Showing posts with label पुस्तक. Show all posts
Showing posts with label पुस्तक. Show all posts

Thursday, January 19, 2023

एज लेस बॉडी टाइम लेस माइंड


रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं। सोने से पूर्व के अंतिम कार्यों का आरंभ हो चुका है। टहलने गए तो हल्की बूंदा-बांदी होने लगी, पर अब उन्हें इसका अभ्यास हो गया है। सुहानी हवा और बेहद हल्की झींसी को चेहरे पर महसूस करते घर के सामने वाली सड़क के अंत तक जाकर लौट आए। उसके आगे ही फ़ौवारे वाला पार्क है। दो दिन से पड़ोसी नहीं दिखे थे जबकि वह सुबह नियमित दो घंटे पैदल चलते हैं, आज दिखे तो बताया, खाने की मेज़ से कुछ लेते समय गिर गये थे, घुटने पर हल्की चोट थी। एक तरह से वृद्धावस्था भी दूसरा बचपन ले आती है, पर बचपन में चोट का पता नहीं चलता, इस समय बात विपरीत है।  आज से ‘देवों का देव महादेव’ पुनः देखना आरम्भ किया है। कुछ वर्षों पूर्व इसका कुछ भाग देखा था। शाम को ‘हिंदी कविता के हज़ार वर्ष’ पुस्तक में कविता के इतिहास के बारे में पढ़ा। काव्य और मानव का नाता बहुत पुराना है। पुरानी पुस्तकों में कविता के अतिरिक्त भी कितने विषयों को गद्य की अपेक्षा पद्य में लिखा गया है, जिसे याद रखना भी सरल है। 


नन्हे ने नेक्सन ईवी की टेस्ट ड्राइव बुक कर दी है। कम्पनी के लोग गाड़ी लेकर आएँगे। सुबह बिग बास्केट से सूखे मेवे आए, जून को खुद जाकर ख़रीदने का शौक़ पूरा करने में अभी समय लगेगा। भावनगर से सौंठ पाउडर आया, अमेजन उन्हें घर बैठ-बैठे पूरे भारत से समान लाकर दे देता है। 


अभी-अभी छोटे भाई से बात की। आजकल काम के सिलसिले में केरल में है। आज धोती पहनकर त्रिवेंद्रम के पद्मनाभ मंदिर गया था। उसे कभी-कभी ध्यान के अनोखे अनुभव होते हैं। बचपन से ही वह पूजा आदि  की तरफ़ आकर्षित था। उसने बताया कक्षा चार में उसके मस्तक में भौहों के मध्य एक कील चुभ गयी थी, जिसे मित्रों ने खींच कर निकाला, खून भी बहा पर बजाय रोने के वह ज़ोर से हँसने लगा था। शायद उसे पहला अतींद्रिय अनुभव तब हुआ था। उसके बाद वह कक्षा में सबसे पीछे बैठता था पर उसे कुछ सुनायी नहीं  देता था, तब निकट बैठा छात्र ज़ोर से हिलाकर कहता तब कुछ समझ में आता। अब वह ओशो के प्रवचन सुनकर और उनकी बतायी साधना से भीतर ऊर्जा का प्रवाह अनुभव करता है। अनंत ऊर्जा के स्रोत से तो सब जुड़े हैं पर उसका अनुभव कोई-कोई ही कर पाता है। 


आज भी घर के दाँयी तरफ़ का गोदाम तोड़ने की आवाज़ें आती रहीं। अब जेसीबी लगाया जाएगा। उसके बाद वहाँ निर्माण कार्य आरम्भ होगा अर्थात लम्बे समय तक इस शोर को सुनने का अभ्यास करना होगा। आज असम की एक पुरानी परिचिता से बात हुई , परसों उनकी माँ का देहांत हो गया। वह शाम को परिवार के साथ बैठकर चाय पी रही थीं, अचानक दिल का दौरा पड़ा; जबकि उन्हें कभी दिल का रोग नहीं हुआ था। जीवन क्षण भंगुर है कितनी बार वे यह बात सुनते हैं पर मानते नहीं, ऐसी घटनाएँ इसकी सत्यता सिद्ध करने आ जाती हैं। आज सुबह दीपक चोपड़ा की पुस्तक ‘सफलता के सात  आध्यात्मिक नियम’, मोबाइल पर सुनी। कल शाम उनकी एक अन्य पुस्तक ‘एज लेस बॉडी टाइम लेस माइंड’ पढ़नी आरंभ की है। उनके अनुसार चेतना में स्थित रहकर कोई भी अपने शरीर को स्वस्थ रख सकता है। व्यक्ति के सकारात्मक या नकारात्मक विचार अच्छे या बुरे हार्मोंस का निर्माण करते हैं। इस सृष्टि में पदार्थ ऊर्जा में व ऊर्जा पदार्थ में निरंतर बदल रही है।देह जो ठोस जान पड़ती है, वास्तव में तरंगों से ही बनी है। अणु या परमाणु तक आते आते पदार्थ खोने लगता है और अति सूक्ष्म ऊर्जा ही शेष रहती है।  यह ऊर्जा विचारों से नए-नए रूप धारण कर लेती है, वह जब भी दिखेगी, प्रकृति के रूप में ही दिखेगी।वह स्वयं ज्ञाता है और ज्ञेय नहीं हो सकती। उसका अनुभव ध्यान में ही किया जा सकता है। आज उनके साथ एक अठानवे वर्षीय एक वृद्ध महिला का साक्षात्कार सुना। उनकी बातें प्रेरणदायक थीं, वह अभी तक योग सिखाती हैं, नृत्य भी करती हैं। शाम को पापा जी से फ़ोन पर बात की, तो पहली बार उन्हें रिकार्ड भी कर लिया। उनकी बातों में भी जीवन के लम्बे अनुभवों का सार होता है। भक्ति और ज्ञान की चर्चा भी होती है।  


Thursday, June 18, 2020

पावर ऑफ़ नाउ


आज ठंड अपेक्षाकृत अधिक है. सुबह वे उठे तो कोहरा बहुत घना था. प्रातः भ्रमण के लिए देर से निकले पर उतनी ठंड में भी एक व्यक्ति को सामान्य कमीज पहने दौड़ लगाते देखा. मानव की सर्दी-गर्मी सहने की क्षमता व्यक्ति सापेक्ष है. नेहरू मैदान में तेज बत्तियां जल रही थीं, दिन-रात वाले फुटबॉल मैच चल रहे हैं वहाँ तीन दिनों के लिये. एक युवा संस्था करवा रही है कम्पनी की सहायता से. आज भी किसी ‘बंद’ की बात थी पर कम्पनी खुली है. एनआरसी और सिटीजनशिप बिल को लेकर उत्तर-पूर्व में वातावरण काफी अस्थिर बना हुआ है. इस समय कमरे में धूप आ रही है और धूप की गर्माहट भली लग रही है. कल दोपहर मृणाल ज्योति गयी, उसकी संस्थापिका कह रही थीं भविष्य में उनके न रहने पर उनकी दिव्यांग पुत्री अकेली न रह जाये इसलिए वह कुछ वर्षों बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहेंगी. माँ का दिल कितनी दूर की सोच रखता है. उनके बाद स्कूल कौन सम्भालेगा इसकी भी चिंता उन्हें होती होगी. कल शाम भजन से पूर्व गले में खराश हुई और ॐ का उच्चारण नहीं कर सकी, देह एक मशीन की तरह ही है, कहीं कुछ फंस गया और मशीन ठप ! एक छोटा सा खाकी रंग का कुत्ते का बच्चा बरामदे में आकर बैठा था कल, उसे कुछ खाने को दिया तो दूर तक छोड़ आने के बावजूद थोड़ी ही देर में वापस आ जाता था, उसका दिशा बोध कितना प्रबल रहा होगा. वे उसे घर में नहीं आने दे रहे थे, शायद रोग का भय था, उसे कोई टीका भी नहीं लगा होगा. परमात्मा ही उसकी रक्षा करते रहे हैं आजतक, आगे भी करेंगे. बाहर मैदान से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही हैं, ये बिना थके शाम तक खेलते रह सकते हैं. 

टीवी पर प्रधानमंत्री का भाषण आ रहा है जो वह बीजेपी के राष्ट्रीय अधिवेशन में दे रहे हैं. महिला सशक्तिकरण की बात की, फिर किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया. उनकी आवाज में बल है और भारत को आगे ले जाने का दृढ संकल्प भी. ‘पावर ऑफ़ नाउ’ वर्षों पहले पढ़ी थी, कल से दुबारा पढ़ रही है, पढ़ते-पढ़ते ही अनुभव घटने लगता है. वर्तमान में रहने का जो मन्त्र ज्ञानी देते आए हैं उसका सर्वोत्तम चित्रण इस पुस्तक में हुआ है. अगले सप्ताह वे अरुणाचल प्रदेश जा रहे हैं एक रात के लिए. शाम को क्लब में एक विज्ञान फिल्म दिखाई जाएगी, रजनीकान्त की हिंदी में डब की गयी फिल्म.  

उस दिन यानि वर्षों पूर्व सुबह साढ़े छह बजे पिताजी द्वारा आवाज लगाने पर नींद खुली तो एक स्वप्न टूट गया. स्वप्न, जो काफी देर से चल रहा था. स्वप्न जो सुंदर था... सुखद था. पता नहीं किस खेत में काम कर रहे थे वे लोग, साथ-साथ बातें भी. फिर घर आये. सबको पता चल गया. मिटटी से सने हाथ, हल चलाते हुए लगी होगी या .. कुछ याद नहीं. फिर स्वप्न में ही एक पत्र मिला और ‘मेरे संसार; ऋषियों की बातों से भरी किताब, श्लोकों और आख्यानों को उसमें देख वह चकित थी फिर दक्षिण भारत का भ्रमण  और सुंदर दृश्य... बस सब बातों की एक बात कि स्वप्न अच्छा था. कालेज में ‘फिलॉसफी ऑफ़ हार्डी’ पर एक सेमिनार था, मध्य में एक गजल की प्रस्तुति... मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता.. ऐसी ही कुछ. कल भारत बन्द का आयोजन है विपक्षी दलों द्वारा. बस में एक वृद्ध ने पेन्सिल खरीदी,  लिखने के लिए सिगरेट की डिब्बी का ढक्कन, उसने उसे एक कागज अपनी कापी का दिया, वह खुश हुआ होगा पर उसने ऐसा जाहिर नहीं किया. बस ड्राइवर ने बस गेट से काफी आगे रोकी, वह क्रोध में भी था.अब से वह सबसे आगे वाली सीट पर बैठेगी, या फिर खड़े होना भी ठीक है ताकि उसे पहले से बता सके. 

