Showing posts with label अनुभव. Show all posts
Showing posts with label अनुभव. Show all posts

Monday, October 15, 2018

लहर और बादल



आठ बजने को हैं. आज भी मौसम ठंडा ही रहा. बदली बनी रही. वे अभी-अभी बाहर टहल कर आये हैं. आकश पर सफेद बादलों के मध्य पूर्णिमा से एक दिन पूर्व का सुंदर चाँद चमक रहा था. कल यहाँ लक्ष्मी पूजा का उत्सव है, उत्तर भारत में दीपावली के दिन यह उत्सव होता है. यहाँ उस दिन काली की पूजा होती है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. बच्चों द्वारा रंगे कुछ सुंदर दीए खरीदे. कम्प्यूटर ठीक हो गया है, ब्लॉग पर नई पोस्ट प्रकाशित की. कल सुबह डिब्रूगढ़ डाक्टर के पास जाना है, जून के घुटने में दर्द है.
शनिवार व इतवार कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इस समय शाम के चार बजे हैं. जून एक दिन के लिए आज देहली गये हैं, देर शाम तक पहुंचेंगे, परसों लौटेंगे. परसों शाम उन्होंने यूरोप के सभी चित्र टीवी की बड़ी स्क्रीन पर दिखाए, भव्य इमारतें और सुंदर बगीचे. कल शाम को वह थोड़ा परेशान हो गये थे जब उसने कहा कि काजीरंगा जाने का समय वह केवल अपने लिए तय कर सकते हैं, अन्यों के लिए नहीं. बाद में उसे समझ में आ गया कि अपने-अपने संस्कारों के वशीभूत होकर वे क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं. उसके बाद उनके मध्य पुनः सकारात्मक ऊर्जा बहने लगी. ऊर्जा का आदान-प्रदान सहज होता रहे, यही तो साधना है. सुबह वे घर में ही कुछ देर टहले, डाक्टर ने उन्हें दो दिन आराम करने को कहा है, आज वह अपना घुटना आराम से मोड़ पा रहे थे. उनकी कम्पनी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कितना सहायक सिद्ध हुआ है, उसका मन कृतज्ञता से भर गया. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से ईमेल आया, टीचर्स की जानकारी थी. अब वे उनके लिए भली-प्रकार योजना बना सकते हैं. वे इस समय जहाँ खड़े हैं, वहाँ से उन्हें आगे लेकर जाना है. उसने क्लब की एक परिचित सदस्या को, जो असमिया लेखिका भी है, प्रेरणात्मक वक्तृता के लिए कहा है.
आज सुबह वह उठी तो आँखें खुलना ही नहीं चाहती थीं, कुछ देर के लिए ऐसे ही बैठ गयी, बाद में सुदर्शन क्रिया करते समय भी अनोखा अनुभव हुआ. शांति की अनुभूति इतनी स्पष्ट पहले कभी नहीं हुई थी. वह इस देह के भीतर प्रकाश रूप से रहने वाली एक ऊर्जा है जिसके पास तीन शक्तियाँ हैं, मन रूप से इच्छा शक्ति, बुद्धि रूप से ज्ञान शक्ति तथा संस्कार रूप से कर्म करने की शक्ति. यदि ज्ञान शुद्ध होगा, तो इच्छा भी शुद्ध जगेगी, और उसके अनुरूप कर्म भी पवित्र होंगे. उनके पूर्व के संस्कार जब जगते हैं और बुद्धि को ढक लेते हैं तब मन उनके अनुसार ही इच्छा करने लगता है. हर संस्कार भीतर एक संवेदना को जगाता है, उस संवेदना के आधार पर उनका मन विचार करता है. यदि संवेदना सुखद है तो वह उस वस्तु की मांग करने लगता है, यदि दुखद है तो द्वेष भाव जगाकर विपरीत विचार करता है. अपने संस्कारों के प्रति सजग होना होगा तथा नये संस्कार बनाते समय भी जागरूक होना होगा. वे स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं. वह ऊर्जा ही इस देह पुरी का शासन करने वाली देवी है, उसे स्वयं में संतुष्ट रहकर इस जगत में परमात्मा की दिव्य शक्ति को लुटाना है.
आज स्कूल जाने के लिए तैयार हुई पर ‘बंद’ के कारण नहीं जा सकी, बच्चे शायद उसकी प्रतीक्षा करते होंगे, सोचकर एक पल के लिए मन कैसा तो हो गया पर ज्ञान की एक पंक्ति पढ़ते ही स्मृति आ गयी और शांति का अनुभव हुआ. वे स्वयं को ही भूल जाते हैं और व्यर्थ के जंजाल में पड़ जाते हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है और वे उसे शब्दों में ढूँढ़ते हैं. करने को कितना कुछ है, दीपावली का उत्सव आने वाला है, एक सुंदर सी कविता लिखनी है.

सागर की गहराई में शांति है,
अचल स्थिरता है, हलचल नहीं..
लहरें जो निरंतर टकराती हैं तटों से,
उपजी हैं उसी शांति से..
भीतर उतरना होगा मन सागर के
आकाश की नीलिमा में भी बादल गरजते है,
टकराते हैं, उमड़ते-घुमड़ते आते हैं और खो जाते हैं !
आकाश बना रहता है अलिप्त.
पहचानना है लहर और बादल की तरह मन के द्वन्द्वों को
जो जीवन का पाठ पढ़ाते हैं.
लहर और बादल को मिटने का दर्द भी सहना होगा
अवसर में बदलना होगा चुनौतियों को
और पाना होगा लक्ष्य-शाश्वत सत्य !   

Friday, September 14, 2018

देवदूत



दस बजने वाले हैं सुबह के. कल रात्रि साढ़े सात बजे हवाई जहाज उतरा, मंझला भाई लेने आया था हवाई अड्डे पर. नौ बजे तक वे घर पहुंच गये. बड़े भाई व भतीजी भी मिलने आये थे. भाई अब ठीक हैं. एक घंटे बाद सोने गयी, पहले नींद नहीं आ रही थी, फिर आ गयी और सुबह पांच बजे ही खुली. स्नान करके प्राणायाम किया, अनोखा अनुभव हुआ. ‘दिव्य समाज के निर्माण’ के सूत्र जैसे कोई भीतर सिखा रहा था. वह यही कोर्स करने ही तो आश्रम गयी थी. कल आश्रम में भी सुदर्शन क्रिया के बाद कितना अनोखा अनुभव हुआ था. एक नन्हे बच्चे का छोटा सा कोमल हाथ मस्तक को छूता हुआ सा लगा, फिर एक सुंदर महिला की आकृति बांयी तरफ सामने आकर बैठ गयी तथा एक पुरुष की आकृति दांयी ओर सामने आकर बैठ गयी. अद्भुत शांति का अनुभव हो रहा था. आज सुबह भी ध्यान घटा. अब भीतर जैसी स्थिरता का अनुभव होता है, वह पहले नहीं था. भक्ति नित नूतन होती है, पढ़ा था, पर अब इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है. परमात्मा उनका सुहृद है, मित्र है, सखा है, ये न जाने कितनी बार लिखा होगा, वह उनका अपना आप है, वह उनसे अभिन्न है, वह उनसे दूर नहीं है, वह उतना ही करीब है, जितना वे स्वयं अपने आप से हैं, वह उनसे उसी तरह बातें करता है जैसे दो मित्र आपस में बातें करते हैं. वह अनुपम है, उसने खुद पढ़ाया उसे, दिव्य समाज के निर्माण का कोर्स. स्वीकार भाव को दृढ़ करवाया. उसका प्रेम अनोखा है !

वह आज गुड़गाँव में है, कल शाम ही यहाँ आ गयी थी, यहाँ के मैनेजमेंट संस्थान में, जहाँ जून की ट्रेनिंग चल रही है. कैम्पस बहुत विशाल है और हर-भरा व शांत है. प्रातःभ्रमण के समय उन्हें कुछ अन्य ट्रेनी भी मिले. दोपहर बाद वे बाजार जायेंगे और शाम को भाई के घर. कल सुबह उसे वापस घर जाना है. सुबह एक अलौकिक अनुभव हुआ. पांच बजकर ग्यारह मिनट हुए थे जब किन्हीं कोमल हाथों का स्पर्श दोनों कंधों पर पाकर उठी. कितना प्रेम था और कितनी शीतलता थी उस स्पर्श में, अनोखी थी उसकी कोमलता, कोई देवदूत था या परमात्मा के स्नेह भरे हाथ. उठकर स्नान आदि किया और प्राणायाम. उसे याद आया एक सुबह किसी मधुर आवाज ने उठाया, घंटी की सी आवाज थी. उस परम के पास हजारों साधन हैं, जब चाहे किसी का भी प्रयोग कर सकता है.

सितम्बर का आरंभ हुए दो दिन हो गये हैं. जून पेरिस पहुँच गये हैं. तस्वीरें भेजी हैं. शाम को भाई से बात की, उन्होंने पैकिंग आरंभ कर दी है. दो दिन बाद उन्हें आना है. घर की सफाई काफी हो चुकी है, कुछ कल हो जाएगी. सेक्रेटरी का फोन आया, कल दस बजे क्लब जाना है, बाजार भी जाना है, फूलों का एक गुलदस्ता भी लेना है. इस बार मीटिंग में एक सदस्या की विदाई पार्टी है, उन्हें देना है. इस बार वार्षिक सभा है, वर्ष भर में जिन लोगों को विदाई दी गयी, उन्हें याद करते हुए नाम कहना ठीक होगा, चाहे जितना भी समय लगे. मंझली भाभी से बात हुई, दीदी ने उन्हें अपने बगीचे की भिन्डी व तोरई भिजवाई है. आज टेलीफोन खराब हो गया, इंटरनेट नहीं चल रहा, वैसे भी पिछले कई दिनों से लेखन का काम बहुत कम हो पा रहा है. अब इस महीने भी ऐसा ही चलेगा. भीतर विश्रांति है, एक नई सी गंध हर समय बनी रहती है. पहले कभी-कभी आती थी, शायद इसका कारण शारीरिक से अधिक आध्यात्मिक है. उसे शुचिता का अधिक ध्यान देना होगा. होना ही पर्याप्त है जिसके लिए, ऐसी स्थिति अब बनती नजर आ रही है. आज सुबह ध्यान में कैसा विचित्र अनुभव हुआ. जैसे भूचाल आया हो, कितने ही दृश्य दिखे, छोटी भांजी को देखा, अपने किसी पूर्व जन्म में वह अंग्रेज थी.   

