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Monday, February 26, 2024

पिरामिड वैली


पिरामिड वैली


नव वर्ष का प्रथम दिन ! सुबह नींद देर से खुली क्योंकि रात को बारह बजे से पटाखों की तेज आवाज़ें आनी आरम्भ हुईं और एक घंटा चलती रहीं। बच्चों व बड़ों के चिल्लाने का शोर भी स्पष्ट आ रहा था। नये वर्ष को तो आना ही है, इतना शोर मचाने का क्या अर्थ है, समझ में नहीं आता। प्रातः भ्रमण के समय आकाश में गोल चंद्रमा के दर्शन हुए, तस्वीर उतारी, वापस आकर छत पर सूरज की। उगते हुए सूरज को देखकर त्राटक करना कितना भला लग रहा था। स्नान करके नाश्ता बनाया और दोपहर के भोजन की तैयारी की, जो वे ‘पिरामिड वैली’ अपने साथ ले जाने वाले थे।जून ने बनारसी चिवड़ा-मटर; और खोये वाला गाजर का हलवा  उन्होंने कल ही बनाया था।  उसने हींग वाले आलू-पूरी और बटर में परवल बनाये। सभी को नाश्ता पसंद आया। बच्चों के साथ उनका एक मित्र भी आया था और सोनू के माँ-पापा भी। वे एक बजे पिरामिड वैली पहुँच गये थे। उनके घर से ज़्यादा दूर नहीं है यह शांत स्थान, जो २८ एकड़ में फैला हुआ है। सुंदर बाग-बगीचों और एक कमल सरोवर से घिरा दुनिया के सबसे बड़े आकार के पिरामिड के लिए प्रसिद्ध है। जो ध्यान के लिए एक संत ब्रह्मर्षि पात्री जी द्वारा बनवाया गया है। वे लोग पहले भी एक बार यहाँ आये थे, और तभी आज के दिन का कार्यक्रम बना था। यहाँ आकर ज्ञात हुआ कि बाहर से लाया भोजन इस परिसर में नहीं खा सकते।एक घंटा हरियाली के सान्निध्य में घूमते हुए बिताया, कुछ देर पिरामिड में जाकर ध्यान किया। किताबों की दुकान से दो किताबें ख़रीदीं, अवेकनिंग कुंडलिनी और द लॉस्ट ईयर्स ऑफ़ जीसस ! रेस्तराँ में चाय पैकर वे घर लौट आये। बाद में छत पर चटाई बिछाकर पिकनिक की तरह पेपर प्लेट्स में दोपहर का भोजन किया। शाम को वे वापस चले गये। जिन मित्रों व संबंधियों से सुबह बात नहीं हुई, उन्हें फ़ोन पर नये साल की शुभकामनाएँ दीं।   


आज सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही आँख खुल गई। छोटी ननद के लिए जन्मदिन की कविता लिखी, मंझले भाई का जन्मदिन भी आज है, उसे भी शुभकामना भरी कविता भेजी। जीसस वाली किताब में पढ़ा, लेह की हिमिस मोनेस्ट्री में कुछ दस्तावेज मिले हैं , जिनके आधार पर कहा गया कि ईसा भारत आये थे।शाम को पापा जी से बात हुई, उत्तर भारत में ठंड बहुत बढ़ गई है, उन्होंने कहा तापमान शून्य हो गया था। दिल्ली में वर्षा हो रही है। यहाँ बैंगलुरु का मौसम सुहावना है, पर कब बदल जाएगा, कहा नहीं जा सकता। 


आज यहाँ भी थोड़ी सी ठंड बढ़ गई है। रात को बारिश होती रही शायद इसी कारण। जून के दांत में दर्द है, कल डेंटिस्ट को दिखाकर नन्हे-सोनू के यहाँ चले जाएँगे। वे दोनों घर से ही काम कर रहे हैं।सुबह एलिजाबेथ क्लेयर की ईसा के भारत में बिताये समय के बारे में किताब आगे पढ़ी, बहुत रोचक है। ​​जीसस की भारत, तिब्बत  व नेपाल की सत्रह वर्षों की यात्रा के पक्के सबूत मिले हैं। उसमें लिखा है कि 13 साल की उम्र से 29 साल की उम्र तक वह पहले पढ़ते रहे फिर उन्होंने पढ़ाया भी ।येरूशलम से भारत तक की उनकी यात्रा का विवरण बौद्ध इतिहासकारों ने दिया है। किसान आंदोलन ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। कल भी सरकार ने वार्ता के लिए बुलाया है। देश में कोरोना की वैक्सीन लगाने का काम आरम्भ हो रहा है । 


आज दिन भर बदली बनी रही। सुबह साढ़े नौ बजे वे डेंटिस्ट के यहाँ जाने के लिए निकले थे। जून को फ़िलिंग करवानी थी। उसने भी दिखाया, तो क्लीनिंग कर दी, दस मिनट की सफ़ाई के लिए एक हज़ार रुपये लिए। जब वे पहुँचे, ठीक उसी समय नन्हा भी आ गया, उसका मित्र उसे लेकर आया था। उसने अपनी मीटिंग आगे खिसका दी और इसलिए आया कि पापा को कहीं एनेस्थीसिया दे दिया गया तो ड्राइविंग में दिक़्क़त होगी।बच्चे बहुत समझदार और केयरिंग हैं। सुबह सामान्य थी, एक विशेष बात हुई कि छोटी भाभी का जन्मदिन है, सुबह ही याद आया, उसके लिए कविता लिखी उसी समय, जबकि उन्हें निकलना था। यह भी तो सेवा का एक कार्य हुआ न ! परसों बड़ी ननद का जन्मदिन है, कल ही उसके लिए लिखनी है। शाम को रमन महर्षि की बातचीत का एक अंश सुना, प्रेरणादायक था फिर गुरु जी का कराया ध्यान किया। मन शांति का अनुभव कर रहा था। सात तारीख़ को सूट-साड़ी पहनकर वे आश्रम जायें, ऐसा मन में विचार आया है ! उस दिन छत्तीस वर्ष हो जाएँगे उनके विवाह को। नन्हे-सोनू के यहाँ भोजन अच्छा था, दाल-चावल व करेले की सब्ज़ी !   


Tuesday, June 25, 2019

नया कैलेंडर



आज जून ने यह डायरी भेजी है. इस बार की कम्पनी की डायरी पहले मिल गयी थी, सलेटी रंग की, सुंदर है, पर लिखने का स्थान कम था, एक ही पेज में दो तिथियाँ. अब एक वर्ष बाद अंतिम डायरी मिलेगी कम्पनी की. अगले वर्ष अगस्त में उन्हें विदाई दे दी जाएगी. असम में अब दो वर्ष से भी कम समय रह गया है. इस समय का सदुपयोग करना है, सेवा, सत्संग और साधना के द्वारा. रात्रि के पौने आठ बजे हैं. जनवरी का महीना वैसे ही इतना ठंडा होता है, ऊपर से झीनी-झीनी वर्षा भी हो रही है. सुबह से ही बादल बने थे. दोपहर को बूंदा बांदी हुई, जब सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखा रही थी. एक ने कहा, उनकी माँ ने भी कभी इस तरह नहीं समझाया जैसे वह उन्हें लड़ाई-झगड़े से दूर रहने के लिए कहती है. उसने सोचा, माँ को भी किसी ने नहीं समझाया होगा शायद. सुबह सेक्रेटरी ने उसका नाम क्लब के प्रोजेक्ट स्कूल की कमेटी में सम्मिलित कर दिया. प्रेसिडेंट ने दस बजे मीटिंग के लिए बुलाया, पर स्वयं सवा दस बजे आयीं. भारतीय समय में इतनी देरी को सामान्य मान लिया जाता है, पर उस कारण वापसी में देर हुई. दोपहर को एक वरिष्ठ सदस्या के यहाँ जाना था, उनकी बहन का दामाद अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री है, जो परिवार सहित असम आया हुआ है. डेढ़ घंटा वहाँ बिताया. वर्षों पूर्व जब वे नासा गये थे, उनके घर भी गये थे, उसने ही उन्हें घुमाया था. शाम को गायत्री समूह की महिलाओं के साथ नियमित योग की साधना, यानि सारा दिन कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला. झींगुर की आवाज आ रही है और कमरे में इतना सन्नाटा है कि घड़ी की टिक-टिक भी स्पष्ट सुनाई दे रही है. पिताजी ने आज स्मार्ट फोन छोटी भाभी को वापस कर दिया है. कुछ दिनों तक व्हाट्स एप पर संदेशों का आदान-प्रदान करने के बाद अब वह उससे विरक्त हो गये हैं, उनका स्वास्थ्य अब ठीक है. टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है, जो रोचक और मनोरंजक भी है.