Saturday, April 11, 2020

श्वेत गुलाब


पौने ग्यारह बजे हैं. आज का दिन कुछ भारी है शायद या फिर अभी वह अनाड़ी है. आज सुबह कार लेकर गयी, कालोनी में ही एक चक्कर लगाया, वापस आयी तब तक भी ड्राइवर नहीं आया था , सो अकेले ही बाजार चली गयी, ट्रैक्टर को ओवरटेक करते हुए गाड़ी का बायां भाग लग गया. कार को गैराज में ले जाना पड़ेगा. कल रात को नींद खुलती रही, फिटबिट सब खबर रखता है. बहुत दिनों बाद सब्जी में प्याज डाला, कैसी अजीब सी लग रही थी उसकी गंध. सात्विक भोजन खाकर  तन-मन दोनों ही हल्के रहते हैं. एक सीनियर महिला ब्लॉगर ने उसकी तीन पोस्ट्स को ब्लॉग बुलेटिन में जगह दी, इसका अर्थ है उन्होंने अवश्य ही उन्हें ध्यान से पढ़ा भी होगा. इस समय रात्रि के आठ बजे हैं, जून अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं. दोपहर को वे गाड़ी बनने के लिए दे आये, दो हफ्तों बाद मिलेगी. अब भविष्य में बहुत सतर्क होकर गाडी को हाथ लगाना होगा, फ़िलहाल कालोनी में चलाना ही ठीक रहेगा. उसके बाद तिनसुकिया गए, छाता बन गया, सब्जियां-फल आदि खरीदे. जून को भी गाड़ी के दुर्घटनाग्रस्त होने का ज्यादा बुरा नहीं लगा, उन्होंने पहली बार इंश्योरेंस क्लेम किया है. कल स्कूल में मीटिंग ठीक रही, अब कुछ महीने बाद स्टेज बनने का कार्य आरम्भ हो जायेगा. समय का सदुपयोग करना हो तो पुस्तक पढ़ने से अच्छा कौन सा काम हो सकता है, कल वी एस नायपॉल की अच्छी सी पुस्तक लायी थी, पढ़ना आरम्भ किया है. नन्हे व सोनू के चश्मे गाड़ी से सामान निकालते समय मिले, उन्हें याद ही नहीं था कि वहां रखे थे.  

‘इंसान जिसके बारे में सोचता है, वैसा ही बन जाता है’. वे वही बन जाते हैं, जैसा वे बनना चाहते हैं, जैसा वे सोचते हैं. मन की गहराई में जो आकांक्षा बलवती होती है, वह एक न एक दिन मूर्तरूप अवश्य लेती है. वह बचपन से ही अध्यापिका बनना चाहती थी, पढ़ना और पढ़ाना, ये दो ही उसके प्रिय कार्य रहे हैं. परमात्मा ने उसे इस योग्य बनाया है कि वह अन्य लोगों को ज्ञान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकती है. आज यदि वह अपने भीतर जाये तो वहां कोई आकांक्षा नहीं मिलेगी, एक मौन और सन्नाटा ! पर वह मौन रसपूर्ण है, एक सहज शांति उसमें से पल-पल रिसती रहती है. खिड़की से बाहर हरियाली नजर आ रही है, पौधे, वृक्ष कैसे शांत खड़े हैं. हवा का एक कण भी नहीं है, आकाश भी थिर है, वर्षा के बाद का खुला, स्वच्छ आकाश ! दूर से पंछियों की आवाजें आ रही हैं और घास काटने की मशीन की भी. अचानक हवा बहने लगी है और अब श्वेत गुलाब की टहनी हिलकर स्थिर हो गयी है. वह जिस आकाश में स्थित है वह तो सदा ही स्थिर है. मन का आकाश भी सदा अडोल है. उसमें विचारों का स्पंदन होता है, जो साक्षी है वही मन बन जाता है और वही स्वयं में ठहर जाता है. नैनी किचन में काम कर रही है, उसने कहा, शरीर में दर्द है, उसे क्रोसिन की दो टेबलेट दी हैं. आजकल उसके पास सिलाई का काम आ रहा है, शायद झुक कर, देर तक सिलाई करने से ही ऐसा हुआ हो. दो दिन बाद गणेश पूजा है. उसी दिन वे बच्चों को नए वस्त्र देंगे. 

Thursday, April 9, 2020

चिड़िया की कूजन


दोपहर के ढाई बजे हैं, कुछ ही देर में दोपहर की योग कक्षा के लिए महिलाएं आएँगी. कुछ देर पहले दो ब्लॉग्स पर लिखा. कमरे में एसी चल रहा है पर उसकी आवाज को भी चीरते हुए बाहर से चिड़िया की मधुर चहकार आ रही है, भले ही तेज धूप हो पर इसके बावजूद पंछी दोपहर भर  कूजते हैं, विश्राम वे रात को ही करते हैं सूर्यास्त के बाद. कल शिक्षक दिवस सोल्लास मनाया, सुबह मृणाल ज्योति में, दोपहर को बाहर बरामदे में बच्चों के साथ और शाम को गायत्री समूह की योग साधिकाओं के साथ ! गुरूजी के प्रेम का जादू उन पर भी चलने लगा है, कल वे बहुत सुंदर दीपदान लायीं पूजा कक्ष के लिए, साथ ही ढेर सारी खाने की वस्तुएं, उनका उत्साह देखते ही बनता था. एक ने कबीर के दोहे गाए, दूसरी ने अपनी रची दो पंक्तियाँ और एक अन्य ने सुंदर बंगाली भजन गाया।  मन होता है उनके लिए एक कविता लिखे. दोपहर को भी बच्चों ने सुंदर सजावट की. समोसे, केक व कोल्डड्रिंक्स का इंतजाम किया, उन्होंने आपस में पैसे जमाकर के ये सामान खरीदा. उनका भी उत्साह बहुत था. स्कुल में सभी टीचर्स को उपहार अवश्य ही पसन्द आये होंगे. कल जाने पर फीडबैक मिलेगा. जीवन एक उत्सव है , यह गुरूजी का वाक्य सत्य सिद्ध हो रहा है. दोपहर बाद उसने लिखा 

दिलों में प्रेम और उत्साह भरे
चमकते हुए ख़ुशी से आपके चेहरे
चुपके-चुपके से उत्सव का आयोजन
मानो लौट आया हो फिर से बचपन

दीप स्तम्भ सजा थाल में
 भरा मिष्ठान और फूलों-फलों से
चहकते पंछियों से सुमधुर गान
याद आएंगे जब तक हैं प्राण

गुरु का ज्ञान जब फलता है
तभी जीवन में ऐसा फूल खिलता है
मिलन घटता है पावन आत्माओं का
जीवन एक सुवास बन झरता है

वैसे तो कभी न आएगा अब
पतझड़ दिल के मौसम में
यदि कभी भूले से आ भी जाये
तो इस शाम का वसन्त भर देगा उसे
जीवन पथ को प्रकाशित कर देगा
फूलों, दीपों और मिठास से

बनी रहे इसी तरह मुखड़े पर मुस्कान हर पल
भरी रहे जीवन सरिता छल छल
कोई आस न रहे अधूरी, हर साध हो पूरी
क्योंकि खुद को जानकर मिल जाती है
श्रद्धा और सबूरी !

सुबह के पौने आठ बजे हैं, ड्राइवर अभी आने वाला होगा, फिर कार निकालेगी, वैसे अकेले भी जा सकती है पर घर में सफाई का काम चल रहा है. पोहे का नाश्ता किया और केला, जून ने कहा केला खाने से वजन बढ़ता है. वह बंगलूरू में अपना मेडिकल चेकअप कराके आये हैं, उनका वजन ज्यादा है. उन्होंने टहलने का वक्त भी बढ़ा दिया है और लंबा रास्ता लिया है पहले से. वापस आकर भी देह में स्फूर्ति नहीं लग रही थी, तमस का अनुभव हुआ पर प्राणायाम से फर्क पड़ा. कल रात को नींद ठीक से नहीं आयी, जून को एओल के कोर्स में जाने के लिए दुबारा कहा तो वह नाराज हो गए और उनकी नकारात्मक ऊर्जा शायद उसे विचलित कर रही हो, सूक्ष्म स्तर पर ऐसा हो सकता है. कुछ वर्ष पूर्व किसी आवाज ने भीतर से बार -बार कहा था, दूसरे कमरे में सोने जाओ पर वह भीरु आजतक हिम्मत नहीं जुटा पायी, जून क्या सोचेंगे, उन्हें बुरा लगेगा. इसलिए विवाह को बन्धन कहा गया है, एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखना होगा. आँखों में नींद का सा अनुभव हो रहा है अब बाहर जाना चाहिए. कल दोपहर बाद मृणाल ज्योति की एक परिचारिका को देखने अस्पताल जा रही थी, एक अध्यापिका से पता चला वह दो दिन पूर्व ही रिलीज हो गयी है. सो पब्लिक लाइब्रेरी चली गयी, एक किताब ली, लाइब्रेरियन ने बताया, माह के अंत में बच्चों की कहानी प्रतियोगिता है, जिसमें कक्षा छह से दस तक के छात्र-छात्राएं भाग लेंगे. उसे हिंदी में निर्णायक के रूप में सहायता करनी है. कल मृणाल ज्योति में मीटिंग है, विधान परिषद के एक सदस्य ने पांच लाख की सहायता का वचन दिया है जिससे स्कूल में एक स्टेज बनेगा, जहां भविष्य में कई कार्यक्रम हो सकते हैं. 

Tuesday, October 10, 2017

लाल और काले शहतूत


कल सुबह एक स्वप्न देखा, वह गुलाम भारत के एक शहर में (वर्तमान पाकिस्तान) किसी शायर की बेटी है. एक कमरा है जिसका दरवाजा दाहिनी तरफ खुलता है तो घर के भीतर जाता है और बायीं तरफ का बाहर, जहाँ पिता खड़े हैं, उनके हाथ में कोई पुस्तक है. कमरे में पाँच-छह वर्ष का बालक( शायद उसका भाई) गेंद से खेल रहा है, तभी वह कमरे में आती है. उसके केश छोटे कटे हैं, चेहरा बिलकुल अबके जैसा ही है, लम्बी है, फ्रॉक पहने हुए है, आकर वह भी उस बच्चे के साथ खेलने लगती है. उम्र चौदह-पन्द्रह होगी. स्वप्न में देखते ही उसने खुद से कहा, अरे, यह तो वह है ! एक और स्वप्न में एक वृद्ध महिला किसी परिचिता के बारे में कुछ बता रही है, जो अशोभनीय है सो वह स्वयं से कहती है, क्या उसे गॉसिप करना भी भाता है  ! आज सुबह उठी तो फिर वही वाक्य याद आया, “उसके जीवन में सब झूठ है”. सत्य तो वही है जो सदा रहता है, जीवन तो प्रतिपल बदलता रहता है, फिर झूठ ही हुआ. आज बहुत दिनों बाद बगीचे में काम करवाया, एक वीडियो भी बनाया. बगिया में ठन्डक थी, सब कुछ धुला-धुला सा था, सफाई भी हो गयी और पौधों को सहारा भी मिल गया. शाम को स्कूल के वार्षिकोत्सव में जाना है, और कल देहली जाना है. फेसबुक पर आस्ट्रेलिया की तस्वीरें पोस्ट कीं आज भी. कोई नई कविता नहीं लिखी कई दिनों से, काव्य श्रंखला पर लिखने वाली कवयित्रियाँ रोज एक नयी कविता ले आ रही हैं. जीवन एक झूठ है एक भाव यह भी है कि उसने कई कविताएँ बाह्य आलम्बनों से प्रेरित होकर लिखी हैं, बहुत सी भीतरी से भी, पर बाहरी आलम्बन से रची कविता स्वतः स्फूर्त नहीं कही जा सकती. काव्य तो उसे ही कहा जा सकता है जो अंतर्मन की गहराई से स्वयं ही प्रकट हो. 