Tuesday, September 11, 2018

ब्रह्मपुत्र का पाट



पूरे पांच दिनों के बाद कलम उठायी है. परसों शाम इस समय वह गोहाटी के आर्ट ऑफ़ लिविंग आश्रम जा रही होगी, या हो सकता है पहुँच ही चुकी हो. तैयारी लगभग हो गयी है. आज ओडोमॉस भी मंगायी, जून ने कल याद दिलाया था. उनकी ट्रेनिंग अच्छी चल रही है. आश्रम का जीवन शांतिदायक होगा, चाहे आरामदायक न हो. अल्प साधनों में रहना सीखना हो तो आश्रम में ही सीखा जा सकता है. बंगलूरु में उनका घर सम्भवतः अगले तीन वर्षों में भी बनकर तैयार न हो सके तो वे आश्रम में ही रहेंगे, अवश्य वहाँ ऐसा कोई स्थान होता होगा, आखिर इतने बड़े आश्रम को चलाने के लिए कितने सारे लोग वहाँ रहते ही होंगे. अभी कुछ देर में सेक्रेटरी आएगी, क्लब का कुछ कार्य है. उसने एक सदस्या के बारे में बताया कि वह दुखी है, एक सीनियर सदस्या ने उसे कड़े शब्द कहे. इंसान का दिल बहुत कोमल होता है, फूल से भी नाजुक, जरा सी बात पर कुम्हला जाता है. आत्मा का अनुभव किये बिना मन को संभालना बहुत मुश्किल है, आत्मा के पास अपार शक्ति है. उस दुखी महिला को समझाना पर आसान नहीं है, वह भावुक है और ज्यादा सकारात्मक भी नहीं, काम बहुत मन से करती है. उसको फोन किया पर उसने उठाया नहीं. वह उसके लिए प्रार्थना ही कर सकती है.

आज दोपहर मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. वापस आकर क्लब की कुछ सदस्याओं को फोन किये नयी कमेटी के कार्यकर्ताओं के चुनाव के लिए, कुछ मान गयीं, कुछ ने मना कर दिया. सेक्रेटरी भी कल कुछ अन्यों को फोन करेगी. सुबह जगने से पहले विस्मित कर देने वाला अनुभव हुआ, वह जिस वस्तु या जीव की कल्पना करती थी, वह प्रकट हो जाता था जैसे बिलकुल सजीव हो. उनके मन में कितनी शक्ति छुपी है. यह अनुभव रोमांचकारी था, पिछले दिनों और भी कई विचित्र अनुभव हुए, पर लिखे नहीं और अब याद नहीं हैं. बड़े भाई का स्वास्थ्य अब ठीक है, पर उन्हें कमजोरी है. जून अपने प्रशिक्षण से प्रसन्न हैं, नन्हे ने भी एक ट्रेनिंग ली कि लोगों को कैसे नियुक्त किया जाये. बिना ट्रेनिंग के वह कितने ही कालेजों में कम्पनी के लिए छात्रों का इंटरव्यू लेने गया है. कह रहा था, इस ट्रेनिंग से काफी सुझाव मिले हैं. वह भी एक किताब पढ़ रही है जो एक ट्रेनर ने लिखी है, इस तरह वे तीनों ही कुछ नया सीख रहे हैं. अभी वह रसोईघर में गयी और नैनी को फ्रिज में बर्फ की ट्रे रखते देखा, इसका अर्थ हुआ उसने बिना कहे फ्रिज से बर्फ निकाली, अवश्य ही वह अपनापन महसूस करती होगी. उसने सोचा, अच्छा है.

इस आश्रम में यह पहली रात है. पिछले माह जब यहाँ के स्वामीजी उनके स्थान पर गये थे, तब इस कोर्स के बारे में पता चला था, पर अभी तक ज्ञात नहीं है कि कल सुबह कोर्स आरंभ भी हो पायेगा या नहीं. कम से कम बीस प्रतिभागियों के होने पर ही होगा और आज की तिथि में केवल ग्यारह ही हैं. टीचर भी कोलकाता से आई हैं. उसकी पीठ में शायद दिन भर में एक भी बार न लेटने के कारण दर्द हो रहा है. कुछ पंक्तियाँ लिखकर सोना ही अगला कार्य है. सुबह सवा नौ बजे वह घर से निकली थी, दोपहर सवा दो बजे गोहाटी में रहने वाली एक सखी के यहाँ पहुंच गयी, दोपहर का भोजन और कुछ देर विश्राम के बाद पौने चार बजे वहाँ से विदा लेकर इस आश्रम में पहुंची. यहाँ पर सब सुविधाएँ हैं पर गर्मी के कारण तथा उस समय बिजली न होने के कारण कुछ देर परेशानी हुई. आसपास का दृश्य बहुत सुंदर है. कल प्रातःकाल और तस्वीरें लेगी. ब्रह्मपुत्र का चौड़ा पाट सागर सा विस्तीर्ण लगता है. शाम को सभी ने मिलकर गुरूजी का जन्माष्टमी के अवसर पर सीधा प्रसारण देखा, फिर भोजन किया. बाद में मंदिर में कृष्ण पूजा हुई, प्रसाद भी मिला.

सुबह के सात बजे हैं. एक सुहावनी सुबह है. वह आश्रम के कमरे में है. बहर वर्षा हो रही है. सुबह पांच बजे ही नींद खुल गयी. स्नान किया, फिर कुछ देर टहलने गयी. तब वर्षा नहीं थी. कुछ देर नदी की तरफ मुख करके एक कुर्सी पर बैठकर ध्यान किया. बहुत अच्छा अनुभव था. जून से बात की, अब कुछ देर में रूद्र पूजा में भाग लेने मन्दिर जाना है.

Friday, April 20, 2018

साबूदाने की खिचड़ी



काले रंग के कवर पर चमकदार लाल रंग से लिखा है तथा पन्नों के सिरों पर सुनहरी रेखा है जो डायरी बंद करने पर स्पष्ट दिखाई देती है. इस वर्ष की उसकी डायरी उनकी कम्पनी से मिली हुई नहीं है, बल्कि जून को एक प्राइवेट तेल कम्पनी द्वारा मिली है. सुबह क्लब की एक सदस्या का फोन आया, उसे एक प्रोजेक्ट की तस्वीरें चाहिए थीं, भेज दीं, ड्राप बॉक्स में सुरक्षित थीं. जून अगले हफ्ते तमिलनाडु जा रहे हैं और तीसरे सप्ताह में उन्हें कोलकाता जाना है, असमिया सखी के पुत्र की शादी में. अभी-अभी उससे फोन पर बात की, विवाह को लेकर कुछ चिंतित थी. जून कल दिन भर कुछ परेशान से थे, आज स्वस्थ हैं. उनमें से हरेक भिन्न है, हरेक एक अपने संस्कार हैं, दो आत्माएं जो साथ चलती हैं उन्हें एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए. हर एक की अपनी यात्रा है. परमात्मा उन्हें ज्ञान, प्रेम और शक्ति देता है ताकि वे सुखपूर्वक जीवन की राह पर चल सकें. उन्हें कर्मयोगी बनना है, यानि धर्म में स्थित रहकर कर्म करना है ! जब वे किसी की आलोचना करते हैं, तब स्वयं भी दोषी हो जाते हैं, क्योंकि वह नकारात्मक ऊर्जा जो वे दूसरों को भेज रहे हैं, उनसे ही होकर जानी है, और सबसे पहले उनपर ही असर करेगी ! बाहर से बच्चों के रोने की आवाज आ रही है, सुबह वे आये थे, भजन के साथ नृत्य करने, जब वह रसोईघर में भोजन पका रही थी और देवी के भजन कैसेट द्वारा चल रहे थे. बच्चे भगवान के ज्यादा निकट होते हैं ! जून के एक सहकर्मी ने एक बड़ा सा बूमरैंग भिजवाया है, जो वे आस्ट्रलिया से लाये हैं. उसने सोचा उनकी श्रीमती जी को फोन करके धन्यवाद कहेगी. इस महीने उनके क्लब का ‘सेल’ भी लगने वाला है, मृणाल ज्योति का भी स्टाल लगेगा. वहाँ की एक अध्यापिका ने फोन करके कहा. क्लब की एक सदस्या के पुत्र का जन्मदिन है अगले ह्फ्ते, वह वहाँ मनाना चाहती है, एक अन्य सखी ने कहा, वह भी कुछ भिजवाना चाहती है. उनका जीवन कितने लोगों से जुड़ा होता है ! छोटी भाभी का जन्मदिन है आज, छोटी बहन ने व्हाट्स एप पर गाकर बधाई दी, तो भाभी ने भी गाकर जवाब दिया ! दोपहर को झपकी लगी तो स्वप्न में उसने खुद को बड़े आराम से गाते हुए देखा, सुना !   

साढ़े दस बजे हैं, यानि आधा घंटा है उसके पास खुद से बातें करने के लिए ! सुबह उठी उसके पूर्व ही कोई अलार्म की आवाज सुना गया, कैसे-कैसे अनोखे अनुभव होते हैं तंद्रा में, तारों भरा आकाश, कभी अग्नि की ज्वाला, कोई चित्र दिखेगा किसी व्यक्ति का और किसी जन्म की कोई स्मृति कौंध जाएगी. परमात्मा न जाने कितने तरीकों से अपनी उपस्थिति जताता है. उसकी करुणा अनंत है. उठकर टहलने निकले तो कोहरा था पर जनवरी के हिसाब से ठंड ज्यादा नहीं थी. नाश्ते में सांवक चावल की खीर बनाई. दोपहर के भोजन में साबूदाने की खिचड़ी, उबला कच्चा पपीता, सलाद व बथुए का रायता बना रही है. सभी कुछ पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक ! कुछ देर पहले बाजार गयी, क्लब के कार्यक्रम के निमन्त्रण पत्रों में लगाने के लिए रिबन खरीदना था. बंगाली सखी को निमन्त्रण देने के लिए फोन किया. दो दिन बाद विवाह की वर्षगांठ है, उसमें वे अग्नि भी जलाएंगे, जैसे रोइंग में सीखी थी. अग्नि के दोनों तरफ नीचे ही बैठने का इंतजाम भी होगा.

शाम होने को है. आज सुबह पुनः एक स्वप्न देखा, किसी पुराने जन्म का स्वप्न था जैसे. वह एक समूह का अंग है, सभी बंगाली में प्रार्थना कर रहे हैं. स्वयं को स्पष्ट मंत्र बोलते हुए सुना, शायद रामकृष्ण परम हंस के आश्रम में थी वह, शायद उनके शिष्यों या भक्तों में से एक, तभी उनके प्रति उसके हृदय में एक गहरा आकर्षण है. टहलने गये वे तो जून को यूनिवर्स से आये नियमित संदेशों के बारे में बताया. इस वर्ष उन्हें जो लक्ष्य निर्धारित करने हैं, कदम दर कदम उन पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले संदेश. एक अन्य डायरी में लक्ष्यों के बारे में लिख रही है, पहली बार कोई एक भीतर स्पष्ट जगा है, पहले जहाँ भीड़ थी वहाँ एक प्रकाश का केंद्र बन गया है, जो सदा ही प्रेमस्वरूप है. कल शाम एक सखी को ध्यान के बारे में बताया, ध्यान ही वह ऊर्जा है जिसके लिए गुरूजी कहते हैं, ‘अग्नि की मशाल’ बन जाओ ! प्रतिपल ध्यान ऊर्जा से वे जुड़े रह सकते हैं और उसका उपयोग श्रेष्ठ कार्यों में कर सकते हैं ! आज जून ने कहा, उनकी इस वर्ष की थीम है, ब्लिस, अच्छा लगा, उन्हें एक कार्ड भेजा है विवाह की वर्षगांठ का कार्ड, उनके लिए कविता भी लिखनी है. शाम को क्लब में ‘दिलवाले’ है, उसे प्रेस जाना है.