रात्रि के नौ बजने वाले हैं, यानि सोने से पूर्व आज के दिन की अंतिम घड़ी. जून ने शाम को गाजर का हलवा बनाया है. कल उनके एक मित्र आ रहे हैं गोहाटी से, उन्हें खाने पर बुलाया है. वैसे भी उनके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. दोपहर बाद को ओपरेटिव स्टोर गयी, बीहू के लिए पीठा आदि लिया, सर्दियों के मौसम में तिल खाने की सलाह दी ही जाती है. मन्दिर की साज-सज्जा बदली, ध्यान कक्ष में भी नया कैलेंडर लगाया व नई मूर्तियाँ भी, नये वर्ष का फेर-बदल अभी चल रहा है. आज वर्षा नहीं हुई. आज योग कक्षा में एक साधिका की भांजी भी आई थी, जो बिहार योग स्कूल से योग सीख चुकी है. उसने शिथलीकरण सिखाया और नाड़ी शोधन प्राणायाम भी.

इस समय दोपहर के तीन बजे हैं. वह रात के भोजन की तैयारी कर चुकी है. उनके पूर्व सहकर्मी आयेंगे ऐसा जून ने कहा था पर अब ज्ञात हुआ वह किसी अन्य जगह निमंत्रित हैं. कल दोपहर भी जून का लंच बाहर है, उनके दफ्तर के चार अधिकारी परीक्षा के बाद स्थायी हुए हैं, वे मिलकर पार्टी का आयोजन कर रहे हैं. अब यह भोजन कल रात्रि को खाया जायेगा. कुछ बना हुआ कुछ बनने के लिए तैयार. फ्रिज में रखा हुआ भोजन तो लोग तीन-चार दिन तक भी खाते ही हैं. आज सुबह क्लब गयी, एक स्थानीय क्लब ने उनके क्लब द्वारा चलाई जा रही सिलाई कक्षा के लिए सात सिलाई मशीनें दी हैं, जो उनके यहाँ वर्षों से रखी हुई थीं. कल मृणाल ज्योति में भी मीटिंग है. सुबह एक सखी को पहली बार अपने पति के साथ टहलते देखकर अच्छा लगा, वह वर्षों तक अकेले ही टहलने जाती रही है. उसके लिए उसने मन ही मन शुभकामनायें भेजीं. परमात्मा ही हर आत्मा के द्वारा प्रकट हो रहा है. उन्हें उसके प्रकट होने में बाधक नहीं बनना है. किसी भी तरह की आसक्ति, मोह तथा अहंकार से मुक्त होकर मन को पारदर्शी बनाना है, तभी परमात्मा की ज्योति मन में झलकेगी. वे अकेले ही इस जगत में आते हैं और अकेले ही यहाँ से जाने वाले हैं. मित्रता का भ्रम यदि टूटता है तो वह इसी सत्य की ओर इशारा करता है.

Tuesday, January 22, 2019

एलोवेरा का जूस



नया वर्ष आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये हैं, आज यह पीले रंग की डायरी उसे मिली है. इतने वर्षों में नीली, भूरी, काली, मैरून रंग की डायरियां ही मिलती रहीं, पहली बार पीले रंग के कवर वाली डायरी. रात्रि के सवा नौ बजने को हैं, जून अभी तक क्लब से नहीं आये हैं. आज से उन्हें ह्यूस्टन से आये मेहमानों के साथ कुछ समय बिताना होगा, शायद कुछ दिन तक रोज ही आने में देर हो. कल शाम भी वे क्लब गये थे, तीन जनों का विदाई समारोह था. उनमें से एक की पत्नी लेडीज क्लब की सदस्या भी हैं, वह उनके लिए कविता लिखेगी. सुबह सुहानी थी, जून को बाहर तक छोड़ कर आई तो अपने आप ही हाथ कविता वाली डायरी की और बढ़ गये, कुछ पंक्तियाँ फूटने लगीं, जैसे भूमि से समय आने पर अंकुर फूटने लगते हैं. उसे आश्चर्य होता है, शब्द भीतर कहाँ सोये रहते हैं, कभी तो एक उड़ता हुआ ख्याल भी नहीं आता कि कुछ लिखे और कभी भावों का दरिया बेसाख्ता बहने लगता है. शायद वे ही समझदारी का बाँध लगा देते हैं और हिसाबी बुद्धि को भला कविता से क्या काम. दिगबोई क्लब पत्रिका के लिए लेख माँगा है, पहले का लिखा ही कोई कल भेजेगी. उसने दो सखियों को नन्हे के विवाह की खबर दी, हो सकता है बंगाली सखी इस खबर को सुनकर ही आये. जून ने रजिस्टर्ड विवाह के लिए फार्म आदि भरकर जमा कर दिए हैं. इस महीने के अंत में वह और सोनू कानूनी रूप से एक पावन बंधन में बंध जायेंगे. आज उसके जन्म के समय लिखी डायरी का एक पन्ना पढ़ा, कितना सरल था तब जीवन. सेब का दाम चौदह रूपये प्रति किलो था और मंहगे लग रहे थे.  

शाम के साढ़े पांच बजे हैं. चार बजे जून आये थे जब किचन के प्लेटफार्म पर लगाने के लिए ठेले वाला काले रंग का ग्रेनाइट लाया था. कल से घर में रंगाई-पुताई का काम शुरू हो रहा है, जो बीहू तक चलेगा. उसने आंवला-एलोवेरा-लौकी का जूस बनाया था और खीरा-टमाटर का सूप, साथ में मौसमी फल, यानि सेहत के लिए सभी मुफीद वस्तुएं ! सुबह धनिये वाले आलू बनाये थे, छोटे-छोटे सफेद आलू इसी मौसम में मिलते हैं. उससे पूर्व स्वामी रामदेव व आचार्य बालकृष्ण को सुना. सन्यास के बाईस वर्ष पूर्ण होने पर वे अपने संस्मरण सुना रहे थे. बेहद रोचक ढंग से उन्होंने अपनी युवावस्था के, गुरूकुल के प्रवास के प्रसंग सुनाये.

कल रात तीन अद्भुत स्वप्न देखे. एक में भूमि की गहराई से एक सुंदर शिवलिंग प्रकट होता हुआ दिखा, दूसरे में एक विशाल पक्षी आसमान से उतरता हुआ दिखा, वह विशाल पंखों वाला था. तीसरे में घर में ही एक कमरे में विशाल कमल ! स्वप्नों की दुनिया उसे सदा ही विस्मयों से भरती रही है. वर्षों पहले एक कविता लिखी थी कि ईश्वर कितना भी अदृश्य रहे पर स्वप्नों में वह छुपा हुआ नहीं रह पाता, उसका वैभव प्रकट हो ही जाता है. किसी अदृश्य लोक से ही आते हैं स्वप्न...दोपहर को ब्लॉग पर लिखा. पुराने दिनों की डायरी पढ़ी, नन्हे के बचपन की बातें ! नन्हे के जीवन में एक नया मोड़ आ रहा है, शायद इसलिए वह उसका बचपन याद कर रही है, मन की थाह कौन लगा सकता है, उसके अवचेतन में क्या चल रहा है, जो अचानक भीतर वात्सल्य भाव उमड़ रहा है.


