट ऑफ़ लिविंग के सेंटर गये थे जहाँ साप्ताहिक सत्संग था, उसके पूर्व गुरुद्वारे तथा काली बाड़ी दिखाए. आज वह बहन को मृणाल ज्योति ले गयी, जहाँ उसे एक मीटिंग में भाग लेना था. मीटिंग के दौरान बहन बाहर टहलती रही, उसे अपना वजन घटाना है सो दिन में कई बार टहलने जाती है. वहाँ उसने एक छोटी तिपहिया साइकिल दान में दी.

आज सभी वापस चले गये हैं. रोजाना की सुबह-सुबह की सैर आज नहीं हुई, क्योंकि वर्षा काफी तेज थी. प्राणायाम किया. जून आज पांच दिनों के बाद दफ्तर गये. वह बहन को एक पड़ोसिन से मिलाने ले गयी. तुलसी का एक पौधा वहाँ से लायी जिसे अभी तक लगाया नहीं है. जाते-जाते बच्चों का वीडियो भी लिया जैसा आते वक्त लिया था. बहन अपनी डायरी छोड़ गयी है ताकि उसे पढ़कर वह कोई कहानी लिख दे ! छोटी भांजी ने भी अपनी एक कहानी दी है, हिंदी अनुवाद के लिए. उनके ढेर सारे चित्र हैं और ढेर सारी यादें हैं. उनके साथ बिताये दिन सुखद याद बन गये हैं !


अज गुरु पूर्णिमा है, सुबह वे सेंटर गये थे. दोपहर को पूजा में भाग लिया, एक बार तो लगा कि जैसे तस्वीर में गुरूजी सजीव हो उठे हैं, उनकी मुस्कान कितनी वास्तविक लग रही थी. आज माँ घर से बाहर जाने के लिए कह रही थीं. आजकल उनको खाने-पीने से अरुचि हो गयी है. पिताजी भी उनकी हालत देखकर परेशान हो गये हैं. 

Thursday, March 17, 2016

स्वप्न में भूचाल


आज नन्हे का जन्मदिन है, सभी के फोन आये. दो दशक पूर्व आज ही के दिन वह उसकी कोख से जन्मा था, उसके जन्म से पूर्व जून और वह कितनी कल्पनाएँ किया करते थे तब वे आज से बिलकुल अलग थे, वक्त के साथ सब कुछ परिवर्तित होता ही है. वह छोटा था उस समय की कितनी बातें याद हैं पर उसे वर्तमान में जीना है, उसका आज देखना है. फोन किया तो उठ गया, आवाज उनींदी सी थी, आज की पीढ़ी को पता नहीं क्या हो गया है. तमस वातावरण में बढ़ रहा है तो लोगों की सोच भी बदल गयी है. मूल्य बदल रहे हैं. वह अपनी बात ही करे तो बेहतर होगा, अभी भी गले व नासिका में विकार है. कल रात कई दिनों बाद आम खाया, पर उससे बढ़ गया लगता है या जो भीतर था बाहर निकल रहा है. कल दोपहर को एक स्वप्न देखा, भूचाल आ रहा है, सब कुछ नष्ट होने वाला है, भीतर कौन है जो स्वप्न रचता है उन्हें जगाने के लिए वह कैसी-कैसी कल्पनाएँ करता है, उनका मन या बुद्धि या इनसे परे आत्मा ? रात भी सद्वचन सुनकर सोयी थी तो नींद में ध्यान का अनुभव हुआ. जून इतवार को आएंगे तब तक वह देर तक जग के पढ़ सकती है या कुछ लिख सकती है, सुन या देख सकती है अर्थात पूरी आजादी ! एक वक्त था जब वह उनके जाने पर आँसू बहाती थी. जीवन में सद्गुरू का पदार्पण जमीन-आसमान का फर्क ला देता है. आज शाम को सत्संग है. सुबह 9x पर सद्गुरू को सुना. ‘पतंजलि योग सूत्र’ पर बोलते हुए उन्होंने कहा, भीतर जोश व उत्साह की कमी ही मानसिक तनाव का कारण है. वे जड़ जैसे हो गये हैं, संबंधों में भी एक ढीलापन आ गया है. एक साधक को अपने भीतर की भावनाओं में सच्चाई व तीव्रता को महसूस करना आना चाहिए तभी वह उसके पार जा सकेगा !


आज भी गला पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, जून ने कहा, फोन पर उसकी आवाज भारी लग रही थी. प्रज्ञापराध ही उसकी इस हालत का कारण है. सुबह डायरी खोली थी कि ससुराल से पिताजी का फोन आ गया, वह उदास थे, वैसे तो इस दुनिया में कौन ऐसा है जो पूर्ण प्रसन्न हो, पर जब कोई फोन पर बात करते-करते ही रुआंसा हो जाये या बात न कर पाए तो बात कुछ गंभीर है, माँ ने पूछा तो उन्हें भी थोडा-बहुत बताया, तब से वह भी कुछ गम्भीर हो गयी हैं. आज धारावाहिक की जगह भगवान की चर्चा सुनती रहीं, जो दुःख ईश्वर की ओर ले जाये वह सार्थक है. इस समय मौसम बहुत अच्छा है, माली बगीचे में काम कर रहा है, माँ टहलने गयी हैं. उसे आत्मा ने दो बार सचेत किया, दोपहर को कुछ सुनते-सुनते सो गयी, ठीक एक बजे किसी ने जगाया, देखा तो बाहर उसका विद्यार्थी आ गया था. कल गैस पर खीर रखी थी, जलने से ठीक एक क्षण पहले किसी ने याद दिलाया, भीतर कोई है जो हर पल नजर रखे है. वह सुह्रद है, वही सत्मार्ग पर जाने की प्रेरणा देता है. वह सत् है चित् है और आनन्द स्वरूप है. उसके होते किसी बात का भय नहीं है. आज भी टीवी पर सत्संग सुना, एक से एक सुंदर विचार सुनने को मिलते हैं, हृदय श्रद्धा से झुक जाता है, संत उस दिव्य परमात्मा की साक्षी देते हैं. संतों का जीवन एक प्रमाण है पर लोग फिर भी नहीं देख पाते. ईश्वर की कृपा होती है तभी संत की वास्तविकता प्रकट होती है.