कल सुबह वे उठे तो वर्षा थमी हुई थी पर लॉन में व सड़क पर पिछली रात आये तूफान और ओलों की वर्षा के चिह्न स्पष्ट नजर आ रहे थे. वे सवा ग्यारह बजे दिल्ली जाने के लिए हवाईअड्डे के लिए रवाना हुए और शाम सवा सात बजे अस्पताल पहुँच गये. भाभी से पहले भाई से मिले, वह दुबले लग रहे थे. भाभी का चेहरा भी छोटा सा लग रहा था, अधर सफेद लग रहे थे, उन्हें देखकर मन रुआँसा हो गया. दिल की बीमारी के कारण उन्हें काफी दुःख झेलना पड़ा है. आज सुबह एंजियोग्राफी हो गयी है, सम्भवतः परसों आपरेशन होगा. यहाँ आज मौसम गर्म है. दोपहर दो बजे बड़ी भांजी अपनी बेटी को लेकर मिलने आएगी. उसकी बिटिया दुबली-पतली है, खूब गोरी और चंचल, बचपन में भांजी बिलकुल ऐसी लगती थी. छोटी बहन भी आई है, जो इस समय कहीं बाहर गयी है. जून अपने दफ्तर के काम से गये हैं, दोपहर तक लौटेंगे. परसों वापस लौटना है. कुछ देर पहले पिताजी व सभी भाई-बहनों, भाभियों से फोन पर बात की. शाम को फिर अस्पताल जाना है. वे मंझली भाभी के यहाँ ठहरे हैं, घर जैसी ही सुविधा है. मंझली भाभी के कंधों पर बहुत काम आ गया है, पर परिपक्वता का परिचय देते हुए वह सब संभाल रही है. बड़ी बहन के लिए पूरी तरह समर्पित. उसने उनके शीघ्र स्वास्थ्य के लिए भगवान से प्रार्थना की.


आज प्रातः भ्रमण के लिए गये तो पिछले गेट के बाहर ही शहतूत के पेड़ से पके हुए लाल व काले शहतूत गिरे देखे. कुछ वापसी में उठाये भी. कल शाम छोटा भाई भी अपनी बड़ी बेटी के साथ अस्पताल आया. मंझले भाई से अब उसकी खूब पटती है. भाभी पहले से ठीक लग रही थीं. सभी के भीतर सच्चा स्नेह देखकर मन संतुष्ट है. आज महरी नहीं आई तो किसी अन्य को बुलाया, नाम है मुस्कान, हंसमुख है. भाई ने कहा है वे लोग शाम को पाँच बजे के बाद ही अस्पताल आयें, वे जल्दी लौट भी आएंगे. भाभी जितना आराम करेंगी उतना ही अच्छा है.  

Friday, August 18, 2017

इ रिक्शा में यात्रा


कल से गले में खिचखिच है, आज ज्यादा बढ़ गयी है. तीन दिन बाद यात्रा पर निकलना है, स्वास्थ्य  ठीक हो जायेगा उससे पूर्व ऐसी उम्मीद है. दोपहर बाद साढ़े तीन होने को हैं, सूर्य की अंतिम धूप में बगीचे में कुरसी पर बैठी है वह, मुँह में मुलेठी है, जिसकी मिठास गले को राहत देती है. कुछ देर पूर्व रजाई ओढ़कर लेटी पर भीतर कोई जाग गया है जो बेवक्त सोने नहीं देता. एक दिन तो गहरी नींद सोना ही है. उसके पूर्व कुछ काम हो जाये तो ही अच्छा है. जीवन के पल व्यर्थ न जाएँ, परमात्मा की दी इस अपार क्षमता का उपयोग हो सके ऐसा प्रयत्न सदा ही चलना चाहिए. आज बहुत दिनों के बाद रीडर्स डाइजेस्ट का एक अंक पढ़ा. मलाला की पुस्तक कल खत्म हो गयी, उसका एक भाषण भी सुना. कल शाम को जून के दफ्तर में काम करने वाली एक महिला आई थी अपने पति के साथ. चाहती है उसका तबादला गोहाटी हो जाये, इसी सिलसिले में बात करने आये थे वे. पति का काम वहीं है, ससुराल भी वहीं है. यदि ऐसा न हो पाया तो दोनों के पास अलग होने के सिवा कोई उपाय नहीं है. महिलाओं ने भी पुरुषों की तरह काम करना तो आरम्भ कर दिया है पर इसके लिए कितनी क़ुरबानी देनी पडती है. सास-ससुर को तो अब बहू से कोई भी उम्मीद रखने का अधिकार नहीं रह गया, पति भी यह नहीं कह सकता कि महिला नौकरी छोड़ दे. बगीचे में पानी डालने माली अभी तक नहीं आया है, वैसे एक दिन छोड़कर भी पानी दिया जा सकता है, रात्रि को इतनी ओस गिरती है कि सब कुछ भीग जाता है.

उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, ऐसा समाचारों में सुना. यहाँ भी मौसम अपेक्षकृत ठंडा है पर धूप भी खिली है. व्हाट्स एप पर दीदी का संदेश सुना. विदेश में रहने वाला बड़ा भांजा परिवार सहित आया है, उससे भी भेंट हो जाएगी. कल स्वप्न में किसी पिछले जन्म का दृश्य देखा, मोह भंग होता है जब पिछले जन्म की सच्चाई सामने आती है. जीवन एक खेल ही तो है, एक स्वप्न मात्र..इसे जो गम्भीरता पूर्वक लेते हैं, वे व्यर्थ ही दुखी होते हैं. मन कितना चंचल है, पल में तोला पल में माशा, इस मन को देखना भी एक मजेदार खेल है. यहाँ सब कुछ बदलने वाला है, सत्य एक है और वह सदा एक सा है अटल. उससे जुड़े रहकर जगत को देखना है, वहाँ न कोई चाह है न ही कोई अभाव ! नये वर्ष के लिए कविता लिखनी है जो वापस आकर पोस्ट करेगी अथवा तो वहीं से मोबाइल पर.


इस समय धूप तेज है, दोपहर के डेढ़ बजे हैं. सुबह ठीक चार बजे किसी ने जगा दिया, जैसे ही उठकर बाथरूम जाने लगी तो अलार्म बजा. तैयार होकर साढ़े पांच बजे ही वे रेलवे स्टेशन आ गये. नन्हे के साथ शताब्दी की तीन घंटे यात्रा का वक्त कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. कल जब वह दिल्ली पहुंची, नन्हा उसे लेने एयरपोर्ट आया था, उसे सुखद आश्चर्य हुआ. स्टेशन पर छोटी भाभी और भतीजी लेने आये थे. बैटरी वाली रिक्शा में बैठकर वे घर आ गये. ढोकला व लड्डुओं का नाश्ता किया. धूप में बैठकर फल खाए. दीदी व बुआजी से बात की, दीदी कल आ रही हैं और बुआजी परसों. पिताजी पहले से काफी दुबले हो गये हैं, भोजन भी पहले से कम हो गया है, वैसे अन्य सभी बातों में पूर्ववत हैं. वे उनके साथ दिल्ली जाने के लिए तैयार हैं.

Tuesday, August 8, 2017

जीवन-चित्र-विचित्र


आज शाम को क्लब में मैजिक शो है. कल ‘गुरू पर्व’ है, ‘देव दीवाली भी’, दूरदर्शन पर वाराणसी से सीधा प्रसारण किया जायेगा, प्रधानमन्त्री भी जायेंगे. परसों वह दो अन्य महिलाओं के साथ दिगबोई व तिनसुकिया के स्कूलों में जायेगी. विकलांग दिवस के अवसर पर मृणाल ज्योति में एक चित्रकला व निबन्ध प्रतियोगिता के लिए निमन्त्रण देना है. सप्ताहांत में एक स्कूल में उसे वाद-विवाद प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में जाना है. लेडिज क्लब की पत्रिका के लिए लेख लिखना है. इस बार विषय क्लब से संबंधित होना चाहिए. बरसों से वह इसमें जा रही है. कितनी ही यादें हैं. लिखना शुरू करे तो कई पन्ने भर जायेंगे. जब इसकी सदस्या बनी थी, उस वक्त को याद करती है तो लगता है कल की ही बात है. आरम्भ में तो अधिक सक्रिय नहीं रही, केवल मीटिंग में सम्मिलित होना ही याद है. फिर एक दिन स्वरचित कविता का पाठ किया जिसके बाद सेक्रेटरी ने वार्षिक कार्यक्रम के लिए हिंदी में कुछ लिखने का काम दिया था. क्लब की पत्रिका में हिंदी लेखों के संपादन का कार्य भी कई बार किया. कितनी ही बार समूह गान में भाग लिया, जिनकी रिहर्सल में जाना एक यादगार अनुभव बन गया है. उन दिनों मीटिंग के बाद की चाय के लिए भोजन घरों पर ही बनाया जाता था. उसे याद है दोपहर को कुछ महिलाएं किसी एक घर में एकत्र होकर यह कार्य करती थीं. रात को भोजन बच जाने पर सभी के यहाँ पहुंचाया जाता था. तब से अब तक बहुत सा पानी गंगा में बह चुका है. अब लोग ज्यादा परिपक्व हो चुके हैं, अब भोजन कुक बनाते हैं परोसने का काम भी उन्हीं के लोग करते हैं. उस समय ज्यादा वक्त वेशभूषा तथा साज-सज्जा पर खर्च होता था, पर आज की महिला अपने को एक पूर्ण व्यक्तित्त्व मानती है. वह समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पहचानती है, उन्हें निभाना चाहती है. क्लब द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न प्रोजेक्ट इसकी गवाही देते हैं.

आज मृणाल ज्योति के संस्थापक महोदय ने अपने जीवन के अनुभव बताये. बहुत रोचक और रोमांचभरी कहानी है उनकी. जीवन में उन्होंने इतने संघर्ष झेले हैं पर उनमें काम करने का जज्बा कूट-कूट कर भरा है. एक बार वह एक बस में यात्रा कर रहे थे. हाथ में रूसी लेखक बोरिस येल्स्तीव की पुस्तक थी. साथ बैठे व्यक्ति ने पूछा, यह पुस्तक कहाँ से मिली, तो उन्होंने कहा, खरीदी है, क्योंकि ऐसी किताबें पढने का शौक है’. उस व्यक्ति ने अपना पता दिया और मिलने को कहा. उन्हें एक सीक्रेट संस्था में काम मिल गया, मगर वह किसी को इस बारे में बता नहीं सकते थे, कोई पहचान पत्र नहीं था. पुलिस तक को पता नहीं था कि ऐसी कोई सरकारी संस्था है. उन्हें वैसी कई पुस्तकें पढने को दी गयीं. नक्सल आन्दोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के बारे में जानकारी मिली. प्रशिक्षण दिया गया. उसी दौरान एक बार ऊँचाई से गिर गये, काफी चोट आई. छह महीने इलाज चला. जॉब जारी रहा पर बाद में तनाव बढ़ने लगा. गिरने के कारण सर में चोट आई थी, उसका भी असर था. नौकरी छोड़ दी. आगे पढ़ाई की और अध्यापक बने. उसी दौरान एक केस के सिलसिले में बड़ी बहन ने कहा, इस काम को ऐसे अंजाम दो, तब पता चला वह भी उसी संस्था में थी, अभी तक उसी क्षेत्र में है. घर में किसी भी पता नहीं था कि वह यह काम करती है. जीवन कितना विचित्र है, इतनी बड़ी धरती पर कब, कहाँ क्या हो रहा है, कौन जान सकता है.