Wednesday, April 25, 2018

हरी मटर की पौध



रविवार होने के बावजूद आज सुबह भी वे भोर होने से पहले ही उठ गये, अँधेरे में ही टहलने गये, पूरे रास्ते में इक्का-दुक्का लोग नजर आए. सुबह की योग कक्षा में सूर्य नमस्कार और सूर्य ध्यान करने व कराने के बाद मन कितना प्रफ्फुलित हो गया था. नाश्ते की तैयारी उसने पहले से कर दी थी. जून ने तंदूर लगा दिया, गर्मागर्म आलू का परांठा और दही का नाश्ता किया. उसके बाद आरम्भ हुआ सभी से फोन पर बातचीत का सिलसिला. हर इतवार को वे सबसे पहले पिताजी से बात करते हैं, उनसे बात करना सदा ही अच्छा लगता है. फिर बहनों से और उसके बाद किसी और से. बड़ी भांजी डाईटीशियन का कोर्स करना चाहती है, उसके पति उसे सहयोग कर रहे हैं, जानकर अच्छा लगा. आज क्लब का वार्षिक उत्सव है, दोनों ने बालों में रंग लगाया. लंच के दौरान पिछले कई वर्षों की तरह एक स्टाल पर उसको भी खड़ा होना था. वे दो बजे क्लब गये, सजी-धजी महिलाएं समूहों में बैठी थीं, अभी भोजन में एक घंटे की देरी थी. लोग मस्त थे, सलाद, फ्राई, स्वादिष्ट भोजन, आइसक्रीम सभी कुछ लाजवाब था, पर पीने का चलन इस दिन कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है. शाम को ‘महाभारत’ का अगला एपिसोड देखा. रात को मकई की रोटी बनाई बगीचे से तोड़े हरे प्याज और मेथी मिलाकर. इस वर्ष मटर को छोड़कर सभी सब्जियों की काफी अच्छी फसल हुई है. मटर की फलियों को पंछी खा जाते हैं.

नये वर्ष के दस दिन गुजर गये, समय कितनी तेजी से गुजरता है, उनके लक्ष्य पूरे नहीं हो पाते. जीवन कितना कुछ छिपाए है, जो अपरिचित ही रहे जाता है. मौसम आज भी काफी ठंडा है, शाम को जून के एक सहकर्मी भोजन  के लिए आ रहे हैं. ‘सिया के राम’ में आज राम मिथिला की तरफ प्रस्थान करेंगे. हजार बार सुनी यह कथा हर बार नई लगती है. आज दुर्योधन का भी अंत होने वाला है ‘महाभारत’ में, मोह का प्रतीक है यह पात्र, इसका नाश होना ही चाहिए. व्हाट्सएप पर एक छोटी सी लडकी को हनुमान चालीसा गाते हुए सुना आज, तकनीक ने कला को कितना बड़ा फलक दे दिया है, देखते-ही देखते यह वीडियो पूरे भारत में प्रसारित हो जाने वाला है. जून आज देहली गये हैं. कल रात सूक्ष्म देह का अनुभव कितना स्पष्ट हो रहा था. वे सूक्ष्म देह के द्वारा भी स्पर्श का अनुभव करते हैं और देखते हैं, अनोखी है भीतर की दुनिया !

आज लोहरी है, सुबह देर से उठी, गले में हल्की खराश थी. नेति आदि करके स्नान किया तो सोचा, प्रातःभ्रमण तो छूट गया, प्राणायाम ही कर ले, पर सुबह-सुबह ही क्लब की सेक्रेटरी का फोन आ गया, कार्यों की एक लम्बी सूची थी सो नाश्ता करके कम्प्यूटर पर काम करने आ गयी, पर स्क्रीन थी कि खुलने को राजी नहीं थी. कल ही जून के जाने से पहले ही लैन से कनेक्ट करके गये थे आईटी विभाग के कर्मचारी. जून को शायद पासवर्ड का ज्ञान हो, पर वह फ्लाईट में थे. कुछ देर की प्रतीक्षा भी सही नहीं गयी. अधीर मन ने कहा, नन्हे को फोन करो, वह क्या करता, इसी बहाने उससे बात हो गयी. तब तक जून का संदेश देखा फोन पर, समस्या पल में हल हो गयी, पर इतनी देर में जो भीतर उत्तेजना को जन्म दिया उसका असर तो होना ही था. सदा शांत रहने वाला मन यदि थोड़ा सा भी ऊपर-नीचे हो तो असर होता ही है. साधक को तो अति सजग रहने की जरूरत है. सवा ग्यारह कब बज गये पता ही नहीं चला. सेक्रेटरी के साथ कार्ड्स बांटने गयी, सवाा एक बजे लौटी, भोजन करके पुनः तीन बजे गयी. उपहार गिनने का कार्य किया, बाजार गये और लौटे तो साढ़े पांच हो चुके थे. उसके बाद योग कक्षा, संध्या भ्रमण, ‘सिया के राम’, रात्रि भोजन और फिर नींद से पूर्व ध्यान. कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं.   

Tuesday, April 17, 2018

मेथी की बड़ियाँ



नये वर्ष का प्रथम दिन अरुणाचल में आरम्भ हुआ और असम में समाप्त. बोलेरो में की यादगार यात्रा  में चालक ने सावधानीपूर्वक गाड़ी चलाते उन्हें सुरक्षित घर पहुंचा दिया. पत्थरों, कच्चे रास्तों और नदियों को पार करते हुए वे दोपहर तक घर पहुंचे. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर नये लोगों से मुलाकात हुई. वह मोटी सी अरुणाचली महिला जो पीकर चहक रही थी और वह शांत सी महिला जो  अपने पुत्र को गोदी में सुलाए बैठी थी. अरुणाचल के वर्तमान संसद सदस्य और भूतपूर्व मुख्यमंत्री से बातचीत, सभी कुछ स्मृतियों में कैद हो गया है. वापस आकर बंगाली सखी से फोन पर बात की. पिछले हफ्ते तोड़ कर रखे  केले, जो सभी पक गये थे, बाँट दिए. कुछ अभी भी शेष हैं. जो आनंद बाँट कर खाने में है, वह स्वयं खाने में कहाँ ? कुछ वस्त्र भी निकले हैं, जो दे देने हैं.   

शाम को ध्यान करने बैठी तो मन तंद्रा में चला गया. चौंक कर उठी, मुख पर शीतल जल के छींटे मारे. ध्यान और नींद में एक समानता है. दोनों में चेतन मन शांत हो जाता है और बातें अचेतन मन में चली जाती हैं. सब काम करते हुए भी सजगता कायम रहे इसका ध्यान रखना है, व्यर्थ के संकल्प ही व्यर्थ कर्मों को जन्म देते हैं. कर्मों से सुख पाने की इच्छा भी बांधती है. पानी जैसा मन स्वयं को नीचे बनाये रखने के लिए कई जाल फैलाता है, पर उन्हें आत्मा रूपी अग्नि बनकर ऊपर ही जाना है.

सुबह वे टहलने गये तो हल्का अँधेरा था और हल्का कोहरा भी, पर इस वर्ष ज्यादा ठंड नहीं है, सो सुबह के भ्रमण में व्यवधान नहीं आया है. वापस आते समय कम्पनी के मुख्य अधिकारी व उनकी पत्नी मिले, अच्छा लगा. वैसे भी उस समय मिलने वाले लोग बहुत कम होते हैं. आज मंझले भाई व छोटी ननद का जन्मदिन है, उन्हें मुबारकबाद दी. भाई जहाँ है, तापमान शून्य से पन्द्रह डिग्री कम है. कमरे में हीटर जलाने के बाद -२ डिग्री तक आ जाता है. इतनी ठंड में भी वहाँ जीवन चल रहा है. मानव की सहनशीलता व क्षमता की कोई सीमा नहीं है. ननद ने नया दफ्तर ज्वाइन किया है, उसके बैंक में सभी ने मिलकर केक मंगाया व जन्मदिन मनाया. कल वापसी की यात्रा में वे तिनसुकिया होते हुए आये, मेथी लाये. आज सुबह मेथी की बड़ी बनाकर सुखाने के लिए रखी हैं. जून ने ही सारी तैयारी की. मेथी की बड़ी उनकी प्रिय खाद्य वस्तु है. इतवार को अक्सर लंच में इसका मेथी पुलाव बनाते हैं, और इतवार की सुबह यदि दक्षिण भारतीय नाश्ते का मन हो तो वे इडली बनाने में दक्ष हैं. शाम को एक परिचित दम्पति अपने पुत्र के विवाह का निमन्त्रण पत्र देने आये, अगले महीने रिसेप्शन है. गुलाबी रंग का कार्ड बहुत सुंदर है, उनका पुत्र स्कूल में नन्हे का सहपाठी था. नन्हा कूर्ग के पास किसी स्थान पर मित्रों के साथ घूमने गया है. शाम को ‘मृणाल ज्योति’ की मीटिंग थी. दस दिनों बाद कन्या छात्रावास का उद्घाटन है. तीसरे सप्ताह में उत्तर-पूर्व सम्मेलन है, जहाँ अन्य राज्यों से विशेष बच्चों के लिए बनी संस्थाओं के प्रमुख आएंगे.
   