Friday, December 18, 2015

शरद का उत्सव


कैसी अजीब सी गंध कमरे में भर गयी है. जिसका स्रोत पता नहीं चल रहा है. भीतर भी कभी-कभी धुंध छा जाती है, कोहरा छा जाता है जिसका स्रोत अज्ञान के सिवा और क्या हो सकता है. ऐसे लगता है जैसे कुछ खो गया है, पर क्या है उनके पास जो खो सके और यदि खो भी जाये तो उस पर दुखी हुआ जाये इसकी क्या आवश्यकता है. क्योंकि अब खुद के सिवाय सभी कुछ एक दिन खो ही जाने वाला है. खुद तो वे ही हैं, वह खो नहीं सकता, बल्कि वह खो जाये तो बात बन जाये जो जन्मों से बिगड़ी हुई है ! कैसी जड़ता छा गयी है, कुछ ऐसा हो भीतर चेतना खिल जाये !

पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली. सुबह बीतती है ध्यान व पढ़ने में, दोपहर को पढ़ना-पढ़ाना. शाम को टीवी, टहलना और बस सारा दिन बीत जाता है. जून पिछले हफ्ते बृहस्पति वार को लौटे तब से व्यस्तता थोड़ी सी बढ़ी है, पर इससे पहले बुधवार को भी नहीं लिख पाई थी. आज वर्षा हो रही है, कल तेज धूप निकली थी, जैसे प्रकृति में परिवर्तन होता रहता है, वैसे ही मन का मौसम है, पर वह आकाश जिसमें परिवर्तन होता दीखता है, एक सा है ऐसे ही वह आत्मा जिसमें मन टिका है, सदा एक सा है, वे वही चिदानन्द आत्मा हैं, सो उन्हें मन के बदलते मौसम से परेशान होने की क्या जरूरत है. मनसा-वाचा-कर्मणा वे जो भी क्रिया करते हैं, उनके लिए व सभी के लिए हितकर हो !

आज सुबह साढ़े चार पर उठी, सभी आवश्यक कार्य किये. जून सुबह छह यूरोपियन देशों के बारे में आवश्यक सूचनाएं लाये हैं, जिन्हें पढकर उन देशों के बारे में जानकारी तो प्राप्त करनी ही है एक लेख भी लिखना होगा, जो जालोनी क्लब की पत्रिका में छपेगा जिसके हिंदी भाग की जिम्मेदारी उसे दी गयी है. टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. वह कह रहे हैं, मानव जहाँ है परमात्मा वही  हैं, साधक अपने से दूर होता है परमात्मा से दूर नहीं हो सकता. आज सुबह सद्गुरू को भी शरद उत्सव में भाग लेते देखा, समाधि में लीन हो गये थे, उनके अंग विशिष्ट मुद्रा में स्थिर हो गये थे. अद्भुत रस का प्राकट्य हो रहा था. कोई कितना मौलिक है, प्रमाणिक है, इसका पता चले तो यह भी ज्ञान होता है कि परमात्मा कितना अन्तर में प्रकट है !

पूजा और विजयादशमी का उत्सव समाप्त हो गया. आज सुबह समय पर उठी, कोई ऐसा स्वप्न जो याद रहे कल रात नहीं देखा. पिछले दिनों एक स्वप्न देखा था जिसमें एक रास्ते पर चलते-चलते एक मधुमक्खियों का छत्ता तथा हजारों मधुमक्खियाँ दिखीं, जिनसे घिरने की बाद भी शरीर पर कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि शरीर आत्मा का था. हवा की तरह हल्का और पारदर्शी. उड़ता था वह तन हवा में छत तक पहुंच कर नीचे उतर आता था. कितना अद्भुत स्वप्न था. वह आत्मा है यह भाव दृढ़तर होता जा रहा है. भीतर कितनी शांति छाई रहती है जैसे सारी दौड़ समाप्त हो गयी है. क्योंकि वह परमात्मा हर क्षण हर स्थान पर सदा ही साथ रहता है. वे उसे महसूस नहीं कर पाए क्योंकि वे सदा उसे बाहर खोजते थे, जबकि वह भीतर था और सदा रहेगा.


जून दिल्ली गये हैं, परसों लौटेंगे. कल क्लब में मीटिंग है. आज शाम को रिहर्सल के लिए जाना है, इस बार उनके एरिया का कार्यक्रम है. उससे पहले एक सखी आएगी सासु माँ से मिलने. दिन ऐसे बीत रहे हैं जैसे किसी की प्रतीक्षा हो, हर वक्त उस एक की प्रतीक्षा तो रहती ही है. उस ब्रह्म की, उस तत्व की, उस परम सत्य की, उस ज्ञान की, उस परम शांति की.. जिसकी झलकें तो जाने कितनी बार मिली हैं पर अब भी मन तो बना ही हुआ है, वह विकारों से मुक्त भी कहाँ हुआ है ! गुरु का ज्ञान ही उस सत्य की पहचान कराएगा. गुरु पहले परम अज्ञानी बनाता है तभी परमात्मा का ज्ञान फूटता है.   