कल जून वापस आ गये, घर जैसे भर गया है, पहले की दिनचर्या आरम्भ हो गयी है. आज एकादशी है, लंच में साबूदाने की खिचड़ी बना रही है. कल से ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का कोर्स आरम्भ हो रहा है. आज सुबह एक दु:स्वप्न देखा. मेहमान के लिए भोजन बना रही है पर बन नहीं पा रहा है. कभी जल जाता है कभी कुछ और समस्या. मेहमान भी वही है जिसके बारे में एक व्यर्थ विचार मन में जागृत अवस्था में आया था, अर्थात उस स्वप्न का बीज तब बोया गया था. उनके हर भाव, विचार तथा कृत्य का फल मिलता है. कर्म पर ही उनका अधिकार है, फल पर नहीं, फल तो भोगना ही पड़ेगा. यदि उस समय जग जाती तो स्वप्न टूट जाता. सद्गुरू के अनुसार इसी तरह अज्ञान की नींद से जगने पर भी भीतर के सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं. 

Tuesday, November 15, 2016

सूरज और बादल


अप्रैल का अंतिम दिन ! देखते-देखते नये वर्ष के चार माह गुजर गये और गुजर गया उनके जीवन का का भी एक और हिस्सा. एक दिन सारी सांसें गुजर जाएँगी और वे आकाश में स्थित होकर देखेंगे अपने ही तन को निस्पंद ! उससे पहले ही यदि संसार को कुछ देना है तो दे देना चाहिए कुछ और गीत कुछ और कविताएँ ! ! मार्च माह की कविताओं में भी उसकी कविता सातवें पायदान पर आयी हुई, ‘पिता’ नामकी कविता अभी अगले तीन हफ्ते तक कहीं प्रकाशित नहीं करनी है. आज जून ऑफिस में ही लंच लेने वाले हैं. मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है. उन्होंने काफी कलात्मक भाषा में विदाई भाषण लिखा है. नन्हा पिछली बार एक किताब लाया था जिसमें साईं बाबा के किसी भक्त ने उनके साथ घटे अपने अनुभवों को लिखा है, आज कुछ देर पढ़ी.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, गले में दर्द था परसों शाम से ही. आज काफी ठीक है, लेकिन नाक बंद है. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हुई है तभी जुकाम हुआ या फिर यह किसी कर्म का परिणाम है. यदि भीतर प्रश्न जिन्दा रहते हैं तो समय-समय पर नये विचार आते हैं. यदि समझा-बुझा कर मन को शांत कर दिया और भीतर तक पहुंचे नहीं तो मार्ग अवरुद्ध हो गया, उदासीन होकर बैठ जाने से रास्ता मिलता नहीं.

कल चार तारीख थी, बच्चों को पढ़ाते समय उसने तीन लिखी, उन्होंने भी नहीं बताया, जबकि वे स्कूल भी गये थे. सोये-सोये ही वे सारी उम्र गुजार देते हैं, आखिर कब होगा जागरण ? आज मौसम गर्म है. मई में यही स्वाभाविक ही है. गले में चुभन है सो चावल खाने का मन नहीं है. योग वशिष्ठ में पढ़ा कि जब भोजन पचता नहीं तब व्याधि होती है. तनाव होने से भोजन नहीं पचता. महीनों से भोजन के समय वातावरण बोझिल हो जाता है, माँ कुछ खाना नहीं चाहतीं तो कभी पिताजी झुंझला जाते हैं कभी जून. आत्मा है ऐसा भान हर समय बना नहीं रहता, रहे तो भी मन, बुद्धि, शरीर सब अपनी जगह हैं जो प्रकृति के अनुसार चलेंगे. आज उसे लग रहा है अवश्य ही साधना में कोई गहरी भूल हो रही है अभी तक परमात्मा की कृपा को पूर्ण रूप से अनुभव नहीं कर पायी है. अब भी लगता है कुछ नहीं जानती !

उस साधक की लिखी किताब पढ़कर काफी कुछ स्पष्ट होता जा रहा है, कितने सोये रहते हैं वे, आसक्ति, राग व द्वेष के शिकार होते हैं और सोचते हैं कि सब जानते हैं. अपने अज्ञान का ज्ञान होना ही वास्तव में ज्ञान की पहली सीढ़ी है. मन कैसा धुला-धुला सा लग रहा है, पर अभी भी कितनी परतें छुपी होंगी, दबी होंगी. सद्गुरू दूर रहकर भी शिष्य को सन्मार्ग पर लाने का कार्य करते रहते हैं. सद्गुरू का प्रेम अनंत है, वे उन्हें क्या प्रेम करेंगे, उनके पास एक बूंद भी नहीं जो है भी तो उसमें न जाने कितनी वासनाएं घुली-मिली हैं. परमात्मा को जो अर्पित होगा वह पावन होगा, पर परमात्मा कृपालु है, वह कोई भेद करना जनता ही नहीं, जो उसे पुकारे उसी पर कृपा लुटाता है !

तन स्वस्थ हो तो मन भी स्वस्थ रहता है. आज एक गर्मी भरा दिन है, बाहर धूप बहुत तेज है. चमचमाता हुआ सूर्य जैसे गुस्सा गया है, बादलों को चिढ़ा रहा है कि अब देखें वे उसे ढक के...उधर बादल भी जब मौका देखेंगे बदला लेगें ही. पिताजी बाहर बैठे हैं, अख़बार पढ़ चुके हैं, चुपचाप बैठे हैं, भीतर कमरे में अपनी कुर्सी पर माँ बैठी हैं जैसे उनकी दुनिया से बाकी दुनिया जुदा है, वैसे ही बाकी दुनिया से उनके बच्चों की दुनिया जुदा है. कल नन्हे को साईं बाबा की बात कही तो वह उन्हें जादूगर कह रहा था. भगवान से बड़ा कोई जादूगर है क्या ? परमात्मा की ओर जो ले जाये वह जादूगर कृष्ण भी तो था.. 


Wednesday, November 2, 2016

फटी हुई पुस्तक


दायें तरफ की पड़ोसिन ने फोन किया और पूछा क्या वह क्लब की कमेटी में है, उसने कहा, नहीं, और फिर कहा इस बार नहीं. वर्षों पहले एक ही बार वह कमेटी में थी, प्रोजेक्ट कन्वेनर तीन साल से है, लेकिन उसकी बात से लग रहा था जैसे वह हमेशा ही रहती है पर इस बार नहीं. मन कितना झूठ बोलता है, अपने आपको कुछ दिखाने के लिए, फिर यह भी कहा कि मीटिंग में देर से जाकर जल्दी आ गयी, जबकि सारा समय वह लाइब्रेरी में ही बैठी रही. मन को झूठ बोलने में सोचना भी नहीं पड़ता. अपनी इमेज बनाये रखने के लिए कितने झूठ बोलता चला जाता है. झूठी इमेज की रक्षा के लिए झूठ के सिवा और साधन हो भी क्या सकते हैं. आज सुबह का अंतिम स्वप्न बड़ा मजे का था. उसने एक पुस्तक नींद में फाड़ दी है पर जिसकी है उसे तो लौटानी होगी सो सेलो टेप लगाकर जोड़ने का प्रयास कर रही है, पर जुड़ना कठिन है सो परेशान होकर नींद खुल जाती है व ठीक अगले ही पल अलार्म बजता है, बल्कि उस क्षण मन में यह विचार आया अब अलार्म बजेगा और ऐसा ही हुआ. तभी बंद आँखों के आगे प्रकाश नृत्य करने लगा, यह परमात्मा के आने का ढंग है, सुबह सन्ध्याकाल में वह इसी तरह मिलने आता है. फिर उसने उससे बात भी की. सुबह उठते ही कुछ पंक्तियाँ उसने लिखीं क्योंकि बाद में वे भाव ओस की बूंदों की तरह उड़ जाते हैं ! कितनी देर तक तो वह भीतर अपनी उपस्थिति जाहिर किये रहा फिर मन पर पर्दे छाते चले गये और वह छुप गया, उनके पीछे, झूठ, अहंकार और अज्ञान के पर्दे ! शाम को सूप उसकी असावधानी से कुर्ती पर गिर गया पर मन ने झट कह दिया कि मैच देखते समय उसका ध्यान विकेट की तरफ था सो..कितना चालाक है उसका मन, एक क्षण में कैसे-कैसे बहाने गढ़ लेता है.पर उसे पता चल गया था, उसके भीतर कोई जाग रहा है जो सब जानता है !

आज सुबह फिर चमत्कार घटा, आज्ञा चक्र पर ज्योति जल रही थी, एक दीपक की लौ, नींद खुली और विचार आया, अब अलार्म बजेगा और वही हुआ, ठीक चार बजे कोई जगा देता है, वही जो भीतर जाग रहा है. परमात्मा उसे धीरे-धीरे अपने नजदीक ले रहा है, पहले वह उसे पुकारती थी अब वह खुद उसे बुलाता है, उसने अपने को प्रकट कर दिया है. उसके अहंकार को चूर करने के उसके प्रयास भी जारी हैं. उसे अपने भीतर सूक्ष्म से सूक्ष्म विकार भी स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं. सभी के भीतर उसी की ज्योति भी दिखाई देती है, किसी को तिलमात्र भी चोट पहुँचाने पर भीतर कैसी पीड़ा जगती है जैसे खुद को ही सताया हो..वे सब एक ही हैं, इस बात का अनुभव भी हो रहा है. अब सारी कामनाएं एक ही केंद्र पर केन्द्रित हो गयी हैं. वह परमात्मा इसी जन्म में उसे मुक्त कर दे. इस में बाधा उसके पूर्व संस्कार हैं व प्रारब्ध कर्म, लेकिन सद्गुरू की कृपा का अक्षय भंडार भी तो साथ है. आज सत्संग है, वे भजन गायेंगे, ध्यान करेंगे और परमात्मा को अपने सारे गुण-अवगुण समर्पित कर देंगे, खाली होकर बैठ रहेंगे फिर वही वह रहेगा, वह एकछत्र साम्राज्य चाहता है..दो दिन बाद नन्हा आ रहा है, उससे भी अध्यात्म पर चर्चा होगी. मुरारी बापू बाबा रामदेव के पतंजलि आश्रम में कथा कर रहे हैं. वे पतंजलि के योग सूत्रों का रामचरित मानस के आधार पर वर्णन कर रहे हैं. यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि ! ये आठ अंग रामायण के सात कांडों में व्यक्त हुए हैं ! वह कह रहे हैं कृपा का पात्र बनना है, अंतर घट को पावन करना है, उसे सीधा करना है तथा उसके छिद्रों को पूरना है.