Tuesday, August 22, 2017

खजूर की मिठाई


शाम के सवा पांच बजे हैं. आज नये वर्ष का प्रथम दिन है. सुबह साढ़े पांच बजे नींद खुली, कल देर रात तक संगीत व पटाखों का शोर सुनाई देता रहा. नये वर्ष के स्वागत का भला यह कौन सा तरीका हुआ कि औरों की नींद खराब की जाए. आज दोपहर को विशेष भोज था, कुछ मित्र परिवारों के साथ, भिस की सब्जी बनाई, जो वे दिल्ली से लाये थे, यहाँ इसके बारे में कोई नहीं जानता. इसके अलावा हरे चने का चीला, बैंगन का भर्ता, पालक का सूप और खजूर की मिठाई जो जून ने बनाई. नये वर्ष  में मन नये उत्साह से भरा है. उसने मन ही मन कुछ संकल्प दोहराए. नये-नये स्थान  देखने हैं, सेवा के नये कार्य करने हैं तथा सभी को साथ लेकर चलना है. मृणाल ज्योति में ज्यादा समय बिताना है. हर हफ्ते दो दिन सत्संग तथा योग सिखाना है. इतवार का सेवा कार्य तो वैसे ही चलेगा. नियमित ध्यान तथा लेखन कार्य भी करना है. उसका कोई भी निर्णय दूसरों के लिए असुविधा का कारण न बने, प्रमाद रहित रहकर इसका भी ध्यान रखना है.

आकाश पर हल्के बादल हैं, मौसम ठंडा है.आज हिंदी की प्रूफ रीडिंग का कार्य हो गया. कल एक सदस्या के यहाँ उपहारों की पैकिंग का कार्य होगा. आज छोटी ननद व मंझले भाई का जन्मदिन है, दोनों से बात की. नन्हे ने नये वर्ष की पार्टी का फोटो भेजा है. सबके हाथ में गिलास है, उसमें क्या है इसका अंदाज लगाया जा सकता है. अब कैसे वक्त हैं कि आधी-आधी रात तक जगते हैं बच्चे और सुबह-सवेरे सो जाते हैं.

अभी-अभी प्रेस से फोन आया, अंग्रेजी के कुछ लेख अभी तक टाइप नहीं हुए हैं. दो दिन बाद कार्यक्रम है. पिछले वर्ष वह आरम्भ से ही पत्रिका से जुड़ी थी, पर इस बार ऐसा नहीं है. अब देर भी बहुत हो गयी है. आज दोपहर कुछ देर सोयी तो अजीब सा स्वप्न देखा, जिसमें छोटा भाई भी था और अखाद्य सब्जी का जिक्र था, वह उसे खाने के लिए मना कर रही थी. कल या परसों रात्रि को स्वप्न में ओशो से बातें की. उनका प्रवचन सुनते-सुनते सो गयी थी, सपने में भी वह उसे सुना रहे थे और राह में मिलने वाले लोग भी सुनने लगते थे. मन कितना रहस्यमय है, आत्मा का तो कोई पार नहीं पा सकता, परमात्मा की तो बात ही छोड़ दें. सारी सृष्टि एक रहस्य ही तो है, पता नहीं कब से है और कब तक रहेगी, पता नहीं किसने बनाई है और क्यों ? पता नहीं, वे कौन हैं और परमात्मा से उनका क्या रिश्ता है ? परमात्मा ही वे बनकर खुद को खोज रहा है क्या ? परमात्मा के पास शायद मन नहीं है पर वह तो सर्वज्ञ है, फिर..उसकी सर्वज्ञता में ही शायद मानव भी शामिल है, मानव भी वही है, सब लोग यह बात नहीं जानते, उसे लगता है यही सही है. वह भी वही है, अब वही जाने उससे क्या करवाना है उसे, वही है तो वही जानेगा..अब उसने स्वयं को खुद को बनाया नहीं है, न ही उसे कुछ पता है, सचमुच उसे कुछ भी नहीं पता, वह कौन है, ईश्वर कौन है, यह क्या है, यह सृष्टि ऐसी क्यों है ? बस एक शांति सी है, एक मौन, एकांत और विश्राम !


Friday, June 23, 2017

सर्दी-जुकाम


फिर एक अन्तराल..नया वर्ष आया और पहला माह समाप्त होने को है, उसने लगभग हर दिन कुछ पंक्तियाँ लिखीं, छोटी-छोटी कविताएँ..गद्य लिखने का मन ही नहीं हुआ. पद्य सुकोमल है, गद्य जीवन का यथार्थ है. जून आज फिर गोहाटी गये हैं, परसों आ जायेंगे. उनका गला खराब था, कालीमिर्च, गुड़ और गाय के घी का नुस्खा अपनाना शुरू किया, उससे लाभ भी हुआ. पिछले एक हफ्ते से भी अधिक समय से वे शाम को सीडी लगाकर प्रवचन सुन रहे थे, आज भगवद् गीता पर आधारित प्रवचन है. साहित्य अमृत के स्वामी विवेकानंद पर आधारित अंक को पढ़कर कई नई जानकारियां मिल रही हैं. वे जब छोटे मन से दुनिया को देखते हैं तो अभाव नजर आता है, जब गहराई से देखते हैं तब पूर्णता का अनुभव होता है.

आज सुबह वह नींद में थी पर महसूस हो रहा था कोई जगा रहा है, जब तक नहीं जागी तब तक वह प्रयास करता रहा. एक स्वप्न जैसा कुछ देखा, जिसमें स्वयं को तितली के रूप में देखा. उस दिन नन्हे को फोन पर स्वयं को कहते सुना था कि हर योनि में जैसे तितली, परमात्मा या प्रकृति सबके साथ होते हैं, उन पर नजर रखते हैं. ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, एक बार स्वयं का चेहरा कुछ बदला सा दर्पण में देखा. स्नान करने गयी तो गाउन के बार्डर में कुछ भारीपन महसूस हुआ, छूकर देखा तो  कान का वह बुंदा था, जो कुछ दिन पहले खो गया था, पर वह वहाँ कैसे गया होगा, चारों तरफ देखा कहीं से भी सिलाई खुली नहीं है. इतने दिन से वहीं था तो आज ही उसका पता क्यों चला. कल स्कूल में बच्चों को सिखा सकी, वह भी तो परमात्मा की कृपा ही थी. उनके जीवन में वह कितना निकट है, बस देखने के लिए नजर चाहिए. टीवी पर जैसे ही गुरूजी का प्रवचन सुनना शुरू किया तो पहला वाक्य था, ‘जीवन एक पहेली है, इसे समझना और सुलझाना सीखना पड़ता है, फिर भी कुछ अनसुलझा रह जाता है’.