Friday, July 31, 2015

अनित्य- मृदुला गर्ग का उपन्यास


इस वर्ष उस यह नीले रंग की सुंदर डायरी मिली है. मन कई भावनाओं से भरा है. नये वर्ष के लिए कई संकल्प पिछले कई दिनों से उमड़ते-घुमड़ते रहे हैं. जीवन कितना अद्भुत है, कितना सुंदर तथा कितना भव्य ! कितना अनोखा है सृष्टि का यह चक्र ! मन कभी आश्चर्य से खिल जाता है कभी मुग्ध हो जाता है उस अनदेखे परमात्मा की याद आते ही उसके लिए श्रद्धा से भर जाता है. इसकी खुशबू को वे अपने भीतर समोते हैं, इसके रस को पीते हैं, इसकी नरमाई तथा गरमाई को महसूसते हैं. वे कितने भाग्यशाली हैं, भीतर एक संतोष का भाव जगता है. इस सुंदर प्रकृति को बिगाड़ने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. जीवन की कद्र करनी है, जीवन को खत्म करने का उन्हें क्या अधिकार है ? नये वर्ष के प्रारम्भ में मन क्यों आतंक का शिकार हुए लोगों की तरफ जा रहा है. मानव के भीतर देवत्व भी है और पशुत्व भी. उसने संकल्प लिया कि अपने भीतर के जीवन को सुन्दरतम करेगी !  
इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं, आशा पढ़ने आई है. उसने कुछ देर पूर्व सद्गुरु को पत्र लिखा, पिछले वर्ष फरवरी में उन्हें पत्र लिखने का जो क्रम आरम्भ किया था, उसमें आजकल व्यवधान पड़ने लगा है. समय कहाँ चला जाता है पता ही नहीं चलता. आजकल लगभग हर समय उसे अपने लिए कुछ करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती. देह को स्वस्थ रखने के लिए उसे समय पर भोजन, व्यायाम आदि देना तथा परमात्मा के प्रति कृतज्ञता जाहिर करने हेतु पूजा, शास्त्र अध्ययन, घर के आवश्यक कार्य के बाद जो भी समय बचता है वह भी पढ़ने-लिखने में ही जाता है. जिससे मन भी स्वस्थ रहे तथा बुद्धि को जंग न लगे.
आज वह बहुत खुश है. लगता है वह फरवरी में बंगलुरु जा सकती है. जून उसकी टिकट के लिए प्रयास कर रहे हैं. सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह ट्रेन से जा रही हैं, वह चाहे तो उनके साथ जा सकती है. उसे लगा यह गुरू कृपा है, उसने प्रार्थना की कि जून मान जाएँ, उन्होंने फ़िलहाल तो मंजूरी दे दी है. भविष्य में क्या लिखा है कौन जानता है ? वह नन्हे से भी मिल सकती है एक दिन के लिए. आज क्लब में मीटिंग है, वह कुछ किताबें लेकर जाएगी. लॉन में प्रकृति के सान्निध्य में बैठकर मन कैसा हल्का हो गया है. एकात्मकता का अनुभव यहीं होता है. ऊर्जा जैसे मुक्तता का अनुभव करती है.
आज बापू की पुण्य तिथि है. पिछले चार दिनों से मन पुस्तक के पन्नों में खोया था, मृदुला गर्ग का लिखा उपन्यास ‘अनित्य’ कल खत्म किया. इस उपन्यास में गांधीजी का जिक्र कई जगह हुआ है. उनको आदर्श मानने वाले कितने ही व्यक्ति स्वयं को छला हुआ मानने लगे जब उन्होंने ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ वापस ले लिया. कई उनके प्रयोगों के आलोचक भी थे. पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि साधारण मानव एक महामानव का मूल्यांकन कैसे कर सकता है, और ही मिट्टी के बने होते हैं वे लोग जो महान कहलाते हैं, साधारण लोगों से भिन्न होती है उनकी सोच और दृष्टि.

वसंत का आगमन हो चुका है. हवा में ठंडक कम है. अभी सुबह के दस भी नहीं बजे हैं धूप तेज हो गयी है. कल रात स्वप्न में वह सभी को बता रही थी कि मैं ‘आत्मा’ हूँ, यह बात कहने से प्रकट नहीं होगी, उसके आचरण से प्रकट होनी चाहिए. ध्यान की अवधि बढ़ानी चाहिए ऐसे प्रेरणा भीतर से उठी है.   

Thursday, July 23, 2015

आंवले का वृक्ष


आज कई दिनों बाद डायरी खोली है. यह तो निश्चित है कि जो पन्ने खाली रह गये हैं, वे भी भर ही जायेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’... प्रभु के बारे में यदि लिखना हो तो शब्द अपने आप भीतर से झरते आते हैं. वह प्रभु, परमेश्वर, ईश्वर, ब्रह्म, कृष्ण, राम, शंकर या पारब्रह्म किसी भी नाम से उसे पुकारो वह जितना-जितना समझ में आता जाता है उतना ही उतना रहस्यमय भी होता जाता है. वही भीतर है वही बाहर है. टीवी पर राम कथा आ रही है. ईश्वर का रस जिसे भीतर से मिलने लगता है, उसके लिए यह जगत अपनी सत्ता ईश्वर रूप में रखता है. संत कह रहे हैं कि ‘तुलसी’ प्रभु को प्रिय है. तुलसी तथा निंब इन दोनों का औषधि रूप में भी महत्व होता है. बगीचे में आंवले के वृक्ष के नीचे एक क्यारी बनवाई है, उसमें फूल लगाने हैं. आज शेष फूलों के बीज भी डालने हैं. कल बालों में मेहँदी लगाई थी एक महीने बाद, अब लगता है दो हफ्तों के अन्तराल पर ही लगानी होगी.

पिछले दो दिन फिर कुछ नहीं लिखा, इसे प्रमाद भी कह सकते हैं और अति व्यस्तता भी. उपन्यास पढ़ने को एक साधक की दृष्टि में प्रमाद ही कहा जायेगा. john की जिंदगी के बारे में पढ़कर इतना ज्ञान हुआ कि यह जीवन क्षणिक है, इतना ज्ञान तो शास्त्रों के अध्ययन से भी होता है. मन को जहाँ साधक खत्म करता जाता है वहाँ उसकी आत्मा मुखर होती जाती है पर उसने आत्मा को दबाकर मन को सुख देने के लिए ही उपन्यास में इतना समय लगाया, खैर जो हो चुका है वह हो चुका. कल सत्संग भी ठीक-ठाक हो गया. उन्होंने aol के लिए कुछ योगदान भी दिया, इतने बड़े यज्ञ में उनकी छोटी सी आहूति. कल चने व सूजी का हलवा खाया सो आज पेट में कुछ हलचल है. आज सुबह से वक्त का पूरा उपयोग किया है, लेकिन सारे कार्य तो शरीर के स्वास्थ्य और मन की शुद्धि के लिए ही हुए. सेवा का तो कोई कार्य नहीं हुआ, अभी दिन शेष है, जो भी सम्मुख आएगा, सहर्ष उसे ग्रहण करना है. आज बड़ी ननद की छोटी बेटी का जन्मदिन है, उसे फोन करना सुबह वे भूल गये. परमेश्वर को सुबह याद किया उठते ही तो पवनपुत्र हनुमान का स्मरण हो आया. उनकी कृपा से सुबह-सुबह समुद्र तट पर बैठे श्रीराम के दर्शन हुए. कैसी अद्भुत घटना है यह, उनके भीतर ही सभी कुछ है, उस दिन नदी, पानी, रस्ते सब इतने स्पष्ट दिख रहे थे !


आज सुबह चार बजे से पूर्व ही उठ गयी थी. मन था कि विचारों से मुक्त ही नहीं हो रहा था. नींद में भी उसे पता चलता रहता है कि मन खाली है या विचार चल रहे हैं. कुछ देर ध्यान का प्रयास किया पर कोई बेचैनी थी भीतर. जब तक मन सारी चेष्टाएँ त्याग नहीं देता तब तक निर्विचार नहीं हो सकता. हर चेष्टा एक न एक विचार को जन्म देती है. उन्हें तो सब छोड़कर मात्र साक्षी भाव में जीना है. एक बार यदि साक्षी भाव में आ गये तो सारी चेष्टाएँ होती भी रहें बाधक नहीं होंगी, बाधा तभी आती है जब मन स्वयं सभी कुछ करना चाहता है. ‘कीत्या न होई, थाप्या न जाई आपे आप सुरंजन सोई’ ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव ही करना है, कहीं से लाना नहीं है. वह करने से नहीं, न करने से प्रकट होता है. बाद में क्रिया के बाद मन खाली हो गया. क्रिया के दौरान भी कई बार भटका, पर बोध रहा. संगीत अभ्यास के समय मन एक पुलक से भरा हुआ था जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, वे चाहें तो तत्क्षण उन्हें पा सकते हैं. मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोया रहता है और जो निधि सहज ही पा सकता है जन्मभर उससे वंचित ही रह जाता है. सद्गुरु का आना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है, वे सुख स्वरूप परमात्मा को पहचानने लगते हैं !         