सुबह अलार्म बजा तो वह पहले से ही जगी थी, परमात्मा को जगाने नहीं आना पड़ा, वैसे भी वह कहीं दूर तो है नहीं जो उसे आना पड़े. वह उनकी आत्मा ही तो है, प्रकाश उसका स्वरूप है, शांति, आनंद, प्रेम, सुख, शक्ति, ज्ञान तथा पवित्रता उसके गुण हैं, जिनके अनंत प्रकार हैं. वह परमात्मा छिपा नहीं है पर उनकी दृष्टि पर ही मोटे-मोटे पर्दे पड़े हैं. उसे देखने के लिए अंतर की आँख चाहिए. कल दिन भर जून ठीक रहे पर शाम को नन्हे का फोन आ गया. वह बंगलूरू में एक घर खरीदने की सोच रहे हैं. उनको भी अपनी स्वतन्त्रता उतनी ही प्रिय है जितनी उसे. कल आभास हुआ कि किसी को जब वे सलाह देते हैं तो उसे कैसे चुभती है, कोई भी नहीं चाहता कि कोई और उसे बताये कि उसके लिए क्या ठीक है, उसे क्या करना चाहिए. अब जबकि वह तथाकथित साधना कर रही है, अहंकार को विसर्जित करना जिसकी पहली शर्त है, उसे कितना नागवार गुजरा चाहे पल भर को ही, क्योंकि तुरंत भीतर वाले ने सचेत कर दिया, लेकिन अब उसे कान पकड़ लेने हैं, किसी को भूल कर भी कोई सलाह नहीं देनी है, क्योंकि उन्हें दी गयी पीड़ा उसे ही मिलने वाली है, अंततः वे जुड़े हए हैं. जून का उसे सम्मान करना करना है और उनकी रजोगुणी प्रवृत्ति स्वत: ही सतोगुण में बदलेगी, वैसे ही नन्हे की भी, वह ऊपर उठ रहा है, उसे तो केवल खुद को देखना है, भीतर कोई दम्भ न रहे, पाखंड न रहे, भेद न रहे, खाली हो जाये मन..तभी तो उस परमात्मा को भरा जा सकता है..सारी इच्छाएं बस इसी एक में मिल गयी हैं..एक ही काम है लिखना, पढ़ना और सुनना..   


Tuesday, October 18, 2016

जला हुआ दूध


फिर एक अन्तराल ! सुबह चार बजे ही अलार्म सुनकर नींद खुल गयी, न बजे तो पता नहीं कितनी देर से खुले. दिन ऐसे बेहोशी में बीत रहे हैं. आज दूध देर से आया था, दोपहर को गैस पर रख कर भूल गयी. जून को लंच के बाद बाहर तक छोड़कर आई तो दूध चूल्हे से उतारने के बजाय कम्प्यूटर के सामने बैठ गयी और पतीला बुरी तरह से जल गया. देखें कितना साफ होता है, नैनी को कहा है कि रगड़-रगड़ कर साफ करे. सारे घर में जले हुए दूध की गंध फ़ैल गयी है. ब्लॉग पर ‘गंगा’ कविता डाली, तस्वीर नहीं आ पाई, स्पीड बहुत कम थी. जून ने दोपहर को पपीते के परांठे की तारीफ़ क्या कर दी, सब भूल गयी. दुःख में मानव सजग रहता है, सुख उसे बेहोश कर देता है, पर उन्हें तो दोनों का साक्षी होकर रहना है. सजग होकर रहना ही आत्मा में रहना है. विचार सदा भूत या भविष्य के होते हैं, वर्तमान में कोई विचार नहीं होता, वर्तमान का पल इतना सूक्ष्म होता है कि बस वह होता है. पिछले दिनों जो पुस्तक पढ़ती रही उसने भी मन पर जैसे पर्दा डाल दिया था. खैर, ठोकर लगकर ही इन्सान सुधरता है. भीतर जो साक्षी है, वह तो अब भी वैसा ही है, निर्विकार और स्थितप्रज्ञ, यह जो उथल-पुथल मची है, यह अहंकार को ही सता रही है.

कल से एक नई किताब पढ़नी शुरू की है, जो कोलकाता यात्रा के दौरान खरीदी थी पर अभी तक पढ़ी नहीं थी. इसके अनुसार सबसे अच्छा ध्यान है कुछ भी न किया जाये, साक्षी भाव में रहा जाये. जब जरूरत हो तभी मन से काम लेना है, अन्यथा उसे शांत रहने दें. अपने आप आकाश में बादलों की तरह कोई विचार आये तो उसे गुजर जाने दें, बिना कोई टिप्पणी किये क्योंकि टिप्पणी करके भी क्या होगा, व्यर्थ ऊर्जा नष्ट होगी. जीवन में भी इसी सिद्धांत को अपनाना होगा तथा ध्यान में भी. हर समय इसी को पक्का करना होगा तब न अहंकार रहेगा न दुःख ! साक्षी भाव इतना सूक्ष्म है कि मन, बुद्धि की पकड़ में नहीं आता, जब कुछ न करें तो बस वही होता है लेकिन जैसे ही भीतर कोई स्फुरणा हुई वह लोप हो जाता है, बड़ा शर्मीला है ! अंतर के आकाश में जब वर्तमान का सूरज खिलता है तो अतीत के बादल छंट जाते हैं.

आज विश्व महिला दिवस है, उसे अपने भीतर अनंत शक्ति का उदय होता दिखाई दे रहा है. कल शाम को क्लब में पहली बार बिलियर्ड खेला. q तथा v का भेद जाना, अच्छा लगा. कोच अच्छी तरह सिखा रहे हैं. कुछ न कुछ नया सीखते रहना चाहिए. होली का उत्सव आने वाला है. होली का उद्देश्य है सारे मतभेद भुलाकर मस्त हो जाना, अद्वैत का संदेश देती है होली..एकता का, प्रेम का, मिठास का, मधुरता का..जब आम पर बौर छा जाते हैं और पलाश के फूलों से वृक्ष सज जाते हैं. भंवरे और तितलियाँ गुंजन करती हैं, जब हवा में मदमस्त करने वाली सुगंध भर जाती है. जब महुआ फूलों से लद जाता है. गाँव-देहात में फागुनी बयार की मस्ती में लोग फागुन गाते हैं और जब बच्चों की परीक्षाएं होने वाली होती हैं, तब होली आती है. रंगों की बातें करे तो हर रंग सुंदर है. सतरंगी यह जगत और सुंदर बन जाता है, तो होली पर कविता लिखी जा सकती है..


Thursday, March 31, 2016

खोया हुआ सा कुछ - निदा फाजली


जब कोई मर्यादा को तोड़ देता है तब पतन निश्चित है. ज्ञान की अग्नि में मन रूपी सोने को उन्होंने तपाया है किन्तु ज्ञान की मर्यादा का भंग भी वे कर देते हैं. सत्य तो यह है कि स्वयं को मुक्त जानकर मर्यादा रखते ही नहीं, बड़ों के प्रति सम्मान भी एक मर्यादा है, वाणी की भी मर्यादा है. उनके भीतर की ग्रन्थियों को जो खोल दे वही तो मर्यादा है. मर्यादा भंग करते-करते वे इतने असंवेदनशील हो गये हैं कि जिनके प्रति व मर्यादाहीन हो रहे हैं उनकी भावनाओं का भी ध्यान उन्हें नहीं आता. आज जून दिल्ली गये हैं, दो दिन बाद आएंगे. उसे आराम से रामकथा सुनने का मौका मिला है. संत कह रहे हैं सोच को हृदय तक लाना आयास-प्रयास से नहीं होता, ज्ञान को प्रेम में बदलना सायास नहीं होता. हृदय में स्वतः आना ही ज्ञान की सफलता है. बुद्धि और हृदय जब एक हो जाते हैं तभी योग होता है. हृदयवान व्यक्ति जब बुद्धि के बहकावे में आ जाये तो घाटे का सौदा है पर बुद्धिमान व्यक्ति जब हृदय के क्षेत्र में आ जाये तो यह परमात्मा तक की यात्रा है. निरंतर उस तत्व से जुड़ जाना ही संतुष्टि है. ऐसा संतोष जब मिलता है तब सारी तृष्णायें छोटी हो जाती हैं. असंगता, समता, निरभिमानी होना, अक्षोभता तथा अनंतता ये सभी ज्ञान की मर्यादाएं हैं. प्रेम की प्रगाढ़ता में ये टूटती हैं पर तब ज्ञान सफल हो जाता है. प्रेमी असंग नहीं होता, वह समता भी नहीं रख पाता, विरह उसे सताता है. प्रेमी अभिमानी भी है, उसे प्रियतम का और अपने प्रेम का अभिमान है. हाँ, प्रेम भी अनंत होता है. इसलिए इसकी तो चिंता ही नहीं करनी चाहिए यदि वे सभी को प्रेम बांटते रहे तो उनके पास कम हो जायेगा और यदि कोई बदले में उन्हें प्रेम न दे तो वे खाली हो जायेंगे, बल्कि जब कोई किसी को प्रेम देगा तो वह अपने आप पुनः भर जायेगा. परमात्मा ही तो प्रेम है, वही तो आनन्द है, शांति है, तो जब कोई किसी को इनमें से कुछ भी देता है तत्क्षण वह जगह भर जाती है. आज पुस्तकालय में मीटिंग थी, मुख्य अतिथि को उसने आदरपूर्वक असमिया गमछा पहनाया. आज की कथा में यह शेर भी सुना था पता नहीं किसका लिखा है-
ये तुझसे किसने कहा कि दिल गम से तबाह नहीं
ये और बात है कि मेरे लब पे आह नहीं
एक मैं हूँ कि सरापा सवाल हूँ
एक तू है कि तुझे फुर्सते निगाह नहीं !

निदा फाजली की पुस्तक खोया हुआ सा कुछ उसने पढ़ी, कल से पढ़ रही है. एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी पढ़ा था. हर लेखक/ कवि/ कलाकार के भीतर साझा दर्द होता है, साझी खुशियाँ होती हैं. प्रकृति के विभिन्न रूपों से प्रेम, ईश्वर की मौजूदगी का अहसास या तलाश और रिश्तों को गहराई से महसूसने की ताकत, भीतर उमड़ता ढेर सारा प्यार, जिसे बिखरने के लिए कोई रास्ता नहीं नजर आता. निदा फाजली से पाठक का एक रिश्ता बन जाता है, वह उसे अपना जैसा लगता है. उनके दोहे भी अच्छे लगे. सीधे-सादे शब्दों में दिल की बात, दिल की गहराई से निकली बात ही दिल को छू जाती है.