Monday, February 12, 2018

वर्षा की फुहारें



आज सुबह उठी तो मन सजग था. भीतर एक अचल स्थिरता का अनुभव अब देर तक टिकने लगा है, पर जब वे प्रातः भ्रमण से लौट कर आये तो जून से एक विषय पर कुछ बात हो गयी. जिसके कारण व्यर्थ ही कुछ समय गया. अहंकार कितने सूक्ष्म रूप से भीतर रहता है, पता ही नहीं चलता. जून को तो क्षमा किया जा सकता है, अभी उन्होंने क्रोध पर विजय पाने की न तो साधना शुरू की है और न ही ऐसा दावा करते हैं, पर उसने तो साधना भी की है और दावे भी बहुत किये हैं. फिर भी इस तरह व्यर्थ ही मन को नकार से भरना..शायद यही परमात्मा चाहते थे, ताकि उसे अपनी वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो सके. उस दिन नन्हे से कहा था कि अब क्रोध का शिकार नहीं होता मन, पर कोई जड़ वस्तु ही ऐसा दावा कर सकती है. चेतन के पास अनंत सम्भावनाएं हैं. उसके बाद से सजगता बढ़ी है. प्राणायाम भी सही विधि से किया, वस्त्रों को सहेजा, व्यायाम किया और अब यह लेखन.. उनका जीवन यदि सत्य को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा तो साधना का फल प्राप्त नहीं हुआ. शाम को मीटिंग है, नई कमेटी को पहला बुलेटिन निकालना है. वर्षा लगातार हो रही है. कल दीदी से बात हुई, उनका हॉल कमरा बीजेपी की मीटिंग्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था, पहले कांग्रेस के लिए भी वे दे चुके हैं और इसके लिए कोई चार्ज नहीं लेते. शादी के लिए देते वक्त भी वे कह देते हैं, जितना मन हो दे जाओ. सेवा का यह कार्य सहज ही उनसे हो रहा है.

आज बहुत दिनों के बाद भागवद का पाठ किया, अच्छा लगा. एक दिन समय निकाल कर राखियाँ बनाने का कार्य भी करना है, संडे क्लास में बच्चों को भी सिखाना है. आज सुबह से वर्षा थमी है. वातावरण शीतल है. पर सबसे जरूरी है भीतर की शीतलता. परमात्मा की बनाई इस सुंदर सृष्टि का आनन्द भी तभी ले सकता है कोई जब मन खाली हो. अहंकार से ग्रसित मन कुछ और देख ही नहीं पाता, वह स्वार्थ से भर जाता है और दुःख का भागी होता है. परसों ही जून ने कहा, ये लोग प्यार से रहना नहीं जानते, जब नैनी के घर में लोग लड़ रहे थे. तत्क्षण उसके मन में ख्याल आया था, क्या वे लोग स्वयं जानते हैं ? और कल सुबह ही उसका जवाब मिल गया. मानव रेत की दीवारों पर किले खड़ा करना चाहता है. नहीं सम्भव है यह. वर्षों साथ-साथ चलने के बाद भी आत्माएं अपनी-अपनी राह ही चलती हैं, और यही उनकी नियति है, यही उनके लिए सही है, क्योंकि वे अपनी-अपनी यात्रा पर हैं. परमात्मा के सिवा आत्मा का कोई सहयात्री नहीं है.

आज छोटे भाई का जन्मदिन है, सुबह उससे बात हुई. भाभी ने उसे सुंदर शब्दों में  बधाई दी है. सुबह अलार्म बजने से पहले ही किसी ने जगा दिया. जैसे कोई भीतर पल-पल की खबर रखता है. वे टहलने गये तो हल्की सी वर्षा हो रही थी न के बराबर. अब भी बदली है. आज विशेष सफाई का दिन है. घर की सफाई के साथ-साथ अंतर की सफाई भी आवश्यक है. आज भी सुमिरन किया, स्थिरता का अनुभव अब भीतर जाते ही हो जाता है. वह अनुभव तो सदा से वहीं था, वे ही दुनिया में उलझे थे. दोपहर को बाजार जाना है, शिक्षक दिवस के लिए क्लब की तरफ से उपहार खरीदने हैं. मृणाल ज्योति के लिए वे अपनी तरफ से भी कुछ उपहार खरीदेगी.

Wednesday, July 5, 2017

बच्चों के योगआसन


आज होली है, वे द्रष्टा बने हुए हैं. उन्हें तो होली हंस बनना है. कंकर-पत्थर को नहीं चुनना है. रतन को चुनना है, ज्ञान रतन है, मन को इन रतनों से भरना है. जीवन में फिर इनका उपयोग करना है. उनका कोई भी कृत्य बिना फल दिए नहीं जाता. स्वयं सुनना है और स्वयं को सुनाना भी है, सुनकर ही वे स्वयं को बदल सकते हैं, जो स्वयं को समझा सकता है वही अन्यों को भी समझा सकता है. जो भी लिखने में आता है, वह स्वप्न जैसा है और जो सत्य है वह लिखने में नहीं आ सकता. पवित्रता, दिव्यता और सत्यता परमात्मा के गुण हैं, उनको धारण करके ही उन्हें काम करना है. मन पवित्र हो, बुद्धि, दिव्य हो और आत्मा सत्य हो तभी वे परमात्मा को स्वयं के द्वारा प्रकट होने दे सकने में सक्षम होंगे. आज एओल के दो टीचर (पति-पत्नी) आये थे, कल से बच्चों का कोर्स होगा. अगले तीन दिन शामें व्यस्त रहेंगी. आज सम्भवतः इस वर्ष की हिंदी की अंतिम कक्षा हुई, अब कुछ दिनों तक तो वह दोपहर को अपना अन्य कार्य कर सकती है.  

 आज स्कूल में प्रिंसिपल ने कहा, वार्षिक उत्सव के लिए बच्चों का योग का भी एक कार्यक्रम तैयार करना है. अगले हफ्ते से कक्षा एक से छोटे बच्चों को भी योग सिखाना है, उन्हें एनिमल पोज तथा उनकी चाल सिखाना ठीक रहेगा. उसके बाद असेम्बली कन्डक्ट करनी है. उसने सोचा है, शुरुआत श्लोक से करेगी फिर धर्म सम्बन्धित कुछ जानकारी, उसके बाद योग अंत में राष्ट्रीय गान. कुछ देर बाद जून आने वाले हैं, बाद में उसे श्री श्री योगा कोर्स में भी जाना है. पिछले तीन दिनों का अनुभव अच्छा रहा, कितना अच्छा उसे शब्दों में कहना कठिन है. देह के प्रति सजगता और बढ़ी है, मन के प्रति और स्वयं के प्रति भी. एक स्थिरता का अनुभव हो रहा है. अस्तित्त्व उसके साथ हर पल है. हर जगह, हर श्वास में, हर धड़कन में, वही साक्षी है, वही दृष्टा है, वही अनुमन्ता है, भोक्ता है, अर्थात मन, बुद्धि तथा देह आदि उसी के लिए हैं. उनकी इन्द्रियों के भोग की सीमा है पर माँग अनंत है, अनंत की चाह अनंत से ही मिट सकती है.

आज कोर्स का अंतिम दिन था. एक अनोखा अनुभव हुआ. शाम्भवी मुद्रा करते समय आज्ञा चक्र पर, सुंदर दृश्य दिखे, चमकदार रंग और फूल जैसी आकृति फिर अचानक ही तन में विभिन्न गतियाँ होने लगीं. कभी आगे-पीछे, कभी दायें-बांये फिर गोल-गोल तेजी से घूमने लगा. सारी आवाजें जैसे कहीं दूर घट रही हों. काफी देर तक बैठ रही, फिर एक ऐसा विचार आया जिससे सारा ध्यान टूट गया, कपड़े धोने का विचार. फिर आँख स्वतः ही खुल गयी. कोर्स के टीचर को उसने ‘श्रद्धा सुमन’ पुस्तिका की एक प्रति भेंट की है, वह अवश्य पढ़ेंगे. आज बंगाली सखी अपने बेटी के विवाह का कार्ड देने आयी.


Thursday, June 1, 2017

पैशन फ्रूट का जूस


रात को तंद्रा में दीपक जलते देखे, देखे कितने चेहरे जैसे कोई स्क्रीन हो सामने, जिसपर चित्र बदल रहे हों. उनके भीतर न जाने कितना बड़ा एक संसार छिपा है. कल स्वप्न में स्वच्छ जल से भरी नदी देखी थी, जिसमें तलहटी में मछलियाँ स्पष्ट दिख रही थीं. सुबह उठे तो पानी बरस रहा था. बगीचे में एक लता गिर गयी, एक गमला टूट गया, घर के सामने पानी भर जाता है, शायद नाला आगे जाकर बंद है अथवा तो मिट्टी डलवानी होगी, जून ने उसके निराकरण के लिए दफ्तर में कह दिया है. दोपहर को ‘बाल्मीकि रामायण’ का अगला अध्याय लिखा, एक दिन तो पूरा हो जायेगा यह महाकाव्य. आज ही ‘महादेव’ में राम-लक्ष्मण का वही प्रसंग देखा था जो लिखा. राम महादेव के भक्त हैं और महादेव राम के, कितना अनोखा रिश्ता है दोनों का. दोनों एकदूसरे के पूरक हैं. उनके भीतर भी पालन कर्ता और विनाश कर्ता दोनों साथ-साथ रहते हैं. ‘पिको आयर’ की जो किताब जो उसने पढ़नी शुरू की थी, रोचक होती जा रही है, जिसने यह किताब उसे दी है क्या वास्तव में उसने इसे पढ़ा होगा, तब तो वह बहुत गहराई में जीने वाली लड़की है. दोपहर को दोनों छात्राएं आयीं, एक अपने घर में उगाये ‘पैशन फ्रूट’ का जूस लाई थी. दूसरी ने परीक्षा की तैयारी ही नहीं की थी, उसे जरा भी भय नहीं है, स्कूल में हिंदी के अध्यापक भी नहीं हैं.

अभी-अभी बगीचे में एक काली तितली दिखी, बड़ी व सुंदर ! जून ने फोटो लिया है उसका. आज सुबह अलार्म बजने से पहले ही उसे पता चल गया कि अब वह बजने वाला है, यहाँ तक कि उसकी आवाज भी उसने अपने भीतर पेट के नीचे से आती हुई अनुभव की, कितना विचित्र अनुभव था. बाद में ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के एक स्वामी से, जो पास ही एक सखी के यहाँ ठहरे हुए हैं, मिलने गयी. उन्हें अपने कुछ अनुभव बताये, अच्छे लगे उन्हें भी. गुरूजी के सारे शिष्य उन्हीं के जैसे हैं, सभी को अपना मानते हैं, हर घर को अपना घर भी. अगले महीने DSN कोर्स होने वाला है, उसे करने को कहा है. आज बगीचे से पांच नारियल तोड़े, पानी बहुत मीठा था.