Wednesday, July 15, 2015

कर्नाटक की ओर


पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. पहले की तरह लिखना अब नियमित नहीं रह गया है. जून के आने के बाद सम्भवतः नियमित हो सके. सुबह के काम के बाद सीधे ही ध्यान के लिए बैठ जाती है. टीवी पर योग कार्यक्रम देखकर आसन करने में भी थोड़ा अधिक समय जाता है, पर उसका प्रभाव भी साफ़ देखने में  आ रहा है. आजकल वह काफी स्वस्थ अनुभव कर रही है. नन्हा और जून इस समय कर्नाटक जाने वाली गाड़ी में बैठे हैं. वे काफी दिनों से सफर में हैं. नन्हे का सफर तो कल समाप्त हो जायेगा जब उसका दाखिला हो जायेगा. पर जून अभी एक हफ्ते बाद घर आएंगे. माँ को सर्दी लगी है, जुकाम हो गया है एसी में सोने के कारण. उस दिन नैनी ने कहा था कि बूढ़े लोग बच्चे की तरह हो जाते हैं, उन्हें अपने भले-बुरे का भी ज्ञान नहीं रहता. वे कभी-कभी ऐसी ही बातें भी करती हैं, बिलकुल बच्चों की तरह. लेकिन आमतौर पर वे स्वस्थ रहती हैं, उनकी दिनचर्या भी यहाँ रहके नियमित रहती है. उनके कारण किसी को कोई असुविधा नहीं होती, इस जगत में सभी को यदि ऐसे जीना आ जाये तो कोई शिकायत कभी भी न हो साथ-साथ रहते हुए भी अलग-अलग रहना ! नूना के लिए तो सारी स्थितियां समान हैं. वह अपने साथ रहती है अपने मन के साथ सो जगत के परिवर्तन का उस पर कोई असर नहीं पड़ता. उनके प्रति उसका व्यवहार और कोमल होना चाहिए कभी-कभी ऐसा उसे लगता है, शायद उन्हें भी लगता हो. वह उन्हें आत्मननिर्भर बनते हुए देखना चाहती है. हर समय दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. वैसे वह खुश रहती हैं पर थोड़ी सी अस्वस्थ होते ही घबरा जाती हैं. उसकी डायरी पुनः कुछ वर्षों जैसे होती जा रही है, क्या यह पतन की निशानी है ? जिन पन्नों पर ईश्वर चर्चा के अतिरिक्त और कुछ लिख ही नहीं पाती थी, वह अब सांसारिक बातों से भरे जाने लगे हैं. सम्भवतः इसका कारण यह हो कि अब उसे सभी के भीतर उसी आत्मा के दर्शन होते हैं. सभी उसे भगवान के मेहमान लगते हैं, जो भीतर है वही बाहर है. वही इस सृष्टि का कारण है, वह स्वयं ही सृष्टि हो गया है तो भौतिक और आध्यात्मिक के बीच का भेद भी अब समाप्त हो गया है. ईश्वर करे यही कारण हो क्योंकि पुनः गड्ढे में गिरने का तो उसका इरादा है नहीं !


आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ. सभी के भीतर एक ही चेतना है यह बुद्धि के स्तर पर तो जानते हैं वे पर जब तक यह अनुभूति के स्तर पर न जाना जाये तब तक इसका फल नहीं मिलता. ध्यान में उसे जड़-चेतन सभी के भीतर एक चेतना का अनुभव हुआ. वह ही पानी की लहर बन गयी वह ही हवा का झोंका ! वह ही नाव बन गयी और वह ही नाविक..जिस वस्तु या व्यक्ति की कल्पना वह करती उसके भीतर स्वयं को ही पाती. उनकी चेतना कितनी असीम है, दूर गगन के पार अनंत ब्रह्मांडों में भी व्याप्त है उनकी चेतना. वे सदा थे सदा हैं सदा रहेंगे, यह चेतना अजर है, अमर है,  नित्य है, शाश्वत है, यह असीम है ! सद्गुरु की कृपा उस पर बरस रही है. मन ध्यानस्थ रहता है. ईश्वर से जुड़ने के बाद जगत से थोड़ा ही प्रयोजन रहता है. इससे शरीर चलता है. शरीर के बिना आत्मा कैसे स्वयं को व्यक्त कर सकती है ?  

Friday, July 10, 2015

भविष्य की दुनिया


आज उसने सुंदर वचन सुने, मन को मैला करने का स्वभाव यदि बनाया तो संवेदना दुखद होगी और फल भी दुःख ही होगा. निर्मल चित्त से किया गया कर्म सुख का कारण बनेगा. सत्कर्म करते हुए मन मुदित होता है, यदि मुदिता का स्वभाव ही बनता जाये तो फल भी मोद ही मोद के रूप में प्राप्त होगा.  

आजकल रोज सुबह डायरी नहीं खोल पाती, सुबह से शाम हो जाती है और फिर नया दिन. आज उनके यहाँ सत्संग है. नन्हा है इसलिए कमरा खाली करने में तथा पुनः सामान रखने में सुविधा होगी. जब भीतर से प्रेरणा मिलती है तब बाहर के सारे कार्य अपने—आप सधते चले जाते हैं. जीवन में एक निश्चिंतता आ जाती है, बेफिक्री और निडरता भी. तब वही होता है जो उचित होता है. जैसे अरविन्द घोष को अदालत में सारे लोग कृष्ण ही दिखाई देने लगे थे वैसे ही तब जगत में सभी के भीतर उस परमात्मा का दर्शन होने लगता है.


