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Tuesday, November 3, 2015

शायरी की खुशबू



आज हालात ठीक हैं, मौसम खुला है बाहर का भी भीतर का भी, अभी-अभी जून का फोन आया, उन्हें कुछ दवाओं के नाम चाहिए.... उसके बाद वह हिंदी अनुभाग गयी, हिंदी अधिकारी से कवितायें भेजने तथा किताब की भूमिका लिखवाने की बात की, वापस आकर चाय पी और बच्चों को पढ़ाया. ‘वाक्य’ पढ़ाते समय मिश्र वाक्य में थोडा संदेह हुआ, उसे स्वयं भी पढ़ना होगा. आज शाम क्लब भी जाना है. क्लब की पत्रिका के लिए एडीटोरियल ग्रुप का फोटो सेशन होगा. कल उनके इस नये कमरे में पहली बार सत्संग होगा, अच्छा होगा, इस कमरे में आते ही कैसी शांति का अनुभव होता है. नीला कारपेट, गुरूजी की तस्वीर, राधा-कृष्ण की मूर्ति तथा दीपदान सभी सात्विक वातावरण पैदा करते हैं ! लेकिन जब तक भीतर समता न हो, ज्ञान न हो, बाहर का वातावरण पूर्ण रूप से सहायक नहीं हो पाता है. उसने तो वर्षों पहले से ही बाहर देखना बंद कर दिया है, वह भीतर देखती है किस तरह मन अभी भी छल-कपट, परनिंदा, परदोष देखने में लिप्त होता है, कैसे मन अभी भी बिना वजह सोचता है ऊलजलूल सोचता है, पर अब वह स्वयं मन से हट जाती है तो मन की बात अपनी नहीं लगती. वह जैसे एक नादान बच्चा हो, उसकी बातों पर क्या ध्यान देना. पर अब भी राह चलते कोई दृश्य देखकर भीतर जो कम्पन होता है, सद्गुरु कहते हैं आत्मनिंदा से साधक को बचना चाहिए, तो जो कुछ मन का है वह आत्मा का नहीं, आत्मा तो सदा निर्दोष है जैसे उसकी वैसे हर एक की !

कल फोटोसेशन हो गया, आज भी क्लब में मीटिंग है, वही सोविनियर के बारे में. इस समय डेढ़ बजे हैं दोपहर के, वह ध्यान कक्ष में है. अभी तक नया माली नहीं मिला है, सो लॉन की हालत बहुत खराब हो रही है, देखे, कौन से हाथ हैं जो इसे संवारेंगे. कल लाइब्रेरी से कुछ नई किताबें लायी है. आज सुबह गुरूजी को सुना, छोटी-छोटी गूढ़ ज्ञान युक्त बातें उन्होंने सूत्र रूप में कहीं. वह जैसा कहते हैं वे उसे मानें तो यह जग कितना सुंदर हो जाये. यह जग तो सुंदर है ही, वे जब तक अन्यों में दोष देखना बंद नहीं करते, जगत उन्हें असुन्दर ही लगेगा. नीरू माँ कहती हैं सभी को निर्दोष देखो. ज्ञानी सभी को शुद्ध आत्मा ही देखते हैं. वह कभी किसी की कमियां नहीं देखते, बल्कि सभी को उनके शुद्ध स्वरूप का ज्ञान करा देते हैं तो कमियां आपने आप छिटक जाती हैं. कोई जब कमियां देखता है तो उसके मन में भी उस कमी का भाव दृढ़ हो जाता है. वह न चाहते हुए भी उसके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं. यह जगत जैसा है वैसा है. उन्हें चाहिए, हो सके तो किसी की सहायता कर दें, न हो सके तो अपने हृदय को खाली रखें, उसमें संसार की कमियां तो न ही भरें. इस नाशवान, स्वप्नवत संसार के पीछे छिपे तत्व को पहचानें और उसी पर नजर रखें !

आज मुरारी बापू के सत्संग में उसने कुछ उम्दा शायरी सुनी टीवी पर –

खुद से हाल छिपाना क्या, दर्पण से शर्माना क्या
चाहत तो बस चाहत है, चाहत का जतलाना क्या

जो खुलकर भी बंद लगे उस दरवाजे जाना क्या
लौ से बचता फिरता है ऐसा भी परवाना क्या

तू पत्थर की ऐंठ है मैं पानी की लोच
तेरी अपनी सोच है मेरी अपनी सोच  

लौ से लौ को जोड़कर बनजा तू मशाल
फिर तू देख अंधेरों का क्या होता है हाल

काम न आएँगी ये दम तोडती शमें
नये चिराग जलाओ बहुत अँधेरा है !