कल दिन भर डायरी नहीं खोली, परसों शाम को क्लब में मीटिंग थी, जून पुस्तकालय में बैठे इंतजार कर रहे थे, बीच में ही फोन करके उसे बुला लिया. रात को उसे नींद नहीं आ रही थी, तो वह ध्यान करने बैठ गयी, जो उन्हें अच्छा नहीं लगा. सुबह उठे तब भी सहज नहीं थे. आज तक जो बात उसने इशारों में कही थी, स्पष्ट कह दी कि अब उन्हें परिपक्व होना चाहिए, रूठना आदि कब तक चलेगा. उसे लगता है, हर उम्र का एक तकाजा होता है. इन्सान इस दुनिया से जाते-जाते तक वही हरकतें करता रहेगा तो बड़ा कब होगा. खैर..वह भी अपने तौर पर प्रयत्न तो करते होंगे, हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार चलता है पर अस्तित्त्व ने ही उसके द्वारा वे शब्द कहे हैं वरना आज तक वह क्यों नहीं कह पायी. सत्य के पथ पर चलने का कर्म पुराने जन्मों के कर्मों का फल ही होता है शायद, किसी ने सच कहा है भगवान स्वयं भी धरती पर उतर जाएँ तो भी उनको न पहचानने का निश्चय करे जो बैठा हो, उसके लिए वह भी कुछ नहीं कर सकते. हरेक को अपनी यात्रा स्वयं ही करनी है, बस दूसरे कुछ दूर तक साथ दे सकते हैं और कुछ नहीं कर सकते. कल दोपहर तक वह सहज हो गये थे. शाम को उन्होंने एक तमिल फिल्म देखी ‘थ्री’, जिसमें कोलेवारी वाला गाना है. 

Sunday, January 22, 2017

अन्ना हजारे का अनशन


बड़े भैया को राखी मिल गयी है, फुफेरे भाई ने फोन करके यह सूचना दी. बुआजी का नया घर बन गया है व उनकी स्वर्गवासिनी बेटी की बेटी के यहाँ पुत्र हुआ है. ये सारी खबरें देते हुए वे लोग बहुत खुश लग रहे थे. आज सुबह जून ने उठाया, उसने सोचा सचमुच उन्होंने उसके जागरण में बहुत योगदान दिया है. सारा धार्मिक साहित्य जो उसने पढ़ा, सारे उपदेश जो सुने, साधना के लिए प्रेरित करना(अपरोक्ष रूप से) भी उन्हीं का कार्य है. जीवन में कुछ भी अचानक नहीं होता. पुरानी घटनाओं को देखे तो यह बात समझ में आती है. अंत:प्राज्ञ कोर्स के द्वारा ध्यान से परिचय, एओएल के द्वारा सद्गुरू से परिचय, ये भी उन्ही के कारण हुआ. परमात्मा हरेक को विकसित होने के लिए पूरी  व्यवस्था कर देते हैं. स्वयं छिप जाते हैं, लुका-छिपी का खेल ही चलता रहता है जीवन भर जीवात्मा व परमात्मा के मध्य..कल रात स्वप्न में भी जागरण का अनुभव हुआ. यदि स्वप्न में भी होश बना रहे तो वे स्वप्न को अपनी इच्छा से बदल भी सकते हैं. एक बार नींद न आने की शिकायत की तो ऐसा स्वप्न दिखाया कि उठना ही पड़ा..इसी को कृष्ण सुषुप्ति में जाग्रति कहते हैं भगवद गीता में ! योगी जगते हुए सोता है और सोते हुए जगता है ! जून को अब भी कभी-कभी दर्द होता है, अब वह उसे बताते नहीं है. उस दिन उसने कहा यदि कोई प्रकृति से सुख लेगा तो दुःख से उसकी कीमत चुकानी होगी. वह भी तो यदि स्वादिष्ट पदार्थों के द्वारा प्रकृति से सुख चाहती है तो इसकी कीमत कभी न कभी रोग के रूप में चुकानी पड़ेगी. साक्षी भाव में रहकर स्वयं को आत्मा मानकर यदि वे जीते हैं तो सहज स्वाभाविक सुख की स्थिति बनी ही रहती है. उन्हें कुछ पाकर सुखी नहीं होना पड़ता. मन हर क्षण परमात्मा से जुड़ा है..बस उसे महसूस करना है. विचार आते और चले जाते हैं, पीछे चिदाकाश ज्यों का त्यों रहता है. वह सबका भला चाहता है, जो उनके लिए अच्छा है वे नहीं जानते पर परमात्मा जानता है. कल वे मृणाल ज्योति जायेंगे बच्चों को राखी बांधने, साथ में पूरी, सब्जी व मिठाई लेकर. अन्ना हज़ारे का अनशन आरम्भ हो गया है. जनता उनके समर्थन में आगे आयी है, इस बार लगता है सरकार को झुकना पड़ेगा.

आज जन्माष्टमी का अवकाश है. अन्ना हजारे के अनशन का सातवाँ दिन है. सरकार अब बात करना चाहती है. हजारों, लाखों की संख्या में लोग घरों से निकलकर समर्थन के लिए जुलूस, रैलियां निकाल रहे हैं. आज शाम को उनके घर पर सत्संग है. नन्हे के नर्सरी स्कूल की पत्रिका के लिए एक लेख माँगा है वहाँ की प्रिंसिपल ने, उसने उसके बचपन की यादों को ताजा करता हुआ एक लेख लिखा है, नन्हे को भी अच्छा लगेगा. एक कविता भी लिखी क्लब की एक सदस्या के लिए. छोटी बहन से बात हुई, उसने नया जॉब शुरू कर दिया है, दीदी नये रिश्तेदारों से मिल रही हैं. बड़ी ननद का फोन आया, बिटिया की शादी के लिए साड़ियाँ आदि खरीदने व जून के लिए शेरवानी खरीदने की बात कह रही थी. नूना के मायके में सबका पता भी मांग रही थी, उन्हें निमन्त्रण देना चाहती है.

आज सुबह क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ. योग वशिष्ठ में जो पढ़ा है, अष्टावक्र गीता में जो पढ़ा है, भगवद्गीता में जो कृष्ण कहते हैं, वह ज्ञान अनुभव में आया. गुण ही गुणों में बरत रहे हैं. उसके सिवा कोई कर्ता नहीं है. आत्मा अपने आप में पूर्ण शुद्ध एक अद्वैत सत्ता है. अब उसे लगता है इसी जन्म में आत्म ज्ञान की पूर्णता सिद्ध होगी. भीतर एक अपूर्व शांति का अनुभव हो रहा है, कहीं कोई द्वंद्व नहीं है. अभी जो लोग इस अनुभव को प्राप्त नहीं हुआ हैं, वे करुणा और प्रेम के ही पात्र हो सकते हैं, क्यों कि वे भी कुछ और नहीं उसी एक परमात्मा का चमत्कार ही है. Accept people as they are का यही अर्थ है कि वे भी उनका ही रूप हैं. जैसे वे अपनी किसी भूल को स्वीकार करते हैं वैसे ही उन्हें उनकी भी हर भूल को स्वीकार करना ही होगा. परमात्मा का अनुभव मानव देह में ही किया जा सकता है, परमात्मा को स्वयं भी अपना अनुभव करना हो तो मानव देह का आश्रय  लेना पड़ता है, क्योंकि शुद्ध चैतन्य में कोई दूसरा है ही नहीं, एक ही सत्ता है उसी को बुद्ध ने शून्य कहा है. जो जानता है कि वह है, जो जानता है कि वह आनन्द स्वरूप है, लेकिन व्यक्त नहीं कर सकता, उसके लिए आवश्यकता होगी देह, मन, बुद्धि की..की पता न भी होती हो, उसके बारे में कुछ भी कहे कैसे..जो कहेगा वह उससे कम ही होगा.. नन्हे के लिए लिखे लेख को आज चर्चामंच में शामिल किया गया है. दीदी को भी वह अच्छा लगा.

  



Wednesday, January 4, 2017

गुरू पूर्णिमा


कल शाम को मुम्बई में तीन बम विस्फोट हुए. वर्षों पहले लिखी कविता का स्मरण हो आया. आज उसे ब्लॉग पर पोस्ट किया है. कितनी दुखद मौत होती होगी, शोलों और दुर्गन्ध के मध्य. अचानक घटी यह मृत्यु झकझोर देती होगी. कैसा विचित्र है यह संसार, यहाँ एक तरफ प्रेम की ऊंचाइयाँ हैं और दूसरी तरफ नीचता की खाईयाँ हैं. एक तरफ सद्गुरू हैं जो साक्षात् परमात्मा का ही रूप हैं जो आतंकियों में भी कुछ भला देख लेते हैं, उसी एक चेतना को देख लेते हैं और दूसरी तरफ ऐसे बेहोश राक्षस हैं जिन्हें भले-बुरे का कोई ज्ञान नहीं. आज सुबह क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ. सद्गुरू उससे बात करते प्रतीत हुए और यह भी कहा, वह तो हर क्षण उसके साथ हैं. एक ही चेतना से यह सारा जगत बना है, ऊर्जा और पदार्थ दो दीखते हैं पर मूलतः हैं नहीं. जड़ के भीतर भी वही चेतन छिपा है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जून कल कोलकाता गये हैं. सम्भवतः आज मायापुरी गये होंगे. ईश्वर उनके साथ है. आज पिताजी ने दाल बनाई है, उनकी बहुत दिनों की इच्छा पूरी हो गयी.

आज गुरूपूर्णिमा है. सुबह से ही मन किसी और लोक में विचर रहा है. सद्गुरू का संदेश कई बार सूक्ष्म रूप से सुन चुकी है. शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर भी जाना है. एक सखी ले जाएगी. जून कल आयेंगे. कल शाम वह मन्दिर गये थे. सद्गुरू का सबसे बड़ा चमत्कार तो यही है. वह पहले उसके साथ मन्दिर जाकर भी बाहर ही खड़े रहते थे. अब सुबह-शाम अगरबत्ती जलाते हैं. संतों की वाणी को सुनते हैं. सद्गुरू की कृपा का कोई अंत नहीं. उसके खुद के जीवन में इतना परिवर्तन आया है कि...इसको कहा नहीं जा सकता. आज सुबह उन्हें टीवी पर देखा. वह कनाडा में हैं आज. कभी ऐसा वक्त अवश्य आएगा जब वह भी उनके निकट रह पायेगी आश्रम में, जब वे बैंगलोर  में रहेंगे !