आषाढ़ का प्रथम दिन, नन्हा आज तिनसुकिया गया था, वहीं से डिब्रूगढ़ चला गया है, अभी कुछ देर पहले उसका फोन आया. जून का आज प्रेजेंटेशन है, दोनों देर शाम तक घर पहुंचेगे. आज सासू माँ का जन्मदिन है, पिछले वर्ष भी इसी दिन मनाया था. देखते-देखते समय बीत जाता है. नन्हे को कालेज जाना है, अगले वर्ष वह आज के दिन सेकंड ईयर का विद्यार्थी होगा, एक दिन पढ़ाई खत्म करके इंजीनियर बन जायेगा. बच्चे बहुत आगे की सोचते हैं, माता-पिता उनके जैसे बनने का प्रयत्न करें तो ठीक है पर वे उनकी तरह बनें ऐसी अपेक्षा करना मूर्खता ही होगी. उनके शरीर वे जरूर देते हैं पर उनके विचार उनके अपने हैं. वे भी आत्मा हैं और वे अपने आप में पूर्ण हैं जैसे माता-पिता आत्मा होने के नाते पूर्ण हैं. उनके विचारों में भविष्य की दुनिया है. समय सदा आगे बढ़ता है, पीछे नहीं लौटता. समय बदल रहा है, समय के साथ जो स्वयं को नहीं बदले पीछे रह जाता है. कुछ वर्षों बाद उनका जीवन भी पहले से अलग होगा. वे साधना में परिपक्व हो जायेंगे. हो सकता है उन्हें ईश्वर का अनुभव भी हो जाये, अभी जो कुछ भीतर अनुभूत होता है वह भी कुछ कम नहीं है. एक अजस्र आनंद का स्रोत भीतर बहता रहत है. जगत से उतना ही प्रयोजन रह गया है जितना जरूरी हो लेकिन स्वयं सुखी हो जाना ही काफी नहीं है, उनके आस-पास भी उस शांति की धारा का प्रभाव फैलना चाहिए जो वे अपने भीतर अनुभव करते हैं. कभी-कभी ध्यान में ऐसे अनुभव होते हैं जिनका उनके वर्तमान जीवन से कोई संबंध नहीं होता, सम्भवतः वे उनके पूर्व जीवन से संबंधित होते हैं. तब ज्ञान होता है कि इस शरीर से कैसा मोह, न जाने कितने शरीर वे धारण कर चुके हैं, हर बार वही कहानी दोहराई जाती रही है, बस, अब और नहीं, अब और इस झूले में नहीं बैठना जिसका एक सिरा जन्म फिर दूसरा नीचे मृत्यु की ओर ले जाता है. इसी जन्म को अंतिम जन्म बनाना है. मृत्यु से पूर्व ही आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना है, वे अपने स्वरूप में टिक तो जाते हैं पर यह स्थिति सदा नहीं बनी रहती. कभी मन भूत में खो जाता है कभी भविष्य में. अब भी झुंझला जाता है मन, भीतर का सूक्ष्म अहंकार ही क्रोध बनकर बाहर आता है, जब तक अहंकार शेष है, पर्दा बना रहेगा.

Thursday, June 25, 2015

जस्सी की दुनिया


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, सुबह का वक्त नियमित कार्यों में बीत गया और सप्ताहांत होने के कारण दिन भर अलग तरह की व्यस्तता रही. आज ससुरजी वापस चले गये, नन्हा और जून उन्हें छोड़ने गये हैं तथा उनका पुराना फ्रिज ट्रेन में घर के लिए बुक करवाने भी, इसी महीने उन्होंने नया फ्रिज लिया है फ्रॉस्ट फ्री ! माँ उनके साथ रहेंगी. उनका प्रिय धारावाहिक टीवी पर आ रहा है, जैसे उसका प्रिय है जस्सी, जो अब रोचक मोड़ पर पहुंच चका है. नन्हा और दो हफ्ते साथ रहकर कॉलेज जाने वाला है. उसे एक अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया है, जो जिसका हकदार होता है उसे ही वह वस्तु मिलती है. वैसे वह आत्मनिर्भर है, जीवन में तरक्की करेगा. दुनिया जिसे तरक्की मानती है वैसी तरक्की न भी करे पर वह खुद की तलाश में लगा है. इन्सान का जीवन खुदा ने इसलिए बनाया है कि वह खुद को ढूँढे, खुदी के पीछे ही खुदा है जो खुद से मिल गया वह खुदा को भी पा ही लेता है. जून उससे बेहद प्यार करते हैं, इसे मोह ही कहा जायेगा. वे उसे कभी किसी तकलीफ में नहीं देख सकते, लेकिन तकलीफ पाए बिना कोई नेमत भी नहीं मिलती है. कल शाम को घर में कितनी चहल-पहल थी. सभी पिताजी से मिलने आये थे, आज चुप्पी छायी है. जीवन इसी उतार-चढ़ाव का नाम है, उन्हें इसका साक्षी बनना है !

इस क्षण को देखे तो सिर में हल्का भारीपन है, वर्षा हो रही है, नन्हा सो रहा है, जून कुछ देर पूर्व घर आकर ऑफिस गये हैं, आज से पांच दिनों तक उनकी ट्रेनिंग है, दोपहर के भोजन के लिए घर नहीं आयेंगे. टीवी पर शहनाई वादन हो रहा है. नैनी कपड़े धो रही है. उसके सिर के भारीपन का एक कारण है मानसिक द्वंद्व, उसे तो द्वन्द्वातीत होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है फिर यह क्या ? यह है असहिशुष्णता, किसी अन्य को सहन न कर सकने की प्रवृत्ति, ‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय’ उसका मन एकाकी रहना चाहता है, विरक्त, दीन-दुनिया से परे, उसे किसी भी वस्तु की न तो कामना है न ही परवाह, पर समाज ऐसे व्यवहार को अच्छा नहीं मानता. एकाकी व्यक्ति से समाज को डर लगता है. वह उसे भीड़ में वापस लाना चाहता है. उसके मन का दर्द तन में भी प्रकट होने लगा है. मन में जो भी घटता है उसका प्रतिबिम्ब तन पर पड़ता ही है. मन की थोड़ी सी नकारात्मकता भी शरीर के स्रावों पर काफी प्रभाव डालती है. भीतर जो कुछ भी घटता है उसका कारण भी भीतर होता है. वह जो भी सोचती है, कहती है अथवा करती है, उसका परिणाम भीतर पड़ता है. इधर-उधर के दर्द सब उसी का परिणाम हैं !


