Showing posts with label पिरामिड वैली. Show all posts
Showing posts with label पिरामिड वैली. Show all posts

Monday, February 26, 2024

पिरामिड वैली


पिरामिड वैली


नव वर्ष का प्रथम दिन ! सुबह नींद देर से खुली क्योंकि रात को बारह बजे से पटाखों की तेज आवाज़ें आनी आरम्भ हुईं और एक घंटा चलती रहीं। बच्चों व बड़ों के चिल्लाने का शोर भी स्पष्ट आ रहा था। नये वर्ष को तो आना ही है, इतना शोर मचाने का क्या अर्थ है, समझ में नहीं आता। प्रातः भ्रमण के समय आकाश में गोल चंद्रमा के दर्शन हुए, तस्वीर उतारी, वापस आकर छत पर सूरज की। उगते हुए सूरज को देखकर त्राटक करना कितना भला लग रहा था। स्नान करके नाश्ता बनाया और दोपहर के भोजन की तैयारी की, जो वे ‘पिरामिड वैली’ अपने साथ ले जाने वाले थे।जून ने बनारसी चिवड़ा-मटर; और खोये वाला गाजर का हलवा  उन्होंने कल ही बनाया था।  उसने हींग वाले आलू-पूरी और बटर में परवल बनाये। सभी को नाश्ता पसंद आया। बच्चों के साथ उनका एक मित्र भी आया था और सोनू के माँ-पापा भी। वे एक बजे पिरामिड वैली पहुँच गये थे। उनके घर से ज़्यादा दूर नहीं है यह शांत स्थान, जो २८ एकड़ में फैला हुआ है। सुंदर बाग-बगीचों और एक कमल सरोवर से घिरा दुनिया के सबसे बड़े आकार के पिरामिड के लिए प्रसिद्ध है। जो ध्यान के लिए एक संत ब्रह्मर्षि पात्री जी द्वारा बनवाया गया है। वे लोग पहले भी एक बार यहाँ आये थे, और तभी आज के दिन का कार्यक्रम बना था। यहाँ आकर ज्ञात हुआ कि बाहर से लाया भोजन इस परिसर में नहीं खा सकते।एक घंटा हरियाली के सान्निध्य में घूमते हुए बिताया, कुछ देर पिरामिड में जाकर ध्यान किया। किताबों की दुकान से दो किताबें ख़रीदीं, अवेकनिंग कुंडलिनी और द लॉस्ट ईयर्स ऑफ़ जीसस ! रेस्तराँ में चाय पैकर वे घर लौट आये। बाद में छत पर चटाई बिछाकर पिकनिक की तरह पेपर प्लेट्स में दोपहर का भोजन किया। शाम को वे वापस चले गये। जिन मित्रों व संबंधियों से सुबह बात नहीं हुई, उन्हें फ़ोन पर नये साल की शुभकामनाएँ दीं।   


आज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही आँख खुल गई। छोटी ननद के लिए जन्मदिन की कविता लिखी, मंझले भाई का जन्मदिन भी आज है, उसे भी शुभकामना भरी कविता भेजी। जीसस वाली किताब में पढ़ा, लेह की हिमिस मोनेस्ट्री में कुछ दस्तावेज मिले हैं , जिनके आधार पर कहा गया कि ईसा भारत आये थे।शाम को पापा जी से बात हुई, उत्तर भारत में ठंड बहुत बढ़ गई है, उन्होंने कहा तापमान शून्य हो गया था। दिल्ली में वर्षा हो रही है। यहाँ बैंगलुरु का मौसम सुहावना है, पर कब बदल जाएगा, कहा नहीं जा सकता। 


आज यहाँ भी थोड़ी सी ठंड बढ़ गई है। रात को बारिश होती रही शायद इसी कारण। जून के दांत में दर्द है, कल डेंटिस्ट को दिखाकर नन्हे-सोनू के यहाँ चले जाएँगे। वे दोनों घर से ही काम कर रहे हैं।सुबह एलिजाबेथ क्लेयर की ईसा के भारत में बिताये समय के बारे में किताब आगे पढ़ी, बहुत रोचक है। ​​जीसस की भारत, तिब्बत  व नेपाल की सत्रह वर्षों की यात्रा के पक्के सबूत मिले हैं। उसमें लिखा है कि 13 साल की उम्र से 29 साल की उम्र तक वह पहले पढ़ते रहे फिर उन्होंने पढ़ाया भी ।येरूशलम से भारत तक की उनकी यात्रा का विवरण बौद्ध इतिहासकारों ने दिया है। किसान आंदोलन ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कल भी सरकार ने वार्ता के लिए बुलाया है। देश में कोरोना की वैक्सीन लगाने का काम आरम्भ हो रहा है । 