‘वो सूफी का कौल हो या पंडित का ज्ञान
जितनी बीते आप पर उतना ही सच जान

माटी से माटी मिले, खो के सभी निशान
किसमें कितना कौन है कैसे हो पहचान

युग-युग से हर बाग़ का ये ही एक उसूल
जिसको हँसना आ गया वो ही मिट्टी फूल

जीवन भर भटका किये खुली न मन की गाँठ
उसका रस्ता छोड़कर देखी उसकी बाट’

आज तीज है, सावन के शुक्ल पक्ष की तीज. उसने सुबह-सुबह मंझले व बड़े भाई तथा बड़ी बुआ से बात की. जून कहते हैं वह भावनाओं को ज्यादा महत्व देती है, बुद्धि को कम. भावना के साथ-साथ बुद्धि का होना भी कितना आवश्यक है, मात्र भावना के कारण वह कितनी बार मूर्ख बनी है. मुरारी बापू कहेंगे, कोई बात नहीं, मूर्ख बनी है न, किसी को बनाया तो नहीं. खैर, ओशो कहते हैं कि बेवकूफ ही परमात्मा के मार्ग पर चल सकते हैं, पर वह कहते हैं ऐसा बेवकूफ बुद्द्धि का अतिक्रमण कर जाता है, यहाँ तो बुद्धि के लाले पड़े हैं, लांघने की बात ही नहीं है. परमात्मा की कृपा तो हर क्षण बरस रही है, लूट मची है, इतनी ज्यादा है कि दोनों हाथों में नहीं समाती, अनवरत बरस रही है, लगातार उसकी कृपा हरेक पर बरस रही है. वे आँखें मूँदे बैठे रहें तो कोई क्या करे. वर्षा पुनः शुरू हो गयी है. दस बजे तक रुक जानी चाहिए. आज सुबह स्वीपर नहीं आया, अब आया है जो उसके ध्यान का समय है. दस बजे एक परिचिता के यहाँ जाना है, उसे समय दिया है. पूजा की छुट्टियों वे यात्रा पर जायेंगे. जून ने अभी से टिकटें कर दी हैं. उनके जीवन में पहले से कहीं अधिक क्रियाशीलता है, इसका पता कल बनाई लिस्ट देखकर लगता है. उसे भी अपनी ऊर्जा का पूरा उपयोग करना है. आजकल कितने अनोखे अनुभव होते हैं, जैसे वह है ही नहीं, बस वही है. उसके हाथों की जैसे कठपुतली है, वह जैसा कहे वैसा करती जाये. कितना असीम है वह और कैसे एक मानव के हृदय में समा जाता है. कितना असंग है पर लगता है उसका संग कभी छूटता ही नहीं ! वह जादूगर है !     


     

Wednesday, October 28, 2015

कान्हा और राधा


क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, कोई कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करे, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो सम्भवतः वहाँ तक भी नहीं ले जाते, जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है आत्मा का, वहाँ कुछ भी नहीं है न कोई दृश्य न द्रष्टा, न कोई ध्वनि न प्रकाश, केवल शुद्ध चैतन्य, वहाँ कोई भाव भी नहीं, अभाव भी नहीं..वहाँ शुद्ध चेतना अपने-आप में है, बस वह परमात्मा में है या कहें वही परमात्मा भी है. उस क्षण दोनों एक हो जाते हैं और जब वही चेतना मन, बुद्धि के साथ जुड़कर संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है. आज सदगुरु ने नारद भक्ति सूत्र पर आगे बोलना शुरू किया, कितना सरल है उनसे गूढ़ शास्त्रों का अध्ययन करना, जो लोग उनके सम्मुख बैठे थे, वे कितनी तृप्ति का अनुभव करते होंगे. इस जन्म में उसके भाग्य नहीं हैं कि निकट से वह ज्ञान ले, पर टीवी के माध्यम से से ही सही उसका जीवन हर दिन उच्च होता जा रहा है. परमात्मा अपनी कृपा हर पल बरसाता है और अब उसे उस कृपा को समेटना भी आने लगा है, भीतर की प्रसन्नता का अनुभव अब अन्यों को भी लाभ देने लगा है, सभी जगें यही तो सद्गुरु की कामना है !

जीवात्मा में कारण शरीर, तेजस शरीर तथा आत्मा तीनों होते हैं. मृत्यु के समय तीनों स्थूल शरीर को छोड़ देते हैं तथा कारण शरीर में जो कर्मों का लेखा जोखा होता है उसी के अनुसार नया शरीर मिलता है. उसका अगला जन्म अवश्य ही किसी संत के करीब ही होगा, संतों के प्रति उसके मन में सहज स्वाभाविक प्रेम जो है. आज सद्गुरु ने होली का महत्व बताया. होली के एक दिन पहले भगवान शिव ने कामदेव को जलाया था होलिका भी जलकर राख हुई थी अर्थात उन्हें कामनाओं को दग्ध करना है, द्वेष को जलाना है तथा घर में जो भी टूटा-फूटा पुराना सामान है उसे भी जलाना है ताकि नये वर्ष में नया जीवन मिले. फागुन के बाद चैत्र का महीना नये साल का पहला महीना ही तो है. दूसरे दिन सभी खुश होते हैं तथा रंगों से एक-दूसरे को नहलाते हैं ! कल होली है उसे सभी के लिए कुछ लिखना है, दो-दो पंक्तियाँ ही सही, ऐसा कुछ जो उन्हें गुदगुदा जाये. उनका नया कमरा बन कर तैयार हो गया है, जून उसके लिए एक पेपर पर नाम भी लिख कर लाये हैं, सतनाम ध्यान कक्ष अगले हफ्ते वे उसे सजायेंगे जैसे कि उसने पहले कल्पना की थी. आज उसके लिए कार्पेट का आर्डर देने तिनसुकिया जाना है, उसकी पुस्तक का काम भी आगे बढ़ रहा है. जून उसकी पूरी सहायता कर रहे हैं, उस दिन के उसके रोष का असर हुआ है.


पिछले तीन-चार दिन व्यस्तता में बीते, पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करके जून ले आये हैं. लेख का कार्य भी हो गया है, अब शेष है नये कमरे को सजाने का कार्य जो आज सम्भवतः हो जायेगा जब कारपेट आ जायेगा. उसकी साधना भी कम हुई पर नीरू माँ कहती हैं कि क्रिया और पदार्थ दोनों के बिना ही ज्ञान को हृदय में धारण करने से ही परम तत्व की प्राप्ति हो जाती है. सदा यह याद रहे कि वह आत्मा है, मन, शरीर व् बुद्धि नहीं है. आत्मा का गुण है शांति, जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि आत्मा में स्थिति है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना तथा मन, बुद्धि आदि में यदि कोई हलचल हो भी तो उसे साक्षी भाव से देखने भर से ही वह हलचल जैसे उत्पन्न हुई थी वैसे ही नष्ट हो जाती है. आत्मा में सारे ही गुण हैं, जहाँ प्रेम है वहाँ किस बात की कमी हो सकती है ? संसार के सुख जिसे फीके लगते हैं उसे ही इस आत्मा की प्राप्ति होती है, सद्गुरु की कृपा से ही उसे यह अमूल्य धन प्राप्त हुआ है और परमात्मा की कृपा से ही सद्गुरु जीवन में आते हैं ! नये कमरे के लिए काफी पहले जून एक सुंदर मूर्ति लाये थे, वह कृष्ण उसके ध्यान कक्ष में राधा के साथ विराजमान हैं, उसमें उसने प्राण प्रतिष्ठा की है अब वह जीता-जागता है, जड़ नहीं है, वह सदा उनके साथ है. सद्गुरु की मुस्कुराती हुई तस्वीर भी इस कमरे की शोभा बढ़ा रही है, उन्हें देखकर चेहरे पर अपने-आप ही मुस्कान आ जाती है, वह भी उनके साथ हैं. मीठी-मीठी गुंजन जो उसके दायें कान से सदा सुनाई देती है, उन्हीं का पता बताती है. 

Thursday, August 6, 2015

नन्ही नन्ही चिड़ियाँ


आज सुबह पाँच बजे से थोड़ा पहले चिड़ियों की चहचहाहट से उठी. कल शाम सत्संग से लौटी तो जून क्लब में ही थे, उन्हें रात को देर से घर आना था. अकेले भोजन किया और जन्मदिन की कविता लिखी. तेजपुर में एडवांस कोर्स होने वाला है, उसने पूछने से पहले ही कल्पना कर ली थी कि जून का जवाब नकारात्मक रहने वाला है, सो सुबह उनकी सहज रूप से कही बात कि कोई और जा रहा है या नहीं, उसे नागवार गुजरी, उसने कहा किसी के जाने या न जाने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. मन ने प्रतिक्रिया की और शायद उसी का असर है कि मन उत्साहित नहीं है, अब जो वस्त्र बिलकुल स्वच्छ हो उस पर हल्का सा दाग भी चुभता है, जो मन पूरी तरह शांत रहने का आदी हो उसे जरा सी भी बेचैनी नहीं सुहाती. उसके भीतर जो डर है कि उन्हें नाराज करके वह नहीं जी सकती, शायद इस बेचैनी का कारण वही है. जहाँ प्रेम होता है वहँ डर नहीं होना चाहिए, जहाँ डर है वहाँ प्रेम नहीं है. यह डर उसके अवचेतन में बैठ गया है. उसे यदि मुक्त होना है तो इससे छुटकारा पाना होगा. ईश्वर है, सद्गुरु है, ज्ञान है, पर भीतर तब भी अँधेरा है तो इसका अर्थ है कि वे सब कुछ नहीं कर सकते, अपने भीतर का अंधकार स्वयं ही दूर करना है, उन्हें देखकर प्रेरणा ले सकते हैं पर यदि कोई यह सोचे कि उनके सारे दुखों का अंत कृपा से ही हो जायेगा तो यह भूल है.

भीतर ही भीतर ऐसा लगता है कि कहीं कुछ अधूरा रह गया है. सद्गुरु ने जो कहा वह उस पर नहीं चल रही. लेकिन यह आत्मग्लानि तो सेवा न करने से ज्यादा घातक है. इससे बचने को तो उन्होंने विशेष तौर पर कहा है. जब अवसर मिले तब सेवा के कार्य से पीछे न हटना भी तो सेवा है. स्वयं से परे जो भी है उसका कार्य करना संसार की सेवा ही कही जाएगी, ध्यान भी उसमें आ जायेगा. आज योग वसिष्ठ में उद्दालक का चरित्र पढ़ा, कितनी अद्भुत पुस्तक है यह, स्वामी रामसुखदास ने कहा कि जड़ता से संबंध तोडना है तो चित्र से मोह क्यों ? अब भविष्य में फोटो नहीं खिंचाएगी ?
‘मन मस्त हुआ तब क्यों बोले, तेरा साहिब है घर माहिं बाहर नैना क्यों खोले ?’ जब तक संसार के अच्छे-बुरे कहने की परवाह थी तब तक भीतर की मस्ती का पता नहीं था. उसकी एक सखी ने कहा, अब उसके जीवन में सब स्पष्ट है..वह इसी वर्ष एक सन्तान को गोद ले रही है. उसे खुश देखकर नूना को बहुत ख़ुशी हुई, उसका ज्ञान टिका तरहे ऐसा उसने प्रार्थना की.