Wednesday, June 17, 2015

बोस्टन की बर्फबारी



आज बहुत दिनों के बाद डायरी का चिर-परिचित पृष्ठ उसके सम्मुख है. मौसम ठंडा है बदली भरा. जून दो दिन की छुट्टी के बाद आज दफ्तर गये हैं. उन्हें घर आये तीन-चार दिन हो गये हैं, अभी तक पूर्व दिनचर्या आरम्भ नहीं हो पायी है. पिछले महीने के मध्य में वे यात्रा पर निकले थे, एक महीने बाद वापस आये तो उसका गला ठीक नहीं था, जो अभी तक भी पूरा ठीक नहीं है. यहाँ इतने दिनों के बाद आकर सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा है. सम्भवतः सब कुछ वही है उनका मन ही बदल गया है. पहले सा नहीं रहा. ह्यूस्टन से वे तीन दिनों के लिए बोस्टन गये थे, जहाँ जून के मित्र और उसकी पत्नी ने स्वागत किया. मौसम बहुत ठंडा था, जितने समय वे वहाँ रहे, बर्फ गिरती रही, पहली बार बर्फ से इतने निकट से आमना-सामना हुआ था, वे मंत्रमुग्ध से खिड़की से देखते रहते, बाहर भी गये तो ढेर सारे वस्त्र पहन कर तथा उन लोगों के दिए जूते पहन कर. बोस्टन से वे लन्दन गये जहाँ तीन दिनों में मुख्य-मुख्य स्थान देखे. वहाँ भी ठंड बहुत ज्यादा थी पर बर्फ नहीं गिर रही थी. लन्दन से दिल्ली पहुंचे तो सब कुछ कितना अलग लग रहा था, वहाँ से एक दिन के लिए पिताजी से मिलने घर गये और फिर वापस असम. नन्हे की परीक्षाओं में बहुत कम समय रह गया है. अगले महीने उसके इम्तहान है. अभी-अभी उसे देखा तो पढ़ते-पढ़ते आँखें बंद थीं. जब उसने कहा, सो जाये, तो जग गया, और सीधे होकर बैठ गया.
आज बहुत दिनों बाद गुरु माँ को सुना, कह रही थीं कि बिजली की तार पर जैसे प्लास्टिक की परत होती है और फिर कपड़े की, छूने पर कुछ भी महसूस नहीं होता इसी प्रकार मन पर कितनी परतें चढ़ी हैं तभी तो ईश्वर का नाम लेते रहने पर भी कुछ नहीं होता. वे उस प्रभु को दूर-दूर से ही याद करते हैं, पास आने से डरते हैं क्यों कि ऐसा करने पर अभिमान को तज देना होगा.

एक लम्बे अन्तराल के बाद आज डायरी खोली है. आज सुबह वह हिंदी पुस्तकालय गयी थी. पिछले महीने उसको सर्दी लगी थी और अब एक-एक करके घर में सभी को जुकाम हो रहा है. मौसम हर दिन नये रूप में आता है, कभी तेज-गर्मी तो कभी बरसात के बाद की ठंड. आज सुबह से ही शीतल हवा चल रही है. वह हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा डा. राधाकृष्णन की पुस्तकें लायी है. अध्यात्म के अतिरिक्त और कोई विषय नहीं सुहाता, इसी जन्म में मुक्त होना चाहती है. जीवन दुखों का घर है, मन को कितने-कितने विकार तपाते हैं. तन को रोगादि, तथा जरा व मृत्यु तो हैं ही. वह दुखों से भागकर ही मुक्ति चाहती है, ऐसा भी नहीं है, वह उस अवस्था का अनुभव करना चाहती है जो शब्दातीत है, जहाँ सद्गुरु पहुंचे हैं. उसकी साधना में कभी-कभी विघ्न पड़ते हैं पर जैसे सहज भाव से चलते हुए नदी अपनी मंजिल पा लेती है वैसे ही उसकी साधना भी फलवती होगी. सद्गुरु का ज्ञान उसका सबसे बड़ा सहारा है, ईश्वर का प्रेम भी उसमें मिल जाता है और मन का विश्वास तथा हृदय की श्रद्धा और आस्था भी उसमें सम्मिलित है, उसे पथ दिखाने के लिए इतने साधन तो हैं फिर उसके परिजन जो सदा उसका सहयोग करते हैं, वह अपने ज्ञान की परीक्षा परिवार में ही कर सकती है. हृदय कितना निर्मल हुआ इसकी परख व्यवहार से ही होती है.

Monday, January 19, 2015

नरेंद्र कोहली का "महासमर"


पिछले चार दिनों से डायरी नहीं खोली, तभी तामसिकता ने अपनी जड़ें गहरी कर लीं. आध्यात्मिक मार्ग पर जितना ऊंचा चलो गिरने का भय उतना ही अधिक होता है. आज सुबह भी अलार्म सुनने के बावजूद रजाई उठाने का छोटा सा कार्य हाथों ने नहीं किया क्योंकि मन अलसाया था. तन गर्मी चाहता था. देह को इतना सुविधाभोगी बनाना और मन को प्रमाद्युक्त रखना तो नीचे गिरने का साक्षात् प्रमाण है, फिर पिछले चार दिनों से सत्संग भी ठीक से नहीं सुना. डायरी में कुछ लिखा नहीं अर्थात मनन-चिन्तन भी नहीं हुआ, बल्कि पठन हुआ. पिछले दो-तीन दिन नरेंद्र कोहली जी की ग्रन्थमाला ‘महासमर’ का प्रथम भाग पढ़ती रही. महाभारत के पात्रों में कितना काम-क्रोध-लोभ-मोह भरा हुआ है, सम्भवतः उसी का प्रभाव अचेतन मन पर पड़ता रहा हो, कुछ भी हो, ये लक्षण उत्तम नहीं हैं. कल योग शिक्षक से भी भेंट हुई, क्रिया में सु-दर्शन भी हुए. आज सुबह उठाने के लिए उसने प्रार्थना भी की थी. स्वप्न में नीली आकृति भी देखी पर जब मद का राक्षस बैठ हो तो दैवी शक्तियाँ भी क्या करें. उसके पापों का ढेर जितना बड़ा है, पुण्यों का संचय उतना ही कम है, सो पाप प्रबल हैं किन्तु गुरू के चरणों में प्रार्थना करने से उनकी कृपा मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं फिर उसके आराध्य तो गुरुओं के परम गुरू कृष्ण हैं. इस क्षण से हर पल सजग रहना होगा ताकि भक्ति मार्ग की ओर बढ़ते कदम ठिठके नहीं, पीछे तो हरगिज न आयें ! आज नन्हा भी घर पर है, पिछले कुछ दिनों से वह ज्यादा गम्भीर हो गया है परीक्षा की तैयारी ठीक चल रही है, स्कूल व घर दोनों जगह ही. गणित का अभ्यास उतना ही करता जितना करना चाहिए, लेकिन ज्यादा कहने का कोई लाभ नहीं. वह स्वयं समझदार है. वह उन्हें हर हाल में प्रिय है.