कल से सर्दी-जुकाम ने परेशान किया है, पिछले दिनों जब जून को खांसी थी, उन्हें परेशान देखकर एक बार उसने प्रार्थना की थी, जून की तबियत ठीक हो जाये, भले उसकी खराब हो, वह स्वयं को ठीक कर सकती है. इसी अहंकार को मिटाने के लिए शायद प्रकृति ने यह उपहार भेजा है. जून अब पहले की तरह स्वस्थ व प्रसन्न हैं. कल शाम महिला क्लब की पार्टी थी. अस्सी महिलाएं आई थीं, हो सकता है उनमें से किसी से संक्रमण पकड़ लिया हो. छोटी बहन से बात की, उसकी गर्दन में भी दर्द था, पिछले हफ्ते बीती उसके विवाह की वर्षगांठ अलबत्ता उन्होंने अच्छी तरह मनायी. आज उसका एक छात्र पढ़ने नहीं आया, पहले सोचा शायद घर पर ही पढ़ रहा होगा, फिर फोन कर लिया. बहुत हँसी आयी जब पता चला उसने माँ से कह दिया था, टीचर ने आने के लिए मना किया है. कुछ बच्चे कितनी आसानी से झूठ बोल देते हैं, उन्हें शायद पता भी नहीं होता कि यह झूठ है.


Thursday, October 6, 2016

नये वर्ष के कार्ड्स


आज सुबह-सुबह टीवी पर एक आचार्य जी से (नाम याद नहीं है ) पतंजलि योग सूत्रों की अद्भुत व्याख्या सुनकर मन स्थिर हो गया. द्रष्टा जब अपने आप में स्थित हो, मन समाहित हो, बुद्धि स्थिर हो तो क्षणांश के लिए उस स्थिति का अनुभव होता है. वहाँ से आने के बाद अपूर्व शांति और आनंद सहज ही भीतर उत्ताल तरंगों की भांति व्यक्त होता है. दोपहर को एक कविता की पंक्तियाँ बार-बार मन में आ रही थीं पर अब वह स्मृति खो गयी है, संकल्प जाने कहाँ से उठते हैं फिर विलीन हो जाते हैं, जो संकल्प वे अपने बोध में उठाते हैं वे उनके भाग्य का निर्माण करते हैं. नये वर्ष में एक लक्ष्य तो है वजन घटाना जो पिछले वर्ष बढ़ गया है. घर की साज-सज्जा पर विशेष ध्यान देना है और सेवा के कार्यों को तरजीह देनी है. जून कुछ कार्ड्स लाये हैं, उसने सोचा उन्हें यहीं उन लोगों को देगी जिनसे उनका वास्ता पड़ता है. लाइब्रेरियन, को-ओपरेटिव मैनेजर, बैंक मैनेजर, मृणाल ज्योति आदि आदि..नैनी अभी अस्पताल में है, उसका आपरेशन कल होगा. दो सखियों के बच्चे छुट्टियों में अपने-अपने घर आये हुए हैं, न मिलने आये, न फोन ही किया. बच्चों की अपनी एक दुनिया होती है जिसमें उनके माता-पिता भी नहीं जा सकते फिर अंकल-आंटी तो दूर की बात है. आत्मा रूप से देखे तो वे भी वह स्वयं ही है, जो निकट ही है, उससे कैसी दूरी और कैसी निकटता. उसके अंतर का स्नेह सदा उन्हें मिलता रहे. आमीन !

आज छोटी भाभी का जन्मदिन है, उसके लिए एक कविता भेजेगी. उसने अंग्रेजी में एमए किया है, गाने तथा चित्रकला का शौक है या था. सुंदर है, लम्बी है, गोरी है, रंग ऐसा जैसे दूध में चन्दन व हल्दी मिलायी हो. पढ़ने का शौक है, घर का काम दक्षता से करती है. तीन बहनों में सबसे बड़ी है. आज फिर सासुमाँ ने उसके कमरे में आकर टीवी बंद कर दिया, उन्हें शायद आवाज से भी डर लगने लगा है. जब उसने पूछा, आपने क्यों बंद किया तो कहने लगीं, कमरे में कोई नहीं था. एक सखी से बात की फोन पर, उसकी मौसेरी बहन की कल मृत्यु हो गयी जो बीमार थी. दीदी को भी ज्वर हो गया है. बड़ी ननद की बेटी दुखी है, उसकी बात पक्की होते-होते टूट गयी है. घर से खबर आई, जून की मासी का देहांत हो गया है, एक-एक कर सभी को जाना है, कोई पहले, कोई बाद में जाने ही वाला है. चारों और से मृत्यु, अस्वस्थता और दुःख के समाचार ही आते हैं, उनके भीतर ही जन्नत हो सकती है यदि हो तो, बाहर तो उसके ख्वाब ही देखे जा सकते हैं. जीवन सम्भवतः इतना जटिल पहले कभी नहीं था, अथवा तो हर युग के अपने कुछ दुःख होते हैं. इस वक्त वह बाहर लॉन में झूले पर बैठी है, इस कोने में धूप देर तक रहती है. गुलदाउदी के कुछ फूल वर्षा में खराब हो गये हैं, उन्हें अलग करना है. कल चार डीवीडी लिए आर्ट ऑफ़ लिविंग के, उनके पड़ोसी टीचर हैं एओल के. कुछ वर्ष पूर्व ऐसा होने पर वे स्वयं को भाग्यशाली मानते, पर अब जून को ज्यादा रूचि नहीं रह गयी है, वह भी अब सत्संग व क्रिया घर पर ही करती है. गुरुजी से कोई दूरी अब लगती नहीं. जून कल तीन दिनों के लिए अहमदाबाद जा रहे हैं. परसों उनके विवाह की सालगिरह है. उन्हें अब इस रिश्ते में दूसरे कई पहलू नजर आने लगे हैं, प्रेम, विश्वास, भरोसा, मित्रता और एक साहचर्य की भावना, देह से ऊपर मन व आत्मा के स्तर पर वे जुड़ गये हैं. अब इस रिश्ते की नींव बहुत गहरी हो गयी है. कुछ वर्ष पूर्व, कई वर्ष पूर्व उसे इसकी चूलें हिलती नजर आई थीं. वैसे मन का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, मन के साथ रहना तो ऐसा ही है जैसे कोई अपने शत्रु के साथ एक ही घर में रह रहा हो !



Wednesday, October 5, 2016

पित्ताशय में पथरी


आज शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसे दो कविताएँ पढ़नी हैं. नेट नहीं चल रहा है आज, कुछ देर ‘गीतांजलि’ के भावानुवाद के कुछ भाग को टाइप किया. नेट न होने से कुछ देर बुरा लगा, फिर खुद को समझाया, अपना लक्ष्य तो एक ही है, और वह है परमात्मा की प्राप्ति, उस एक लक्ष्य में जो सहायक है उसे करना व जो बाधक है उसे छोड़ते जाना ही बुद्धिमत्ता है, उसे लगता है अहंकार की पुष्टि के सिवा अभी उसके लिए नेट का क्या उपयोग है. कविता पोस्ट करना फिर उस पर आये कमेंट्स को पढ़ने की आकांक्षा, यह अहंकार की पुष्टि ही हुई. जो भी होता है उसमें कुछ न कुछ अच्छाई छिपी होती है. परमात्मा की ओर उन्मुख होने में जो भी सहायक हो वही वन्दनीय है, अस्तित्त्व चाहता है कि उसके मन, बुद्धि पावन हों, वह उसके द्वारा प्रकट हो. जीवन का एक-एक क्षण कितना अनमोल है और हर क्षण वह उनके साथ ही है, बस नजर उठाने भर की देर है !