आज सुबह भी चिड़ियों ने जगाया, रात सोने में देर हुई. कल दोपहर लेख लिख लिया आज उसे टाइप करना आरम्भ किया है. शाम को एक परिचित वृद्ध महिला आने वाली हैं, उससे पहले शाम के सब काम खत्म करने हैं. अभी चार बजने को हैं, कुछ देर पहले दीदी से बात की, जीजाजी का स्वास्थ्य कुछ दिन पहले बिगड़ गया था, अब ठीक है. उन्होंने याद दिलाया कि सद्गुरु के प्रति उसके मन में कितनी भक्ति से भरी भावनाएं हैं. आजकल वह अपने मन को देख रही है, वह ज्यादा समय जगत में खोया रहता है, वैसे उसे परेशान नहीं कर रहा और न ही स्वयं है. भीतर एक अलग ही वातावरण बन गया है, जहाँ अब दो नहीं हैं. गुरू और ईश्वर जो पहले जुदा प्रतीत होते थे कि उनसे प्रेम किया जाये अब कोई भेद ही नहीं लगता, जैसे कोई तलाश पूरी हो गईं है. जैसे जो जानना था जान लिया है. एक तृप्ति का अहसास हो रहा है. यह भावना बिलकुल अलग है, पहले भी तृप्ति का अहसास होता रहा है पर वह भिन्न भाव था. सद्गुरु ने ही उसके मन पर कोई जादू किया है, कोई असर डाला है. विरह के दिन जैसे समाप्त हो गये हैं और मिलन की शांत धारा में मन बह रहा है. जून और नन्हा दोनों से रात को बात होगी. वे उसे छोड़ने गये हैं. आज बहुत दिनों बाद धूप निकली है, दो-दो माली बगीचे में काम कर रहे हैं, आज मजदूर कमरा बनाने नहीं आये. लग रहा है जैसे जीवन में एक ठहराव आ गया है, पर सुबह सद्गुरु को भजन गाते देखकर कदम थिरके जरूर थे !    


Monday, July 27, 2015

ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया


लगता है उसकी विद्यार्थिनी आज फिर भूल गयी है. पिछले शुक्रवार भी वह नहीं आई थी. उसे एक कविता लिखनी है ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिये समय मिल जायेगा. शाम को क्लब जाना है कोरस के अभ्यास के लिए. रात को एक सखी के यहाँ खाने पर जाना है, उसकी शादी की सालगिरह है. सुबह उठने से पूर्व कितने स्वप्न देखे. बर्फ गिर रही है, आकाश एक बड़ी सी फिल्म की स्क्रीन बन गया है, वहाँ लोग एक दूसरे पर बर्फ के गोले बनाकर डाल रहे हैं. सब कुछ इतना स्पष्ट था जैसे सामने घट रहा हो. रात को देर तक नींद नहीं आई, पर इससे उसे कोई परेशानी तो महसूस नहीं होती, शायद वह जगते हुए भी सोती रहती है अर्थात सोते हुए भी जगती है, शायद ध्यान करने से ऐसा होता है. आज नीरू माँ का कार्यक्रम देखा, ऑंखें भर आयीं. कितनी करुणा, कितना प्रेम है उनके भीतर. प्रश्न पूछने वाले तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं पर बिना जरा भी विचलित हुए सभी को जवाब देती हैं. जैन मुनि आचार्य महाप्राज्ञ ने बताया मस्तिष्क का एक प्रकोष्ठ विकसित हो जाय तो मानव का व्यवहार ही बदल जाता है. भीतर की सुप्त शक्ति जब तक जाग्रत नहीं होती वह अज्ञान से मुक्त नहीं हो पाता. उसे जाग्रत करने का पुरुषार्थ तो करना ही है, उसे भाग्य पर नहीं छोड़ा जा सकता. सद्गुरु के बताये मार्ग पर तो चलना ही पड़ेगा. कल पता चला बड़ी भाभी के बड़े भाईसाहब नहीं रहे, उन्हें फोन करना है. कल से नन्हे के इम्तहान हैं. वह कुछ पल नियमित जप करता है. उसे शांति का अनुभव होता है. जब मन शांत होता है तो आत्मा का सहज स्वभाव मुखर हो जाता है. मन को अपने सही स्थान पर रखना ही साधना है.

कल का कार्यक्रम ठीकठाक हो गया. आज शाम को सत्संग में जाना है, कल एक शादी में तथा परसों तीन दिसम्बर है, नेहरू मैदान जाना है. आचानक ही उनके शामें व्यस्त हो गयी हैं. सुबहें और दोपहर तो पहले से ही थीं. कल सद्गुरु को समर्पित उसकी पुस्तिका की उन्नीस प्रतियाँ निकल गयीं, अगले हफ्ते.. और इसी तरह अगले कुछ हफ्तों में और भी लोग इसे लेकर पढ़ेंगे. अभी-अभी वह धूप में गयी, दिसम्बर में भी धूप इतनी तेज है कि दस मिनट से अधिक उसमें नहीं बैठा जा सकता. इसी तरह संसार रूपी धूप में भी देर तक अब रहा नहीं जाता, आत्मा की छाँव में लौट-लौट कर आना होता है, तभी भीतर शीतलता छायी रहती है. ऐसी शीतलता जो अलौकिक है, दिव्य है, प्रेम से पूर्ण है !

पिछले दो दिन फिर नहीं लिखा, रात्रि के पौने आठ बजे हैं. मन में विचार आया कि दिन भर का लेखा-जोखा कर लिया जाये. सुबह उठते ही जैसे पहले अधरों पर प्रार्थना आ जाती थी, “दूर दुनिया की हर बुराई से बचाना मुझको, नेक जो राह हो उस राह पर चलाना मुझको” अब नहीं आती. रात्रि को आने वाले स्वप्न भी पहले से आध्यात्मिक नहीं रह गये हैं, लेकिन होते बहुत अद्भुत हैं. आज दोपहर को Paul Bruntun की पुस्तक A search in secret india पढ़ती रही. शिक्षक ने कहा, विलम्बित ठीक से नहीं हो रहा है, अभ्यास बढ़ाना होगा. शाम को कोपरेटिव जाकर नन्हे के लिए कुछ समान खरीदा, वह परसों आ रहा है, उसकी आलमारी भी पिछले दिनों ठीक कर दी थी. 

Friday, May 22, 2015

टालस्टाय की पुस्तक


कल शाम को उसने जून का इंतजार करते-करते चाय बनायी कि वह आ गये. ढेर सारा सामान गजक, मूंगफली, रेवड़ी, तिल के लड्डू, तिल बुग्गा लेकर, नन्हे को स्वेटर्स पसंद आये. कल शाम भर वह बेहद खुश था, उसके लिए पिज़ा बेस व पिज़ा चीज भी लाये हैं. कल डिनर में उसने वही खाया. रात को वे जल्दी सो गये. सुबह साढ़े चार बजे उठे, ‘क्रिया’ की और क्रिया के बाद उसे अद्भुत संगीत सुनाई दिया. कृष्ण उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उनकी बातें उसे भीतर बहुत सुनाई देती हैं, वह उसके प्रिय, सर्वस्व हैं ! सुबह सभी को फोन किया, पिताजी, दीदी, मंझला भाई.. बड़े भाई-भाभी का फोन कल शाम को आ गया था. जून सभी से मिलकर आये सभी से उपहारों का आदान-प्रदान किया. जीवन इसी लेन-देन का नाम है ! आज दीदी लोग बड़ी भांजी के रिश्ते के लिये जा रहे हैं. इस बार बात बन जाएगी, ऐसी उन्हें आशा है. उसने पिछले दिनों बहुत बार, बहुत जगह फोन किये अब कुछ कम करना होगा, मन पर नियन्त्रण रखना होगा. कल जून उसके लिए Light on yoga और Light on Pranayam भी लाये. दीदी ने दीपक चोपड़ा की पुस्तक The seven spiritual laws for success भी भिजवाई है. पुस्तकें उनकी मार्गदर्शक हैं. टालस्टाय की पुस्तक मन को भीतर तक छू जाती है. अंतर की छोटी-छोटी भावनाओं को कितनी दक्षता से पकड़ते हैं वह. मनोविश्लेषण करने में वह सिद्ध हस्त हैं. मन में हर पल न जाने कितने विचार आकर चले जाते हैं जिनके बारे में कोई ध्यान ही नहीं दता. मन को एक उसी पर टिका दें तो उसकी खबर लगती रहती है. हर पल का साथी है मन पर फिर भी इसकी गहराइयों में क्या छिपा है कोई नहीं जानता. विचित्र हैं इसकी गतिविधियाँ, पर मन कितनी ही चालाकियां करे सूक्ष्म नजर से बच नहीं सकता. अपने ऊपर ऐसी ही कड़ी नजर रखनी होती है सत्य के साधक को...उसका मन दर्पण सा बने जिसमें सारी चालाकियां साफ झलकें और सारी सच्चाईयाँ भी !

परसों पूर्णिमा थी. कल से माघ का महीना आरम्भ हो गया. उसने आज मौन व्रत रखा है, फोन निकाल दिया है पर ध्यान कई बार उस ओर गया. कबीरदास ने ठीक ही कहा है कि माला तो कर में फिरे..आज सुबह सद्गुरु ने बताया कि मौन में मन भीतर केन्द्रित होता है, उर्जा एकत्र होती है जिसे कोई साधना में उपयोग में ला सकते हैं. ज्ञान जब व्यवहार में उतर जायेगा तभी वह ज्ञान है, वरना तो पुस्तकों में अनंत ज्ञान भरा पड़ा है, वहाँ से थोडा सा मन में भर भी लिया तो कोई हर्ज नहीं है. ज्ञान का पथिक बनना है तो स्वयं को हर क्षण कसौटी पर कसना होगा, थोड़ी सी बेखबरी भी नहीं चलेगी ! साधना के पथ पर चाहे आरम्भ में कितनी ही कठिनाइयाँ हों, अंत में अनंत सुख है, न भी हो उसे सुख की चाह भी नहीं है, परम सत्य को जानना है. सच्चाई को स्वयं अपनी आँखों से देखना है, अंतिम सत्य क्या है ? वे इस जगत में क्यों आये हैं, उनकी मंजिल क्या है ? गुरुओं के बताये मार्ग पर स्वयं चलकर देखना है, ईश्वर का साक्षत्कार करना है. तत्व ज्ञान पाना है. उस परम अनुभव को अपना बनाना है. यही उसका साध्य है. उसका पथ ज्ञान, भक्ति और कर्म का मिलाजुला हो सकता है. पथ से पल भर के लिए भी डिगना नहीं है. उसका यह सौभाग्य है कि कृष्ण के प्रति हृदय में भक्ति है, सद्गुरु के प्रति श्रद्धा है तथा हृदय में कोई ऐसी कामना नहीं है जिसके पूरे न होने पर उसे शोक हो. लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, मत्सर से अभी पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है मन..संस्कार बहुत गहरे हैं, पर ध्यान, जो वह नियमित करती है इसमें अवश्य सहायक सिद्ध होगा ! ईश्वर की शरण लिए बिना मुक्ति असम्भव है.  