सद्गुरू ने गुरूपूर्णिमा का तोहफा भेजा है. आज सुबह ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ. प्रकृति-पुरुष, देह-देही, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ सभी का संबंध स्पष्ट हुआ. देवी तत्व समझ में आया. शिव तत्व व कृष्ण तत्व भी और लीला का क्या अर्थ है यह भी. सारे शास्त्र जैसे भीतर स्वयं खुल रहे थे और साथ ही अपूर्व आनन्द की धारा बरस रही थी. सद्गुरू ने जो उस दिन कृपा की थी यह उसी का फल है. वह जानते हैं, वह सब जानते हैं. वह उस दिन भी जानते थे जब पहली बार मिले थे. उसके भीतर जब पहली बार ज्ञान की किरण फूटी थी. आज नये तरह का गीत लिखा है, अभी तक उस ऊंचाई पर जाने का प्रयास कर रही थी, सो उसी के गीत लिख रही थी. अब वहाँ पहुँच कर नीचे का सब दिखाई दे रहा है. संसार दिखाई दे रहा है, जलता हुआ अपनी आग में !


कल की जो भावदशा थी, वह आज ध्यान में नहीं घटी. सद्गुरू ठीक ही कहते हैं, 'सदा' निकाल दें तो आनंद ही आनंद है. आज कल वाली कविता पोस्ट की है, कुछ को आनन्द दे जाएगी !    

Wednesday, October 5, 2016

पित्ताशय में पथरी


आज शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसे दो कविताएँ पढ़नी हैं. नेट नहीं चल रहा है आज, कुछ देर ‘गीतांजलि’ के भावानुवाद के कुछ भाग को टाइप किया. नेट न होने से कुछ देर बुरा लगा, फिर खुद को समझाया, अपना लक्ष्य तो एक ही है, और वह है परमात्मा की प्राप्ति, उस एक लक्ष्य में जो सहायक है उसे करना व जो बाधक है उसे छोड़ते जाना ही बुद्धिमत्ता है, उसे लगता है अहंकार की पुष्टि के सिवा अभी उसके लिए नेट का क्या उपयोग है. कविता पोस्ट करना फिर उस पर आये कमेंट्स को पढ़ने की आकांक्षा, यह अहंकार की पुष्टि ही हुई. जो भी होता है उसमें कुछ न कुछ अच्छाई छिपी होती है. परमात्मा की ओर उन्मुख होने में जो भी सहायक हो वही वन्दनीय है, अस्तित्त्व चाहता है कि उसके मन, बुद्धि पावन हों, वह उसके द्वारा प्रकट हो. जीवन का एक-एक क्षण कितना अनमोल है और हर क्षण वह उनके साथ ही है, बस नजर उठाने भर की देर है !

आज सुबह एक सुंदर अनुभव हुआ, अब स्वरूप में मन टिकने लगा है. पढ़ा था कितनी बार जैसे एक छोटा सा अवरोध विस्तीर्ण गगन को ढक लेता है, वैसे ही छोटी सी वृत्ति आत्मा को ढक लेती है, आत्मा जस की तस रहती है, उसका कुछ आता-जाता नहीं है, उसे घटते हुए देखा, कितना सुकून है इस अहसास में. उस क्षण भीतर मौन पसर जाता है, कुछ भी जानना, पाना, चाहना शेष नहीं रहता, जीवन एक खेल बन जाता है. एक स्वप्न कहें या खेल..आज शाम को पब्लिक लाइब्रेरी जाना है, जहाँ इस वर्ष एक बार भी नहीं गयी, आज संयोग बना है, एक वरिष्ठ सदस्य की विदाई है. कल मृणाल ज्योति भी जाना है, कम्पनी में पेट्रोलियम सेक्रेटरी आ रहे हैं. उनकी पत्नी कल शाम को वहाँ जाएँगी, स्कूल देखना चाहती हैं. आज नेट चला पर समय सीमा निर्धारित कर दी है. कल वर्ष का अंतिम दिन है, जाते-जाते इस वर्ष वर्ष की विदाई के रूप में नये वर्ष की शुभकामना की कविता लिखेगी. एक बार फिर जीवन को नये अंदाज में जीने का संदेश देने नया वर्ष आया है. नये साल में बहुत कुछ नया करना होगा. जीवन को एक नये अंदाज में जीना होगा, क्योंकि अब मार्ग मिल गया है, सो किस तरह समय का अच्छे से अच्छा उपयोग हो सके, अपनी ऊर्जा का और अपनी योग्यता का इसका ही प्रयास करना है ! अभी-अभी पता चला, नैनी के गॉलब्लैडर में पथरी है, इसलिए उसे इतना दर्द होता है, आपरेशन करवाना पड़ सकता है. वह पिछले कई दिनों से शिकायत कर रही थी. नया वर्ष उसके लिए भी स्वास्थ्य लायेगा.   



Monday, September 19, 2016

घर की सफाई


आज सुबह वह उठी तो सीधे आँख बंद करके बैठ गयी, अनोखा था वह अनुभव ! भीतर एक शांति भर गया है, फोन की घंटी बज गयी और बीच में ही छोड़ना पड़ा. भीतर कितनी अटूट संपदा है. परम पिता परमेश्वर स्वयं ही विराजमान है, एक दिव्य चेतना, एक प्रकाश और एक मुखर मौन...शब्द कहाँ कह पाएंगे उस अनुभव को..इसलिए कहते हैं कि जो जानता है वह कहता नहीं, कह सकता नहीं..उसकी बुद्धि तब बचती ही नहीं, मन खो जाता है. भीतर कोई है जो हर क्षण देख रहा है. उस देखने वाले को सारे कृत्यों को देखते हुए वह देख रही है. वह सदा जगा है और उसकी जागृति उसे भी जगा रही है. क्योंकि उसे देखने के लिए उसे भी सजग रहना पड़ रहा है. एक पल को ध्यान हटा तो भी भीतर यह बोध रहता है कि वह देख रहा है ! जागरण का यह अनुभव अनोखा है. कल देवी पर कुछ पंक्तियाँ लिखीं. मौसम आज भी बदली भरा है. एक सखी आज घर जा रही है, एक पहले ही जा चुकी है. इस बार पूजा पर वे दोनों नहीं रहेंगी. वे एक दिन तिनसुकिया जायेंगे, पत्रिकाएँ देनी हैं लाइब्रेरी में. पिछले कुछ दिनों से वे घर की सफाई कर रहे हैं. कितनी पत्रिकाएँ तथा किताबें जो वर्षों से इकट्ठी हो गयी हैं, वे लाइब्रेरी में भिजवा रहे हैं. वह खाली होना चाहती है, सारे पेपर्स भी धीरे-धीरे करके निकालने हैं. सारी डायरी भी धीरे-धीरे हटानी हैं, एक दिन केवल आत्मा ही रह जाने वाली है, नितांत अकेली, उस अकेलेपन का अनुभव इसी जीवन में कर लेना कितना अनूठा होगा. वे अपने मन में भी अतीत का बोझ तथा भविष्य की चिंताएं ढोये रहते हैं और वर्तमान को बोझिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, उन्हें जीवन का मोह इतना सताता है कि वर्षों पुराना भी कुछ त्यागते उन्हें पीड़ा होती है, जिसका उपयोग भी उन्होंने न किया ही, न करना हो..जून का फोन आया अभी-अभी, वह भावांजलि को प्रिंट करके ला रहे हैं. अभी तक किसी ने उसे पढ़ा नहीं है, लेकिन एक दिन लोग उसे पढ़ेंगे. मानव के भीतर यह कामना कितनी बलवती होती है कि वे जो भी करें लोग उसे सराहें, यह इतनी भीतरी है कि...

आज षष्ठी है. उन वृद्धा आंटी ने अपने पुत्र व पुत्रवधू के लिए भोजन बनवाया, खीर बनवाई, लेकिन उनकी फ्लाईट छूट जाने के कारण आज वे वापस नहीं आ पाए हैं. दोपहर को वह उनके घर गयी थी. मौसम में थोडा बदलाव आ गया है. शाम को जल्दी अँधेरा हो जाता है और सुबह जल्दी दिन नहीं निकलता. कल शाम दीदी से बात की, उन्होंने कहा वे उसकी सभी कविताएँ पढ़ती हैं, उन्हें भी अपने लिखे पर उसकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है. उस क्षण उसका हृदय भीग गया था.

आज सुबह भीतर स्पष्ट आवाज सुनाई दी, आजतक जो भी कहीं से पढ़ा या सुना हुआ बिना कृतज्ञता जताए लिख दिया, वह धोखा है. आज से पूर्व उसे इस बात का जरा भी अहसास नहीं था, पर आज कितना स्पष्ट है कि वह गलत था. इसी तरह जो व्यक्ति गलती कर रहा होता है, उसे पता नहीं होता..वरना वह ऐसा कभी करे ही न. उन्हें किसी को दोषी देखने का अधिकार नहीं है, उनके हाथ भी तो खून से रंगे हुए हैं. कितने जन्मों में कितने अपराध उनके हाथों हुए हैं. वे धीरे-धीरे परमात्मा के मार्ग पर आये हैं किन्हीं  पुण्यकर्मों के कारण सद्गुरू मिले हैं और अब उनका जीवन सही अर्थों में जीवन कहलाने के योग्य हुआ है. साक्षी की तरह कोई सदा साथ रहता है. हरेक के साथ रहता है, भय का कोई कारण ही नहीं, वे सुरक्षित हाथों में हैं.    


Friday, July 29, 2016

सहज समाधि


शाम के सात बजे हैं, आजकल बादल जब देखो तब बरसने लगते हैं. इस समय भी सुबह से शायद दसवीं बार मूसलाधार वर्षा हो रही है. जून क्लब गये हैं, वहाँ stress managment पर कोई योग का कार्यक्रम है. उसकी बाईं आँख के निचले कोने पर हल्का सा दर्द हो रहा है, शायद कोई छोटा सा दाना निकला है. माँ बहुत कहने पर अब लेट गयी हैं, पहले दिन भर उन्हें लेटना पसंद था, अब घंटों बैठी रहती हैं. उनका व्यक्त्तित्व बिलकुल बदल गया है, लेकिन कई बातें पहले की तरह हैं पर हैं वे सारी की सारी नकारात्मक. अभी कुछ देर पूर्व सुना मुरारी बापू कह रहे थे, अहंकार, स्वार्थ और कपट गुरु कृपा से दूर रखते हैं. नूना कभी-कभी तेज स्वर में बोलने लगती है, यह अहंकार का ही रूप है. स्वार्थ थोड़ा भी नहीं है, ऐसा तो नहीं कह सकते, निज की मुक्ति की कामना तो है ही, कपट भी अक्सर झलक जाता है, अब चाहे भले के लिए ही बातों को वे जैसी हैं वैसी प्रकट न करके उन्हें मधुर करके सहज करके प्रस्तुत करती है, लेकिन उस छिपाव में किसी का अहित करने का भाव नहीं है और सबसे बड़ी बात कृपा का अनुभव हर क्षण होता है.