आज सुबह एक सुंदर अनुभव हुआ, अब स्वरूप में मन टिकने लगा है. पढ़ा था कितनी बार जैसे एक छोटा सा अवरोध विस्तीर्ण गगन को ढक लेता है, वैसे ही छोटी सी वृत्ति आत्मा को ढक लेती है, आत्मा जस की तस रहती है, उसका कुछ आता-जाता नहीं है, उसे घटते हुए देखा, कितना सुकून है इस अहसास में. उस क्षण भीतर मौन पसर जाता है, कुछ भी जानना, पाना, चाहना शेष नहीं रहता, जीवन एक खेल बन जाता है. एक स्वप्न कहें या खेल..आज शाम को पब्लिक लाइब्रेरी जाना है, जहाँ इस वर्ष एक बार भी नहीं गयी, आज संयोग बना है, एक वरिष्ठ सदस्य की विदाई है. कल मृणाल ज्योति भी जाना है, कम्पनी में पेट्रोलियम सेक्रेटरी आ रहे हैं. उनकी पत्नी कल शाम को वहाँ जाएँगी, स्कूल देखना चाहती हैं. आज नेट चला पर समय सीमा निर्धारित कर दी है. कल वर्ष का अंतिम दिन है, जाते-जाते इस वर्ष वर्ष की विदाई के रूप में नये वर्ष की शुभकामना की कविता लिखेगी. एक बार फिर जीवन को नये अंदाज में जीने का संदेश देने नया वर्ष आया है. नये साल में बहुत कुछ नया करना होगा. जीवन को एक नये अंदाज में जीना होगा, क्योंकि अब मार्ग मिल गया है, सो किस तरह समय का अच्छे से अच्छा उपयोग हो सके, अपनी ऊर्जा का और अपनी योग्यता का इसका ही प्रयास करना है ! अभी-अभी पता चला, नैनी के गॉलब्लैडर में पथरी है, इसलिए उसे इतना दर्द होता है, आपरेशन करवाना पड़ सकता है. वह पिछले कई दिनों से शिकायत कर रही थी. नया वर्ष उसके लिए भी स्वास्थ्य लायेगा.   



Tuesday, September 27, 2016

लैप टॉप पर कविता


आज जून लंच पर घर नहीं आ रहे हैं. सुबह-सवेरे वे दोनों टहलने गये थे, ठंडे मौसम का सामना करो तो सारी ठंड काफूर हो जाती है. नया वर्ष आने वाला है, उसके मन में नये-नये सूत्र आने लगे हैं, नये साल के लिए लोग कितने प्रण लेते हैं. सर्दियों की सुबह में कैसी शांति पसरी है चहुँ ओर, कोई जल्दी नहीं है. समाचारों में सुना, कल बनारस में शीतला घाट पर बम विस्फोट हुआ, आरती का वक्त था, विदेशी सैलानी भी थे, घायल हुए कुछ, एक बच्ची की मौत भी हुई. आतंकवाद की जड़ें कितनी गहरी चली गयी हैं, और कितने हृदयशून्य हैं आतंकवादी.

नेट नहीं चल रहा है आज, ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. वह डायरी में एक कविता खोज रही थी, माना सुंदर है जग, सुंदर... फिर से लिख सकती है, बहुत समय व्यर्थ किया उसकी खोज में, कई बार वे यूँही व्यर्थ के कामों में लग जाते हैं. सोये हुए व्यक्ति की यही निशानी है. दोपहर को भोजन के बाद जब आराम कर रही थी, मन में कितनी पंक्तियाँ गूँज रही थीं, नये वर्ष की कविता के लिए. आज मौसम ने फिर करवट ली है, बदली छायी है, ठंड बढ़ गयी है, सब घर के भीतर ही बैठे हैं. कल वर्षों बाद गुरूजी की पुस्तक God loves fun दुबारा पढ़ी. बहुत अच्छी लगी, आज उन्हें सुना भी, कितने सहज रहते हैं वह और कितने केन्द्रित भी..अनोखे हैं वह और वे भी कितने भाग्यशाली हैं कि उनके होते हुए वह आए हैं धरती पर ! कह रहे थे, शब्दों को अर्थ मानव देते हैं, लोगों को नाम भी वे देते हैं, धारणाएँ वे बनाते हैं, सब उनका खुद का ही किया धरा है. वे व्यर्थ ही अपने विचारों को इतना महत्व देते हैं, जो उन्हें कहीं का नहीं रखते, आज तक इन शब्दों ने क्या भला किया है जो आगे करेंगे.. जो शब्द मौन में ले जाकर छोड़ दें वही काम के हैं !

शनिवार को वे पिकनिक पर गये, रविवार को मैराथन में भाग लिया, आज प्रेस जाना है और कल विशेष बच्चों के स्कूल. जून के दफ्तर में ऑडिट चल रहा है, अभी तक आये नहीं हैं. बादल नहीं हैं पर बाहर घना कोहरा है. परसों धूप इतनी तेज थी जैसे मई-जून में होती है, कल दिन भर वर्षा होती रही और आज.. कुदरत अपना सारा खजाना खोल के बैठी है, अलग-अलग मौसम के रंग बिखर रहे हैं. भीतर साक्षी भाव दृढ़ हो रहा है या नहीं इसका भी पता नहीं चलता..परमात्मा और आत्मा तो एक ही हैं फिर भान किसे हो, कोई हो तो उसे भान होगा, वहाँ एक मौन है..एक शून्य..एक आकाश. कल पिताजी ने उसकी कविताएँ पढ़ीं, बल्कि सुनीं, छोटा भाई उन्हें पढ़कर सुना रहा था. सम्भवतः वह स्वयं भी लैप टॉप ले लें, फिर स्वयं ही पढ़ सकेंगे.

आज एक अनोखा अनुभव कुछ पल के लिए हुआ ही होगा. शास्त्रों के वचन घटित होते स्पष्ट दिखे. स्वयं को पानी की तरह जिस जगह गयी उसी रूप में ढलते देखा, फिर स्वयं में टिकते हुए भी देखा. वृत्ति जैसी हो वैसा ही रूप स्वयं भी धर लेता है मन और वृत्ति कब कौन सी उठ जाएगी, उन्हें भी पता नहीं होता और वे उन विचारों को इतना महत्व देते हैं..सब माया है..सम्भवतः अब जाके उसे ध्यान का सूत्र समझ में आया है. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके लिए कविता लिखने की कोशिश करेगी..

एक चुलबुली हंसमुख कन्या
पढ़ती होटल मैनेजमेंट
पहली बार है घर छोड़ा

मस्ती करना शौक है उसका
पाक कला में हुई निष्णात
रंगत गोरी सुंदर मुखड़ा..

Monday, December 28, 2015

जाता हुआ वर्ष


वे कल घर लौट आये, अभी यात्रा की थकान पूरी तरह नहीं गयी है. घर भी पूरी तरह पुनः व्यवस्थित नहीं हुआ है. पेट में कैसी खलबली मची है. तरह-तरह के भोजन, जगह-जगह का पानी पीकर कुछ तो असर पड़ना ही था. मौसम भी एकदम से बदल गया है, वहाँ गर्मी थी यहाँ ठंड जोरों पर है. आज सुबह बहन व परिवार के अन्य सभी सदस्यों पर कविताएँ लिखीं, छोटी-छोटी तुकबन्दियाँ ! दोपहर को एक आलेख शुरू किया है, अभी दोएक दिन लगेंगे, मन में कितनी ही बातें हैं. कल रात स्वप्न में यूएइ ही देखती रही, खबूस खायी. जो मन पर अंकित है, वही तो पन्नों पर अंकित हो रहा है. यहाँ बगीचे में गुलदाउदी खिली है. शेष फूलों की पौध अभी लगनी है. वर्ष का यह अंतिम महीना है.

आज सुबह पांच बजे उठे, ठंड काफी थी पर ऐसी ठंड में भी उनकी नैनी बिना स्वेटर पहने ही रहती है, पता नहीं वह किस मिट्टी की बनी है. उसने ठंड पर विजय पा ली है, यहाँ वह है दो स्वेटर पहने है, तिस पर भी धूप में बैठी है. बरामदे में धूप आ रही है. भोजन बन गया है, सुबह के सभी आवश्यक कार्य भी हो चुके हैं. नैनी की बेटी पढ़ने आती है पर आज अभी तक नहीं आई, उसकी माँ को पढ़ाई का महत्व पता नहीं है, स्वयं अनपढ़ है सो क्या जाने कि पढ़ना-लिखना इन्सान के लिए कितना आवश्यक है. नन्हा परसों आ रहा है, वे उसे लेने जायेंगे. कल शाम वे एक मित्र परिवार के यहाँ गये, जन्मदिन की बधाई देने, वापसी में वह अपना पर्स वहीं भूल आई, दुबारा जाकर लाना पड़ा, मन कितना बेहोशी में जीता है. मन तो जड़ है ही, वे सजग नहीं रह पाते, मशीनवत काम करते हैं. मन कहीं और होता है, हाथ कुछ और कर रहे होते हैं. असजगता ही बंधन है वही दुःख में डालती है.