आज संगीत की परीक्षा का फार्म भर दिया. अगले हफ्ते शुल्क जमा करना है. मई में परीक्षा होगी. कल वे हिंदी पुस्तकालय गये. श्रील प्रभुपाद की ‘भगवद गीता’ लायी है, वहाँ भागवद के भी सभी भाग हैं. ‘महासमर’ का प्रथम भाग भी वहीं से लायी थी. महाभारत पढ़ने के लिए योग शिक्षक ने कहा था सो पढ़ने का अवसर मिल गया है. भगवद गीता अमूल्य ग्रन्थ है. इसमें अभय को जीवन में प्रमुखता सड़ने का संदेश है. भयभीत व्यक्ति मृत्यु से पहले ही मर जाता है. भय ही व्यक्ति को जीवन में कई समझौते करने पर विवश करता है. निर्भीक व्यक्ति को कोई झुका नहीं सकता.

आज क्रिसमस है. एक सखी को शाम को चाय पर बुलाया है. फूलों से उसे प्यार है और उनके लॉन में ढेरों फूल खिले हैं. वह अपनी पुस्तक भी उसे देना चाहती है लेकिन यह सब करते हुए अहंकार की हल्की सी भावना भी नहीं आनी चाहिए. नहीं आएगी क्योंकि यह सब उसने कहाँ किया है. प्रकृति ने उससे करवाया है, इसमें उसका कोई योगदान नहीं है.

आज दोपहर उन्होंने aol के बच्चों के कोर्स ‘आर्ट एक्सेल’ की एक शिक्षिका को खाने पर बुलाया है. aol से उनका नाता धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है. मौसम आज सुहावना है. महासमर में कल पहली बार कृष्ण का उल्लेख हुआ, मन जैसे भावों से भर गया. उसका नाम अंतर में कैसी शांति भर देता है.



Monday, November 3, 2014

नेपाल के राजा


नेपाल के राजा वीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या तथा उनके परिवार के अन्य कई सदस्यों सहित ग्यारह लोगों की हत्या का समाचार सुनकर कल बहुत दुःख हुआ, उनके ही पुत्र ने अपने विवाह को लेकर उठे विवाद के कारण गोली चला दी ऐसा पहले सुनने में आया, बाद में उसने स्वयं को भी गोली मार दी, पर गोली उसकी पीठ में लगी है. टीवी समाचारों में सुना, वे एक पढ़े-लिखे उच्च पदों पर रह चुके अपनी माँ के प्रति श्रद्धा रखने वाले राजकुमार थे, युवराज थे, भला ऐसा जघन्य कार्य क्यों करेंगे, अस्पताल में उनकी भी बाद में मृत्यु हो गयी है. उनके चाचा नागेंद्र को अब राजा बनाया गया है, जिनके अनुसार यह एक दुर्घटना थी पर इस पर विश्वास करना कठिन है. नेपाल की जनता के लिए यह दुःख सह पाना कितना कठिन होगा, उसे याद है इंदिरा गाँधी तथा राजीव गाँधी की मृत्यु पर भारत के लोग कितने दिनों तक संयत नहीं हो पाए थे. नेपाल में जनता सडकों पर उतर आई है इतने बड़े हत्याकांड को भुला पाना तो असम्भव है, पचा पाना कोई कम कठिन नहीं है, जब वह स्वयं को नेपाल की प्रजा की जगह रखकर देखती है तो काँप जाती है. यह दुःख बहुत गहरा है, इसके जख्म इतने गहरे हैं कि रह-रह कर उनमें टीस उठती रहेगी. ईश्वर के बंदे खुद ऐसी करनी करते हैं फिर सब कुछ उसी पर डाल देते हैं कि ईश्वर को यही मंजूर होगा !

कल डायरी नहीं खोल सकी, सुबह व्यस्त रही फोन पर बात करने में, दोपहर नन्हे को पढ़ाने में और शाम को वे एक मित्र के यहाँ गये. बाबाजी आज भक्ति पर बोल रहे हैं. भक्ति प्रेम का उच्च रूप है. स्नेह, प्रेम और श्रद्धा के अतिरेक का नाम ही भक्ति है. अलौकिक अनुराग का नाम ही है भक्ति ! सुबह से शाम तक जन्म से मृत्यु तक मनुष्य की दौड़ सुख के लिए होती है. मन का विकार रहित उल्लास या सुख ही भक्ति है ! उन्होंने बताया, भूताकाश, हृदयाकाश तथा चिदाकाश...तीन आकाश हैं, जो बाहर दिखाई देता है वह भूताकाश है, जो हर्षित अथवा उदास होता है वह हृदयाकाश है, जो इसे हर्षित अथवा उदास हुए देखता है वह चिदाकाश है, वहीं खुदा का बसेरा है जो हर वक्त प्रकट होने के लिए तत्पर है पर मानव ने इतने मोटे-मोटे पर्दे डाल रखे हैं उसके और ह्रदयाकाश के मध्य कि वह उसकी नजरों से दूर ही रहता है ! पिछले दिनों वह सात्विक भाव से दूर ही रही, राजसिक वृत्ति और कभी-कभी तामसिक वृत्ति भी प्रकट हो रही थी, आज पुनः ईश्वरीय कृपा से सत्संग सुनने को मिला और इसका ही प्रभाव है कि वह पुनः सद्भावना से युक्त है. पिछले दिनों कोई नई कविता भी नहीं लिखी, लिखने के लिए बैठी तक नहीं. आज भी वर्षा हो रही है, परसों रात को आरम्भ हुई तो थमने का नाम नहीं ले रही है. जून और उसका दोनों का वजन दो-दो किलो बढ़ गया है, उन्हें इस पर नियन्त्रण रखना होगा, अमूल दूध का ही असर जान पड़ता है.


कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं पड़ता, कुछ मिलने पर कुछ खो जाता है. सत्य मात्र ईश्वर है शेष सभी परिवर्तनशील है, कोई लाख इसे अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करता रहे पर उस चादर की तरह जो छोटी है, कहीं कहीं से प्रतिकूलता आ ही जाएगी, इसलिए समझदारी इसी में है कि अनुकूलता की चाह ही छोड़ दी जाये. आज गुरु माँ का प्रवचन प्रेरणादायक था उन्होंने कहा, संकीर्णता छोड़कर यदि कोई अपनी दृष्टि को विश्वव्यापी बना ले तब ईश्वर की आराधना करने के लिये कुछ छोड़ना नहीं पड़ेगा, जिसे छूटना होगा वह अपने आप ही छूटता चला जायेगा. यह सारा जहाँ ही तो अपना है जब तक वह इस दुनिया में है, दुनिया के किसी कोने में कुछ भी अच्छा या बुरा घटित हो किसी न किसी रूप में उसका असर तो पड़ता ही है. 