पिताजी लौट आए हैं. आज सुबह आकर उन्होंने स्टोर के खाली डिब्बों को भर दिया है. वे लाये हैं- आंवले का मुरब्बा, पेठे की केसरिया मिठाई, मावे का लड्डू, मूँगफली, चने, मिस्सा आटा, किशमिश, काजू, बादाम, हरे चने, ककड़ी, खजूर, बिस्किट, राजधानी ट्रेन में मिला सामान और भी एक वस्तु- अंजीर ! वह आठ दिनों के लिए बेटी के घर गये और उनका कितना काम करके आये हैं. सामने और पीछे के स्थान की सफाई, दोनों कूलर साफ करके इस्तेमाल के योग्य करवाए. ट्यूब लाइट साफ करवाई, घड़ा लाकर दिया और भी न जाने क्या-क्या. घर में एक जिम्मेदार बुजुर्ग के रहने से घर ठीकठाक चलता है, जहाँ पति-पत्नी दोनों काम पर जाने वाले हों वहाँ घर के कुछ काम छूट ही जाते हैं. कम्प्यूटर पर बैठकर कुछ लिखा नहीं आज. नेट पर नन्हे का साईट देखा, फेसबुक पर बड़े भांजे ने उसके जवाब दिया है उसके प्रश्न का. सारी सुबह पिताजी के लाये सामानों को व्यवस्थित करने में निकल गयी. दोपहर माली से बगीचे में काम करवाने में. अभी कुछ ही देर में जून आने वाले होंगे शाम का कार्यक्रम आरम्भ हो जायेगा, इसी तरह एक और दिन बीत जायेगा, इस जीवन का एक और दिन कम हो जायेगा. हजारों लोग इस समय यही बात सोच रहे होंगे, हजारों हँस रहे होंगे और न जाने कितने आत्मबोध को पा रहे होंगे..एक तरह से देखे तो सभी कुछ व्यर्थ है और दूसरी तरह से देखे तो सभी कुछ सार्थक है. यहाँ होना ही काफी नहीं है क्या ? हर कोई स्वयं को कुछ साबित करना चाहता है, हर कोई अपना विज्ञापन की रहा है, लेकिन अंततः तो वह तड़प आत्मा ही की है या कहें परमात्मा की..चेतना की..जो न जाने कितने-कितने रूपों में प्रकट होना चाह रही है, न जाने कितने चेहरे लगाकर एक ही सत्ता.
.सद्गुरु कहते हैं, साधक उनका काम करें और वे तो उनका काम कर ही रहे हैं. आज उसे एक सुनहरा मौका मिला है सद्गुरु का काम करने का. सुबह ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की एडवांस कोर्स टीचर से मिलने गयी, जो इटानगर से आयी हैं. दो दिन पहले ही गुरूजी ने उन्हें कहा कि यहाँ एडवांस कोर्स कराना है. उनकी कृपा यहाँ के लोगों पर कुछ विशेष ही बरस रही है. उन्होंने कहा कि वह चाहती हैं या सही होगा कि सद्गुरु चाहते हैं कि उनके ‘सत्संग कक्ष’ में सहज समाधि कोर्स रखा जाये. उसने तत्क्षण ‘हाँ’ कह दी और अब कुछ लोग चाहियें जो कोर्स करें, उसने कई लोगों को फोन किये लगता है कुछ तो अवश्य ही राजी हो जायेंगे ! सद्गुरु की कृपा से अवश्य ही ‘सहज समाधि’ उनके घर में सम्पन्न होगा. कुछ वर्ष पूर्व वह स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी पर आज वह सम्भव है तो इसके पीछे परमात्मा की शक्ति ही काम कर रही है. उसकी कृपा कहें, प्रेम कहें या आनंद कहें, वह सब एक के ही नाम हैं. उनका सद्गुरु दुनिया में कहीं भी हो वह हर क्षण उनके साथ रहता है, रहा करता है, वह अनोखा है, अन्तर्यामी है और उस अनन्त गुणों को धारण करने वाले की नजर उन पर है, उसका हाथ उनके सिर पर है, उसकी दृष्टि उन पर पड़ी है, वह जीता-जगता परमेश्वर उन्हें अपनी झलक दिखाने खुद चलकर आया, प्यासा कुएं के पास जाता है पर यहाँ तो खुद कुआँ ही सामने खड़ा है, गंगा उनके द्वार आई है, सद्गुरु रूपी हीरा उन्हें सहज ही मिल गया है.

Friday, December 4, 2015

अंग्रेजी गाने


नन्हा बहुत तेज आवाज में अंग्रेजी गाने बजाता है जो जून और नूना को समझ में नहीं आते, उन्होंने कभी समझने का प्रयत्न भी नहीं किया. शोर बहुत होता है इन गानों में और इन्हें धीमे सुनने का रिवाज नहीं है. उसका मित्र जब आ जायेगा तब दोनों मिलकर और शोर करेंगे, आज की पीढ़ी इसी शोर में जीना पसंद करती है ! उसने अभी कुछ देर पहले कुछ पत्रिकाएँ उलटीं-पलटीं, अब उनमें रूचि नहीं रह गयी है, बाहर जो कुछ भी हो रहा है, घट रहा है उसका भीतर से क्या संबंध है ? मन के विकारों से क्या संबंध है ? जानकारी बढ़ाए चले जाने से भीतर परिवर्तन तो होता नहीं, साधक के लिए उतना ही जानना जरूरी है जो उसकी साधना में सहायक हो. वे इस दुनिया में पहली बार तो आए नहीं हैं, न ही अंतिम बार, न जाने कितनी बार पहले इन दृश्यों को आँखें देख चुकी हैं, वे न जाने कितनी बार हँस-रो चुके हैं, अब इन सबसे जैसे अरुचि हो गयी है, वीतरागता...अब तो आत्मा के भीतर गहरे और गहरे प्रवेश करने की एक मात्र कामना प्रबल हो गयी है, कैसे भीतर शांति हो, मन निर्मल हो और वाणी पवित्र हो ताकि कोई आवरण आत्मा को ढके नहीं, वह मुखर हो जाये, सुबह से शाम तक अंतर में यही भाव प्रमुख रहता है.

अहंकार के कारण ही वे हर बार प्रभु से दूर हो जाते हैं, तभी दुःख उनका पीछा नहीं छोड़ता. जो दुःख दूसरों को दुखी देखकर आया हो सात्विक है तथा जो अहंकार से आया है, अज्ञान से आया है, तामसिक है. आज धूप तेज है, कल गर्मी थी पर बादल भी थे. इस वक्त सुबह के पौने नौ बजे हैं, समय से उठी पर आज आसन नहीं कर पायी. कल शाम सासु माँ का जन्मदिन मनाया, रात को देर से सोये, अभी भी उसका असर आँखों पर लग रहा है. नन्हा आज ट्रेनिंग पर गया है. उसका चित्त इस वक्त जरा भी स्थिर नहीं है, तभी डायरी में इधर-उधर की बातें लिखी जा रही हैं. आसन करने से तन के साथ मन भी शांत व स्थिर होता है. सुबह नाश्ते में पोहा बनाया. कल पिताजी का फोन आया, बड़ी बुआ जी का भी जन्मदिन था कल, मंझली भाभी का भी, वे भूल ही गये थे.

अभी कुछ देर पूर्व एक अनोखा अनुभव हुआ, उसने विचार किया कि परमात्मा के नाम के सिवा सभी कुछ अपावन है, तत्क्षण सारा दृश्य बदल गया, सुंदर हो गया, दरवाजा, फर्श और एक भाप जैसा या रंगहीन धुएं जैसा या कुछ रेडिएशन जैसा निकला, लगा जैसे अस्तित्त्व ने उस परम शक्ति ने उससे सम्पर्क किया. उसके मन के विचार का जवाब दिया. विचार तो आत्मा की गहराई से उपजा था, उनके भीतर एक अथाह स्रोत है जो चमत्कार कर सकता है. अभाव से निकल कर वह उन्हें स्वभाव में लाता है. प्रभाव से मुक्त कर भी वह स्वभाव में लाता है. सहज ही उनके कर्म सेवा बन जाते हैं, लेकिन करने का भाव नहीं है. अकर्ता भाव भी आता है. परमात्मा उनका सुहृदय है, सखा है, आत्मीय है, मीत है और ऐसा सखा जो कभी उन्हें गलत राह पर जाने नहीं देता, जो सदा उनकी उन्नति ही चाहता है, जो उन्हें प्रेम करता है. वे उससे दूर चले जाते हैं तो जगत में फंस जाते हैं, घबराते हैं, दुखी होते हैं तथा ईर्ष्या व द्वेष का शिकार होते हैं. उनका मन जब कृष्ण से विमुख हो जाता है तो ही वे सजग नहीं रह पाते. जब वे सजग नहीं रह पाते तो अपने स्रोत से दूर हो जाते हैं, अपनी शक्तियों से दूर हो जाते हैं. आत्मा के पद से हट जाते हैं ! शरीर और आत्मा के भेद को भूल जाते हैं !

‘रहो भीतर, जीओ बाहर’ यह प्रेक्षा ध्यान का सूत्र है. जब तक भीतर कोई केंद्र नहीं है तो वे कैसे वहाँ टिक सकते हैं. आत्मा ही वह केंद्र है, इसे भूलकर वे मन को ही सत्य मानकर उसके सुख-दुःख में लिप्त होते रहते हैं. इस संसार में जो कुछ भी उन्हें मिला है, वह व्यवस्थित है, उनके ही कर्मों के अनुसार मिल रहा है. वे यदि इसमें राग-द्वेष करेंगे तो नये कर्म भी बांधेंगे. यदि समता में रहेंगे तो शान्ति से इन कर्मों को करेंगे जो उनके प्रारब्ध में हैं तथा आत्मा की शक्ति का सदा अनुभव करेंगे. ‘भीतर’ तब स्वस्थ रहता है, शांत और स्थिर रहता है, ऐसा ‘भीतर’ सारे दुखों से मुक्त करके आश्रय देता है. मन साधन रूप में मिला है पर वे उसे साध्य मान लेते हैं, उसको संतुष्ट करना ही वे अपना लक्ष्य बना लेते हैं, आत्मा रूपी भीतर ही साध्य है !   

Wednesday, August 19, 2015

नोकिया का फोन


मई महीने का आरम्भ कितनी तेज धूप और गर्मी से हुआ है. दोपहर के एक बजने वाले हैं, आज जून ने उसे नोकिया का सेल फोन लाकर दिया, जो दिल्ली से एक मित्र द्वारा मंगवाया है. उसका गला अब काफी ठीक है.  पिछले दिनों जून ने उसका उसका बहुत ध्यान रखा, वह उसका हितैषी है. उनके प्रेम में कामना है वह स्वयं को जानते नहीं और अभी जो वे जानते हैं उसी को सत्य मानते हैं. कामना वैराग्य को दृढ़ होने नहीं देती. उसे गर्मी ने सताया तो एसी की आवश्यकता महसूस हुई. इसी तरह हर क्षण इस शरीर, मन को संतुष्ट करने के लिए कितने ही साधनों की आवश्यकता होती है. अपनी क्षमता के अनुसार हर कोई उसकी पूर्ति भी करता है. बस इसी में सारा जीवन चला जाता है. परमात्मा की ओर बढ़ते कदम वहीं थम जाते हैं और जगत की चकाचौंध में खो जाते हैं. सुख की तलाश में वे सुख के स्रोत को ही भूल जाते हैं. उसका जीवन एक शांत धारा की तरह अनवरत बह रहा है, इसकी मंजिल प्रभु है, इसका जल आत्मज्ञान है. उसके भीतर की शांति अखंड है, सभी कामनाओं से परे !  