साल का अंतिम दिन ! कल मैराथन में भाग लिया, जैसी उम्मीद थी, प्रथम आई. रास्ते में एक बार लड़खड़ा गयी पर जैसे किसी ने सम्भाल लिया, कुछ विशेष चोट भी नहीं लगी, न ही उसके कारण कोई आगे निकल पाया. दिन भर खूब आराम किया. थोड़ी थकन अभी भी है तन में, पर मन तो जैसे है ही नहीं, प्रेम का अनुभव उसे गलाये जा रहा है. प्रेम इन्सान को कितना महान बना देता है. एक क्षुद्र, अनपढ़ गाँव का भोला व्यक्ति भी यदि अपने भीतर प्रेम का अनुभव करता है तो वह संसार का सबसे धनी व्यक्ति होगा. वह सद्गुरू के प्रति, परमात्मा के प्रति और उसकी इस अनमोल सृष्टि के प्रति असीम प्रेम का अनुभव करती है, भीतर जो संगीत गूंजता है, वह उसे भुलाने नहीं देता जो सार्थक है, जो शाश्वत है और जो सत्य है, इस अस्तित्त्व से प्रेम करना जिसे आ जाता है, अस्तित्त्व भी उससे प्रेम करता है. इस वर्ष उसकी चेतना और मुखर हुई है, विकसित हुई है. अब इस बात का डर नहीं है कि कहीं पथ से विचलित न हो जाए, क्योंकि अब भीतर कुछ जग गया है कुछ पनप गया है जो अब खुद जगायेगा. अब मन पहले से जल्दी ठहर जाता है. इस वर्ष कवितायें भी कुछ अधिक लिखी गयीं, ऐसे कवितायें जो कुछ लोगों को ख़ुशी दे गयीं. सभी के भीतर उसी परमात्मा को देखने का अभ्यास भी बढ़ा है और भीतर शांति का झरना भी निरंतर बहता है. जाता हुआ साल ढेर सारी यादें देकर जा रहा है, पर अब वर्तमान में रहने की इतनी आदत हो गयी है कि इस वक्त कुछ भी याद नहीं आ रहा !

Tuesday, October 6, 2015

नारद भक्ति सूत्र


नये वर्ष की दिनचर्या – सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, हल्का व्यायाम, क्रिया, नाश्ता बनाना, स्नान(नेति, धौती), योगासन, प्राणायाम, पाठ, नाश्ता, ध्यान, भोजन बनाना व खाना, संगीत, डायरी लेखन, पढ़ाना, पत्र लेखन, रात्रि भोजन बनाना, टिफिन, टहलना, अख़बार आदि पढ़ना, बागवानी, संध्या, रात्रि भोजन, स्वाध्याय, शयन. पूरे दिन भर में छब्बीस कार्य हैं जो उसे करने हैं. इसी में समय निकाल कर कविता लिखना तथा पहले की कविताओं को टाइप करना भी होगा तथा लोगों से मिलना-जुलना भी होगा, इसमें से कई कार्य जून के साथ ही होंगे और कुछ एकांत में, जीवन को अब एक दिशा मिल गयी है. सद्गुरु हर कदम पर उसके साथ हैं. आज सुबह टीवी पर उनके मुख से ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर प्रवचन सुना, नेत्रों में जल भर आया. वह हृदय को छू लेने वाले वचन कहते हैं. वह जो कहते हैं उसे अपने भीतर घटता हुआ दीखता है. जैसा-जैसा वह कहते हैं वैसा ही अनुभव में आता है, पर उनके इस भीतरी अनुभव का लाभ जगत को मिले इसके लिए कार्य भी करना होगा. केवल भक्ति में डूबे रहकर बैठे रहने से तो काम नहीं होगा, अपना कर्त्तव्य निभाते हुए जितना सहजता से हो सके, अपने को जगत को देते जाना होगा..वैसे भी ऊपर जितने कार्य उसने लिखे हैं वह सभी उस भीतर वाले परमात्मा को ही समर्पित हैं. जब स्वयं वह है ही नहीं तो उसके कृत्य कैसे ? ये तो स्वयं को व्यस्त कहने का एक साधन है. वही तो है, उसी के लिए सब कुछ है. उसकी हर श्वास उसी के लिए ही है, उसी की है.

जीवन में यदि योग हो, ईश्वर की लगन हो सदगुरू का अनुग्रह हो और मन में समता हो तो परमात्मा को प्रकट होने में देर नहीं लगती, वह तत्क्षण प्रकट हो जाता है. प्रभु का स्मरण यदि अपने आप होता हो, मन उसके बिना स्वयं को असहाय महसूस करता हो जब वैराग्य सहज हो जाये और जगत में कोई भी आकर्षण न रहे तो पात्रता के अनुसार परमात्मा भीतर प्रकट हो जाता है. जो विराट है, इतने बड़े ब्रह्मांड का मालिक है, वह एक व्यक्ति के छोटे से उर में प्रकट हो जाता है. भक्ति विराट को लघु, असीम को ससीम बनाने में सक्षम है. ऐसी भक्ति ही मानव जीवन का ध्येय है, साध्य है. शरीर, मन, बुद्धि की सार्थकता इसी में है कि इस तन में चैतन्य प्रकटे, मन प्रभु में लीन  हो तथा बुद्धि उसके सम्मुख नतमस्तक हो. उसके सामने बुद्धि की कुछ नहीं चलती.


आज मौसम ठंडा है, धूप नहीं निकली है लेकिन उसके भीतर का मौसम सम है. नया वर्ष आने में मात्र चार दिन रह गये हैं. इस एक वर्ष में उसके भीतर आत्मा का ज्ञान परिपक्व हुआ है. द्रष्टा भाव में रहना सीखा है. क्रोध, मन, माया, लोभ, राग व द्वेष भीतर स्पष्ट दिखने लगे हैं. ईर्ष्या भी खूब दिखी. मन में कटुता का अनुभव होने पर लगता है कोई पापकर्म उदय हुआ है जो मन कि यह हालत हुई है. उन्हें देखते जाओ तो वे नष्ट होते जाते हैं. भीतर विचार प्रकट होते हैं और तत्क्षण लुप्त हो जाते हैं, वे जैसे कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं, किन्तु यदि कोई सजग न रहे तो वे बढ़ते ही चले जाते हैं. सजगता अध्यात्म की पहली और अंतिम सीढ़ी है, बिना सजग रहे कोई कहीं नहीं पहुंच सकता. सद्गुरु से पूछ तो कहेंगे कि कोई प्रेम को अपने मन में धारण करे तो सारे विकार अपने आप दूर हो जायेंगे. विकारों को दूर करने जायेंगे तो उन्हें सत्ता मिलेगी. जो वास्तव में हैं नहीं, होने का भ्रम पैदा करते हैं, वे विकार सत्य और शाश्वत प्रेम के सम्मुख कहाँ तक टिक पाएंगे. प्रेम जो उनका सहज स्वभाव है तभी तो थोडा सा विकार भी सहन नहीं होता. भीतर पल भर के लिए भी उद्वेग हो तो कैसा लगता है..प्रेम यदि सदा बना रहे तो कोई भी उलझन नहीं होती क्योंकि वह मूल है, स्वाभाविक है. दो दिनों बाद नया वर्ष आ रहा है. इस साल ने जाते-जाते एक मोह से मुक्ति दिलाई है. मोह जहाँ भी हो दुःख का कारण होता है. भविष्य में इस मोह के कारण न जाने कितनी बार दुःख उठाना पड़ता, सो अब मन मुक्त है. नये वर्ष का स्वागत मुक्त मन से ही करना चाहिए. सद्गुरु से प्रार्थना है कि उसके अंतर का सारा छोटापन सारी संकीर्णता वह ले लें. 