आज दिन भर बदली बनी रही। सुबह साढ़े नौ बजे वे डेंटिस्ट के यहाँ जाने के लिए निकले थे। जून को फ़िलिंग करवानी थी। उसने भी दिखाया, तो क्लीनिंग कर दी, दस मिनट की सफ़ाई के लिए एक हज़ार रुपये लिए। जब वे पहुँचे, ठीक उसी समय नन्हा भी आ गया, उसका मित्र उसे लेकर आया था। उसने अपनी मीटिंग आगे खिसका दी और इसलिए आया कि पापा को कहीं एनेस्थीसिया दे दिया गया तो ड्राइविंग में दिक़्क़त होगी।बच्चे बहुत समझदार और केयरिंग हैं। सुबह सामान्य थी, एक विशेष बात हुई कि छोटी भाभी का जन्मदिन है, सुबह ही याद आया, उसके लिए कविता लिखी उसी समय, जबकि उन्हें निकलना था। यह भी तो सेवा का एक कार्य हुआ न ! परसों बड़ी ननद का जन्मदिन है, कल ही उसके लिए लिखनी है। शाम को रमन महर्षि की बातचीत का एक अंश सुना, प्रेरणादायक था फिर गुरु जी का कराया ध्यान किया। मन शांति का अनुभव कर रहा था। सात तारीख़ को सूट-साड़ी पहनकर वे आश्रम जायें, ऐसा मन में विचार आया है ! उस दिन छत्तीस वर्ष हो जाएँगे उनके विवाह को। नन्हे-सोनू के यहाँ भोजन अच्छा था, दाल-चावल व करेले की सब्ज़ी !   


Wednesday, May 26, 2021

पिरामिड वैली

 

नव वर्ष का नौवां दिन भी बीत गया। अभी तक  लेखन कार्य आरंभ नहीं हुआ है। भगवान बुद्ध की पुस्तक पढ़ने में ही सारा समय चला जाता है। वह ध्यान पर बहुत जोर देते हैं और शील के पालन पर भी। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अलोभ और अक्रोध पर, साथ ही प्रज्ञा पर भी। अनुभव करके स्वयं जानने को कहते हैं न कि किसी की बात पर भरोसा करके ! जगत परिवर्तनशील है, सब कुछ नश्वर है, वस्तुओं के पीछे भागना व्यर्थ है और संबंधों के पीछे भी, भीतर की शांति और आनंद को यदि स्थिर रखना है तो अपने भीतर ही उसका अथाह स्रोत खोजना होगा। शांति और आनंद से मन को भरकर ही करुणा के पुष्प खिलाए जा सकते हैं ! किसीके पास यदि स्वयं ही प्रेम नहीं है तो वे किसी अन्य को दे कैसे सकते हैं ! पहले मन को सभी इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से ऊपर ले जाकर खाली करना होगा। यशेषणा, वित्तेषणा, पुत्रेष्णा और जीवेषणा से ऊपर उठकर भीतर के आनंद को पहले स्वयं अनुभव करना होगा फिर उसे बाहर वितरित करना होगा। जगत में कितना दुख है, दुख का कारण अज्ञान है, अज्ञान को दूर करने का उपाय ध्यान है, ध्यान से ही दुख और शोक के पार जाया जा सकता है। अहंकार को मिटाकर ही कोई इस पथ का यात्री बनता है । धरती, पवन, अनल और जल की तरह धैर्यवान, सहनशील, परोपकारी और पावन बनकर ही बुद्ध ने अपने जीवनकाल में हजारों लोगों के जीवन को सुख की राह पर ला दिया था। उसे भी उसी पथ का राही बनना है। 