उसका मोबाइल फोन काम करने लगा है, अभी उसे बहुत कुछ सीखना है, sms करना, game खेलना उसमें प्रमुख है. जून आज दिल्ली चले गये, उन्हें मलेशिया जाना है अगले हफ्ते. नन्हे के आने तक उसे अकेले रहना है. उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दो व्यक्ति. यह सही है कि माँ-पिता के बिना तो भौतिक अस्त्तित्व इस देह में होना कठिन है, माँ जाने कहाँ होंगी, जहाँ भी होंगी, अवश्य ही प्रसन्न होंगी. पिताजी से परसों ही बात हुई, उन्हें ख़ुशी है कि वे शीघ्र ही उनसे मिलने जायेंगे. जून को उसने जानबूझ कर कभी भी दुखी करना नहीं चाहा, पर अनजाने में वह उसके कारण बहुत दुखी हुए हैं. वह दिल से पश्चाताप करती है और उनके प्रेम का आदर भी. जून के मन में उसके लिए बहुत प्रेम है, वह शरीर, मन, बुद्धि से परे जा नहीं पाये हैं सो नूना की बातें उनकी समझ में नहीं आतीं, पर वह उनके प्रति कृतज्ञता अनुभव करती है. उनके कारण ही उसकी साधना तीव्रतर हुई है. जो भी अनुभव उसे हुए हैं, उसमें उनका बहुत योगदान है. उसने प्रार्थना की कि उसके अंतर की शुभकामना उस तक पहुंचे. नन्हे को भी उसने मूर्खतावश दंडित किया होगा, पर उसके पीछे ममता रही होगी. उसे भी उसके जीवन में आकर मातृत्व प्रदान करने के लिए बहुत-बहुत प्रेम.. और कोटि-कोटि प्रणाम उसके सद्गुरु को जिन्होंने उसे दूसरा जन्म दिलवाया !


आज से नन्हे की परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं, आज गणित की परीक्षा है जो उसे कठिन लगने लगा है. जून ने वीसा के लिए अप्लाई कर दिया है. योग वसिष्ठ में सत्य ही कहा गया है कि इस जगत में कुछ भी बिना पुरुषार्थ के नहीं मिलता और ऐसा कुछ नहीं जो पुरुषार्थ से न मिले. प्रमोद महाजन यह मानते थे कि जगत में कुछ भी पहले से तय नहीं किया गया है अर्थात वे स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं. उनकी मृत्यु आज बाहरवें दिन हो गयी, एक भाई के हाथों अपने भाई की नृशंस हत्या का यह मामला कितने सवाल उठाता है. ऊंचाई पर जाकर भी अपने परिवार को उपेक्षित नहीं करना चाहिए, पहले अपने इर्द-गिर्द के लोगों के चेहरे पर मुस्कान आए फिर दुनिया और समाज की चिंता कोई करे. लेकिन जो भी आगे बढ़ता है वह अपने पीछे कितनों को रुलाता ही है. हर वस्तु की कीमत चुकानी पड़ती है. यदि व्यक्ति हर समय सजग रहे तो वह सभी को साथ लेकर चल सकता है. आज क्लब में दो टॉक सुनने को मिलीं. प्लास्टिक का बढ़ता हुआ प्रकोप तथा अपनी सेहत के प्रति लापरवाही. एक डांस  का प्रोग्राम बेहद आकर्षक था तथा गीत भी. कल की तरह आज भी सोते समय कमरे के दरवाजों को अंदर से बंद करना उसके मन के भय को दर्शाता है. जहाँ भय है वहाँ प्रेम हो ही नहीं सकता और जहाँ प्रेम नहीं है वहाँ परमात्मा कैसे आ सकते हैं ! परमात्मा तो प्रेम से ही प्रकट होते हैं, तभी उसका मन सूना-सूना सा रहता है, आँखें मुस्कुराती नहीं, होंठ गाते नहीं, कदम थिरकते नहीं ! जैसे कुछ खो गया है, आज पता चला कि जो खो गया है वह और कहीं नहीं उसके ही मन में छुपा है, उस डर के पीछे, उस डर को निकाल दे तो वह उजागर हो जायेगा ! 

Wednesday, July 29, 2015

सत्यम..शिवम..सुन्दरम..


सद्गुरू से जुड़े रहना साधना में आगे बढ़ने के लिए प्रथम और अंतिम शर्त है. सद्गुरु दूर नहीं हैं, वह हृदय के बिल्कुल निकट हैं. हमारे स्वयं से भी निकट. उनसे मिलकर भी यदि जीवन में कुछ परिवर्तन नहीं हुआ तो व्यर्थ है वह जीवन. आज सुबह नींद देर से खुली, स्वप्न देखती रही कि आम खरीदे हैं पर उसमें रस नहीं है, एक छेद के जरिये सारा रस उसमें से पहले ही निचोड़ लिया गया है. अनार खरीदा है पर उसमें दाने नहीं हैं, ऊपर से छिलका सही-सलामत है. ऐसे ही तो वे ऐसे कार्य करते हैं जो ऊपर से भले दीखते हैं पर उनमें कोई सार नहीं होता. गुरू के साथ जुड़े रहो तो वह स्वप्नों में भटकने नहीं देता. उन्होंने कहा था कि स्वप्न से जैसे ही जगो तो उठकर बैठ जाओ, स्वस्थ हो जाओ, अपने आप में स्थित. आत्मा में स्थित. वहीं बोध मिलेगा, वहीं मुक्ति है, वही वास्तविकता है !

जैसा-जैसा शास्त्रों में लिखा है उसे वैसा-वैसा अनुभूत होता है. सत्य एक ही है वह जिसके भीतर प्रकट होगा, समान रूप से होगा. उसका मन आजकल कितना जीवंत रहता है. सदा तृप्ति और उछाह से भरा, पता नहीं भीतर क्या रिसता है और कौन उसका पान करता है, लेकिन एक निर्द्वंद्वता, निडरता तथा स्वतन्त्रता का अनुभव होता है, जैसे अब इस जहाँ में कुछ भी पाना नहीं है. आत्मा को क्या पाना है जो स्वयं ही सबका स्रोत है, जो नित्य है, अनंत है. आज दोपहर एक अंग्रेजी फिल्म देखी, जिसमें रोबोट मानवों पर हुकूमत करने लगते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि मानव अपना विनाश कर बैठेंगे, मानव ने जिन्हें बनाया वही मशीनें उस पर अधिकार करने लगी पर अंत में जीत मानव की हुई. मानव के भीतर दैवीय शक्ति है, प्रभु ने उसे बनाया है, वह भी अपने जैसा, ईश्वर का मित्र है वह.. यदि उसकी आज्ञा में रहे, पर अंततः जीत तो परमात्मा की ही होती है.

आज सुबह वह तीन घरों में गयी, एक के यहाँ किताब भेजी. दो ने मना कर दिया, एक ने लेकर कहा पैसे बाद में भिजवा देगी. एक और प्रति किसी परिचिता ने खरीदी, सेवा का यह यह काम करते हुए उसे बहुत ख़ुशी हो रही है, लोगों से बात करने का एक नया अनुभव. वह जो पहले लोगों से बात नहीं करती थी, मतलब की बात ही करती थी. अब अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर बात कर रही है. लोग तो सारे उसके अपने ही हैं. वे जो भी जवाब दें, उसे एक नया पाठ सीखने को मिल रहा है. इसी बहाने लोगों से उसकी जान-पहचान भी बढ़ रही है. मिलते-जुलते रहने से वक्त पर लोग काम आते हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के लिए काम करते समय मन में ऐसा भाव भी है कि कुछ भी नहीं कर रही. जो कुछ भी हो रहा है वह अपने आप ही हो रहा है, किसी बड़े कार्य का छोटा सा हिस्सा ! एक परिचिता के पास गयी तो उसने अपना पूरा जीवन दर्शन सुना दिया. वे सभी ही तो ज्ञानी हैं, सदा एक-दूसरे को ज्ञान देते हुए. जून परसों आयेंगे, उनसे फोन पर बात हुई. वे ये जानते हुए भी कि वस्तुओं की वस्तविकता क्या है, उन्हें महत्वपूर्ण बनाते रहते हैं, क्योंकि वस्तुएं उनके जीवन में बाह्य ही सही रंग भरती हैं. जून उसके लिए और वस्तुएं ला रहे हैं. वे सभी सौन्दर्य के पुजारी हैं. उनका इष्ट देवता उनका प्रिय कान्हा भी तो सौन्दर्य का देवता है. सत्यं, शिवं, सुन्दरं की परिकल्पना कितनी अद्वितीय है, जो सत्य है, वही शिव है, जो शिव है  वही सुंदर है..पर जो सुंदर है वह शिव भी होगा इसमें संदेह हो सकता है...क्योंकि हर चमकती हुई चीज सोना नहीं होती.. .भारतीय संस्कृति पर निर्मल वर्मा का एक विस्तृत निबन्ध पढ़ा पर पूरा डूब कर नहीं, क्योंकि साथ-साथ माली के काम का निरिक्षण भी कर रही थी.  सुबह उठने से पूर्व फिर स्वप्न देखे, जो उस समय वास्तविक ही लग रहे थे. एक छोटी लड़की जो स्वप्न में मृत हो जाती है फिर जीवित और फिर एक जलती हुई देह का स्वप्न देखती है ..कितना अजीब था यह स्वप्न पर तब बिलकुल स्वाभाविक लग रहा था, उनका जीवन भी तो एक स्वप्न की तरह ही है, पल में बीत जाने वाला !


जून आज आ रहे हैं, फ्लाइट एक घंटा लेट है. अभी एक सखी से बात की, उसकी सासूजी परसों बाथरूम में गिर पड़ीं. बुढ़ापे की कमजोरी तथा भारी शरीर, कहीं जाने की जल्दी के कारण..तथा स्नानघर में में लोहे की बाल्टी थी, उन्हें थोड़ी चोट भी लग गयी है. उसने सोचा शाम को वे उन्हें देखने जायेंगे, यदि आज नहीं तो कल अवश्य ही. 