Monday, October 13, 2014

ब्लैक फारेस्ट केक


मानव हर क्षण अपनी ही मूर्खता का शिकार होता रहता है, जीवन का ढंग यदि सुंदर करना हो तो इस जीवन को प्रश्रय देने वाले से नाता जोड़ना है. चलते, फिरते उठते, बैठते उसका स्मरण बना रहे तो विवेक जाग्रत रहेगा. ज्ञान ही संतुलित होना सिखाता है. सुख की चाहना को त्याग दें तो दुःख से घबराएंगे नहीं.” ये सभी विचार आज सुबह उसने  ‘जागरण’ में सुने. सुनना, पढ़ना तो जारी है पर गुनना कभी-कभी ही हो पाता है और आदर्शों पर चलना, वह तो टेढ़ी खीर है. सुबह जब बाबा जी आये तो एक सखी का फोन आ गया, वह खुश थी, उसके पतिदेव को एक प्रेजेंटेशन के सिलसिले में दिल्ली जाना है, शायद उन्हें पुरस्कार भी मिले. जून जब लंच पर आये तो चौबीस पैकेट दूध के ले आये जैसे कि अगले चौबीस दिन का उन्हें पूरा भरोसा है यहाँ अगले पल की खबर नहीं...फिर उसे याद आया वे लोग तो अन्य सामान भी महीने भर का एक साथ ले आते हैं. पिछले हफ्ते ही उसका अपनी पुरानी डायरियों में से कविताएँ उतारने का कार्य पूर्ण हो गया था, अब नई रचनी हैं, हर दिन एक नई कविता जो भावपूर्ण भी हो और जिसमें अंतरात्मा का प्रकाश झलके. उस दिन उन्नीस साल पुरानी डायरी में सरसों के फूलों पर किसी कवि की बहुत अच्छी एक कविता पढ़ी. कल नैनी का ब्लाउज सिलकर दे दिया तथा साथ ही अपना एक पुराना भी. अज वह नाहरकटिया गयी है. वेलवेट का काला ब्लाउज उसने पहना था, बाहर निकलने पर अच्छा कपड़ा पहनने का उसे शौक है. पूसी अभी तक नीचे नहीं उतरी है, आज भी उसे खाना ऊपर ही दिया.

श्वास-श्वास में सुमिरन चलता रहे, सारी गांठे खुल जाएँ तो मन मुक्त आकाश मन विचरण करेगा, जीवन में सदा ही वसंत ऋतु बनी रहेगी. आज भी पिछले कई दिनों की तरह वर्षा हो रही है, रात भर मूसलाधार वर्षा हुई. कल रात की आंधी वर्षा में तो पूसी ने अपने बच्चों की रक्षा कर ली पर बिलाव से नहीं बचा पायी. रात को उसकी करुण पुकार तथा चीत्कार सुनाई दी थी. सुबह उसने आवाज देने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की, अभी भी वहीं बैठी है. नैनी के बेटे ने सीढ़ी पर चढकर दूध-रोटी दिया तो गुस्सा कर रही थी. इस समय कितना दुःख व क्रोध होगा उसके मन में. जून आज मोरान गये हैं. कल से नन्हे के स्कूल में बीहू का अवकाश शुरू हो रहा है. बैसाखी का उत्सव भी आ रहा है. कल रात उसने स्वप्न में फिर माँ को अस्पताल में देखा, वह बेहद कमजोर लग रही थीं. आज दोपहर को उसने नैनी को स्टोर की सफाई के लिए बुलाया है. इन छुट्टियों में बाकी सफाई भी करनी है. नन्हे के कमरे के पर्दों की धुलाई, ओवन, कम्प्यूटर, हारमोनियम आदि के कवर भी धोने हैं. अलमारियां ठीक-ठाक करनी हैं और बुक केस तथा शो केस भी साफ करने हैं. स्वच्छता पवित्रता की निशानी है, रहने का स्थान स्वच्छ हो तो रहने वालों का मन भी साफ-सुथरा रहता है. जैसे जून का मन है निर्विकार, उन्हें कभी किसी पर टिप्पणी करते कम ही देखा है. कुछ न करते हुए भी वह शांत रहे सकते हैं एक उसका मन है हमेशा किसी न किसी उधेड़बुन में लगा हुआ.

ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे ! अपने आत्मस्वरूप को व जान सके, यह जो संसारिक बुद्धि है जो ऊपर से ओढ़ी हुई है, उसे उतार फेंकें. आज नन्हा घर पर है, फरमाइश की है केक बनाने की, ‘ब्लैक फारेस्ट केक’ पहले भी एक दो बार बना चुके हैं वे. अभी एक सखी का फोन आया तो शाम को उसे आने का निमन्त्रण दे डाला, अब कोई केक की तारीफ करने वाला भी तो होना चाहिए. कल शाम वे स्वयं असमिया सखी के यहाँ गये थे, उसने पकौड़े, मूंगफली, पॉपकॉर्न और नमकीन के साथ चाय परोसी. उसकी बिटिया और बेटे से मिलकर ख़ुशी हुई. नन्ही सी बेटी बहुत प्यारी बातें करती है और बेटा बहुत अच्छी भावपूर्ण कविताएँ लिखता है English में. अभी अभी वे केक ओवन में पकने रख आये हैं. साढ़े दस हो चुके हैं, आज वह रियाज नहीं कर पायी, नन्हा जिस दिन घर रहता है, रूटीन बदल जाता है, अभी सुबह ही है और उससे बातें करके (उस समझाना टेढ़ी खीर है और एक एक काम के लिए कई-कई बार कहना भी ) जैसे सारी ऊर्जा चुक गयी है. नन्हे का यह साल बहुत महत्वपूर्ण है. कल से जून का दफ्तर भी बंद हो रहा है, वे कहीं घूमने जायेंगे. कल दोपहर उसने “हिंदी साहित्य का इतिहास तथा हजार वर्ष की हिंदी कविता” की भूमिका दुबारा पढ़ी. कविता को लिखा नहीं जाता यह खुद को लिखवा लेती है ऐसा वह पहले भी कहीं पढ़ चुकी है. पर वह तभी हो सकता है जब कोई पूरी तरह से भावमय हो चुका हो, संवेदनशील हो और सत्य का अन्वेषक हो. सच्चा कवि समाज को नई दिशा देता है. सत्य के छोटे से छोटे क्षण को ही उद्घाटित कर पाए इसी में कविता की सार्थकता है. जो असत्य है ऊपर से ओढ़ा है वह कविता का विषय नहीं हो सकता यह तो अंदर से निकलती है, नितांत स्पष्ट, शुद्ध और सच्ची वाणी !