Monday, May 18, 2015

फ्लोटिंग कैंडल्स




आज सुबह वह उठी तो रात देखे दो स्वप्नों की स्मृति मन पर छायी थी, एक में माँ को मृत्यु शैया पर देखा, उनका बदन गुलाबी हो चुका है, तलवे तथा हथेलियाँ तो लाल ही हैं. डाक्टर ने जवाब दे दिया है और उनके देखते-देखते वह उन्हें चेताते हुए दम तोड़ देती हैं. वह कुछ देर स्वप्न  में रोई पर शीघ्र ही नींद खुल गयी और भान हो गया. दूसरे स्वप्न में वे एक यात्रा में हैं ट्रेन की खिड़की से एक विषैला सर्प अंदर आ जाता है वह उसका फन पकड़ कर उसे मारने में सफल होती है, सभी डर रहे थे, यह स्वप्न सम्भवतः उस द्वंद्व के कारण था जिसे लेकर वह रात को सोयी थी. दिन में उन्होंने ‘कांटे’ फिल्म देखी, बहुत अच्छी तो नहीं लगी पर कुछ का अभिनय अच्छा था. नन्हा दिगबोई में है. कल क्लब में मीटिंग थी, उसने नये वर्ष की शुभकामनाओं वाली कविता पढ़ी, एक सदस्या ने ‘फ्लोटिंग कैंडल्स’ बनाना सिखाया. वापस आई तो एक मित्र परिवार मिलने आया हुआ था, उसने चिवड़ा-मटर बनाया, नमक कुछ अधिक हो गया. आज सभी संबंधियों को उन्होंने नये वर्ष के कार्ड भी भेज दिए.

कल रात्रि वे सोये ही थे कि बड़े भैया का फोन आया, दोपहर तीन बजे चाचाजी का देहांत हो गया. आत्मा ने अशक्त देह को त्याग दिया. मंगलवार को चौथा है, इतनी दूर से वह ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना ही कर सकती है. जून नन्हे को लाने दिगबोई गये हैं. उसके स्कूल की प्रदर्शनी तीन दिनों तक चलने वाली है, यह बात उन्हें पहले पता ही नहीं थी. मित्र के घर रहना उसे अच्छा लग रहा है, यह बात उसने फोन पर दो-तीन बार बतायी. कल मौसम बेहद ठंडा था, वर्षा हो रही थी, आज धूप खिली है. कल वे बहुत दिनों बाद लाइब्रेरी भी गये, Don Moraes की पुस्तक Indian Journeys लायी है, अवश्य ही यह पुस्तक रोचक होगी. कल सुबह पिताजी से बात हुई, वह चाचाजी के यहाँ जाने वाले थे. छोटे चचेरे भाई के बारे में बड़ी भाभी ने जो बताया काश वह सच न हो. उसे नशे की आदत पड़ गयी है ऐसा उन्होंने कहा, जो बेहद दुखद समाचार है.

वर्ष का अंतिम दिन, धूप खिली है, फूल मुस्का रहे हैं जैसे वे सदा ही करते हैं. वह इन सर्दियों में पहली बार बाहर लॉन में बैठकर लिख रही है, इसकी प्रेरणा एक सखी से मिली जिसने कहा कि कल नये वर्ष के पहले दिन की पिकनिक उनके लॉन में मनाते हैं प्रकृति के सान्निध्य में. नन्हे की छुट्टियाँ चल रही हैं. इस पूरे वर्ष का लेखा-जोखा करें तो उन्हें यह ज्ञान के पथ पर ले जाने वाला वर्ष रहा है. ईश्वर की निकटता का अनुभव हुआ है और कई अच्छी पुस्तकें भी पढ़ीं. नन्हे का हाई स्कल का रिजल्ट आया, जून का प्रोजेक्ट शुरू हुआ, उसने संगीत की पहली परीक्षा दी. आने वाला वर्ष भी उन्हें ज्ञान के मार्ग पर दृढ़ करे. ईश्वर को वे अपना बनाये रखें. परहित की भावना प्रबल हो, विकारों से मुक्त हों, स्वार्थी न बनें, अपने कर्त्तव्यों को निबाहें और ध्यान से वर्तमान  में रहें. तभी नूतनवर्ष उन सभी के लिए मंगलमय होगा. गुलाब के सुंदर फूलों की तरह उनकी सुवास ही सबको मिले, वाणी शुभ हो. मनसा, वाचा, कर्मणा वे कभी भी डिगे नहीं, चूके नहीं, कृष्ण को अपना मीत बनाया है यह एक पल को भी न भूलें तभी होगा जून , नन्हा और उसके लिए नया वर्ष मंगलमय...विदा जाते हुए वर्ष और स्वागत नये वर्ष.

Tuesday, September 23, 2014

भागवद पुराण का श्लोक


आज उनके महिला क्लब की मीटिंग है, उस दिन अंध विद्यालय में जाने के बाद से क्लब के प्रति उसका सम्मान बढ़ गया है, सो आज वह जा रही है. सुबह भाई-भाभी से बात की. आज जून उसकी किताब भेज रहे हैं. अभी-अभी असमिया सखी का फोन आया, उसने दूरदर्शन पर एक नीति वचन सुना था, बताया, यह भी कहा कि उसकी किताब देखकर उसे बेहद ख़ुशी हुई है. उम्र के साथ-साथ उनकी मित्रता भी परिपक्व हो रही है. बाबाजी ने आज एक श्लोक का अर्थ बताया जो भागवद पुराण से लिया गया था, “कल का अजीर्ण आज के उपवास से दूर किया जा सकता है और कल का प्रारब्ध आज के पुरुषार्थ से”. मानव अपने भाग्य का विधाता स्वयं है. वास्तव में यदि वे प्रयत्न करें और सच्चे हृदय से ईश्वर के मार्ग पर चलें, ईश्वर का मार्ग यानि सच का मार्ग, तो उनके कार्य सफल होने लगते हैं. खोट भीतर नहीं होनी चाहिए, ईमानदारी का सौदा है यह. आज नैनी ने कहा उसके पास एक धार्मिक पुस्तक है जिसमें उर्दू और असमिया दोनों भाषाओँ में लिखा है. एक सूरा ऐसी है जिसको पढ़ पाने से शैतान कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता. अन्धविश्वास में डूबा है आज भी मुस्लिम धर्म. वह उस किताब को पढ़ना चाहती है क्यों कि उसे कुरान को छूने की इजाजत नहीं है. कल रात वर्षा हुई और कहीं पास ही बिजली भी गिरी. बादलों की गड़गड़ाहट की जोरदार आवाज हुई उसकी नींद खुल गयी और उस कविता का स्मरण हो आया जिसमें दिल धड़कने का जिक्र है. संसद में अवकाश है सो पता नहीं चल पाता दोनों पार्टियाँ कितना विरोध कर रही हैं, धीरे-धीरे तहलका का ज्वर उतरने लगा है. लोग एक दूसरे से क्षमायाचना कर रहे हैं. भविष्य में वे लोग सचेत रहेंगे इतना तो फायदा इस प्रकरण से होगा ही. उसे आज दोपहर को वह अधूरी गजल पूरी करनी है.  

कल की मीटिंग अच्छी रही. एरिया टेन ने एक रीमिक्स कोरस गया और एक समूह नृत्य भी पेश किया. एक महिला कुछ कास्मेटिक प्रोडक्ट्स लेकर आई थी और कुकिंग प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था. वह पड़ोसिन सखी के साथ गयी थी. उसने ‘ध्यान’ करने का प्रयास किया पर सफल नहीं हुई, नैनी का बेटा तेज संगीत बजा रहा था, सडक पर वाहनों की आवाजें थीं और वर्षा की रिमझिम भी, जो कल रात से हो रही है. उसने आँखें बंद कीं तो तंद्रा घेरने लगी, कभी-कभी ऐसा होता है जब मन शांत नहीं हो पाता. आज का दिन सामने पड़ा है कोरे कागज की तरह, जो चाहे लिख दे. दोपहर का कार्य नियत है. शाम कुछ भिन्न हो सकती है. कल लाइब्रेरी से अमितव घोष की एक पुस्तक लायी है कल शाम ही थोड़ी सी पढ़ी. अभी robert फ्रॉस्ट की कविताएँ भी पढ़नी हैं. ढेर सारी पत्रिकाएँ भी अनपढ़ी पड़ी हैं. रोज का अख़बार पढ़ने में भी समय जाता है. इन्सान का छोटा सा दिमाग (ब्रह्मांड से भी विशाल है वास्तव में ) कितना कुछ समेटना चाहता है. कल GLSV का प्रक्षेपण किसी खराबी के कारण टाल देना पड़ा, शुरू होने से पहले उसका दिल धड़क रहा था, लग रहा था, सब कुछ ठीक नहीं होगा. खैर, अगली बार जरूर वैज्ञानिकों को सफलता मिलेगी. कल भारत मैच भी हार गया. नैनी ने असमिया में वह पुस्तक लाकर दी है जिसमें से उसे ऐसी सूरा चाहिए जिसे पढ़कर शैतान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

कल की शाम एक सखी और उसके बेटे के नाम थी. वे शाम को साढ़े चार बजे ही आ गये थे, जून को हाउसिंग सोसाइटी की मीटिंग में जाना था. साढ़े आठ पर वे वापस आये तब तक नन्हा और उसका मित्र खाना खा चुके थे. वह सखी के साथ पहले टहलने गयी फिर चाय पी और बाद में डिनर की तैयारी. उसका साथ सहज लगता है, कितनी बातें बतायीं उसने अपने परिचितों की और इधर-उधर की. कुछ देर उन्होंने क्रॉस वर्ड्स हल किया. समाचार नहीं सुन पायी कल रात. आज सुबह सुना पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ रही हैं. राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र अथवा विरोधी नहीं होता. आज जागरण में एक सन्त का भावपूर्ण प्रवचन सुना, कह रहे थे रोना, हँसने से ज्यादा बेहतर है बशर्ते आँसूं पश्चाताप के हों यहाँ तो कोई गलत है यह तक स्वीकारने को तैयार नहीं होता तो पछतावा क्यों करेंगे, हर कोई अपने को सही साबित करने पर तुला है. आज सुबह ससुराल से फोन आया, कल वे लोग नये घर में रहने चले गये हैं, गृह प्रवेश में बड़ी ननद भी आई है, काफी चहल-पहल रहती होगी. दिन भर किचन में भी हलचल रहती होगी. आजकल ‘ध्यान’ में वह पांच-दस मिनट से ज्यादा नहीं बैठ पाती है सम्भवतः आस-पास होती हलचल इसका कारण हो, उसे दूसरा समय चुनना होगा जब कोई बाधा न हो. यह भी सही है कि जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक पढ़े काफी समय बीत गया है और प्रतिपल सजग रहने का जो अभ्यास उन दिनों हो गया था आजकल छूट गया है. एक बेखुदी सी छायी रहती है जैसे वह किसी spell के अंदर है. जमीन पर आ जाना ही बेहतर होगा,. वास्तविकता की ठोस जमीन पर, जहाँ अपनी कमियां भी बखूबी नजर आती रहें. एक परिचिता से मिलने का वादा किया था जो आज ही पूरा करना होगा.