Monday, May 18, 2015

लॉन में पिकनिक


नववर्ष की सुबह भी सुहानी थी, दोपहर भी पर शाम होते-होते बादल छा गये और वर्षा शुरू हो गयी. उनकी पिकनिक समाप्त हो गयी थी, सब अपने-अपने घर चले गये थे. ऐसे ही एक दिन इस जगत से उन सभी को चले जाना है. दीदी का फोन आया, कल यानि वर्ष के अंतिम दिन चाचाजी का उठाला भी इस संसार से हो गया. नये वर्ष की शुभकामना का फोन और कहीं से नहीं आया. ससुराल से अवश्य सुबह जब वे सो रहे थे पिताजी ने फोन किया था. नन्हे का स्कूल कल खुल रहा है, आज उसने पहली बार शेव की, जून ने उसकी सहायता की. आजकल नूना ने भी उसे गणित पढ़ाने में सहायता करना शुरू किया है. अच्छा लगता है अपना विषय पढ़ना. सुबह वे लगभग साढ़े पांच बजे उठे, ‘क्रिया’ आदि करके सात बजे सुबह की चाय ली. ग्यारह बजे से पिकनिक की तैयारी शुरू की जो उनके लॉन में ही होने वाली थी. शाम होने से पहले साढ़े तीन बजे सभी वापस गये और उन्होंने थोड़ा आराम किया. सुबह गुरूजी ने कहा था कि राम विश्राम में ही है, काम में नहीं. सो नींद की जगह उसने शवासन किया. देह में उठने वाली छोटी से छोटी संवेदना को भी महसूस करना एक सुखद अनुभव है. प्राण को विचरते हुए भी देखा जा सकता है और सुबह-सुबह स्टील के गिलास में पानी पीते समय उसके किनारों को कई परतों में बंटे देखा और उस पर प्रकाश के सातों रंगों की चमक भी एक अच्छा अनुभव है. त्राटक में फर्श की अथवा दीवार की सतह का आकर्षक रूप धरना, प्रकाश के एक बिंदु का विस्तृत होते जाना और कानों में एक मधुर ध्वनि का निरंतर गुंजन...ये सरे अनुभव उसे इस जगत में होते हुए भी इस जगत से परे रखते हैं. स्नानघर में वस्त्रों से भरे टब का हिलना तथा आँखें बंद करके भी टीवी स्क्रीन का दिखाई देना भी सुखद अनुभव हैं. यह जगत उन्हें जैसा दिखाई देता है वैसा ही नहीं भी हो सकता. यह उनकी नजर पर ही निर्भर करता है, उनका मन ही इस जगत की उत्पत्ति का कारण है !
आज उसने नैनी के बेटे पर ट्रांजिस्टर तेज बजाने के लिए क्रोध किया, क्रोध करते समय या पहले इसका भान ही नहीं था, बाद में इसकी व्यर्थता का अनुभव हुआ, उसे यही बात धीरे से भी कही जा सकती थी. स्वीपर समय पर नहीं आया तो सेनिटेशन दफ्तर में फोन किया, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने के बजाय आधा घंटा बाद पुनः फोन कर दिया, अर्थात उस पूरे समय मन में वही बात घूम रही थी. साधक के लिए जरूरी है कि मन को खाली रखे. धर्म को धारण करना होगा, इस जगत के सागर को पार करने के लिए तैरना सीखना पड़ेगा. स्वयं में परिवर्तन लाना है और स्वयं में आया सुधार ही आस-पास के वातावरण को शुद्ध करेगा. सद्गुरु कहते हैं जीवन को उत्सव बनाना है. समर्पण जब जीवन की रीत बनती है तभी ऐसा सम्भव है.
अज सुबह ‘क्रिया’ के बाद अनोखा अनुभव हुआ, सम्भवतः योग वशिष्ठ में पढ़े हुए वचनों का असर हो पर ऐसा लगा जैसे समस्त ब्रह्मांड उसके सम्मुख है, घूम रहा है और वह उससे पृथक है परमपद को प्राप्त ! मन तब से फूल सा खिला है. वास्तविक जीवन भी यही है जब कोई भीतर के आनंद को पाले, बाहरी किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति का मोहताज न रहे. आज उनके विवाह की वर्षगाँठ है, जून ने कहा, नूना का कार्ड तो वही है और उसने कहा जब स्वयं को ही दे दिया तो उपहार में और क्या दे ? जून और वह गुरुकृपा से से ही इस प्रेम को पा सके हैं जो वस्तुओं का अथवा सामीप्य का भी मोहताज नहीं है. जून दोपहर को दिल्ली जा रहे हैं. वे प्रेम में हैं उसी तरह जैसे विवाह से पहले थे. ईश्वर को पा लेने के बाद हृदय से यूँ ही प्रेम छलकता है, और जून भी अब प्रभु की ओर कदम बढ़ा चुके हैं. आज सुबह पिताजी का फोन आया, फिर फूफाजी, बुआ जी का भी. सभी सखियों के भी फोन आ चुके हैं. कल रात छोटी बहन का फोन आया, वह थोड़ी सी उदास थी, ईश्वर से उसके लिए भी प्रार्थना है ! मौसम आज भी खुशनुमा है. सुबह नन्हे ने भी शुभकामना दी और उससे भी पूर्व कान्हा ने भी...वह प्रेममय ईश्वर सदा उनके साथ है, हर क्षण वह उनके निकटतम है...सब कुछ वही तो है !  


Friday, March 13, 2015

बारिश और छाता


कबिरा इस जग में आय के अनेक बनाये मीत
जिन बाँधी एक संग प्रीत वही रहा निश्चिंत !

उस एक से जब लौ लग जाती है तो जीवन फूल सा हल्का हो जाता है, कोई रूई के फाहों की तरह गगन में उड़ने लगता है. वह एक इतना प्यारा है, इतना अपना कि दिल भर जाता है उसकी याद में. वह हर पल मित्र की तरह साथ रहता है, कुशल-क्षेम को वहन करता है. उसकी कृपा असीम है, अपार है, उस पर किसी का जितना अधिकार है उतना संसार की किसी भी वस्तु पर नहीं. उसकी सारी बातें ही निराली हैं, उसका बखान करना जितना कठिन है उतना ही आसान भी ! एक शब्द में कहें तो प्रेम वही तो है, सभी में उसका ही प्रकाश है. सद्गुरु की आँखों में उसकी ही तो चमक है, उनकी मुस्कान में उसका ही रहस्य झलकता है, उनके हृदय की गहराई में एकमात्र वही बसता है. उस अशब्द परमात्मा को शब्दों से नहीं जाना जा सकता. वह मौन है उसे मौन में ही ढूँढना होगा. कोई जितना-जितना अपने आस-पास की ध्वनियों के प्रति सजग होता जाता हैं उतना-उतना ही उसे मौन का भी आभास होता है. दो ध्वनियों के बीच का मौन और वह बेहद प्रभावशाली होता है, शब्दों से कहीं ज्यादा, उस मौन में उसे अपने होने का अहसास तीव्रता से होता है. अपने वास्तविक शून्य रूप का ! वही उन्हें पहुंचना है, जहाँ न राग है न द्वेष, न संयोग हैं न वियोग, न अच्छा न बुरा ! उस अद्भुत लोक में प्रवेश करने के लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है. ध्यान का अर्थ है कोई अपने को जो आज तक मानता आया है उससे अलग सच्चे स्वरूप को जानना. ईश्वर को जानना हो तो अपने आप को जानना होगा.

आज सुबह ध्यान में नवीन अनुभव हुआ, जैसे वह एक गहरी सुरंग में उतरती जा रही है, फिर कुछ शब्द सुने जो अप्रिय थे. एक बार विपासना में सुना था आत्म मंथन के समय सभी तरह के अनुभव होंगे लेकिन यह याद रखना है जो उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है अत किसी भी अच्छी या बुरी संवेदना को महत्व नहीं देना है. मन को समत्व भाव में स्थिर रखना है. आज सुबह संगीत की कक्षा हुई. दोपहर को एक हास्य फिल्म देखी. अख़बार पढ़ा. नन्हा अभी तक कोचिंग से आया नहीं है, वर्षा हो रही है उसके पास छाता तक नहीं है. परसों शाम वह डांट खाने के कारण बहुत नाराजगी व्यक्त कर रहा था पर कल दोपहर उतनी ही ख़ुशी व्यक्त कर रहा था. हर रात के बाद सवेरा आता है, हर दुःख के बाद सुख. पिछले हफ्ते छोटी बहन का फोन सुनकर उसने उसे व्यर्थ ही सुझाव दिए. अस्वस्थ होना तो कोई भी नहीं चाहता पर अगर कोई किसी कारणवश हो भी जाता है तो दुखी होने का कारण नहीं है. “जो पहले नहीं था वह बाद में भी नहीं रहेगा” और वे मात्र शरीर तो नहीं हैं जो थोड़ी सी परेशानी से ही व्यथित हो जाएँ, भविष्य में ध्यान रखेगी. उन्हें अपनी आत्मिक शक्ति पर भरोसा रखना है. रोग तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं. बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, संत यही तो कहते आए हैं कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग ये चार व्याधियाँ ऐसी हैं जिनका भाजन हरेक को बनना है. इनसे कोई जीवात्मा बच नहीं सकता. आत्मा जो परमात्मा का ही अंश है अपनी जीने की इच्छा के कारण ही देह धारण करता है और फिर इन चारों के चक्रव्यूह में फंस जाता है. माया का बंधन काट दें तो इन चारों का अस्तित्त्व नहीं रहता ! 


आज तीन महीनों की छुट्टियों के बाद नन्हा स्कूल गया है. उसका हृदय उसके लिए शुभाशीष और शुभकामनाओं से युक्त है. जैसे आज तक वह अपनी पढ़ाई में सफल रहा है वैसे ही आगे भी रहेगा. आज सुबह वे तीनों सुबह चार बजे उठे. वह समय से पहले ही तैयार हो गया था. जून और उसने सुबह साधना भी की. ईश्वर के सम्मुख होकर यदि वे अपने दिन का आरम्भ करें तो दिन भर मन सात्विक भावों से पूर्ण रहता है. कृष्ण उनके अंतर में ज्ञान का दीपक जलाकर स्वयंमेव तम को मिटने का संकल्प करते हैं. कल इस का अनुभव हुआ, गीता का एक श्लोक उसे अपने आप याद आया और मन में विचारों की एक अनवरत श्रृंखला.. जो एक भाव को ही पोषित कर रही थी, प्रवाहित होने लगी, जैसे तेल की धार. उसे विश्वास है कि एक दिन एक ऐसा क्षण इसी जन्म में आयेगा जब उसके मन में ऐसा ठहराव आयेगा जिसके बाद और दौड़ नहीं करनी होगी. जब मन ध्यान में टिकाना नहीं पड़ेगा बल्कि टिका रहेगा. अभी उस लक्ष्य से दूर है, पर कृष्ण उसके साथ हैं. अंतर में उसी का उजाला, बुद्धि में उसी का प्रकाश और आत्मा में उसी का प्रेम...वह प्रिय से भी प्रिय उसके मन पर अपना पूर्ण अधिकार कर चुका है ! वही उसे मुक्त करता है इस जग से !