Tuesday, July 21, 2015

नीरू माँ की शिक्षा


आज ध्यान में कैसी खुमारी छा रही थी. नाश्ते में दलिया, पोहा और एक ‘बनाना’, लिया था, अन्न का भी एक नशा होता है. यह ध्यान था या नींद थी, कैसे कह सकते हैं. सद्गुरु कहते हैं ध्यान के बाद तो चेतनता का स्तर बढ़ जाना चाहिए. नींद के बाद भी एक ताजगी आती है पर मन उतना सचेत नहीं रहता. उसका मन पूर्ववत है, एक सा, एक शांत सरोवर की तरह. सर के ऊपरी भाग में एक अजीब सी सनसनाहट का अनुभव हो रहा है. कई बार होता है एक सिहरन या कहें स्पंदन महसूस होता है. कभी-कभी पूरे शरीर में ही अद्भुत रोमांच और कम्पन होता है ध्यान में. पता नहीं कितने रहस्य छुपे हैं चेतना में, जगत भी दीखता है. स्वप्न में भी तो चेतना कितने अद्भुत दृश्य गढ़ लेती है. कल स्वप्न में देखा फिर वह एक मुस्लिम मोहल्ले में फंस गयी है. वहाँ एक के बाद एक घर ही नजर आते हैं, न कोई सड़क न गली, घरों के दरवाजों से गुजरकर ही जाना पड़ता है यदि कहीं बाहर जाना हो. यह स्वप्न उसे अनेकों बार आ चुका है शायद किसी पूर्वजन्म की स्मृति है. गुरुमाँ कहती हैं जिस तरह जगने के बाद स्वप्न महत्वहीन हो जाता है वैसे ही संतजन इस जगत को स्वप्न मानकर कोई महत्व नहीं देते !

“घर में वृद्ध माता-पिता हों तो घर में ही तीर्थ होता है, उनकी सेवा करने से ही सारे तीर्थों का सेवन करने का पुण्य मिल जाता है.” स्वामी रामसुखदास जी का प्रवचन सुनकर हृदय पर कैसा मीठा आघात होता है, शहद की तरह मीठी उनकी वाणी और उससे भी मधुर ईश्वर के प्रेम में रची-बसी जैसे चाशनी में डूबी हो, ऐसी हँसी उसके अंतर को छू जाती है. उसने सद्गुरु को भी सुना. नन्हे बच्चों को कैसे संस्कार दें, इस पर चर्चा कर रहे थे. पहले लिंग, मूर्तिपूजा, मन्त्र जप, मन्दिर आदि के महत्व पर प्रकाश डाला. अद्भुत ज्ञान का भंडार है उनके पास और कैसी सहज, बालवत् निश्छलता. संतों के अलावा जगत में किसको जीने की कला आती है, उधर स्वामी रामदेव जी हैं जो उन्हें कितने भिन्न-भिन्न तरीकों से देह से ऊपर ले जाना चाहते हैं, वे अद्भुत क्रान्तिकारी संत हैं, उनकी वाणी भीतर जोश भरती है. गुरूमाँ तो साक्षात् सरस्वती हैं, कितना प्रेम है उनकी वाणी में, उनके हृदय में. नीरूमाँ की ज्ञान की विधि कैसी अनोखी होगी कि लोग अपनी फाइलें सुधारने लगते हैं. ये सारे संतजन उसे बहुत प्यारे हैं. सभी को उसने अनंत-अनंत नमन किये. सद्गुरु तो और भी निराले हैं, वह कहते हैं कुछ मान के चलो, कुछ जान के चलो. वे भावना पर बल देते हैं. वे भीतर के विश्वास को दृढ करना चाहते हैं वे ज्ञान को बोझिल नहीं बनाते. हर संत अपने आप में अनूठा होता है. सबके रास्ते भिन्न-भिन्न हैं मंजिल एक ही है, उसे भी एक ही मार्ग पर चलना है, सद्गुरु के मार्ग पर !  फिर उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, वही तो हैं जो भिन्न-भिन्न रूप धर कर ज्ञान फैला रहे हैं. एक ही सत्ता है जो चारों ओर फैली है, वही भीतर है वही बाहर है. वही उसे सत्य के मार्ग की ओर ले जाएगी ! उसने प्रार्थना की कि उसका हृदय किसी के प्रति राग-द्वेष से लिप्त न रहे.  


कल उसे हल्का जुकाम था, आज अपेक्षाकृत शरीर स्वस्थ है. सारे रोग प्रज्ञापराध के कारण ही होते हैं. पर इससे उसे कितना कुछ सीखने को मिला है. एक तो देह से अलग जानकर स्वयं को स्वस्थ जानने का अभ्यास. दूसरा नम्रता का पाठ, जो रोग पढ़ाता है. पिछले दिनों उसने अन्यों की बीमारी को देखकर उन्हें दोषदृष्टि से देखा. उससे मुक्त करने के लिए शायद यह रोग आया, ताकि वह स्वयं को सजग तथा अन्यों को असजग न समझे. प्रकृति उसे दोष रहित देखना चाहती है.