Friday, February 14, 2014

उड़िया फेस्टिवल



आज क्रिसमस ईव है और एक मित्र के विवाह की वर्षगाँठ भी. शाम को उनके यहाँ जाना है, नन्हे को क्लब जाना है, जहां बच्चों को सांता क्लाज उपहार व स्नैक्स देते हैं. आज ही उनका कम्प्यूटर भी आने वाला है. कल शाम जून ने दीदी का पत्र दिया, वह आध्यात्मिक रूप से कहीं आगे हैं. उनकी सहनशक्ति कहीं ज्यादा है, उसे लगा, इस तरह तुलना नहीं करनी चाहिए, उनका दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट है कहीं शंका की गुंजाइश नहीं जबकि वह इधर-उधर बिना पतवार की नौका की तरह डोलती रहती है. उसे उनके पत्र से कुछ जवाब तो मिले हैं पर कुछ नये सवाल भी खड़े हो गये हैं. कल जून ने शिकायत की कि उसके पास उनके लिए समय नहीं है. वह कर्त्तव्य मात्र समझकर किसी कार्य को करना नहीं चाहती पर उसे लगा जीवन में संतुलन के लिए ऐसा करना जरूरी है. कल उन्हें पिकनिक पर जाना है, दिसम्बर के महीने में गुनगुनी धूप में नदी के ठंडे पानी की छुअन, सोचकर अच्छा लगता है, माँ-पापा के आने पर उन्हें भी ले जायेंगे वे नदी के तट पर.

नये साल का आखिरी दिन...कभी तो यह साल भी नया ही था, हर वर्ष नया बनकर ही आता है और कल...यह इतिहास बन जायेगा. पिछले कई दिनों से वह कुछ नहीं लिख सकी, पिकनिक अच्छी रही, उसके अगले दिन जून तिनसुकिया गये उसके सिर में दर्द था. उनका एसी भी बनकर आ गया है. नन्हे के साथ सुबहें कैसे बीत जाती हैं पता ही नहीं चलता, आज उसके शीतावकाश का अंतिम दिन है. कल से यानि नये साल के पहले दिन से स्कूल खुल रहे हैं, जिसे आने में अब कुछ ही घंटों का वक्त रह गया है.

नये वर्ष की सुबह नशीली भी है और सुहानी भी ! सुबह अलसाये से सात बजे के थोड़ा बाद ही उठे, सभी को फोन पर नये वर्ष की शुभकामनायें दीं, सभी को उनके कार्ड्स भी मिल गये होंगे. एक उत्सव की तरह सेवइयों की खीर से नये वर्ष का स्वागत किया, उसे याद आया, धर्मयुग का विशेषांक निकलता था नये साल पर, अब तो उन्हें महीनों, वर्षों हो जाते हैं धर्मयुग पढ़े हुए. हिंदी की कोई पत्रिका वह इस वर्ष मंगाएगी, सृजनात्मक लेखन का कोर्स जो करना है. हसबैंड नाईट के लिए एक skit भी लिखनी है. पाठ और योगासन करने के बाद उसने मन ही मन संकल्प लिया है,  इन दोनों कार्यों के साथ साथ प्रतिदिन कुछ लिखेगी भी. अभी काफी काम पड़ा है लेकिन उन कामों के कारण अपने निजी कार्यों की बलि नहीं चढने देगी. जून अपनी कार को वैक्यूम क्लीन कर रहे हैं और नन्हा पास खड़े होकर खुद भी करने की जिद करके उन्हें झुंझला रहा है. कल रात जून ने प्रेस जाकर हिंदी की कम्पोजिंग का काम पूरा करा दिया. मेहमानों के आने में ग्यारह दिन का वक्त रह गया है, उसे सारे घर की सफाई करनी है और सिलाई का कार्य भी अभी शेष है. आज शाम को क्लब में ‘उड़िया टी’ का आयोजन किया गया है, उसकी उड़िया पड़ोसिन सुबह से तैयारी में व्यस्त है.




Saturday, August 4, 2012

बीहू का अवकाश


वर्षा अभी थमी नहीं है, आज भी बीहू का अवकाश है, नया वर्ष आरम्भ हुआ है तो ‘म्यूजिक कॉर्नर’ वाले उनकी सिलाई मशीन आज ठीक नहीं करेंगे क्योंकि नए वर्ष के पहले दिन वे कोई काम नहीं करते. जून कुछ देर के लिये ओ.सी.एस. गए थे, लौट आये हैं और व्यस्त हैं. नन्हा उनकी नई उड़िया पड़ोसन के घर गया है. पिछले दो दिन से वह कुछ परेशान लगता है, बेवजह ही रोता है, शायद बेवजह नहीं, पर वे समझ नहीं पाते. शायद वे उसकी ओर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं. छुट्टी के दिन वैसे भी घर में काम ज्यादा होता है और सुबह सोकर देर से उठने से और भी समय कम मिलता है. कल शाम नूना का मन अशांत था, जैसे मन में कितना कुछ घुमड़ रहा था. शाम को वे लोग एक पुराने परिचित के यहाँ गए थे, पर उनका व्यवहार उदासीनता भरा था, वह कुछ ज्यादा ही संवेदनशील है, उसे लगा अब उनके सम्बन्धों में वह पहले जैसी बात नहीं है.

वर्षा के कारण लगता है महरी आज भी काम पर नहीं आयेगी, उसे छाता खरीदने के लिये पैसे देने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं. नन्हा अभी कुछ देर पूर्व ही सोकर उठा है और इस समय दूध पी रहा है, लेकिन कब पीना छोड़ कर खेलने बैठ जायेगा कुछ नहीं कह सकते, बीच-बीच में वह उस पर नजर रखती है. उसका रोज का काम अभी आधा ही हुआ है और यदि बर्तन व कपड़े भी धोने पड़े तो पूरे ग्यारह ही बजेंगे आज. कल शाम उन्होंने नए पड़ोसी उड़िया जोड़े को चाय पर बुलाया था, नयी दुल्हन में उसे बहुत बचपना लगा.

परसों शाम या कहें दिन भर ही कुछ अनाप-शनाप सभी कुछ खाया सो कल सुबह से ही सिर भारी था. शाम को जाकर ठीक हुआ. मानसिक तनाव के कारण सिरदर्द होता है इसका अनुभव उसे कभी नहीं हुआ पर अपच के कारण कई बार हुआ है. जून ने उसकी बहुत देखभाल की. खाना बनाने में भी सहायता की, पर भिन्डी की सब्जी जो उसने बनायी, नमक भूल गया. कल क्लब में उनकी देखी हुई ‘इंकलाब’ फिल्म थी, मौसम ठंडा था वर्षा भी यदाकदा हो जाती थी, सो वे नहीं गए.

आज उसने कई दिन बाद योग के आसन किये. परिणाम पता नहीं क्या हो. चाहे इसका कोई ठोस कारण न हो पर उसे ऐसा लगता है की नन्हे के जन्म के बाद वह जब भी कुछ दिन व्यायाम करती है, दो एक हफ्ते तो ठीक रहती है फिर कुछ न कुछ समस्या अवश्य होती है. सर्दी, जुकाम, सरदर्द या कमर में दर्द कुछ न कुछ. नन्हे के ऊँ ऊँ की आवाज आ रही है, अभी चुप होकर जब वह उसे आवाज देगा तभी वह जायेगी, नहीं तो रोने का जो मूड उठते समय शुरू हुआ है, वह भूलेगा नहीं. कल फिर वर्षा होती रही, वे कहीं नहीं गए, सुबह वह कुछ देर के लिये पड़ोस में गयी और शाम को सामने रहने वाली अकेली लड़की के यहाँ, पर शायद उसे उसके आने की उम्मीद नहीं थी, वह नर्वस हो गयी जब उसके बेड पर सोये एक व्यक्ति को उसने देखा, उसे न तो आश्चर्य हुआ न ही इससे कोई मतलब है, पर उसने तय किया है अब वह उसके घर तभी जायेगी जब पूरा पता हो कि वह अकेली है. कल टीवी पर ‘श्रावंती’ एक अच्छी तेलेगु फिल्म देखी, परसों रात की ‘विद्यापति’ इससे कहीं ऊपर थी.