आज शाम आश्रम में गुरूजी को सुना, उन्होंने पहले कन्नड़ में बोला फिर अंग्रेजी व हिंदी में। उनके जवाब कितने सटीक होते हैंऔर कितने मजेदार भी, सभी को संतुष्ट करने वाले ! खुले प्रांगण में था कार्यक्रम, हजारों लोग रहे होंगे, जिन्हें गुरुजी के सान्निध्य ने आनंदित किया। । पहले भजनों का दौर चला फिर प्रश्नोत्तर का। अष्टावक्र गीता का एक श्लोक पढ़ा गया, जिसकी व्याख्या की गुरुजी ने। उन्होंने कहा, जब तक अहंकार है तब तक ही झिझक होती है, जब अहंकार नहीं रहता साधक बालवत बन जाता है। आराम बहुत हो गया, उसे अब ब्लॉग पर लिखना आरंभ करना ही होगा, भीतर से कोई बार-बार कह रहा है। नाश्ते के बाद का समय इसी काम के लिए रखा जा सकता है और दोपहर को भोजन के बाद के विश्राम के बाद का समय भी।  यदि जरूरत पड़ी तो समय और भी निकाला जा सकता है। जीवन जैसे दौड़ता ही जा रहा है, समय जो बीत गया वापस नहीं आता ! दोपहर को निकट स्थित खेत से वे सब्जी लाए व चीकू भी जिसे यहाँ सपोटा कहते हैं और बहुतायत में होता है। कल नन्हा व सोनू आए थे, व भांजा भी, वे सब पिरामिड वैली गए थे, जो बहुत सुंदर स्थान है। हरियाली और छोटी पहाड़ियों से घिरा यह विशाल स्थान सुकून से भर देने वाला है।यहाँ  दुनिया का सबसे बड़ा और दस मंजिल इमारत जितना ऊँचा पिरामिड नुमा ध्यान कक्ष है। जब वे कक्ष में पहुँचे तो कुछ लोग वहाँ पहले से ही बैठे थे, पर इतनी गहन शांति थी कि आपनी श्वास की आवाज भी सुनाई दे रही थी। कुछ देर सब उसी मौन में रहे फिर बाहर आकर फूलों के सुंदर बगीचों में।  यहाँ पर दूर-दूर से आकर लोग रहते हैं व ध्यान शिविरों में भाग लेते हैं। कल बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर एक कविता लिखी। 


आज भी वे आश्रम गए थे,आश्रम का वातावरण बहुत आनंददायक होता है। सफलता की परिभाषा बताते हुए गुरुजी ने कहा, जो व्यक्ति हर स्थिति में अपने मन की समता को बनाए रख सकता है वही सफल है।उन्होंने आज ध्यान भी कराया। कर्ताभाव जब खो जाता है तब ही ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो अप्रयास घटता है। जब भीतर कोई इच्छा नहीं रहती तब ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो सहज अवस्था का अनुभव कराए। जब न राग रहे न द्वेष, न कोई अपना न पराया, न भूत का पश्चाताप न भविष्य की आकांक्षा, तब ध्यान घटता है, ऐसा ध्यान जो मुक्ति का स्वाद देता है, जो शांति प्रदाता है। आर्जव, क्षमा, दया, संतोष और सत्य जब जीवन में घुलमिल जाते हैं तब ध्यान घटता है।  मुक्ति की चाह ही व्यक्ति को परमात्मा से मिलने की चाह की ओर ले जाती है। बंधन मन को दुख के सिवाय कुछ नहीं देता, आदतों का बंधन, कर्म का बंधन, अहंकार का बंधन, इच्छाओं का बंधन, अहंकार का बंधन, घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, संदेह तथा दंभ जैसे विकारों का बंधन ! मानव के मन को कितनी बेड़ियों ने जकड़ रखा है, जो उसे दुख देती हैं पर सुख का भुलावा भी देती हैं। उसके पास आत्मा का अनंत सुख तो है नहीं, सो उसी छोटे से सुख से काम चलाना चाहता है, यह भुलाकर कि बड़ा सा दुख भी पीछे खड़ा है। स्वर्ग के लोभ में लोग नरक को चुन लेते हैं। फूलों के साथ काँटे भी मिल जाते हैं, मित्र ही शत्रु बन जाते हैं एक दिन और देह माटी बन जाती है। मृत्यु के द्वार से कोई नहीं बचता, एक दिन तो सभी को यहाँ से चले ही जाना है ! जहाँ जाना है वहाँ रहना जो सीख लेता है वह ध्यान में ही है ! आज आश्रम में रहने वाले  हाथी को भी देखा, सजा -सजाया हाथी बहुत अच्छा लग रहा था। मस्तक पर तिलक था, गले में घुंघरू थे और माला भी। कई बार गुरूजी उसे अपने हाथों से उसका आहार खिलाते हैं। वे आश्रम के मानव संसाधन विभाग की अध्यक्ष से भी मिले, अपनी रुचि बताते हुए एक ईमेल लिखने को कहा है। आश्रम के कैफे में पुस्तकों के रैक  को साफ करके किताबें ठीक से लगाईं, ऐसा ही लगा जैसे अपने घर को ही सहेज रहे हैं। आश्रम उनके घर जैसा ही है और आगे बनने भी वाला है, जब वे यहाँ नियमित काम करना शुरू कर देंगे। आज असमिया सखी का फोन आया वे लोग इसी माह आएंगे।